Saturday, 18 July 2020

(PP) अश्लीलता, ऋषि, पुराण, मनुस्मृति


अप्राकृतिक मैथुन और वीर्यपात।

पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे! सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!

रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी! वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो! यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी. अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये! दूसरी घटना विश्वामित्र की है. जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!

इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे! ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी!  ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे! ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!

यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!

हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है! 
जो कभी घड़े मे... कभी दोने मे....कभी जल मे.... तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....

खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!

रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी- रम्भा इन नंगे- फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती! पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!

पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा! ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!

पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!

मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"
अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।

यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है! कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!

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ब्रह्मवैवर्तपुराण या कामशास्त्र  

ब्रह्मवैवर्तपुराण ने अश्लीलता की सारी हदे पार कर दी है, ऊपर से लिखने वाले ने कहा है कि:- 
"चतुर्णमपि वेदानां पाठादपि वरम् फलम" (कृष्णजन्म खण्ड अध्याय-133)
अर्थात- चारो वेद पठने से अधिक फल यह पुराण पढ़ने से होगा।

अब जरा अश्लीलता देखो-
ब्रह्मा विश्वम् विनिर्माय सावित्र्यां वर योषिति।
चकार वीर्यधानम् च कामुक्या कामुको यथा।।
सा दिव्यं शतवर्ष च घृत्वा गर्भ सुदुःसहम् ।।
सुप्रसूता च सुषुवे चतुर्वेदान्मनोहरात् ।।
(ब्रह्मखण्ड अध्याय-9/1-2)
अर्थात-ब्रह्मा ने विश्व का निर्माण कर सावित्री मे उसी प्रकार वीर्यदान किया जैसे एक कामुक पुरुष कामुक स्त्री से करता है, तब सावित्री ने दिव्य सौ वर्षो के बाद चारो वेदों को जन्म दिया!

अब जरा विचार करो कि इस पुराण ने वेद भी सावित्री के गर्भ से पैदा किया है! खैर ये तो ब्रह्मा की इज्जत उतारी गयी, अब जरा विष्णु को भी देखो लो.

प्रकृतिखण्ड अध्याय-8/29 मे लिखा है कि विष्णु ने वाराह रूप मे पृथ्वी से सम्भोग किया और बेचारी पृथ्वी बेहोश हो गयी! इसलिये पृथ्वी विष्णु की पत्नि कही गयी! पृथ्वी का प्रातःस्मरणीय श्लोक भी यही कहता है:-
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम् पादस्पर्ष क्षमस्व मे।।

इस श्लोक मे भी धरती को "विष्णुपत्नि" कहा गया है! हालाकि विष्णु को यही नही छोड़ा और तुलसी (वृन्दा) से भी सहवास का दोषी बताया।
"शङ्खचूङस्य रूपेण जगाम तुलसी प्रति।
गत्वा तस्यां मायया च वीर्यधानं चकार।।"
(प्रकृतिखण्ड-20/12) 
अर्थात- तुलसी भी जान गयी थी कि मेरे पति का रूपधारण करके कोई अन्य पुरुष (विष्णु) मेरे साथ सहवास कर रहा है!

शिव को भी इस पुराण ने नही छोड़ा, शिव का सती के साथ अश्लील वर्णन इस पुराण मे है! सती के मरने के बाद भी जो श्लोक लिखे गये जरा उस पर नजर डालो-
"अधरे चाधरं दत्वा वक्षो वक्षसि शङ्कर:।
पुनः पुनः समाश्लिपुनर्मूछामवाप सः।।"
अर्थात- अधरो पर अधर और वक्ष पर वक्ष कर शंकर ने उस मृतक शरीर का आलिंगन किया!

अब जब ब्रह्मा,विष्णु और शिव नही बचे तो भला कृष्ण कहाँ से बचते! इस पुराण ने कृष्ण की इज्जत उतारने मे कोई कसर नही छोड़ी।
जरा इस पुराण के प्रकृतिखण्ड का कुछ श्लोक देखिये-
"करे घृत्वा च तां कृष्णः स्थापयामास वक्षसि।
चकार शिथिल वस्त्रं चुम्बन च चतुर्विधम् ।।
बभूव रतियुद्धेन विच्छिन्नां क्षुद्रघण्टिका।
चुम्बननोष्ठेंरागश्च ह्याश्लेषेण च पत्रकम् ।।
मूर्छामवाप सा राधा बुपुधेन दिवानिषम् ।।"
अर्थात- कृष्ण ने राधा का हाथ पकड़कर वक्ष से लगा लिया,और उसके वस्त्र हटाकर चतुर्विध चुम्बन किया! फिर जो रतियुद्ध हुआ उससे राधा की करधनी टूट गयी और चुम्बन से होठों का रंग उड़ गया, तथा इस संगम से राधा मूर्छित हो गयी और उसे रात-दिन तक होश नही आया।

यही नही कृष्ण जन्मखण्ड (अध्याय-106/22) मे लिखा है कि- 
"कुब्जा मृता संभोगद्वाससा रजकोमृतः"
यहाँ रुक्मि कृष्ण से कहता है कि "तुमने कुब्जा से ऐसा सम्भोग किया कि वह बेचारी मर ही गयी"
कुब्जा के साथ जन्मखण्ड (अध्याय-72) मे और भी कई अश्लील श्लोक है जिसमे नाना प्रकार के सम्भोग का वर्णन है, जिसे मै संकोचवश लिख भी नही सकता! 

हाँ कृष्ण जन्मखण्ड अध्याय-27/83 श्लोक भी कम अश्लील नही है-
"प्रजग्मुर्गोपिका नग्नाः योनिमाच्छाद्व पाणानि"
यहाँ बताते हैं कि गोपिकाऐं अपनी हाथ से योनि को ढ़ककर पानी के बाहर निकली! वैसे इस अध्याय के सारे श्लोक अति अश्लील है, जिसे लिखना सम्भव नही।

खैर कृष्ण का गुणगान तो और भी है, जन्मखण्ड (अध्याय-3/59-62) मे लिखा है कि गोलोक मे कृष्ण विरजा नाम की एक महिला से सहवास कर रहे थे, तभी राधा ने पकड़ लिया और फटकारते हुये कहा कि- "हे कृष्ण तू पराई औरत मे व्यभिचार करते हो, तुम चंचल और लम्पट हो, तुम मनुष्यो की भाँति मैथुन करते हो! तुम मेरे सामने से चले जाओ, और तुम्हे श्राप देती हूँ कि तुम्हे मनुष्य योनि मिले"

पुराणकर्ता यही नही रुके, गणपतिखण्ड (अध्याय-20/44-46) मे इन्द्र और रम्भा के सम्भोग का ऐसा वृतान्त है कि कोई पोर्न फिल्मकार भी शर्म से लाल हो जाऐ! 
ब्रह्मखण्ड (अध्याय-10/85-87) मे विश्वकर्मा और घृताची के सम्भोग का अतिअश्लील वर्णन है, आगे इसी अध्याय के श्लोक-127-128 मे एक ब्राह्मणी से अश्विनीकुमार के बालात्कार ऐसा वर्णन है कि कोई कामशास्त्र भी फीका पड़ जाऐ।

यह पूरा पुराण ही अश्लीलता से भरपूर है, मैने केवल उतना ही लिखा जो सभ्य समाज के सामने परोसा जा सकता है, कई प्रकरण तो ऐसे है कि जिसे मै चाहकर भी नही लिख सकता। अब आप लोग स्वयं निर्णय करे कि यह कोई धर्मग्रन्थ है या अश्लील कामवासना की किताब, इस पुराण मे बड़ी चतुराई के साथ देवताओं की इज्जत उतारी गयी है, पर आज भी पंडे इस पुराण को सिर रखकर घूमते हैं!

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आंसू और अंडों से बच्चे 

महेश शर्मा ने जब मोर के आंसू वाली बात कही तो सोशल मीडिया पर उनकी खूब खिचाई हुई. असल मे ब्रह्मपुराण मे लिखा है कि मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भ धारण करती है, क्योकि मोर ब्रह्मचारी होता है!

अब मै महाभारत से एक ऐसी ही बात बता रहा हूँ. कश्यप ऋषि की तेरह पत्नियाँ थी, उन्होने ही समस्त जीव-जन्तुओं को जन्म दिया था (इस पर मैने पूर्व मे पोस्ट की थी) उनकी दो पत्नियो के नाम कद्रु और विनता थे. कद्रु से सांप और विनता से अरुण तथा गरुण का जन्म हुआ था! कश्यप ऋषि की ये दोनो पत्नियाँ जब गर्भवती हुई तो इन्होने बच्चो को जन्म नही दिया, बल्कि कद्रु ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये थे. उन अंडो को दासियों ने प्रसन्न होकर गर्म बर्तन मे रख दिया जिसमे से कद्रु के हजार नाग,सांप और तक्षक पैदा हुये! पर विनता के अंडे मे से बच्चे नही निकले तो उन्होने जल्दबाजी मे खुद एक अंडा फोड़ दिया, जिसमे वरुण देव थे. वरुण को बहुत गुस्सा आया और बोले कि तुमने मुझे समय से पहले अंडा फोड़कर बाहर निकाला इसलिये मै तुम्हे श्राप देता हूँ सैकड़ो वर्षो तक तुम अपनी सौतन की नौकरानी रहोगी.

अब जरा विचार करो कि अगर महिलाऐं उस काल अंडे देती थी और बच्चा अंडे से निकलकर माँ श्राप देता था, तो मोरनी वाली बात भी आश्चर्यजनक नही हो सकती।
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अंडकोष।

अण्डकोष शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है! यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है! पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है! जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है! लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था! सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया! अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती! अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें.

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!

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महावारी का रहस्य

विज्ञान के अनुसार महिलाओं के अंडाशय में एक अंडा तैयार होता है, जो गर्भाशय की नलिका में पहुंच जाता है, साथ ही गर्भाशय की अंदरूनी परत में खून जमा होता है ताकि अगर गर्भ बैठ जाए तो उस खून से बच्‍चा विकसित हो सके! अगर गर्भ नहीं बैठता तो यह परत टूट जाती है और उसमें जमा खून माहवारी के रूप में शरीर से बाहर आता है. हर महीने फिर गर्भ की तैयारी होती है और यही चक्र चलता है, अगर किसी माह गर्भ बैठ जाता है तो बच्‍चा गर्भाशय में पलने लगता है और इसीलिए माहवारी आना बंद हो जाती है!

भागवतपुराण के अनुसार आदिकाल मे असुरों और देवों का भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें देवता हार गये! इन्द्र से अपना खोया हुआ स्वर्ग वापस पाने के लिये विष्णुजी से सलाह ली! विष्णु ने कहा कि किसी ब्रह्मज्ञानी की सेवा करके वरदान अर्जित करो और असुरों को हराओ. इन्द्र ने एक ब्रह्मज्ञानी की सेवा करनी शुरू कर दी, पर उस ब्रह्मज्ञानी की माँ असुर घराने से थी.  जैसे ही यह बात इन्द्र को पता चली उन्होने उस ब्रह्मज्ञानी की हत्या कर दी! अब इन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया।  उसके निदान के लिऐ विष्णु जी ने इन्द्र से कहा कि आप अपने पाप को धरती,पेड़,जल और नारी मे एक-एक चौथाई करके बांट दो. इन्द्र ने धरती,पेड़,जल और नारी को उनका श्राप लेने के लिये मना लिया.  पर नारी ने बदले मे एक वर मांगा कि मै पुरुषों से अधिक कामशक्ति वाली रहूँ और पुरुषों का उपभोग कर सकूँ. इन्द्र ने वरदान देकर अपना एक चौथाई पाप महिलाओं को दे दिया. अब हर महीने जो माहवारी का दर्द महिलाऐं झेलती हैं वो ब्रह्महत्या का एक चौथाई पाप ही है, इससे स्वयं कामाख्या देवी भी नही बची और वो भी हर महीने माहवारी मे होती हैं तथा मन्दिर बन्द करना पड़ता है!

बस ये पता लगाना अभी शेष है कि वो कौन महिला थी जो सारी औरतों की चौधरी बनकर गयी और एक चौथाई पाप को स्वीकार कर लिया!

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विष्णु और अश्लीलता।

एक बार विष्णु जी ने किसी बात पर नाराज होकर लक्ष्मीजी को घोड़ी बनने का श्राप दे दिया. फिर क्या था पलक झपकते ही लक्ष्मी घोड़ी बन गयी! विष्णु ने निवारण के लिये कहा कि जब तुम एक पुत्र को जन्म दोगी तो फिर से अपने वास्तविक स्वरूप मे आ जाओगी! लक्ष्मी जी घोड़ी बनकर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर आ गयी, और सोचने लगी कि मै जब तक पुत्र को जन्म नही दूँगी तब तक श्रापमुक्ति नही मिलेगी, पर पुत्र होगा कैसे? यही विचार करके उन्होनेे शिवजी को ध्यान लगाया. भगवान शिव समझ गये कि जब तक पुत्र नही होगा ये बेचारी घोड़ी ही बनी रहेगी. पर पुत्र होगा कैसे?

ये यहाँ है, और विष्णु वैकुण्ठ मे. लक्ष्मी किसी दूसरे घोड़े के साथ मुँह काला करना नही चाहती थी. यही सोचकर शिव ने विष्णु को फटकार लगायी, शिव की बात मानकर विष्णु शीघ्र घोड़ा बनकर लक्ष्मी के पास पहुँचे और फिर दोनो के संसर्ग से लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया! इस पुत्र का नाम "एकवीर" रखा और यही आगे चलकर क्षत्रियों के हैहयवंश जन्मदाता बना।

अब सवाल यह है कि क्या यह कहानी सच है? अगर सच है तो विष्णु कैसे भगवान है जो खुद की पत्नि और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को घोड़ी बना देते है! क्या खुद को गौरवशाली समझने वाले हैहयवंशी क्षत्रिय घोड़ी से पैदा हुऐ? क्या हिन्दुओं के सर्वमान्य परमेश्वर विष्णु इतने निर्लज्ज थे कि घोड़ा/घोड़ी बनकर पुत्र पैदा करते थे?

ये कथा कई प्रश्न पैदा कर रही है, जिस पर आप भी विचार कर सकते हो! वैसे पुराणों मे लिखी हर कथा को महंत और कथावाचक लोग नाच-गाकर बताते हैं, पर इस कथा को पंडे-पुरोहित दबाकर ही रखते हैं! मै चाहता हूँ कि इस कथा के माध्यम से आप सब धर्माधिकारियों से सवाल करो कि विष्णु कैसे भगवान थे जो खुद की पत्नि को घोड़ी बनाते थे और दूसरे (जलंधर) की पत्नि (वृन्दा "तुलसी" ) से छल करते थे!

श्रोत:- देवीपुराण/छठा स्कन्ध (अध्याय-18, पृष्ठ संख्या- 442)

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इंद्र और अश्लीलता।

इन्द्र तो वासनाग्रस्त और हवस के पुजारी तो थे ही, साथ ही कायर भी थे, जो लगभग तमाम युद्धों असुरों से हार जाते थे। इन्द्र किस कदर वासना के अधीन थे इसका उदाहरण अहिल्या प्रकरण तो हैं ही, इसके अतिरिक्ति भी इन्द्र ने कई और बड़े काण्ड किये थे।

एक पौराणिक कथा के अनुसार अरूणदेव (सूर्यदेव के सारथी) ने एक बार स्त्री का रूप बनाकर (क्योंकि इन्द्र की सभा मे पुरुषों का आना निषेद्य था) इन्द्र की सभा मे अप्सराओं का नृत्य देखने गये। अचानक इन्द्र की नजर एक कोने मे स्त्री बनकर खड़े अरुणदेव पर पड़ी। इन्द्र ने सोचा कि यह फुलझड़ी कौन है जो अब तक मेरे हाथ नही लगी? इन्द्र अपने सिंहासन से उठकर अरुणदेव की तरफ लपके! अरूणदेव भी स्थिति को भांपकर भागे, पर इन्द्र ने उन्हे तेजी से झपटकर पकड़ लिया। बेचारे अरुणदेव छटपटाते रहे, पर इन्द्र ने एक न सुनी और अरुणदेव की नथ उतार ही दिया! इस मधुर-मिलन का परिणाम यह हुआ कि स्त्री-रूपधारी अरुणदेव गर्भवती हो गये और कालान्तर मे उनके गर्भ से वानरराज बालि का जन्म हुआ।

इन्द्र के कामपिपासा की एक कथा श्रीनरसिंहपुराण अध्याय-63 मे भी मिलती है- 
"कथानुसार एक बार इन्द्र ने सोचा कि मैने स्वर्ग का सुख बहुत भोग लिया, अब कहीं एकांत मे चलकर तप करके मोक्षप्राप्ति का साधन किया जाये।
ऐसा सोचकर कैलास-पर्वत के निकट आ गये और वहाँ उन्होने यक्षराज कुबेर की पत्नि चित्रसेना को देखा! चित्रसेना बहुत सुन्दर थी और उसकी सुन्दरता पर इन्द्र मुग्ध हो गये। इन्द्र ने सोचा कि कुछ भी करके मुझे यह सुन्दरी प्राप्त करनी ही है।
उस समय इन्द्र की हालत भी वही थी कि "निकले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"। बेचारे गये थे मोक्ष ढ़ूढ़ने पर फिर से सुन्दरता के जाल मे फँस गये। इन्द्र ने चित्रसेना को पाने के लिये कामदेव का आह्वान किया! जब कामदेव आये तो इन्द्र ने उन्हे सारी स्थिति बतायी और कहा कि तुम अपने कामबाणों से इस सुन्दरी की कामाग्नि भड़का दो, और मै तत्काल उसके सम्मुख जाकर मौके का फायदा उठा लूँगा।

कामदेव ने कहा, "देखो देवराज! एक बार मै इसी कैलास पर भस्म हो चुका हूँ, अब तुम दूसरी बार मुझे खतरा उठाने के लिये कह रहे हो"
कामदेव के बारम्बार समझाने पर भी इन्द्र न माने और मजबूरन कामदेव ने चित्रसेना पर कामबाण चला दिया। जैसे ही चित्रसेना काममोहित हुई, इन्द्र ने उसी क्षण उसके पास जाकर प्रणय-प्रस्ताव रख दिया और उसे अपने रथ पर बैठाकर मन्दराचल की गुफाओं मे लेकर चले गये। इन्द्र ने कामवेदना से पीड़ित चित्रसेना संसर्ग करके स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुख का अनुभव किया।"

इसके आगे काफी लम्बी कहानी है कि नाडीजङ्घा नामक एक राक्षसी की मदद से कुबेर ने अपनी पत्नि का पता लगाया! बाद मे इन्द्र ने नाडीडङ्घा राक्षसी को मार डाला और क्रोध मे आकर तृणबिन्दु मुनि इन्द्र को श्राप देकर स्त्री बना देते हैं।

उक्त कथाऐं भी इन्द्र की विलासिता का अन्त नही है, पुराणों मे ऐसी कई कथाऐं हैं जो बताती हैं कि इन्द्र परस्त्री-हरण, परस्त्री-गमन का अपराध करते थे, फिर भी त्रिदेवों ने इन्द्र को हमेशा माफ भी किया और उन्हे कभी अपदस्थ भी नही किया।
दूसरी बात जब श्रीकृष्ण ने तीन मुट्ठी चावल के बदले स्वर्ग और धरती का सारा वैभव सुदामा को दे दिया था, तब भी यह ज्ञात नही होता कि सुदामा ने आखिर कितने दिनों स्वर्ग और धरती पर राज्य किया था?

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ऋषियों की अश्लीलता।

वैदिककाल मे ऋषि-मुनि चाहे जितना ही तपस्वी क्यों न थे, पर वे महिलाओं के जाल मे जरूर फंस जाते थे। यानि भले ही वे दावा करते थे कि हमने काम, क्रोध, मोह और लोभ, सब पर विजय पा ली है, पर सुन्दर महिला देखते ही उनका भी लंगोट गीला होने लगता था।

एक ऐसी ही कथा रामायण-काल मे घटित हुई है। त्रेतायुग मे एक महाऋषि थे जिनका नाम ऋंग था। ये ऋंग रामजी के बहनोई और दशरथ के जमाता थे। (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग-9, श्लोक-11) 
जैसा कि सबको पता ही है कि राजा दशरथ के चार पुत्रों के अलावा एक पुत्री शांता भी थी। (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-11/3-5) 
दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को अपने निःसंतान मित्र रोमपाद को दे दिया था! एक बार रोमपाद से कोई पापकर्म हो गया और उनके राज्य मे अकाल पड़ गया।

राजा रोमपाद ने अपने तमाम ऋषियों और पुरोहितों को बुलाकर अकाल से निवारण का उपाय पूँछा! तब पुरोहितों ने बताया कि यदि ऋषि ऋंग को आप अपने महल मे बुलाकर उनका सत्कार करें और अपनी पुत्री शांता का वैदिकरीति से उनसे विवाह कर दें, तो आपके राज्य मे वर्षा जरूर होगी। राजा पुरोहितों की बात मानकर तैयार हो गये, पर अब समस्या यह थी कि ऋंगऋषि सदैव वन मे ही रहते थे, और कभी नगर मे आते ही नही थे। फिर भला राजा उन्हे नगर मे कैसे लेकर आते? तब पुरोहितों ने कहा कि यदि राज्य की सुन्दर वैश्याओं को ऋंगऋषि के आश्रम के आसपास भेजा जाये तो उनके सम्मोहन से ऋषि ऋंग जरूर पीछे-पीछे नगर तक आ जायेगें। राजा रोमपाद को यह योजना उचित लगी, और उन्होने इसी योजना पर वैश्याओं को अमल करने का निर्देश दे दिया।

अब मै यहाँ जरा आपको बता दूँ कि ऋंग इतने तपस्वी और प्रतापी ऋषि थे कि उनके कहीं आगमन मात्र से वर्षा हो सकती थी। राजा दशरथ के राज्य मे वशिष्ठ, वामदेव और जाबाल जैसे विद्वान के होते हुये भी यही ऋंग ऋषि ने दशरथ का पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करवाया था! मतलब ऋंग वामदेव, जाबाल और वशिष्ठ से भी अधिक विद्वान और तपस्वी थे। अब इतने विद्वान और तपस्वी ऋषि को फांसने के लिये राजा रोमपाद ने वैश्याओं का सहारा लिया, और आश्चर्य की बात है कि अपनी समस्त इन्द्रियों पर अंकुश रखने का दम्भ भरने वाले ये ऋषि भी वैश्याओं के लटके-झटके मे फंस गये!

रोमपाद की योजनानुसार जब वैश्याऐं ऋंग के आश्रम के पास गयी तो उन्हे देखते ही ऋंग के मुँह मे पानी आ गया। और जब वैश्याऐं आश्रम से वापस नगर लौटने लगी तो ऋषिऋंग भी उनके पीछे-पीछे नगर तक चले आये। इसके बाद की कथानुसार फिर रोमपाद के राज्य मे बारिश हुई और ऋंग का विवाह शांता से हो गया। बाद मे इन्ही ऋंग के सामर्थ्य से दशरथ ने राम तथा तीन अन्य प्रतापी पुत्रों को प्राप्त किया।

विभण्डक, विश्वामित्र, पराशर और ऋंग जैसे कई ऋषि आपको मिल जायेंगे जो सुन्दर नारी देखते ही लार टपकाने लगते थे। दूसरी बात इस कथा से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पौराणिक-काल के आर्य राजा अपने दुश्मनों या किसी अन्य को फांसने के लिये वैश्याओं का सहारा लेते थे।

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ऋषि, अश्लीलता, सेविका।

पुराणों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन आर्य-राजाओं की ऐसी लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो, अतः वे खुशी-खुशी अपनी रानियों को गर्भवती करने के लिये ऋषियों की शरण मे जाया करते थे। उनकी दृष्टि मे ये ऋषि "कुलीन सांड़" होते थे।

सत्यकाम जबाल की कथा लगभग सभी को मालुम है! कई लोग इस कथा को उदाहरण-स्वरूप भी बताते हैं कि किस तरह एक गणिका-पुत्र जबाल ऋषि बन गये थे।

वैसे यह कथा छान्दोग्योपनिषद चतुर्थखण्ड (चित्र-1-3) मे लिखी है! इस कथा को एक झूठ के साथ बताया जाता है कि सत्यकाम की माँ जबाला गणिका (वैश्या) थी। वास्तव मे जबाला गणिका नही थी, वह शादीशुदा थी और बहुत सारे अथितियों की सेवा-टहल करती थी। 

जब सत्यकाम अपनी माँ से पूँछते हैं कि माँ मेरा गोत्र क्या है. तब जबाला कहती है कि हे पुत्र! मै अपने पति के घर आये बहुत सारे अतिथियों की सेवा करने वाली परिचायिका थी, और उन्ही जवानी के दिनों मे मैने तुम्हे जन्म दिया था! अतः मुझे नही मालुम कि तुम्हारा गोत्र क्या है?

अब इस कथा का गीताप्रेम वाले चाहे जितना लीपापोती करके भाष्य करें, पर सच यही था कि जबाला को यह पता ही नही था कि उसने किस पुरुष के संसर्ग से सत्यकाम को पैदा किया था। और तो और जबाला यह सारे कर्म तब से करती थी, जब उसके पति जीवित भी थे।

ऋषियों के रंगीन-मिजाजी वाली कहांनियों से पुराण भरे पड़े हैं। ऐसी ही एक कथा महाभारत के उधोगपर्व (अध्याय-103 से 123 तक) मे माद्री की आती है! 
माद्री राजा ययाति के कुल से थी, फिर भी उसे एक के बाद एक कई ऋषियों के साथ सहवास करना पड़ता है, और जब सारे ऋषियों का मन माद्री से भर जाता है तो वे उसे पुनः राजा ययाति को वापस लौटा देते हैं।

एक अन्य कथा महाभारत के "आदिपर्व" मे महर्षि उतथ्य की आती है, जो ऋषि अंगिरस के कुल के थे। महर्षि उतथ्य की पत्नि ममता बहुत सुन्दर थी, और उतथ्य का छोटा भाई वृहस्पति (जो देवऋषि माने गये हैं) ममता पर आसक्त था। एक दिन जब ममता घर मे अकेली थी तो वृहस्पति ने मौका देखकर ममता से सम्भोग करना चाहा, जिस पर ममता ने यह कहकर मना कर दिया कि " अभी मै गर्भवती हूँ, अतः आप प्रतिक्षा करो"

सोचने वाली बात यह है कि यहाँ ममता ने वृहस्पति को फटकारा नही, और न ही यह कहा कि यह अनैतिक है। केवल इंतजार करने के लिये कहा! इससे ऐसा लगता है कि ममता और वृहस्पति के बीच अनुचित सम्बन्ध रहे होंगे! हालांकि वृहस्पति ममता के इस अर्ध-इनकार से भी इतने नाखुश हुये कि उन्होने ममता को श्राप दे दिया कि तेरा पुत्र अंधा पैदा होगा। हुआ भी वही, ममता के पुत्र ऋषि दीर्घतमा अंधे ही पैदा हुये।

वैसे, यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि खुद वृहस्पति की पत्नि तारा को इनके ही शिष्य चन्द्र उठा ले गये थे, और उससे सहवास करके "बुध" नामक पुत्र को पैदा किया था। आगे चलकर इसी गुरूपत्नि-पुत्र बुध से चंद्रवंशीय क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई।

पूर्वकाल मे ऋषि किस कदर कामान्ध होते थे, इसका एक उदाहरण डा० अम्बेडकर ने अपनी बहुचर्चित किताब "रिडल इन हिन्दुइज्स" के पृष्ठ-298 पर उल्लेख किया है! अम्बेडकर ने लिखा है कि पूर्वकाल मे यदि कोई ऋषि यज्ञ कर रहा होता था, और यदि उसी समय वह किसी स्त्री से संभोग करना चाहता था तो ऋषि यज्ञ को अधूरा छोड़कर एकांत मे जाने के बजाए यज्ञ-मण्डप मे ही खुलेआम उस स्त्री से मैथुन कर सकता था। बाद मे इस घृणित-कृत्य को भी "वामदेव व्रत" नामक धार्मिक विधान बना दिया गया, और कालान्तर मे यही 'वाममार्ग' कहलाया।

रंगीन-ऋषियों की सूची और भी लम्बी है, जिसमे पराशर, कर्दम, विभण्डक और दीर्घतमा के नाम मुख्य हैं.

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ऋषि अगस्त्य।

समुद्र पी जाने वाले ऋषि अगस्त्य का नाम तो लगभग सभी ने सुना है, पर शायद कम ही लोग जानते हैं कि ऋषि अगस्त्य पैदा कैसे हुये। एक बार राजा निमि और ऋषि वशिष्ठ मे किसी बात को लेकर विवाद हो गया, फिर दोनो ने एक-दूसरे को शरीर-हीन होने का श्राप दे दिया और श्रापवश दोनो ही शरीर-विहीन हो गये....
तत्पश्चात वशिष्ठ अपने पिता ब्रह्माजी के पास गये और उनसे पुनः शरीर प्राप्ति का उपाय पूँछने लगे! ब्रह्मा ने कहा कि आप वरूणदेव के वीर्य मे प्रवेश कर जाओ, फिर तुम अयोनिज रूप से पुनः शरीर पा जाओगे और जो वायुरूप मे विचरण कर रहे हो उससे मुक्ति मिल जायेगी! ब्रह्मा की आज्ञा से वशिष्ठ वरुण के वीर्य मे प्रविष्ठ कर गये!

एक दिन की बात है, उर्वशी बड़े सुन्दर वस्त्र पहनकर वरुण के निकट से गुजर रही थी! उर्वशी के रूप-रंग को देखकर वरुण काम पीड़ित हो गये और उसके पास जाकर समागम करने की विनती करने लगे! उर्वशी ने कहा कि हें वरुणदेव! आज तो यह सम्भव नही हैं... आज मैने आपसे पहले मित्रदेव को समागम करने के लिये हाँ कर दिया है! अभी मै उन्ही के पास जा रही हूँ, आज मेरा शरीर उनके लिये है, आप किसी और दिन अपनी इच्छापूर्ति कर लेना! वरुण ने कहा कि मै आज तड़प रहा हूँ, और तुम किसी और दिन की बात कर रही हो! मुझसे कामाग्नि सही नही जा रही है.....हे उर्वशी! मेरी विनती स्वीकार कर लो। पर उर्वशी न मानी और बोली कि मैने आज मित्रदेव को वचन दे दिया है, वो आपसे पहले ही मेरे पास आये थे!
तब वरुण देव ने कहा कि उर्वशी तुम मेरी मदद करो, मै किसी घड़े मे अपना वीर्य-त्याग करना चाहता हूँ! उर्वशी ने कहा कि हाँ, आज यही ठीक रहेगा! फिर उर्वशी एक घड़ा लायी, और वरुण देव ने उसी घड़े मे अपना वीर्यपात करके अपनी हवस शान्त की!

इसके बाद जब उर्वशी मित्रदेव के पास पहुँची तो मित्रदेव क्रोध से लाल हो गये, और बोले, रे दुराचारिणी! तू अभी तक किससे नैना-चार कर रही थी?
मै कब से तेरी प्रतिक्षा कर रहा हूँ, और तू किसी और से व्यभिचार कर रही थी, जबकि तूने मुझे आज अपने आप को समर्पित करने का वचन दिया था! उर्वशी ने मित्रदेव को बहुत समझाया, पर मित्रदेव न माने, और वो भी उसी मटके मे वीर्यपात करके चले गये! थोड़े दिन बाद वरुण के वीर्य से वशिष्ठ और मित्रदेव के वीर्य से अगस्त्य ऋषि का जन्म हुआ! अगस्त्य ऋषि कुम्भ (मटके) से पैदा हुये थे इसलिये इनका एक नाम 'कुम्भज' भी है!

अब जरा सोचो कि मटके मे ऐसा कौन सा पदार्थ होता था कि जिसमे वीर्य गिराने से बच्चे का जन्म हो जाता था! महाभारत के अनुसार गांधारी के सौ पुत्र भी मटके से ही पैदा हुये थे! आखिर कुम्हार मटका पानी रखने के लिये बनाते थे, या उसमे वीर्यपात करके अयोनिज संतान पैदा करने के लिये। यह पूरी कथा वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग-56-57 से ली गयी है।

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ऋषि गौतम और अहिल्या।

ओशो का मानना था कि पौराणिक ऋषियों को भी सुन्दर स्त्रियों की लालसा थी, कई बार इनकी स्त्रियाँ इनसे उम्र मे काफी छोटी होती थी! एक बात ध्यान रखना कि काम को सामान्यतः कोई जीत नही पाया, न तो ऋषि-मुनि और न ही इनकी पत्नियाँ!

यह तो सबको पता ही है कि देवगुरू वृहस्पति की पत्नि तारा और चन्द्रदेव (चन्द्रमा) के बीच अनैतिक सम्बन्ध थे, और इन दुराचार से 'बुध' नाम का एक पुत्र भी पैदा हुआ था!

ऐसी ही एक और ऋषिपत्नि थी "अहिल्या"।  अहिल्या ऋषि गौतम की पत्नि थी, जो बहुत सुन्दर थी! अहिल्या की सुन्दरता पर स्वयं देवराज इन्द्र भी फिदा थे! कहते हैं कि एक बार इन्द्र और चन्द्र ने मिलकर गौतम ऋषि को बेवकूफ बनाया!
गौतम ऋषि प्रतिदिन सुबह मुर्गे की बांग सुनकर नहाने जाते थे, और इसी का लाभ लेकर चन्द्र ने एक दिन समय से पहले ही मुर्गा बनकर बांग दे दी! गौतम ऋषि धोखे मे आकर नहाने चले गये, मौका पाकर इन्द्र गौतम का वेष बनाकर अहिल्या के पास आये ट्वेन्टी-ट्वेन्टी खेलकर भाग निकले...  जिससे क्रोधित होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप देकर पत्थर बना दिया, क्योंकि उसने अपने पति के रूप मे आये इन्द्र को पहचानने मे भूल की!

हांलाकि यह कहानी सच नही है, सच तो यह है कि अहिल्या ने स्वयं इन्द्र के साथ संसर्ग किया था! यह सच है कि चन्द्र मुर्गा बनकर बोले थे, पर इन्द्र ने अहिल्या से छल नही किया था!

बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड सर्ग-48/17-21 मे साफ लिखा है कि जैसे ही गौतम ऋषि स्नान करने अपनी कुटिया से निकले, देवराज इन्द्र अन्दर आ गये!
इन्द्र ने अहिल्या से कहा- हे देवी! मे देवराज इन्द्र हूँ, मैने तीनों लोकों मे तुमसे सुन्दर स्त्री नही देखी! तुम अद्वितीय रूपवती हो, मै तुमसे रतिक्रिया (सम्भोग) करना चाहता हूँ! इन्द्र चालाक थे, उन्हे मालूम था कि महिलाऐं अपनी प्रशंसा सुनना बहुत पसन्द करती है....

इन्द्र के मुँह से अपने रूप की प्रशंसा सुनते ही अहिल्या के पाँव जमीन पर नही रहे, वो सोचने लगी कि "हाय,, मै इतनी सुन्दर हूँ कि स्वयं देवराज मुझसे प्रणय के लिये विनती कर रहे है, मेरे अहो भाग्य!" और फिर अहिल्या तैयार हो गयी! जब इन्द्र ने गौतम ऋषि की कुटिया मे भरपूर 'बरसात' कर ली, तब अहिल्या से बोले कि- 'हे देवी! मुझे बहुत आनन्द आया, मै अब संतुष्ट हुआ' अहिल्या ने कहा कि मै भी आपसे तृप्त हुई, पर इससे पहले की मेरे पति आ जाये, आप यहाँ से चले जाओ।

कहते हैं कि हाथी पालना तो आसान होता है, पर उसका चारा देना मुश्किल है!
ऋषि-मुनि अधेड़ अवस्था मे भी सुन्दर कन्याओं से शादी कर लेते थे, पर क्या वो अपनी पत्नियों को खुश रख पाते थे, यह बड़ा प्रश्न था! और अहिल्या की घटना भी यही बताती है। चलो अगर एक बार मान भी लें कि इन्द्र ने अहिल्या से छल किया, और अहिल्या इन्द्र को पहचान ही नही पायी तो फिर क्यों गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप दिया? फिर तो उस दिन केवल अहिल्या ही नही, गौतम ऋषि भी छले गये थे! गौतम ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे, और इतना तपोबल था कि किसी को श्राप देकर पत्थर बना सकते थे, पर उस समय इनका तपोबल कहाँ चला गया था, जब ये चन्द्रमा की नकली बांग को असली मुर्गे की आवाज समझ बैठे! अगर गौमत जैसे दिव्यऋषि को यह ज्ञान नही हो पाया कि चन्द्रमा उन्हे छल रहा है, तो अहिल्या कैसे जान पायेगी कि इन्द्र मेरे पति के रूप मे आये हैं। गौतम ऋषि का अहिल्या को श्राप देना सर्वथा अनुचित था! अहिल्या इन्हे भी तो श्राप दे सकती थी, कि तुम धोखे मे आकर आधी रात को नहाने क्यों गये। और अगर महर्षि बाल्मीकि की बात सत्य है तब भी गौतम ऋषि ही दोषी है, अगर वो अहिल्या को संतुष्ट रखते तो शायद वो इन्द्र के प्रस्ताव को न स्वीकार करती!

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ऋषि और अप्सराएं।

पूर्वकाल मे ऋषि-मुनि भी काम (Sex) मे विरक्त नही थे! सामान्यतः यह अवधारणा है कि ऋषि लोग काम को जीत लेते थे, पर जरा गौर करना कि पूर्वकाल मे लगभग पुरुष बहुपत्निक होते थे!

ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!
मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!
कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!
राम के पिता दशरथ को तीन पत्नियाँ थी, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा!

अरे मनुष्य तो क्या तथाकथित देवता थी बहुपत्निक ही थे!
चन्द्रमा को 27 पत्नियां थी, जिनके नाम से 27 नक्षत्रों के नाम है!
इसके बाद भी इन्होने अपने गुरू वृहस्पति की पत्नि तारा से मुँह काला किया!
इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा!
अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!

आखिर जब ये महामानव काम को जीत चुके थे तो एक पत्नि से संतोष क्यो नही होता था! चलो अगर पुराणों की बात को ही पूर्णतः सच मान लिया जाये कि ऋषि-मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे! तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था? क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है! आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा!

रामायण मे कुम्भकर्ण को नींद से जगाने के लिये रावण ने सुन्दर स्त्री नही भेजी थी, बल्कि स्वादिष्ठ भोजन भेजा था! क्योकि रावण जानता था कि कुम्भकर्ण को स्वादिष्ठ भोजन पसन्द है, और उसकी महक से कुम्भकर्ण जाग जायेगा! क्या इसी प्रकार इन्द्र जानता था कि ऋषियों को अप्सराऐं पसन्द है, और उनकी पायल की खनक सुनते ही इनकी साधना टूट जायेगी! उसका यह प्रयोग सच भी होता था, अप्सराओं को देखते ही ऋषि-मुनि लार टपकाने लगते थे, और अपनी वर्षो की कठोर साधना तोड़ देते थे!

आश्चर्य की बात तो यह है कि इन्ही पुराणों मे यह भी लिखा है कि जब कोई असुर तपस्या करता था, तब भी इन्द्र उनके तप को भंग करने के लिये इन्ही अप्सराओं को भेजता था! तब भी अप्सराऐं आकर अपने लटके-झटके दिखाती थी, पर कोई भी असुर इनके झांसे मे नही आता था! तो क्या यह मान लेना चाहिये कि ऋषि-मुनि असुरों से भी अधिक लंगोट के ढ़ीले थे!

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पुराणों की अश्लीलता।

एक कथा कूर्मपुराण अध्याय-37 मे लिखी है, जो निम्न है-
"एक बार भगवान शिव खुद भी नंग-धड़ंग होकर और साथ मे भगवान विष्णु को भी एक सुन्दर महिला बनाकर उन्हे भी नग्न-अवस्था मे लेकर देवदारू नामक वन मे विचरण करने लगे। उसी वन मे कई ऋषियों के आश्रम भी थे तथा उन ऋषियों की पत्नियाँ और उनके युवा पुत्र तथा पुत्रबधुऐं निवास करती थी।वन मे विचरण करते-करते शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु नंगे बदन ही उन ऋषियों के आश्रम के पास पहुँच गये। दोनो को नग्न अवस्था मे देखकर ऋषियों के पुत्र और बहुऐ स्तब्ध हो गयी! शिव नग्न-स्थिति मे भी इतने सुन्दर दिख रहे थे कि ऋषियों की जवान पुत्रबधुऐं कामातुर हो उनसे जाकर लिपट गयी और उनका आलिंगन करने लगी।
विष्णु भी स्त्रीरूप मे अपना जलवा बिखेर रहे थे, उनके गदराऐ हुस्न को देखकर तमाम ऋषिपुत्र भी विष्णु के चरणों मे जाकर गिर गये और उनसे प्रणय की याचना कर लगे। अभी यह खेल चल ही रहा था कि अचानक तमाम ऋषिगण भी वहाँ आ गये और उन्होने जब अपने पुत्रों और बहुओं को इस तरह वासनाग्रस्त स्थिति मे देखा तो अत्यन्त क्रोध किया। क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने विष्णु और शिव दोनो को अनेक प्रकार के श्राप दिये पर उनके सारे श्राप निष्फल होकर रह गये। अतः क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने नग्न शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु को मारकर उस वन से भगा दिया।

अब दोनो देवदारू वन से घायल (ऋषियों की मार से) होकर वशिष्ठ के आश्रम मे आ गये! वशिष्ठ की पत्नि अरुन्धती ने दोनों देवों का बहुत स्वागत किया तथा उनके घावों पर औषधि भी लगायी। अभी घायल विष्णु और शिव का वशिष्ठ के आश्रम मे उपचार चल ही रहा था कि अचानक वशिष्ठ के शिष्यगण कहीं से आ गये और आश्रम मे नग्न महिला-पुरुष के जोड़े को देखकर उन्हे डंडे, ढ़ेलों तथा मुक्कों से मारने लगे। उन मुनियों ने क्रोध मे आकर शिव से कहा 'हे दुर्मते! तुम अपने इस लिंग को उखाड़ फेंको'। शिवजी ने कहा कि यदि आप लोगों को मेरे लिंग के प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया है तो मै वैसा ही करता हूँ। ऐसा कहकर शिव ने अपना लिंग उखाड़कर फेंक दिया! उनके लिंग फेंकते ही सबकुछ अदृश्य हो गया और चारो तरफ अंधेरा छा गया! सूर्य का तेज मंद हो गया, समुद्र सूखने लगे और धरती कांपने लगी। अब सारे ऋषिगण परेशान होकर ब्रह्माजी के पास गये और बोले कि हे देव! दारूवन मे एक अति सुन्दर नग्न पुरुष आया था जो हमारी पत्नियों और बहुओं को दूषित कर रहा था, तथा उसके साथ एक सुन्दर महिला भी थी, जो हमारे पुत्रों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी! हम लोगों ने उसे विविध प्रकार के श्राप दिये, पर जब हमारे सारे श्राप निष्फल हो गये तब हम लोगो ने उसे बहुत मारा और उस पुरुष के लिंग को नीचे गिरा दिया। लिंग के नीचे गिरते ही सभी प्राणियों मे भय प्रदान करने वाला भीषण उत्पात मच गया!
हे ब्रह्मदेव! वह स्त्री और पुरुष आखिर कौन थे?"

अब इसके आगे लम्बी कहानी है कि ब्रह्मा ने बताया कि वे साक्षात महादेव और विष्णु थे, और फिर ऋषियों ने अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये उनके कटे हुये लिंग के समान एक दूसरा लिंग बनाकर अपने पुत्रों, पत्नियों तथा बहुओं सहित वैदिक-रीति से शिव की अराधना की और फिर सब कुछ पहले जैसा ठीक हो गया।

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पुराण में मिलावट।

पौराणिक कहते हैं की पुराण अलंकृत तरीके से लिखे गये है।

भविष्यपुराण (गीताप्रेस कोड-584) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड (पृष्ठ-343) पर तैमूरलंग द्वारा भारत पर आक्रमण की कथा लिखी है। यहाँ लिखा है कि तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण करके यहाँ के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डाली, और पुजारियों से कहा कि तुम लोग मूर्तिपूजक हो, तुम लोग शालग्राम को विष्णु (भगवान) मानते हो जबकि यह एक पत्थर है। ऐसा कहकर वह शालग्राम की तमाम मूर्तियाँ ऊँट पर लदवाकर अपने देश तातार (उजबेकिस्तान के पास का क्षेत्र) लेकर चला गया और वहाँ उसने उन मूर्तियों का सिंहासन बनवाया तथा उस पर बैठने लगा! शालग्राम की ऐसी दुर्दशा देखकर तमाम देवता दुःखी होकर इन्द्र के पास गये और बोले कि हे देवराज! अब आप ही कुछ करो। फिर क्रोध मे आकर इन्द्र ने अपना वज्र तातार देश की ओर खीचकर मारा! वज्र के प्रहार से तैमूरलंग का राज्य टुकड़े-टुकड़े हो गया और तैमूरलंग अपने सभी सभासदों समेत मृत्यु को प्राप्त हो गया।

मतलब यह पुराण कह रहा है कि तैमूरलंग का वध इन्द्र ने किया था। वैसे ही दुर्गा ने महिषासुर को मारा होगा और वैसे ही विष्णु ने भी तमाम राक्षसों को मारा होगा! अब चूँकि तैमूरलंग नाम का पात्र इतिहास मे था, अतः कुछ दशकों बाद पंडों- पुरोहितों को यह प्रचार करने मे अधिक तकलीफ नही होगी कि तैमूर को इन्द्र ने ही मारा था!

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पुराण और खेती।

श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम हल धारण करते थे, इसीलिये उनका एक नाम 'हलधर' भी था। हिन्दूधर्म के एक पुराण मे बताया गया है कि जितने लोग खेती करते थे, या हल जोतते थे, वे सबके सब घोर नर्क मे जायेंगे।

संक्षिप्त भविष्यपुराण (गीताप्रेस) उत्तरपर्व, अध्याय-214 (पृष्ठ-386) मे एक कथा लिखी है। कथानुसार एक बार नारद ने विष्णु से जिद किया कि आप मुझे अपनी माया के दर्शन कराइये। विष्णु ने नारद की बात मान ली, और दोनो ब्राह्मण का वेष बनाकर धरती पर आये। दोनो विदिशा नामक एक नगरी मे गये, जहाँ एक सीरभद्र नामक वैश्य निवास करता था। उस वैश्य ने ब्राह्मण-रूपधारी नारद और विष्णु का खूब आदर-सत्कार करते हुये विनती किया कि 'हे महात्मन्! यदि आप उचित समझे तो हमारे घर भोजन ग्रहण करें'

उस वैश्य की विनय सुनने के बाद ब्राह्मणरूपी विष्णु ने उसे आशिर्वाद दिया की तुम्हारे अनेकों पुत्र/पौत्र हो, और व्यापार तथा खेती मे खूब सफलता मिले। उक्त आशिर्वाद देकर, बिना भोजन किये ही विष्णु और नारद वैश्य के घर से चले गये! अब दोनो उसी नगरी मे थोड़ी दूर स्थित एक ब्राह्मण के घर आ पहुँचे। ब्राह्मण ने भी दोनो ही मेहमानों का खूब सेवा-सत्कार किया और भोजनादि करवाया, पर जब विष्णु उस ब्राह्मण के घर से जाने लगे तो उन्होने ब्राह्मण को आशीष देते हुये कहा कि "परमेश्वर करें कि तुम्हारी खेती निष्फल हो जाये"

विष्णु के इस अजीब व्यवहार को नारद समझ नही पाये, और उन्होने ब्राह्मण के घर से थोड़ी दूर जाते ही विष्णु से पूँछा कि "हे भगवन्! आपने वैश्य के घर भोजन भी नही किया, फिर भी उसे आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी खेती मे वृद्धि हो, और ब्राह्मण के घर भोजन करने के बाद भी उसकी खेती निष्फल हो जाने का श्राप दे दिया"। प्रभु, आखिर ये क्या रहस्य है?

तब विष्णु ने नारद से कहा- हे नारद! साल भर मछली पकड़ने से जितना पाप होता है, उतना ही पाप एक दिन हल जोतने से होता है। वह सुरभद्र वैश्य अपने पुत्र/पौत्रों के साथ इसी कार्य मे लगा है, अतः वह अपने परिवार सहित नर्क मे जायेगा! इसीलिये हमने उसके घर न विश्राम किया और न ही भोजन किया, लेकिन ब्राह्मण के घर विश्राम और भोजन दोनो किया, इसीलिये उसे ऐसा श्राप दिया जिससे वह इस पाप से बचकर मुक्ति को प्राप्त करे।

एक किसान मेहनत करके खेती करता है, तो विष्णु के कथनानुसार वह नर्क मे जायेगा, और कोई ब्राह्मण जो उसी के घर भिक्षा-स्वरूप मांगकर अन्न खाता है, वह स्वर्ग का भागीदार है। यदि इन कथाओं मे सत्यता है तो कम से कम 60% हिन्दू अब तक नर्कगामी हो चुके हैं। ब्राह्मणों ने वास्तव मे इन कथाओं को खेतिहर समाज के लोगों के मानस पर एक तगड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ने के लिये लिखा है। ताकि किसान-वर्ग को यह लगे कि वे खेती करके अधर्म का काम कर रहे हैं, और उस अधर्म से बचने के लिये खेत मे पैदा हुये फसल का एक भाग ब्राह्मणों को दान-स्वरूप देते रहें।
ऐसा गाँव-देहात मे होता भी है, जब कोई फसल कटकर तैयार हो जाती थी, तो पंडित जी खलिहानी मांगने गाँव मे आते भी थे।

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पुराण और पहाड़ो की उत्पत्ति।

वाल्मीकि ने रामायण बालकाण्ड सर्ग-36 मे लिखा है कि- "पूर्वकाल मे जब शिवजी ने पार्वती से विवाह करके अपनी रतिक्रीड़ा प्रारम्भ की तो लगातार सौ दिव्यवर्षों तक समागम करते ही रहे! इतने समागम करने बाद भी जब पार्वती को कोई गर्भ न हुआ तो देवताओं मे बड़ी बेचैनी हुई, और ब्रह्मा आदि दूसरे अन्य देवता उन्हे रोकने का उधोग करने लगे, क्योंकि देवता डर भी रहे थे कि इतने अधिक समय तक यदि समागम से शिवजी के तेज (वीर्य) से कोई महान प्राणी पैदा हो गया तो उसे रोकेगा कौन?

यही सोचकर सारे देवता शिव के पास गये और बोले कि हे महादेव! यह संसार आपके तेज (वीर्य) को धारण नही कर सकेगा, अतः अब आप क्रीडा से निवृत्त हो माँ पार्वती के साथ तप करो।  देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी मान गये, और देवों से बोले कि देवताओ! उमा सहित यदि मैने अपने तेज से अपने वीर्य को धारण कर लिया, फिर भी यदि क्षुब्ध होकर मेरा वीर्य स्खलित हो गया तो उसे कौन धारण करेगा? शिवजी की बात सुनकर देवता बोले कि हे देवेश्वर! यदि आपका वीर्य स्खलित हुआ तो उसे देवी पृथ्वी धारण कर लेगी। देवताओं की बात सुनने के बाद शिवजी ने अपना तेज छोड़ दिया, जिससे वह सारी पृथ्वी पर फैल गया। फिर शिवजी के वीर्य के प्रभाव से पृथ्वी पर श्वेत पर्वत बन गये और सरकंडों के वन भी प्रकट हो गये।

लेकिन पार्वती को यह बात बुरी लगी कि शिवजी ने देवताओं के अनुरोध पर क्रीड़ा को बीच मे ही छोड़ दिया और अपना वीर्य मेरे गर्भ के बजाय पृथ्वी पर ही स्खलित कर दिया है। फिर क्या था, पार्वती क्रोध से तिमतिमा गयी और देवताओ से बोली कि मैने पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से पति के साथ समागम किया था, परन्तु तुम लोगों ने मुझे रोक दिया। अतः मै भी तुम लोगों को श्राप देती हूँ कि तुम लोग भी संतानहीन हो जाओगे। पार्वती ने इसके बाद पृथ्वी को भी श्राप दे दिया कि तुमने मेरे पति के तेज को धारण किया, अतः भूमे! अब से तेरा भी एक रूप नही रह जायेगा"

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पुरणो में सोना चांदी की उत्पत्ति।

सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारे मे वैज्ञानिक बताते हैं कि करीब 20 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर धूमकेतुओं की वर्षा हुई थी, और उससे पिघले खनिज ही आज सोना और चाँदी के रूप मे मौजूद है!

भागवतपुराण द्वितीयखण्ड मे सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारें मे पूरी कहानी बतायी गयी है-- एक बार शिवजी विष्णु से मिलने गये, और उन्होने विष्णु से निवेदन किया कि आप मुझे वही मोहिनी वाला रूप दिखा दो, जिसे देखकर असुरों ने आपको अमृत का घड़ा दे दिया था! विष्णु ने कहा कि उचित समय पर आपको वह रूप जरूर दिखा दूँगा! कुछ समय बाद एक दिन शिवजी पार्वती के साथ कहीं जा रहे थे, अचानक उन्होने एक सुन्दर स्त्री को देखा! वह स्त्री एक गेंद को उछालकर खेल रही थी, और जब वह गेंद को ऊपर उछालती तो उसके स्तन जालीदार कपड़ों से बाहर झांकने लगते थे. उसे देखते ही शिवजी मदहोश और कामातुर हो गये, शिवजी ने इतनी सुन्दर स्त्री कभी नही देखी थी! वह स्त्री कोई और नही, बल्कि मोहिनी रूप मे विष्णु ही थे। शिवजी मोहिनी को पकड़ने के लिये उसकी तरफ दौड़े, वे कामपिपासा से इस तरह व्यग्र थे कि यह भी भूल गये कि उनके साथ पार्वती भी है! शिवजी को अपनी तरफ आता देखकर मोहिनी भी उनसे दूर जाने लगी... अब तो शिवजी अपना त्रिशूल फेंककर उसकी तरफ ऐसे झपटे जैसा किसी गाय के पीछे मतवाला सांड़ भागता हो!

मोहिनी रूपधारी विष्णु भी समझ गये कि मैने 'मोहिनी' बनकर आफत मोल ले लिया है, अब अगर इस भंगेड़ी के हाथ लग गये तो मेरी सजी-सजाई हवेली खण्डहर बन जायेगी. फिर क्या था, अपनी जान बचाकर मोहिनी भी भागी!
शिवजी मोहिनी के अद्भुत सौन्दर्य को देखकर कामाग्नि मे जल रहे थे, उन्होने मोहिनी को पूरी ताकत झोककर खदेड़ लिया कि 'कहाँ तक भागकर जाओगी छम्मक-छल्लो'। शिवजी किसी कामुक घोड़े की तरह मोहिनी को पकड़ने के लिये दौड़ रहे थे, वे इतने कामातुर हो गये थे कि यूँ समझ लो कि भुसावली केला छिलके के बाहर आ गया, और शिवजी का वीर्य टपकने लगा. शिवजी का वीर्य जहाँ-जहाँ टपका, वहाँ सोने की खादाने हुई, अर्थात भागवतपुराण के अनुसार सोना और चाँदी शिवजी के वीर्य से बने हैं! अतः ऐसे ही सोना-चाँदी की उत्पत्ति हुई.

वैसे शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों की पूजा हम भारतीय करते है, और ये वीर्य टपकाने दक्षिण अफ्रीका चले गये! वैसे इस कथा से जुड़ी कुछ लोककथाऐं भी है, केरल के हिन्दुओं का मानना है कि मोहिनी ने शिव के एक पुत्र को जन्म दिया था, जिसका नाम "अयप्पा" था! केरल के हिन्दू सबसे अधिक अयप्पा की ही पूजा करते है, और वहाँ अयप्पा के कई मन्दिर हैं. जबकि भागवतपुराण की माने तो मोहिनी शिव के हाथ से निकलकर भाग गयी थी!

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धरती और मनुष्य रचना।

भगवान ने दो अरब साल पहले ब्रह्माण्ड की रचना की, फिर पृथ्वी को बनाया! पृथ्वी लुढ़क ना  जाये इसलिये उसे शेषनाग के फन पर रख दिया.जब शेषनाग जरा सा हिलते हैं तो भुकम्प आ जाता है, फूँक मारते हैं तो धरती पर आँधी आती है और जब गांजा पीकर धुआँ छोड़ते है तो धरती पर कुहरा छा जाता है.

भगवान ने पृथ्वी बनाने के बाद आक्सीजन लाने के लिये पेड़-पौधों के बीज धरती पर बोए.  हर महीने ईश्वर इफको यूरिया का छिड़काव करते थे, और जब आक्सीजन आ गयी तब ईश्वर ने मनु/सतरूपा को धरती पर मनुष्य पैदा करने के लिये भेजा. प्रथम मानव मनु ने सतरूपा को अपना आँसू पिलाया और इंसान पैदा हुऐ!

विज्ञान झूठा है जो कहता है कि मानवों का DNA अलग-अलग है। हम सब एक ही पिता की संतान है. जिस दिन सतरूपा ने जामुन खाकर मनु के आंसू पियेे, तो बच्चे काले पैदा हुऐ और अफ्रीका के नीग्रो बने, जिस दिन पपीता खाकर आंसू पिया तो बच्चे पीले रंग के चीन के लोग हुऐ! जिस दिन दूध पीकर पैदा किया तो बच्चे यूरोप के गोरे हुऐ और हम आर्यो को खरबूज खाकर पैदा किया था माता सतरूपा ने. हम सब मनु-सतरूपा की औलाद है!

द्रोपदी पाँच पतियों के होने के बाद भी सती मानी गयी, भक्ति की वजह से अन्धे धृतराष्ट्र ने भी सौ पुत्र पैदा किए. भक्ति की वजह से श्रवणकुमार के माँ-बाप अन्धे होकर भी चारधाम दर्शन करते थे, और मीरा जहर पीकर भी मरी नही जबकि दयानन्द सरस्वती टपक गये. भक्ति की शक्ति से हनुमान ने पूरी लंका फूँक दी और उनकी पूँछ का एक बाल भी नही जला.

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पंडो की पोल खोलता भविष्यपुराण

भविष्यपुराण में जितनी पुनर्जन्म की झूठी बातें लिखी है शायद किसी और पुराण मे नही होगी. भविष्यपुराण निश्चितरूप से तब लिखा गया जब भारत मे दूसरे धर्मो का प्रभाव बढ़ रहा था, और हिन्दूधर्म खतरे मे था! इसका उदाहरण यह है कि जब इस्लाम भारत मे प्रभाव मे आया तो उसका असर कम करने के लिये भविष्यपुराण मे मोहम्मद साहब को "म्लेच्छ" लिख दिया गया।

इसी भविष्यपुराण (गीताप्रेस) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड पृष्ठ-372 पर लिखा है कि- "2700 वर्ष कलियुग बीतने के बाद बलि के द्वारा भेजा गया "मय" नामक असुर धरती पर आया, और शाक्यगुरू बनकर गौतमाचार्य नाम से दैत्यपक्ष को बढ़ाने लगा, और जो उसका शिष्य होता वह 'बौद्ध' कहा जाता! जब दस करोड़ आर्य 'बौद्ध' हो गये तब अग्निवंशी राजाओं ने चतुर्वेद के प्रभाव से 'बौद्धो' को हराया तथा पुनः भारत मे आर्यो का राज स्थापित किया"

इस पुराण मे "मय" असुर गौतम बुद्ध को कहा गया है! यह शायद उस समय की बात है जब भारत मे बौद्धधर्म चरम पर था, इसीलिये इस पुराण मे "बौद्धो" को दैत्यपक्षी कहा गया है! यह पुराण यह भी मानता है कि एक समय भारत मे दस करोड़ बौद्ध थे! अब सवाल यह भी है कि फिर आखिर इतने सारे "बौद्ध" आखिर कहाँ चले गये?

इस पुराण के लेखक मुगल सम्राट औरंगजेब से भी बहुत चिढ़े थे, इसीलिये उन्होने भविष्यपुराण के इसी खण्ड के पृष्ठ-376 पर औरंगजेब को अन्धक नामक दैत्य का अवतार लिखा है!

अब सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि विष्णुपुराण गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार बताता है, तो भविष्यपुराण उन्हे एक असुर का अवतार कैसे बता रहा है! मतलब जब विष्णुपुराण लिखा गया तब परिस्थिति कुछ और थी, तब पौराणिक पंडो को लगा कि बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करके बौद्धधर्म पर भी कब्जा कर लेंगे और बौद्धो से बुद्ध को भी छीन लेंगे. पर जब होशियार बौद्धो के आगे उनकी ना चली और बौद्धधर्म अलग शाखा बन गया तो इन्होने द्वेषवश तथागत बुद्ध को भविष्यपुराण मे 'असुर' लिख दिया!

एक बात यह भी सोचने वाली है कि इसी प्रतिसर्गपर्व के तृतीयखण्ड के पृष्ठ-330 पर आल्हा के भाई ऊदल को श्रीकृष्ण का अंशावतार बताया गया है, जबकि इतने प्रभावशाली और समाज को नई दिशा दिखाने वाले गौतम बुद्ध को असुर का अवतार लिखा गया! यह सच है कि पुराणों मे बहुत सारा झूठ लिखा है, पर इनका गहराई से अध्ययन किया जाये तो ये हमारे इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा भी उठाते है, और भविष्यपुराण का प्रतिसर्गपर्व भी ऐसा ही रोचक खण्ड है!

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अकबर बादशाह भविष्यपुराण में।

जिस तरह पुराणों मे राम और कृष्ण का बखान किया गया है और उनके पूर्वजन्म के बारे मे लिखा गया है, उसी तरह अकबर की भी प्रशंसा की गयी है तथा उसके पूर्वजन्म के बारे मे भी लिखा है।
       
संक्षिप्स भविष्यपुराण (गीताप्रेस, गोरखपुर) के प्रतिसर्गपर्व के चतुर्थखण्ड (पृष्ठ-373-374, चित्र-1-3) की एक कथा मे लिखा है कि अकबर पूर्वजन्म का ब्राह्मण था और वो भी शंकराचार्य के गोत्र का, पर एक भूल के कारण वह इस जन्म मे म्लेच्छ (मुसलमान) बनकर पैदा हुआ! पर पूर्वजन्म का ब्राह्मण होने की वजह से उनके कर्म महान ही रहे.

कथानुसार, प्रयाग (इलाहाबाद) मे एक मुकुन्द नामक ब्राह्मण अपने बीस शिष्यों के साथ तप करता था, पर जब उसे पता चला कि म्लेच्छ बाबर ने भारत मे आकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ नष्ट कर दी, तो उसने दुःखी होकर अपने सभी शिष्यों के साथ आत्मदाह कर लिया, और यही मुकुन्द ब्राह्मण अगले जन्म मे अकबर बनकर पैदा हुआ।
                   
एक तपस्वी ब्राह्मण म्लेच्छ-योनि मे कैसे पैदा हुआ, इसके पीछे भी एक कथा है?
एक बार जब मुकुन्द ब्राह्मण गाय का दूध पी रहा था तो उसने अज्ञानता-वश दूध के साथ गाय का रोम (बाल) भी पी लिया था, इसी दोष के कारण वह अगले जन्म मे म्लेच्छ बनकर पैदा हुआ। और इसी मुकुन्द ब्राह्मण के बीस चेले अगले जन्म मे बीरबल और तानसेन वगैरह बनकर उसकी सहायता के लिये जन्मे थे।

अब इस कथा मे यह भी बताया गया है कि मुकुन्द ब्राह्मण का नाम इस जन्म मे अकबर क्यों पड़ा? असल मे जब अकबर का जन्म हुआ तो हुमायूँ को एक भविष्यवाणी हुई कि "तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा, यह अक् (अकस्मात) वर (वरदान) की प्राप्ति के साथ पैदा हुआ है, इसीलिये इसका नाम 'अकबर' होगा।

खैर, यह तो सम्पूर्ण कथा थी, पर अब इस पौराणिक कथा के पीछे छुपे ब्राह्मणी पाखण्ड और झूठ को समझते हैं! पहली बात तो अकबर के नामकरण की जो बात इस पुराण मे लिखी है, तो शायद डपोरशंख पंडों को पता नही होगा कि अकबर का असली नाम "जलालुद्दीन" था! अकबर तो अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है "महान"। बादशाह अकबर उदार-हृदय का था, और इसीलिये उसे अकबर कहा जाता था।

दूसरी बात इसमे लिखा है कि हुमायूँ को आकाशवाणी हुई थी, तो विचार करो कि यह कितनी झूठी बात है? अबुल फजल ने भी "अकबरनामा" लिखी है, जो अकबर की ही जीवनी है, पर इसमे आकाशवाणी जैसा तो कोई उल्लेख नही है। इससे पता चलता है कि पौराणिक ब्राह्मण झूठ की झड़ी थे!  आप इसी से समझ लो कि इसी तरह से ही इन्होने कंस को कृष्ण के पैदा होने की भी आकाशवाणी करवाई होगी, जैसे यहाँ अकबर के जन्म पर करवा दी।

तीसरी बात, कहते हैं कि गाय के रोम-रोम मे देवताओं का वास होता है, फिर भूलवश गाय का एक रोम पी जाना कैसे दोष हो गया? ऐसे तो फिर बहुत सारे लोग म्लेच्छ बनकर पैदा होने वाले हैं, और फिर यदि गाय का रोम भक्षण करने से अगले जन्म मे गाय-भक्षण करने वाला बनकर पैदा होना है तो गाय पालने का क्या फायदा?

चौथी बात, जब मुकुन्द ब्राह्मण ने बाबर के उपद्रव की वजह से आत्मदाह किया था तो अगले जन्म मे उसी बाबर के कुल मे पैदा होना जरा अजीब लग रहा है! और यदि गाय के रोम-भक्षण की वजह से मुकुन्द ब्राह्मण मुस्लिम बना तो उसके चेले किस अपराध की वजह से अगले जन्म मे अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, फैजी, मुल्ला दो-प्याजा और अबुल फजल आदि बनकर पैदा हुये?

वास्तव मे पुराणों मे लिखी राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और विष्णु की भी कहानियाँ मुकुन्द ब्राह्मण की कहानी की तरह कोरी गप्प है। और इन देवी-देवताओं चमत्कार की जो बातें लिखी हैं, वह भी पूर्णतः कल्पना मात्र है। ब्राह्मणों ने बड़ी चतुराई से ऐसी ही गप्प कहानियाँ गढ़कर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाया और उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण किया।

वैसे यह मुकुन्द ब्राह्मण की कथा बाद मे अकबर-विरोधियों के लिये काफी परेशानी खड़ी करेगी। भारत मे एक वर्ग ऐसा भी है जो अकबर को महान नही मानता तथा उसे क्रूर और कामी बताकर उसका विरोध करता है, लेकिन इस पुराण मे अकबर की प्रशंसा की गयी है। अब अकबर के समर्थक इस कथा का अचूक-अस्त्र जैसा प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि मूर्खतावश ब्राह्मणों ने अकबर को ऐतिहासिक के साथ-साथ पौराणिक-पात्र भी बना दिया है।

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विरोधाभासी मनु

मनुस्मृति रामायण और महाभारत से प्राचीन है! मनुस्मृति मे कहीं भी राम और कृष्ण का कोई उल्लेख नही है, परन्तु रामायण के किष्किंधाकाण्ड मे राम ने स्वयं मनुस्मृति की प्रशंसा की है, तो महाभारत के शान्तिपर्व और अनुशासन पर्व मे भीष्म पितामह ने इस ग्रंथ का गुणगान किया है! मनुस्मृति निश्चित ही किसी काल मे सनातन धर्म की सबसे मान्य पुस्तक थी, लेकिन इस किताब मे मनु ने कई श्लोक ऐसे लिखे हैं, जो उन्ही के अन्य श्लोकों का ठीक उलट है! आइऐ, कुछ ऐसे ही श्लोकों पर नजर डालते हैं-

मनुस्मृति-3/56 मे मनु ने नारियों के सम्मान मे यह बड़ी बात कही है-
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।"
अर्थात- जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ नारियाँ कष्ट पाती है, वहाँ समृद्धि नही होती!

यहाँ तो मनु ने बड़ी उत्तम बात लिखी, पर नौवां अध्याय शुरू होते ही मनु कहते हैं कि नारियों को स्वतंत्रता मत दो, नारियां कामुक होती है!

यही नही मनु ने अध्याय-8/371 मे लिखा है-
"भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते।।"
अर्थात- अपनी सुन्दरता और बाप-दादा के धन पर यदि स्त्री घमण्ड करे तो उसे सबके सामने कुत्ते से नोचवा डालें।

मनु का दूसरा विरोधाभास यह है कि उन्होने अध्याय-9/104 मे कहा है कि-
"ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः।।"
अर्थात- माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी भाई धन-सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांट लें, माता-पिता के जीते जी उन्हे धन बांटने का कोई अधिकार नही। 

इस श्लोक मे मनु पैतृक सम्पत्ति मे सभी भाइयों को बराबर को अधिकार बता रहे हैं, पर इसका ठीक अगला ही श्लोक उन्होने गांजे के नशे मे लिखा और मनु अध्याय-9/105 मे लिखते हैं-
"ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयान्पित्र्यं धनमशेषतः। शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा।।"
अर्थात- भाइयों मे जो सबसे श्रेष्ठ हो, वो पिता की सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति को ग्रहण करे, शेष भाई उसे पितातुल्य मानकर उसके अधीन रहें! 

आगे मनु ने मनुस्मृति-8/123-124 मे लिखा है कि राजा केवल क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को दण्ड दे, क्योंकि स्वायम्भायु मनु ने जो दण्ड विधान बताया है, वह केवल इन्ही तीन वर्णों के लिये है, ब्राह्मण के लिये नही।

लेकिन कुछ आगे बढ़ते ही मनु की अक्ल फिर ठिकाने आयी और इसी आठवें अध्याय के श्लोक-337/338 मे मनु लिखते हैं कि यदि शूद्र चोरी करे तो उससे आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना और ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड दें!

मनु केवल इतने ही विरोधाभासी नही थे! मनु के अनुसार मांस नही खाना चाहिये, अतः मांस खाने से रोकने के लिये मनु ने लोगों को डराया है और मनुस्मृति-5/55 मे लिखा है-
"मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिणः।।"
अर्थात- जो मनुष्य इस लोक मे जिसका मांस खाता है, परलोक मे वह उसका भी मांस खाता है, यही मांस का मांसत्व है।

इसी अध्याय के श्लोक-5/35 मे मनु कहते हैं-
"नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः।
स प्रेत्य पशुतां याति संभावनेकविंशशतिम् ।।"
अर्थात- जो विधि नियुक्त होने पर भी मांस नही खाता, वह मरने के बाद इक्कीस जन्म तक पशु होता है!

मनु ने मनुस्मृति-10/65 मे लिखा है-
"शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।"
अर्थात- अपने कर्मो से ब्राह्मण शूद्र और शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है!

पर इसी अध्याय के श्लोक 10/73 मे मनु लिखते हैं कि ब्राह्मण और शूद्र कभी समान नही हो सकते, अर्थात यहाँ उन्होने वर्ण-परिवर्तन को नकार दिया है।

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मनुस्मृति के आदेश।

मनु 1/100 मे लिखते हैं कि ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, अतः सारी पृथ्वी उसी की है!

मनु मनुस्मृति-9/2 मे लिखते हैं- "अस्वतन्त्रः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।"
अर्थात- पुरुष द्वारा अपने स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नही देनी चाहिये।

मनु ने स्त्रियों की गवाही खारिज कर दी है!  मनु ने इन्हे मान्यता ही नही दी है!
"एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् बह्वच्य शुच्योऽपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः"
मनुस्मृति-8/77
अर्थात- एक निर्लोभी पुरुष भी साक्षी हो सकता है, परन्तु अनेक स्त्रियां पवित्र होने पर भी साक्षी नही हो सकती, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है! और अन्य मनुष्य भी जो दोषों से घिरें हैं, साक्षी होने के योग्य नही होते।

स्त्रियाँ खेती हैं, मनु का यही मानना है!
मनुस्मृति-9/33 मे लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को खेत (क्षेत्र) और पुरुष को बीज (अनाज) रूप माना गया है, खेत और बीज के मिलन से जीवों की उत्पत्ति होती है।

बल्कि मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये, और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।

स्त्री व्यभिचार कर ले तो मनु ने उसकी शुद्धि का मंत्र भी बताया है!
मनु ने 9/20 मे लिखा है- अगर कोई स्त्री की पर-पुरुष से व्यभिचार कर लेती है तो उसकी शुद्धि के लिये मनु ने एक मंत्र भी बताया है, जो निम्न है-
"यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।।"
इस मंत्र का अर्थ है - 'मेरी माता ने अपवित्रता पूर्वक घूमते हुये पराये घर मे जाकर पर पुरुष की इच्छा की, अतः उसके दूषित रज को मेरे पिता शुद्ध करें'।
मनु का यह भी दावा है कि यह वेदमंत्र है। 

मनु का मानना था कि विधवा का पुनः विवाह नही होना चाहिये! मनु ने बाकयदा 9/65 मे इसे लिखा भी है-
"नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः।।"
अर्थात- विवाह के वेदमंत्रों मे नियोग का कही उल्लेख नही है, और न ही विवाह विषयक शास्त्रों मे विधवा विवाह का उल्लेख है।

मनु ने भी 4/81 मे लिखा है-
"यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति।।"
अर्थात- दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का जो पालन करता है, वह उस शूद्र सहित असंवृत नामक अंधकारमय नरक में जा गिरता है!

अब कुछ लोग सोचेगें कि क्या मनु के समय मे दूसरा धर्म भी था, तो मै बता दूँ कि उस काल मे दस्युधर्म था, जो रक्ष संस्कृति को मानते थे और मनुस्मृति मे इसका व्याख्यान भी है!
मनु ने तो 5/89 मे यह भी कहा है कि जिन्होने अपना धर्म त्याग दिया हो, उन्हे जलाञ्जलि भी नही देनी चाहिये।

"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
मनुस्मृति-9/83
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।

मनु ने 9/88 मे लिखा है-
"उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः।।
अर्थात- उत्तम कुल और सुन्दर वर मिल जाये तो कन्या के विवाह योग्य न होने पर भी ऐसे वर से उसका विवाह विधिवत कर देना चाहिये।

मनु 7/96 मे कहते हैं कि जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!

आगे मनु 7/194 मे लिखते हैं कि शत्रु के अन्दर खौफ पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो।

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