विज्ञान और ईश्वर
यह अकाट्य सत्य है कि विज्ञानवाद के सामने ईश्वरवाद हमेशा औंधे मुँह गिरा है! विज्ञान के आने के बाद मानव जीवन मे क्रान्तिकारी बदलाव आये!-
विज्ञान के आने के बाद ईश्वर के अवतार का आना बन्द हो गया!
विज्ञान के आने के बाद ईश्वर ने धरती पर ग्रन्थ भेजना बन्द कर दिया!
विज्ञान के आने के बाद मंत्र मारने, खीर पीने और फल खाने से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
विज्ञान के आने के बाद असुरो और राक्षसों ने लोगो को सताना बन्द कर दिया!
विज्ञान के आने के बाद कभी किसी ने सूर्य को नहीं निगला है।
विज्ञान के आने से मर्दो के मुँह, नाक, कान और पैर से बच्चे पैदा होना बन्द हो गये!
विज्ञान के आने के बाद जो बन्दर,भालू और गिद्ध धाराप्रवाह संस्कृत बोलते थे, वो चींचीं और चूँचूँ करने लगे!
और तो और विज्ञान के आने से श्राप देकर सांप-बिच्छू बनाना भी बन्द हो गया!
जरा सोचो विज्ञान ने आपके जीवन मे कितने बदलाव लाये!!
तो अब जय भगवान नही, जय विज्ञान बोलो!!!!
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वेदों का ज्ञान।
भागवत जी जो कह रहे है कि वेद विज्ञान से ऊपर है वो बात एकदम सही है, पर तुम सरस सलिल पढ़ने वाले लोग वेदो की सत्ता क्या जानो। अरे ऋगवेद मे विराटपुरुष के मुँह और पैर से बच्चे का जन्म ही "जीव विज्ञान" है, यम-यमी संवाद ही "सामाजिक विज्ञान" है और इन्द्र का शराब पीना ही "रसायन विज्ञान" है! आज लोग विज्ञान के नशे मे इतना चूर है कि वेदों के महत्व को समझते ही नही. एक अरब 96 करोड़ साल पहले ब्रह्माजी ने "अल्फाल्फा" घास की कुटाई करके कागज बनाया और वेद लिखना शुरू किया और ऐ बकलोल वैज्ञानिक कहते है कि कागज की खोज 105 ई० मे चीन मे हुई!
वेदो की ऋचाओं मे बड़ी चमत्कारी शक्ति है, दो ऋचा पढ़कर शंकर जी कैलाश पर्वत पर बर्फ के बीच नंग-धड़ंग बैठे है, पर कभी उन्हे सर्दी नही हुई, चार ऋचा विष्णु जी ने पढ़ी और सब सात जन्म ही लेते है पर विष्णु जी नौ जन्म ले चुके है, अभी दसवें की तैयारी है। पहले के पशु-पक्षी भी वेद पढ़कर शुद्ध शाकाहारी थे, अन्यथा शंकर जी का सांप गणेश का चूहा खा जाता और कार्तिकेय जी का मोर शंकर जी के सांप को खा जाता. पर सब वेदो के ज्ञाता थे, अतः पास ही रहकर भी कभी झगड़े नही! पहले ऋषि-मुनि वेद पढ़कर श्राप देते थे और वो सही हो जाता था. रामजी ने थोड़ा वेद कम पढ़ा था नही तो वो भी रावण को श्राप देकर भस्म कर देते, जरूरत ही ना पड़ती वानरों को ले जाकर लंका मे कबड्डी खेलने की........
खुद मोहन भागवत भी वेदो से प्राप्त शक्ति से ही देश के प्रधानमंत्री को अपने इशारे पर घुमाते है. तो अब विज्ञान छोड़ो और वेद पढ़कर... "ब्राह्मणो_मुखमासीद********पद्भ्याम_शूद्रो_अजायते" करो...
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पूर्वजन्म और अपंग।
हमारे धर्मग्रंथ भी यह कहते हैं कि जो आज दिव्यांग है, वो पूर्वजन्म के पापी थे, और ईश्वर ने उन्हे दण्ड दिया है! फिर आखिर किस आधार पर यही ईश्वरवादी ये कहते है कि लंगड़े-लूले अपंगो की मदद करो! क्या ऐसा करके वो ईश्वर को नाराज नही कर रहे है? क्या वो ईश्वर के दण्डविधान मे हस्तक्षेप नही कर रहे हैं? आखिर अपराधी का साथ देने वाला अपराधी ही होता है, तो क्या ईश्वर इनसे रुष्ठ नही होगा?
गरुणपुराण कहता है कि जो लोग आज जन्म से ही शारीरिक अपंग है, वो पूर्वजन्म मे महापापी थे, फिर धार्मिक इन पापियों से क्यों सहानुभूति रखते हैं!
गरुणपुराण अध्याय-5 श्लोक 1 से 57 तक मे तमाम पूर्वजन्म के पापियों का वर्णन है! मै बताता हूँ कि पूर्वजन्म का पापी किस कमी के साथ जन्म लेता है।
ब्रह्महत्यारा क्षयरोगी होता है!
गौहत्यारा कुबड़ा!
कन्या हत्यारा कोढ़ी!
परस्त्री गमनकर्ता नपुंसक!
गुरूपत्नि व्यभिचारी चर्मरोगी!
गुरू का निन्दक मिरगी रोगी!
झूठी गवाही देने वाला गूँगा!
पक्षपात करने वाला काना!
पुस्तक चुराने वाला अन्धा!
ब्राह्मणों को पैर से मारने वाला लंगड़ा-लूला!
झूठ सुनने वाला बहरा!
आग लगाने वाला गंजा!
अन्न चुराने वाला चूहा!
धान चुराने वाला टिड्डी!
विष देने वाला बिच्छू!
सुगन्धित वस्तु चुराने वाला छछुन्दर!
मांस चुराने वाला गीध!
नमक चुराने वाला चींटी!
फल चोरी करने वाला बन्दर!
जूता चुराने वाला भेड़!
मार्ग मे यात्रियोंको लूटने वाला बकरा!
विषपान करने वाला काला नाग!
गायत्रीपाठ न करने वाला ब्राह्मण बगुला!
अयोग्य के घर यज्ञ कराने वाला ब्राह्मण सुअर!
बिना निमंत्रण भोजन करने वाला कौआ!
गर्भपात कराने वाला भिल्ल रोगी!
कम तौलने वाला उल्लू!
सास-ससुर का अपमान करने वाली स्त्री जोंक!
पति का अपमान करने वाली नारी जूँ!
परपुरुष से सम्बन्ध बनाने वाली नारी छिपकली!
स्त्रीलम्पट पुरुष घोड़ा होता है!
ब्राह्मण का धन लेना वाला ब्रह्मराक्षस!
अपने गोत्र की स्त्री से सेक्स करने वाला लकड़बग्घा!
शराब पीने वाला सियार!
इसके अतिरिक्त और भी कई पाप और पापयोनि लिखी है! अब आप लोग जरा सोचों कि आपने इनमे से कौन सा पाप किये है, और आप अगले जन्म किस रूप मे पैदा होंगे! मुझे यह पढ़कर भी आनन्द आया कि जितने सुअर है, ये सब पूर्वजन्म मे ब्राह्मण थे, और अयोग्य के घर यज्ञ करवा कर बेचारे सुअर बन गये!
इसलिये जितने भी धर्मात्मा हो, आप सब लूले-लंगड़ो की मदद मत करो, अन्यथा आप अन्जाने मे अपने ईश्वर को नाराज कर रहे हो!
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क्या शरीर मे आत्मा होती है।
जब दिमाग और हृदय काम करना बन्द कर देते हैं तो शरीर मे रक्त संचार रुक जाता है और ग्लूकोज की सप्लाई भी बन्द हो जाती है. जिससे मांस सड़ने लगता है, बस यही मृत्यु है! अगर हमारा हाथ-पैर कट जाता है तो आत्मा नही निकलती पर गला कटने पर क्यों निकल जाती है. आध्यात्मिक कहते हैं कि आत्मा गर्भावस्था के दौरान शरीर में प्रवेश कर जाती हैं और मृत्यु के साथ शरीर से निकल जाती है! फिर दुबारा से जन्म,परमात्मा से मिलन या प्रलय के दिन होने वाले फैसले का इंतजार करती है!
जीवाणुओं में "सुप्त आत्मायें" शरीर में पहले से मौजूद नहीं हो सकती क्या?
गरुणपुराण के अनुसार मृतात्मा को कर्मानुसार तरह-तरह के कष्ट झेलने पड़ते है, कभी नर्क पकोड़े की तरह उबाला जाता है तो कभी आरी से काटा जाता है, इस पुराण मे नर्क के कष्ट का पूरा "मेन्यूकार्ड" है. अब इस कष्ट से बचने का उपाय भी इसी पुराण मे है.. अगर आप ब्राह्मण को गौदान करोगे तो आपके परिजन की आत्मा "वैतरणी" नदी पार कर जायेगी, अगर आप ब्राह्मण को भोजन और दान-दक्षिणा से तृप्त करोगे तो मृतक की आत्मा को यमदूत कष्ट नही देगे अर्थात मृत्यु पश्चात भी करोबार चलता रहे इसके लिऐ आत्मा बनायी गयी.
गरुणपुराण मे पाँच प्रकार के नर्को का वर्णन है..
रौरव नर्क! महारौरव नर्क! कण्टकावन नर्क! अग्निकुण्ड नर्क! पंचकष्ट नर्क!
अब इन कष्टदायी नर्कीय यातना से बचने के लिऐ तमाम प्रकार के दान-दक्षिणा वाले उपाय भी है. असल मे आत्मा का अस्तित्व बनाया ही इसीलिऐ गया कि अपने पित्रो की आत्मा को नर्क से बचाने के लिये परिजन तमाम कर्मकाण्ड और दान-दक्षिणा आसानी से करेगे, बस यही आत्मा का सच है. गीता मे श्रीकृष्ण कहते है कि आत्मा कभी नही मरती. अरे माधव मरेगी तो तब जब वो होगी ना!
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सती प्रथा का सच।
सती प्रथा का मतलब होता है ऐसी प्रथा (परम्परा) जो 'सती' द्वारा चलायी गयी!
शिवपुराण मे एक कथा आती है कि शिव की पत्नी सती के पिता "दक्ष" ने अपने ही दामाद शिव का अपमान किया था! देवी सती अपने पति का अपमान सहन ना कर सकी और हवनकुण्ड मे कूदकर खुद को आग की लपटों से भस्म कर दिया!
पति के सम्मान के लिये सती का यह बलिदान एक परम्परा बन गयी, पुरातनकाल मे जब कोई महिला विधवा होती थी, तब वह अपने पति के साथ ही चिता पर बैठकर जल जाती थी, और पंडे ऐसी महिला का दर्जा देवी 'सती' के बराबर मानते थे!
महाभारत मे पाण्डु की पत्नि माद्री भी पाण्डु के साथ सती हुई थी, और यही से यह क्रूर प्रथा प्रबल हो गयी। सोचने की बात तो यह है कि दशरथ की पत्नियाँ कौशिल्या, कैकेयी और सुमित्रा दशरथ के साथ सती नही हुई थी! तो क्या वो 'पतिव्रता' नही थी?
यह प्रथा हिन्दू समाज मे निर्विरोध रूप से सन् 1829 तक चलती रही, इसके बाद अंग्रेजों ने इस पर रोक लगा दी और यह परम्परा लगभग बन्द हो गयी! इस प्रथा के विरोध मे राजा राममोहन राय और लार्ड विलियम बैटिंक ने बहुत लड़ाई लड़ी!
यह रिवाज निश्चित रूप मे हिन्दू समाज पर कलंक था, पर अब कुछ हिन्दू धर्माधिकारी कहते हैं कि यह प्रथा कभी भी धार्मिक प्रावधान नही थी!
लेकिन गरुणपुराण उन पंडो के झूठ को उजागर कर रहा है!
गरुणपुराण/अध्याय-10 श्लोक-35 से 56 तक मे लिखा है-
"पति की मृत्यु के बाद पतिव्रता नारी को पति के साथ ही परलोकगमन करना चाहिये, महिला लज्जा और मोह त्यागकर श्मशान भूमि मे जाये, चिता की परिक्रमा करके महिला चिता पर चढ़े और अपने पति को गोद मे लिटाये, तथा अग्नि को गंगाजल समान मानकर खुद को पति के साथ भस्म कर ले"
यह सब कितनी बेशर्मी और निर्दयिता के साथ लिखा गया है, जैसे महिला जीवन का कोई महत्व ही नही है! इस पुराण मे यह कहीं नही लिखा है कि यदि पत्नि पहले मर जाये तो पति उसके साथ चिता पर लेटे, पर पत्नियों के लिये ऐसी बेरहम बातें लिखी है!
अब सवाल यह है कि यदि महिला गर्भवती हो तो भी क्या उसे 'सती' होना चाहिये?
इस पर इसी अध्याय के 41 वें श्लोक मे लिखा है कि महिला पहले प्रसव करके पुत्र पैदा कर दे, उसके बाद उसे 'सती' हो जाना चाहिये!
इसी पुराण 54वें श्लोक मे महिला को डराया भी गया है कि "यदि वह क्षणमात्र होने वाली पीड़ा के कारण सती होने का सुख नही भोगती है तो वो महिला जन्म- जन्मातर तक विरहाग्नि मे जलती रहती है, और जो महिला सती हो जाती है वह 14 इन्द्रों के कार्यकाल तक स्वर्ग मे पति के साथ रमण करती है!
अग्नि केवल महिला के शरीर को जलाती है, पर आत्मा को पीड़ा नही होती! नारी अमृत समान अग्नि मे जलकर पवित्र हो जाती है, और उसके सारे पाप भी नष्ट हो जाते है! यदि महिला ऐसा नही करती तो वह नारी ऋण मे उत्तीर्ण नही होती!"
इस पुराण से यह स्पष्ट हो जाता है कि पंडे महिला को सती होने पर स्वर्ग का लालच देते थे, और इनकार करने पर नर्क की अग्नि का डर दिखाकर उसकी निर्मम हत्या करते थे! पंडे महिला से कहते थे कि सती होने से तुम्हारे कुल का गौरव बढ़ेगा और अगले जन्म मे शीघ्र ही अपने पति से तुम्हारा मिलन होगा!
बस ऐसी ही बातों से विधवा नारी को सम्मोहित किया जाता था! सती प्रथा पंडो की क्रूरता का और छोटा सा उदाहरण मात्र है, पंडे पूर्वकाल मे ऐसे दर्जनों जघन्य अपराध धर्म की आड़ मे करते थे!
सती प्रथा का उल्लेख "नारदपुराण अध्याय-7" मे भी है, पर वहाँ जरा सा रहम किया गया है! नारदपुराण अध्याय-7/52 के श्लोक मे लिखा है-
"बालापत्याश्च गर्भिण्यो ह्यदृष्टऋतवस्तथा।
रजस्वला राजसुते नारोहन्ति चिंता शुभे।।"
अर्थात- जिस महिला की संतान बहुत छोटी हो, जिसकी उम्र इतनी कम हो कि उसे अभी तक माहवारी ना शुरू हुई हो, जो गर्भवती हो, और जिसे माहवारी आ रही हो, उसे पति के साथ चिता पर नही चढ़ना चाहिये।
नारदपुराण ने तो जरा सा दयाभाव भी दिखा दिया है, पर गरुणपुराण तो विधवा को जलाने पर ही उतारू है.
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पुराणों में बुद्ध।
गौतम बुद्ध को लेकर पौराणिकों मे सदैव दो मत रहे हैं। कुछ पौराणिक चाहते थे कि बुद्ध को विष्णु का अवतार बनाकर हिन्दूधर्म का ही अंग घोषित कर दे, और कुछ बुद्ध से काफी चिढ़े थे तो उनके लिये अपशब्द ही बोलते थे। वायुपुराण, विष्णुपुराण और नरसिंहपुराण ने खुले तौर पर बुद्ध को विष्णु का अवतार माना तो भविष्यपुराण ने बुद्ध को आसुरी-स्वरूप घोषित कर दिया।
भविष्यपुराण (गीताप्रेस कोड-584) प्रतिसर्गपर्व चतुर्थखण्ड (पृष्ठ सं-372) मे लिखा है कि "2700 साल कलियुग बीत जाने के बाद बलि नामक असुर के द्धारा भेजा गया 'मय' नामक असुर धरती पर आया! वह असुर शाक्यगुरू बनकर दैत्यपक्ष को बढ़ाने लगा और जो उसका शिष्य होता उसे 'बौद्ध' कहा जाता। उसने तमाम तीर्थों पर मायावी यन्त्रों को स्थापित कर दिया था, जिससे जो भी मानव उन तीर्थों पर जाता वह 'बौद्ध' हो जाता। इससे चारों तरफ बौद्ध व्याप्त हो गये और दस करोड़ आर्य बौद्ध बन गये।"
इस पुराण मे जिस "मय" असुर का वर्णन है, वह कोई और नही बल्कि गौतम बुद्ध है! इस पुराण मे बुद्ध को मानने वाले बौद्धों को "दैत्यपक्षी" कहा गया है। भविष्य पुराण के इस कथन से यह स्पष्ट है कि पौराणिकों को बुद्ध से किस कदर चिढ़ थी कि उन्हे दैत्य ही घोषित कर दिया। जबकि इसके पूर्व के पुराणों ने बुद्ध को विष्णु का अवतार माना है।
नरसिंहपुराण अध्याय-36 श्लोक-9 मे लिखा है- "कलौ प्राप्ते यथा बुद्धो भवेन्नारायणः प्रभुः" अर्थात- कलियुग प्राप्त होने पर भगवान नारायण बुद्ध का रूप धारण करेंगे।
इसी नरसिंहपुराण मे एक अन्य स्थान पर बुद्ध को राम का ही वंशज तथा सूर्यवंशी भी बताया गया है। इस पुराण के 21वें अध्याय मे लिखा है कि राम के पुत्र लव, लव के पुत्र पद्म, पद्म के पुत्र अनुपर्ण, अनुपर्ण के पुत्र वस्त्रपाणि, वस्त्रपाणि के पुत्र शुद्धोधन और शुद्धोधन के पुत्र गौतम बुद्ध हुये। अर्थात राम की छठवीं पीठी मे बुद्ध पैदा हुये थे।
वैसे अगर इसे पूर्ण सच मान लिया जाये तो फिर राम का समय आज से लगभग तीन हजार साल के आसपास का ही होता है! यदि बुद्ध अब से ढ़ाई हजार साल पहले थे तो उनके छः पूर्वज अधिकतम छः सौ साल और पूर्व होगे, जो लगभग ईसा से 1100 सौ वर्ष पूर्व का हो सकता है! अब यह गणना इतनी कम है, अतः सनातनी इसे मानने से तुरन्त इनकार कर देंगे। यहाँ मै आपको एक बात और बता दूँ कि नरसिंहपुराण हिन्दूधर्म के 18 पुराणों मे नही आता। यह एक उपपुराण है, अतः अधिकांश लोग यही मानते हैं की इसमे मिलावट नही है।
अब सोचना यह है कि यदि इतने पुराणों मे बुद्ध को विष्णु का अवतार कहा गया है तो सबसे अन्त मे लिखे गये भविष्यपुराण मे उन्हे असुर क्यों कहा गया? इसी भविष्यपुराण प्रतिसर्गपर्व के तृतीयखण्ड मे आल्हा के भाई ऊदल को कृष्ण का अवतार कहता है, पर इतने बड़े समाज-सुधारक तथागत बुद्ध को असुर बताता है।
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आत्मरक्षा में हिंसा।
तथागत बुद्ध हमेशा हिंसा के विरुद्ध थे, लेकिन सदा ही न्याय के पक्ष मे थे! पर जहाँ न्याय के लिये हिंसा जरूरी हो, वहाँ क्या किया जाये, यह बड़ा सवाल उनके सामने भी आता था?
एक बार वैशाली के मुख्य सेनापति ने आकर बुद्ध से पूँछा- भगवन्! आप अहिंसा का उपदेश देते हो। आपके अनुसार क्या एक अपराधी को दण्ड से मुक्त रखा जाये? भगवन्! क्या हम अपने बीवी, बच्चे और धन की रक्षा के लिये युद्ध न करें?
क्या हम सभी प्रकार के युद्ध से विरत होकर अहिंसा के नाम पर अपराधियों द्वारा सताये जायें?
तब बुद्ध ने उत्तर दिया- हे सेनापति! आपने मेरे उपदेशों का गलत अर्थ लिया है। एक निर्दोष व्यक्ति की रक्षा होनी चाहिये पर अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिये। अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी को दोष नही होता, क्योंकि सजा का कारण तो अपराधी का स्वयं का कृत्य है। कोई व्यक्ति जो न्याय के लिये लड़ता है वह अहिंसा का दोषी नही होता, इसी तरह अपराधी को सजा देने से दण्डाधिकारी दोषी नही माना जायेगा। यदि शांति स्थापित करने के सारे प्रयास विफल हो जाये तो हिंसा का उत्तरदायित्व युद्ध प्रारम्भ करने वाले पर होता है। शांति स्थापित करने के लिये युद्ध हो सकता है, पर युद्ध कभी स्वार्थ-सिद्धि के लिये नही होना चाहिये।
तथागत बुद्ध ने इन बातों से बहुत कुछ साफ कर दिया था। वे हिंसा के विरोध मे जरूर थे, पर न्याय की रक्षा के लिये हथियार उठाने को हिंसा नही मानते थे। लगभग यही बातें सारे महापुरुषों के जीवनकाल मे घटी है, पैगम्बर मोहम्मद ने कई युद्ध ऐसे किये जो प्रतिरक्षा मे थे, लेकिन कई बार वो धर्म का विस्तार करने के लिये छोटे-छोटे कबीलों पर हमले करते थे, जो शायद अनुचित-कृत्य था!
श्रीकृष्ण ने भी अपने जीवन मे कभी किसी पर हमला नही किया, बल्कि दूसरों ने उन पर आक्रमण किया और वो आत्मरक्षा के लिये युद्ध करते रहे। पर एक बार इन्होने भी यह अनुचित-कृत्य किया है! दरअसल इनकी पत्नि सत्यभामा ने एक बार इनसे कहा कि- "हे सइयां! हमको पारिजात का फूल चाहिये"। फिर क्या था... इन्होने कहा "हे गोरी! फूल क्या, हम तुम्हे पूरा पारिजात का पेड़ ही लाकर देंगे"
इसके बाद कृष्ण मे अमरावती पर हमला कर दिया! समझ नही आता कि कृष्ण को इतना बड़ा जोरू का गुलाम बनने की क्या जरूरत थी?
बाइबल (न्यू टेस्टामेंट) Luke-22/36 मे जीसस ने भी कहा है कि "जिसके पास तलवार नही है, उसे अपना अंगरखा (वस्त्र) बेंचकर भी तलवार लेनी चाहिये"
शायद जीसस भी आत्मरक्षा के लिये ही तलवार खरीदने की सलाह दे रहे थे। अब तलवार से कोई सब्जी तो काटेगा नही.
तथागत बुद्ध की बात सही थी, अगर शांति-स्थापना के लिये तलवार उठाना पड़े तो जरूर उठाये, पर स्वार्थ-निहित हिंसा कभी नही करनी चाहिये। कुल मिलाकर यही सच है कि आत्मरक्षा के लिये यदि हिंसा होती है तो कोई बात नही, पर कभी धर्म-विस्तार के लिये, या अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिये हिंसा का मार्ग उचित नही हो सकता।
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अम्बेडकर की किताबों में गलतियां और आडंबर।
अम्बेडकर जी की एक ऐसी ही कृति है "भगवान बुद्ध और उनका धम्म"। इस किताब मे अम्बेडकर ने तथागत बुद्ध की पूरी जीवनी और उनके उपदेशों को लिखा है. अम्बेडकर इस किताब मे गौतम बुद्ध के जन्म के संदर्भ मे लिखते हैं कि..
एक बार महामाया (बुद्ध की माँ) किसी उत्सव मे गयी थी, और उन्हे वहाँ निद्रा आ गयी! फिर उन्होने स्वप्न देखा कि कुछ देवता आये और उन्हे उठाकर एक सुन्दर उपवन मे ले गये! वहाँ उन देवताओं और उनकी देवियों ने महामाया का खूब स्वागत-सत्कार किया, फिर एक 'सुमेध' नामक देवता ने आकर महामाया से प्रार्थना की, और कहा- "हे देवी! मै धरती पर अपना अन्तिम अवतार लेना चाहता हूँ, क्या आप मेरी माँ बनोगी? महामाया ने हाँ कर दिया, और वही सुमेध ही नियत समय पर बुद्धरूप मे पैदा हुये"
इतनी बड़ी पाखण्ड नौवें पृष्ठ पर ही कर दी है, पर बाबासाहब और आगे लिखते हैं कि जब बुद्ध पैदा हुये तो आकाश मे देवता 'बुद्ध, बुद्ध' के नारे लगा रहे थे, और 'असित' नामक एक महर्षि ने पूरे जम्बूद्वीप पर दिव्यदृष्टि से देखा तो उन्हे पता चला कि बुद्ध पैदा हो चुके है!
डा० अम्बेडकर को 'बाबासाहब' उपनाम मिला था, और "बाबा" शब्द सही मे पाखण्ड का पर्याय होता है, फिर अम्बेडकर इस "बाबा" शब्द के प्रकोप से भला कैसे बच पाते!
अम्बेडकर ने तो इस किताब मे बाकयदा ब्राह्मणों का गुणगान किया है, और लिखा है कि देवी महामाया ने गर्भधारण करने के बाद आठ ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन कराया और सोना-चाँदी दान किये! और इन ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी भी की कि आपके घर एक प्रतापी पुत्र पैदा होगा! अम्बेडकर ने तो तथागत बुद्ध को ब्राह्मणों का आशिर्वाद और एक देवता का अवतार ही बता डाला है, और बिडम्बना तो देखो कि बामसेफी आशिर्वाद और अवतारवाद का विरोध करते हैं!
बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर की सबसे विवादित और चर्चित किताब है "Riddles in hinduism"। जब मै यह किताब पढ़ रहा था तो इसके पृष्ठ-301 (सम्यक प्रकाशन) पर बाबासाहब ने कृष्ण और यदुवंशियों पर बड़े गम्भीर आरोप लगाये है!
डा० अम्बेडकर लिखते है कि- "यादव बहुपत्नीक थे, लेकिन श्रीकृष्ण के पूर्वज पुत्रीमैथुन करते थे! बाबासाहब ने मत्स्यपुराण का उदाहरण देते हुये लिखा है कि कृष्ण के पूर्वज तैत्तिरि ने अपनी पुत्री से शादी करके नल नामक पुत्र पैदा किया था! डा० अम्बेडकर यही नही रुके, उन्होने कृष्ण/जामवन्ती पुत्र साम्ब पर आरोप लगाया कि वह अपनी माँ से ही सहवास करता था, और अवैध रूप से श्रीकृष्ण की अन्य पत्नियों के साथ रहता था"
बाबासाहब ने यह बात #मत्स्यपुराण के हवाले से कही है, तो मैने सारा "मत्स्यपुराण" पढ़ डाला, पर मुझे ऐसा कहीं नही मिला! मैने गीताप्रेस (कोड-0557) वाली मत्स्यपुराण पढ़ी है।
यही नही बाबासाहब ने इसी किताब के पृष्ठ-214 पर कुम्हारों को "ब्राह्मण पिता और वैश्य माता" की संतान बताया है!
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यीशु मसीह।
जीसस के बारे मे पादरी गैंग दो बातें बहुत प्रचारित करती हैं- पहली की वे ईश्वर के पुत्र थे! दूसरी की वे बहुत दयालु थे!
सबसे पहले हम पहली बात पर नजर डालते हैं। जैसा कि बाइबल मैथ्यू-3/17 मे लिखा है कि बाइबल के परमेश्वर (यहोवा) ने स्वयं आकाशवाणी करके कहा कि "यह (जीसस) मेरा पुत्र हैं, और मै इससे अत्यन्त प्रसन्न हूँ"
एक अप्रमाणिक आरोप लगाया जाता है कि New testament (Luke) मे जीसस के गुमनाम पिता की तरफ ईशारा किया गया है! जीसस खुद को ईश्वर का पुत्र ही घोषित करते रहे। यही बात यहूदियों को बहुत नागवर लगती थी। जब येरुसलम के गर्वनर पोण्टियास पॉलेट (पिलातुस) ने यहूदियों से कहा कि इसका (जीसस) अपराध इतना भी बड़ा नही है कि इसे मृत्युदंड दिया जाये, तब यहूदियों ने पिलातुस से कहा- "हमारी भी एक व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार वह मारे जाने योग्य है, क्योंकि उसने अपने-आपको परमेश्वर का पुत्र बताया है।"
(यूहन्ना-19/7 चित्र-1)
बाइबल में किसे मिलावट हुई है जानते है। बाइबल Luke-23/34 मे लिखा है कि "यीशु ने कहा, हे पिता! इन्हे क्षमा कर, क्योंकि ये नही जानते कि ये क्या कर रहे हैं"। लेकिन इसी बाइबल (ल्यूक-19/27 चित्र-2) मे जीसस ने कहा है "परन्तु मेरे उन दुश्मनों को जो नही चाहते थे कि मै उन पर राज करूँ, उनको यहाँ लाकर मेरे सामने मार डालो।" जीसस कहते थे कि मै केवल यहूदियों के मार्गदर्शन के लिये आया हूँ, साथ ही गैर यहूदियों को "कुत्ता" भी कहकर सम्बोधित करते थे। बाइबल (मैथ्यू-15/23-27 चित्र-3) की कथानुसार एक बार एक सामरी (गैर-यहूदी) महिला मे जीसस से अपनी पुत्री के लिये प्रार्थना करने को कहा! पहले तो जीसस ने अनसुना कर दिया, लेकिन जब उनके चेलों ने निवेदन किया तब जीसस ने कहा कि "लड़को (यहूदियों) की रोटी लेकर कुत्तों (गैर-यहूदियों) के आगे डालना उचित नही". यह सुनकर वह सामरी महिला जीसस के पैरों मे गिरकर बोली "हे प्रभु! कुत्ते भी तो मालिक का वही चूरचार खाते हैं जो उनके स्वामियों की मेज पर से गिरते हैं।". इतना गिड़गिड़ाने के बाद तब कहीं जाकर दयालु ईशपुत्र को दया आयी।
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जीसस और सूली।
ईसाई कहते हैं कि जीसस हम मानवों के लिये क्रास पर चढ़ गये, पर यह भी सरासर झूठ है। बाइबल (मैथ्यू-27/46-50, चित्र-1) मे लिखा है कि जब जीसस को क्रास पर लटकाया गया, तब वे अपने पिता (यहोवा) से कह रहे थे कि आपने मुझे क्यों छोड़ दिया। अर्थात जीसस अपने प्रभु से अपनी जान बचाने के लिये प्रार्थना कर रहे थे और बाद मे जोर से चिल्लाकर उन्होने अपने प्राण त्याग दिये।
ईसाइयों का सबसे बड़ा झूठ तो इसके बाद शुरू होता है, जब वे कहते हैं कि जीसस मृत्यु के बाद तीन दिनों के अन्दर ही फिर जी उठे थे। यह झूठी कहानी भी केवल इसलिये गढ़ी गयी ताकि जीसस को ईशपुत्र घोषित किया जा सके, जबकि बाइबल मे जैसा लिखा है, उससे तो लगता है कि यह कहानी पूर्ण-फर्जी है।
असल मे जीसस जब जीवित थे तो वे अपने चेलों को एक अन्य नबी 'योना' की कहानी बताते थे, जिस कहानी मे योना तीन दिन मछली के पेट मे रहने के बाद यहोवा की कृपा से पुनः बाहर आ जाते हैं। यह कहानी बाइबल के योना नामक अध्याय मे लिखी है!
इसी कहानी के आधार पर जीसस भी कहते थे कि यदि मै मर गया तो तीन दिन के भीतर ही पुनः कब्र से बाहर आ जाऊँगा। (मैथ्यू-12/39-40, चित्र-8)। जब पिलातुस ने जीसस को मौत की सजा सुनाई तब उसके कुछ सैनिकों ने पिलातुस से कहा कि हे महाराज! वह धूर्त (जीसस) कहता था कि मै तीन दिन के भीतर पुनः जीवित हो जाऊँगा, कहीं यह बात सत्य न हो जाये। तब पिलातुस ने अपने सैनिकों से कहा था कि उसकी कब्र पर पहरा दो। अब यदि सैनिक कब्र पर पहरा दे रहे थे तो सब्त की अगली सुबह ही मरियम कैसे कब्र पर गयी और जीसस कैसे कब्र से बाहर आये?
यह कहानी भी बाइबल (मैथ्यू-27/62-66, चित्र-2) मे साफ लिखी है। मतलब जीसस के पुनः जीवित होने की कथा भी सरासर झूठ है। वैसे जीसस को ईशपुत्र तो दूर एक महामानव कहना भी उचित नही होगा क्योंकि जीसस हमेशा खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ समझते थे।
जीसस ने (जॉन-10/8, चित्र-3) मे कहा है कि मै ही सबसे अच्छा चरवाहा (मार्गदर्शक) हूँ। मुझसे पहले जितने (नबी) आये थे, वे सब चोर-डाकू थे। साफ था कि जीसस खुद अपने ही पूर्वजों का भी सम्मान नही करते थे, वैसे भी मै बाइबल को घृणित बातों का एक गुच्छा मात्र ही समझता हूँ।
उदाहरण के लिये बाइबल के कुछ आदेश नीचे लिख रहा हूँ- यहोवा आदेश देते हैं कि मनुष्य के मल पर भोजन बनाओ! (यहेजकेल-4/15, चित्र-4)
मूसा (Moses) कहते हैं कि जितनी भी स्त्रियों का विवाह हुआ है उन्हे मार डालो, और जो कुवाँरी हैं, उन्हे पकड़कर मौज-मस्ती करो। (गिनती-31/17-18, चित्र-5)
मूसा कहते हैं कि जो सब्त (यहूदियों का शनिवार और ईसाइयों का रविवार) के दिन काम करे, उसे जान से मार डालो! (निर्गमन-35-2, चित्र-6)
दरअसल यहूदी मान्यता के अनुसार यहोवा ने छः दिन (रविवार से शुक्रवार) मे पूरी दुनिया बनाई, और सातवे दिन (शनिवार) को आराम किया। प्रारम्भ मे ईसाई भी शनिवार को ही सब्त मानते थे, परन्तु बाद मे जीजस के पुनः जीवित होने वाले दिन (रविवार) को सब्त मान लिया, और इसीलिये ईसाई रविवार को छुट्टी रखते हैं।
यहोवा कहते हैं कि मै तुम पर तलवार चलवाऊँगा और तुम्हारे पूजा के स्थानों का नाश करूँगा, तुम्हारी वेदियाँ उजड़ेगी और सूर्य की मूर्तियां तोड़ दी जायेगी! (यहेजकेल-6/3-4, चित्र-7)
इसके अलावा बाइबल के एक और बड़े नबी याकूब (Jacob) एक महिला को बहला-फुसलाकर उससे दुष्कर्म करते हैं। (2- Samuel-11/2-25) याकूब का बेटा भी अपनी ही सगी बहन का बालात्कार करता है। (2-Samuel-13/1-25)
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अवेस्ता
अवेस्ता में राम का नाम कई बार आया है। अवेस्ता के एक अध्याय मे जब पारसियों के ईश्वर अहुर मज्दा अपने पुत्रों (पारसियों) को सम्बोधित करते हैं तो कहते हैं कि "पोऊरु खाथ्रेम बवाहि यथ रामनो" अर्थात- राम की तरह पूर्ण क्षत्रिय हो जाओ। (पृष्ठ-424, चित्र-1)
यही नही, जब पारसियों की शादी होती है तो पारसियों मे भी शादी-विवाह लगभग हिन्दू रीति-रिवाजों जैसा ही होता है! हिन्दू भी अग्नि को पवित्र मानते हैं और पारसी भी। जब पारसियों की शादियाँ होती है तो शादी सम्पन्न होने के बाद लोग अवेस्ता के ही जिंद (मंत्र) पढ़कर वर और वधू को आशिर्वाद देते हैं।
जहाँ लोग वर को आशिर्वाद देते समय कहते हैं कि "सदैव दीनशील हो, जरथुस्त्र की शिक्षाऐं ग्रहण करो, ऐसे ही आगे चलकर वर को आशिर्वाद देते हुये कहते हैं कि "रामः शाश्वतं आनन्दं" अर्थात राम की तरह सबको आनन्दित करो। (संस्कृत संस्करण अवेस्ता, पृष्ठ-515, चित्र-2)
अवेस्ता इतिहासकारों के अनुमान से लगभग 3,500 साल पुरानी किताब है, अतः इसमे राम का वर्णन होना यह बताता है कि यह किताब राम के बाद लिखी गयी।
दूसरा आश्चर्य तो यह है कि इसमे कृष्ण का नाम नही है! शायद कृष्ण का जन्म अवेस्ता के बाद हुआ हो....
उदाहरण के लिये जैसे रामायण मे कृष्ण का जिक्र तक नही है, पर गीता मे राम का नाम आता है। स्वयं कृष्ण ही अर्जुन से कहते हैं कि " हे पार्थ! मै सभी शस्त्रधारियों मे राम हूँ" (गीता-10/31)
अवेस्ता मे राम का नाम आना इस बात का ठोस प्रमाण है कि किसी समय भारत और ईरान की सभ्यताऐं एक ही थी।
पहले ईरान मे पारसीधर्म था, बाद मे मुसलमानों के अतिक्रमण ने पारसियों और उनके धर्म को कुचल दिया, तथा कुछ पारसी किसी तरह अपनी जान बचाकर भारत (गुजरात) आ गये।
अवेस्ता की लेखनशैली वेदों से इतनी मिलती है कि आप यदि एक बार अवेस्ता पढ़ो तो आपको भ्रम हो जायेगा कि आप ऋगवेद ही पढ़ रहे हो! अवेस्ता मे वेदों की तरह ऋचायें तो हैं ही साथ ही इन्द्र, चन्द्र और मित्र जैसे देवताओं के नाम भी हैं।
यही नही, अवेस्ता मे चातुष्यवर्ण व्यवस्था भी है जो ऋग्वेद के पुरुषसूक्त मे भी लिखी है।
अवेस्ता के एक अध्याय जिसे "आफरीन अषो जरथुस्त्र" कहते हैं, उसमे लिखा है कि अवेस्ता का ईश्वर (अहुर मज्द) जरथुस्त्र (पारसी धर्म के प्रवर्तक) से कहते हैं कि "हमारे दस पुत्र हुये! उनमे से तीन अर्थवान (अथर्वऋषि जैसे ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण) तीन रथेस्टार (क्षत्रिय) तीन वास्त्रेय (व्यापारी अर्थात वैश्य) हुये, और दसवां पुत्र हुतोक्ष (कुशल कारीगर अर्थात शूद्र) हुआ।
हांलाकि पारसियों के ईश्वर अहुर मज्द ने दसवें पुत्र की बहुत प्रशंसा भी की है और कहा कि मेरा यह पुत्र चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान, अग्नि जैसा चमकदार, इन्द्र की तरह शत्रुओं का दमन करने वाला और राम की तरह आदरणीय होगा।"
अवेस्था कि वर्णव्यवस्था ठीक वेदों जैसी ही है, बस वैदिक-वर्णव्यवस्था मे शूद्र को निम्न दिखाया गया है, जबकि अवेस्ता का ईश्वर शूद्र को ही सबसे अधिक प्रेम करता है।
अब यहाँ सवाल यह उठता है कि अवेस्ता वेदों से इतनी अधिक मिलती कैसे है?
क्या वेदों की नकल करके अवेस्ता बनी, या अवेस्ता की नकल करके वेद बने?
वैसे भी ज्योतिबा फुले ने बहुत पहले अपनी किताब "गुलामगीरी" मे यह दावा किया था कि आर्य ईरान से भारत आये थे, जबकि दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य भारत से दूसरे देश जैसे कि ईरान वगैरह मे गये।
आज के बामसेफी भी यही कहते हैं कि ईरान से आर्यों की तीन जातियाँ (अथर्वा, रथाइस्ट और वस्तारिया) भारत मे आये! रामायण की भी माने तो राजा दशरथ की पत्नि कैकेयी ईरान की ही थी। वही पुरातन शोधकर्ताओं की माने तो ब्रह्मा भी ईरान के एक प्रदेश (प्राचीन सुषानगर) के थे। अवेस्ता मे तो ईरान का प्राचीन नाम "अइर यान वेज" अर्थात "आर्यों का देश" बताया भी गया है।
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ईरानी आर्यों में वर्ण व्यवस्था
ईरान के आर्यों में चार वर्ण होने के बाद भी चौथे वर्ण यानि शूद्र को सबसे अधिक सम्मान दिया गया है। हजारों साल से पहले इर्रान में आर्य धर्म मौजूद था , आज इन आर्यों को पारसी कहा जाता है , इनका पवित्र ग्रन्थ जेन्द अवेस्ता है , जो अवेस्ता भाषा में है , अवेस्ता भाषा बिलकुल वैदिक संस्कृत से मिलती है ,"जेन्द " का अर्थ "छंद " है , इसलिए वेदों के मन्त्रों को छंद कहा जाता है ,अवेस्ता भाषा में ईरान को "अइर यान वेज "अर्थात "आर्यानवर्ष "अर्थात आर्यों का देश कहा गया है।
1-अवेस्ता में चार वर्ण
पारसी धर्मग्रन्थ "खोरदेह अवेस्ता में आखिर में एक अध्याय है जिसका नाम है, आफरीन अषो जरदुश्त। इसमें चार वर्णो के बारे में अवेस्ता भाषा में जो लिखा है उसे हिंदी लिपि में दे रहे हैं
"जायाऐ न्ते हच वो दस पुथर। थ्रायो बवाहि यथ अथउरु नो,
थ्रायो बवाहि यथ रथ ऐश्तारहे। थ्रायो बवाहि वास्त्रयहे फुशुयन्तो
अएव ते बवाहि यथ वीशतासपाई। अउर्वरत अस्पेम बवाहि यथ ह्वरे,
रओचिनवंतेम बवाहि यथ मांओंघेम: सओचिन वंतेम बवाहि यथ आतरेम,
तिजिनवंतेम बवाहि यथ मिथरेम, हुरओघेम वेरेथ्राजनेम बावहि यथ स्रोषम अषीम।
ख़ोरदाह अवेस्ता-पेज 423
अर्थ - अहुर मज्द (ईश्वर ) ने जरदुश्त से कहा कि हमारे दस पुत्र हुए उनमे तीन अथर्वन (अथर्व ऋषि ) जैसे ज्ञानी और तीन रथेशतार (क्षत्रिय ) युद्ध में प्रवीण हुए और तीन वास्त्रय हुए जो कृषि करके देश को आबाद करने वाले और व्यापारी हुए ,और एक पुत्र हुतोक्ष ( प्रवीण - Skill ) हुआ , जो विश्ताश्व जैसा सम्राट , खुरशेद जैसा घुड़सवार ,चन्द्रमा जैसा प्रकाशवान ,अग्नि जैसा चमचमाने वाला ,इजद देवता की तरह तेजी वाला ,सरोष इज्द की तरह सुन्दर और विजयी , और रशन देव की तरह सत्य मार्ग पर चलने वाला ,अर्थात धर्म पर स्थिर रहने वाला ,बहराम इज्द की तरह शत्रुओं का नाश करने वाला ,राम की तरह आदरणीय , और कवी सुश्रवा (कैकयी का पिता कय खुसरो )की तरह मृत्यु को जीतने वाला होगा , क्योंकि यह मुझे प्रिय है .
इस से साफ पता चलता है कि किसी को सवर्ण यानि ऊँचा और किसी को अवर्ण यानी नीचा समझ लेना अज्ञान की बात है , जबकि सभी ईश्वर के पुत्र सामान है , जिस तरह से अहुर मज्द (ईश्वर ) ने अपने दसवें पुत्र को सबसे अधिक प्रेम और प्रतिष्ठा प्रदान की है उसी तरह हमें भी उन लोगों आदर देना चाहिए जिन्हे हम अज्ञानवश निम्न वर्ण मानते हैं , याद रखिये यह हमारे आर्य भाई हैं
KHORDEH AVESTA, First Edition, April 1880 (411)
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