*ईदुल अज़हा (प्रचलित शब्द - बकरीद) पर उठने वाले ऐतराज़ का जवाब*
*इस्लाम मे जीव हत्या उचित या अनुचित*
*क़ुरबानी का उद्देश्य*
क़ुरबानी का एक उद्देश्य तो सभी जानते हैं जो हज़रत इब्राहीम अ. से जुड़ा है लेकिन क़ुरबानी का एक दूसरा पहलू भी है।
पशुओं की कुरबानी का आशय ये भी है कि पैसे वाला मनुष्य, उन निर्धन मनुष्यों को वो भोजन दान करे, जो मनुष्य निर्धनता के कारण कभी पौष्टिक भोजन करने की बात भी नही सोच पाते। वे अक्सर भूखे रहते हैं, या जब भोजन करते हैं तो न्यून पौष्टिकता वाला भोजन करते हैं ,क्योंकि वो भोजन सस्ता होता है, ऐसे मे निर्धन लोग कुपोषण और अनेक रोगों का शिकार हो जाते हैं। अल्लाह स्पष्ट रूप से फरमाता है कि कुरबानी का मांस मनुष्य के स्वयं के उपयोग के लिए और गरीबों को दान करने के लिए है, न कि अल्लाह को भेंट चढ़ाने या धनी संपन्न व्यक्ति के लिए :-
पवित्र क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है : -
*न उनका मांस अल्लाह के यहाँ पहुंचता है और ना खून। उसे तो तुहारे दिल की परहेज़गारी पहुँचती है।।(क़ुरआन 22:37)*
*" ताकि वो उन लाभों को देखें जो वहाँ उन के लिए रखे गए हैं, और कुछ ज्ञात और निश्चित दिनों में उन चौपायो पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दिए हैं . फिर उस मे से खुद भी खाओ और भूखे तंगहाल को भी खिलाओ "*
[ पवित्र कुरान 22:28 ]
तो बकरीद मे हम पशु की कुरबानी कर के न उस का मांस जलाते हैं, न व्यर्थ फेंकते हैं, बल्कि मांस के तीन भाग करते हैं एक भाग निर्धन मोहताजो को दान करते हैं, दूसरा भाग अपने कमजोर आर्थिक स्थिति वाले दोस्त और रिश्तेदारों को वरीयता देने का आदेश है, और तीसरा भाग स्वयं के खाने के लिए रखते हैं। इससे उसके अंदर सोशल रिस्पांसिबिलिटी का भाव पैदा होता है और वह समाज से सकारात्मक रूप से जुड़ता है। समाज उपयोगिता को जानता है वह समाज के लिए उपयोगी बनता है और समाज के लोग उसको फायदे का आदमी समझ कर पहले से ज्यादा आदर और सहयोग देते हैं। और पवित्र हदीस मे ये आदेश है कि यदि हमारे आसपास निर्धन लोग अधिक हैं तो हमें सारा का सारा मांस उनमें दान कर देना चाहिए ॥
इसके अलावा एक बुराई कंजूसी है। कंजूस आदमी माल जोड़ने पर यकीन रखता है, खर्च करने में नहीं। दूसरों पर अपना माल खर्च करने में तो बिल्कुल नहीं क्योंकि वे तो अपने ऊपर भी मालामाल खर्च नहीं करते। कुर्बानी का बकरा खरीदने में अपना माल कुर्बान करना पड़ता है और इस तरह कंजूसी की बुराई कुर्बान हो जाती है। और जो भूमिहीन ग़रीब लोग कुछ कर नहीं सकते। वे बकरे पालकर जंगल की फ्री की घास खिला कर उसे बड़ा कर लेते हैं। उनके बकरे बकरियां बक़रीद के अवसर पर महंगे दामों पर बिक जाती हैं और उनको आर्थिक बल मिल जाता है। राजस्थान में जहां हरियाली मैदान कम है वहां कटीली झाड़ियों पर पलकर बकरियां अपने मालिकों को करोड़ों रुपये का आर्थिक लाभ देती है जो रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाके के लोगों की अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। इस तरह उनके हाथ में धन आने से उनकी गरीबी की बलि चढ़ जाती है। यह चौथी बुराई थी जोकि सैकड़ों बुराईयों पर, तन बेचने तक पर मजबूर करती है। देश की बेटियों की अस्मत बिकने से बचाती है क़ुर्बानी की परंपरा।
ईद के अवसर पर चमड़ा ज़्यादा होने से अमीर पूंजीपतियों को यह सस्ते दामों में मिल जाता है और वे उससे विभिन्न उत्पाद तैयार करके अच्छी क़ीमत पर एक्सपोर्ट करते हैं जिससे चर्मकारों को रोजगार मिलता है। विदेशी मुद्रा भारत में आती है और भारत का रुपया मज़बूत होता है। जिससे वह रक्षा उपकरण खरीदना है और बहुत सा एक्स वी टैक्स भी प्राप्त करता है इस तरह कुर्बानी की परंपरा देश को मजबूत बनाने में और सुरक्षित रखने में भी बहुत बड़ा योगदान देती है।
आर्थिक रूप से कमजोर होकर विदेशों का गुलाम हो जाना सबसे बड़ी बुराई है। इस बुराई की बलि भी कुर्बानी की परंपरा के कारण चढ़ती रहती है। सो बकरीद की कुरबानी हमारे विचार मे कोई बेकार का आडम्बर नही बल्कि मोहताज की सेवा का एक बड़ा पुण्य कार्य है ॥
अंत मे इतना ही कहना चाहता हूँ कि ईश्वर की दी हुई नेमतों को व्यर्थ नष्ट करना वाकई एक बडा पाप है क्योंकि दुनिया मे संसाधन सीमित हैं , यदि हम धार्मिक त्योहार के नाम पर अनाज को बालि का आधार बनाकर जलाकर नष्ट कर देते है, त्योहार के नाम पर पेड़ काटकर लकड़ियाँ व्यर्थ ही जला डालते है, त्योहार के नाम पर दूध और मिठाई जैसी खाने पीने की महंगी चीजें नदी नालों मे बहाकर व्यर्थ कर देते है, तो उस की जरूर निन्दा करनी चाहिए, क्योंकि एक तो ये सारे काम जीवहत्या भी हैं। दूसर; इन संसाधनो को व्यर्थ नष्ट कर के हम कहीं न कहीं, किसी न किसी को भूखा जरूर मार देते हैं। पर हम पाते हैं कि बकरीद मे ऐसी कोई संसाधनो की बरबादी नहीं होती है॥
*मांसाहार करना पूर्णतः गलत है!*
समीक्षा:-
आधुनिक युग में वैज्ञानिक शोध के बाद यह मालूम हुआ कि भोजन का मक़सद है कि जिस्म को ऐसा आहार मुहैया करना जिसे मौजूदा ज़माने में संतुलित आहार (balanced diet) कहा जाता है। जिसमें बुनियादी तौर पर 6 तत्व शामिल हैं-
A balance diet is one which cotains carbohydrate, protein, fat, vitamins, mineral salts and fibre in the correct proportions .
इन तत्वों में से प्रोटीन (protein) की अहमियत बहुत ज़्यादा है क्योंकि प्रोटीन का हमारे जिस्म की बनावट में बुनियादी हिस्सा है।
Protein is the main building block of our body .
प्रोटीन का सबसे बड़ा ज़रिया मांसाहार है। मांस से हमें उत्तम प्रोटीन मिलता है। मांस के अलावा अन्य चीज़ों से भी कुछ प्रोटीन मिलती है लेकिन वह अपेक्षाकृत निम्न स्तरीय होती है। Meat is the best source for high-quality protein . Plant protein is of a lower biological value. मज़ीद यह कि मांसीय प्रोटीन और ग़ैर-मांसीय प्रोटीन का विभाजन भी सिर्फ़ समझने की ग़र्ज़ से है, वह वास्तविक विभाजन नहीं है। इसलिये कि सूक्ष्मदर्शी के अविष्कार के बाद वैज्ञानिकों ने जो अध्ययन किया है उससे मालूम होता है कि सभी खाद्य सामग्री के अन्दर बेशुमार बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं जो पूरी तरह जीवधारी होते हैं। मांस से भिन्न जिन खाद्य चीज़ों के बारे में समझा जाता है कि उनमें बड़ी मात्रा में प्रोटीन होता है मस्लन दूध, दही, पनीर वग़ैरह, वे सब बैक्टीरिया की सूक्ष्म प्रक्रिया के ज़रिये ही अंजाम पाता है। बैक्टीरिया का अमल अगर उसके अन्दर न हो तो किसी भी ग़ैर-मांसीय भोजन से प्रोटीन हासिल नहीं किया जा सकता।
बैक्टीरिया को विज्ञान की भाषा में माइक्रो-ओर्गेनिज्म (Micro organism) कहा जाता है, यानि सूक्ष्म जीव। इसके मुक़ाबले में बकरी और भेड़ वग़ैरह की हैसियत मैक्रो-ओर्गेनिज्म (macro-organism) की है यानि विशाल जीव। इस हक़ीक़त को सामने रखिये तो यह कहना बिल्कुल सही होगा कि
हर आदमी व्यवहारतः मांसाहार कर रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि तथाकथित शाकाहारी उसे सूक्ष्म जीवों के रूप में ले रहे हैं और नॉन-वेजिटेरियन लोग उसे बड़े जीवों के रूप में ले रहे हैं।
दूसरे अल्फ़ाज़ में यह कि हर इनसान का पेट एक बहुत बड़ा स्लॉटर हाउस की हैसियत रखता है। इस अदृष्ट स्लॉटर हाउस में रोज़ाना मिलियन एंड मिलियन सूक्ष्म जीव ख़त्म होते रहते हैं। इनकी संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि सारी दुनिया में बड़े जानवरों के जितने स्लॉटर हाउस हैं उन सबमें कुल जितने जानवर मारे जाते हैं उनसे असंख्य गुना ज़्यादा ये सूक्ष्म जीव मारे जाते हैं।
इस सारे मामले का ताल्लुक़ रचयिता की सृष्टि योजना से है। उस रचयिता ने सृष्टि का जो विधान निश्चित किया है, वह यही है कि इनसान के जिस्म की आहार संबंधी ज़रूरत ज़िन्दा जीवों (living organism) के ज़रिये पूरी हो। प्राकृतिक योजना के मुताबिक़ ज़िन्दा जीवों को अपने अन्दर दाखि़ल किये बिना कोई मर्द या औरत अपनी ज़िन्दगी को बाक़ी नहीं रख सकता। उस रचयिता के विधान के मुताबिक़ ज़िन्दा चीज़ें ही ज़िन्दा वजूद की खुराक बनती हैं। जिन चीज़ों में ज़िन्दगी न हो, वे ज़िन्दा लोगों के लिए खुराक की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकतीं। इसका मतलब यह है कि वेजिटेरियनिज़्म (vegetarianism) और नॉनवेजिटेरियनिज़्म (non-vegetarianism) की परिभाषायें सिर्फ़ साहित्यिक परिभाषाएं हैं, वे वैज्ञानिक परिभाषाएं नहीं हैं।
माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है. यह न तो किसी धर्म-विशेष की जागीर है और न ही मानने या मनवाने का विषय है. कुल मिलकर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह साग-सब्जियां आदि शाकाहारी चीज़ें और माँस भी ख़ा सकता है और उसे पचा सकता है. इससे न तो पर्यावरण-प्रेमियों को कुछ ऐतराज़ होना चाहिए और न ही इससे जानवरों के जानवराधिकार का ही हनन. अगर आपको माँस पसन्द हो तो माँस खाइए और अगर सब्जियां पसन्द है तो सब्जियां. आप सर्वाहारी जीव हैं.
जीव-हत्या का अपने आप में सही अथवा ग़लत होना इस बात पर निर्भर करता है कि इसका 'उद्देश्य' क्या है? मसलन अगर एक मेंढक को अनर्थ मार कर फेंक दिया जाए तो यह किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होगा. यह हत्या, निर्दयता और पाप है लेकिन वहीँ चिकित्सा-विज्ञान के छात्रों शल्य-प्रशिक्षण देने के उनके द्वारा मेडिकल-कॉलेज में जो मेंढक की चीर-फाड़ की जाती है वह निरर्थक और व्यर्थ न होकर मनुष्य और मानव जाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा और न ही पाप बल्कि लाभदायक, वांछनीय और सराहनीय है.
और मेरा विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही एक मापदंड है और यह मापदंड सम्पूर्ण मानव-समाज में प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है. यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तक़ाज़ों के अनुकूल भी !
*जीव हत्या और मांसाहार पर कुछ तार्किक उत्तर*
‘‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने न केवल मांसाहार का निशेध किया है बल्कि यह भी कहा है कि मांसाहारी मनष्यों का संग करने व उनके हाथ का खाने से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगता है। यह भी लिखा है कि पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाला जानिए। (10-25) एक आर्य समाज के विद्वान से कुछ खास विषयों पर चर्चा हुई, उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी अन्य सारी बातें मानने को तैयार हूँ मगर जीव हत्या कर मांस खाने को मैं धर्मशास्त्र व मानव प्रकृति के अनुकूल नहीं मानता। निरीह, मूक पशु-पक्षियों को काट कर खाना न केवल निंदित व निषिद्ध है, बल्कि जघन्य अपराध भी है।
उन्होंने यहां तक भी कहा कि जो कौमे पशुओं को ज़िब्ह करती हैं, वो कट्टर, बेदर्द और बेरहम हो जाती हैं और उन कौमों को फिर मनुष्यों को मारने व काटने में कोई दया व हिचक महसूस नहीं होती। मैंने उनसे पूछा कि जो लोग भ्रूण हत्या कर रहे हैं, अपनी ही निरीह, मूक व निपराध संतान की पेट में ही टुकड़े-टुकड़े कराकर निर्दयता के साथ हत्या करा रहे हैं क्या उनकी यह कट्टरता पशुओं को ज़िब्ह करने व मांस खाने का परिणाम हैं ? क्या इससे अधिक कट्टरता व बेरहमी कोई और हो सकती है ? क्या यह मनुष््य की बेदर्दी की पराकाष्ठा नहीं है ?
मैंने उनसे पूछा कि आप बताइए “शेर मांस क्यों खाता है ? उन्होंने कहा कि जानवरों में बुद्धि नहीं होती, उनको अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता। अगर मनुष्य भी ऐसा ही करता है तो फिर उसमें व जानवरों में अंतर ही क्या रहा ? मैंने उनसे कहा कि हाथी मांस नहीं खाता तो क्या वह बुद्धिमान होता है ? उन्होंने दोबारा अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि मांस तामसी भोजन है, इसको खाने से बुद्धि भी तामसी हो जाती है, ‘‘जैसा खाये अन्न वैसा हो जाए मन’’ मांस मानव बुद्धि व शरीर दोनों के लिए हानिकारक है।
मैंने उनसे कहा कि वैज्ञानिकों का बौद्धिक स्तर सबसे ऊंचा होता है, शायद ही विश्व में कोई वैज्ञानिक ऐसा हो जो मांस न खाता हो। क्या उनकी बुद्धि को तामसी कहा जा सकता है ? बाद में उन्होंने इस विषय को पूर्वकृत कर्मों के परिणामों से जोड़कर चर्चा समाप्त कर दी। एक अन्य आर्य समाज के विद्वान ने ‘‘आतंकवाद, समस्या व समाधान’’ विषय पर बोलते हुए कहा कि आतंकवाद का प्रमुख कारण मांसाहार है। तामसी भोजन खाने से बुद्धि तामसी हो जाती है फिर मनुष्य को आतंक ही सूझता है। अगर विश्व में मांसाहार पर पाबंदी लगा दी जाए तो आतंकवाद की समस्या का समाधान हो सकता है। उनका इशारा तो एक विशेष क़ौम की तरफ़ था, मगर मांस तो विश्व की सभी क़ौमे खाती हैं।
वनस्पति वैज्ञानिक अनेक शोधों द्वारा इस अंतिम निश्कर्ष पर पहुंच गए हैं कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है कि मनुष्य, पशु व पेड़-पौधों आदि में जीव एक जैसा है जो कर्मानुसार एक योनि से दूसरी योनि में आता जाता रहता है। (9-75) इसलिए न तो केवल पशु-पक्षियों आदि को खाना महा पाप हुआ बल्कि पेड़-पौधों को खाना भी जघन्य अपराध हुआ।
पशु-पक्षियों को अगर ज़िब्ह किया जाए तो वे अपना विरोध प्रकट कर सकते हैं, मगर पैड़-पौधों से अधिक लाचार व बेबस और कौन होगा जो अपना विरोध तक प्रकट नहीं कर सकते ? उनको काटना व खाना तो और भी अधिक पाप होगा। तो क्या शाक सब्जियों व फलों आदि को भी नहीं खाना चाहिए। अब अगर हम विज्ञान के सत्य को झुठला भी दें कि पेड़- पौधों में जीवन नहीं है तो क्या हम यह भी झुठला सकते हैं कि जिन शाक-सब्जियों व फलों को हम खाते हैं उनको उत्पन्न करने में कितनी बड़ी संख्या में जीवों की हत्या होती है ?
एक आम के पेड़ पर लगने वाला कड़ी कीड़ा लाखों-करोड़ों की तादाद में होता है। ईख व ज्वार की फ़सल पर लगने वाला पाइरिल्ला एक हेक्टेयर खेत में अरबों-खरबों की तादाद में होता है। चने आदि की फ़सल को लगने वाली सूंडियां व गिडारें कुछ ही दिनों में पूरी फ़सल नष्ट कर देती हैं। असंख्य जीवों की हत्या कर किसान गोभी, बैगन, शाक-सब्ज़ी उत्पन्न करता है। अनेक बीमारियों से बचने के लिए हम कीटनाशकक दवाएं प्रयोग करते हैं। घरों में महिलाएं मक्खी, मच्छर, जूं व रसोई घर में रखे दाल, चावल, गेहूं आदि में पैदा होने वाले कीड़ों को मारने में कोई झिझक अथवा ग्लानि महसूस नहीं करती। क्या इन सब जीवों को मारना जीव हत्या के दायरे में नहीं आता ? क्या इन सबसे बचा जा सकता है ? क्या भैंस, गाय, बकरी आदि को मारने ही को जीव हत्या कहते हैं?
यह भी विचारणीय है कि हिंदू संगठन केवल गो-हत्या का विरोध करते हैं, जबकि ऊंट, भैंस, बकरा, मछली आदि भी गाय जैसे ही जीव हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो जीव को आदि अमर व अजर बतलाते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या की बात करते हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो कर्मानुसार फल भोग की बात करते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या को पाप व जघन्य अपराध की संज्ञा देते हैं। अफ़सोस इस बात का है कि धर्मशास्त्र व विज्ञान दोनों की अनुमति के बावजूद भी इस विषय को विवाद का विषय बनाया गया व बनाया जा रहा है और कुछ मांस खाने वाले हिंदू भाई भी रुग्ण मानसिकता का शिकार होकर मांसाहार का विरोध कर रहे हैं।
हमारे एक साथी जो मांसाहार का पुरजोर विरोध करते हैं, बारह ज्योति-लिंगों के दर्शन हेतु भारत भ्रमण पर निकले। वापसी होने पर यात्रा के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के लोग उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। मैंने उनसे पूछा कि दक्षिण भारत के लोग मांसाहारी होते हैं और आपके अनुसार मांस खाना पाप व अधार्मिक कृत्य है तो फिर वे लोग धार्मिक कहाँ, पापी हैं। उन्होंने अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि दक्षिणी भारत की भौगोलिक परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि वहां मांस खाने को पाप नहीं कहा जा सकता। ये विचार किसी आम व्यक्ति के नहीं बल्कि वर्ग विशेष में
अपनी एक खास पहचान रखने वाले व्यक्ति के हैं।
अनेक बीमारियों की दवाएं ऐसी हैं जिनको अनेक पशु-पक्षियों के अंशों से बनाया जाता है। कुछ खास बीमारियां जैसे - सांस, क्षयरोग आदि में चिकित्सक बकरा, मछली व पक्षियों आदि का मांस खाने की सलाह देते हैं। किसानों की अत्याधिक मांग पर उत्तर प्रदेश सरकार ने नील गाय को नील घोड़ा नाम देकर मारने के शसनादेश जारी किए हैं, ताकि वे किसानों की खड़ी व पकी फ़सल को बरबाद न करें। चूहों से फसल को बचाने के लिए सरकार गीदड़ों की व्यवस्था करती है। भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल व उत्तराखण्ड आदि में गैर-मुस्लिम समाज में बलि की प्रथा प्रचलित है जो बड़ी निर्दयता व निर्भयता से की जाती है। नेपाल में वीरगंज के समीप गढ़ी माई मंदिर में हर वर्ष करीब 200000 (दो लाख) पशुओं की बलि दी जाती है। नाहन (सिरमौर) गिरिपार में माघी के दिन हर वर्ष हजारों बकरों की बलि दी जाती है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोडा की पत्नी गीता कोडा ने रांची के रजप्पा मंदिर में 11 बकरों की बलि दी (अमर उजाला, 7.11.2009)।
यह भी विचारणीय है कि जो पशु-पक्षी खाने में इस्तेमाल किए जाते हैं उनकी संख्या में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। संख्या के एतबार से देखा जाए तो मछली विश्व में सबसे अधिक खाई जाती है मगर मछली का उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। कुछ जीव जैसे शेर, हाथी आदि खाने में इस्तेमाल नहीं होते, उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। यह भी विचारणीय है कि विश्व में बहुत से देश ऐसे हैं जो केवल पूरी तरह मांसाहार पर ही निर्भर हैं। ग्रीन लैंड और उत्तरी अमेरिका में समुद्र तटों पर बसने वाली जाति स्कीमों की रोटी, कपड़ा और मकान आदि मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति समुद्री जीवों द्वारा ही होती है। उनका जीवन पूर्णतः मांस पर ही निर्भर है।
यह भी विचारणीय है कि नन्हीं-सी चींटीं व मकड़ी मांसाहारी होती है, जबकि विशालकाय हाथी व ऊँट मांसाहारी नहीं होते। बहुत से मध्यम ऊँचाई के पेड़-पौधे मांसाहारी होते हैं, जबकि विशालकाय वट व पीपल वृक्ष मांसाहारी नहीं होते। बगुले को केला व सेब और छिपकली को हम दाल व चावल खाना नहीं खिला सकते। अगर हमें विश्वास है कि कोई सृष्टिकर्ता है तो यह उसी की व्यवस्था है। पृथ्वी पर कोई भी जीव अथवा पौधा मनुष्य जाति का मोहताज नहीं है। पीपल, तुलसी, चींटी, बंदर व गाय आदि मनुष्य की वजह से जीवित नहीं हैं, मगर मनुष्य इन सबके बिना जीवित नहीं रह सकता। सभी जीव-जन्तु व पेड़-पौधे मनुष्य जाति की आवश्यकता है। वास्तविकता भी यह है कि सृष्टिकर्ता ने इन सबको पैदा ही मनुष्य जाति के उपयोग के लिए किया है।
स्वामी जी ने मांसाहारी मनुष्यों को इतना अधिक मलेच्छ, अछूत, घृणित व पापी माना है कि उनके संग करने मात्र से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगने की सम्भावना व शंका व्यक्त की है, तो क्या मांसाहारी मनुष्यों का संग करने से बचा जा सकता है ? दूसरी बात बिना जीव हत्या के गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि को पैदा नहीं किया जा सकता, अगर हम कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल न भी करें फिर भी खेत जोतने-खोदने में ही असंख्य जीवों की हत्या होती है, तो क्या बिना गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि खाये बिना मनुष्य जिन्दा रह सकता है ? क्या ये आदर्श व सिद्धान्त तार्किक व व्यावहारिक हैं?
स्वामी जी ने मनुष्य, पशु व पेड़-पौधों में जीव एक जैसा बताया है, फिर तो स्वामी जी के मतानुसार पेड़-पौधों को न केवल खाना बल्कि काटना भी पाप व अपराध हुआ, क्योंकि जिन पेड़-पौधों को हम काट रहे हैं, हो सकता है उनमें हमारे ही किसी सगे-संबंधियों की आत्मा विद्यमान हो।
स्वामी जी की दोनों बातें वेद विरूद्ध तो है हीं, अव्यावहारिक व अतार्किक भी हैं। मांस खाना धर्म शास्त्र व चिकित्सा विज्ञान दोनों की दष्टि से मानव के लिए लाभकारी भी है और मानव की प्रकृति के अनुकूल भी। यह अलग विषय है कि किस पशु-पक्षी का मांस खाया जाए और किसका न खाया जाए तथा किस विधि से काटा जाए। दूसरी बात मानव, पशु व पेड़- पौधों में जीव भी एक जैसा नहीं है, मानव की जीवात्मा कर्म करने में स्वतंत्र व ईश्वर के प्रति जवाबदेह है, जबकि पशु व पेड़-पौधे आदि स्वभाव से बंधे हैं, न उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान है और न ही किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता।
मेरा उदेश्य किसी को ठेस पहुचना नहीं है मगर इसपे बिचार करें ।
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क़ुरबानी हो या फिर वली धर्म के नाम पाखंड है ||
पशु काटना अगर धर्म है तो अधर्म किसे कहेंगे ?
प्रायः लोगों को पता है की मानव समाज में ही एक सम्प्रदाय है दुनिया जिन्हें मुसलमान के नाम से पुकारते हैं | यह इस्लाम के मानने वाले भी अपने को धर्म कहते हैं या दुनिया के लोग भी इसे इस्लाम धर्म कहते हैं |
इन की बुनियाद या भिंत पाँच चीजों पर है, जो निम्न प्रकार है नियम
{1} कलमा पढना जुबान से इकरार करना और दिलसे मानना
{2} नमाज पढना जो दिन में पाँच बार अनिवार्य है हर मुसलमान कहलाने वाले बालिग {जवान} औरत, व मर्द के लिए |
{3} रोज़ा रखना जो साल में एक महिने का होता है सूर्योदय से सूर्यास्त तक निज्जला उपवास रहना थूक तक हलक में ना जाने देना |
{4} जकात देना यानि अगर एक सौ 100 रुपया जमा हो तो उसमें से ढाई 2.50 पैसे किसी गरीब मुसलमान या किसी इस्लामी संस्था को दान करना |
{5} है हज करना, इसी हज के महीने में पशु के गले में छूरी चलाना या पशु को काटना इसे ख़ुशी मानाना कहते हैं जिसे ईदुज्जोहा अथवा बकरीद कहते हैं
संभवतः आज 31 जुलाई 20 के दिन बकरीद वाला दिन होगा | सम्पूर्ण धरती को तीन दिन तक पशुओं के खूनसे रंगाया जायगा | अर्थात जिसे कुर्वानी समर्पण सेकरीफाईज भी कहते हैं | यह तीन दिन तक कुर्वानी दिया जा सकता है | यह इस्लाम की बुनियादों में पाँचवा पिलर माना जाता है |
यह परिपाटी हजरत मुहम्मद {स} से नहीं चली, यह परिपाटी या कार्यक्रम हज़रत इब्राहीम नामी एक पैगम्बर से चली है, जिनके एक दासी थी जो एक राजा ने उन्हें गिफ्ट दिया था जिन दासी का नाम हाजरा था इन्ही दासी से पैगम्बर इब्राहीम ने एक बेटे को उत्पन्न किया था, जिस बेटे का नाम इस्माईल था | कुरान नामी पुस्तक में इसका प्रमाण है |
अल्लाह ने अपने पैगम्बर को ख्वाब दिखाता है, तुम्हारा जो सबसे प्यारा चीज है उसे हमारे रास्ते में कुर्बान करो | जब की उस मां, बेटे को घर से निकाल कर एक मरुभूमि में छोड़ आये थे |
बड़ी लम्बी कहानी है फिर कभी लिखूंगा | इसी लड़के की क़ुरबानी अल्लाह ने चाही, इब्राहीम ने ख्वाब देखा तीन दिन, सुन रहे थे की अल्लाह उन्हें क़ुरबानी देने के लिए खवाब दिखा रहे हैं |
लगातार 100 ,100 , ऊंट रोजाना काटते रहे, अल्लाह को यह सब क़ुरबानी पसंद नहीं | और फिर ख्वाब दिखाया तो इब्राहीम ने जिस मां बेटे को घर से बाहर कर आये थे एक ब्याहबान में छोड़ आये थे, वहां पहुंचे और अपने जन्म दिए बेटे को क़ुरबानी देने के लिए अपने साथ बच्चे की माता से जुदा कर ले गये |
मानव कहलाने वालों को जरुर याद रखना चाहिए की यह तैयारी अल्लाह के कहने पर हुई | यह बात समझ नहीं आई, की जब हम मानव कहते कहलाते हैं खुद को, तो क्या हमें यह जानना नहीं चाहिए की यह काम अल्लाह का क्यों और कैसे हो सकता है ?
इसे खुदा का हुक्म माना है इस्लाम ने, इस्लाम वाले यह जानना नहीं चाहा की खुदा किसी को उसके बेटे की क़ुरबानी किस लिए चाहेंगे ? क्या काम है खुदा का इस क़ुरबानी से ? खुदा को इस कुरबानी से क्या संपर्क ?
खुदा का काम दुनिया चलाने का है या फिर किसी के बेटे की क़ुरबानी लेना है इससे अल्लाह को दुनिया चलाने में क्या सहयोग मिल रहा है पता नहीं ?
यहाँ इस्लाम वाले इसे विचार करने को भी तैयार नहीं और न इसे समझ ने को तैयार हैं ? इससे यह बात मानव समाज में खुल गई की इस्लाम एक अंध विश्वास,अंध भक्ति,अंध परमपरा का नाम है |
यही है मानवता विरोधी कार्य अथवा मानवता विरोधी बातें, अगर हम अपने को मानव कहलाते तो शायद इन अमानवीय बातों को नहीं स्वीकारते यह सभी कार्य अमानवीय है, यही तो कारण बना परमात्मा का उपदेश मनुर्भव: का है {मानव बनो} सम्पूर्ण वेद में यह उपदेश कहीं नहीं आया की, हिन्दू बनो,मुसलमान बनो,या फिर ईसाई बनो या जैनी व बूधिष्ट बनो आदि |
हमें मानव बनकर ही जाना पड़ेगा, किन्तु दुर्भाग्य है, हम मानव कहलाने वालों के लिए की हम जब दुनिया से जाते हैं तो मानव बनकर नहीं जा पाते |
कोई हिन्दू बनाकर जाता है, कोई मुसलमान बनकर जाता है, फिर कोई ईसाई बनकर जाता है | कारण शव देखकर पता चलता है की यह अर्थी किसी मानव का है अथवा कोई मुसलमान या हिन्दू या फिर ईसाई का है ? मानव बनकर नहीं गया वह जो बनकर जा रहा है वे इसी दुनिया में आकर ही यह सब कुछ बना था |
जब कोई दुनियामें आता है सब एक ही तरीके से आता है यह दुनिया में आने के बाद ही उसके घर वाले उसे बना देते हैं, यही हिन्दू मुसलमान ईसाई आदि | विधाता ने जब दुनिया में भेजा किसी को तो, भीम आर्मी बनाकर नहीं भेजा, किसी को शिव सेना बनाकर,या फिर आदम सेना बनाकर भी नहीं भेजा | न मुसलमान, या ईसाई बनाकर भेजा ?
अत: हमें परमात्मा का उपदेश को ही चरियार्थ करना होगा =मनुर्भव: अर्थात मानव बनो यानि हमें मानव ही बनना होगा अगर हम मानव नहीं बन पाए फिर हमारा जीवन ही व्यर्थ होगा | मानव वही है मानों कोई एक बृक्ष लगाना हो जिसके छाया में खुद शीतलता का आनंद लें |
और धरती को छोड़ने से पहले एक बृक्ष ऐसा ही लगाकर जाएँ जिसके नीचे मानव से लेकर पशु पक्षी भी उसके शीतल छाया का आनंद ले सके और आपके लिए भी वे धन्यवाद दे सकें की इस बृक्ष लगाने वाले को धन्यवाद जिसके छायातले हमें ठंडी ठंडी हवा का लाभ मिला, परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें |
यही कारण है मानव बनने का यही कारण बना मनुर्भव: का | तो आयें हम सब मिलकर प्रतिज्ञा करें की हमें मानव बनना हैं न की क़ुरबानी देकर मुसलमान बनना है – और ना वली चढाकर हिन्दू बनना है – और ना तो बप्तिस्मा लेकर ईसाई बनना है | अगर बनना ही है तो हमें मानव ही बनना है |
क़ुरबानी चली कहाँ से ?
इब्राहीम पैगम्बरअल्लाह को सही जवाब नही दे सके | अल्लाह ने स्वप्न दिखाया इब्राहीम पैगम्बर को, सबसे प्यारा चीज मेरे रास्ते में कुरबानी करो, हजरत इब्राहीम इसका सही जवाब नहीं दे पाए ?
इसका जवाब यह होना था की ऐअल्लाह मानव मात्र का तो सबसे प्यारा आप ही हैं, हर कोई आप का सानिध्य पाना चाहता है और यही मानव जीवन का लक्ष्य है | फिर आप से ज्यादा प्यारा मेरा कौन हो सकता है ?
आप ही मुझसे पूछ रहे हैं की सबसे प्यारा मेरे लिए कौन है ? आप तो सब कुछ जानने वाले हैं, तो क्या आप को यह जानकारी नहीं की मेरे प्यारा चीज सबसे कौन है ?
ऐ अल्लाह आपने तो कुरान में बहुत बार कहा है इस बात को, मैं जो जानता हूँ वह तुम नहीं जानते ?
तो क्या आप इस चीज को नहीं जानते की मेरे लिये प्यारा क्या है और कौन ? हर मानव कहलाने वाले आप को अपनी आत्मा से ज्यादा प्यारा मानते हैं और कहते भी हैं |
दुनिया वालों आप लोगों को यह मालूम हुवा है की यह ईदुज्जोहा या बकरीद जिसे कहते हैं | यह घटना है पैगम्बर हजरत इब्राहीम के जीवन की, जिसे आज तक इस्लाम के मानने वाले मनाते आ रहे हैं, और जब तक इस्लाम के नाम लेवा धरती पर हैं तब तक यह मनाते रहेंगे और करते भी रहेंगे कुर्बानी को |
बहुत बार लिख चूका हूँ हजरत इब्राहीम अल्लाह का एक पैगम्बर का नाम था जिनकी एक पत्नी थी सारा दूसरी एक दासी थी गिफ्ट में मिला दासी का नाम हाजर |
सारा की संतान अभी जन्म नहीं लिया था, पर दासी से पुत्र जन्म लिया, जिस का नाम इस्माईल था | इस से जरुर समझ रहे होंगे इंसानी फितरत, सारा बीवी सहन नहीं कर सकी और इब्राहीम से कहलवा कर बीवी हांजरऔर बेटे इस्माईल को घर से निकलवा दिया |
उस समय घर से बहुत दूर एक वयहवांन में छोड़ दिया माँ, बेटे को | कहा जाता है की माँ पानी के प्यास में भाग रही थी पानी की तलाश में | पहाड़ों के बीच दौड़ रही थी पानी के लिए,जो रेत को पानी समझ कर भागती रही |
इतने में बेटे ने पैर पटका तो उसी जगह कुवां खुद गया | जिसे आबे जमजम कहा गया जमजम उस कुवें के पानी को कहा जाता है आबे जम, जम, |
इससे यह बात स्पष्ट है के बच्चा इस्माईल उनदिनों छोटा था | कुछ भी था लेकिन इब्राहीम का प्यारा नहीं था | अगर प्यारा होता तो इतने छोटे बच्चे को घरसे बाहर कैसे निकालते ?
अगर अल्लाह ने इसी इस्माईल की क़ुरबानी देने के लिये कहा तुम्हारा जो प्यारा है उसे क़ुरबानी दो | तो इसका मतलब यह भी हुवा की अल्लाह ज्ञानी नहीं है ?
और.इब्राहीम भी अल्लाह को नहीं बताया सच क्या है ? दुनिया के लोग सब से प्यारा अल्लाह को ही मानते हैं यहाँ अल्लाह इब्राहीम का प्यारा इस्माईल को समझे बैठे |
जो सत्य नहीं था अगर अल्लाह सब कुछ जानते हैं पर इन बातों को नहीं जाना की इब्राहीम का प्यारा क्या है जिसे अल्लाह क़ुरबानी देने का आदेश दे रहे हैं इब्राहिम को बताना था इस क़ुरबानी में अल्लाह मैं तो आप का ही नम्बर देख रहा हूँ |आप मानव कहलाने वालों इसपर चिंतन करें =धन्यवाद के साथ =महेन्द्रपाल आर्य,31 ,7 , 20 =