Thursday, 26 November 2020

(xyz) वेद और क़ुरान का तुलनात्मक अध्ययन।

Quraan vs vedas in the ligth of science :-         

कुरान और वेद का वैज्ञानिक तुलनात्मक अधय्यन :=

1. कुरान कहता है कि धरती गोल है जबकि वेद कहता है कि धरती चोकोर  है ईंट की तरह । ऋग्वेद ( 7/83/3) ऋग्वेद/8/25/18)(ऋग्वेद 1/62/8) शतपथ ब्राह्मण 6/1/2/29)

2. कुरान कहता है कि धरती चाँद , सूर्य और सब एक एक दायरें में घूम रहें हैं । (कुरान सूरा यासीन :40)

परंतु वेद कहता है कि धरती    सिथर है और  ( ऋग्वेद २/१२/१२)
और सूर्य पृथ्वी के चारों और चक्कर लगाता है ।( ऋग्वेद १/५०/१)

इतना ही नहीं वेदो में पृथ्वी गतिहीन है :-

वेदों मे पृथ्वी के लिए "निऋति" शब्द का प्रयोग हुआ है । वेदों के कोश निघंटु (1/1) मे "निऋति " शब्द पृथ्वी के पर्यायवाची मे लिखा है ।

इस का अर्थ है निर+ऋति ( ऋ गतौ )अर्थात गतिहीन । इसलिये आज तक संस्कृत और हिन्दी के शब्दकोशों मे पृथ्वी का नाम:-
"अचला "
अर्थात :- गतिहीन है ।

3. कुरान कहता हि सूर्य एक नियम के अनुसार इस ब्रहमाण्ड यात्रा कर रहा है । (कुरान 36:38)

जबकि वेद कहता है कि सूर्य रथ पर सवार होकर पृथ्वी के चक्कर काटता है ।( यजुर्वेद ३३/४३)

4. कुरान कहता है कि पृथ्वी बगैर किसी सहारे के आसमान में तैर रही है । (कुरान यासीन 40)

जबकि हिंदू ग्रंथ  कहती है कि पृथ्वी कहती है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है ।

5. इस्लाम हदीस कहती है कि पृथ्वी पर जब भूकम्प आता जमीन की पिलेट हिलने की वजह से होता है । (मुसनद अहमद 14/543)

जबकि हिंदू धर्म के अनुसार शेषनाग के करवटें लेने से भूकम्प आता है [ महाभारत आदि पर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक  ]

6. कुरान कहता है कि चाँद की अपनी रोशनी नहीं है बल्कि सूर्य से ली गई है ।(कुरान 25 :61)

जबिक हिंदू धर्म के अनुसार चाँद की अपनी खुद की रोशनी हैं । भागवत गीता (10/21)

7. कुरान कहता है कि पेड पोधों में जान होती है (कुरान 20:53) 36:36

जबकि दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार पेड पोधों में जान नहीं होती । (सत्यार्थ प्रकाश दशममुल्लास पृष्ट 313 )

8 . वेद कहता है कि जब सूर्य ॻहण लगता है तो सूर्य को राहु नामक राक्षस निगलता है ।(ॠ.5/40/9)

जबिक इस्लाम कहता है कि सूर्य ग्रहण  और चंद्रमा ग्रहण ईश्वर की निशानी है ।( हदीस बुखारी , मुस्लिम )

9.  कुरान कहता है कि मनुष्य जीवन केवल पृथ्वी पर ही संभव है ।कुरान (27/61)

जबकि दयानंद सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश अनुसार सूर्य पर 6000 डिग्री सेल्सियस तापमान भी मनुष्य जीवन है ।( सत्यार्थप्रकाश )

वेदों में कुछ अवैज्ञानिक( unscientific) बाते:=

1. वेदों के अनुसार सूर्य पानी पीता है ।

2. वेदों के अनुसार नदियाँ घी और दूध देती हैं (  ऋग्वेद 7/95/2)

3. वेदों के अनुसार गंगा , यमुना , सरस्वती मनुष्य की प्राथर्ना सुनती हैं ( ऋग्वेद 10/75/5)

4. हिंदू धर्म के अनुसार पृथ्वी पर सात तरह के समुद्र पाए जातें हैं जैसे मीठे जल का समुद्र , दूध का समुद्र , घी का समुद्र , गन्ने के रस का समुद्र , शहद का समुद्र आदि । (भागवत पुराण (5/1/32)

जबकि कुरान के अनुसार दो तरह के समुद्र हैं एक मीठे जल का समुद्र और खारे जल का समुद्र । (सूरा रहमान )

5. हिंदू धर्म के अनुसार चाँद सूर्य से बडा हैं । (भागवत पुराण अध्याय 5/24/2)

6. वेद के अनुसार सूर्य को सात घोडे खींचते हैं ।(ऋग्वेद 1/150/9)

7. ऋग्वेद (8/41/10 ) जमीन पिल्लरो टिकी है  के सहारे खडी है और आसमान पिल्लर के सहारे

9 सनातन धर्म के अनुसार चाँद सूर्य से दूर है ।( छांगोगय उपनिषद् 4/15/5,5,/10/2)

10 सनातन धर्म के अनुसार सूर्य गोल नहीँ बल्कि चौकोर है ।(ऐतरेय ब्राह्मण 14/3/1/17)

11 सूर्य रात को उल्टा हो जाता है ।( ऐतरेय ब्राह्मण 3/44)

12 सूर्य की 32 दिन की स्वर्ग की यात्रा । पृथ्वी और आकाश आपस मे मिलते है । (बृह उपनिषद् 3/3)

13 पर्वतों के पंख होते हैं जो कटते भी हैं ( अथर्ववेद  20/34/2 आचार्य श्री राम शर्मा )


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हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म में नैतिकता का तुलनात्मक अधय्यन :=  भाग -1

1. कुरान कहता है कि जुआ खेलना पाप है ।

जबकि वेदों मे जुआ में जीतने का मन्त्र सिखाया गया है (अथर्ववेद 7/109/4)

जैसे पांडव जुआ खेलते थे ।

2. कुरान कहता है कि जो लडकियों को माँ के पेट में मारता है उसको जहन्नुम में भयानक अजाब दिया जायगा ।

जबकि वेद कहता है है कि कन्या भूरण हत्या यानि वेद मन्त्र पढो घर में पुत्री जन्म नहीं लेगी ( अथर्ववेद 6/11/3)

अथर्ववेद 8/6/25 मे लिखा है कि पुत्र की रक्षा करो उसे औरत मत बनावओ ।

3. कुरान कहता है कि जादू टोना ये शैतानी (राक्षसी ) काम है एेसे आदमी का ठिकाना जहन्नुम की भयानक आग है ।

जबकि वेद कहतें हैं कि जादू टोना किसी की हत्या करना सही है (अथर्ववेद 19/29/8)
(अथर्ववेद ( 1/ 27/1)
जादू से निर्दोष मेंढक ,तोता , मैनाओं , पक्षियों को मारने का हुक्म अथर्ववेद वेद मे ( 7/116/1)
अथर्ववेद( 1/22/4)

4. कुरान में बगैर शादी शुदा या शादी से पहले हर सम्बध का गलत माना है ।

पर्ंतु वेदों में लडकियों को अपनें वश में करने का मन्त्र आवारा मनचलो लडकों को सिखाया है ।
अथर्ववेद( 2/30/1)

5. इस्लाम कहता है कि छींक आना ये प्रकृति के स्वास्थ्य प्रदान के नियम है

जबकि वेद छींक को खाली बरतन दिखाई पडने पर अपशकुन मानता है ।
अथर्ववेद (19/ 8/4)

6. इस्लाम के अनुसार मासिक धर्म होना एक पा्रकृतिक स्वास्थ्य ईश्वर का नियम है ।

जबिक हिंदू धर्म के अनुसार इन्द्र के कुकर्मों और इन्द्र के शाप के कारण औरतों को मासिक धर्म होता है ।

7. इस्लाम के अनुसार जो औरत जाति पर रहम करता है ईश्वर उस पर रहम करता है ।

मुहम्मद सलिल० ने कहा तुम मे सबसे बैहतर वह है जो अपनी पत्नी के साथ अच्छा व्यवहार करता हो ।

लेकिन बृह. उपनिषद्( 6/4/7) में कहा है कि जो औरत शारिरिक समबन्ध ना बनाने दे उसे लात, घूँसों और डंडों से बुरी तरह पीटो और उसे फिर उसे इसके लिए मजबूर करो ।

8. (छांदोग्य उपनिषद् 4/2/5/ शंकराचार्य भाष्य ) मे लिखा है कि अपने काम बनाने या रिश्वत के तौर पर कोई आदमी अपनी पत्नी या कन्या को राजा को भेंट कर सकता है ।

पर्ंतु इस्लाम नें इसे घृणित कार्य माना है और इस्लाम ने एेसे करने वाले को मौत का फरमान सुनाया है ।

9. कुरआन में ईश्वर कहता है कि मर्द और औरत को ज्ञान हासिल करना जरूरी है

लेकिन ऋग्वेद 8/33/17 में लिखा है कि औरतों को शिक्षित नहीं किया जा सकता कयोकि उनकी बुद्धि तुच्छ होता है ।

10. वैदिक साहित्य में निरुक्त को बहुत उंचा स्थान दिया है " निरुक्त "[ 3/4 ]में कहा गया है कि दुहिता ( बेटी ) माता पिता का धन चुसने वाली होती है और आगे निरुक्त 3/3 में "दूरे हिता " अर्थात = उस से दूर रहने में ही भलाई है ।

जबकि कुरआन ने बेटी को रहमत बताया है । बेटी से प्रेम करने वालों को जन्नत की खुशखबरी दी ।

11. ऐतरेय ब्राह्मण (7/3/1) पुत्री कष्टप्रदा , दुखदायनि और " हृदयदारिका पितु:" अर्थात = लडकी पिता के ह्दय को चीरने वाली होती है ।

जबकि कुरआन ने बेटी को ह्दय की ठंडक बताया है बेटी को खुशखबरी और खुशनसीब बताया है ।

12. ऋग्वेद 10/95/15 में लिखा है कि औरत किसी सखी नहीं हो सकती उनके दिल लकडबग्गों की तरह क्रूर होते हैं ।

जबकि कुरआन कहता है मर्द और औरत एक ही फितरत पैदा किया,  इस्लाम के मुताबिक औरत के दिल में ज़ियादा करूणा ( दया ) होती है ।

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*Similarities between Islam and Hinduism.*


*Sharab pina hindu dharam me bhi mna hai ( Haram hai)*

📚Rigved 

( Path 2: mantra:12)

( path 21 mantra:14)


Manusmarti 

📚(path 7: mantra 47-50)

📚(path 9: mantra 225)


Gambling is also prohibited in the Hindu Scriptures.


📚 *Rigveda*

[Book 10 Hymn 34 Verse 3:]

📚 *[Rigved 10:34:13]*

📚 *[Rigved 10:34:13]*


*"Non-veg" khana dono mazhab me allowed hai*

📚Manusmruti:- Chapter 5 Verse 30,31 and 39 - 40

📚Mahabharata: Anushashan Parva Chapter 88.


*Prophet Muhammad ﷺ Sari insaniyat ke liye bheje gye hain ye bat Hindu dharam ki kitabo me bhi maujood hai.*


📚 *[Bhavishya Purana]* 

(Parv III, Khand 3, Adhyay 3, Shalokas 5 to 8)

📚 *[Samveda Uttararchika]*

(Part 2 Book 7 chapter 1 section 5 verse 1)

📚 *[Yajurveda]*

(chapter 31 verse 18)     

📚 *[Atharva Veda]*

( Hymn-127)

 📚 *[Yajurved]* (chapter 20 verse 37)


*Aurat ka prda( Hijab)*

📚Rigved:- Book no:8 Padh no:33, Mantra no:19.


Saturday, 29 August 2020

(घ) विश्वमित्र, मंत्रदृष्टा।


*ऋग्वेद मंडल ३ : ३३ : १ 
*ऋषि मुनि विश्वामित्र* 

*विश्वामित्र – वेद, गायत्री मंत्र निर्माता.*
*विश्वामित्र – राम का गुरु.*
*विश्वामित्र – राजा भरत का नानु.*

विश्वामित्र की उपस्थिति तीनों युग में दिखाई देती है। सत युग, त्रेता युग और व्दापर युग, एक युग लाखों सालों का होता है। कोई आदमी लाखों साल कैसे जी सकता है। ये तीनों Situation एक समय कि नहीं हो सकती. या तो वेद वाला विश्वामित्र सही हो सकता है,या फिर रामायण वाला,या फिर महाभारत वाला, या फिर ४ युग का concept हि गलत होगा. सच तो यही है कि विश्वामित्र नाम से तीनो कहानी किसी 3rd आदमी ने बनाई है. 

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परंतु दयानंद ने , रघुनंद ने , भगवत नर , कपिलदेव ने ,उमाशंकर ने आदि आदि ने इनको मंत्रद्रष्टा औऱ मंत्रकर्ता मानते हैं ।

और वेद को अपौरुषेय मानते हैं ।

और निरुक्त 7 .1 कुछ और ही कहता है , वैसे ही आचार्य दुर्ग भी निरुक्त वृति भी यास्क का समर्थन करती है थोड़ा बहुत मत भेद के बाद ।

परतु अपौरुषेय के लिए सब खोखली दलील है , जिसका आसानी से रद्द किया जा सकता , बस ये एक मान्यता है ।

700 मंत्र की  मंत्रद्रष्टा ऋषिया भी है जिसका उदाहरण सीता , सरस्वती आदि आदि ।

चलो मान लिया कि वे मंत्रद्रष्टा ऋषि है , पर जड़ थे या चेतन ? 

जड़ हो नही सकते ? क्योंकि निरुक्त 7 . 1 का खंड हो जाएगा ।

सब का निष्कर्ष ये निकला कि सब मे चेतना थी , अमुक अमुक काल मे कई ऋषि मंत्रद्रष्टा जिसमे से वैवस्वत मनु भी एक था , बाकी सब की बोइग्राफी कहा है जिससे हम माने की ये मंत्र के ऋषि जुटा , सच्चा या नही था , कमाल है किसी से भी ले ली जाती है , आज एक काम करता हु , एक किसी मंत्र में ऋषि का नाम अमिताभ बच्चन लिख देता हूं , वो भी ऋषि है । 

निरुक्त 13 में यास्क लिखता है , की एक ऋषि एवं तपस्वी ही वेद का गुड़ समझ सकता है ? 

किसी ऋषि में कौनसे गुण की  आवश्कता होती है जो उसको ऋषि बनाती है ? 
आप खुद उसका म्यार तय करे फिर उस पर वेद के केवल 10% ऋषि को उस मे फिट करे प्रमाण और तथ्य के साथ मानने की वेद में कुछ दम है , वैसे वेद एक अज्ञानी व्यक्ति का प्रयास है ,की उसको पता नही होता कि  उसने किस वेद में क्या लिखा , खुद ही एक वेद के मंत्र का खंड मंडन दूसरे वेद में करता है 

एतरिय ब्राह्मण 14 . 6 
सूर्य उदय और अस्त नही होता हम दौड़ कर मांगे एतरिय पर सायण का भाष्य उपलब्ध है , वो भाष्य का हवाला हर कोई आर्य कुत्ता देता है , बरहाल मुद्दे की बात है पर उसी एतरिय का 7 .1 क्यों कि मानते 

सब पोपलीला है , दयानंद ने कहा है , की ब्राह्मण ग्रंथ में मिलावट हुई है , तो एतरिय 14 . 6 मिलावट Q नही ? 

101% मिलावट है अगर नही है तो हर चीज माननी होगी 

~ इदरीस रिज़वी

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Monday, 3 August 2020

(Z) बक़रा ईद।


*ईदुल अज़हा (प्रचलित शब्द - बकरीद) पर उठने वाले ऐतराज़ का जवाब*

*इस्लाम मे जीव हत्या उचित या अनुचित*

*क़ुरबानी का उद्देश्य*

क़ुरबानी का एक उद्देश्य तो सभी जानते हैं जो हज़रत इब्राहीम अ. से जुड़ा है लेकिन क़ुरबानी का एक दूसरा पहलू भी है।

पशुओं की कुरबानी का आशय ये भी है कि पैसे वाला मनुष्य, उन निर्धन मनुष्यों को वो भोजन दान करे, जो मनुष्य निर्धनता के कारण कभी पौष्टिक भोजन करने की बात भी नही सोच पाते। वे अक्सर भूखे रहते हैं, या जब भोजन करते हैं तो न्यून पौष्टिकता वाला भोजन करते हैं ,क्योंकि वो भोजन सस्ता होता है, ऐसे मे निर्धन लोग कुपोषण और अनेक रोगों का शिकार हो जाते हैं। अल्लाह स्पष्ट रूप से फरमाता है कि कुरबानी का मांस मनुष्य के स्वयं के उपयोग के लिए और गरीबों को दान करने के लिए है, न कि अल्लाह को भेंट चढ़ाने या धनी संपन्न व्यक्ति के लिए :-

पवित्र क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है : -
*न उनका मांस अल्लाह के यहाँ पहुंचता है और ना खून। उसे तो तुहारे दिल की परहेज़गारी पहुँचती है।।(क़ुरआन 22:37)*

*" ताकि वो उन लाभों को देखें जो वहाँ उन के लिए रखे गए हैं, और कुछ ज्ञात और निश्चित दिनों में उन चौपायो पर अल्लाह का नाम लें, जो अल्लाह ने उन्हें दिए हैं . फिर उस मे से खुद भी खाओ और भूखे तंगहाल को भी खिलाओ "*
[ पवित्र कुरान 22:28 ]


तो बकरीद मे हम पशु की कुरबानी कर के न उस का मांस जलाते हैं, न व्यर्थ फेंकते हैं, बल्कि मांस के तीन भाग करते हैं एक भाग निर्धन मोहताजो को दान करते हैं, दूसरा भाग अपने कमजोर आर्थिक स्थिति वाले दोस्त और रिश्तेदारों को वरीयता देने का आदेश है, और तीसरा भाग स्वयं के खाने के लिए रखते हैं। इससे उसके अंदर सोशल रिस्पांसिबिलिटी का भाव पैदा होता है और वह समाज से सकारात्मक रूप से जुड़ता है। समाज उपयोगिता को जानता है वह समाज के लिए उपयोगी बनता है और समाज के लोग उसको फायदे का आदमी समझ कर पहले से ज्यादा आदर और सहयोग देते हैं। और पवित्र हदीस मे ये आदेश है कि यदि हमारे आसपास निर्धन लोग अधिक हैं तो हमें सारा का सारा मांस उनमें दान कर देना चाहिए ॥

इसके अलावा एक बुराई कंजूसी है। कंजूस आदमी माल जोड़ने पर यकीन रखता है, खर्च करने में नहीं। दूसरों पर अपना माल खर्च करने में तो बिल्कुल नहीं क्योंकि वे तो अपने ऊपर भी मालामाल खर्च नहीं करते। कुर्बानी का बकरा खरीदने में अपना माल कुर्बान करना पड़ता है और इस तरह कंजूसी की बुराई कुर्बान हो जाती है। और जो भूमिहीन ग़रीब लोग कुछ कर नहीं सकते। वे बकरे पालकर जंगल की फ्री की घास खिला कर उसे बड़ा कर लेते हैं। उनके बकरे बकरियां बक़रीद के अवसर पर महंगे दामों पर बिक जाती हैं और उनको आर्थिक बल मिल जाता है। राजस्थान में जहां हरियाली मैदान कम है वहां कटीली झाड़ियों पर पलकर बकरियां अपने मालिकों को करोड़ों रुपये का आर्थिक लाभ देती है जो रेगिस्तानी और पहाड़ी इलाके के लोगों की अर्थव्यवस्था में बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। इस तरह उनके हाथ में धन आने से उनकी गरीबी की बलि चढ़ जाती है। यह चौथी बुराई थी जोकि सैकड़ों बुराईयों पर, तन बेचने तक पर मजबूर करती है। देश की बेटियों की अस्मत बिकने से बचाती है क़ुर्बानी की परंपरा।

ईद के अवसर पर चमड़ा ज़्यादा होने से अमीर पूंजीपतियों को यह सस्ते दामों में मिल जाता है और वे उससे विभिन्न उत्पाद तैयार करके अच्छी क़ीमत पर एक्सपोर्ट करते हैं जिससे चर्मकारों को रोजगार मिलता है। विदेशी मुद्रा भारत में आती है और भारत का रुपया मज़बूत होता है। जिससे वह रक्षा उपकरण खरीदना है और बहुत सा एक्स वी टैक्स भी प्राप्त करता है इस तरह कुर्बानी की परंपरा देश को मजबूत बनाने में और सुरक्षित रखने में भी बहुत बड़ा योगदान देती है।
आर्थिक रूप से कमजोर होकर विदेशों का गुलाम हो जाना सबसे बड़ी बुराई है। इस बुराई की बलि भी कुर्बानी की परंपरा के कारण चढ़ती रहती है। सो बकरीद की कुरबानी हमारे विचार मे कोई बेकार का आडम्बर नही बल्कि मोहताज की सेवा का एक बड़ा पुण्य कार्य है ॥

अंत मे इतना ही कहना चाहता हूँ कि ईश्वर की दी हुई नेमतों को व्यर्थ नष्ट करना वाकई एक बडा पाप है क्योंकि दुनिया मे संसाधन सीमित हैं , यदि हम धार्मिक त्योहार के नाम पर अनाज को बालि का आधार बनाकर जलाकर नष्ट कर देते है, त्योहार के नाम पर पेड़ काटकर लकड़ियाँ व्यर्थ ही जला डालते है, त्योहार के नाम पर दूध और मिठाई जैसी खाने पीने की महंगी चीजें नदी नालों मे बहाकर व्यर्थ कर देते है, तो उस की जरूर निन्दा करनी चाहिए, क्योंकि एक तो ये सारे काम जीवहत्या भी हैं। दूसर; इन संसाधनो को व्यर्थ नष्ट कर के हम कहीं न कहीं, किसी न किसी को भूखा जरूर मार देते हैं। पर हम पाते हैं कि बकरीद मे ऐसी कोई संसाधनो की बरबादी नहीं होती है॥

*मांसाहार करना पूर्णतः गलत है!*

समीक्षा:-

आधुनिक युग में वैज्ञानिक शोध  के बाद यह मालूम हुआ कि भोजन का मक़सद है कि जिस्म को ऐसा आहार मुहैया करना जिसे मौजूदा ज़माने में संतुलित आहार (balanced diet) कहा जाता है। जिसमें बुनियादी तौर पर 6 तत्व शामिल हैं-
A balance diet is one which cotains carbohydrate, protein, fat, vitamins, mineral salts and fibre in the correct proportions .
इन तत्वों में से प्रोटीन (protein) की अहमियत बहुत ज़्यादा है क्योंकि प्रोटीन का हमारे जिस्म की बनावट में बुनियादी हिस्सा है।

Protein is the main building block of our body .
प्रोटीन का सबसे बड़ा ज़रिया मांसाहार है। मांस से हमें उत्तम प्रोटीन मिलता है। मांस के अलावा अन्य चीज़ों से भी कुछ प्रोटीन मिलती है लेकिन वह अपेक्षाकृत निम्न स्तरीय होती है। Meat is the best source for high-quality protein . Plant protein is of a lower biological value. मज़ीद यह कि मांसीय प्रोटीन और ग़ैर-मांसीय प्रोटीन का विभाजन भी सिर्फ़ समझने की ग़र्ज़ से है, वह वास्तविक विभाजन नहीं है। इसलिये कि सूक्ष्मदर्शी के अविष्कार के बाद वैज्ञानिकों ने जो अध्ययन किया है उससे मालूम होता है कि सभी खाद्य सामग्री के अन्दर बेशुमार बैक्टीरिया मौजूद रहते हैं जो पूरी तरह जीवधारी होते हैं। मांस से भिन्न जिन खाद्य चीज़ों के बारे में समझा जाता है कि उनमें बड़ी मात्रा में प्रोटीन होता है मस्लन दूध, दही, पनीर वग़ैरह, वे सब बैक्टीरिया की सूक्ष्म प्रक्रिया के ज़रिये ही अंजाम पाता है। बैक्टीरिया का अमल अगर उसके अन्दर न हो तो किसी भी ग़ैर-मांसीय भोजन से प्रोटीन हासिल नहीं किया जा सकता।

बैक्टीरिया को विज्ञान की भाषा में माइक्रो-ओर्गेनिज्म  (Micro organism) कहा जाता है, यानि सूक्ष्म जीव। इसके मुक़ाबले में बकरी और भेड़ वग़ैरह की हैसियत मैक्रो-ओर्गेनिज्म (macro-organism) की है यानि विशाल जीव। इस हक़ीक़त को सामने रखिये तो यह कहना बिल्कुल सही होगा कि
हर आदमी व्यवहारतः मांसाहार कर रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ यह है कि तथाकथित शाकाहारी उसे सूक्ष्म जीवों के रूप में ले रहे हैं और नॉन-वेजिटेरियन लोग उसे बड़े जीवों के रूप में ले रहे हैं।

दूसरे अल्फ़ाज़ में यह कि हर इनसान का पेट एक बहुत बड़ा स्लॉटर हाउस की हैसियत रखता है। इस अदृष्ट स्लॉटर हाउस में रोज़ाना मिलियन एंड मिलियन सूक्ष्म जीव ख़त्म होते रहते हैं। इनकी संख्या इतनी ज़्यादा होती है कि सारी दुनिया में बड़े जानवरों के जितने स्लॉटर हाउस हैं उन सबमें कुल जितने जानवर मारे जाते हैं उनसे असंख्य गुना ज़्यादा ये सूक्ष्म जीव मारे जाते हैं।

इस सारे मामले का ताल्लुक़ रचयिता की सृष्टि योजना से है। उस रचयिता ने सृष्टि का जो विधान निश्चित किया है, वह यही है कि इनसान के जिस्म की आहार संबंधी ज़रूरत ज़िन्दा जीवों (living organism) के ज़रिये पूरी हो। प्राकृतिक योजना के मुताबिक़ ज़िन्दा जीवों को अपने अन्दर दाखि़ल किये बिना कोई मर्द या औरत अपनी ज़िन्दगी को बाक़ी नहीं रख सकता। उस रचयिता के विधान के मुताबिक़ ज़िन्दा चीज़ें ही ज़िन्दा वजूद की खुराक बनती हैं। जिन चीज़ों में ज़िन्दगी न हो, वे ज़िन्दा लोगों के लिए खुराक की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकतीं। इसका मतलब यह है कि वेजिटेरियनिज़्म (vegetarianism) और नॉनवेजिटेरियनिज़्म (non-vegetarianism) की परिभाषायें सिर्फ़ साहित्यिक परिभाषाएं हैं, वे वैज्ञानिक परिभाषाएं नहीं हैं।

माँसाहार और शाकाहार किसी भी तरह से बहस का मुद्दा नहीं है. यह न तो किसी धर्म-विशेष की जागीर है और न ही मानने या मनवाने का विषय है. कुल मिलकर इन्सान का जिस्म इस क़ाबिल है कि वह साग-सब्जियां आदि शाकाहारी चीज़ें और माँस भी ख़ा सकता है और उसे पचा सकता है. इससे न तो पर्यावरण-प्रेमियों को कुछ ऐतराज़ होना चाहिए और न ही इससे जानवरों के जानवराधिकार का ही हनन. अगर आपको माँस पसन्द हो तो माँस खाइए और अगर सब्जियां पसन्द है तो सब्जियां. आप सर्वाहारी जीव हैं.

जीव-हत्या का अपने आप में सही अथवा ग़लत होना इस बात पर निर्भर करता है कि इसका 'उद्देश्य' क्या है?  मसलन अगर एक मेंढक को अनर्थ मार कर फेंक दिया जाए तो यह किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं होगा. यह हत्या, निर्दयता और पाप है लेकिन वहीँ चिकित्सा-विज्ञान के छात्रों शल्य-प्रशिक्षण देने के उनके द्वारा मेडिकल-कॉलेज में जो मेंढक की चीर-फाड़ की जाती है वह निरर्थक और व्यर्थ न होकर मनुष्य और मानव जाति की सेवा के लिए होता है इसलिए यह न निर्दयता है, न हिंसा और न ही पाप बल्कि लाभदायक, वांछनीय और सराहनीय है.

और मेरा विश्वास है कि हत्या या हिंसा के उचित या अनुचित होने का यही एक मापदंड है और यह मापदंड सम्पूर्ण मानव-समाज में प्राचीन काल से वर्तमान काल तक मान्य व प्रचलित रहा है. यही मानव-प्रकृति के अनुकूल है और मानव-जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताओं के तक़ाज़ों के अनुकूल भी !




*जीव हत्या और मांसाहार पर कुछ तार्किक उत्तर*

‘‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने न केवल मांसाहार का निशेध किया है बल्कि यह भी कहा है कि मांसाहारी मनष्‍यों का संग करने व उनके हाथ का खाने से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगता है। यह भी लिखा है कि पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्‍यों की हत्या करने वाला जानिए। (10-25) एक आर्य समाज के विद्वान से कुछ खास विषयों पर चर्चा हुई, उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी अन्य सारी बातें मानने को तैयार हूँ मगर जीव हत्या कर मांस खाने को मैं धर्मशास्त्र व मानव प्रकृति के अनुकूल नहीं मानता। निरीह, मूक पशु-पक्षियों को काट कर खाना न केवल निंदित व निषिद्ध है, बल्कि जघन्य अपराध भी है।

उन्होंने यहां तक भी कहा कि जो कौमे पशुओं को ज़िब्ह करती हैं, वो कट्टर, बेदर्द और बेरहम हो जाती हैं और उन कौमों को फिर मनुष्‍यों को मारने व काटने में कोई दया व हिचक महसूस नहीं होती। मैंने उनसे पूछा कि जो लोग भ्रूण हत्या कर रहे हैं, अपनी ही निरीह, मूक व निपराध संतान की पेट में ही टुकड़े-टुकड़े कराकर निर्दयता के साथ हत्या करा रहे हैं क्या उनकी यह कट्टरता पशुओं को ज़िब्ह करने व मांस खाने का परिणाम हैं ? क्या इससे अधिक कट्टरता व बेरहमी कोई और हो सकती है ? क्या यह मनुष्‍्य की बेदर्दी की पराकाष्‍ठा नहीं है ?

मैंने उनसे पूछा कि आप बताइए “शेर मांस क्यों खाता है ? उन्होंने कहा कि जानवरों में बुद्धि नहीं होती, उनको अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता। अगर मनुष्‍य भी ऐसा ही करता है तो फिर उसमें व जानवरों में अंतर ही क्या रहा ? मैंने उनसे कहा कि हाथी मांस नहीं खाता तो क्या वह बुद्धिमान होता है ? उन्होंने दोबारा अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि मांस तामसी भोजन है, इसको खाने से बुद्धि भी तामसी हो जाती है, ‘‘जैसा खाये अन्न वैसा हो जाए मन’’ मांस मानव बुद्धि व शरीर दोनों के लिए हानिकारक है। 
मैंने उनसे कहा कि वैज्ञानिकों का बौद्धिक स्तर सबसे ऊंचा होता है, शायद ही विश्‍व में कोई वैज्ञानिक ऐसा हो जो मांस न खाता हो। क्या उनकी बुद्धि को तामसी कहा जा सकता है ? बाद में उन्होंने इस विषय को पूर्वकृत कर्मों के परिणामों से जोड़कर चर्चा समाप्त कर दी। एक अन्य आर्य समाज के विद्वान ने ‘‘आतंकवाद, समस्या व समाधान’’ विषय पर बोलते हुए कहा कि आतंकवाद का प्रमुख कारण मांसाहार है। तामसी भोजन खाने से बुद्धि तामसी हो जाती है फिर मनुष्‍य को आतंक ही सूझता है। अगर विश्‍व में मांसाहार पर पाबंदी लगा दी जाए तो आतंकवाद की समस्या का समाधान हो सकता है। उनका इशारा तो एक विशेष क़ौम की तरफ़ था, मगर मांस तो विश्‍व की सभी क़ौमे खाती हैं।

वनस्पति वैज्ञानिक अनेक शोधों द्वारा इस अंतिम निश्‍कर्ष पर पहुंच गए हैं कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है कि मनुष्‍य, पशु व पेड़-पौधों आदि में जीव एक जैसा है जो कर्मानुसार एक योनि से दूसरी योनि में आता जाता रहता है। (9-75) इसलिए न तो केवल पशु-पक्षियों आदि को खाना महा पाप हुआ बल्कि पेड़-पौधों को खाना भी जघन्य अपराध हुआ।

पशु-पक्षियों को अगर ज़िब्ह किया जाए तो वे अपना विरोध प्रकट कर सकते हैं, मगर पैड़-पौधों से अधिक लाचार व बेबस और कौन होगा जो अपना विरोध तक प्रकट नहीं कर सकते ? उनको काटना व खाना तो और भी अधिक पाप होगा। तो क्या शाक सब्जियों व फलों आदि को भी नहीं खाना चाहिए। अब अगर हम विज्ञान के सत्य को झुठला भी दें कि पेड़- पौधों में जीवन नहीं है तो क्या हम यह भी झुठला सकते हैं कि जिन शाक-सब्जियों व फलों को हम खाते हैं उनको उत्पन्न करने में कितनी बड़ी संख्या में जीवों की हत्या होती है ?
एक आम के पेड़ पर लगने वाला कड़ी कीड़ा लाखों-करोड़ों की तादाद में होता है। ईख व ज्वार की फ़सल पर लगने वाला पाइरिल्ला एक हेक्टेयर खेत में अरबों-खरबों की तादाद में होता है। चने आदि की फ़सल को लगने वाली सूंडियां व गिडारें कुछ ही दिनों में पूरी फ़सल नष्‍ट कर देती हैं। असंख्य जीवों की हत्या कर किसान गोभी, बैगन, शाक-सब्ज़ी उत्पन्न करता है। अनेक बीमारियों से बचने के लिए हम कीटनाशकक दवाएं प्रयोग करते हैं। घरों में महिलाएं मक्खी, मच्छर, जूं व रसोई घर में रखे दाल, चावल, गेहूं आदि में पैदा होने वाले कीड़ों को मारने में कोई झिझक अथवा ग्लानि महसूस नहीं करती। क्या इन सब जीवों को मारना जीव हत्या के दायरे में नहीं आता ? क्या इन सबसे बचा जा सकता है ? क्या भैंस, गाय, बकरी आदि को मारने ही को जीव हत्या कहते हैं?

यह भी विचारणीय है कि हिंदू संगठन केवल गो-हत्या का विरोध करते हैं, जबकि ऊंट, भैंस, बकरा, मछली आदि भी गाय जैसे ही जीव हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो जीव को आदि अमर व अजर बतलाते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या की बात करते हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो कर्मानुसार फल भोग की बात करते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या को पाप व जघन्य अपराध की संज्ञा देते हैं। अफ़सोस इस बात का है कि धर्मशास्त्र व विज्ञान दोनों की अनुमति के बावजूद भी इस विषय को विवाद का विषय बनाया गया व बनाया जा रहा है और कुछ मांस खाने वाले हिंदू भाई भी रुग्ण मानसिकता का शिकार होकर मांसाहार का विरोध कर रहे हैं। 

हमारे एक साथी जो मांसाहार का पुरजोर विरोध करते हैं, बारह ज्योति-लिंगों के दर्शन हेतु भारत भ्रमण पर निकले। वापसी होने पर यात्रा के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के लोग उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। मैंने उनसे पूछा कि दक्षिण भारत के लोग मांसाहारी होते हैं और आपके अनुसार मांस खाना पाप व अधार्मिक कृत्य है तो फिर वे लोग धार्मिक कहाँ, पापी हैं। उन्होंने अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि दक्षिणी भारत की भौगोलिक परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि वहां मांस खाने को पाप नहीं कहा जा सकता। ये विचार किसी आम व्यक्ति के नहीं बल्कि वर्ग विशेष में 
अपनी एक खास पहचान रखने वाले व्यक्ति के हैं। 

अनेक बीमारियों की दवाएं ऐसी हैं जिनको अनेक पशु-पक्षियों के अंशों से बनाया जाता है। कुछ खास बीमारियां जैसे - सांस, क्षयरोग आदि में चिकित्सक बकरा, मछली व पक्षियों आदि का मांस खाने की सलाह देते हैं। किसानों की अत्याधिक मांग पर उत्तर प्रदेश सरकार ने नील गाय को नील घोड़ा नाम देकर मारने के शसनादेश जारी किए हैं, ताकि वे किसानों की खड़ी व पकी फ़सल को बरबाद न करें। चूहों से फसल को बचाने के लिए सरकार गीदड़ों की व्यवस्था करती है। भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल व उत्तराखण्ड आदि में गैर-मुस्लिम समाज में बलि की प्रथा प्रचलित है जो बड़ी निर्दयता व निर्भयता से की जाती है। नेपाल में वीरगंज के समीप गढ़ी माई मंदिर में हर वर्ष करीब 200000 (दो लाख) पशुओं की बलि दी जाती है। नाहन (सिरमौर) गिरिपार में माघी के दिन हर वर्ष हजारों बकरों की बलि दी जाती है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोडा की पत्नी गीता कोडा ने रांची के रजप्पा मंदिर में 11 बकरों की बलि दी (अमर उजाला, 7.11.2009)।

यह भी विचारणीय है कि जो पशु-पक्षी खाने में इस्तेमाल किए जाते हैं उनकी संख्या में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। संख्या के एतबार से देखा जाए तो मछली विश्‍व में सबसे अधिक खाई जाती है मगर मछली का उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। कुछ जीव जैसे शेर, हाथी आदि खाने में इस्तेमाल नहीं होते, उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। यह भी विचारणीय है कि विश्‍व में बहुत से देश ऐसे हैं जो केवल पूरी तरह मांसाहार पर ही निर्भर हैं। ग्रीन लैंड और उत्तरी अमेरिका में समुद्र तटों पर बसने वाली जाति स्कीमों की रोटी, कपड़ा और मकान आदि मानव जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति समुद्री जीवों द्वारा ही होती है। उनका जीवन पूर्णतः मांस पर ही निर्भर है। 

यह भी विचारणीय है कि नन्हीं-सी चींटीं व मकड़ी मांसाहारी होती है, जबकि विशालकाय हाथी व ऊँट मांसाहारी नहीं होते। बहुत से मध्यम ऊँचाई के पेड़-पौधे मांसाहारी होते हैं, जबकि विशालकाय वट व पीपल वृक्ष मांसाहारी नहीं होते। बगुले को केला व सेब और छिपकली को हम दाल व चावल खाना नहीं खिला सकते। अगर हमें विश्‍वास है कि कोई सृष्टिकर्ता है तो यह उसी की व्यवस्था है। पृथ्वी पर कोई भी जीव अथवा पौधा मनुष्‍य जाति का मोहताज नहीं है। पीपल, तुलसी, चींटी, बंदर व गाय आदि मनुष्‍य की वजह से जीवित नहीं हैं, मगर मनुष्‍य इन सबके बिना जीवित नहीं रह सकता। सभी जीव-जन्तु व पेड़-पौधे मनुष्‍य जाति की आवश्‍यकता है। वास्तविकता भी यह है कि सृष्टिकर्ता ने इन सबको पैदा ही मनुष्‍य जाति के उपयोग के लिए किया है। 

स्वामी जी ने मांसाहारी मनुष्‍यों को इतना अधिक मलेच्छ, अछूत, घृणित व पापी माना है कि उनके संग करने मात्र से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगने की सम्भावना व शंका व्यक्त की है, तो क्या मांसाहारी मनुष्‍यों का संग करने से बचा जा सकता है ? दूसरी बात बिना जीव हत्या के गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि को पैदा नहीं किया जा सकता, अगर हम कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल न भी करें फिर भी खेत जोतने-खोदने में ही असंख्य जीवों की हत्या होती है, तो क्या बिना गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि खाये बिना मनुष्‍य जिन्दा रह सकता है ? क्या ये आदर्श व सिद्धान्त तार्किक व व्यावहारिक हैं?

स्वामी जी ने मनुष्‍य, पशु व पेड़-पौधों में जीव एक जैसा बताया है, फिर तो स्वामी जी के मतानुसार पेड़-पौधों को न केवल खाना बल्कि काटना भी पाप व अपराध हुआ, क्योंकि जिन पेड़-पौधों को हम काट रहे हैं, हो सकता है उनमें हमारे ही किसी सगे-संबंधियों की आत्मा विद्यमान हो। 

स्वामी जी की दोनों बातें वेद विरूद्ध तो है हीं, अव्यावहारिक व अतार्किक भी हैं। मांस खाना धर्म शास्त्र व चिकित्सा विज्ञान दोनों की दष्टि से मानव के लिए लाभकारी भी है और मानव की प्रकृति के अनुकूल भी। यह अलग विषय है कि किस पशु-पक्षी का मांस खाया जाए और किसका न खाया जाए तथा किस विधि से काटा जाए। दूसरी बात मानव, पशु व पेड़- पौधों में जीव भी एक जैसा नहीं है, मानव की जीवात्मा कर्म करने में स्वतंत्र व ईश्‍वर के प्रति जवाबदेह है, जबकि पशु व पेड़-पौधे आदि स्वभाव से बंधे हैं, न उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान है और न ही किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता।

मेरा उदेश्य किसी को ठेस पहुचना नहीं है मगर इसपे बिचार करें ।

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क़ुरबानी हो या फिर वली धर्म के नाम पाखंड है ||
          
पशु काटना अगर धर्म है तो अधर्म किसे कहेंगे ?
प्रायः लोगों को पता है की मानव समाज में ही एक सम्प्रदाय है दुनिया जिन्हें मुसलमान के नाम से पुकारते हैं | यह इस्लाम के मानने वाले भी अपने को धर्म कहते हैं या दुनिया के लोग भी इसे इस्लाम धर्म कहते हैं |

इन की बुनियाद या भिंत पाँच चीजों पर है, जो निम्न प्रकार है नियम 
{1} कलमा पढना जुबान से इकरार करना और दिलसे मानना 
{2} नमाज पढना जो दिन में पाँच बार अनिवार्य है हर मुसलमान कहलाने वाले बालिग {जवान} औरत, व मर्द के लिए |
{3} रोज़ा रखना जो साल में एक महिने का होता है सूर्योदय से सूर्यास्त तक निज्जला उपवास रहना थूक तक हलक में ना जाने देना |

{4} जकात देना यानि अगर एक सौ 100 रुपया जमा हो तो उसमें से ढाई 2.50 पैसे किसी गरीब मुसलमान या किसी इस्लामी संस्था को दान करना | 

{5} है हज करना, इसी हज के महीने में पशु के गले में छूरी चलाना या पशु को काटना इसे ख़ुशी मानाना कहते हैं जिसे ईदुज्जोहा अथवा बकरीद कहते हैं 

संभवतः आज 31 जुलाई 20 के दिन बकरीद वाला दिन होगा | सम्पूर्ण धरती को तीन दिन तक पशुओं के खूनसे रंगाया जायगा | अर्थात जिसे कुर्वानी समर्पण सेकरीफाईज भी कहते हैं | यह तीन दिन तक कुर्वानी दिया जा सकता है | यह इस्लाम की बुनियादों में पाँचवा पिलर माना जाता है |

यह परिपाटी हजरत मुहम्मद {स} से नहीं चली, यह परिपाटी या कार्यक्रम हज़रत इब्राहीम नामी एक पैगम्बर से चली है, जिनके एक दासी थी जो एक राजा ने उन्हें गिफ्ट दिया था जिन दासी का नाम हाजरा था इन्ही दासी से पैगम्बर इब्राहीम ने एक बेटे को उत्पन्न किया था, जिस बेटे का नाम इस्माईल था | कुरान नामी पुस्तक में इसका प्रमाण है |

अल्लाह ने अपने पैगम्बर को ख्वाब दिखाता है, तुम्हारा जो सबसे प्यारा चीज है उसे हमारे रास्ते में कुर्बान करो | जब की उस मां, बेटे को घर से निकाल कर एक मरुभूमि में छोड़ आये थे | 

बड़ी लम्बी कहानी है फिर कभी लिखूंगा | इसी लड़के की क़ुरबानी अल्लाह ने चाही, इब्राहीम ने ख्वाब देखा तीन दिन, सुन रहे थे की अल्लाह उन्हें क़ुरबानी देने के लिए खवाब दिखा रहे हैं | 

लगातार 100 ,100 , ऊंट रोजाना काटते रहे, अल्लाह को यह सब क़ुरबानी पसंद नहीं | और फिर ख्वाब दिखाया तो इब्राहीम ने जिस मां बेटे को घर से बाहर कर आये थे एक ब्याहबान में छोड़ आये थे, वहां पहुंचे और अपने जन्म दिए बेटे को क़ुरबानी देने के लिए अपने साथ बच्चे की माता से जुदा कर ले गये | 

मानव कहलाने वालों को जरुर याद रखना चाहिए की यह तैयारी अल्लाह के कहने पर हुई | यह बात समझ नहीं आई, की जब हम मानव कहते कहलाते हैं खुद को, तो क्या हमें यह जानना नहीं चाहिए की यह काम अल्लाह का क्यों और कैसे हो सकता है ? 

इसे खुदा का हुक्म माना है इस्लाम ने, इस्लाम वाले यह जानना नहीं चाहा की खुदा किसी को उसके बेटे की क़ुरबानी किस लिए चाहेंगे ? क्या काम है खुदा का इस क़ुरबानी से ?  खुदा को इस कुरबानी से क्या संपर्क ?
 
खुदा का काम दुनिया चलाने का है या फिर किसी के बेटे की क़ुरबानी लेना है इससे अल्लाह को दुनिया चलाने में क्या सहयोग मिल रहा है पता नहीं ?

 यहाँ इस्लाम वाले इसे विचार करने को भी तैयार नहीं और न इसे समझ ने को तैयार हैं ? इससे यह बात मानव समाज में खुल गई की इस्लाम एक अंध विश्वास,अंध भक्ति,अंध परमपरा का नाम है | 
 
यही है मानवता विरोधी कार्य अथवा मानवता विरोधी बातें, अगर हम अपने को मानव कहलाते तो शायद इन अमानवीय बातों को नहीं स्वीकारते यह सभी कार्य अमानवीय है, यही तो कारण बना परमात्मा का उपदेश मनुर्भव: का है {मानव बनो} सम्पूर्ण वेद में यह उपदेश कहीं नहीं आया की, हिन्दू बनो,मुसलमान बनो,या फिर ईसाई बनो या जैनी व बूधिष्ट बनो आदि |

 हमें मानव बनकर ही जाना पड़ेगा, किन्तु दुर्भाग्य है, हम मानव कहलाने वालों के लिए की हम जब दुनिया से जाते हैं तो मानव बनकर नहीं जा पाते | 

कोई हिन्दू बनाकर जाता है, कोई मुसलमान बनकर जाता है, फिर कोई ईसाई बनकर जाता है | कारण शव देखकर पता चलता है की यह अर्थी किसी मानव का है अथवा कोई मुसलमान या हिन्दू या फिर ईसाई का है ? मानव बनकर नहीं गया वह जो बनकर जा रहा है वे इसी दुनिया में आकर ही यह सब कुछ बना था |

जब कोई दुनियामें आता है सब एक ही तरीके से आता है यह दुनिया में आने के बाद ही उसके घर वाले उसे बना देते हैं, यही हिन्दू मुसलमान ईसाई आदि | विधाता ने जब दुनिया में भेजा किसी को तो, भीम आर्मी बनाकर नहीं भेजा, किसी को शिव सेना बनाकर,या फिर आदम सेना बनाकर भी नहीं भेजा | न मुसलमान, या ईसाई बनाकर भेजा ?

अत: हमें परमात्मा का उपदेश को ही चरियार्थ करना होगा =मनुर्भव: अर्थात मानव बनो यानि हमें मानव ही बनना होगा अगर हम मानव नहीं बन पाए फिर हमारा जीवन ही व्यर्थ होगा | मानव वही है मानों कोई एक बृक्ष लगाना हो जिसके छाया में खुद शीतलता का आनंद लें | 

और धरती को छोड़ने से पहले एक बृक्ष ऐसा ही लगाकर जाएँ जिसके नीचे मानव से लेकर पशु पक्षी भी उसके शीतल छाया का आनंद ले सके और आपके लिए भी वे धन्यवाद दे सकें की इस बृक्ष लगाने वाले को धन्यवाद जिसके छायातले हमें ठंडी ठंडी हवा का लाभ मिला, परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें | 

यही कारण है मानव बनने का यही कारण बना मनुर्भव: का | तो आयें हम सब मिलकर प्रतिज्ञा करें की हमें मानव बनना हैं न की क़ुरबानी देकर मुसलमान बनना है – और ना वली चढाकर हिन्दू बनना है – और ना तो बप्तिस्मा लेकर ईसाई बनना है | अगर बनना ही है तो हमें मानव ही बनना है |

                 
क़ुरबानी चली कहाँ से ? 

इब्राहीम पैगम्बरअल्लाह को सही जवाब नही दे सके | अल्लाह ने स्वप्न दिखाया इब्राहीम पैगम्बर को, सबसे प्यारा चीज मेरे रास्ते में कुरबानी करो, हजरत इब्राहीम इसका सही जवाब नहीं दे पाए ?

इसका जवाब यह होना था की ऐअल्लाह मानव मात्र का तो सबसे प्यारा आप ही हैं, हर कोई आप का सानिध्य पाना चाहता है और यही मानव जीवन का लक्ष्य है | फिर आप से ज्यादा प्यारा मेरा कौन हो सकता है ?
 
आप ही मुझसे पूछ रहे हैं की सबसे प्यारा मेरे लिए कौन है ?  आप तो सब कुछ जानने वाले हैं, तो क्या आप को यह जानकारी नहीं की मेरे प्यारा चीज सबसे कौन है ?

ऐ अल्लाह आपने तो कुरान में बहुत बार कहा है इस बात को, मैं जो जानता हूँ वह तुम नहीं जानते ?

 तो क्या आप इस चीज को नहीं जानते की मेरे लिये प्यारा क्या है और कौन ? हर मानव कहलाने वाले आप को अपनी आत्मा से ज्यादा प्यारा मानते हैं और कहते भी हैं |

दुनिया वालों आप लोगों को यह मालूम हुवा है की यह ईदुज्जोहा या बकरीद जिसे कहते हैं | यह घटना है पैगम्बर हजरत इब्राहीम के जीवन की, जिसे आज तक इस्लाम के मानने वाले मनाते आ रहे हैं, और जब तक इस्लाम के नाम लेवा धरती पर हैं तब तक यह मनाते रहेंगे और करते भी रहेंगे कुर्बानी को |

 बहुत बार लिख चूका हूँ हजरत इब्राहीम अल्लाह का एक पैगम्बर का नाम था जिनकी एक पत्नी थी सारा दूसरी एक दासी थी गिफ्ट में मिला दासी का नाम हाजर |
सारा की संतान अभी जन्म नहीं लिया था, पर दासी से पुत्र जन्म लिया, जिस का नाम इस्माईल था | इस से जरुर समझ रहे होंगे इंसानी फितरत, सारा बीवी सहन नहीं कर सकी और इब्राहीम से कहलवा कर बीवी हांजरऔर बेटे इस्माईल को घर से निकलवा दिया |
 
उस समय घर से बहुत दूर एक वयहवांन में छोड़ दिया माँ, बेटे को | कहा जाता है की माँ पानी के प्यास में भाग रही थी पानी की तलाश में | पहाड़ों के बीच दौड़ रही थी पानी के लिए,जो रेत को पानी समझ कर भागती रही |

इतने में बेटे ने पैर पटका तो उसी जगह कुवां खुद गया | जिसे आबे जमजम कहा गया जमजम उस कुवें के पानी को कहा जाता है आबे जम, जम, |

इससे यह बात स्पष्ट है के बच्चा इस्माईल उनदिनों छोटा था | कुछ भी था लेकिन इब्राहीम का प्यारा नहीं था | अगर प्यारा होता तो इतने छोटे बच्चे को घरसे बाहर कैसे निकालते ?
 
अगर अल्लाह ने इसी इस्माईल की क़ुरबानी देने के लिये कहा तुम्हारा जो प्यारा है उसे क़ुरबानी दो | तो इसका मतलब यह भी हुवा की अल्लाह ज्ञानी नहीं है ?

और.इब्राहीम भी अल्लाह को नहीं बताया सच क्या है ? दुनिया के लोग सब से प्यारा अल्लाह को ही मानते हैं यहाँ अल्लाह इब्राहीम का प्यारा इस्माईल को समझे बैठे |

जो सत्य नहीं था अगर अल्लाह सब कुछ जानते हैं पर इन बातों को नहीं जाना की इब्राहीम का प्यारा क्या है जिसे अल्लाह क़ुरबानी देने का आदेश दे रहे हैं  इब्राहिम को बताना था इस क़ुरबानी में अल्लाह मैं तो आप का ही नम्बर देख रहा हूँ |आप मानव कहलाने वालों इसपर चिंतन करें =धन्यवाद के साथ =महेन्द्रपाल आर्य,31 ,7 , 20 =




Saturday, 18 July 2020

(PP) हिन्दू मत, सती, बुद्ध, अम्बेडकर, यीशु, अवेस्ता।

विज्ञान और ईश्वर

यह अकाट्य सत्य है कि विज्ञानवाद के सामने ईश्वरवाद हमेशा औंधे मुँह गिरा है! विज्ञान के आने के बाद मानव जीवन मे क्रान्तिकारी बदलाव आये!- 

विज्ञान के आने के बाद ईश्वर के अवतार का आना बन्द हो गया!
विज्ञान के आने के बाद ईश्वर ने धरती पर ग्रन्थ भेजना बन्द कर दिया!
विज्ञान के आने के बाद मंत्र मारने, खीर पीने और फल खाने से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
विज्ञान के आने के बाद असुरो और राक्षसों ने लोगो को सताना बन्द कर दिया!
विज्ञान के आने के बाद कभी किसी ने सूर्य को नहीं निगला है।
विज्ञान के आने से मर्दो के मुँह, नाक, कान और पैर से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
विज्ञान के आने के बाद जो बन्दर,भालू और गिद्ध धाराप्रवाह संस्कृत बोलते थे, वो चींचीं और चूँचूँ करने लगे!
और तो और विज्ञान के आने से श्राप देकर सांप-बिच्छू बनाना भी बन्द हो गया! 
जरा सोचो विज्ञान ने आपके जीवन मे कितने बदलाव लाये!!

तो अब जय भगवान नही, जय विज्ञान बोलो!!!!

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वेदों का ज्ञान।

भागवत जी जो कह रहे है कि वेद विज्ञान से ऊपर है वो बात एकदम सही है,  पर तुम सरस सलिल पढ़ने वाले लोग वेदो की सत्ता क्या जानो। अरे ऋगवेद मे विराटपुरुष के मुँह और पैर से बच्चे का जन्म ही "जीव विज्ञान" है, यम-यमी संवाद ही "सामाजिक विज्ञान" है और इन्द्र का शराब पीना ही "रसायन विज्ञान" है! आज लोग विज्ञान के नशे मे इतना चूर है कि वेदों के महत्व को समझते ही नही.  एक अरब 96 करोड़ साल पहले ब्रह्माजी ने "अल्फाल्फा" घास की कुटाई करके कागज बनाया और वेद लिखना शुरू किया और ऐ बकलोल वैज्ञानिक कहते है कि कागज की खोज 105 ई० मे चीन मे हुई!

वेदो की ऋचाओं मे बड़ी चमत्कारी शक्ति है, दो ऋचा पढ़कर शंकर जी कैलाश पर्वत पर बर्फ के बीच नंग-धड़ंग बैठे है, पर कभी उन्हे सर्दी नही हुई, चार ऋचा विष्णु जी ने पढ़ी और सब सात जन्म ही लेते है पर विष्णु जी नौ जन्म ले चुके है, अभी दसवें की तैयारी है। पहले के पशु-पक्षी भी वेद पढ़कर शुद्ध शाकाहारी थे, अन्यथा शंकर जी का सांप गणेश का चूहा खा जाता और कार्तिकेय जी का मोर शंकर जी के सांप को खा जाता. पर सब वेदो के ज्ञाता थे, अतः पास ही रहकर भी कभी झगड़े नही! पहले ऋषि-मुनि वेद पढ़कर श्राप देते थे और वो सही हो जाता था. रामजी ने थोड़ा वेद कम पढ़ा था नही तो वो भी रावण को श्राप देकर भस्म कर देते, जरूरत ही ना पड़ती वानरों को ले जाकर लंका मे कबड्डी खेलने की........

खुद मोहन भागवत भी वेदो से प्राप्त शक्ति से ही देश के प्रधानमंत्री को अपने इशारे पर घुमाते है. तो अब विज्ञान छोड़ो और वेद पढ़कर...  "ब्राह्मणो_मुखमासीद********पद्भ्याम_शूद्रो_अजायते" करो...

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पूर्वजन्म और अपंग।

हमारे धर्मग्रंथ भी यह कहते हैं कि जो आज दिव्यांग है, वो पूर्वजन्म के पापी थे, और ईश्वर ने उन्हे दण्ड दिया है! फिर आखिर किस आधार पर यही ईश्वरवादी ये कहते है कि लंगड़े-लूले अपंगो की मदद करो! क्या ऐसा करके वो ईश्वर को नाराज नही कर रहे है? क्या वो ईश्वर के दण्डविधान मे हस्तक्षेप नही कर रहे हैं? आखिर अपराधी का साथ देने वाला अपराधी ही होता है, तो क्या ईश्वर इनसे रुष्ठ नही होगा?

गरुणपुराण कहता है कि जो लोग आज जन्म से ही शारीरिक अपंग है, वो पूर्वजन्म मे महापापी थे, फिर धार्मिक इन पापियों से क्यों सहानुभूति रखते हैं!

गरुणपुराण अध्याय-5 श्लोक 1 से 57 तक मे तमाम पूर्वजन्म के पापियों का वर्णन है! मै बताता हूँ कि पूर्वजन्म का पापी किस कमी के साथ जन्म लेता है।

ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है!
गौहत्यारा कुबड़ा! 
कन्या हत्यारा कोढ़ी! 
परस्त्री गमनकर्ता नपुंसक! 
गुरूपत्नि व्यभिचारी चर्मरोगी!
गुरू का निन्दक मिरगी रोगी!
झूठी गवाही देने वाला गूँगा!
पक्षपात करने वाला काना!
पुस्तक चुराने वाला अन्धा!
ब्राह्मणों को पैर से मारने वाला लंगड़ा-लूला!
झूठ सुनने वाला बहरा!
आग लगाने वाला गंजा!
अन्न चुराने वाला चूहा!
धान चुराने वाला टिड्डी!
विष देने वाला बिच्छू!
सुगन्धित वस्तु चुराने वाला छछुन्दर!
मांस चुराने वाला गीध!
नमक चुराने वाला चींटी!
फल चोरी करने वाला बन्दर!
जूता चुराने वाला भेड़!
मार्ग मे यात्रियोंको लूटने वाला बकरा!
विषपान करने वाला काला नाग!
गायत्रीपाठ न करने वाला ब्राह्मण बगुला!
अयोग्य के घर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण सुअर!
बिना निमंत्रण भोजन करने वाला कौआ!
गर्भपात कराने वाला भिल्ल रोगी!
कम तौलने वाला उल्लू!
सास-ससुर का अपमान करने वाली स्त्री जोंक!
पति का अपमान करने वाली नारी जूँ!
परपुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली नारी छिपकली!
स्त्रीलम्पट पुरुष घोड़ा होता है!
ब्राह्मण का धन लेना वाला ब्रह्मराक्षस!
अपने गोत्र की स्त्री से सेक्स करने वाला लकड़बग्घा!
शराब पीने वाला सियार!

इसके अतिरिक्त और भी कई पाप और पापयोनि लिखी है! अब आप लोग जरा सोचों कि आपने इनमे से कौन सा पाप किये है, और आप अगले जन्म किस रूप मे पैदा होंगे! मुझे यह पढ़कर भी आनन्द आया कि जितने सुअर है, ये सब पूर्वजन्म मे ब्राह्मण थे, और अयोग्य के घर यज्ञ करवा कर बेचारे सुअर बन गये!
इसलिये जितने भी धर्मात्मा हो, आप सब लूले-लंगड़ो की मदद मत करो, अन्यथा आप अन्जाने मे अपने ईश्वर को नाराज कर रहे हो!

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क्या शरीर मे आत्मा होती है।

जब दिमाग और हृदय काम करना बन्द कर देते हैं तो शरीर मे रक्त संचार रुक जाता है और ग्लूकोज की सप्लाई भी बन्द हो जाती है. जिससे मांस सड़ने लगता है, बस यही मृत्यु है! अगर हमारा हाथ-पैर कट जाता है तो आत्मा नही निकलती पर गला कटने पर क्यों निकल जाती है. आध्यात्मिक कहते हैं कि आत्मा गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है! फिर दुबारा से जन्म,परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करती है!

जीवाणुओं में "सुप्त आत्मायें" शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती क्या?

गरुणपुराण के अनुसार मृतात्मा को कर्मानुसार तरह-तरह के कष्ट झेलने पड़ते है, कभी नर्क पकोड़े की तरह उबाला जाता है तो कभी आरी से काटा जाता है, इस पुराण मे नर्क के कष्ट का पूरा "मेन्यूकार्ड" है. अब इस कष्ट से बचने का उपाय भी इसी पुराण मे है.. अगर आप ब्राह्मण को गौदान करोगे तो आपके परिजन की आत्मा "वैतरणी" नदी पार कर जायेगी, अगर आप ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा से तृप्त करोगे तो मृतक की आत्मा को यमदूत कष्ट नही देगे अर्थात मृत्यु पश्चात भी करोबार चलता रहे इसके लिऐ आत्मा बनायी गयी.

गरुणपुराण मे पाँच प्रकार के नर्को का वर्णन है..
रौरव नर्क! महारौरव नर्क! कण्टकावन नर्क! अग्निकुण्ड नर्क! पंचकष्ट नर्क!

अब इन कष्टदायी नर्कीय यातना से बचने के लिऐ तमाम प्रकार के दान-दक्षिणा वाले उपाय भी है. असल मे आत्मा का अस्तित्व बनाया ही इसीलिऐ गया कि अपने पित्रो की आत्मा को नर्क से बचाने के लिये परिजन तमाम कर्मकाण्ड और दान-दक्षिणा आसानी से करेगे, बस यही आत्मा का सच है. गीता मे श्रीकृष्ण कहते है कि आत्मा कभी नही मरती. अरे माधव मरेगी तो तब जब वो होगी ना!

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सती प्रथा का सच।

सती प्रथा का मतलब होता है ऐसी प्रथा (परम्परा) जो 'सती' द्वारा चलायी गयी!
शिवपुराण मे एक कथा आती है कि शिव की पत्नी सती के पिता "दक्ष" ने अपने ही दामाद शिव का अपमान किया था! देवी सती अपने पति का अपमान सहन ना कर सकी और हवनकुण्ड मे कूदकर खुद को आग की लपटों से भस्म कर दिया!

पति के सम्मान के लिये सती का यह बलिदान एक परम्परा बन गयी, पुरातनकाल मे जब कोई महिला विधवा होती थी, तब वह अपने पति के साथ ही चिता पर बैठकर जल जाती थी, और पंडे ऐसी महिला का दर्जा देवी 'सती' के बराबर मानते थे!

महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी। सोचने की बात तो यह है कि दशरथ की पत्नियाँ कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा दशरथ के साथ सती नही हुई थी!  तो क्या वो 'पतिव्रता' नही थी?

यह प्रथा हिन्दू समाज मे निर्विरोध रूप से सन् 1829 तक चलती रही, इसके बाद अंग्रेजों ने इस पर रोक लगा दी और यह परम्परा लगभग बन्द हो गयी! इस प्रथा के विरोध मे राजा राममोहन राय और लार्ड विलियम बैटिंक ने बहुत लड़ाई लड़ी!

यह रिवाज निश्चित रूप मे हिन्दू समाज पर कलंक था, पर अब कुछ हिन्दू धर्माधिकारी कहते हैं कि यह प्रथा कभी भी धार्मिक प्रावधान नही थी! 
लेकिन गरुणपुराण उन पंडो के झूठ को उजागर कर रहा है!

गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"

यह सब कितनी बेशर्मी और निर्दयिता के साथ लिखा गया है, जैसे महिला जीवन का कोई महत्व ही नही है! इस पुराण मे यह कहीं नही लिखा है कि यदि पत्नि पहले मर जाये तो पति उसके साथ चिता पर लेटे, पर पत्नियों के लिये ऐसी बेरहम बातें लिखी है!

अब सवाल यह है कि यदि महिला गर्भवती हो तो भी क्या उसे 'सती' होना चाहिये?
इस पर इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!

इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म- जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!

अग्नि केवल महिला के शरीर को जलाती है, पर आत्मा को पीड़ा नही होती! नारी अमृत समान अग्नि मे जलकर पवित्र हो जाती है, और उसके सारे पाप भी नष्ट हो जाते है! यदि महिला ऐसा नही करती तो वह नारी ऋण मे उत्तीर्ण नही होती!"

इस पुराण से यह स्पष्ट हो जाता है कि पंडे महिला को सती होने पर स्वर्ग का लालच देते थे, और इनकार करने पर नर्क की अग्नि का डर दिखाकर उसकी निर्मम हत्या करते थे! पंडे महिला से कहते थे कि सती होने से तुम्हारे कुल का गौरव बढ़ेगा और अगले जन्म मे शीघ्र ही अपने पति से तुम्हारा मिलन होगा!
बस ऐसी ही बातों से विधवा नारी को सम्मोहित किया जाता था! सती प्रथा पंडो की क्रूरता का और छोटा सा उदाहरण मात्र है, पंडे पूर्वकाल मे ऐसे दर्जनों जघन्य अपराध धर्म की आड़ मे करते थे!

सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है! नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"
अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।

नारदपुराण ने तो जरा सा दयाभाव भी दिखा दिया है, पर गरुणपुराण तो विधवा को जलाने पर ही उतारू है.

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पुराणों में बुद्ध।

गौतम बुद्ध को लेकर पौराणिकों मे सदैव दो मत रहे हैं। कुछ पौराणिक चाहते थे कि बुद्ध को विष्णु का अवतार बनाकर हिन्दूधर्म का ही अंग घोषित कर दे, और कुछ बुद्ध से काफी चिढ़े थे तो उनके लिये अपशब्द ही बोलते थे। वायुपुराण, विष्णुपुराण और नरसिंहपुराण ने खुले तौर पर बुद्ध को विष्णु का अवतार माना तो भविष्यपुराण ने बुद्ध को आसुरी-स्वरूप घोषित कर दिया।

भविष्यपुराण (गीताप्रेस कोड-584) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड (पृष्ठ सं-372) मे लिखा है कि "2700 साल कलियुग बीत जाने के बाद बलि नामक असुर के द्धारा भेजा गया 'मय' नामक असुर धरती पर आया! वह असुर शाक्यगुरू बनकर दैत्यपक्ष को बढ़ाने लगा और जो उसका शिष्य होता उसे 'बौद्ध' कहा जाता। उसने तमाम तीर्थों पर मायावी यन्त्रों को स्थापित कर दिया था, जिससे जो भी मानव उन तीर्थों पर जाता वह 'बौद्ध' हो जाता। इससे चारों तरफ बौद्ध व्याप्त हो गये और दस करोड़ आर्य बौद्ध बन गये।"

इस पुराण मे जिस "मय" असुर का वर्णन है, वह कोई और नही बल्कि गौतम बुद्ध है! इस पुराण मे बुद्ध को मानने वाले बौद्धों को "दैत्यपक्षी" कहा गया है। भविष्य पुराण के इस कथन से यह स्पष्ट है कि पौराणिकों को बुद्ध से किस कदर चिढ़ थी कि उन्हे दैत्य ही घोषित कर दिया। जबकि इसके पूर्व के पुराणों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार माना है।

नरसिंहपुराण अध्याय-36 श्लोक-9 मे लिखा है- "कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः" अर्थात- कलियुग प्राप्त होने पर भगवान नारायण बुद्ध का रूप धारण करेंगे।

इसी नरसिंहपुराण मे एक अन्य स्थान पर बुद्ध को राम का ही वंशज तथा सूर्यवंशी भी बताया गया है। इस पुराण के 21वें अध्याय मे लिखा है कि राम के पुत्र लव, लव के पुत्र पद्म, पद्म के पुत्र अनुपर्ण, अनुपर्ण के पुत्र वस्त्रपाणि, वस्त्रपाणि के पुत्र शुद्धोधन और शुद्धोधन के पुत्र गौतम बुद्ध हुये। अर्थात राम की छठवीं पीठी मे बुद्ध पैदा हुये थे।

वैसे अगर इसे पूर्ण सच मान लिया जाये तो फिर राम का समय आज से लगभग तीन हजार साल के आसपास का ही होता है! यदि बुद्ध अब से ढ़ाई हजार साल पहले थे तो उनके छः पूर्वज अधिकतम छः सौ साल और पूर्व होगे, जो लगभग ईसा से 1100 सौ वर्ष पूर्व का हो सकता है! अब यह गणना इतनी कम है, अतः सनातनी इसे मानने से तुरन्त इनकार कर देंगे। यहाँ मै आपको एक बात और बता दूँ कि नरसिंहपुराण हिन्दूधर्म के 18 पुराणों मे नही आता। यह एक उपपुराण है, अतः अधिकांश लोग यही मानते हैं की इसमे मिलावट नही है।

अब सोचना यह है कि यदि इतने पुराणों मे बुद्ध को विष्णु का अवतार कहा गया है तो सबसे अन्त मे लिखे गये भविष्यपुराण मे उन्हे असुर क्यों कहा गया? इसी भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व के तृतीयखण्ड मे आल्हा के भाई ऊदल को कृष्ण का अवतार कहता है, पर इतने बड़े समाज-सुधारक तथागत बुद्ध को असुर बताता है।

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आत्मरक्षा में हिंसा।

तथागत बुद्ध हमेशा हिंसा के विरुद्ध थे, लेकिन सदा ही न्याय के पक्ष मे थे! पर जहाँ न्याय के लिये हिंसा जरूरी हो, वहाँ क्या किया जाये, यह बड़ा सवाल उनके सामने भी आता था?

एक बार वैशाली के मुख्य सेनापति ने आकर बुद्ध से पूँछा- भगवन्! आप अहिंसा का उपदेश देते हो। आपके अनुसार क्या एक अपराधी को दण्ड से मुक्त रखा जाये? भगवन्! क्या हम अपने बीवी, बच्चे और धन की रक्षा के लिये युद्ध न करें?
क्या हम सभी प्रकार के युद्ध से विरत होकर अहिंसा के नाम पर अपराधियों द्वारा सताये जायें?

तब बुद्ध ने उत्तर दिया- हे सेनापति! आपने मेरे उपदेशों का गलत अर्थ लिया है। एक निर्दोष व्यक्ति की रक्षा होनी चाहिये पर अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिये। अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी को दोष नही होता, क्योंकि सजा का कारण तो अपराधी का स्वयं का कृत्य है। कोई व्यक्ति जो न्याय के लिये लड़ता है वह अहिंसा का दोषी नही होता, इसी तरह अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी दोषी नही माना जायेगा। यदि शांति स्थापित करने के सारे प्रयास विफल हो जाये तो हिंसा का उत्तरदायित्व युद्ध प्रारम्भ करने वाले पर होता है। शांति स्थापित करने के लिये युद्ध हो सकता है, पर युद्ध कभी स्वार्थ-सिद्धि के लिये नही होना चाहिये।

तथागत बुद्ध ने इन बातों से बहुत कुछ साफ कर दिया था। वे हिंसा के विरोध मे जरूर थे, पर न्याय की रक्षा के लिये हथियार उठाने को हिंसा नही मानते थे। लगभग यही बातें सारे महापुरुषों के जीवनकाल मे घटी है, पैगम्बर मोहम्मद ने कई युद्ध ऐसे किये जो प्रतिरक्षा मे थे, लेकिन कई बार वो धर्म का विस्तार करने के लिये छोटे-छोटे कबीलों पर हमले करते थे, जो शायद अनुचित-कृत्य था!

श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन मे कभी किसी पर हमला नही किया, बल्कि दूसरों ने उन पर आक्रमण किया और वो आत्मरक्षा के लिये युद्ध करते रहे। पर एक बार इन्होने भी यह अनुचित-कृत्य किया है! दरअसल इनकी पत्नि सत्यभामा ने एक बार इनसे कहा कि- "हे सइयां! हमको पारिजात का फूल चाहिये"। फिर क्या था... इन्होने कहा "हे गोरी! फूल क्या, हम तुम्हे पूरा पारिजात का पेड़ ही लाकर देंगे"
इसके बाद कृष्ण मे अमरावती पर हमला कर दिया! समझ नही आता कि कृष्ण को इतना बड़ा जोरू का गुलाम बनने की क्या जरूरत थी?

बाइबल (न्यू टेस्टामेंट) Luke-22/36 मे जीसस ने भी कहा है कि "जिसके पास तलवार नही है, उसे अपना अंगरखा (वस्त्र) बेंचकर भी तलवार लेनी चाहिये"
शायद जीसस भी आत्मरक्षा के लिये ही तलवार खरीदने की सलाह दे रहे थे। अब तलवार से कोई सब्जी तो काटेगा नही.

तथागत बुद्ध की बात सही थी, अगर शांति-स्थापना के लिये तलवार उठाना पड़े तो जरूर उठाये, पर स्वार्थ-निहित हिंसा कभी नही करनी चाहिये। कुल मिलाकर यही सच है कि आत्मरक्षा के लिये यदि हिंसा होती है तो कोई बात नही, पर कभी धर्म-विस्तार के लिये, या अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये हिंसा का मार्ग उचित नही हो सकता।

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अम्बेडकर की किताबों में गलतियां और आडंबर।

अम्बेडकर जी की एक ऐसी ही कृति है "भगवान बुद्ध और उनका धम्म"। इस किताब मे अम्बेडकर ने तथागत बुद्ध की पूरी जीवनी और उनके उपदेशों को लिखा है. अम्बेडकर इस किताब मे गौतम बुद्ध के जन्म के संदर्भ मे लिखते हैं कि.. 

एक बार महामाया (बुद्ध की माँ) किसी उत्सव मे गयी थी, और उन्हे वहाँ निद्रा आ गयी! फिर उन्होने स्वप्न देखा कि कुछ देवता आये और उन्हे उठाकर एक सुन्दर उपवन मे ले गये!  वहाँ उन देवताओं और उनकी देवियों ने महामाया का खूब स्वागत-सत्कार किया, फिर एक 'सुमेध' नामक देवता ने आकर महामाया से प्रार्थना की, और कहा- "हे देवी! मै धरती पर अपना अन्तिम अवतार लेना चाहता हूँ, क्या आप मेरी माँ बनोगी? महामाया ने हाँ कर दिया, और वही सुमेध ही नियत समय पर बुद्धरूप मे पैदा हुये"

इतनी बड़ी पाखण्ड नौवें पृष्ठ पर ही कर दी है, पर बाबासाहब और आगे लिखते हैं कि जब बुद्ध पैदा हुये तो आकाश मे देवता 'बुद्ध, बुद्ध' के नारे लगा रहे थे, और 'असित' नामक एक महर्षि ने पूरे जम्बूद्वीप पर दिव्यदृष्टि से देखा तो उन्हे पता चला कि बुद्ध पैदा हो चुके है!

डा० अम्बेडकर को 'बाबासाहब' उपनाम मिला था, और "बाबा" शब्द सही मे पाखण्ड का पर्याय होता है, फिर अम्बेडकर इस "बाबा" शब्द के प्रकोप से भला कैसे बच पाते!

अम्बेडकर ने तो इस किताब मे बाकयदा ब्राह्मणों का गुणगान किया है, और लिखा है कि देवी महामाया ने गर्भधारण करने के बाद आठ ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन कराया और सोना-चाँदी दान किये! और इन ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी भी की कि आपके घर एक प्रतापी पुत्र पैदा होगा! अम्बेडकर ने तो तथागत बुद्ध को ब्राह्मणों का आशिर्वाद और एक देवता का अवतार ही बता डाला है, और बिडम्बना तो देखो कि बामसेफी आशिर्वाद और अवतारवाद का विरोध करते हैं!

बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की सबसे विवादित और चर्चित किताब है "Riddles in hinduism"। जब मै यह किताब पढ़ रहा था तो इसके पृष्ठ-301 (सम्यक प्रकाशन) पर बाबासाहब ने कृष्ण और यदुवंशियों पर बड़े गम्भीर आरोप लगाये है!

डा० अम्बेडकर लिखते है कि- "यादव बहुपत्नीक थे, लेकिन श्रीकृष्ण के पूर्वज पुत्रीमैथुन करते थे! बाबासाहब ने मत्स्यपुराण का उदाहरण देते हुये लिखा है कि कृष्ण के पूर्वज तैत्तिरि ने अपनी पुत्री से शादी करके नल नामक पुत्र पैदा किया था! डा० अम्बेडकर यही नही रुके, उन्होने कृष्ण/जामवन्ती पुत्र साम्ब पर आरोप लगाया कि वह अपनी माँ से ही सहवास करता था, और अवैध रूप से श्रीकृष्ण की अन्य पत्नियों के साथ रहता था"

बाबासाहब ने यह बात #मत्स्यपुराण के हवाले से कही है, तो मैने सारा "मत्स्यपुराण" पढ़ डाला, पर मुझे ऐसा कहीं नही मिला! मैने गीताप्रेस (कोड-0557) वाली मत्स्यपुराण पढ़ी है।

यही नही बाबासाहब ने इसी किताब के पृष्ठ-214 पर कुम्हारों को "ब्राह्मण पिता और वैश्य माता" की संतान बताया है!

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यीशु मसीह।

जीसस के बारे मे पादरी गैंग दो बातें बहुत प्रचारित करती हैं- पहली की वे ईश्वर के पुत्र थे! दूसरी की वे बहुत दयालु थे!

सबसे पहले हम पहली बात पर नजर डालते हैं। जैसा कि बाइबल मैथ्यू-3/17 मे लिखा है कि बाइबल के परमेश्वर (यहोवा) ने स्वयं आकाशवाणी करके कहा कि "यह (जीसस) मेरा पुत्र हैं, और मै इससे अत्यन्त प्रसन्न हूँ"

एक अप्रमाणिक आरोप लगाया जाता है कि New testament (Luke) मे जीसस के गुमनाम पिता की तरफ ईशारा किया गया है! जीसस खुद को ईश्वर का पुत्र ही घोषित करते रहे। यही बात यहूदियों को बहुत नागवर लगती थी।  जब येरुसलम के गर्वनर पोण्टियास पॉलेट (पिलातुस) ने यहूदियों से कहा कि इसका (जीसस) अपराध इतना भी बड़ा नही है कि इसे मृत्युदंड दिया जाये, तब यहूदियों ने पिलातुस से कहा- "हमारी भी एक व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार वह मारे जाने योग्य है, क्योंकि उसने अपने-आपको परमेश्वर का पुत्र बताया है।" 
(यूहन्ना-19/7 चित्र-1)

बाइबल में किसे मिलावट हुई है जानते है। बाइबल Luke-23/34 मे लिखा है कि "यीशु ने कहा, हे पिता! इन्हे क्षमा कर, क्योंकि ये नही जानते कि ये क्या कर रहे हैं"। लेकिन इसी बाइबल (ल्यूक-19/27 चित्र-2) मे जीसस ने कहा है "परन्तु मेरे उन दुश्मनों को जो नही चाहते थे कि मै उन पर राज करूँ, उनको यहाँ लाकर मेरे सामने मार डालो।"   जीसस कहते थे कि मै केवल यहूदियों के मार्गदर्शन के लिये आया हूँ, साथ ही गैर यहूदियों को "कुत्ता" भी कहकर सम्बोधित करते थे। बाइबल (मैथ्यू-15/23-27 चित्र-3) की कथानुसार एक बार एक सामरी (गैर-यहूदी) महिला मे जीसस से अपनी पुत्री के लिये प्रार्थना करने को कहा! पहले तो जीसस ने अनसुना कर दिया, लेकिन जब उनके चेलों ने निवेदन किया तब जीसस ने कहा कि "लड़को (यहूदियों) की रोटी लेकर कुत्तों (गैर-यहूदियों) के आगे डालना उचित नही". यह सुनकर वह सामरी महिला जीसस के पैरों मे गिरकर बोली "हे प्रभु! कुत्ते भी तो मालिक का वही चूरचार खाते हैं जो उनके स्वामियों की मेज पर से गिरते हैं।". इतना गिड़गिड़ाने के बाद तब कहीं जाकर दयालु ईशपुत्र को दया आयी।

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जीसस और सूली।

ईसाई कहते हैं कि जीसस हम मानवों के लिये क्रास पर चढ़ गये, पर यह भी सरासर झूठ है। बाइबल (मैथ्यू-27/46-50, चित्र-1) मे लिखा है कि जब जीसस को क्रास पर लटकाया गया, तब वे अपने पिता (यहोवा) से कह रहे थे कि आपने मुझे क्यों छोड़ दिया। अर्थात जीसस अपने प्रभु से अपनी जान बचाने के लिये प्रार्थना कर रहे थे और बाद मे जोर से चिल्लाकर उन्होने अपने प्राण त्याग दिये।

ईसाइयों का सबसे बड़ा झूठ तो इसके बाद शुरू होता है, जब वे कहते हैं कि जीसस मृत्यु के बाद तीन दिनों के अन्दर ही फिर जी उठे थे। यह झूठी कहानी भी केवल इसलिये गढ़ी गयी ताकि जीसस को ईशपुत्र घोषित किया जा सके, जबकि बाइबल मे जैसा लिखा है, उससे तो लगता है कि यह कहानी पूर्ण-फर्जी है।
असल मे जीसस जब जीवित थे तो वे अपने चेलों को एक अन्य नबी 'योना' की कहानी बताते थे, जिस कहानी मे योना तीन दिन मछली के पेट मे रहने के बाद यहोवा की कृपा से पुनः बाहर आ जाते हैं। यह कहानी बाइबल के योना नामक अध्याय मे लिखी है!

इसी कहानी के आधार पर जीसस भी कहते थे कि यदि मै मर गया तो तीन दिन के भीतर ही पुनः कब्र से बाहर आ जाऊँगा। (मैथ्यू-12/39-40, चित्र-8)। जब पिलातुस ने जीसस को मौत की सजा सुनाई तब उसके कुछ सैनिकों ने पिलातुस से कहा कि हे महाराज! वह धूर्त (जीसस) कहता था कि मै तीन दिन के भीतर पुनः जीवित हो जाऊँगा, कहीं यह बात सत्य न हो जाये। तब पिलातुस ने अपने सैनिकों से कहा था कि उसकी कब्र पर पहरा दो। अब यदि सैनिक कब्र पर पहरा दे रहे थे तो सब्त की अगली सुबह ही मरियम कैसे कब्र पर गयी और जीसस कैसे कब्र से बाहर आये?

यह कहानी भी बाइबल (मैथ्यू-27/62-66, चित्र-2) मे साफ लिखी है। मतलब जीसस के पुनः जीवित होने की कथा भी सरासर झूठ है। वैसे जीसस को ईशपुत्र तो दूर एक महामानव कहना भी उचित नही होगा क्योंकि जीसस हमेशा खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ समझते थे।

जीसस ने (जॉन-10/8, चित्र-3) मे कहा है कि मै ही सबसे अच्छा चरवाहा (मार्गदर्शक) हूँ। मुझसे पहले जितने (नबी) आये थे, वे सब चोर-डाकू थे। साफ था कि जीसस खुद अपने ही पूर्वजों का भी सम्मान नही करते थे, वैसे भी मै बाइबल को घृणित बातों का एक गुच्छा मात्र ही समझता हूँ।

उदाहरण के लिये बाइबल के कुछ आदेश नीचे लिख रहा हूँ- यहोवा आदेश देते हैं कि मनुष्य के मल पर भोजन बनाओ! (यहेजकेल-4/15, चित्र-4)

मूसा (Moses) कहते हैं कि जितनी भी स्त्रियों का विवाह हुआ है उन्हे मार डालो, और जो कुवाँरी हैं, उन्हे पकड़कर मौज-मस्ती करो। (गिनती-31/17-18, चित्र-5)
मूसा कहते हैं कि जो सब्त (यहूदियों का शनिवार और ईसाइयों का रविवार) के दिन काम करे, उसे जान से मार डालो! (निर्गमन-35-2, चित्र-6)
दरअसल यहूदी मान्यता के अनुसार यहोवा ने छः दिन (रविवार से शुक्रवार) मे पूरी दुनिया बनाई, और सातवे दिन (शनिवार) को आराम किया। प्रारम्भ मे ईसाई भी शनिवार को ही सब्त मानते थे, परन्तु बाद मे जीजस के पुनः जीवित होने वाले दिन (रविवार) को सब्त मान लिया, और इसीलिये ईसाई रविवार को छुट्टी रखते हैं।
यहोवा कहते हैं कि मै तुम पर तलवार चलवाऊँगा और तुम्हारे पूजा के स्थानों का नाश करूँगा, तुम्हारी वेदियाँ उजड़ेगी और सूर्य की मूर्तियां तोड़ दी जायेगी! (यहेजकेल-6/3-4, चित्र-7)

इसके अलावा बाइबल के एक और बड़े नबी याकूब (Jacob) एक महिला को बहला-फुसलाकर उससे दुष्कर्म करते हैं। (2- Samuel-11/2-25) याकूब का बेटा भी अपनी ही सगी बहन का बालात्कार करता है। (2-Samuel-13/1-25)

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अवेस्ता 

अवेस्ता में राम का नाम कई बार आया है। अवेस्ता के एक अध्याय मे जब पारसियों के ईश्वर अहुर मज्दा अपने पुत्रों (पारसियों) को सम्बोधित करते हैं तो कहते हैं कि "पोऊरु खाथ्रेम बवाहि यथ रामनो" अर्थात- राम की तरह पूर्ण क्षत्रिय हो जाओ। (पृष्ठ-424, चित्र-1)

यही नही, जब पारसियों की शादी होती है तो पारसियों मे भी शादी-विवाह लगभग हिन्दू रीति-रिवाजों जैसा ही होता है! हिन्दू भी अग्नि को पवित्र मानते हैं और पारसी भी। जब पारसियों की शादियाँ होती है तो शादी सम्पन्न होने के बाद लोग अवेस्ता के ही जिंद (मंत्र) पढ़कर वर और वधू को आशिर्वाद देते हैं।

जहाँ लोग वर को आशिर्वाद देते समय कहते हैं कि "सदैव दीनशील हो, जरथुस्त्र की शिक्षाऐं ग्रहण करो, ऐसे ही आगे चलकर वर को आशिर्वाद देते हुये कहते हैं कि "रामः शाश्वतं आनन्दं" अर्थात राम की तरह सबको आनन्दित करो। (संस्कृत संस्करण अवेस्ता, पृष्ठ-515, चित्र-2)

अवेस्ता इतिहासकारों के अनुमान से लगभग 3,500 साल पुरानी किताब है, अतः इसमे राम का वर्णन होना यह बताता है कि यह किताब राम के बाद लिखी गयी।
दूसरा आश्चर्य तो यह है कि इसमे कृष्ण का नाम नही है! शायद कृष्ण का जन्म अवेस्ता के बाद हुआ हो....

उदाहरण के लिये जैसे रामायण मे कृष्ण का जिक्र तक नही है, पर गीता मे राम का नाम आता है। स्वयं कृष्ण ही अर्जुन से कहते हैं कि " हे पार्थ! मै सभी शस्त्रधारियों मे राम हूँ" (गीता-10/31)

अवेस्ता मे राम का नाम आना इस बात का ठोस प्रमाण है कि किसी समय भारत और ईरान की सभ्यताऐं एक ही थी।

पहले ईरान मे पारसीधर्म था, बाद मे मुसलमानों के अतिक्रमण ने पारसियों और उनके धर्म को कुचल दिया, तथा कुछ पारसी किसी तरह अपनी जान बचाकर भारत (गुजरात) आ गये।

अवेस्ता की लेखनशैली वेदों से इतनी मिलती है कि आप यदि एक बार अवेस्ता पढ़ो तो आपको भ्रम हो जायेगा कि आप ऋगवेद ही पढ़ रहे हो! अवेस्ता मे वेदों की तरह ऋचायें तो हैं ही साथ ही इन्द्र, चन्द्र और मित्र जैसे देवताओं के नाम भी हैं।

यही नही, अवेस्ता मे चातुष्यवर्ण व्यवस्था भी है जो ऋग्वेद के पुरुषसूक्त मे भी लिखी है।

अवेस्ता के एक अध्याय जिसे "आफरीन अषो जरथुस्त्र" कहते हैं, उसमे लिखा है कि अवेस्ता का ईश्वर (अहुर मज्द) जरथुस्त्र (पारसी धर्म के प्रवर्तक) से कहते हैं कि "हमारे दस पुत्र हुये! उनमे से तीन अर्थवान (अथर्वऋषि जैसे ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण) तीन रथेस्टार (क्षत्रिय) तीन वास्त्रेय (व्यापारी अर्थात वैश्य) हुये, और दसवां पुत्र हुतोक्ष (कुशल कारीगर अर्थात शूद्र) हुआ।

हांलाकि पारसियों के ईश्वर अहुर मज्द ने दसवें पुत्र की बहुत प्रशंसा भी की है और कहा कि मेरा यह पुत्र चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान, अग्नि जैसा चमकदार, इन्द्र की तरह शत्रुओं का दमन करने वाला और राम की तरह आदरणीय होगा।"

अवेस्था कि वर्णव्यवस्था ठीक वेदों जैसी ही है, बस वैदिक-वर्णव्यवस्था मे शूद्र को निम्न दिखाया गया है, जबकि अवेस्ता का ईश्वर शूद्र को ही सबसे अधिक प्रेम करता है।

अब यहाँ सवाल यह उठता है कि अवेस्ता वेदों से इतनी अधिक मिलती कैसे है?
क्या वेदों की नकल करके अवेस्ता बनी, या अवेस्ता की नकल करके वेद बने?
वैसे भी ज्योतिबा फुले ने बहुत पहले अपनी किताब "गुलामगीरी" मे यह दावा किया था कि आर्य ईरान से भारत आये थे, जबकि दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य भारत से दूसरे देश जैसे कि ईरान वगैरह मे गये।

आज के बामसेफी भी यही कहते हैं कि ईरान से आर्यों की तीन जातियाँ (अथर्वा, रथाइस्ट और वस्तारिया) भारत मे आये! रामायण की भी माने तो राजा दशरथ की पत्नि कैकेयी ईरान की ही थी। वही पुरातन शोधकर्ताओं की माने तो ब्रह्मा भी ईरान के एक प्रदेश (प्राचीन सुषानगर) के थे। अवेस्ता मे तो ईरान का प्राचीन नाम "अइर यान वेज" अर्थात "आर्यों का देश" बताया भी गया है।

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ईरानी आर्यों  में वर्ण व्यवस्था  

ईरान  के आर्यों  में  चार वर्ण होने  के बाद  भी  चौथे  वर्ण  यानि शूद्र  को सबसे अधिक  सम्मान दिया   गया  है। हजारों   साल से पहले इर्रान में  आर्य धर्म   मौजूद  था  ,  आज  इन  आर्यों  को पारसी  कहा जाता है , इनका पवित्र ग्रन्थ   जेन्द अवेस्ता  है  , जो अवेस्ता भाषा में  है ,  अवेस्ता भाषा बिलकुल  वैदिक  संस्कृत से मिलती  है  ,"जेन्द " का अर्थ   "छंद   " है  ,  इसलिए वेदों के मन्त्रों  को छंद  कहा  जाता  है  ,अवेस्ता भाषा में  ईरान  को "अइर यान  वेज "अर्थात  "आर्यानवर्ष  "अर्थात  आर्यों  का देश कहा  गया  है।

1-अवेस्ता में चार वर्ण 
पारसी  धर्मग्रन्थ   "खोरदेह अवेस्ता  में  आखिर में एक अध्याय  है  जिसका नाम  है, आफरीन  अषो  जरदुश्त। इसमें चार  वर्णो  के  बारे में अवेस्ता भाषा में  जो लिखा है उसे हिंदी लिपि में  दे  रहे हैं 
"जायाऐ न्ते हच वो दस पुथर। थ्रायो बवाहि यथ अथउरु नो,
थ्रायो  बवाहि यथ रथ ऐश्तारहे। थ्रायो बवाहि वास्त्रयहे फुशुयन्तो 
अएव ते बवाहि यथ वीशतासपाई। अउर्वरत अस्पेम बवाहि यथ ह्वरे,
रओचिनवंतेम बवाहि यथ मांओंघेम: सओचिन वंतेम बवाहि यथ आतरेम,
तिजिनवंतेम बवाहि यथ मिथरेम, हुरओघेम वेरेथ्राजनेम बावहि यथ स्रोषम अषीम। 
ख़ोरदाह अवेस्ता-पेज 423 

अर्थ - अहुर मज्द (ईश्वर ) ने जरदुश्त से कहा कि हमारे दस पुत्र    हुए  उनमे तीन   अथर्वन (अथर्व  ऋषि ) जैसे ज्ञानी और तीन रथेशतार  (क्षत्रिय ) युद्ध में प्रवीण हुए  और  तीन वास्त्रय हुए  जो  कृषि करके  देश को आबाद  करने वाले और व्यापारी  हुए  ,और एक पुत्र हुतोक्ष ( प्रवीण -  Skill ) हुआ  , जो विश्ताश्व जैसा सम्राट  , खुरशेद जैसा  घुड़सवार  ,चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान ,अग्नि जैसा चमचमाने  वाला ,इजद देवता की तरह तेजी वाला  ,सरोष इज्द की तरह सुन्दर और विजयी  , और रशन देव की तरह  सत्य मार्ग पर चलने वाला ,अर्थात धर्म पर स्थिर  रहने वाला  ,बहराम इज्द की तरह  शत्रुओं  का नाश करने  वाला ,राम  की तरह आदरणीय , और कवी    सुश्रवा  (कैकयी  का पिता   कय खुसरो )की  तरह मृत्यु  को जीतने  वाला  होगा , क्योंकि यह मुझे प्रिय  है .

इस  से  साफ  पता चलता है कि किसी  को सवर्ण   यानि  ऊँचा और  किसी को  अवर्ण यानी नीचा   समझ लेना  अज्ञान  की बात है  , जबकि सभी ईश्वर के पुत्र  सामान   है  , जिस तरह  से अहुर मज्द (ईश्वर ) ने  अपने  दसवें पुत्र  को  सबसे  अधिक   प्रेम और प्रतिष्ठा  प्रदान  की है  उसी तरह हमें भी उन लोगों  आदर  देना चाहिए  जिन्हे हम  अज्ञानवश  निम्न     वर्ण मानते  हैं   ,  याद रखिये  यह  हमारे  आर्य  भाई   हैं  

KHORDEH AVESTA, First Edition, April 1880 (411)

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(PP) अश्लीलता, ऋषि, पुराण, मनुस्मृति


अप्राकृतिक मैथुन और वीर्यपात।

पुराणों मे कई जगह ऐसा उल्लेख मिलता है कि पुरातनकाल मे ऋषि-मुनि आप्राकृतिक तरीके से अपना वीर्य स्खलन करते थे! सवाल यह होता है कि क्या पुरातन भारत मे लोग आप्राकृतिक मैथुन करते थे, जैसे हस्तमैथुन या जानवर से मैथुन आदि!

रामायणकाल मे एक ऋषि (विभण्डक) की कथा मिलती है! एक बार विभण्डक ऋषि ने जंगल मे उर्वशी को देखा, और उन्होने कामाशक्त होकर जल मे ही वीर्यपात कर दिया, इनके वीर्य को एक हिरनी ने पी लिया और वह गर्भवती हो गयी! वीर्य पीने से हिरनी का गर्भवती होना नामुमिकन है, हाँ अगर दूसरे तरीके से हिरनी के गर्भ मे वीर्य ना पहुचाया गया हो! यह तो प्रक्षेपण कहानी थी, जबकि सच यह होगा कि विभण्डक की कामाग्नि जब बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो उन्हे साममे खड़ी हिरनी भी उर्वशी नजर आने लगी होगी!

महाभारत के आदिपर्व मे भी ऐसी ही दो घटनाऐं है....
एक बार भारद्वाज ऋषि स्नान करने जा रहे थे, कि अचानक उन्हे घृताची अप्सरा दिखी. अप्सरा को देखते ही ऋषि का वीर्य गिर पड़ा और उसी से द्रोणाचार्य पैदा हुये! दूसरी घटना विश्वामित्र की है. जब विश्वामित्र ने मेनका को देखकर अपनी तपस्या भंग की और उसी का परिणाम शकुन्तला का जन्म हुआ!

इन कथाओं के बारें मे आचार्य रजनीश (ओशो) भी कहते थे कि अप्सराओं को क्या जरूरत थी ऋषि-मुनियों के सामने नग्न होकर नाचने की, जबकि ना जाने कितने लोग उनके लिये अपना सर्वत्र लूटाने को तैयार थे! ओशो का कहना था कि ये अप्सराऐं मानसिक थी, ये उन ऋषियों के मन मे दबी हुई वासनाये थी!  ऋषियों ने अपनी वासनाओं को इतनी बुरी तरह से दबाया था कि वो दबते-दबते इतनी प्रगाढ़ हो गयी कि खुली आँख अप्सराओं के सपने देखने लगे! ये कुछ और नही बल्कि उनकी कल्पना (संभ्रम) मात्र था!

यह बात भी सच है कि जिस तरह कई दिनों से प्यासे मनुष्य को चमकीली रेत भी पानी सी प्रतीत होती है, उसी तरह कई वर्षों तक वासनाऐं दबाने से उसका वीभत्स रूप सामने आने लगता है, जिसे आप अप्राकृतिक मैथुन भी कह सकते हो!

हमारे ऋषि-मुनि ईश्वर की तलाश मे जंगलों मे तो चले जाते थे, और उस समय उन्हे यह बड़ा सहज लगता था कि हम अध्यात्म से काम (Sex) को वश मे कर लेंगे, पर ऐसा होता नही था! फिर जब काम उन पर हावी होता था तो उनका हाथ बर्बस उनके शिश्न तक चला जाता था, और उसी को पुराणों मे वीर्य स्खलन लिखा गया है! 
जो कभी घड़े मे... कभी दोने मे....कभी जल मे.... तो कभी-कभी पशुओं (जैसे हिरनी आदि) मे....

खजुराहों मे भी पशुमैथुन की एक मूर्ति है! यह मूर्ति भी मूर्तिकार की कल्पनामात्र नही है, बल्कि उस दौर की विकृति को दर्शाती है!

रही बात उर्वशी और रम्भा की तो उन्हे ऋषियों के पास आने की क्या जरूरत थी! उनकी जैसी सुन्दरियों के साथ समागम करने के लिये बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपना सब कुछ हथेली पर लेकर कतार मे खड़े रहते थे, तो फिर भला उर्वशी- रम्भा इन नंगे- फकीर ऋषियों के पास वीरान जंगलों मे क्या करने जाती! पुराणों मे लिखा है कि इन्द्र ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये उर्वशी,रम्भा और मेनका जैसी अप्सराओं को इनके पास भेजता था!

पर ओशों कहते थे कि न तो इन्द्र किसी को भेजता था और ना ही कोई उर्वशी आती थी! इन्द्र तो खुद ऋषि-मुनियों की पत्नियों के पीछे पड़ा रहता था! वो क्यों अपनी अप्सराओं को इनके पास भेजेगा! ओशो का यह भी कहना था कि धर्मग्रंथों मे जो चीजें वर्जित की गयी है, वो उस समय मे बहुतायत होती थी, फिर उसे रोकने के लिये धर्मग्रंथों मे उसे पाप बताया गया, ताकि नर्क मे जाने के डर से लोग उसे करना छोड़ दे!

पुरातन भारत मे आप्राकृतिक मैथुन निश्चित ही होता होगा, तभी तो मनु ने मनुस्मृति मे इसे पाप बताया है!

मनुस्मृति -11/173 मे मनु ने लिखा है-
"मानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्र्छं सान्तपनं चरेत् ।।"
अर्थात- जो मनुष्य अमानुषीय (मनुष्य से भिन्न योनि मे, जैसे जानवर आदि) रजस्वला स्त्री से, अथवा योनि से भिन्न स्थान मे (जैसे गुदामैथुन) और जल मे वीर्यपात करता है, वह कृच्र्छसान्तपन करने से शुद्ध होता है।

यह श्लोक उस दौर की सच्चाई से अवगत करा रहा है! कुल मिलाकर सच यही है कि किसी भी ऋषि-मुनि के पास जंगल मे अप्सराऐं नही आती थी, बल्कि उनके अन्दर वर्षों से दबी वासनाऐं ही उनके सामने अप्सरा बनकर नग्न नृत्य करती थी! अब चूकिः ये ऋषि जंगल मे तप करने जाते थे तो वहाँ कोई स्त्री नही मिलती थी, फिर ये आप्राकृतिक तरीके से अपनी हवस को शांत करते थे!

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ब्रह्मवैवर्तपुराण या कामशास्त्र  

ब्रह्मवैवर्तपुराण ने अश्लीलता की सारी हदे पार कर दी है, ऊपर से लिखने वाले ने कहा है कि:- 
"चतुर्णमपि वेदानां पाठादपि वरम् फलम" (कृष्णजन्म खण्ड अध्याय-133)
अर्थात- चारो वेद पठने से अधिक फल यह पुराण पढ़ने से होगा।

अब जरा अश्लीलता देखो-
ब्रह्मा विश्वम् विनिर्माय सावित्र्यां वर योषिति।
चकार वीर्यधानम् च कामुक्या कामुको यथा।।
सा दिव्यं शतवर्ष च घृत्वा गर्भ सुदुःसहम् ।।
सुप्रसूता च सुषुवे चतुर्वेदान्मनोहरात् ।।
(ब्रह्मखण्ड अध्याय-9/1-2)
अर्थात-ब्रह्मा ने विश्व का निर्माण कर सावित्री मे उसी प्रकार वीर्यदान किया जैसे एक कामुक पुरुष कामुक स्त्री से करता है, तब सावित्री ने दिव्य सौ वर्षो के बाद चारो वेदों को जन्म दिया!

अब जरा विचार करो कि इस पुराण ने वेद भी सावित्री के गर्भ से पैदा किया है! खैर ये तो ब्रह्मा की इज्जत उतारी गयी, अब जरा विष्णु को भी देखो लो.

प्रकृतिखण्ड अध्याय-8/29 मे लिखा है कि विष्णु ने वाराह रूप मे पृथ्वी से सम्भोग किया और बेचारी पृथ्वी बेहोश हो गयी! इसलिये पृथ्वी विष्णु की पत्नि कही गयी! पृथ्वी का प्रातःस्मरणीय श्लोक भी यही कहता है:-
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम् पादस्पर्ष क्षमस्व मे।।

इस श्लोक मे भी धरती को "विष्णुपत्नि" कहा गया है! हालाकि विष्णु को यही नही छोड़ा और तुलसी (वृन्दा) से भी सहवास का दोषी बताया।
"शङ्खचूङस्य रूपेण जगाम तुलसी प्रति।
गत्वा तस्यां मायया च वीर्यधानं चकार।।"
(प्रकृतिखण्ड-20/12) 
अर्थात- तुलसी भी जान गयी थी कि मेरे पति का रूपधारण करके कोई अन्य पुरुष (विष्णु) मेरे साथ सहवास कर रहा है!

शिव को भी इस पुराण ने नही छोड़ा, शिव का सती के साथ अश्लील वर्णन इस पुराण मे है! सती के मरने के बाद भी जो श्लोक लिखे गये जरा उस पर नजर डालो-
"अधरे चाधरं दत्वा वक्षो वक्षसि शङ्कर:।
पुनः पुनः समाश्लिपुनर्मूछामवाप सः।।"
अर्थात- अधरो पर अधर और वक्ष पर वक्ष कर शंकर ने उस मृतक शरीर का आलिंगन किया!

अब जब ब्रह्मा,विष्णु और शिव नही बचे तो भला कृष्ण कहाँ से बचते! इस पुराण ने कृष्ण की इज्जत उतारने मे कोई कसर नही छोड़ी।
जरा इस पुराण के प्रकृतिखण्ड का कुछ श्लोक देखिये-
"करे घृत्वा च तां कृष्णः स्थापयामास वक्षसि।
चकार शिथिल वस्त्रं चुम्बन च चतुर्विधम् ।।
बभूव रतियुद्धेन विच्छिन्नां क्षुद्रघण्टिका।
चुम्बननोष्ठेंरागश्च ह्याश्लेषेण च पत्रकम् ।।
मूर्छामवाप सा राधा बुपुधेन दिवानिषम् ।।"
अर्थात- कृष्ण ने राधा का हाथ पकड़कर वक्ष से लगा लिया,और उसके वस्त्र हटाकर चतुर्विध चुम्बन किया! फिर जो रतियुद्ध हुआ उससे राधा की करधनी टूट गयी और चुम्बन से होठों का रंग उड़ गया, तथा इस संगम से राधा मूर्छित हो गयी और उसे रात-दिन तक होश नही आया।

यही नही कृष्ण जन्मखण्ड (अध्याय-106/22) मे लिखा है कि- 
"कुब्जा मृता संभोगद्वाससा रजकोमृतः"
यहाँ रुक्मि कृष्ण से कहता है कि "तुमने कुब्जा से ऐसा सम्भोग किया कि वह बेचारी मर ही गयी"
कुब्जा के साथ जन्मखण्ड (अध्याय-72) मे और भी कई अश्लील श्लोक है जिसमे नाना प्रकार के सम्भोग का वर्णन है, जिसे मै संकोचवश लिख भी नही सकता! 

हाँ कृष्ण जन्मखण्ड अध्याय-27/83 श्लोक भी कम अश्लील नही है-
"प्रजग्मुर्गोपिका नग्नाः योनिमाच्छाद्व पाणानि"
यहाँ बताते हैं कि गोपिकाऐं अपनी हाथ से योनि को ढ़ककर पानी के बाहर निकली! वैसे इस अध्याय के सारे श्लोक अति अश्लील है, जिसे लिखना सम्भव नही।

खैर कृष्ण का गुणगान तो और भी है, जन्मखण्ड (अध्याय-3/59-62) मे लिखा है कि गोलोक मे कृष्ण विरजा नाम की एक महिला से सहवास कर रहे थे, तभी राधा ने पकड़ लिया और फटकारते हुये कहा कि- "हे कृष्ण तू पराई औरत मे व्यभिचार करते हो, तुम चंचल और लम्पट हो, तुम मनुष्यो की भाँति मैथुन करते हो! तुम मेरे सामने से चले जाओ, और तुम्हे श्राप देती हूँ कि तुम्हे मनुष्य योनि मिले"

पुराणकर्ता यही नही रुके, गणपतिखण्ड (अध्याय-20/44-46) मे इन्द्र और रम्भा के सम्भोग का ऐसा वृतान्त है कि कोई पोर्न फिल्मकार भी शर्म से लाल हो जाऐ! 
ब्रह्मखण्ड (अध्याय-10/85-87) मे विश्वकर्मा और घृताची के सम्भोग का अतिअश्लील वर्णन है, आगे इसी अध्याय के श्लोक-127-128 मे एक ब्राह्मणी से अश्विनीकुमार के बालात्कार ऐसा वर्णन है कि कोई कामशास्त्र भी फीका पड़ जाऐ।

यह पूरा पुराण ही अश्लीलता से भरपूर है, मैने केवल उतना ही लिखा जो सभ्य समाज के सामने परोसा जा सकता है, कई प्रकरण तो ऐसे है कि जिसे मै चाहकर भी नही लिख सकता। अब आप लोग स्वयं निर्णय करे कि यह कोई धर्मग्रन्थ है या अश्लील कामवासना की किताब, इस पुराण मे बड़ी चतुराई के साथ देवताओं की इज्जत उतारी गयी है, पर आज भी पंडे इस पुराण को सिर रखकर घूमते हैं!

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आंसू और अंडों से बच्चे 

महेश शर्मा ने जब मोर के आंसू वाली बात कही तो सोशल मीडिया पर उनकी खूब खिचाई हुई. असल मे ब्रह्मपुराण मे लिखा है कि मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भ धारण करती है, क्योकि मोर ब्रह्मचारी होता है!

अब मै महाभारत से एक ऐसी ही बात बता रहा हूँ. कश्यप ऋषि की तेरह पत्नियाँ थी, उन्होने ही समस्त जीव-जन्तुओं को जन्म दिया था (इस पर मैने पूर्व मे पोस्ट की थी) उनकी दो पत्नियो के नाम कद्रु और विनता थे. कद्रु से सांप और विनता से अरुण तथा गरुण का जन्म हुआ था! कश्यप ऋषि की ये दोनो पत्नियाँ जब गर्भवती हुई तो इन्होने बच्चो को जन्म नही दिया, बल्कि कद्रु ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये थे. उन अंडो को दासियों ने प्रसन्न होकर गर्म बर्तन मे रख दिया जिसमे से कद्रु के हजार नाग,सांप और तक्षक पैदा हुये! पर विनता के अंडे मे से बच्चे नही निकले तो उन्होने जल्दबाजी मे खुद एक अंडा फोड़ दिया, जिसमे वरुण देव थे. वरुण को बहुत गुस्सा आया और बोले कि तुमने मुझे समय से पहले अंडा फोड़कर बाहर निकाला इसलिये मै तुम्हे श्राप देता हूँ सैकड़ो वर्षो तक तुम अपनी सौतन की नौकरानी रहोगी.

अब जरा विचार करो कि अगर महिलाऐं उस काल अंडे देती थी और बच्चा अंडे से निकलकर माँ श्राप देता था, तो मोरनी वाली बात भी आश्चर्यजनक नही हो सकती।
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अंडकोष।

अण्डकोष शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है! यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है! पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है! जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है! लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था! सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया! अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती! अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें.

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!

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महावारी का रहस्य

विज्ञान के अनुसार महिलाओं के अंडाशय में एक अंडा तैयार होता है, जो गर्भाशय की नलिका में पहुंच जाता है, साथ ही गर्भाशय की अंदरूनी परत में खून जमा होता है ताकि अगर गर्भ बैठ जाए तो उस खून से बच्‍चा विकसित हो सके! अगर गर्भ नहीं बैठता तो यह परत टूट जाती है और उसमें जमा खून माहवारी के रूप में शरीर से बाहर आता है. हर महीने फिर गर्भ की तैयारी होती है और यही चक्र चलता है, अगर किसी माह गर्भ बैठ जाता है तो बच्‍चा गर्भाशय में पलने लगता है और इसीलिए माहवारी आना बंद हो जाती है!

भागवतपुराण के अनुसार आदिकाल मे असुरों और देवों का भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें देवता हार गये! इन्द्र से अपना खोया हुआ स्वर्ग वापस पाने के लिये विष्णुजी से सलाह ली! विष्णु ने कहा कि किसी ब्रह्मज्ञानी की सेवा करके वरदान अर्जित करो और असुरों को हराओ. इन्द्र ने एक ब्रह्मज्ञानी की सेवा करनी शुरू कर दी, पर उस ब्रह्मज्ञानी की माँ असुर घराने से थी.  जैसे ही यह बात इन्द्र को पता चली उन्होने उस ब्रह्मज्ञानी की हत्या कर दी! अब इन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया।  उसके निदान के लिऐ विष्णु जी ने इन्द्र से कहा कि आप अपने पाप को धरती,पेड़,जल और नारी मे एक-एक चौथाई करके बांट दो. इन्द्र ने धरती,पेड़,जल और नारी को उनका श्राप लेने के लिये मना लिया.  पर नारी ने बदले मे एक वर मांगा कि मै पुरुषों से अधिक कामशक्ति वाली रहूँ और पुरुषों का उपभोग कर सकूँ. इन्द्र ने वरदान देकर अपना एक चौथाई पाप महिलाओं को दे दिया. अब हर महीने जो माहवारी का दर्द महिलाऐं झेलती हैं वो ब्रह्महत्या का एक चौथाई पाप ही है, इससे स्वयं कामाख्या देवी भी नही बची और वो भी हर महीने माहवारी मे होती हैं तथा मन्दिर बन्द करना पड़ता है!

बस ये पता लगाना अभी शेष है कि वो कौन महिला थी जो सारी औरतों की चौधरी बनकर गयी और एक चौथाई पाप को स्वीकार कर लिया!

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विष्णु और अश्लीलता।

एक बार विष्णु जी ने किसी बात पर नाराज होकर लक्ष्मीजी को घोड़ी बनने का श्राप दे दिया. फिर क्या था पलक झपकते ही लक्ष्मी घोड़ी बन गयी! विष्णु ने निवारण के लिये कहा कि जब तुम एक पुत्र को जन्म दोगी तो फिर से अपने वास्तविक स्वरूप मे आ जाओगी! लक्ष्मी जी घोड़ी बनकर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर आ गयी, और सोचने लगी कि मै जब तक पुत्र को जन्म नही दूँगी तब तक श्रापमुक्ति नही मिलेगी, पर पुत्र होगा कैसे? यही विचार करके उन्होनेे शिवजी को ध्यान लगाया. भगवान शिव समझ गये कि जब तक पुत्र नही होगा ये बेचारी घोड़ी ही बनी रहेगी. पर पुत्र होगा कैसे?

ये यहाँ है, और विष्णु वैकुण्ठ मे. लक्ष्मी किसी दूसरे घोड़े के साथ मुँह काला करना नही चाहती थी. यही सोचकर शिव ने विष्णु को फटकार लगायी, शिव की बात मानकर विष्णु शीघ्र घोड़ा बनकर लक्ष्मी के पास पहुँचे और फिर दोनो के संसर्ग से लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया! इस पुत्र का नाम "एकवीर" रखा और यही आगे चलकर क्षत्रियों के हैहयवंश जन्मदाता बना।

अब सवाल यह है कि क्या यह कहानी सच है? अगर सच है तो विष्णु कैसे भगवान है जो खुद की पत्नि और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को घोड़ी बना देते है! क्या खुद को गौरवशाली समझने वाले हैहयवंशी क्षत्रिय घोड़ी से पैदा हुऐ? क्या हिन्दुओं के सर्वमान्य परमेश्वर विष्णु इतने निर्लज्ज थे कि घोड़ा/घोड़ी बनकर पुत्र पैदा करते थे?

ये कथा कई प्रश्न पैदा कर रही है, जिस पर आप भी विचार कर सकते हो! वैसे पुराणों मे लिखी हर कथा को महंत और कथावाचक लोग नाच-गाकर बताते हैं, पर इस कथा को पंडे-पुरोहित दबाकर ही रखते हैं! मै चाहता हूँ कि इस कथा के माध्यम से आप सब धर्माधिकारियों से सवाल करो कि विष्णु कैसे भगवान थे जो खुद की पत्नि को घोड़ी बनाते थे और दूसरे (जलंधर) की पत्नि (वृन्दा "तुलसी" ) से छल करते थे!

श्रोत:- देवीपुराण/छठा स्कन्ध (अध्याय-18, पृष्ठ संख्या- 442)

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इंद्र और अश्लीलता।

इन्द्र तो वासनाग्रस्त और हवस के पुजारी तो थे ही, साथ ही कायर भी थे, जो लगभग तमाम युद्धों असुरों से हार जाते थे। इन्द्र किस कदर वासना के अधीन थे इसका उदाहरण अहिल्या प्रकरण तो हैं ही, इसके अतिरिक्ति भी इन्द्र ने कई और बड़े काण्ड किये थे।

एक पौराणिक कथा के अनुसार अरूणदेव (सूर्यदेव के सारथी) ने एक बार स्त्री का रूप बनाकर (क्योंकि इन्द्र की सभा मे पुरुषों का आना निषेद्य था) इन्द्र की सभा मे अप्सराओं का नृत्य देखने गये। अचानक इन्द्र की नजर एक कोने मे स्त्री बनकर खड़े अरुणदेव पर पड़ी। इन्द्र ने सोचा कि यह फुलझड़ी कौन है जो अब तक मेरे हाथ नही लगी? इन्द्र अपने सिंहासन से उठकर अरुणदेव की तरफ लपके! अरूणदेव भी स्थिति को भांपकर भागे, पर इन्द्र ने उन्हे तेजी से झपटकर पकड़ लिया। बेचारे अरुणदेव छटपटाते रहे, पर इन्द्र ने एक न सुनी और अरुणदेव की नथ उतार ही दिया! इस मधुर-मिलन का परिणाम यह हुआ कि स्त्री-रूपधारी अरुणदेव गर्भवती हो गये और कालान्तर मे उनके गर्भ से वानरराज बालि का जन्म हुआ।

इन्द्र के कामपिपासा की एक कथा श्रीनरसिंहपुराण अध्याय-63 मे भी मिलती है- 
"कथानुसार एक बार इन्द्र ने सोचा कि मैने स्वर्ग का सुख बहुत भोग लिया, अब कहीं एकांत मे चलकर तप करके मोक्षप्राप्ति का साधन किया जाये।
ऐसा सोचकर कैलास-पर्वत के निकट आ गये और वहाँ उन्होने यक्षराज कुबेर की पत्नि चित्रसेना को देखा! चित्रसेना बहुत सुन्दर थी और उसकी सुन्दरता पर इन्द्र मुग्ध हो गये। इन्द्र ने सोचा कि कुछ भी करके मुझे यह सुन्दरी प्राप्त करनी ही है।
उस समय इन्द्र की हालत भी वही थी कि "निकले थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास"। बेचारे गये थे मोक्ष ढ़ूढ़ने पर फिर से सुन्दरता के जाल मे फँस गये। इन्द्र ने चित्रसेना को पाने के लिये कामदेव का आह्वान किया! जब कामदेव आये तो इन्द्र ने उन्हे सारी स्थिति बतायी और कहा कि तुम अपने कामबाणों से इस सुन्दरी की कामाग्नि भड़का दो, और मै तत्काल उसके सम्मुख जाकर मौके का फायदा उठा लूँगा।

कामदेव ने कहा, "देखो देवराज! एक बार मै इसी कैलास पर भस्म हो चुका हूँ, अब तुम दूसरी बार मुझे खतरा उठाने के लिये कह रहे हो"
कामदेव के बारम्बार समझाने पर भी इन्द्र न माने और मजबूरन कामदेव ने चित्रसेना पर कामबाण चला दिया। जैसे ही चित्रसेना काममोहित हुई, इन्द्र ने उसी क्षण उसके पास जाकर प्रणय-प्रस्ताव रख दिया और उसे अपने रथ पर बैठाकर मन्दराचल की गुफाओं मे लेकर चले गये। इन्द्र ने कामवेदना से पीड़ित चित्रसेना संसर्ग करके स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुख का अनुभव किया।"

इसके आगे काफी लम्बी कहानी है कि नाडीजङ्घा नामक एक राक्षसी की मदद से कुबेर ने अपनी पत्नि का पता लगाया! बाद मे इन्द्र ने नाडीडङ्घा राक्षसी को मार डाला और क्रोध मे आकर तृणबिन्दु मुनि इन्द्र को श्राप देकर स्त्री बना देते हैं।

उक्त कथाऐं भी इन्द्र की विलासिता का अन्त नही है, पुराणों मे ऐसी कई कथाऐं हैं जो बताती हैं कि इन्द्र परस्त्री-हरण, परस्त्री-गमन का अपराध करते थे, फिर भी त्रिदेवों ने इन्द्र को हमेशा माफ भी किया और उन्हे कभी अपदस्थ भी नही किया।
दूसरी बात जब श्रीकृष्ण ने तीन मुट्ठी चावल के बदले स्वर्ग और धरती का सारा वैभव सुदामा को दे दिया था, तब भी यह ज्ञात नही होता कि सुदामा ने आखिर कितने दिनों स्वर्ग और धरती पर राज्य किया था?

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ऋषियों की अश्लीलता।

वैदिककाल मे ऋषि-मुनि चाहे जितना ही तपस्वी क्यों न थे, पर वे महिलाओं के जाल मे जरूर फंस जाते थे। यानि भले ही वे दावा करते थे कि हमने काम, क्रोध, मोह और लोभ, सब पर विजय पा ली है, पर सुन्दर महिला देखते ही उनका भी लंगोट गीला होने लगता था।

एक ऐसी ही कथा रामायण-काल मे घटित हुई है। त्रेतायुग मे एक महाऋषि थे जिनका नाम ऋंग था। ये ऋंग रामजी के बहनोई और दशरथ के जमाता थे। (वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड, सर्ग-9, श्लोक-11) 
जैसा कि सबको पता ही है कि राजा दशरथ के चार पुत्रों के अलावा एक पुत्री शांता भी थी। (वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-11/3-5) 
दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को अपने निःसंतान मित्र रोमपाद को दे दिया था! एक बार रोमपाद से कोई पापकर्म हो गया और उनके राज्य मे अकाल पड़ गया।

राजा रोमपाद ने अपने तमाम ऋषियों और पुरोहितों को बुलाकर अकाल से निवारण का उपाय पूँछा! तब पुरोहितों ने बताया कि यदि ऋषि ऋंग को आप अपने महल मे बुलाकर उनका सत्कार करें और अपनी पुत्री शांता का वैदिकरीति से उनसे विवाह कर दें, तो आपके राज्य मे वर्षा जरूर होगी। राजा पुरोहितों की बात मानकर तैयार हो गये, पर अब समस्या यह थी कि ऋंगऋषि सदैव वन मे ही रहते थे, और कभी नगर मे आते ही नही थे। फिर भला राजा उन्हे नगर मे कैसे लेकर आते? तब पुरोहितों ने कहा कि यदि राज्य की सुन्दर वैश्याओं को ऋंगऋषि के आश्रम के आसपास भेजा जाये तो उनके सम्मोहन से ऋषि ऋंग जरूर पीछे-पीछे नगर तक आ जायेगें। राजा रोमपाद को यह योजना उचित लगी, और उन्होने इसी योजना पर वैश्याओं को अमल करने का निर्देश दे दिया।

अब मै यहाँ जरा आपको बता दूँ कि ऋंग इतने तपस्वी और प्रतापी ऋषि थे कि उनके कहीं आगमन मात्र से वर्षा हो सकती थी। राजा दशरथ के राज्य मे वशिष्ठ, वामदेव और जाबाल जैसे विद्वान के होते हुये भी यही ऋंग ऋषि ने दशरथ का पुत्र-कामेष्टि यज्ञ करवाया था! मतलब ऋंग वामदेव, जाबाल और वशिष्ठ से भी अधिक विद्वान और तपस्वी थे। अब इतने विद्वान और तपस्वी ऋषि को फांसने के लिये राजा रोमपाद ने वैश्याओं का सहारा लिया, और आश्चर्य की बात है कि अपनी समस्त इन्द्रियों पर अंकुश रखने का दम्भ भरने वाले ये ऋषि भी वैश्याओं के लटके-झटके मे फंस गये!

रोमपाद की योजनानुसार जब वैश्याऐं ऋंग के आश्रम के पास गयी तो उन्हे देखते ही ऋंग के मुँह मे पानी आ गया। और जब वैश्याऐं आश्रम से वापस नगर लौटने लगी तो ऋषिऋंग भी उनके पीछे-पीछे नगर तक चले आये। इसके बाद की कथानुसार फिर रोमपाद के राज्य मे बारिश हुई और ऋंग का विवाह शांता से हो गया। बाद मे इन्ही ऋंग के सामर्थ्य से दशरथ ने राम तथा तीन अन्य प्रतापी पुत्रों को प्राप्त किया।

विभण्डक, विश्वामित्र, पराशर और ऋंग जैसे कई ऋषि आपको मिल जायेंगे जो सुन्दर नारी देखते ही लार टपकाने लगते थे। दूसरी बात इस कथा से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पौराणिक-काल के आर्य राजा अपने दुश्मनों या किसी अन्य को फांसने के लिये वैश्याओं का सहारा लेते थे।

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ऋषि, अश्लीलता, सेविका।

पुराणों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन आर्य-राजाओं की ऐसी लालसा होती थी कि उनकी संतति अच्छी उत्पन्न हो, अतः वे खुशी-खुशी अपनी रानियों को गर्भवती करने के लिये ऋषियों की शरण मे जाया करते थे। उनकी दृष्टि मे ये ऋषि "कुलीन सांड़" होते थे।

सत्यकाम जबाल की कथा लगभग सभी को मालुम है! कई लोग इस कथा को उदाहरण-स्वरूप भी बताते हैं कि किस तरह एक गणिका-पुत्र जबाल ऋषि बन गये थे।

वैसे यह कथा छान्दोग्योपनिषद चतुर्थखण्ड (चित्र-1-3) मे लिखी है! इस कथा को एक झूठ के साथ बताया जाता है कि सत्यकाम की माँ जबाला गणिका (वैश्या) थी। वास्तव मे जबाला गणिका नही थी, वह शादीशुदा थी और बहुत सारे अथितियों की सेवा-टहल करती थी। 

जब सत्यकाम अपनी माँ से पूँछते हैं कि माँ मेरा गोत्र क्या है. तब जबाला कहती है कि हे पुत्र! मै अपने पति के घर आये बहुत सारे अतिथियों की सेवा करने वाली परिचायिका थी, और उन्ही जवानी के दिनों मे मैने तुम्हे जन्म दिया था! अतः मुझे नही मालुम कि तुम्हारा गोत्र क्या है?

अब इस कथा का गीताप्रेम वाले चाहे जितना लीपापोती करके भाष्य करें, पर सच यही था कि जबाला को यह पता ही नही था कि उसने किस पुरुष के संसर्ग से सत्यकाम को पैदा किया था। और तो और जबाला यह सारे कर्म तब से करती थी, जब उसके पति जीवित भी थे।

ऋषियों के रंगीन-मिजाजी वाली कहांनियों से पुराण भरे पड़े हैं। ऐसी ही एक कथा महाभारत के उधोगपर्व (अध्याय-103 से 123 तक) मे माद्री की आती है! 
माद्री राजा ययाति के कुल से थी, फिर भी उसे एक के बाद एक कई ऋषियों के साथ सहवास करना पड़ता है, और जब सारे ऋषियों का मन माद्री से भर जाता है तो वे उसे पुनः राजा ययाति को वापस लौटा देते हैं।

एक अन्य कथा महाभारत के "आदिपर्व" मे महर्षि उतथ्य की आती है, जो ऋषि अंगिरस के कुल के थे। महर्षि उतथ्य की पत्नि ममता बहुत सुन्दर थी, और उतथ्य का छोटा भाई वृहस्पति (जो देवऋषि माने गये हैं) ममता पर आसक्त था। एक दिन जब ममता घर मे अकेली थी तो वृहस्पति ने मौका देखकर ममता से सम्भोग करना चाहा, जिस पर ममता ने यह कहकर मना कर दिया कि " अभी मै गर्भवती हूँ, अतः आप प्रतिक्षा करो"

सोचने वाली बात यह है कि यहाँ ममता ने वृहस्पति को फटकारा नही, और न ही यह कहा कि यह अनैतिक है। केवल इंतजार करने के लिये कहा! इससे ऐसा लगता है कि ममता और वृहस्पति के बीच अनुचित सम्बन्ध रहे होंगे! हालांकि वृहस्पति ममता के इस अर्ध-इनकार से भी इतने नाखुश हुये कि उन्होने ममता को श्राप दे दिया कि तेरा पुत्र अंधा पैदा होगा। हुआ भी वही, ममता के पुत्र ऋषि दीर्घतमा अंधे ही पैदा हुये।

वैसे, यहाँ यह भी जान लेना चाहिये कि खुद वृहस्पति की पत्नि तारा को इनके ही शिष्य चन्द्र उठा ले गये थे, और उससे सहवास करके "बुध" नामक पुत्र को पैदा किया था। आगे चलकर इसी गुरूपत्नि-पुत्र बुध से चंद्रवंशीय क्षत्रियों की उत्पत्ति हुई।

पूर्वकाल मे ऋषि किस कदर कामान्ध होते थे, इसका एक उदाहरण डा० अम्बेडकर ने अपनी बहुचर्चित किताब "रिडल इन हिन्दुइज्स" के पृष्ठ-298 पर उल्लेख किया है! अम्बेडकर ने लिखा है कि पूर्वकाल मे यदि कोई ऋषि यज्ञ कर रहा होता था, और यदि उसी समय वह किसी स्त्री से संभोग करना चाहता था तो ऋषि यज्ञ को अधूरा छोड़कर एकांत मे जाने के बजाए यज्ञ-मण्डप मे ही खुलेआम उस स्त्री से मैथुन कर सकता था। बाद मे इस घृणित-कृत्य को भी "वामदेव व्रत" नामक धार्मिक विधान बना दिया गया, और कालान्तर मे यही 'वाममार्ग' कहलाया।

रंगीन-ऋषियों की सूची और भी लम्बी है, जिसमे पराशर, कर्दम, विभण्डक और दीर्घतमा के नाम मुख्य हैं.

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ऋषि अगस्त्य।

समुद्र पी जाने वाले ऋषि अगस्त्य का नाम तो लगभग सभी ने सुना है, पर शायद कम ही लोग जानते हैं कि ऋषि अगस्त्य पैदा कैसे हुये। एक बार राजा निमि और ऋषि वशिष्ठ मे किसी बात को लेकर विवाद हो गया, फिर दोनो ने एक-दूसरे को शरीर-हीन होने का श्राप दे दिया और श्रापवश दोनो ही शरीर-विहीन हो गये....
तत्पश्चात वशिष्ठ अपने पिता ब्रह्माजी के पास गये और उनसे पुनः शरीर प्राप्ति का उपाय पूँछने लगे! ब्रह्मा ने कहा कि आप वरूणदेव के वीर्य मे प्रवेश कर जाओ, फिर तुम अयोनिज रूप से पुनः शरीर पा जाओगे और जो वायुरूप मे विचरण कर रहे हो उससे मुक्ति मिल जायेगी! ब्रह्मा की आज्ञा से वशिष्ठ वरुण के वीर्य मे प्रविष्ठ कर गये!

एक दिन की बात है, उर्वशी बड़े सुन्दर वस्त्र पहनकर वरुण के निकट से गुजर रही थी! उर्वशी के रूप-रंग को देखकर वरुण काम पीड़ित हो गये और उसके पास जाकर समागम करने की विनती करने लगे! उर्वशी ने कहा कि हें वरुणदेव! आज तो यह सम्भव नही हैं... आज मैने आपसे पहले मित्रदेव को समागम करने के लिये हाँ कर दिया है! अभी मै उन्ही के पास जा रही हूँ, आज मेरा शरीर उनके लिये है, आप किसी और दिन अपनी इच्छापूर्ति कर लेना! वरुण ने कहा कि मै आज तड़प रहा हूँ, और तुम किसी और दिन की बात कर रही हो! मुझसे कामाग्नि सही नही जा रही है.....हे उर्वशी! मेरी विनती स्वीकार कर लो। पर उर्वशी न मानी और बोली कि मैने आज मित्रदेव को वचन दे दिया है, वो आपसे पहले ही मेरे पास आये थे!
तब वरुण देव ने कहा कि उर्वशी तुम मेरी मदद करो, मै किसी घड़े मे अपना वीर्य-त्याग करना चाहता हूँ! उर्वशी ने कहा कि हाँ, आज यही ठीक रहेगा! फिर उर्वशी एक घड़ा लायी, और वरुण देव ने उसी घड़े मे अपना वीर्यपात करके अपनी हवस शान्त की!

इसके बाद जब उर्वशी मित्रदेव के पास पहुँची तो मित्रदेव क्रोध से लाल हो गये, और बोले, रे दुराचारिणी! तू अभी तक किससे नैना-चार कर रही थी?
मै कब से तेरी प्रतिक्षा कर रहा हूँ, और तू किसी और से व्यभिचार कर रही थी, जबकि तूने मुझे आज अपने आप को समर्पित करने का वचन दिया था! उर्वशी ने मित्रदेव को बहुत समझाया, पर मित्रदेव न माने, और वो भी उसी मटके मे वीर्यपात करके चले गये! थोड़े दिन बाद वरुण के वीर्य से वशिष्ठ और मित्रदेव के वीर्य से अगस्त्य ऋषि का जन्म हुआ! अगस्त्य ऋषि कुम्भ (मटके) से पैदा हुये थे इसलिये इनका एक नाम 'कुम्भज' भी है!

अब जरा सोचो कि मटके मे ऐसा कौन सा पदार्थ होता था कि जिसमे वीर्य गिराने से बच्चे का जन्म हो जाता था! महाभारत के अनुसार गांधारी के सौ पुत्र भी मटके से ही पैदा हुये थे! आखिर कुम्हार मटका पानी रखने के लिये बनाते थे, या उसमे वीर्यपात करके अयोनिज संतान पैदा करने के लिये। यह पूरी कथा वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग-56-57 से ली गयी है।

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ऋषि गौतम और अहिल्या।

ओशो का मानना था कि पौराणिक ऋषियों को भी सुन्दर स्त्रियों की लालसा थी, कई बार इनकी स्त्रियाँ इनसे उम्र मे काफी छोटी होती थी! एक बात ध्यान रखना कि काम को सामान्यतः कोई जीत नही पाया, न तो ऋषि-मुनि और न ही इनकी पत्नियाँ!

यह तो सबको पता ही है कि देवगुरू वृहस्पति की पत्नि तारा और चन्द्रदेव (चन्द्रमा) के बीच अनैतिक सम्बन्ध थे, और इन दुराचार से 'बुध' नाम का एक पुत्र भी पैदा हुआ था!

ऐसी ही एक और ऋषिपत्नि थी "अहिल्या"।  अहिल्या ऋषि गौतम की पत्नि थी, जो बहुत सुन्दर थी! अहिल्या की सुन्दरता पर स्वयं देवराज इन्द्र भी फिदा थे! कहते हैं कि एक बार इन्द्र और चन्द्र ने मिलकर गौतम ऋषि को बेवकूफ बनाया!
गौतम ऋषि प्रतिदिन सुबह मुर्गे की बांग सुनकर नहाने जाते थे, और इसी का लाभ लेकर चन्द्र ने एक दिन समय से पहले ही मुर्गा बनकर बांग दे दी! गौतम ऋषि धोखे मे आकर नहाने चले गये, मौका पाकर इन्द्र गौतम का वेष बनाकर अहिल्या के पास आये ट्वेन्टी-ट्वेन्टी खेलकर भाग निकले...  जिससे क्रोधित होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप देकर पत्थर बना दिया, क्योंकि उसने अपने पति के रूप मे आये इन्द्र को पहचानने मे भूल की!

हांलाकि यह कहानी सच नही है, सच तो यह है कि अहिल्या ने स्वयं इन्द्र के साथ संसर्ग किया था! यह सच है कि चन्द्र मुर्गा बनकर बोले थे, पर इन्द्र ने अहिल्या से छल नही किया था!

बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड सर्ग-48/17-21 मे साफ लिखा है कि जैसे ही गौतम ऋषि स्नान करने अपनी कुटिया से निकले, देवराज इन्द्र अन्दर आ गये!
इन्द्र ने अहिल्या से कहा- हे देवी! मे देवराज इन्द्र हूँ, मैने तीनों लोकों मे तुमसे सुन्दर स्त्री नही देखी! तुम अद्वितीय रूपवती हो, मै तुमसे रतिक्रिया (सम्भोग) करना चाहता हूँ! इन्द्र चालाक थे, उन्हे मालूम था कि महिलाऐं अपनी प्रशंसा सुनना बहुत पसन्द करती है....

इन्द्र के मुँह से अपने रूप की प्रशंसा सुनते ही अहिल्या के पाँव जमीन पर नही रहे, वो सोचने लगी कि "हाय,, मै इतनी सुन्दर हूँ कि स्वयं देवराज मुझसे प्रणय के लिये विनती कर रहे है, मेरे अहो भाग्य!" और फिर अहिल्या तैयार हो गयी! जब इन्द्र ने गौतम ऋषि की कुटिया मे भरपूर 'बरसात' कर ली, तब अहिल्या से बोले कि- 'हे देवी! मुझे बहुत आनन्द आया, मै अब संतुष्ट हुआ' अहिल्या ने कहा कि मै भी आपसे तृप्त हुई, पर इससे पहले की मेरे पति आ जाये, आप यहाँ से चले जाओ।

कहते हैं कि हाथी पालना तो आसान होता है, पर उसका चारा देना मुश्किल है!
ऋषि-मुनि अधेड़ अवस्था मे भी सुन्दर कन्याओं से शादी कर लेते थे, पर क्या वो अपनी पत्नियों को खुश रख पाते थे, यह बड़ा प्रश्न था! और अहिल्या की घटना भी यही बताती है। चलो अगर एक बार मान भी लें कि इन्द्र ने अहिल्या से छल किया, और अहिल्या इन्द्र को पहचान ही नही पायी तो फिर क्यों गौतम ऋषि ने अहिल्या को श्राप दिया? फिर तो उस दिन केवल अहिल्या ही नही, गौतम ऋषि भी छले गये थे! गौतम ऋषि ब्रह्मज्ञानी थे, और इतना तपोबल था कि किसी को श्राप देकर पत्थर बना सकते थे, पर उस समय इनका तपोबल कहाँ चला गया था, जब ये चन्द्रमा की नकली बांग को असली मुर्गे की आवाज समझ बैठे! अगर गौमत जैसे दिव्यऋषि को यह ज्ञान नही हो पाया कि चन्द्रमा उन्हे छल रहा है, तो अहिल्या कैसे जान पायेगी कि इन्द्र मेरे पति के रूप मे आये हैं। गौतम ऋषि का अहिल्या को श्राप देना सर्वथा अनुचित था! अहिल्या इन्हे भी तो श्राप दे सकती थी, कि तुम धोखे मे आकर आधी रात को नहाने क्यों गये। और अगर महर्षि बाल्मीकि की बात सत्य है तब भी गौतम ऋषि ही दोषी है, अगर वो अहिल्या को संतुष्ट रखते तो शायद वो इन्द्र के प्रस्ताव को न स्वीकार करती!

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ऋषि और अप्सराएं।

पूर्वकाल मे ऋषि-मुनि भी काम (Sex) मे विरक्त नही थे! सामान्यतः यह अवधारणा है कि ऋषि लोग काम को जीत लेते थे, पर जरा गौर करना कि पूर्वकाल मे लगभग पुरुष बहुपत्निक होते थे!

ऋषि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थी, जिनसे उन्होने करोड़ संतान पैदा की!
मनु के पुत्र उत्तानुपात की दो पत्नियां थी, सुरूचि और सुनीति!
कृष्ण के पिता वासुदेव की दो पत्नियां थी, रोहिणी और देवकी!
राम के पिता दशरथ को तीन पत्नियाँ थी, कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा!

अरे मनुष्य तो क्या तथाकथित देवता थी बहुपत्निक ही थे!
चन्द्रमा को 27 पत्नियां थी, जिनके नाम से 27 नक्षत्रों के नाम है!
इसके बाद भी इन्होने अपने गुरू वृहस्पति की पत्नि तारा से मुँह काला किया!
इन्द्र के बारें मे कुछ कहना ही सूर्य को दीपक दिखाने के बराबर होगा!
अग्निदेव की भी दो पत्नियां थी, स्वाहा और स्वधा!

आखिर जब ये महामानव काम को जीत चुके थे तो एक पत्नि से संतोष क्यो नही होता था! चलो अगर पुराणों की बात को ही पूर्णतः सच मान लिया जाये कि ऋषि-मुनियों के पास अप्सराओं को इन्द्र भेजता था, वो तो वैराग्य मे खुश थे! तब भी यहाँ यह सवाल उठेगा कि ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिये इन्द्र अप्सराऐं ही क्यो भेजता था? क्या इन्द्र जानता था कि ऋषियों के मन मे अप्सराओं की इच्छा है! आखिर वह अप्सराओं के बदले हीरे-मोती के ढ़ेरों आभूषण और स्वादिष्ठ पकवान भी तो भेज सकता था, जिसकी लालच मे ऋषि-मुनि अपनी साधना तोड़ देते! पर वह हर बार अप्सरा ही भेजता था, इसका कोई तो कारण होगा!

रामायण मे कुम्भकर्ण को नींद से जगाने के लिये रावण ने सुन्दर स्त्री नही भेजी थी, बल्कि स्वादिष्ठ भोजन भेजा था! क्योकि रावण जानता था कि कुम्भकर्ण को स्वादिष्ठ भोजन पसन्द है, और उसकी महक से कुम्भकर्ण जाग जायेगा! क्या इसी प्रकार इन्द्र जानता था कि ऋषियों को अप्सराऐं पसन्द है, और उनकी पायल की खनक सुनते ही इनकी साधना टूट जायेगी! उसका यह प्रयोग सच भी होता था, अप्सराओं को देखते ही ऋषि-मुनि लार टपकाने लगते थे, और अपनी वर्षो की कठोर साधना तोड़ देते थे!

आश्चर्य की बात तो यह है कि इन्ही पुराणों मे यह भी लिखा है कि जब कोई असुर तपस्या करता था, तब भी इन्द्र उनके तप को भंग करने के लिये इन्ही अप्सराओं को भेजता था! तब भी अप्सराऐं आकर अपने लटके-झटके दिखाती थी, पर कोई भी असुर इनके झांसे मे नही आता था! तो क्या यह मान लेना चाहिये कि ऋषि-मुनि असुरों से भी अधिक लंगोट के ढ़ीले थे!

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पुराणों की अश्लीलता।

एक कथा कूर्मपुराण अध्याय-37 मे लिखी है, जो निम्न है-
"एक बार भगवान शिव खुद भी नंग-धड़ंग होकर और साथ मे भगवान विष्णु को भी एक सुन्दर महिला बनाकर उन्हे भी नग्न-अवस्था मे लेकर देवदारू नामक वन मे विचरण करने लगे। उसी वन मे कई ऋषियों के आश्रम भी थे तथा उन ऋषियों की पत्नियाँ और उनके युवा पुत्र तथा पुत्रबधुऐं निवास करती थी।वन मे विचरण करते-करते शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु नंगे बदन ही उन ऋषियों के आश्रम के पास पहुँच गये। दोनो को नग्न अवस्था मे देखकर ऋषियों के पुत्र और बहुऐ स्तब्ध हो गयी! शिव नग्न-स्थिति मे भी इतने सुन्दर दिख रहे थे कि ऋषियों की जवान पुत्रबधुऐं कामातुर हो उनसे जाकर लिपट गयी और उनका आलिंगन करने लगी।
विष्णु भी स्त्रीरूप मे अपना जलवा बिखेर रहे थे, उनके गदराऐ हुस्न को देखकर तमाम ऋषिपुत्र भी विष्णु के चरणों मे जाकर गिर गये और उनसे प्रणय की याचना कर लगे। अभी यह खेल चल ही रहा था कि अचानक तमाम ऋषिगण भी वहाँ आ गये और उन्होने जब अपने पुत्रों और बहुओं को इस तरह वासनाग्रस्त स्थिति मे देखा तो अत्यन्त क्रोध किया। क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने विष्णु और शिव दोनो को अनेक प्रकार के श्राप दिये पर उनके सारे श्राप निष्फल होकर रह गये। अतः क्रोध मे आकर उन ऋषियों ने नग्न शिव और स्त्री-रूपधारी विष्णु को मारकर उस वन से भगा दिया।

अब दोनो देवदारू वन से घायल (ऋषियों की मार से) होकर वशिष्ठ के आश्रम मे आ गये! वशिष्ठ की पत्नि अरुन्धती ने दोनों देवों का बहुत स्वागत किया तथा उनके घावों पर औषधि भी लगायी। अभी घायल विष्णु और शिव का वशिष्ठ के आश्रम मे उपचार चल ही रहा था कि अचानक वशिष्ठ के शिष्यगण कहीं से आ गये और आश्रम मे नग्न महिला-पुरुष के जोड़े को देखकर उन्हे डंडे, ढ़ेलों तथा मुक्कों से मारने लगे। उन मुनियों ने क्रोध मे आकर शिव से कहा 'हे दुर्मते! तुम अपने इस लिंग को उखाड़ फेंको'। शिवजी ने कहा कि यदि आप लोगों को मेरे लिंग के प्रति द्वेष उत्पन्न हो गया है तो मै वैसा ही करता हूँ। ऐसा कहकर शिव ने अपना लिंग उखाड़कर फेंक दिया! उनके लिंग फेंकते ही सबकुछ अदृश्य हो गया और चारो तरफ अंधेरा छा गया! सूर्य का तेज मंद हो गया, समुद्र सूखने लगे और धरती कांपने लगी। अब सारे ऋषिगण परेशान होकर ब्रह्माजी के पास गये और बोले कि हे देव! दारूवन मे एक अति सुन्दर नग्न पुरुष आया था जो हमारी पत्नियों और बहुओं को दूषित कर रहा था, तथा उसके साथ एक सुन्दर महिला भी थी, जो हमारे पुत्रों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी! हम लोगों ने उसे विविध प्रकार के श्राप दिये, पर जब हमारे सारे श्राप निष्फल हो गये तब हम लोगो ने उसे बहुत मारा और उस पुरुष के लिंग को नीचे गिरा दिया। लिंग के नीचे गिरते ही सभी प्राणियों मे भय प्रदान करने वाला भीषण उत्पात मच गया!
हे ब्रह्मदेव! वह स्त्री और पुरुष आखिर कौन थे?"

अब इसके आगे लम्बी कहानी है कि ब्रह्मा ने बताया कि वे साक्षात महादेव और विष्णु थे, और फिर ऋषियों ने अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये उनके कटे हुये लिंग के समान एक दूसरा लिंग बनाकर अपने पुत्रों, पत्नियों तथा बहुओं सहित वैदिक-रीति से शिव की अराधना की और फिर सब कुछ पहले जैसा ठीक हो गया।

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पुराण में मिलावट।

पौराणिक कहते हैं की पुराण अलंकृत तरीके से लिखे गये है।

भविष्यपुराण (गीताप्रेस कोड-584) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड (पृष्ठ-343) पर तैमूरलंग द्वारा भारत पर आक्रमण की कथा लिखी है। यहाँ लिखा है कि तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण करके यहाँ के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डाली, और पुजारियों से कहा कि तुम लोग मूर्तिपूजक हो, तुम लोग शालग्राम को विष्णु (भगवान) मानते हो जबकि यह एक पत्थर है। ऐसा कहकर वह शालग्राम की तमाम मूर्तियाँ ऊँट पर लदवाकर अपने देश तातार (उजबेकिस्तान के पास का क्षेत्र) लेकर चला गया और वहाँ उसने उन मूर्तियों का सिंहासन बनवाया तथा उस पर बैठने लगा! शालग्राम की ऐसी दुर्दशा देखकर तमाम देवता दुःखी होकर इन्द्र के पास गये और बोले कि हे देवराज! अब आप ही कुछ करो। फिर क्रोध मे आकर इन्द्र ने अपना वज्र तातार देश की ओर खीचकर मारा! वज्र के प्रहार से तैमूरलंग का राज्य टुकड़े-टुकड़े हो गया और तैमूरलंग अपने सभी सभासदों समेत मृत्यु को प्राप्त हो गया।

मतलब यह पुराण कह रहा है कि तैमूरलंग का वध इन्द्र ने किया था। वैसे ही दुर्गा ने महिषासुर को मारा होगा और वैसे ही विष्णु ने भी तमाम राक्षसों को मारा होगा! अब चूँकि तैमूरलंग नाम का पात्र इतिहास मे था, अतः कुछ दशकों बाद पंडों- पुरोहितों को यह प्रचार करने मे अधिक तकलीफ नही होगी कि तैमूर को इन्द्र ने ही मारा था!

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पुराण और खेती।

श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम हल धारण करते थे, इसीलिये उनका एक नाम 'हलधर' भी था। हिन्दूधर्म के एक पुराण मे बताया गया है कि जितने लोग खेती करते थे, या हल जोतते थे, वे सबके सब घोर नर्क मे जायेंगे।

संक्षिप्त भविष्यपुराण (गीताप्रेस) उत्तरपर्व, अध्याय-214 (पृष्ठ-386) मे एक कथा लिखी है। कथानुसार एक बार नारद ने विष्णु से जिद किया कि आप मुझे अपनी माया के दर्शन कराइये। विष्णु ने नारद की बात मान ली, और दोनो ब्राह्मण का वेष बनाकर धरती पर आये। दोनो विदिशा नामक एक नगरी मे गये, जहाँ एक सीरभद्र नामक वैश्य निवास करता था। उस वैश्य ने ब्राह्मण-रूपधारी नारद और विष्णु का खूब आदर-सत्कार करते हुये विनती किया कि 'हे महात्मन्! यदि आप उचित समझे तो हमारे घर भोजन ग्रहण करें'

उस वैश्य की विनय सुनने के बाद ब्राह्मणरूपी विष्णु ने उसे आशिर्वाद दिया की तुम्हारे अनेकों पुत्र/पौत्र हो, और व्यापार तथा खेती मे खूब सफलता मिले। उक्त आशिर्वाद देकर, बिना भोजन किये ही विष्णु और नारद वैश्य के घर से चले गये! अब दोनो उसी नगरी मे थोड़ी दूर स्थित एक ब्राह्मण के घर आ पहुँचे। ब्राह्मण ने भी दोनो ही मेहमानों का खूब सेवा-सत्कार किया और भोजनादि करवाया, पर जब विष्णु उस ब्राह्मण के घर से जाने लगे तो उन्होने ब्राह्मण को आशीष देते हुये कहा कि "परमेश्वर करें कि तुम्हारी खेती निष्फल हो जाये"

विष्णु के इस अजीब व्यवहार को नारद समझ नही पाये, और उन्होने ब्राह्मण के घर से थोड़ी दूर जाते ही विष्णु से पूँछा कि "हे भगवन्! आपने वैश्य के घर भोजन भी नही किया, फिर भी उसे आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी खेती मे वृद्धि हो, और ब्राह्मण के घर भोजन करने के बाद भी उसकी खेती निष्फल हो जाने का श्राप दे दिया"। प्रभु, आखिर ये क्या रहस्य है?

तब विष्णु ने नारद से कहा- हे नारद! साल भर मछली पकड़ने से जितना पाप होता है, उतना ही पाप एक दिन हल जोतने से होता है। वह सुरभद्र वैश्य अपने पुत्र/पौत्रों के साथ इसी कार्य मे लगा है, अतः वह अपने परिवार सहित नर्क मे जायेगा! इसीलिये हमने उसके घर न विश्राम किया और न ही भोजन किया, लेकिन ब्राह्मण के घर विश्राम और भोजन दोनो किया, इसीलिये उसे ऐसा श्राप दिया जिससे वह इस पाप से बचकर मुक्ति को प्राप्त करे।

एक किसान मेहनत करके खेती करता है, तो विष्णु के कथनानुसार वह नर्क मे जायेगा, और कोई ब्राह्मण जो उसी के घर भिक्षा-स्वरूप मांगकर अन्न खाता है, वह स्वर्ग का भागीदार है। यदि इन कथाओं मे सत्यता है तो कम से कम 60% हिन्दू अब तक नर्कगामी हो चुके हैं। ब्राह्मणों ने वास्तव मे इन कथाओं को खेतिहर समाज के लोगों के मानस पर एक तगड़ा मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ने के लिये लिखा है। ताकि किसान-वर्ग को यह लगे कि वे खेती करके अधर्म का काम कर रहे हैं, और उस अधर्म से बचने के लिये खेत मे पैदा हुये फसल का एक भाग ब्राह्मणों को दान-स्वरूप देते रहें।
ऐसा गाँव-देहात मे होता भी है, जब कोई फसल कटकर तैयार हो जाती थी, तो पंडित जी खलिहानी मांगने गाँव मे आते भी थे।

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पुराण और पहाड़ो की उत्पत्ति।

वाल्मीकि ने रामायण बालकाण्ड सर्ग-36 मे लिखा है कि- "पूर्वकाल मे जब शिवजी ने पार्वती से विवाह करके अपनी रतिक्रीड़ा प्रारम्भ की तो लगातार सौ दिव्यवर्षों तक समागम करते ही रहे! इतने समागम करने बाद भी जब पार्वती को कोई गर्भ न हुआ तो देवताओं मे बड़ी बेचैनी हुई, और ब्रह्मा आदि दूसरे अन्य देवता उन्हे रोकने का उधोग करने लगे, क्योंकि देवता डर भी रहे थे कि इतने अधिक समय तक यदि समागम से शिवजी के तेज (वीर्य) से कोई महान प्राणी पैदा हो गया तो उसे रोकेगा कौन?

यही सोचकर सारे देवता शिव के पास गये और बोले कि हे महादेव! यह संसार आपके तेज (वीर्य) को धारण नही कर सकेगा, अतः अब आप क्रीडा से निवृत्त हो माँ पार्वती के साथ तप करो।  देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी मान गये, और देवों से बोले कि देवताओ! उमा सहित यदि मैने अपने तेज से अपने वीर्य को धारण कर लिया, फिर भी यदि क्षुब्ध होकर मेरा वीर्य स्खलित हो गया तो उसे कौन धारण करेगा? शिवजी की बात सुनकर देवता बोले कि हे देवेश्वर! यदि आपका वीर्य स्खलित हुआ तो उसे देवी पृथ्वी धारण कर लेगी। देवताओं की बात सुनने के बाद शिवजी ने अपना तेज छोड़ दिया, जिससे वह सारी पृथ्वी पर फैल गया। फिर शिवजी के वीर्य के प्रभाव से पृथ्वी पर श्वेत पर्वत बन गये और सरकंडों के वन भी प्रकट हो गये।

लेकिन पार्वती को यह बात बुरी लगी कि शिवजी ने देवताओं के अनुरोध पर क्रीड़ा को बीच मे ही छोड़ दिया और अपना वीर्य मेरे गर्भ के बजाय पृथ्वी पर ही स्खलित कर दिया है। फिर क्या था, पार्वती क्रोध से तिमतिमा गयी और देवताओ से बोली कि मैने पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से पति के साथ समागम किया था, परन्तु तुम लोगों ने मुझे रोक दिया। अतः मै भी तुम लोगों को श्राप देती हूँ कि तुम लोग भी संतानहीन हो जाओगे। पार्वती ने इसके बाद पृथ्वी को भी श्राप दे दिया कि तुमने मेरे पति के तेज को धारण किया, अतः भूमे! अब से तेरा भी एक रूप नही रह जायेगा"

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पुरणो में सोना चांदी की उत्पत्ति।

सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारे मे वैज्ञानिक बताते हैं कि करीब 20 करोड़ साल पहले पृथ्वी पर धूमकेतुओं की वर्षा हुई थी, और उससे पिघले खनिज ही आज सोना और चाँदी के रूप मे मौजूद है!

भागवतपुराण द्वितीयखण्ड मे सोना-चाँदी की उत्पत्ति के बारें मे पूरी कहानी बतायी गयी है-- एक बार शिवजी विष्णु से मिलने गये, और उन्होने विष्णु से निवेदन किया कि आप मुझे वही मोहिनी वाला रूप दिखा दो, जिसे देखकर असुरों ने आपको अमृत का घड़ा दे दिया था! विष्णु ने कहा कि उचित समय पर आपको वह रूप जरूर दिखा दूँगा! कुछ समय बाद एक दिन शिवजी पार्वती के साथ कहीं जा रहे थे, अचानक उन्होने एक सुन्दर स्त्री को देखा! वह स्त्री एक गेंद को उछालकर खेल रही थी, और जब वह गेंद को ऊपर उछालती तो उसके स्तन जालीदार कपड़ों से बाहर झांकने लगते थे. उसे देखते ही शिवजी मदहोश और कामातुर हो गये, शिवजी ने इतनी सुन्दर स्त्री कभी नही देखी थी! वह स्त्री कोई और नही, बल्कि मोहिनी रूप मे विष्णु ही थे। शिवजी मोहिनी को पकड़ने के लिये उसकी तरफ दौड़े, वे कामपिपासा से इस तरह व्यग्र थे कि यह भी भूल गये कि उनके साथ पार्वती भी है! शिवजी को अपनी तरफ आता देखकर मोहिनी भी उनसे दूर जाने लगी... अब तो शिवजी अपना त्रिशूल फेंककर उसकी तरफ ऐसे झपटे जैसा किसी गाय के पीछे मतवाला सांड़ भागता हो!

मोहिनी रूपधारी विष्णु भी समझ गये कि मैने 'मोहिनी' बनकर आफत मोल ले लिया है, अब अगर इस भंगेड़ी के हाथ लग गये तो मेरी सजी-सजाई हवेली खण्डहर बन जायेगी. फिर क्या था, अपनी जान बचाकर मोहिनी भी भागी!
शिवजी मोहिनी के अद्भुत सौन्दर्य को देखकर कामाग्नि मे जल रहे थे, उन्होने मोहिनी को पूरी ताकत झोककर खदेड़ लिया कि 'कहाँ तक भागकर जाओगी छम्मक-छल्लो'। शिवजी किसी कामुक घोड़े की तरह मोहिनी को पकड़ने के लिये दौड़ रहे थे, वे इतने कामातुर हो गये थे कि यूँ समझ लो कि भुसावली केला छिलके के बाहर आ गया, और शिवजी का वीर्य टपकने लगा. शिवजी का वीर्य जहाँ-जहाँ टपका, वहाँ सोने की खादाने हुई, अर्थात भागवतपुराण के अनुसार सोना और चाँदी शिवजी के वीर्य से बने हैं! अतः ऐसे ही सोना-चाँदी की उत्पत्ति हुई.

वैसे शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों की पूजा हम भारतीय करते है, और ये वीर्य टपकाने दक्षिण अफ्रीका चले गये! वैसे इस कथा से जुड़ी कुछ लोककथाऐं भी है, केरल के हिन्दुओं का मानना है कि मोहिनी ने शिव के एक पुत्र को जन्म दिया था, जिसका नाम "अयप्पा" था! केरल के हिन्दू सबसे अधिक अयप्पा की ही पूजा करते है, और वहाँ अयप्पा के कई मन्दिर हैं. जबकि भागवतपुराण की माने तो मोहिनी शिव के हाथ से निकलकर भाग गयी थी!

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धरती और मनुष्य रचना।

भगवान ने दो अरब साल पहले ब्रह्माण्ड की रचना की, फिर पृथ्वी को बनाया! पृथ्वी लुढ़क ना  जाये इसलिये उसे शेषनाग के फन पर रख दिया.जब शेषनाग जरा सा हिलते हैं तो भुकम्प आ जाता है, फूँक मारते हैं तो धरती पर आँधी आती है और जब गांजा पीकर धुआँ छोड़ते है तो धरती पर कुहरा छा जाता है.

भगवान ने पृथ्वी बनाने के बाद आक्सीजन लाने के लिये पेड़-पौधों के बीज धरती पर बोए.  हर महीने ईश्वर इफको यूरिया का छिड़काव करते थे, और जब आक्सीजन आ गयी तब ईश्वर ने मनु/सतरूपा को धरती पर मनुष्य पैदा करने के लिये भेजा. प्रथम मानव मनु ने सतरूपा को अपना आँसू पिलाया और इंसान पैदा हुऐ!

विज्ञान झूठा है जो कहता है कि मानवों का DNA अलग-अलग है। हम सब एक ही पिता की संतान है. जिस दिन सतरूपा ने जामुन खाकर मनु के आंसू पियेे, तो बच्चे काले पैदा हुऐ और अफ्रीका के नीग्रो बने, जिस दिन पपीता खाकर आंसू पिया तो बच्चे पीले रंग के चीन के लोग हुऐ! जिस दिन दूध पीकर पैदा किया तो बच्चे यूरोप के गोरे हुऐ और हम आर्यो को खरबूज खाकर पैदा किया था माता सतरूपा ने. हम सब मनु-सतरूपा की औलाद है!

द्रोपदी पाँच पतियों के होने के बाद भी सती मानी गयी, भक्ति की वजह से अन्धे धृतराष्ट्र ने भी सौ पुत्र पैदा किए. भक्ति की वजह से श्रवणकुमार के माँ-बाप अन्धे होकर भी चारधाम दर्शन करते थे, और मीरा जहर पीकर भी मरी नही जबकि दयानन्द सरस्वती टपक गये. भक्ति की शक्ति से हनुमान ने पूरी लंका फूँक दी और उनकी पूँछ का एक बाल भी नही जला.

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पंडो की पोल खोलता भविष्यपुराण

भविष्यपुराण में जितनी पुनर्जन्म की झूठी बातें लिखी है शायद किसी और पुराण मे नही होगी. भविष्यपुराण निश्चितरूप से तब लिखा गया जब भारत मे दूसरे धर्मो का प्रभाव बढ़ रहा था, और हिन्दूधर्म खतरे मे था! इसका उदाहरण यह है कि जब इस्लाम भारत मे प्रभाव मे आया तो उसका असर कम करने के लिये भविष्यपुराण मे मोहम्मद साहब को "म्लेच्छ" लिख दिया गया।

इसी भविष्यपुराण (गीताप्रेस) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड पृष्ठ-372 पर लिखा है कि- "2700 वर्ष कलियुग बीतने के बाद बलि के द्वारा भेजा गया "मय" नामक असुर धरती पर आया, और शाक्यगुरू बनकर गौतमाचार्य नाम से दैत्यपक्ष को बढ़ाने लगा, और जो उसका शिष्य होता वह 'बौद्ध' कहा जाता! जब दस करोड़ आर्य 'बौद्ध' हो गये तब अग्निवंशी राजाओं ने चतुर्वेद के प्रभाव से 'बौद्धो' को हराया तथा पुनः भारत मे आर्यो का राज स्थापित किया"

इस पुराण मे "मय" असुर गौतम बुद्ध को कहा गया है! यह शायद उस समय की बात है जब भारत मे बौद्धधर्म चरम पर था, इसीलिये इस पुराण मे "बौद्धो" को दैत्यपक्षी कहा गया है! यह पुराण यह भी मानता है कि एक समय भारत मे दस करोड़ बौद्ध थे! अब सवाल यह भी है कि फिर आखिर इतने सारे "बौद्ध" आखिर कहाँ चले गये?

इस पुराण के लेखक मुगल सम्राट औरंगजेब से भी बहुत चिढ़े थे, इसीलिये उन्होने भविष्यपुराण के इसी खण्ड के पृष्ठ-376 पर औरंगजेब को अन्धक नामक दैत्य का अवतार लिखा है!

अब सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि विष्णुपुराण गौतम बुद्ध को विष्णु का अवतार बताता है, तो भविष्यपुराण उन्हे एक असुर का अवतार कैसे बता रहा है! मतलब जब विष्णुपुराण लिखा गया तब परिस्थिति कुछ और थी, तब पौराणिक पंडो को लगा कि बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करके बौद्धधर्म पर भी कब्जा कर लेंगे और बौद्धो से बुद्ध को भी छीन लेंगे. पर जब होशियार बौद्धो के आगे उनकी ना चली और बौद्धधर्म अलग शाखा बन गया तो इन्होने द्वेषवश तथागत बुद्ध को भविष्यपुराण मे 'असुर' लिख दिया!

एक बात यह भी सोचने वाली है कि इसी प्रतिसर्गपर्व के तृतीयखण्ड के पृष्ठ-330 पर आल्हा के भाई ऊदल को श्रीकृष्ण का अंशावतार बताया गया है, जबकि इतने प्रभावशाली और समाज को नई दिशा दिखाने वाले गौतम बुद्ध को असुर का अवतार लिखा गया! यह सच है कि पुराणों मे बहुत सारा झूठ लिखा है, पर इनका गहराई से अध्ययन किया जाये तो ये हमारे इतिहास के कई रहस्यों से पर्दा भी उठाते है, और भविष्यपुराण का प्रतिसर्गपर्व भी ऐसा ही रोचक खण्ड है!

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अकबर बादशाह भविष्यपुराण में।

जिस तरह पुराणों मे राम और कृष्ण का बखान किया गया है और उनके पूर्वजन्म के बारे मे लिखा गया है, उसी तरह अकबर की भी प्रशंसा की गयी है तथा उसके पूर्वजन्म के बारे मे भी लिखा है।
       
संक्षिप्स भविष्यपुराण (गीताप्रेस, गोरखपुर) के प्रतिसर्गपर्व के चतुर्थखण्ड (पृष्ठ-373-374, चित्र-1-3) की एक कथा मे लिखा है कि अकबर पूर्वजन्म का ब्राह्मण था और वो भी शंकराचार्य के गोत्र का, पर एक भूल के कारण वह इस जन्म मे म्लेच्छ (मुसलमान) बनकर पैदा हुआ! पर पूर्वजन्म का ब्राह्मण होने की वजह से उनके कर्म महान ही रहे.

कथानुसार, प्रयाग (इलाहाबाद) मे एक मुकुन्द नामक ब्राह्मण अपने बीस शिष्यों के साथ तप करता था, पर जब उसे पता चला कि म्लेच्छ बाबर ने भारत मे आकर देवी-देवताओं की मूर्तियाँ नष्ट कर दी, तो उसने दुःखी होकर अपने सभी शिष्यों के साथ आत्मदाह कर लिया, और यही मुकुन्द ब्राह्मण अगले जन्म मे अकबर बनकर पैदा हुआ।
                   
एक तपस्वी ब्राह्मण म्लेच्छ-योनि मे कैसे पैदा हुआ, इसके पीछे भी एक कथा है?
एक बार जब मुकुन्द ब्राह्मण गाय का दूध पी रहा था तो उसने अज्ञानता-वश दूध के साथ गाय का रोम (बाल) भी पी लिया था, इसी दोष के कारण वह अगले जन्म मे म्लेच्छ बनकर पैदा हुआ। और इसी मुकुन्द ब्राह्मण के बीस चेले अगले जन्म मे बीरबल और तानसेन वगैरह बनकर उसकी सहायता के लिये जन्मे थे।

अब इस कथा मे यह भी बताया गया है कि मुकुन्द ब्राह्मण का नाम इस जन्म मे अकबर क्यों पड़ा? असल मे जब अकबर का जन्म हुआ तो हुमायूँ को एक भविष्यवाणी हुई कि "तुम्हारा पुत्र बड़ा प्रतापी और भाग्यशाली होगा, यह अक् (अकस्मात) वर (वरदान) की प्राप्ति के साथ पैदा हुआ है, इसीलिये इसका नाम 'अकबर' होगा।

खैर, यह तो सम्पूर्ण कथा थी, पर अब इस पौराणिक कथा के पीछे छुपे ब्राह्मणी पाखण्ड और झूठ को समझते हैं! पहली बात तो अकबर के नामकरण की जो बात इस पुराण मे लिखी है, तो शायद डपोरशंख पंडों को पता नही होगा कि अकबर का असली नाम "जलालुद्दीन" था! अकबर तो अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है "महान"। बादशाह अकबर उदार-हृदय का था, और इसीलिये उसे अकबर कहा जाता था।

दूसरी बात इसमे लिखा है कि हुमायूँ को आकाशवाणी हुई थी, तो विचार करो कि यह कितनी झूठी बात है? अबुल फजल ने भी "अकबरनामा" लिखी है, जो अकबर की ही जीवनी है, पर इसमे आकाशवाणी जैसा तो कोई उल्लेख नही है। इससे पता चलता है कि पौराणिक ब्राह्मण झूठ की झड़ी थे!  आप इसी से समझ लो कि इसी तरह से ही इन्होने कंस को कृष्ण के पैदा होने की भी आकाशवाणी करवाई होगी, जैसे यहाँ अकबर के जन्म पर करवा दी।

तीसरी बात, कहते हैं कि गाय के रोम-रोम मे देवताओं का वास होता है, फिर भूलवश गाय का एक रोम पी जाना कैसे दोष हो गया? ऐसे तो फिर बहुत सारे लोग म्लेच्छ बनकर पैदा होने वाले हैं, और फिर यदि गाय का रोम भक्षण करने से अगले जन्म मे गाय-भक्षण करने वाला बनकर पैदा होना है तो गाय पालने का क्या फायदा?

चौथी बात, जब मुकुन्द ब्राह्मण ने बाबर के उपद्रव की वजह से आत्मदाह किया था तो अगले जन्म मे उसी बाबर के कुल मे पैदा होना जरा अजीब लग रहा है! और यदि गाय के रोम-भक्षण की वजह से मुकुन्द ब्राह्मण मुस्लिम बना तो उसके चेले किस अपराध की वजह से अगले जन्म मे अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, फैजी, मुल्ला दो-प्याजा और अबुल फजल आदि बनकर पैदा हुये?

वास्तव मे पुराणों मे लिखी राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा और विष्णु की भी कहानियाँ मुकुन्द ब्राह्मण की कहानी की तरह कोरी गप्प है। और इन देवी-देवताओं चमत्कार की जो बातें लिखी हैं, वह भी पूर्णतः कल्पना मात्र है। ब्राह्मणों ने बड़ी चतुराई से ऐसी ही गप्प कहानियाँ गढ़कर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाया और उनका शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण किया।

वैसे यह मुकुन्द ब्राह्मण की कथा बाद मे अकबर-विरोधियों के लिये काफी परेशानी खड़ी करेगी। भारत मे एक वर्ग ऐसा भी है जो अकबर को महान नही मानता तथा उसे क्रूर और कामी बताकर उसका विरोध करता है, लेकिन इस पुराण मे अकबर की प्रशंसा की गयी है। अब अकबर के समर्थक इस कथा का अचूक-अस्त्र जैसा प्रयोग कर सकते हैं, क्योंकि मूर्खतावश ब्राह्मणों ने अकबर को ऐतिहासिक के साथ-साथ पौराणिक-पात्र भी बना दिया है।

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विरोधाभासी मनु

मनुस्मृति रामायण और महाभारत से प्राचीन है! मनुस्मृति मे कहीं भी राम और कृष्ण का कोई उल्लेख नही है, परन्तु रामायण के किष्किंधाकाण्ड मे राम ने स्वयं मनुस्मृति की प्रशंसा की है, तो महाभारत के शान्तिपर्व और अनुशासन पर्व मे भीष्म पितामह ने इस ग्रंथ का गुणगान किया है! मनुस्मृति निश्चित ही किसी काल मे सनातन धर्म की सबसे मान्य पुस्तक थी, लेकिन इस किताब मे मनु ने कई श्लोक ऐसे लिखे हैं, जो उन्ही के अन्य श्लोकों का ठीक उलट है! आइऐ, कुछ ऐसे ही श्लोकों पर नजर डालते हैं-

मनुस्मृति-3/56 मे मनु ने नारियों के सम्मान मे यह बड़ी बात कही है-
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।"
अर्थात- जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का वास होता है, और जहाँ नारियाँ कष्ट पाती है, वहाँ समृद्धि नही होती!

यहाँ तो मनु ने बड़ी उत्तम बात लिखी, पर नौवां अध्याय शुरू होते ही मनु कहते हैं कि नारियों को स्वतंत्रता मत दो, नारियां कामुक होती है!

यही नही मनु ने अध्याय-8/371 मे लिखा है-
"भर्तारं लङ्घयेद्या स्त्री ज्ञाति गुणदर्पिता।
तां श्वाभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते।।"
अर्थात- अपनी सुन्दरता और बाप-दादा के धन पर यदि स्त्री घमण्ड करे तो उसे सबके सामने कुत्ते से नोचवा डालें।

मनु का दूसरा विरोधाभास यह है कि उन्होने अध्याय-9/104 मे कहा है कि-
"ऊर्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम् ।
भजेरन्पैतृकं रिक्थमनीशास्ते हि जीवतोः।।"
अर्थात- माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी भाई धन-सम्पत्ति को बराबर-बराबर बांट लें, माता-पिता के जीते जी उन्हे धन बांटने का कोई अधिकार नही। 

इस श्लोक मे मनु पैतृक सम्पत्ति मे सभी भाइयों को बराबर को अधिकार बता रहे हैं, पर इसका ठीक अगला ही श्लोक उन्होने गांजे के नशे मे लिखा और मनु अध्याय-9/105 मे लिखते हैं-
"ज्येष्ठ एव तु गृह्णीयान्पित्र्यं धनमशेषतः। शेषास्तमुपजीवेयुर्यथैव पितरं तथा।।"
अर्थात- भाइयों मे जो सबसे श्रेष्ठ हो, वो पिता की सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति को ग्रहण करे, शेष भाई उसे पितातुल्य मानकर उसके अधीन रहें! 

आगे मनु ने मनुस्मृति-8/123-124 मे लिखा है कि राजा केवल क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को दण्ड दे, क्योंकि स्वायम्भायु मनु ने जो दण्ड विधान बताया है, वह केवल इन्ही तीन वर्णों के लिये है, ब्राह्मण के लिये नही।

लेकिन कुछ आगे बढ़ते ही मनु की अक्ल फिर ठिकाने आयी और इसी आठवें अध्याय के श्लोक-337/338 मे मनु लिखते हैं कि यदि शूद्र चोरी करे तो उससे आठ गुना, वैश्य करे तो सोलह गुना, क्षत्रिय करे तो बत्तीस गुना और ब्राह्मण करे तो उसे चौंसठ गुना या एक सौ अट्ठाइस गुना दण्ड दें!

मनु केवल इतने ही विरोधाभासी नही थे! मनु के अनुसार मांस नही खाना चाहिये, अतः मांस खाने से रोकने के लिये मनु ने लोगों को डराया है और मनुस्मृति-5/55 मे लिखा है-
"मांस भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद्म्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिणः।।"
अर्थात- जो मनुष्य इस लोक मे जिसका मांस खाता है, परलोक मे वह उसका भी मांस खाता है, यही मांस का मांसत्व है।

इसी अध्याय के श्लोक-5/35 मे मनु कहते हैं-
"नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः।
स प्रेत्य पशुतां याति संभावनेकविंशशतिम् ।।"
अर्थात- जो विधि नियुक्त होने पर भी मांस नही खाता, वह मरने के बाद इक्कीस जन्म तक पशु होता है!

मनु ने मनुस्मृति-10/65 मे लिखा है-
"शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।"
अर्थात- अपने कर्मो से ब्राह्मण शूद्र और शूद्र ब्राह्मणत्व को प्राप्त होता है!

पर इसी अध्याय के श्लोक 10/73 मे मनु लिखते हैं कि ब्राह्मण और शूद्र कभी समान नही हो सकते, अर्थात यहाँ उन्होने वर्ण-परिवर्तन को नकार दिया है।

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मनुस्मृति के आदेश।

मनु 1/100 मे लिखते हैं कि ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है, अतः सारी पृथ्वी उसी की है!

मनु मनुस्मृति-9/2 मे लिखते हैं- "अस्वतन्त्रः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशम्।"
अर्थात- पुरुष द्वारा अपने स्त्रियों को कभी स्वतंत्रता नही देनी चाहिये।

मनु ने स्त्रियों की गवाही खारिज कर दी है!  मनु ने इन्हे मान्यता ही नही दी है!
"एकोऽलुब्धस्तु साक्षी स्याद् बह्वच्य शुच्योऽपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येऽपि ये वृताः"
मनुस्मृति-8/77
अर्थात- एक निर्लोभी पुरुष भी साक्षी हो सकता है, परन्तु अनेक स्त्रियां पवित्र होने पर भी साक्षी नही हो सकती, क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है! और अन्य मनुष्य भी जो दोषों से घिरें हैं, साक्षी होने के योग्य नही होते।

स्त्रियाँ खेती हैं, मनु का यही मानना है!
मनुस्मृति-9/33 मे लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को खेत (क्षेत्र) और पुरुष को बीज (अनाज) रूप माना गया है, खेत और बीज के मिलन से जीवों की उत्पत्ति होती है।

बल्कि मनु ने 9/41 मे कहा है कि पराये खेत मे पुरुष को अपना बीज नही बोना चाहिये, और 9/49 मे कहते हैं-
"येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः।
ते वै सस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ।।"
अर्थात- जिसके पास खेत (स्त्री) नही है, वह दूसरे के खेत मे बीज बोता है तो उसमे उत्पन्न धान्य (बालक) को वह पाने का अधिकारी नही है।

स्त्री व्यभिचार कर ले तो मनु ने उसकी शुद्धि का मंत्र भी बताया है!
मनु ने 9/20 मे लिखा है- अगर कोई स्त्री की पर-पुरुष से व्यभिचार कर लेती है तो उसकी शुद्धि के लिये मनु ने एक मंत्र भी बताया है, जो निम्न है-
"यन्मे माता प्रलुलुभे विचरन्त्यपतिव्रता।
तन्मे रेतः पिता वृक्तामित्यस्यैतन्निदर्शनम् ।।"
इस मंत्र का अर्थ है - 'मेरी माता ने अपवित्रता पूर्वक घूमते हुये पराये घर मे जाकर पर पुरुष की इच्छा की, अतः उसके दूषित रज को मेरे पिता शुद्ध करें'।
मनु का यह भी दावा है कि यह वेदमंत्र है। 

मनु का मानना था कि विधवा का पुनः विवाह नही होना चाहिये! मनु ने बाकयदा 9/65 मे इसे लिखा भी है-
"नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः।।"
अर्थात- विवाह के वेदमंत्रों मे नियोग का कही उल्लेख नही है, और न ही विवाह विषयक शास्त्रों मे विधवा विवाह का उल्लेख है।

मनु ने भी 4/81 मे लिखा है-
"यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् ।
सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति।।"
अर्थात- दूसरे धर्म का उपदेश और व्रत का जो पालन करता है, वह उस शूद्र सहित असंवृत नामक अंधकारमय नरक में जा गिरता है!

अब कुछ लोग सोचेगें कि क्या मनु के समय मे दूसरा धर्म भी था, तो मै बता दूँ कि उस काल मे दस्युधर्म था, जो रक्ष संस्कृति को मानते थे और मनुस्मृति मे इसका व्याख्यान भी है!
मनु ने तो 5/89 मे यह भी कहा है कि जिन्होने अपना धर्म त्याग दिया हो, उन्हे जलाञ्जलि भी नही देनी चाहिये।

"अधिविन्ना तु या नारी निर्गच्छेद्रुषिता गृहात् ।
सा सद्यः संनिरोध्दव्या त्याज्या वा कुलसन्निधौ।।"
मनुस्मृति-9/83
अर्थात- दूसरा व्याह करने पर यदि पहली स्त्री रुष्ठ होकर घर से भागे तो उसे पकड़कर घर मे बन्द कर देना चाहिये, या उसे उसके मायके पहुँचा देना चाहिये।

मनु ने 9/88 मे लिखा है-
"उत्कृष्ठायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद्यथाविधिः।।
अर्थात- उत्तम कुल और सुन्दर वर मिल जाये तो कन्या के विवाह योग्य न होने पर भी ऐसे वर से उसका विवाह विधिवत कर देना चाहिये।

मनु 7/96 मे कहते हैं कि जो सैनिक दासी को युद्ध मे जीतकर लाता है, उस पर उसी का अधिकार है!

आगे मनु 7/194 मे लिखते हैं कि शत्रु के अन्दर खौफ पैदा करने के लिये उसके अन्न, जलायश जला दो और राज्य मे घेरा डालो।

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पौराणिकों से 31 प्रश्न।

संसार के पौराणिक विद्वानों से 31 प्रश्न-आचार्य डॉ श्रीराम आर्य हम अपने पौराणिक विद्वानों से कुछ प्रश्न चिरकाल से करते चले आ रहे है, जिनका उत...