क़ुरान के आयते दुनिया के गोल आकार के बारे में।
सूरए बकरा 2 : 22 वह ज़ात (अल्लाह) जिसने ज़मीन को तुम्हारे लिए बिछौना (फ़र्श- floor) बनाया और आसमान को छत (cieling) बनाया , और उतारा आसमान से पानी और उस से पैदा किए फल (अनाज,सब्ज़ी आदि) तुम्हारी ग़िज़ा (खुराक) के लिए, पस तुम किसी को अल्लाह के बराबर न ठहराओ हालाँकि तुम जानते हो।
सूरत राअद 13 : 3 और वही है जिसने ज़मीन (मिट्टी-earth) को फैलाया और उसमें पहाड़ और नदियाँ रख दीं और हर क़िस्म के फलों के जोड़े उसमें पैदा किए, वह रात को दिन से छुपा देता है, बेशक इन चीज़ों में निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो ग़ौर करें।
सुरतुल हजर 15 : 19 और हमने ज़मीन को फैलाया (spreaded like a carpet flooring ) और उस पर हमने पहाड़ जमा दिए और उसमें हर चीज़ एक अंदाज़े से (वनस्पति/ वृक्ष) उगाई।
सूरत ताहा 20 : 53 "वही है जिस ने तुम्हारे लिए धरती को "पालना" (जीवन पोषक/पालक ) बनाया और उस ने तुम्हारे लिए रास्ते निकाले और आकाश से पानी उतारा। फिर हम ने उस के द्वारा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे निकाले
सूरत ज़ुखरूफ़ 43 : 10 जिस ने तुम्हारे लिए धरती को गहवारा (बसने लायक) बनाया और उस में तुम्हारे लिए मार्ग बना दिए ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो
सूरत काफ़ 50 : 7 और धरती (ज़मीन) को हम ने फैलाया ( like a flooring ) और उस में अटल पहाड़ डाल दिए। और हम ने उस में हर प्रकार की सुन्दर चीज़े उगाई,
सुरतुज़ ज़ारियात 51 : 48
और धरती को हम ने बिछाया, (spreaded) तो हम क्या ही ख़ूब बिछाने वाले हैं
सुरतून नूह 71 : 19 और अल्लाह ने तुम्हारे लिए धरती को बिछौना (carpet flooring ) बनाया,
सुरतून नबा 78 : 6 क्या ऐसा नहीं है कि हम ने (तुम्हारे लिए) धरती को बिछौना बनाया (like a ground floor) ?
सुरतून नाज़ियात 79 : 30
और धरती को देखो! इस के पश्चात उसे फैलाया (spreaded) ;
सुरतुल गाशिया 88 : 20
और धरती की ओर कि कैसी बिछाई (spreaded) गई?
सुरतुश शम्स 91 : 6
और धरती (ज़मीन) और जैसा (और चीजों को बिछाते हैं उसी तरह) कुछ उसे (धरती को) बिछाया
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■ क़ुरआन में पृथ्वी को कहीँ भी चपटी (flat) नही कहा है। बल्कि धरती पर रहने वाले *मानव जाती के RELATIVE Se* और *मानव की अनूभव और प्रकृति ( HUMAN SENSE and NATURE ) की RELATIVE* से सिर्फ ज़मीन के मर्यदित क्षेत्र ( भूमि ,मिट्टी , LAND , SOIL , CRUST ) के संदर्भ में उसे हर तरफ फैलाया ( SPREADED ) कहा गया है ; और मानव अनुभव के RELATIVE से उसे बिछौया कहा गया है
( सूरए बकरा 2 : 22 ) वह ज़ात (अल्लाह) जिसने भूमि( मिट्टी , LAND , SOIL , CRUST ) को *तुम्हारे लिए [ RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to INDIVIDUAL HUMAN SENSE and NATURE ]* बिछौना ( ground , मैदान ) बनाया और आसमान को छत (cieling) बनाया , और उतारा आसमान से पानी और उस से पैदा किए फल (अनाज,सब्ज़ी आदि) तुम्हारी ग़िज़ा (खुराक) के लिए, पस तुम किसी को अल्लाह के बराबर न ठहराओ हालाँकि तुम जानते हो। *[ "आसमान" शब्द खुद एक "RELATIVE" शब्द हे ..... यानि धरती के रिलेटिव से धरती का असमान ..... मतलब - धरती में रहने वाले इंसानों के RELATIVE से धरती पृष्ठ को छोड़कर , बाकी सब यूनिवर्स ( multiverse ) ]*
( सूरत राअद 13 : 3 ) और वही है जिसने भूमि (मिट्टी-) को फैलाया ( spread out ) और उसमें पहाड़ और नदियाँ रख दीं और हर क़िस्म के फलों के जोड़े उसमें पैदा किए, वह रात को दिन से छुपा देता है, बेशक इन चीज़ों में निशानियाँ हैं उन *लोगों के लिए {( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and REALTIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}* जो ग़ौर करें।
( सुरतुल हजर 15 : 19 - 20 ) और हमने भूमि( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) को फैलाया (SPREAD OUT ) और उस पर हमने पहाड़ जमा दिए और उसमें हर चीज़ एक अंदाज़े से (वनस्पति/ वृक्ष) उगाई । और *उसमें तुम्हारे लिए {( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMANKIND )}* गुज़र-बसर के सामान निर्मित किए, और उनको भी जिनको रोज़ी देनेवाले तुम नहीं हो
( सूरत ताहा 20 : 53 ) "वही है जिस ने *तुम्हारे लिए धरती को {( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}* "पालना" (जीवन पोषक/पालक ) बनाया और उस ने *तुम्हारे लिए {( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}* रास्ते निकाले और आसमान से पानी उतारा। फिर हम ने उस के द्वारा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे निकाले *{ [ "आसमान" शब्द खुद एक "RELATIVE" शब्द हे ..... यानि धरती के रिलेटिव से धरती का असमान ..... मतलब - धरती में रहने वाले इंसानों के RELATIVE से धरती पृष्ठ को छोड़कर , बाकी सब यूनिवर्स ( multiverse ) ] }*
( सूरत ज़ुखरूफ़ 43 : 10 ) जिस ने *तुम्हारे लिए {( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}* धरती को गहवारा (बसने लायक) बनाया और उस में *तुम्हारे लिए* मार्ग बना दिए *ताकि तुम्हें* मार्गदर्शन प्राप्त हो
( सूरत काफ़ 50 : 7 - 8 ) और भूमि( मिट्टी , LAND , SOIL , CRUST ) को हम ने फैलाया ( SPREAD OUT ) और उस में अटल पहाड़ डाल दिए *और* हम ने उस में हर प्रकार की सुन्दर चीज़े उगाई *ताकि तमाम रूजू लाने वाले (बन्दे)* हिदायत और इबरत हासिल करें *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}*
( सुरतुज़ ज़ारियात 51 : 48 - 49 )
और भूमि(( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) को हम ने बिछाया ( SPREAD OUT , grounding ) , तो हम क्या ही ख़ूब बिछाने वाले हैं *और* हम ही ने हर चीज़ की दो दो क़िस्में बनायीं *ताकि तुम लोग* नसीहत हासिल करो *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}*
( सुरतून नूह 71 : 19 ) और अल्लाह ने *तुम्हारे लिए* *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}* भूमि( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) को बिछौना ( ground ) बनाया,
( सुरतून नबा 78 : 6 - 9 ) क्या ऐसा नहीं है कि हम ने *तुम्हारे लिए* भूमि( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) को बिछौया (make ground ) और पहाड़ों को ज़मीन ( मिट्टी ,भूमि , CRUST , SOIL , PLATES ) की मेख़े नहीं बनाया और हमने *तुम लोगों* को जोड़ा जोड़ा पैदा किया *और तुम्हारी* नींद को आराम (का बाइस) क़रार दिया *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}*
( सुरतून नाज़ियात 79 : 30 - 33 )
और भूमि( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) को देखो! इस के पश्चात ( भूमि को बनाने के पश्चात )* उसे फैलाया ( SPREADED ) , उसी में से उसका पानी और उसका चारा निकाला और पहाड़ों को उसमें गाड़ दिया , *(ये सब ) तुम्हारे और तुम्हारे चारपायो के* फ़ायदे के लिए है *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}*
( सुरतुल गाशिया 88 : 17 ; 20 )
*तो क्या ये लोग* .....................और भूमि( मिट्टी,LAND , SOIL , CRUST ) की ओर कि कैसी फैलाए ( SPREADED ) गई? *{( RELATIVE to INHABITANTs of EARTH and RELATIVE to HUMAN SENSE and NATURE )}*
( सुरतुश शम्स 91 : 6 )
और भूमि( मिट्टी ,LAND , SOIL , CRUST ) की जिसने उसे फैलाया
क़ुरआन में पृथ्वी को कहीँ भी चपटी (flat) नही कहा है बल्कि धरती पर रहने वाले *मानव जाती के RELATIVE Se* और *मानव की अनूभव और प्रकृति ( HUMAN SENSE and NATURE )* ज़मीन( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) के मर्यदित क्षेत्र के संदर्भ में उसे बिछौया कहा है और उसे हर तरफ फैलाया ( SPREADED ) है!
समीक्षा :-
विशाल गोल पृथ्वी पर मानवीय जीवन प्रवृत्ति के मर्यदित क्षेत्र (विस्तार/area) के संदर्भ में भूमि ( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) को बिछौना ( ground ) की तरह फैलाया (SPREADED ) ताकि पृथ्वी गोल होने के बावजूद इंसानोंके समक्ष floor होनेकी अनुभूती हो । ये अल्लाह की हिकमत है। अगर कोई ये कहे में मेरी ज़मीन ( भूमि , मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) किसी को नहीं बेचूँगा! तो क्या वो पूरी पृथ्वी के संदर्भ में बोल रहा है !? बीलकुल नही बल्कि उसके पास जमीन( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) का जो टुकड़ा है उसके संदर्भ में बोल रहा है । क़ुरआन की वुक्त आयतों मे मानवी पृथ्वी पर जिस मर्यादित क्षेत्र में रहता है (घर, गावँ, नगर,शहेर ) उसके आसपास की ज़मीन के संदर्भ में बिछौना (फर्श/ground ) कहा है। अगर किसी व्यक्ति को अपना मकान या किसी पंचायत/नगरपालिका को गॉंव/नगर/शहेर का town plannig का नक्शा (plan), civil engineer draw करेगा तो वो मकान/गाँव/नगर/शहेर का ground का lay out plan top view से उसका carpet area ऊपर से देखने से flat carpet area नज़र आयेगा । और उस मकान/ शहेर के नक्शे में, verticle cross section के view में horizontal ground floor एक "strait line" से दिखाना पड़ेगा । कोई भी civil engineer पृथ्वी की गोलाई की तुलना नक्शा में भूमि का horizontal area (carpet flooring) को बिछा हुवा या verical cross section में strait line ही draw करना पड़ेगा । वो इंजीनियर नकशे के floor (फर्श) को कभी भी गोलाई (curve) वाला हिस्सा दिखाने की मूर्खता नही करेगा क्यूँ कि घर या गावँ के नक्शे में बताया गया ज़मीन (भूमि , मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) का टुकड़ा (ground ) , विशाल गोल धरती (पृथ्वी) की तुलना और संदर्भ में flat ही नज़र आयेगा इसलिये civil engineer को घर या गावँ की ज़मीन जो बिछौने की तरह फैली हुई है उसको को flat ही draw करना पड़ेगा । क़ुरआन में भूमि ( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) को फैलाने का वर्णन के पीछे का तर्क ये है कि विशाल गोल धरती होते हुवे भी उसके ऊपर रहनेवाले इंसानों के लिए धरती एक बिछौना (फर्श/ ground ) नज़र आता है। धरती गोल होते हुवे भी आदउसकी अनुभूति एक ऐसा सुगम अनुकूल फर्श/ground (बिछौना) जिस पर आराम से आदमी चल फिर सके, मकान बना के रेह सके,शहेर बना सके, खेती कर सके ।इन्सानों के लिये भूमि ( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) को ऐसा फैलाया कि गोल धरती पे खड़े होने का एहसास ही न हो !
◆ भूमि( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) को फैलाया और बिछौने जैसा बनाया का concept समझने के लिए दूसरा logic समझये । अगर कोई 10,000 फूट या उससे अधिक व्यासवाला (diameter) गोल (ball) के ऊपर एक छोटीसी चींटी (कीड़ी) को रख दिया जाए तो विशाल गोल बोल पे अपने आसपास का क्षेत्र उसको चपटा (flat) नज़र आयेगा । येही concept विशाल गोल धरती पे बसनेवाला आदमी के लिए भी लागू है। ये समझ उसी को आएगा जिसको civil और geography का common sense का ज्ञान हो । बाकी क़ुरआन कीआयतों को misinterpretation करके लोगों को आराम से गुमराह (बेवकूफ) बनाया जा सकता है। अल्लाह ने गोल धरती के ऊपर भूमि( मिट्टी,LAND / SOIL / CRUST ) को फैलाया का मतलब समझने के लिए तीसरा logic ये है कि जैसे कोई painter गोल विशाल पानी की टंकी के उपरी स्तर को ब्रश से कलर करता हो और कलर को फैला कर ब्रश मार रहा हो तो उसका मतलब ये थोड़ा ही हुवा कि वो गोल टंकी flat हो गई !? । जिनको civil और भूगोल का ज्ञान न हो ऐसे लोगों को गोल गोल समझा के क़ुरआन की आयतों का अर्थघटन करके उनको गुमराह करना आसान है..!
अल्लाह ने धरती को किस तरह फैलाया (Geological concept).
(1) Formation of earth continents by sliding of earth surface https://youtu.be/uLahVJNnoZ4
इस video को गौर से देखो वो जब पृथ्वी उतपन्न हुई तो उसपे शुरुआती समयमें ज़मीन के सारे भूखंड (महाद्वीप) स्थिर बनने की प्रक्रिया चल रही थी और ज़मीन के बड़े टुकड़े एक जगह से दूसरी जगह जाके अलग अलग आकार लेकर खंड बनने की प्रक्रिया चल रही होने को दर्शाया है। उसी दौरान ज़मीन को स्थिरता देने के लिए पहाड़ों की संरचना हुई थी जो ज़मीन की खिसकने की प्रक्रिया को break लगाया और आजके हयात खण्ड बने। क़ुरआन ने उसी संदर्भ sliding होती धरती को स्थिरता देने के लिए पहाड़ों की रचना की जो लोगों को समझाने के लिए उसको जैसे peg का उपमा दिया । जो नीचे के वीडियो लिंक में स्पष्टता की है। ये खंडों की रचना सरकते भूखंड धीरे धीरे कैसे स्थिर हुवा और अभी भी ज़मीन के नीचे दो tactonic layer एक दूसरे पे सरकने की प्रक्रिया जारी है और जहाँ बड़ा fault line create होते ही धरतीकम्प आता है। पहाडों की रचना multipurpose है ।उसी में एज ज़मीन को स्थिरता देने के लिए है। और पहाड़ों से जीवित प्राणी के लिए ज़रूरी जंगल और नदियां निकलती है और प्राकृतिक पर्यावरण से जीवन सुष्ट्री का सम्बंद है ।
(2) Quran and mountains
https://youtu.be/61oM3-uL-PE
क़ुरआन जिस संदर्भ में धरती को flat (बिछौना) कहा I भी उसी संदर्भ को समर्थन कर रहा है !
(1) क़ुरआनने धरती को मानवी को रहने लायक उपयुक्त बिछौना कहा और गोल पृथ्वी पे ज़मीन को बिछौने की तरह कैसे उसको फैलाया और सात भूखंडों में सर्जन किया land formation की पृथ्वी के उपर के प्रक्रिया भूगोलशास्त्रियों ने जो concept को समर्थन किया वो अपरोक्ष क़ुरआन के ज़मीन को बिछाने और फैलाने के दावे की पुष्टि करता है और जैसे ये तमाम प्रक्रिया गोल पृथ्वी पे हो रही थी तब भूगोल ने गोल पृथ्वी का उल्लेख किए बिना ही सारा वर्णन किया और कुरान ने भी इसी तरह ज़मीन को बिछाने और फैलाने की प्रक्रिया में कहीं भी पृथ्वी flat होने की बात नहीं की है । और अगर पृथ्वी गोल है तो भूगोल की ये वीडियो लिंक में गोल पृथ्वी के उपर महासगरों के बीच ज़मीन का plain crust surface layer है जो tactonics plate के उपर स्थित है उसको गोल पृथ्वी के संदर्भ में plate यानी flat स्वरूप कहा । Tactonic plate के ऊपर की धरती को फैलाने की प्रक्रिया एक बिछौने की मिसाल देने से धरती (पृथ्वी) flat होने का मतलब किस तरह निकल सकता है ? ये क़ुरआन की आयतों को misinterprete करके जुठलाने की कोशिश में साथ साथ भूगोलशास्त्र को भी जुठला रहे हैं !?
https://youtu.be/0f3sX9lK4pU
(2) Land formation is geological related subject connencted to the claiming of the spreading of land on earth same as by Quran verses .
https://youtu.be/U29Mtm5zKQQ. . .
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क्या क़ुरआन में धरती चपटी है
धरती की अवस्था: गोल या चपटी
प्राराम्भिक ज़मानों में लोग विश्वस्त थे कि ज़मीन चपटी है, यही कारण था कि सदियों तक मनुष्य केवल इसलिए सुदूर यात्रा करने से भयाक्रांति करता रहा कि कहीं वह ज़मीन के किनारों से किसी नीची खाई में न गिर पडे़! सर फ्रांस डेरिक वह पहला व्यक्ति था जिसने 1597 ई0 में धरती के गिर्द ( समुद्र मार्ग से ) चक्कर लगाया और व्यवहारिक रूप से यह सिद्ध किया कि ज़मीन गोल (वृत्ताकार ) है। यह बिंदु दिमाग़ में रखते हुए ज़रा निम्नलिखित क़ुरआनी आयत पर विचार करें जो दिन और रात के अवागमन से सम्बंधित है:
‘‘ क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में ‘‘
(अल-.क़ुरआन: सूर: 31 आयत 29 )
यहां स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि अल्लाह ताला ने क्रमवार रात के दिन में ढलने और दिन के रात में ढलने (परिवर्तित होने )की चर्चा की है ,यह केवल तभी सम्भव हो सकता है जब धरती की संरचना गोल (वृत्ताकार ) हो। अगर धरती चपटी होती तो दिन का रात में या रात का दिन में बदलना बिल्कुल अचानक होता ।
निम्न में एक और आयत देखिये जिसमें धरती के गोल बनावट की ओर इशारा किया गया है:
उसने आसमानों और ज़मीन को बरहक़ (यथार्थ रूप से )उत्पन्न किया है ,, वही दिन पर रात और रात पर दिन को लपेटता है।,,(अल.-क़ुरआन: सूर:39 आयत 5)
यहां प्रयोग किये गये अरबी शब्द ‘‘कव्वर‘‘ का अर्थ है किसी एक वस्तु को दूसरे पर लपेटना या overlap करना या (एक वस्तु को दूसरी वस्तु पर) चक्कर देकर ( तार की तरह ) बांधना। दिन और रात को एक दूसरे पर लपेटना या एक दूसरे पर चक्कर देना तभी सम्भव है जब ज़मीन की बनावट गोल हो ।
ज़मीन किसी गेंद की भांति बिलकुल ही गोल नहीं बल्कि नारंगी की तरह (geo-spherical) है यानि ध्रुव (poles) पर से थोडी सी चपटी है। निम्न आयत में ज़मीन के बनावट की व्याख्या यूं की गई हैः ‘‘और फिर ज़मीन को उसने बिछाया ‘‘(अल क़ुरआन: सूर 79 आयत 30)
यहां अरबी शब्द ‘‘दहाहा‘‘ प्रयुक्त है, जिसका आशय ‘‘शुतुरमुर्ग़‘‘ के अंडे के रूप, में धरती की वृत्ताकार बनावट की उपमा ही हो सकता है। इस प्रकार यह माणित हुआ कि पवित्र क़ुरआन में ज़मीन के बनावट की सटीक परिभाषा बता दी गई है, यद्यपि पवित्र कुरआन के अवतरण काल में आम विचार यही था कि ज़मीन चपटी है।
प्रमोद कुमार जैसे भाई लोग सब जानते समझते है लेकिन खुद जैसे भर्मित है दुसरो को भी भर्मित करना चाहते है अपनी गपोल कथा अपनी पाखण्ड दुसरो के साथ जोड़ना चाहते है
पृथ्वी और शेषनाग वाली बात" महाभारत में इस प्रकार उल्लेखित है...
"अधॊ महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम;
स्वयं तवैषा विवरं प्रदास्यति।
इमां धरां धारयता त्वया हि मे;
महत् परियं शेषकृतं भविष्यति।।"
(महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक )
इसमें ही वर्णन मिलता है कि... शेषनाग को ब्रह्मा जी धरती को धारण करने को कहते हैं... और, क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लेते हैं.
शास्त्रों का ये कहना कि...
शेषनाग के हिलने से भूकंप आता है
थोड़ा शेषनाग के बारे में
महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिन्होंने अपनी इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र उत्पन्न किया। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की 17 पुत्रियों से विवाह किया। उनमें से एक का नाम कद्रू था जिनसे 1000 बलशाली नाग (सर्प नहीं) पैदा हुए जिसमें सबसे बड़े भगवान् शेषनाग थे। कद्रू के बेटों में सबसे पराक्रमी शेषनाग थे। इनका एक नाम अनन्त भी है।
विनता तथा कद्रु एक बार कहीं बाहर घूमने गयीं। वहाँ उच्चैश्रवा नामक घोड़े को देखकर दोनों की शर्त लग गयी कि जो उसका रंग गलत बतायेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। अगले दिन घोड़े का रंग देखने की बात रही। विनता ने उसका रंग सफेद बताया था तथा कद्रु ने उसका रंग सफेद, पर पूंछ का रंग काला बताया था। कद्रु के मन में कपट था। उसने घर जाते ही अपने पुत्रों को उसकी पूंछ पर लिपटकर काले बालों का रूप धारण करने का आदेश दिया जिससे वह विजयी हो जाय।
शेषनाग का धर्म के प्रति दृढ़ता
शेषनाग ने जब देखा कि उनकी माता व भाइयों ने मिलकर विनता के साथ छल किया है तो उन्होंने अपनी मां और भाइयों का साथ छोड़कर गंधमादन पर्वत पर तपस्या करनी आरंभ की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी बुद्धि कभी धर्म से विचलित नहीं होगी।
ब्रह्मा ने शेषनाग को यह भी कहा कि यह पृथ्वी निरंतर हिलती-डुलती रहती है, अत: तुम इसे अपने फन पर इस प्रकार धारण करो कि यह स्थिर हो जाए। इस प्रकार शेषनाग ने संपूर्ण पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लिया।
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*पृथ्वी गोल है*
एक मेरे दोस्त ने कहा इस्लाम मे सिखाया जाता है कि पृथ्वी चकोर या चपटी है ,
एक और मेरे मित्र ने बताया कि अथर्वेद में धरती को चिपटा हुवा बताया गया है और उनका कहना था कि साइंस झूठ बोलती है धरती चिपटी हुई ही है लेकिन वह मित्र भी रेफरेन्स देने से क़ासिर है अभी तक
अब जानेंगे क़ुरआन क्या कहती है पृथ्वी के बारे में
~ पहले के जमाने मे लोगो का मानना था कि धरती समतल (फ्लैट) या चपटी है सदियों तक लोग दूर दराज का सफर करने से डरते थे की कही धरती के आखरी किनारे पर पहुच कर वह गिर न जाये ।
*सन फ्रांसिक ड्रेक,* दुनिया के पहले शख्स थे जिन्होंने 1577 में जहाज़ से दुनिया का चक्कर लगाकर साबित किया कि दुनिया गोल है
क़ुरआन की इस आयत को समझना जरूरी है जो दिन और रात को लगातार तब्दीली(एक के बाद एक के बदलने ) के बारे में बयान करती है
Surat No 31 : Ayat No 29
اَلَمۡ تَرَ اَنَّ اللّٰہَ یُوۡلِجُ الَّیۡلَ فِی النَّہَارِ وَ یُوۡلِجُ النَّہَارَ فِی الَّیۡلِ وَ سَخَّرَ الشَّمۡسَ وَ الۡقَمَرَ ۫ کُلٌّ یَّجۡرِیۡۤ اِلٰۤی اَجَلٍ مُّسَمًّی وَّ اَنَّ اللّٰہَ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ خَبِیۡرٌ ﴿۲۹﴾
क्या तुम ने देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है। उस ने सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है? प्रत्येक एक नियत समय तक चला जा रहा है और इस के साथ यह कि जो कुछ भी तुम करते हो, अल्लाह उस की पूरी ख़बर रखता है
लफ्ज़ दाखिल करना या मिलाना खलत-मलत करना
यहां अरबी लफ्ज़ *युलिजु* का इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब रात आहिस्ता आहिस्ता दिन में दाखिल होती है और इसी तरह दिन धीरे धीरे रात में बदलता है और यह तभी मुमकिन हो सकता है जब दुनिया गोल हो
दुनिया अगर चपटी होती तो अचानक रात दिन में और दिन रात में तब्दील(परिवर्तित) हो जाती ।
क़ुरआन की नीचे लिखी आयत भी इसी तरफ इशारा करती है कि दुनिया का आकार गोल है
Surat No 39 : Ayat No 5
خَلَقَ السَّمٰوٰتِ وَ الۡاَرۡضَ بِالۡحَقِّ ۚ یُکَوِّرُ الَّیۡلَ عَلَی النَّہَارِ وَ یُکَوِّرُ النَّہَارَ عَلَی الَّیۡلِ وَ سَخَّرَ الشَّمۡسَ وَ الۡقَمَرَ ؕ کُلٌّ یَّجۡرِیۡ لِاَجَلٍ مُّسَمًّی ؕ اَلَا ہُوَ الۡعَزِیۡزُ الۡغَفَّارُ ﴿۵﴾
उस ने आकाशों और धरती को सत्य के साथ पैदा किया। रात को दिन पर लपेटता है और दिन को रात पर लपेटता है। और उस ने सूर्य और चन्द्रमा को वशीभुत कर रखा है। प्रत्येक एक नियत समय को पूरा करने के लिए चल रहा है। जान रखो, वही प्रभुत्वशाली, बड़ा क्षमाशील है
क़ुरआन की आयत में यहाँ अरबी लफ्ज़ *कविरु* का इस्तेमाल किया गया है जिसका माना (अर्थ) है लपेटना(ओवरलैप करना) यानी उसके ऊपर दूसरी तह बिछाना *काइल करना* जिस तरह सर पर पगड़ी बाधा जाता है ये ओवरलैपिंग या काइलिंग करना यह अमल तभी मुमकिन है जब दुनिया गोल हो
क़ुरआन की नीचे लिखी आयत बताती है दुनिया का आकार कैसा है
Surat No 79 : Ayat No 30
وَ الۡاَرۡضَ بَعۡدَ ذٰلِکَ دَحٰىہَا ﴿ؕ۳۰﴾
और धरती को देखो! इस के पश्चात उसे फैलाया;
यहां अरबी लफ्ज़ *दहाहा* का इस्तेमाल हुआ है जिसका मानी है अण्डा यानी (शुतुरमुर्ग का अण्डा)
शुतुरमुर्ग का अण्डा दुनिया के आकार से पूरी तरह मेल खाता है
लिहाज़ा क़ुरआन दुनिया के शेप(आकार) के बारे में बिल्कुल सही वजाहत करता है वरना जिस जमाने मे क़ुरआन नाज़िल हुवा उस जमाने मे लोग यही मानते थे कि दुनिया चपटी है ,
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प्राचीन तार्किक वेदिक वैज्ञानिकों की तरफ से भूमि का दाहिना हाथ।
जिस पवित्र उद्देश्य से अग्निदेव ने इस #भूमि_के_दाहिने हाथ को ग्रहण किया है उसी पवित्र भावना से मै आपका पतिग्रहन करता हूं। आप दुख कष्टों से रहित होकर मेरे साथ सुसन्तति और ऐश्वर्य संपदा के साथ रहें। (अथर्ववेद १४/१/४८)
ये वही वैज्ञानिक है जिन्होंने क़ुरान की आयतों में बिछौना और फैलाना जैसे शब्द देख के ही ये कहना और सवाल उठना शुरू कर दिया कि कुरान के अनुसार पृथ्वी चपटी है ये वैज्ञानिक दृष्टि कोण से गलत है । जबकि क़ुरान की वो आयत (सूरा अल बकरा 2:22) जिसके अनुसार -
जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन का बिछौना और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया फिर उसी ने तुम्हारे खाने के लिए बाज़ फल पैदा किए पस किसी को खुदा का हमसर न बनाओ हालाँकि तुम खूब जानते हो।
जमीन को बिछौना मतलब बिछाना,(क्या बिछाते हुए इन परतो को नहीं फैलाया extend गया?) सभी जानते है कि जमीन परत दर परत एक दूसरे के ऊपर बिछी हुई है जैसे ऊपरी Humus परत से नीचे की और Topsoil - Subsoil - Weathered rock - Bedrock ऊपर नीचे बिछी हुई हैं और उसके नीचे पानी है ।
और आसमान को छत होने से उद्देश्य,,वायु और ओजोन परत जो जमीन से 0-12 किमी ऊपर तक Troposphere (संतापमंडल) और Stratosphere (समतापमंडल) के बीच आसमान उसी छत में ओजोन परत है जो इस पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवो के लिए छत का ही काम करती है इस छत के कारण ही यहां पर जीवन है, यह परत सूर्य के उच्च आवृत्ति के पराबैंगनी प्रकाश की 93-99 % मात्रा अवशोषित कर लेती है, जो पराबैंगनी किरणे पृथ्वी पर जीवन के लिये हानिकारक है।
उपरोक्त्त आयत में अल्लाह की तरफ से उपकारो की तरफ मनुष्यो का ध्यान केंद्रित कराते हुए उपासना के बारे में आदेश दिया गया।
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वैदों में पृथ्वी गोल होने का गोल गोल गलत तारण !
वैद मंत्र > ऋग्वेद 1/33/8 में पृथ्वी को आलंकारिक भाषा में गोल बताया गया है। इस मंत्र में सूर्य पृथ्वी को चारों ओर से अपनी किरणों द्वारा घेरकर सुख का संपादन (जीवन प्रदान) करने वाला बताया गया है। पृथ्वी अगर गोल होगी तभी उसे चारों और से सूर्य प्रकाश डाल सकता है ! (वेदिक विद्ववानों ऐसा निष्कर्ष निकाला है)
विवाद > इस उपरोक्त स्वलोक के अर्थघटन में अगर पृथ्वी का मतलब गोल निकलता है तो उस पे एक ही समय मे गोल पृथ्वी पे सूर्य अपनी किरणें कैसे डाल सकता है? इस का मतलब गोल पृथ्वी पर कभी रात नही होती है !? क्यूँकि गोल पृथ्वी को चारों और से घेरकर सूर्यप्रकाश गिरता है का मतलब तो येही निकलता है ! हमसब जानते हैं कि पृथ्वी गोल होने पर ही रात और दिन होते हैं । और सब जानते हैं कि उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव पे 6 महीने रात और 6 महीने दिन होते हैं । तो वैद का उक्त मंत्र विरोधाभाषी है।
वैद मंत्र पे अभिप्राय > अब कुछ लोग यह शंका कर सकते है कि पृथ्वी अगर चतुर्भुज होगी तो भी तो उसे चारों दिशा से सूर्य प्रकाशित कर सकता है।
विवाद >ये उपरोक्त शंका सच नही है !? अगर पृथ्वी की संरचना चतुर्भुज (चतुष्कोण ) कल्पित की होगी तभी तो चारों और सूर्य किरणे flat sqaure पे डाल सकेगा ! इस लिए वैद में पृथ्वी चपटी होने की मान्यताकी स्पष्ट पुष्टि होती है।
वैद मंत्र > इस शंका का समाधान यजुर्वेद 23/61-62 मंत्र में वेदों पृथ्वी को अलंकारिक भाषा में गोल सिद्ध करते है। यजुर्वेद 23/61 में लिखा है कि इस पृथ्वी का अंत (end) क्या है? इस भुवन (धरती) का मध्य (center) क्या है? यजुर्वेद 23/62 में इसका उत्तर इस प्रकार से लिखा है कि यह "यज्ञवेदी" (जहाँ यज्ञ हो रहा हो) ही पृथ्वी की अंतिम सीमा है। यह यज्ञ ही भुवन का मध्य है। अर्थात जहाँ खड़े हो वही पृथ्वी का अंत (end) है तथा यही स्थान भुवन का मध्य है। किसी भी गोल पदार्थ का प्रत्येक बिंदु (स्थान) ही उसका अंत होता है और वही उसका मध्य होता है। पृथ्वी और भुवन दोनों गोल हैं।
विवाद > इस स्वलोक मे पृथ्वी का अंत (end) पूछा है । लेकिन उसकी शुरुआत कहाँ से होती है वो जवाब missing है । इसलिए शुरुआत वेद मंत्र में नही है फिरभी थोड़ी देर के लिए जहाँ खड़ा है उसे से शुरुआत मान भी ले तो ये बात बात गोल वर्तुलाकार (flat circle) को भी लागू होती है जिसका हर बिंदु चपटे गोलाकार थाली पे घूमता है या पृथ्वी बोल जैसी गोल नही बल्कि गोल थाली की कल्पना को भी पुष्टि करती है और ये चाँद और सूर्य जैसे पृथ्वी पे से थाली जैसे गोल दिखता है उसका आधार लेके भी कोई कल्पना कर सकता है । इस लिए उपरोक्त वैद मंत्र में पृथ्वी ball जैसे 3D आकार की गोल होने की पुष्टि नही करती है। वेदोँ में पृथ्वी को गोल बताया है साबित करने के लिए सनातन वैदिक विद्धवान हर संभव गोल गोल बात कर रहे हैं !
वैद > ऋग्वेद 10/22/14 मंत्र में भी पृथ्वी को बिना हाथ-पैर वाला कहा गया है। बिना हाथ पैर का अलंकारिक अर्थ गोल ही बनता है (ऐसा वेदिक विद्धवान interpretation करते हैं) । इसी प्रकार से ऋग्वेद 1/185/2 मंत्र में भी अंतरिक्ष और पृथ्वी को "बिना हाथ-पैर वाला" कहा गया है।
विवाद टिपणी >> अगर पृथ्वी और अंतरिक्ष को गोल ही कहना होता तो पृथ्वी और अंतरिक्ष को बिना हाथ पैर के कहने के बजाए वेद मंत्र में मुंडनवाला सर (head) का सीधा उदहारण सीधा दिया होता तो वो ज़्यादा logical लगता !
वेद >(ऋग्वेद 2/12/12 मंत्र ) ओ मनुष्य ! इन्द्रदेवने ही हिलती धुलती धरती को स्थिर कर रख्खा है !
विवाद >यहाँ एकदम स्पष्ट है कि धरती हिल डुल रही है और उसको इंद्रदेव ने जकड़ कर स्थिर रख्खा है ।इसका मतलब न वो खुदकी धरी (axis) पे घुमती है , न वो सूर्य की प्रदक्षिणा (orbitting) करती है । इस का सीधा मतलब है पृथ्वी का एक हिस्सा हमेशा दिन और दूसरा हिस्सा रात रहता है। जो खगोलीय नियमोंके विरुद्ध है
> (यजुर्वेद 32/6) पृथ्वी को ईश्वर ने ही थामकर स्थिर कर रख्खा है
विवाद मंत्र >ऊपर के ऋग्वेद 2/12/12 मे धरती को इन्द्रदेवने थामा है और इस यजुर्वेद 32/6 के स्वलोक मे ईश्वरने धरती को थामा है तो दोनों मंत्र से ये मतलब निकलता है कि पृथ्वी को ईश्वर और इंद्रदेव ने थामा है या दोनों मे से कोई एक ने ! कौनसा मंत्र इस मे सच है !? यानी इंद्रदेव ही ईश्वर है ? ये दोनों मंत्र एक दूसरे के विरोधाभाषी है ।
वेद > मंत्र (अथर्ववेद 12/1/11) इंद्रदेव ने ही विशाल धरती को संरक्षित कर रख्खा है जिस धरती के अनेक रूप है उसको अचलित (immovable) कर रख्खा है !
विवाद >इस मंत्र मे धरती के अनेक विविध रूप होनेकी कल्पना की गई है । चौरस, त्रिकोण , चपटी आदि लेकिन कहीं भी त्रीपरीमाणीय (three dimensional) गोल होने की पुष्टि नही मिलती है।
> (अथर्ववेद 12/1/17) चलो हमसब उस विशाल चौड़ी धरती पर हीरे फिरें ! (मतलब flat !?). . .
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अगर हम वेद अनुसार पृथ्वी को देखते हैँ तो इसमें तीन तरह के मंत्र मिलते हैँ।
पहले कुछ मंत्र ऐसे हैँ जिसमे बताया गया है की पृथ्वी के किनारे हैँ अर्थात चपटी है.
[ऋग्वेद 1.62.8] सनाद्दिवं परि भूमा विरूपे पुनर्भुवा युवती स्वेभिरेवैः ।
विविध रूप वाली दो युवतियाँ उपा और रात्रि अपनी गतियों से आकाश मे भूमि के चारो और सनातन काल से चलती आती हैँ.
[ऋग्वेद 10.58.3] यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम् ।
वह आत्मा चार किनारे वाली पृथ्वी से दूर चली जाती है.
चतुर्भृष्टि [Chaturbhushti/Caturbhrsti] =Four Cornered
रामायण के हिसाब से भी पृत्वी के किनारे हैँ
उसमे भूमि को नरह चौरस चौकोन विचित्र फर्श, जिसमे हीरे जड़ी हुई थीं. यह कोरों रावण को शयन शाला ही नहीं थी, बल्कि राज्यों और घरों से शोभित दूसरी लम्बी चौड़ी पृथ्वी ही के समान थी.
और कुछ मंत्रो मै बताया गया है की पृथ्वी के अंत हैँ.
[अथर्ववेद 15.7.1]
वाह विराट वात्य समर्थ होकर तीवतापूर्वक पृथ्वी के अंतिम छोर तक गया और समुद्र मे परिवर्तित हो गया.
पृथ्वी के अंत को विविध प्रकार दृढ़ किया है.
सूर्य लोक ठहरा हुआ है, पृथ्वी ठहरा हुआ है,यह सब जगत ठहरा हुआ है, सब पर्वत विश्रामस्थान में ठहरा हुआ है,घोड़ों को स्थान में मैन खड़ा कर दिया है।(मतलब जैसे किसी घोड़ो को किसी स्थान में बंद देते है वैसे ही रोक दिया है।)
[अथर्वेद 6:77:1]जिसमे भूमि, अंतरिक्ष और आकाश दृढ स्थापित है। (अथर्वेद 10:7:12)
यजुर्वेद( 32:6, 1:21)अथर्वेद(13:1:6) में भी यही बाते लिखी है।
[अथर्वेद 4:1:4]सूर्य आदि लोको को रच कर और उसने सबको डोरी लगाकर बांद दिया है।️
अगर डोरी छोड़ दोंगे तो सब भाग जाएंगे क्या?
और इससे भी बढ़कर दयानन्द सस्वती ने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश के 8 समुलास में लिखा है। कि उनसे प्रशन किया लगा कि सूर्य , चंद इत्यादि मनुष्य रहते है । उनका उत्तर ये था कि हा वो भी वेदों के साथ।
क्या मजाक है। सूर्य का तापमान 5500 डिग्री है। वहाँ तक अभी तक कोई यान तक नही गया तो मानव जीवन तो ना-मुमकिन है। और रही चंद्र की बात तो मनुष्य वहाँ जा चुके है। यह बाते शिर्फ़ कॉमिक बुक में अच्छी लगती है।
इससे मिलती जुलती बात वेद में भी है ।
("वसुनाम जनानाम देवम राध:") अर्थात :- पृथिवि आदि वसुओं और मनुष्यो का अभिसित धनरूप है, उस अग्नि को तुम लोग उपयोग में लाओ। (वसुओं का मतलब बसने की जगह)
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Hinduism ki manyata dharti ke 4 kinare hain.
यत्ते भूमिं चतुर्भृष्टिं मनो जगाम दूरकम् ।
Rig Veda 10.58.3 Thy spirit, that went far away, away to the four cornered earth…
http://www.sacred-texts.com/hin/rigveda/rv10058.htm
भूमिं- earth
चतुर्भृष्टिं- four-cornered
http://spokensanskrit.org/index.php?mode=3&script=hk&tran_input=चतुर्भृष्टिं&direct=au
जगाम - went
http://spokensanskrit.org/index.php?mode=3&script=hk&tran_input=जगाम&direct=au
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*वेदों में पृथ्वी खड़ी है*
वेंदों-में-विज्ञान,,?
हमें इन ग्रंथों पहले विचार करना चाहिए,, देखो ?
*वेदों में पृथ्वी खडी है*
यह बात चौथी कक्षा का विद्यार्थी भी जानता है कि यह घूमती है लेकिन वेदों में लिखा पृथ्वी खडी है..!
*यः पृथ्वी व्यथमानामद्रहत् यः जनास इंद्रः--- ऋग्वेद मण्डल 2/ सुक्त 12/ मंत्र 2*
*अर्थात:-* "हे मनुष्यो, जिसने कांपती हुई पृथ्वी को स्थिर किया, वह इंद्र है"
*वेदों का घूमता सूर्य*
प्रारंभिक स्कूल का विद्यार्थी भी जानता है सूर्य वहीं खडा है वेदों में सूर्य को रथ पर सवार होकर चलने वाला कहा गया है..!
*उदु तयं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः, दृशे विश्वाय सूर्यम ----- ऋग्वेद मण्डल 1/ सुक्त 50/ मंत्र 1*
*अर्थात:-* "सूर्य प्रकाशमान है और सारे प्राणियों को जानता है. सूर्य के घोडे उसे सारे संसार के दर्शन के लिए ऊपर ले जाते हैं"
वेदों में ग्रहणों के संबंध में जो जानकारी भरी हुई है उसे पढ लेने के बाद कोई जरा सी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति भी वेदों में विज्ञान ढूंडने की बात न करेगा।
सूर्य ग्रहण के बारे में ऋग्वेद का कहना है कि सूर्य को स्वर्भानु नामक असुर आ दबोचता है और अत्रि व अत्रिपुत्र उसे उस असुर से मुक्त करते हैं, तब ग्रहण समाप्त होता है.
(क)
*यतृत्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः*
*अक्षेत्रविद् यथा गुग्धो भुवनान्यदीधयुः -- ऋग्वेद मण्डल 5/ सुक्त 40/ मंत्र 5*
*इसी प्रकार “अथर्ववेद कांण्ड 19/ सुक्त 9/ मंत्र 10” में चंद्र को ग्रहण लगाने वाला राहू असुर बताया गया है।
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*वेद मे धरती चपती !!!!*
पृथ्वी के अंत सिरे बेकार पड़े हैं ...
अंत [अंता] = अंत
*( ऋग्वेद 8.25.18)*
वह जो अपनी किरण को स्वर्ग और पृथ्वी के *अंत सीमा* [ENDS] तक नापता है .. *
*(अथर्ववेद 15.7.1)*
वह आगे बढ़कर महामन्वित बन गए, *धरती की अंत सीमा* ... को गए
*(अथर्ववेद 20.88.1)*
वह जीसने पराक्रम के साथ *धरती की अंत सीमा तक* को पहुंचे ।
*( ऋग्वेद 1.62.8)*
अभी पैदा हुआ, युवती की तरह, प्रत्येक, उसके तरीके में, रंग के विपरीत, अदल-वदल जोड़ा में *धरती की चारों ओर और चारो किनारे* ......
*( ऋग्वेद 4.50.1,)*
"... जिसके पास आग की ज़ुबान है, जो अपनी ताकत से *धरती की अंत तक* बनाता है, और जो ब्रह्मांड के तीन क्षेत्रों में महिमा के साथ राज करता है"।
*( सत्यप्रकाश सरस्वती, खंड 5, पृष्ठ 1535)*
👉 * वेद स्पष्ट रूप से बताता है कि पृथ्वी चारो तरफ से * है
*( ऋग्वेद 10.58.3)*
तेरा आत्मा, जो दूर चला गया, *पृथ्वी की चार कोनों* से दूर।
# शब्द संस्कृत अनुवाद द्वारा शब्द,
यते [यते] = आपका
मन [मन] = आत्मा / मन
जगम [जगम] = जाता है
दूरकम [दुर्कम] = दूर
* चतुर्भृष्टि [चतुर्भूषी / कैटर्भूर्स्ति] = चार कोनों *
* भूमि [भूमि] = पृथ्वी*
* चतुर्भृष्टि शब्द (कैटर्भूस्टी भी लिखा गया है) का अर्थ है, चारो ओर से *,
■ मोनियर-विलियम का संस्कृत शब्दकोश भी यही अर्थ देता है
http://sanskritdictionary.com/caturbh%E1%B9%9B%E1%B9%A3%E1%B9%ADi/78694/1
इसके अलावा ब्राह्मण ग्रंथ इसकी पुष्टि करते हैं,
*(शतपथ ब्राह्मण 6.1.2.29)*
अब *यह धरती चार कोनों वाला (FOUR-CORNERED) है, क्योंकि *चारो दिशा उसके कोना हैं*: इसलिए सभी ईंटें चार कोनों वाले ( FOUR-CORNERED ) हैं; सभी ईंटें इस धरती के तरीके से हैं।
*(ऋग्वेद 6.62.1)*
"... वे सभी अंधेरे को दूर करने वाले हैं और भोर के समय, इस *धरयी के अंत* तक बिखराव को दूर करते हैं।" -
*(सत्यप्रकाश सरस्वती, पृष्ठ २१ )३।)*
*(ऋग्वेद 5.47.2)*
*धरती चारो कोने के साथ* और स्वर्ग एक सीमा के बिना ।___________________________________________________________
*वेद में सुर्य की स्थिति देखिए*
*उदु तयं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः, दृशे विश्वाय सूर्यम ----- ऋग्वेद 1/50/1*
*अर्थात:-* "सूर्य प्रकाशमान है और सारे प्राणियों को जानता है. सूर्य के घोडे उसे सारे संसार के दर्शन के लिए ऊपर ले जाते हैं"
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*■वेद सूर्य के बारे में■*
वेद *सूर्य* के बारे में क्या कहते हैं।
*[ऋग्वेद मण्डल 7 सूक्त 55 मंत्र 7]* कहता है-
सहस्रश्र्ङगो वृषभो यः समुद्रादुदाचरत |
*(अर्थात)* हज़ार *सींगों* वाला *बेल* अर्थात हज़ार किरणों वाला बलवान *सूर्य* समुद्र से उदय हुआ..| यही मंत्र *[अथर्ववेद काण्ड 4 सूक्त 5 मंत्र 1]* में दोहराया गया है।
*[अथर्ववेद 7/81/1]* में है
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परियातोर्णवम्||
*(अर्थात)* ये दोनों बालक अर्थात *सूर्य* और *चन्द्र* खेलते हुए, शक्ति से आगे पीछे चलते हैं, और *समुद्र* तक भ्रमण करते हुए पहुँचते हैं।
*(तो हमारे हिन्दू एवं आर्य बंधु यह बताने का कष्ट करेंगे कि सूर्य और चन्द्र को बच्चों की तरह खेलते हुए बताना कोनसा विज्ञान है?)*
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद के विशेष ब्राह्मण ग्रंथ *[कौषीतकी ब्राह्मण 18/9]* मैं लिखा है:-
स वा एषोअपः प्रविशय वरुणो भवति||
*(अर्थात)* - सूर्य पानी में प्रविष्ट हो जाता है और वरुण कहलाता है।
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वेदों में ज्ञान के तौर पर कुछ नहीं है किन्तु विज्ञान के उलट बहुत कुछ सारी बातें है, जैसे पृथ्वी खड़ी है, वह अन्नरस से पूर्ण करती है, वह दूध देती है;
(२) सूर्य रथ पर सवार घूमता है;
(३) सूर्य ग्रहण के समय सूर्य की स्व्भार्नु नामक असुर आ दबोचता है और अत्री व अत्रिपुत्र उसे असुर को मुक्त करते है, तब समाप्त होता है. ( ऋग्वेद ८/४०/५)
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● संदर्भ * VED में FLAT EARTH ?? * ● अंक
पृथ्वी के सिरे बेकार हो गए हैं ...
अंत [अंता] = अंत
* (RIG VED 8.25.18) *
वह जो अपनी किरण को स्वर्ग और पृथ्वी के * BOUNDARIES [ENDS] से नापता है .. *
# उपरोक्त कविता में प्रयुक्त शब्द पृथ्वी है जिसका अर्थ है पृथ्वी, कुछ हिंदू तर्क से बचने की कोशिश कर सकते हैं कह सकते हैं कि BHUMI [भूमि या पृथ्वी] की सीमाएं राष्ट्रों की वास्तविक सीमाओं को संदर्भित करती हैं, लेकिन उपरोक्त कविता पृथ्वी शब्द का उपयोग करती है जो विशेष रूप से संदर्भित करता है पृथ्वी। यहाँ BOUNDARY शब्द पृथ्वी की सीमाओं को दर्शाता है।
* (अथर्ववेद 15.7.1) *
वह आगे बढ़ते हुए महामहिम बन गए, * EARTH के ENDS ... * के पास गए
* (अथर्ववेद २०..1.1.१) *
जो उसके साथ हो सकता है EARTH'S END को छोड़े।
* (RIG VED 1.62.8) *
फिर भी पैदा हुए, युवा डेम, प्रत्येक, उसके तरीके में, ह्यू के विपरीत, पारे के चारों ओर अल्टरनेशन में * चार साइड्स ऑफ द ईथ .. *
* (RIG VED 4.50.1,) *
"... जिसके पास लपटों की जीभ है, जो अपनी ताकत द्वारा अपनी ताकत से * THE END OF EARTH * का नारा लगाता है, और जो ब्रह्मांड के तीन क्षेत्रों में संप्रभुता का पालन करता है"।
(त्र। सत्यप्रकाश सरस्वती, खंड 5, पृष्ठ 1535)
* VED स्पष्ट रूप से बताता है कि पृथ्वी चारो ओर से घिरी हुई है *
* (RIG VED 10.58.3) *
तेरा आत्मा, जो दूर चला गया, दूर चार कोनों पृथ्वी।
# शब्द संस्कृत अनुवाद द्वारा शब्द,
यते [यते] = तुम्हारा
मन [मन] = आत्मा / मन
जगम [जगम] = जाता है
दूरकम [दुर्कम] = दूर
* चतुर्भूषी [चतुर्भूषी / कैटबुर्स्ति] = चार सही *
* भूमि [भूमि] = पृथ्वी *
* CHATURBHUSTI शब्द (कैटबर्स्टी भी लिखा गया है) का अर्थ है, चारो ओर से *,
■ मोनियर-विलियम का संस्कृत शब्दकोश भी यही अर्थ देता है
http://sanskritdictionary.com/caturbh%E1%B9%9B%E1%B9%A3%E1%B9%ADi/78694/1
इसके अलावा ब्राह्मण इस कविता की पुष्टि करते हैं,
* (SATAPATHA BRAHMANA 6.1.2.29) *
अब यह * EARTH FOUR-CorNERED * है, * के लिए * QUARTERS उसके कोर्स * हैं: are इसलिए ईंटें FOUR-CORNERED हैं; सभी ईंटें इस धरती के तरीके के बाद हैं।
* (RIG VED 6.62.1) *
"... वे कभी अंधेरे के डिस्क्मिटर हैं और भोर के समय, निवेश के ठप्पे को इस समय के अंत तक बिखेर देते हैं।" -
(त्र। सत्यप्रकाश सरस्वती, पृष्ठ २१ )३।)
* (RIG VED 5.47.2) *
EARTH के बारे में * FID SIDES पर * और स्वर्ग एक सीमा के बिना विशाल रास्तों से आगे बढ़ता है।
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*ऋग्वेद मंडल १:१६४:११*
इस मंत्र में वैदिक ईश्वर ने अग्नि को संबोधित करते हुए तीन सौ साठ दिन और रातों का उल्लेख किया है ।
अज्ञानी वैदिक इश्वर ने दिन और रात कि उत्पत्ति कि और स्वयं ही भुल गया कि दिन तो तीन सौ पैंसठ होते है। इस मंत्र से ये साबित होता है कि आर्य समाजियों का वैदिक इश्वर संसार का जो पालनहार है उसको भुलने कि बिमारी है।
जिस आर्य समाजी को इस मंत्र पर संदेह है वो आचार्य सायण भाष्य ऋग्वेद में इस मंत्र कि पुष्टि कर सकता है।
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