तुलसीदास और रामचरितमानस।
गीताप्रेस ने जहाँ तुलसीदास का महत्व बढ़ाने के लिये यह लिखा है कि राम, लक्ष्मण और हनुमान तुलसीदास से मिलने आते थे, वही रामचरित मानस की वरीयता कायम करने के लिये यहाँ तक लिख दिया है कि स्वयं शिवजी ने रामचरित मानस को सत्यापित किया है कि यह किताब समस्त सनातनी धर्मग्रंथों मे सबसे उच्च है।
अच्छा एक और बात यहाँ पर विचार करने वाली यह है कि यदि तुलसीदास से राम, लक्ष्मण और हनुमान रूबरू मिलते थे तो उन्होने रामचरित मानस को बचाने के लिये उन्ही से आग्रह क्यों नही किया? क्यों इसे ले जाकर टोडरमल के घर छुपाकर रख दिया था?
अब इससे पहले कि मै तुलसीदास समर्थक गीताप्रेस की होशियारी का बयान करूँ, उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि तुलसीदास और काशी के पंडों के बीच विवाद क्या था?
दरअसल तुलसीदास एक वैष्णव ब्राह्मण थे, और जब उन्होने रामचरित मानस लिखा तो वे उसका प्रचार-प्रसार काशी मे भी करना चाहते थे। उन दिनों काशी शैव-ब्राह्मणों का गढ़ था, और शैवों को यह स्वीकार नही था कि कोई वैष्णव आकर यहाँ किसी भी उपास्य को शिव के बराबर या उनसे श्रेष्ठ बताये। जबकि तुलसीदास ने तो मानस मे बड़ी चालाकी से शिव को राम भक्त तक लिख दिया था।
एक जगह तुलसीदास लिखते है-
"राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेहु सती जगतपति जागे।।"
अर्थात- जब शिवजी ने राम-राम कहना शुरू कर दिया, तब सती ने जान लिया कि अब भगवान जाग गये हैं।
यहाँ तुलसीदास बताना चाहते थे कि शिव भी राम नाम का जाप करते थे! तुलसीदास यहीं नही रुके, वे तो कहते थे कि-
"चतुराई चूल्हे गयी, घूरे पड्यो आचार। तुलसी बिन राम भजन के चारो वरण चमार।।" अर्थात- जो मानव राम का भजन नही करता, वह चमार के जैसा है, चाहे वह चारों वर्णों मे से जिस भी वर्ण का हो।
बस, तुलसीदास की इन्ही हरकतों से काशी के पंडे नाराज थे, और वे रामचरित मानस को जला देना चाहते थे, तथा तुलसीदास की पिटाई भी करना चाहते थे।
तुलसीदास भी इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे... अतः उन्होने पहले मानस को टोडरमल के पास छुपाकर रख दिया, और फिर काशी से अपनी जान बचाकर भाग लिये।
तुलसीदास ने जो मानस पहले लिखी थी, वह टोडरमल के पास ही थी, बाद मे उसी आधार पर दूसरी प्रतिलिपियाँ तैयार की गयी! सम्भवतः बाद मे उसमे मिलावट भी हुई होगी और शिव से सम्बन्धित कुछ अच्छी चौपाइयाँ भी लिखी गयी होंगी, ताकि नाराज शैवों को मनाया जा सके।
जब इससे भी काम न बना तो तुलसीदासियों ने एक और दांव चला, उन्होने शिव के माध्यम से ही मानस को चमत्कारिक ग्रंथ साबित करने की चेष्टा की।
उन्होने इसके लिये एक कहानी बनायी कि एक बार तुलसीदास ने रामचरित मानस को विश्वनाथ मन्दिर मे रख दिया था, और सुबह जब मन्दिर के पट खोलकर देखा गया तो किताब के ऊपर स्वयं शिवजी ने "सत्यम् शिवम् सुन्दरम्" लिखकर नीचे अपने हस्ताक्षर कर दिये थे।
अब मुझे तो यह पढ़कर बड़ी जिज्ञासा हो रही है कि पंडों को शिव के लिखे गये उस वाक्य को और उनके हस्ताक्षर को दुनिया को दिखाना चाहिये।
आखिर हम भी तो देखें कि भगवान शिव की हैंड-राइटिंग कैसी थी?
तुलसीदासिया पंडे केवल इस एक कथा से ही संतुष्ट नही हुये, उन्होने एक दूसरी कथा भी रच डाली। अबकी बार उन्होने लिखा कि एक बार सब ब्राह्मणों ने रामचरित मानस को अजमाने के लिये विश्वनाथ मन्दिर मे सबसे ऊपर वेद, उसके नीचे शास्त्र, उसके नीचे तमाम पुराण और सबसे नीचे रामचरित मानस को रखकर मन्दिर बन्द कर दिया! जब सुबह मन्दिर खोलकर देखा तो रामचरित मानस सबसे ऊपर था। पंडों के कहने का मतलब था कि शिवजी ने स्वयं मानस को सबसे ऊपर रख दिया, और उसे सबसे उच्च सनातनी ग्रंथ का सर्टिफिकेट दे दिया।
इस कहानी से पड़ों ने यह भी साबित किया कि मानस वेदों से भी महान है! शायद यही वजह थी कि वेदों के सबसे बड़े प्रचारक स्वामी दयानन्द ने रामचरित मानस की प्रतियाँ जलायी थी और तुलसीदास को सबसे बड़ा मूर्ख भी बताया था।
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तुलसीदास।
तुलसीदास की रचना कवितावली मुझे उनकी सारी रचनाओं से जरा अलग लगी! इसमे तुलसीदास ने अपने जीवन के उन दिनों का वर्णन किया है जब वह अत्यन्त गरीब थे, और भूखे पेट भी रहना पड़ता था! उन्होने यह भी बताया है कि किस तरह से काशी के ब्राह्मण उन्हे मारना चाहते थे! इतनी सारी विपदाओं को लिखने के बावजूद भी तुलसीदास ने इसमे भी अपनी आदतानुसार जाति-पात और ऊँच-नीच घुसा दिया है!
तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड मे राम की प्रशंसा करते हुये लिखा है-
"सज्जन-सींव बिभीषनु भो, अजहूँ बिलसै बर बंधबधू सो"
अर्थात- हे राम! आपकी कृपा से जो विभीषण अपने बड़े भाई (रावण) की पत्नि (मंदोदरी) का उपभोग करते हैं, वो भी आपकी कृपा से साधुता पा गये!
यह एक और विवादपूर्ण बात है कि तुलसीदास कह रहे हैं कि भले ही विभीषण अपनी भाभी से विवाह किये पर आपने उन्हे भी संत बना दिया! सवाल यह है की जो राम बालि को केवल इसलिये मार डाले कि उसने सुग्रीव की पत्नि को कैद करके रखा था, वो भला विभीषण को कैसे क्षमा करते यदि उसने अपनी भाभी का उपभोग किया!
आगे तुलसी दास ने लिखते हैं-
"रिषिनारि उधारि कियो सठ केवटु मीत पुनीत सुकीर्ती लही"
अर्थात- हे राम! आपने उस दुष्ट केवट को मित्र बनाकर पवित्र कर दिया!
जरा सोचो, उस केवट ने दुष्टता का कौन सा कार्य किया था, उसने तो स्नेह से राम के चरण ही धोये थे! वैसे वाल्मीकि रामायण मे ये चरण धोने वाला प्रकरण है ही नही, पर अगर तुलसीदास की ही बात सच मान लें कि केवट ने चरण धोये तो वह दुष्ट कैसे हुआ!
तुलसीदास ने इसी तरह मानस के लंकाकाण्ड मे लिखा है-
"सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो"
अर्थात- हर प्रकार से उस नीच निषाद को राम ने भरत जैसे गले लगा लिया!
अब बताओ, वह निषाद राम का मित्र था! फिर उसने ऐसा कौन सा कुकर्म कर दिया था कि तुलसीदास ने उसे नीच बना दिया, और अगर वह नीच था तो फिर राम ने उससे मित्रता क्यों की?
तुलसीदास ने समाज मे जाति-पात का वह जहर घोला है जिसका असर आज भी कायम है! तुलसीदास पूरे मानस और कवितावली मे ब्राह्मणों के अलावा और किसी को मनुष्य मानने को तैयार ही नही थे! वैसे तुलसीदास जातिवाद बहुत मानते थे, पर जब वो बुरे दौर मे थे, तब किसी भी जाति के घर मांगकर खा लेते थे!
इसी कवितावली मे तुलसी ने लिखा है-
"मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो बिधिहूँ न लिखी कुछ भाल भलाई।
नीच निरादरभाजन कादर कूकर-टूकन लागि ललाई।।"
अर्थात- माता-पिता ने मुझे पैदा करके त्याग दिया, और ब्रह्मा ने भी भाग्य मे कुछ अच्छा नही लिखा था! तब मै निरादर होकर कुत्ते के मुँह मे टुकड़े को देखकर ललचाता था!
आगे तुलसीदास लिखते हैं-
"जातिके, सुजातिके, कुजाति के पेटागि बस।
खाए टूक सबके बिदित बात दूनीं सो।।"
अर्थात- मैने पेट की आगि (भूख) के कारण अपनी जाति, सुजाति और कुजाति सभी के टुकड़े मांगकर खाये है, और यह बात सभी को पता है।
अब जरा मानस अयोध्याकाण्ड-193 की चौपाई देखो-
"लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।"
अर्थात- तुलसीदास यहाँ कह रहे हैं कि केवट लोकरीति और वेदरीति से सब भाँति नीच है, और जिसे उसकी परछाई छू ले उसे स्नान करना चाहिये!
सवाल तो यह भी होता है कि अगर परछाई छूने पर स्नान करना है तो फिर तुलसीदास ने बचपन मे कुजातियों के घर भोजन किया था, तो वो कैसे पवित्र हुये?
दूसरी बात तुलसीदास ने अपनी मुर्खतावश वेदों पर भी आक्षेप लगा दिया है, वेदों ने किसी को भी नीच बताया ही नही है! वेद कहते हैं "कृण्वन्तो विश्वमार्यम् " अर्थात- पूरे संसार को श्रेष्ठ बनाओ! फिर तुलसीदास ने कौन से वेद पढ़े थे जो निषादों (केवट) को नीच बताता है!
तुलसीदास ने वेदों का आक्षेप लगाना यही नही रोका, आगे अयोध्याकाण्ड-195 मे उन्होने लिखा है-
"कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।"
अर्थात- केवट कपटी, डरपोक, मूर्ख और कुजाति होते हैं, तथा सभी प्रकार मे लोकरीति और वेदरीति से बाहर हैं!
अब सोचना यह है कि तुलसीदास ने यहाँ केवटों को कुजाति कहा हैं, और कवितावली मे कुजाति का भोजन करने की बात की है! साथ ही साथ केवटों को लोकरीति से वेदव्राह्य बता रहे हैं! किस वेद ने निषादों का परित्याग किया है!
केवटों के विरुद्ध तुलसीदास इतना जहर उगलकर गये हैं, पर अज्ञानता-वश केवट भी रामचरित मानस का पाठ करवाते हैं!
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तुलसीदास और मृत्यु।
हनुमान चालीसा का दोहा तो लगभग सबने पढ़ा ही होगा-
"नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत वीरा।।"
यहाँ तुलसीदास लिखते हैं कि जो निरन्तर हनुमान का नाम जपता है, उसके सारे दर्द और रोगों का नाश हो जाता है!
तुलसीदास की मृत्यु बड़ी भयंकर हुई थी! इनके पैरों मे बेवाई फट गयी थी और इनके हाथ भी काम करना बन्द कर दिये थे, तथा बाहों मे भयंकर दर्द होता था!
दर्द से तुलसीदास न तो भजन कर पाते थे, और न ही पूजन! इसी दर्द के निवारण के लिये तुलसीबाबा ने 'हनुमान बाहुक' लिखी थी! तुलसीदास दर्द से तड़पते हुये राम से प्राथना करते हैं-
"बाँह की बेदन बाँह पगार, पुकारत आरत आनन्द भूलो।
श्रीरघुवीर निवारियो पीर, रहौं दरबार परो लटि लूलो।।"
(हनुमान बाहुक-36)
अर्थात- हे श्रीराम! बाहों की पीड़ा से सारा आनन्द भुलाकर दुःखी होकर पुकार रहा हूँ! हे रघुवीर मेरी पीड़ा दूर करो जिससे मै दुर्बल और पंगु होकर भी आपके दरबार मे पड़ा रहूँ!
वास्तव मे तुलसीदास लूले हो चुके थे, उन्हे पता चला गया था कि राम के नाम से उनका काम नही होने वाला, अन्ततः तुलसीदास ने तंत्र-मंत्र करना शुरू कर दिया!
हनुमान बाहुक-30 मे तुलसीदास ने लिखा है-
"आपने ही पापतें त्रितापतें कि सापतें, बढ़ी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है।
औषध अनेक तंत्र-मंत्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है।।"
अब इसे तो पढ़कर ही हंसी आती है कि जो तुलसी दावा करते थे कि राम उनसे मिलने आते थे, वो कह रहे हैं कि बाहों की पीड़ा इतनी बढ़ी है कि औषधि, तंत्र-मंत्र सब कर लेने के बाद भी राहत नही मिलती! तुलसी बाबा जीवन भर दूसरों को जातिसूचक गाली देते रहे, और अन्त मे ऐसी स्थिति मे पड़ गये कि सारी हेकड़ी निकल गयी! तुलसीदास की हालत कैसी थी वह हनुमान बाहुक की घनाक्षरी-38 से समझी जा सकती है!
"पाँयपीर, पेटपीर, बाँहपीर, मुँहपीर, जरजर सकल शरीर पिरमई है।
देव, भूत, पितर, करम, खल, काल, ग्रह, मोहिपर दवर दमानक सी दई है।।"
अर्थात- पाँव की पीड़ा, पेट की पीड़ा, मुँह की पीड़ा, और बाँहों की पीड़ा से शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया है! ऐसा लगता है कि देवता, प्रेत, पितर, काल और ग्रह सब एक साथ मेरे ऊपर तोपों की बाड़ सी दे रहे हैं!
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तुलसीदास और साँप।
सांप को कान नही होते है, और वह अपनी जीभ से इसकी भरपाई करता है! सांप की जीभ कैची के आकार की होती है, जिसे वह बाहर निकालकर हवा मे लहराता रहता है! यह सांप के लिये सेन्सर जैसा कार्य करती है. लेकिन यह बात बड़ी प्रकृति-विरुद्ध थी कि किसी को कान ही न हो! पर अब जाकर उसका जवाब मिला जिसे विज्ञान अभी तक नही खोज पाया है!
पिछली सदी के महान वैज्ञानिक गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी किताब "कवितावली" के बालकाण्ड-11 मे लिखा हैं-
"डिगति उर्वि, अति गुर्वि, सर्व पब्बै समुद्र-सर।
ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिग्पाल चराचर।।"
अर्थात- सीता स्वयंवर मे जब श्री राम ने शिवधनुष तोड़ा, उस समय उसकी प्रचण्ड टंकार ब्रह्माण्ड के पार चली गयी और आघात से सारे पर्वत, समुद्र तथा तालाब सहित पृथ्वी डगमगाने लगी! उसी टण्कार के फल-स्वरूप सांप भी बहरे हो गये, अर्थात उनका कान उड़ गया।
देखा आपने बाबा तुसलीदास के ज्ञान-विज्ञान को, वास्तव मे त्रेतायुग से पहले सांप को कान होते थे, पर त्रेतायुग की उस घटना के बाद सांप कर्णहीन हो गये।
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तुलसीदास और नारी
तुलसीदास ने रामचरित मानस मे मे एक बड़ी ही चर्चित चौपाई लिखी है-
"ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।"
इस चौपाई मे वो नारियों को प्रताड़ना की अधिकारी बता रहें हैं! इस चौपाई की वजह से कई नारीवादी तुलसीदास का बड़ा विरोध करते हैं, और कहते हैं कि तुलसीदास नारी विरोधी थे! अब सवाल यह है कि अगर तुलसीदास की नजर मे नारियाँ 'ताड़ना' की अधिकारी है, तो सीता के बारे मे उनके क्या विचार थे?
क्योंकि सीता भी तो नारी ही थी, जिसे वो "माता" मानते थे! पर तुलसीदास ने पूरे मानस मे सीता के बारें मे कही भी कोई अपशब्द नही लिखा! वास्तव मे तुलसीदास नारी विरोधी नही थे, इसका प्रमाण भी रामचरित मानस मे ही है...
इसी मानस मे नारियों के बारे मे एक और चौपाई है-
"कत विधि सृजी नारी जग माहीं। पराधीन सपनेहु सुख नाही।।"
यह चौपाई तब की हैं, जब शिवजी के साथ पार्वती की शादी हुई और विदाई के समय उनकी माँ मैनावती रो रही थी! तब तुलसीदास को भी बड़ा कष्ट हुआ, और उन्होने कहा कि "भगवान ने नारियों को कैसे बनाया, बेचारी दूसरे के अधीन होती है, और पराधीन को सपने मे भी सुख नही मिलता"
अब इसी मानस की एक दूसरी चौपाई भी देखिये-
"अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमन्द अघारी।।"
यह चौपाई बाबा तुलसी ने शबरी के लिये अरण्यकाण्ड मे कही है, इसमे तुलसीदास कह रहे हैं- "जो नीचों मे नीच होते है, नारियाँ उनसे भी नीच होती है"
अब यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि बाबा तुलसी पार्वती को लिये आंसू बहा रहे हैं, और शबरी के लिये 'नीच' शब्द कह रहे हैं! आखिर इसकी वजह क्या है?
हैं तो दोनो ही नारी! असल मे पार्वती आर्य (सवर्ण) थी, और शबरी दलित (अवर्ण) थी!
तुलसीदास का नारी विरोध भी सेलेक्टिव था, वो केवल अनार्य नारियों का अपमान करते थे, सवर्ण नारियों पर उन्होने एक भी कटाक्ष नही लिखा! सीता का सम्मान बचाने के लिये तो वो झूठ भी लिखते थे! इसका एक बड़ा उदाहरण मै आपको देता हूँ! रामचरित मानस अरण्यकाण्ड मे तुलसीदास ने सीता और कौआ बने इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा लिखी हैं!
तुलसीदास ने लिखा है-
"सीता चरण चोच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।"
अर्थात- अपनी मंदबुद्धि के कारण कौऐ ने सीता के चरणों मे चोंच मार दी!
तुलसीदास यहाँ 'चरण' मे चोंच मारने की बात करते हैं, जबकि सच कुछ और ही है!
यही प्रसंग बाल्मीकि ने सुन्दरकाण्ड सर्ग-38 मे लिखा है! यहाँ बाल्मीकि साफ लिखते हैं कि जयन्त ने कौआ बनकर सीता की छाती (स्तन) पर चोंच मारी थी!
सीता खुद हनुमान को यह कथा बताती हैं, और कहती है- 'हे हनुमान! कौआरूपी जयन्त ने मेरे स्तनों पर इतने चोंच मारे कि मेरे स्तन घायल हो गये, और उसमे से खून की धारा बहने लगी'
अब जरा देखिये कि सीता के सम्मान को बचाये रखने के लिये तुलसीदास सच को किस चालाकी से हजम कर गये, और 'स्तन' की जगह 'चरण' लिख दिया!
वास्तव मे तुलसीदास घोर जातिवादी थे, और वो जाति देखकर ही नारी का अपमान करते थे! सीता एक सवर्ण महिला थी, तुलसी बाबा उनका सम्मान करते थे! अतः उन्हे झूठ बोलना स्वीकार था, पर सीता के शान मे कोई गुस्ताखी नही होनी चाहिये!
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रामचरितमानस।
मुसलमानों को हजारों सालों तक कब्र मे पड़े रहने से बचने का एक उपाय है, जिसे तुलसीदास ने कवितावली के उत्तरकाण्ड पद संख्या-76 मे लिखा है!
तुलसीदास ने लिखा है-
"आँधरो अधम जड़ जाजरो जराँ जवनु, सूकरके सावक ढ़कँ ढकेल्यो मगमे।
गिरो हिएँ हहरि हराम हो हराम हन्यो, हाय! हाय करत परीगो कालफगमे।।
तुलसी बिसोक ह्नै त्रिलोकपतिलोक गयो, नामकें प्रताप बात बिदित है जगमे।"
अर्थात- एक सुअर के बच्चे ने किसी अंधे, पापी और बुढ़ापे से जर्जर मुसलमान को रास्ते मे धक्का देकर गिरा दिया! वह जोर से गिर गया और भयभीत होकर "ह'राम ने मार डाला, ह'राम ने मार डाला" ऐसा चीखने लगा! इस प्रकार वह चिल्लाते हुये मर गया और अन्तिम समय मे भूल वश राम (ह'राम) कहने से वह समस्त पापों के बन्धन से छूटकर त्रिलोकीनाथ के धाम (वैकुण्ठ) चला गया।
अब मुसलमानों को निर्णय लेना है कि अल्लाह-अल्लाह करके सदियों तक कब्र मे पड़े रहना है, या अन्तिम समय से राम-राम करके सीधा वैकुण्ठ-धाम जाना है!
तुसलीदास ने लिखा है-
"तुलसी मेरे राम को रीझि भजो या खीझ।
भौम पड़ा जामे सभी उल्टा-सीधा बीज।।"
अर्थात- जैसे जमीन के अन्दर पड़ा बीज चाहे उल्टा हो या सीधा, फिर भी जाम जाता है, वैसे ही मेरे राम का नाम चाहे श्रद्धा से लो या घृणा से, पर फल भरपूर मिलता है।
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रामचरितमानस में गणनाएं।
गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस (सुन्दरकाण्ड) मे लिखते है कि-
"अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥"
अर्थात- बाबा तुलसी कह रहे हैं कि रामजी की वानरी सेना मे 18 "पद्म" केवल सेनापति है!
अब यह जान लेना आवश्यक है कि एक "पद्म" किस संख्या को कहते है. सौ "करोड़" का एक "अरब" होता है,और सौ "अरब" का एक "खरब" , ऐसे ही सौ "खरब" का एक "नील" , और सौ "नील" की संख्या को एक "पद्म" कहते हैं!
अब अगर राम की सेना मे 18 "पद्म" सेनापति थे तो सेना कितनी बड़ी हुई! अगर एक सेनापति के पास सौ बन्दर भी थे, तो भी 180 "पद्म" बन्दरों की सेना हो जाती है!
बाबा तुलसी ने फेंकने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं, वास्तव मे तुलसीदास सस्ते दाम वाला "भंगेड़ा" पीते थे, और जब नशा होता था तो ऐसी ही अनर्गल बातें लिखते थे!
इतनी बड़ी संख्या की गिनती करने मे एक इंसान का पूरा जीवन निकल जायेगा, पर तुलसीदास ने ना जाने कैसे गणना कर ली थी!
दुःख की बात तो यह है कि आज भी पंडे-पुरोहित इसे सच मानते हैं, जबकि तुलसीदास ने यह भी लिखा है कि हर एक वानर सुग्रीव जैसा बलवान था, और अपने जैसे लाखों को कुछ भी नही समझता था, इतना बलवान की तीनों लोकों को "घास के टुकड़े" जैसा समझता था!
निम्न चौपाई देखो कि बाबा तुलसी कैसे फेंक रहें हैं......
"ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना॥
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं॥"
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राम की आयु।
वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-128/106 मे लिखा हैं कि श्रीराम ने राजा बनने के बाद अपने भाइयों सहित अयोध्या मे 11 हजार साल तक राज्य किया. क्या कोई मनुष्य 11 हजार वर्ष तक जीवित रह सकता है? क्या मनुष्यों की आयु कभी इतना होती थी? वेदों के बाद मनुस्मृति ही सनातनियों की सबसे विश्वसनीय और मान्य धर्मग्रंथ है, अगर इसे प्राचीन संविधान कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी!
मनुस्मृति की प्रशंसा देवगुरू वृहस्पति ने भी अपनी पुस्तक वृहस्पति स्मृति संस्कारखण्ड-13/14 मे किया है, उन्होने लिखा है--
"मनुस्मृति विरुद्धा या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते।
वेदार्थोपनिबद्धत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतेः।।"
अर्थात- जो स्मृति मनुस्मृति के विरुद्ध है, वह प्रशंसा के योग्य नहीं है। वेदार्थों के अनुसार वर्णन होने के कारण मनुस्मृति ही सब में प्रधान एवं प्रशंसनीय है।
यह तो मनुस्मृति का गुणगान हुआ, अब जरा देखो कि मनुस्मृति मे मनुष्यों की कितनी आयु बताई गयी है!
मनुस्मृति-1/83 मे मनु ने कहा है--
"आरोगाः सर्वसिध्दार्थाश्चतुर्वर्षशतायुषः।
कृते त्रेतादिषु ह्योषामायुर्ह्रसति पादशः।।"
अर्थात- कृतयुग (सतयुग) मे मनुष्य धर्माचरण पूर्वक सब मनोरथ सिद्ध करते हुये निरोग होकर चार सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रहते हैं! त्रेता, द्वापर और कलियुग मे धर्म का लोप होने से क्रमशः सौ-सौ वर्ष आयु कम हो जाती है।
मनु ने इस श्लोक मे साफ बताया है कि त्रेतायुग मे मनुष्यों की आयु तीन सौ साल होती थी! अब इसी त्रेतायुग मे राम थे, फिर भला राम 11 हजार साल कैसे जी गये? वाल्मीकि और मनु मे से कोई एक तो झूठ बोल रहा है, और मेरी साधारण बुद्धि को वाल्मीकि ही झूठे नजर आ रहे हैं!
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रामायण।
जब रामजी सीता स्वयंवर मे शिव-धनुष तोड़ते हैं तो बड़े क्रोध से वहाँ परशुराम आ जाते हैं और राम को मारने के लिये उतावले हो जाते है! इसके बाद लक्ष्मण के साथ उनकी गर्मा-गर्म बहस भी होती है. आपने कभी सोचा कि इतनी शीघ्र परशुराम को पता कैसे चला कि शिवधनुष टूट गया है, और वो महेन्द्र पर्वत से फौरन ही कैसे आ धमके? वास्तव मे यह पूरी गप्प कहानी तुलसीदास के खुरापाती दिमाग की उपज है, जिसका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नही!
वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग-67 मे राम के द्वारा शिवधनुष भंग का प्रकरण है, जबकि सर्ग-74 मे परशुराम और राम की भेंट हुई! तुलसीदास ने जान-बूझकर कहानी को रोमांचक बनाने के लिये परशुराम को जनक के दरबार तक पहुँचा दिया! जबकि वास्तव मे राम सीता से विवाह करने के बाद जब अयोध्या लौट रहे थे, तब उनकी मुलाकात परशुराम से मार्ग मे हुई, जहाँ परशुराम ने केवल उन्हे अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिये कहा, और यहाँ लक्ष्मण बिल्कुल चुप ही रहे थे! अर्थात परशुराम और लक्ष्मण मे कभी भी तू-तू, मै-मै नही हुई!
तुलसीदास ने ऐसे ही कई झूठ रामचरित मानस मे लिखे है, जिसमे सबसे बड़ा झूठ है हनुमान द्धारा सुषेन वैध को घर सहित लंका से उठा लाना है! मानस मे तुलसीदास ने लिखा है- "जामवंत कह बैद सुषेना, लंकाँ रहइ को पठई लेना।
धरि लघु रूप गयउ हनुमंता, आनेउ भवन समेत तुरंता।।"
अर्थात-जामवंत के कहने पर हनुमान सूक्ष्मरूप बनाकर लंका मे गये और सुषेन वैध को घर सहित उठाकर लाये!
तुलसीदास हनुमान को हीरो बनाने के चक्कर मे इतने पागल हो गये थे कि कुतर्क पर कुतर्क कर रहे थे! सोचो कि अगर सुषेन वैध को लाना ही था तो उसे ही उठाकर लाते, उसका घर भी साथ लाने के क्या जरूरत थी?
वास्तव मे तुलसीदास हनुमान की शक्ति का महिमा-मण्डन करना चाहते थे, जबकि वाल्मीकि रामायण मे सुषेन वैध नाम का कोई पात्र ही नही है! वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-74 मे साफ लिखा है कि जाम्बवान नामक ऋक्ष के आदेश पर हनुमान संजीवनी लाने गये थे, न कि किसी सुषेन वैध के, और यह जाम्बवान ऋक्ष राम की ही सेना मे थे! मतलब सुषेन वैध का पूरा का पूरा प्रकरण ही झूठ है, हाँ पुराणों मे सुषेन नाम के एक वैध का वर्णन है, पर वह लंका मे नही बल्कि वानरों के वैध थे और वानरराज बालि के ससुर भी थे! यही नही अगर आप रामायण का सूक्ष्मता से अध्ययन करो तो यह भी पता चलता है कि हनुमान उड़कर नही बल्कि तैरकर समुद्र पार करके लंका गये थे!
वाल्मीकि रामायण सुन्दरकाण्ड सर्ग-1 श्लोक-67-69 मे लिखा है कि हनुमान समुद्र के जल मे ऐसे चल रहे थे जैसे कोई नौका तैरती हो, उनका आधा शरीर पानी मे था और आधा पानी के ऊपर! इससे साफ है कि हनुमान तैर रहे थे, न कि उड़ रहे थे, उड़ते हुए मनुष्य का आधा शरीर पानी मे कैसे रहेगा! आगे लिखा है हनुमान जिस तरफ जाते थे उनके अंगो से समुद्र मे तरंगे उठने लगती थी, और वो अपनी छाती से तरंगमालाओं को चूर-चूर कर रहे थे! अब अगर कोई आसमान मे उड़ेगा तो उससे पानी मे तरंगे नही उठेगी, और उसकी छाती जल की तरंगो को नही छुएगी...
बात बिल्कुल साफ है कि हनुमान तैर ही रहे थे, और तो और तुलसीदास ने भी हनुमान चालीसा मे लिखा है- "प्रभु मुद्रिका मेलिं मुँख माहि। जलधि लांघि गये अचरज नाहि।।" अब अगर हनुमान आकाश मे उड़ रहे थे तो उन्हे राम की मुद्रिका मुँह मे रखने की क्या जरूरत थी! हाँ तैरते समय कही हाथ से छिटक न जाये इसलिये मुँह मे रखने की बात प्रासंगिक हो सकती है!
हम लोग अक्सर रामायण पढ़ते नही है, और रामचरित मानस का इतना प्रचार-प्रसार है कि सारी झूठी बातें ही हिन्दू सच मानकर तार्किकों से लड़ते रहते हैं! हनुमान का उड़कर समुद्र पार करना, सुषेन को घर समेत उठाकर लाना, लक्ष्मण तथा परशुराम को लड़ाना, हनुमान का बूटी लेने जाते समय रास्ते मे कालनेमि का मिलना और भरत का बाण मारकर हनुमान को पहाड़ समेत पृथ्वी पर गिरा देना, ये सारे कृत्य तुलसीदास की कल्पना मात्र है! आपने जो रामानन्द सागर की टेलीवीजन पर "रामायण" देखी थी, वह भी वास्तव मे 'रामचरित मानस' ही थी!
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रामायण में गप्प।
तुलसीदास ने रामचरित मानस मे रामजी की सेना का वर्णन करते हुये लिखा है-
"अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर॥"
अर्थात-तुलसीदास लिख रहे हैं कि राम की सेना मे 18 पद्म केवल बन्दरों के सेनापति थे! अब जरा आप लोग अनुमान लगाओ कि जहाँ 18 पद्म केवल सेनापति थे, तो सेना कितनी बड़ी होगी?
ऐसा ही कुछ वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकाण्ड, सर्ग-39 मे लिखा है। यहाँ वाल्मीकि ने राम के सेना की संख्या बताते हुये जो लिखा है, मै वही नीचे लिख रहा हूँ। आप लोग खुद गिनती कर लेना...
वाल्मीकि लिखते हैं कि-
... शतबलि नामक वानर ने दस अरब की सेना सुग्रीव को दी!
... तारा के पिता सुषेण ने सौ करोड़ की सेना दी!
... सुग्रीव के ससुर ने दस अरब सेना दी!
... केसरी ने कई हजार वानरों की सेना दी!
... गवाक्ष ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... धूम्र ने बीस अरब भालूओं की सेना दी!
... पनस ने तीन करोड़ वानरों की सेना दी!
... नील ने दस करोड़ वानरों की सेना दी!
... गवय ने पाँच करोड़ वानरों की सेना दी!
... दरीमुख ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... मैन्द और द्विविद ने बीस अरब वानरों की सेना दी!
... गज ने तीन करोड़ वानरों की सेना दी!
... जामवन्त ने दस करोड़ भालुओं की सेना दी!
... रुमण ने एक अरब वानरों की सेना दी!
... गन्धमादन ने एक पद्म वानरों की सेना दी!
... अंगद ने दस शंख और एक पद्म वानरों की सेना दी!
... तार ने पाँच करोड़ वानरों की सेना दी!
... इन्द्रजानु ने ग्यारह करोड़ वानरों की सेना दी!
... रम्भ ने ग्यारह हजार एक सौ वानरों की सेना दी!
... दुर्मुख ने दो करोड़ वानरों की सेना दी!
... हनुमान जी ने दस अरब वानरों की सेना दी!
... नल ने एक अरब से अधिक वानरों की सेना दी!
... दधिमुख ने दस करोड़ वानरों की सेना दी!
... इसके अतिरिक्त शरभ, कुमुद, वह्नि तथा रंह नामक वानरों ने भी विशाल सेना सुग्रीव को दिया!
आखिर इतनी सेना लंका मे कहाँ ठहरी भाई? आखिर इतना झूठ लिखने से क्या हासिल क्या वाल्मीकि ने? क्या इसे पढ़ने के बाद यह नही लगता कि रामायण एक काल्पनिक ग्रंथ है।
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रामायण और महिलाओं से हिंसा।
ऐसा लगता है कि रामायण-काल मे महिलाओं को दण्डित करने के लिये उनके नाक, कान और स्तन काटना साधारण सी बात थी. कम से कम रामायण मे ही ऐसे तीन प्रकरण मिलते हैं जब राम और लक्ष्मण ने महिलाओं को दण्ड देने के लिये उनका अंग-विच्छेदन किया और नाक, कान अथवा स्तन काट दिये।
इसका पहला प्रमाण वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग-26/11(चित्र-1) मे मिलता है-
राम और लक्ष्मण जब विश्वामित्र के साथ वन मे जा रहे थे, तब रास्ते मे उन्हे ताड़का नामक राक्षसी मिली। विश्वामित्र ने लक्ष्मण को बताया कि यह राक्षसी बहुत ही क्रूर है! तब लक्ष्मण ने विश्वामित्र से कहा कि "मै अभी इसके नाक, कान काटकर पीछे लौटने को विवश करता हूँ"
यही नही.. जब राम ने अपने तीरों से ताड़का की दोनो भुजाऐं काट दी, तब भी लक्ष्मण से न रहा गया और उन्होने मर रही ताड़का के नाक, कान काट लिये। (इसी सर्ग का श्लोक-18, चित्र-2)
वैसे राम और लक्ष्मण को स्त्री-हत्या के लिये उकसाने वाले भी विश्वामित्र ही थे! बालकाण्ड-25/18 (चित्र-3) मे विश्वामित्र ने राम से कहा था कि "हे राम! तुम स्त्री-हत्या का विचार करके इस (ताड़का) के प्रति दया न दिखाना"
नाक, कान काटने वाला दूसरा मामला सूर्पणखा का है, जो लगभग सर्वविदित है।
वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड सर्ग-18/22 (चित्र-4) मे यह प्रकरण है कि लक्ष्मण ने राम के आदेश पर सूर्पणखा के नाक और कान काट लिये थे।
रामायण मे महिला के अंग-विच्छेदन का तीसरा मामला अरण्यकाण्ड के ही सर्ग-76/17 (चित्र-5) मे मिलता है! वैसे, इस बार मामला जरा अधिक ही गम्भीर है, क्योंकि इस बार लक्ष्मण ने केवल एक स्त्री के नाक और कान ही नही काटे, बल्कि उसके स्तन भी काट डाले।
असल मे सीता को खोजते हुये राम और लक्ष्मण जब वन मे विचरण कर रहे थे, तभी उन्हे वन मे ही अयोमुखी नामकी एक राक्षसी मिली थी। अयोमुखी ने लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा और लक्ष्मण को अपनी बाहों मे भर लिया. लेकिन क्रोध मे आकर आर्यपुत्र लक्ष्मण ने राक्षसी के नाक, कान और स्तन भी काट दिये।
इन तीनों मामले मे ही महिलाओं को अंग-विहीन किया गया है। मै ये भी नही कह रहा हूँ कि वे तीनों महिलाऐं बहुत साध्वी थी! हाँ.. वे राक्षसकुल से थी और स्वभाव की उग्र भी थी, पर क्या दण्ड देने के लिये कान, नाक और स्तन काटना जरूरी था? इससे तो अच्छा होता कि उन्हे मार ही डालते। आखिर ऐसा दण्डविधान किस वैदिक-ग्रंथ मे लिखा है, जिसका अनुशरण राम और लक्ष्मण कर रहे थे.
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राम और धोबी।
एक कहानी है कि जब एक धोबी के ताना मारने पर राम ने सीता का त्याग कर दिया था, तब क्रोध मे आकर सीता ने धोबियों को श्राप दिया था कि "तुम लोगों ने मेरे चरित्र पर झूठा दाग लगाया है, तो मै श्राप देती हूँ कि तुम लोग भी जीवन भर दूसरों का दाग ही धोते रहोगे।" अब यदि लोककथाओं की माने तो धोबी इसी श्राप की वजह से दूसरों के कपड़े धोते हैं।
ये किसी पुराण या अन्य धर्मग्रंथ मे पढ़ा नही है। क्या सचमुच राम ने किसी धोबी के कहने पर सीता को वन मे भेजा था तो इसके भी कहीं कोई प्रमाण नही है। अक्सर हम रामकथा मे कुछ ऐसी बातें भी मानते हैं जो रामायण और मानस दोनो मे नही लिखी है। जैसे कि शबरी के जूठे बेर खाना, लक्ष्मण का लक्ष्मण-रेखा खीचना और धोबी का सीता को ताना मारना। वास्तव मे ये कपोल कहानियां "पद्मपुराण" की देन है।
रामायण मे सीता के परित्याग का वर्णन उत्तरकाण्ड सर्ग-43 मे है! यहाँ स्पष्ट लिखा है कि रामजी के एक मित्र भद्र ने आकर बताया कि नगरवासी सीताजी को लेकर अशुभ बातें करते हैं! यहाँ साफ नगरवासियों का नाम है, किसी "धोबी" का उल्लेख भी नही है! रामचरित मानस मे तो तुलसीदास ने इस (सीता परित्याग) कथा को लिखा ही नही है, फिर आखिर ये "धोबी" का नाम आया कहाँ से?
दरअसल पद्मपुराण/पातालखण्ड अध्याय-125 मे एक कथा आती है कि वाल्मीकि के आश्रम मे एक शुक (तोते) का जोड़ा रहता था! एक दिन जब वाल्मीकि अपने शिष्यों को रामायण सुना रहे थे (मान्यता है कि वाल्मीकि जी ने पूरी रामायण पहले ही लिख दी थी) तब तोते के उस जोड़े ने सारी रामायण कथा सुन ली, और वहाँ से उड़कर वह मिथिला आ गया!
मिथिला के एक बगीचे मे तोते का वह जोड़ा राम और सीता की बातें कर रहा था, और संयोग से सीता भी उसी बगीचे मे बैठी थी... उन्होने सारी कथा सुन ली तथा
कौतुहलवश उन्होने सुग्गी (तोते की पत्नी) को पकड़ लिया, और अपने बारें मे और कथा पूँछने लगी! सीता ने कहा कि मुझे बताओ मेरे होने वाले पति राम कौन है? वे देखने मे कैसे है? उनमे क्या विलक्षण गुण है?
सीता ने जब सुग्गी को पकड़ा उस समय वह गर्भवती थी, उसने सीता से निवेदन किया कि मुझे छोड़ दो, पर सीता ने उसे नही छोड़ा! सुग्गी ने कहा कि देखो मेरा पति (तोता) मेरे बिना तड़प रहा है, मुझे जाने दो, मै अभी कुछ नही बता सकती! पर सीता ने उसकी एक न सुनी, और कहा कि जब तक तुम नही बताओगी, तब तक मेरे पास कैद रहोगी।
काफी अनुनय-विनय करने के बाद भी जब सीता ने उस सुग्गी को नही छोड़ा तब उसने सीता को श्राप दिया कि- "तुमने मुझे गर्भावस्था मे मेरे पति से अलग किया है, अब तुम भी जब गर्भवती होगी तब तुम्हे भी अपने पति से वियोग सहना पड़ेगा"
ऐसा कहकर उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिये!
सुग्गी की मृत्यु के बाद तोते ने भी सीता को श्राप दिया कि "मै अगले जन्म मे तुम्हारे पति से वियोग का कारण बनूँगा!" ऐसा कहकर वह तोता भी मर गया, और कथानुसार वही तोता अगले जन्म मे "धोबी" बनकर अयोध्या मे पैदा हुआ था।
वैसे इसी पातालखण्ड मे यह भी लिखा है कि जब राम ने सीता से विवाह किया उस समय सीता की उम्र 6 वर्ष और राम की उम्र 15 वर्ष थी! तो क्या एक 6 साल की लड़की इतना जिज्ञासु हो सकती है कि अपनी शादी और होने वाले पति का विवरण जानना चाहती थी।
वैसे अगर पद्मपुराण की कथा को सत्य ही मान लिया जाऐ तो सीता ही सारे फसाद की जड़ है, उन्होने तोते के जोड़े को त्रास दिया, तभी यह घटना घटी!
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पहले राम आये या बुद्ध
यूँ तो हिन्दू राम और बुद्ध दोनो को विष्णु का अवतार मानते है, पर उनका कहना है कि पहले रामावतार हुआ, फिर कृष्णावतार और तत्पश्चात बुद्ध का आगमन हुआ! लेकिन आप कुछ श्रोतो और पौराणिक ग्रंथो का अध्ययन करे तो मामला जरा पेचीदा लगता है!
गौतम बुद्ध ने अपने जीवनकाल मे कभी भी शायद राम का उल्लेख नही किया, या उनके दौर मे राम का अस्तित्व ही नही रहा होगा! पर राम ने अपने मुँह से बुद्ध का नाम लिया है, मतलब राम के समय मे बुद्ध का अस्तित्व था!
हिन्दू बड़ी चालाकी से हमेशा एक साजिश करते हैं, हिन्दुओं को यह पता है कि भारत मे नई चीजों की अपेक्षा प्राचीन चीजों का अधिक महत्व है, इसीलिये जब कभी भी कोई बड़ा मन्दिर बनता है तो पंडे-पुरोहित यह कहकर प्रचारित करते हैं कि यह मन्दिर बहुत पुराना है..द्वापरयुग मे यहाँ पाण्डवों ने पूजा की थी!
हर मन्दिर से इसी तरह की झूठी कहानियाँ जोड़ दी जाती है, ताकि उस मन्दिर का महत्व बढ़ जाये और वहाँ चढ़ावे मे कमी ना आये! बस ऐसे ही हिन्दूधर्म भी है, पंडे-पुरोहित हिन्दूधर्म को अतिप्राचीन बताते हैं, पर कई बार ऐसा लगता है कि हिन्दूधर्म बौद्धधर्म के बाद खड़ा किया गया! ऐसे ही यह भी प्रतीत होता है कि राम भी बुद्ध के बाद के हैं! इसका एक उदाहरण बाल्मीकि रामायण मे भी मिलता है।
बाल्मीकि रामायण (गीताप्रेस) अयोध्याकाण्ड सर्ग-109 पृष्ठ-359 पर श्रीराम अपने ही एक हितैषी 'जाबालि' से कहते है कि -"जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध (बौद्धधर्म को मानने वाला) भी दण्डनीय है!"
यहाँ रामजी ने बौद्धो को दण्ड देने की बात की है! अर्थात राम के समय मे बौद्ध थे, तो यह स्पष्ट है कि राम का अस्तित्व बुद्ध के बाद खड़ा किया गया!
इसी श्लोक मे राम नास्तिकों को भी दण्ड देने की बात करते है और कहते है -"नास्तिकों (चार्वाकी) को भी इसी प्रकार दण्ड देना चाहिये, इसलिये राजा को चाहिये कि नास्तिक को भी चोर की भाति दण्ड दें"
रामायण का यह प्रसंग एक और सवाल खड़ा करता है कि राम क्या वाकई अयोध्या मे ही पैदा हुये, या राम का चरित्र कहीं बाहर (विदेश) से आयात किया गया! क्योकि बुद्ध के बाद कोई भी इतिहासकार अयोध्या मे राम के जन्म की बात स्वीकार नही करेगा!
दूसरी बात राम को नास्तिकों से भी घृणा थी, अर्थात राम के समय मे नास्तिक थे!
इसमे जरा भी संदेह नही है कि तथागत बुद्ध एक आध्यात्मिक गुरू थे, और भारतीयों पर उनका गहरा प्रभाव था! कहीं ऐसा तो नही कि उनके प्रभाव को कम करने के लिये राम नाम का एक फर्जी पात्र पंडो द्वारा खड़ा किया गया।
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विजयदशमी रावण की पराजय पर नहीं मानयी जाती।
रोशन बौद्ध लिखित एक किताब (त्योहारों का रहस्य) मे दावा किया गया था कि दशहरे (विजयदशमी) का त्योहार रावण पर राम की जीत से नही, अपितु पुष्यमित्र शुंग द्वारा इसी दिन की गयी वृहद्रथ की हत्या की वजह से मनाया जाता है।
खोज की तो यह पता चला कि दशहरे के दिन (अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की दशमी) राम ने रावण को नही मारा था! अर्थात यह तो सरासर झूठ है कि विजयदशमी इसलिये मनायी जाती है क्योंकि इसी दिन रावण मारा गया था।
रामायण के अनुसार राम को चैत्रमास (अयोध्याकाण्ड सर्ग-3, श्लोक-4, चित्र-1) मे वनवास जाना पड़ा था, क्योंकि इसी महीने मे दशरथ उनको राजा बनाने वाले थे, पर एक नाटकीय घटनाक्रम से उन्हे अगले ही दिन वन मे जाना पड़ गया। अब यदि राम वन चैत्रमास मे गये तो चौदह साल बाद वे चैत्रमास मे ही वापस अयोध्या आ सकते थे, क्योंकि कैकेयी को दिये वचनानुसार उससे पहले उनका अयोध्या आना सम्भव ही नही था। अब इस तरह से तो कार्तिक मास मे जो दिपावली मनायी जाती है, वह भी राम के आगमन की वजह से सम्भव नही है, क्योंकि वनवास की अवधि से पाँच महीने पहले राम अयोध्या कैसे आ सकते हैं?
रामायण मे केवल इतना ही प्रमाण है कि राम चैत्रमास मे वन गये थे, पर वे वापस किस महीने मे आये इसका कोई वर्णन नही है। रामायण मे इतना जरूर लिखा है कि वे चौदह साल व्यतीत करने के बाद ही वापस आये थे, उससे पहले नही।
रामायण युद्धकाण्ड अध्याय-124/1 (चित्र-2) के अनुसार राम चौदह वर्ष बाद पंचमी तिथि को भारद्वाज के आश्रम और उसके अगले दिन छठीं तिथि को अयोध्या आये थे। हालाकि वे कौन से महीने मे आये यह तो नही लिखा है, पर इतना स्पष्ट है कि वे अमावश्या के दिन तो नही आये थे, जिस दिन दिपावली मनायी जाती है।
खैर, अब बात करते हैं दशहरे की! रामायण से एक बात तो साफ हो जाती है कि यदि राम चौदह साल बाद अर्थात चैत्र/वैशाख महीने मे वापस अयोध्या आये थे तो यह सम्भव ही नही है कि उन्होने रावण का वध अश्विन (क्वार) महीने मे किया होगा, क्योंकि युद्धकाण्ड मे साफ लिखा है कि रावण को मारने के तुरन्त बाद ही राम का वनवास खत्म हो चुका था, अतः शीघ्रता से आने के लिये उन्होने पुष्पक विमान का सहारा लिया था।
वैसे उपरोक्त बातें केवल तर्क है कि राम ने दशहरे के दिन रावण का वध नही किया था, पर इसके अलावा एक मजबूत प्रमाण भी है।
पद्मपुराण को रामायण का अखिलभाग ही माना जाता है! पद्मपुराण मे रामायण की घटनाओं को बहुत आसान और तिथि/महीने के साथ लिखा गया है।
इसी पद्मपुराण पातालखण्ड अध्याय-118, पृष्ठ-482-484 (चित्र-3,4,5,6) मे बहुत स्पष्ट लिखा है कि राम वन किस महीने मे गये? सीता हरण कब हुआ?
राम-रावण युद्ध कब शुरू हुआ? रावण वध कब हुआ और राम अयोध्या वापस कब आये?
पद्मपुराण के अनुसार राम ने रावण से चैत्र शुक्लपक्ष की द्वादशी से लेकर कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तक लगातार अठारह दिन युद्ध किया और फिर अठारहवें दिन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को ही रावण का वध किया। अर्थात राम ने चैत्रमास कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन रावण को मारा था, फिर अश्विन महीने की शुक्लपक्ष की दशमी को "विजयदशमी" क्यों मनायी जाती है?
अब सवाल यह है कि क्या सचमुच इसी दिन पुष्यमित्र शुंग ने वृहद्रथ की हत्या की थी, और अपनी इस खुशी को पड़े-पुरोहित रावणवध के रूप मे मनाते हैं? या यह मान लिया जाये कि पुष्यमित्र शुंग ही राम थे, और वृहद्रथ ही रावण, क्योंकि रामायण वाला रावण तो इस दिन नही मरा था?
दूसरी बात इसी पद्मपुराण मे यह भी लिखा है कि राम वैशाख शुक्लपक्ष की षष्ठी-तिथि को अयोध्या वापस आये थे, तो फिर कार्तिकमास के कृष्णपक्ष की अमावश्या को दिपावली क्यों मनायी जाती है?
आखिर विजयदशमी क्यों और किसकी विजय पर मनायी जाती है।
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कैकयी के साथ अन्याय।
रामायण की कैकेयी को लोग आमतौर पर एक खलनायिका ही समझते हैं, क्योंकि इन्ही की वजह से राम को चौदह वर्ष के लिये वन मे जाना पड़ा था! पर इसके पीछे एक दूसरी कहानी भी है. सच्ची बात को दबाने के लिये एक झूठी कहानी कैकेयी के साथ भी बनायी गयी।
रामायण के अनुसार एक बार राजा दशरथ देवताओं की सहायता के लिये असुरों से युद्ध करने देवलोक गये तथा उनकी प्रिय रानी कैकेयी भी उनके साथ गयी।
युद्ध के दौरान दशरथ के रथ का धुरा टूट गया, तब समझदार कैकेयी ने धुरे मे अपना हाथ लगाकर रथ को टूटने से बचाया!
युद्ध समाप्त होने के बाद जब दशरथ को यह बात पता चली तो वे कैकेयी की समझदारी से खुश होकर उससे दो वर मांगने को कहने लगे, जिसे कैकेयी ने उचित अवसर पर मांगने को कह दिया था। रामायण के अनुसार कैकेयी ने यही दो वर मांगकर राम को वनवास भेज दिया, और भरत को राजा बनाने की कुचेष्टा की।
वैसे सम्भवतः यह एक झूठी कहानी है, वास्तव मे रणक्षेत्र मे महिलाऐं जाती ही नही थी! अगर कैकेयी गयी भी थी तो रथ आसमान मे उड़ रहा था, भला पहिऐ के भीतर अपना हाथ डालने के बाद कैकेयी कहाँ खड़ी थी? भला एक महिला का कोमल हाथ कब तक रथ का धुरा बन सकता था?
सच्चाई यह है कि कैकेयी कैकेय देश के राजा अश्वपति की पुत्री थी. कैकेयी बहुत सुन्दर थी, और राजा दशरथ उस पर मोहित थे! पर दशरथ पहले से ही विवाहित थे, अतः अश्वपति कैकेयी की शादी दशरथ से करने को तैयार नही थे। अन्ततः कैकेयी को पाने के लिये दशरथ ने अश्वपति को वचन दिया था कि कैकेयी से जो पुत्र पैदा होगा, मै उसी को राजा बनाऊँगा. दशरथ के इस वचन से अश्वपति मान गये, और उन्होने कैकेयी की शादी दशरथ से कर दी!
यह कथा पुराणों (खासकर पद्मपुराण) मे मिलती भी है कि किस तरह दशरथ ने भीष्म पितामह के पिता शान्तनु जैसा वर देकर कैकेयी को प्राप्त किया था।
कहते हैं कि "रघुकुल रीति सदा चली आयी, प्राण जाये पर वचन न जायी" लेकिन यह भी सरासर झूठ ही है! अपने वचनानुसार दशरथ कैकेयी के पुत्र (भरत) को राजा बनाते, पर दशरथ को राम अधिक प्रिय थे, अतः मन ही मन उन्होने राम को राजा बनाने का संकल्प किया! दशरथ अपना वचन तोड़ रहे थे, इसलिये राम के राज्याभिषेक के समय उन्होने भरत को ननिहाल भेज दिया था, पर कैकेयी ने उनकी एक भी न चलने दी!
जब राम वन मे चले गये, और भरत ननिहाल से वापस आये तो उन्हे पूरे घटनाक्रम को सुनकर बहुत दुःख हुआ, और वो राम को मनाने के लिये सारे मंत्रियों को लेकर वन मे गये। वन मे वशिष्ठ ने राम से कहा कि श्रृष्टि की परम्परा अनुसार ज्येष्ठ-पुत्र ही राजा बनता है, अतः हे राम, आप भी अयोध्या का राज्य ग्रहण करो!
भरत ने भी राम से कहा कि आप वापस लौट चलो, तब जवाब मे राम ने भरत को वह सच बताया, और कहा-
"पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्धहन् । मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्मम् ।।" (अयोध्याकाण्ड-107/3, चित्र-1)
अर्थात- "हे भरत! पिताजी ने तुम्हारी माता (कैकेयी) से विवाह करते समय ही तुम्हारे नाना को वचन दिया था कि कैकेयी से जन्मा पुत्र ही मेरे बाद राजा बनेगा।"
अब सवाल यह होता है कि जब राम यह सब जानते थे तो फिर वे दशरथ की बात मानकर राजा बनने को तैयार क्यों हुये? दूसरी बात अगर रघुकुल मे वचन का इतना महत्व था, तो दशरथ ने अपना वचन क्यों तोड़ा? इन दोनो महापुरुषों (राम और दशरथ) की लाज बचाने के लिये रामकथा के लेखकों ने बेचारी कैकेयी को ही अपराधी बना डाला, जबकि वास्तव मे असली अपराधी तो दशरथ थे! यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है कि दशरथ के वचनानुसार अयोध्या के राजा केवल भरत बन सकते थे, या फिर भरत स्वतः राज्य त्याग देते, तभी कोई दूसरा राजा बन सकता था।
राम को यह बात भलीभांति मालुम थी, यही वजह है कि जब राम चौदह साल बाद वन से वापस लौटकर अयोध्या आ रहे थे तो उन्होने पहले हनुमान को भरत से मिलने भेजा था। राम ने हनुमान से कहा था कि "हे हनुमते! तुम जाकर भरत से कहना कि मै (राम) वानरराज सुग्रीव तथा अन्य महाबलि मित्रों के साथ वन से वापस आ रहा हूँ। मेरे वापस आने की बात सुनकर भरत की जैसी मुख-मुद्रा हो, उसका अवलोकन करना। भरत के मनोभाव को समझना की मेरे वापस आने से वह खुश है या दुःखी?
इतने दिनों तक समस्त ऐश्वर्य से भरपूर राज्य भोगने से यदि भरत के अन्दर राज्य के लिये जरा भी लालच आया हो तो तुरन्त वापस आकर मुझे बताना, मै फिर राजधानी मे न जाकर कहीं अन्यत्र चला जाऊँगा और तपस्वी जीवन व्यतीत करूँगा।" (युद्धकाण्ड, सर्ग-125, श्लोक-12-17, चित्र-2)
उपरोक्त उदाहरणों से साफ पता चलता है कि अयोध्या के राज्य पर भरत का ही अधिकार था! कैकेयी ने कुछ भी गलत नही किया था और भरत महान थे जिन्होने स्वयं राज्य त्यागकर राम को राजा बना दिया था।
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राम और बाली।
राम ने बालि को पीछे से नही बल्कि योद्धाओं की तरह युद्ध करके सामने से उसके सीने मे तीर मारा था! सबसे पहली बात तो बालि के पास ऐसी कोई शक्ति थी ही नही कि वो अपने शत्रु की आधी ताकत खींच ले! रामायण मे साफ लिखा है कि बालि को सामने आने वाले योद्धा की आधी ताकत क्षीण हो जाती थी! यह इस बात का प्रतीक है कि बालि लम्बा-चौड़ा और कद-काठी वाला योद्धा था!
दूसरी बात यदि राम के हाथों बालि को पीछे से छुपकर मरवाना था तो सुग्रीव और जामवन्त ने राम की शक्ति का परीक्षण क्यों किया? सुग्रीव ने साफ ही कहा है कि मै कैसे मान लूँ कि आप बालि को युद्ध मे मार गिराओगे। क्यों राम से सात पेड़ो को एक बाण से कटवाया गया? आखिर पीछे से तो कोई भी छुपकर मार सकता था.
तीसरी बात जब लंका मे राम और रावण का युद्ध चल रहा था तब रावण राम को शर्मिंदा करने के लिये कहता है कि अरे वो वन-वन भटकते वनवासी तू क्या त्रिलोक-विजयी रावण से युद्ध करेगा! रावण ऐसे ही कही ताने राम को मारता है, पर उसने भी एक बार यह नही कहा कि तुमने बालि को पीछे से मारकर अपने कुल को कलंकित कर दिया! अगर राम ने ऐसा किया होता तो रावण जरूर यह ताना भी मारता।
चौथी बात जब मेघनाद और लक्ष्मण का युद्ध चल रहा था, तब मेघनाद ने मायावी युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया! इससे क्रोधित होकर लक्ष्मण राम के पास आये और बोले कि हे भइया! वह धूर्त मायावी युद्ध कर रहा है, अतः आप मुझे ब्रह्मास्त्र चलाने की अनुमति दो! राम ने कहा कि हे लक्ष्मण! ब्रह्मास्त्र जैसे विध्वंसक अस्त्र का प्रयोग कभी यूँ ही नही करना चाहिये, यह अधर्म होगा। लक्ष्मण बोले कि भइया ये असुर कोई युद्धनीति नही मानते, ये खुद अधर्म करते हैं। राम ने कहा कि वो चाहे जो करें, पर हमे अनैतिक तरीके से युद्ध नही करना चाहिये। ऐसा कहकर राम ने लक्ष्मण को ब्रह्मास्त्र चलाने से मना कर दिया! इस बात से साफ पता चलता है कि राम युद्ध मे भी छल-कपट या अनैतिकता का मार्ग नही अपनाते थे! फिर भला वही राम छलपूर्वक बालि को क्यों मारेंगे।
पाँचवीं बात रामायण और रामचरित मानस मे बालि को किष्किंधा का राजा बताया गया है, पर पढ़ने के बाद तो ऐसा लगता है कि पूरे किष्किंधा मे बालि अकेला ही रहता था! न तो उसकी कोई प्रजा थी, और न ही मंत्री तथा सेना!
अब यदि राम ने उसे पीछे से छलपूर्वक मारा तो फिर उसकी सेना या प्रजा ने इसका विरोध क्यों नही किया? सुग्रीव और राम के खिलाफ किष्किंधा की प्रजा ने विद्रोह क्यों नही किया?
वाल्मीकि रामायण (गीताप्रेस) किष्किंधाकाण्ड, सर्ग-19 श्वोक-11-12 मे साफ लिखा है कि जब युद्ध मे राम ने बालि को मार गिराया तो उसकी सेना भाग खड़ी हुई। भागते हुये बन्दरों को रास्ते मे बालि की पत्नि तारा मिली, और बन्दरों से बोली कि यदि राज्य के लोभी उस सुग्रीव ने राम के हाथों अपने ही भाई को मरवा दिया है, तो तुम लोग भाग क्यों रहे हो?
तब बालि के सैनिक वानरों ने कहा कि हे देवी! तुम्हारा पुत्र (अंगद) अभी जीवित है, तुम लौट चलो और अंगद की रक्षा करो! राम के रूप मे स्वयं यमराज आ गये हैं जो बालि को मारकर अपने साथ ले जा रहे हैं। अगले श्वोक मे वही वानर तारा से कहते हैं कि- "बालि के चलाये हुये वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओं को अपने वज्रतुल्य बाणों से विदीर्ण करके राम ने बालि को मार गिराया है"। इस श्वोक मे वानर साफ कहते हैं कि बालि ने राम के ऊपर पेड़ उखाड़कर फेंके, और बड़े-बड़े पत्थरों को भी उनके ऊपर फेंका! पर राम ने अपने बाणों से पेड़ों और पत्थरों को विदीर्ण करके बालि को मार दिया।
अब सवाल यह है कि यदि राम बहेलिये की तरह छुपे थे, तो बालि उन पर पेड़ और पत्थर कैसे फेंक रहा था। प्रतीक तो ऐसा हो रहा है कि पहले बालि और सुग्रीव का युद्ध हुआ, और जब सुग्रीव परास्त हुये तो राम ने बीच मे आकर बालि से युद्ध किया। बालि ने कहा भी है की युद्ध मेरा और सुग्रीव का था, तो तुम बीच मे क्यों आये? युद्ध मे जब बालि अस्त्र-शस्त्रहीन हो गया तब उसने राम पर पेड़ और पत्थर फेंके! और अन्ततः राम ने अपने नुकीले तीर उसके सीने मे उतार दिये।
वस्तुतः रामायण मे मिलावट का एक दौर चला! आज भी विद्वान कहते हैं कि रामायण मे हजारों श्लोक मिलावटी है! यहाँ तक की पूरा का पूरा उत्तरकाण्ड मिलावटी ही है! नरसिंहपुराण और विष्णुपुराण से एक नही दर्जनों सबूत दे सकता हूँ कि श्रीकृष्ण ने कभी रासलीला की ही नही!
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राम और बाली।
यह तो लगभग सबने पढ़ा ही होगा कि वानरराज बालि के पास एक ऐसी माला थी जिसे पहनने से वह अपने शत्रु का आधा बल खींच लेता था, और उसी से वो अपराजेय हो गया था! यही वजह थी कि राम ने बालि को पेड़ के पीछे से छुपकर मारा था! मै सोचता हूँ कि आखिर बालि के माले मे ऐसा कौन सा चुम्बक लगा था जिससे वह सामने वाले की आधी शक्ति खीच लेता था?
बाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-11 मे बाल्मीकि जी ने लिखा है कि जो शत्रु बालि से युद्ध करने जाता था, बालि के सामने आते ही उसकी आधी शक्ति क्षीण हो जाती थी, पर कहीं ऐसा नही लिखा है कि बालि उसकी शक्ति को खींच लेता था!
वास्तव मे बालि कद-काठी से बहुत हट्टा-कट्टा था! वह अत्यन्त बलवान और गठीले बदन का मालिक था! यह साधारण सी बात है कि यदि कोई अपने से दोगुने लम्बे-चौड़े योद्धा से युद्ध करे तो उसे देखते ही उसकी आधी शक्ति जैसे क्षीण हो जाती है! इसमे खीचने जैसी कोई बात नही थी, बल्कि जो योद्धा बालि से युद्ध करने जाता था, वह बालि के गठीले और ऊँचे शरीर को देखकर ही ऐसा अनुभव करता था कि जैसे उसकी आधी शक्ति क्षीण हो गयी है! बालि वास्तव मे कितना बलिष्ठ था उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वयं हनुमान और जामवंत भी उससे लड़कर सुग्रीव का राज्य वापस दिलाने मे नाकाम थे! इसीलिए तो इन लोगों ने राम के हाथों धोखे से बालि का वध करवाया!
वैसे राम ने जिस तरह बालि को मारा वह भी किसी घृणित कृत्य से कम नही था!
राम ने केवल सुग्रीव की बात सुनकर बालि को मारने की प्रतिज्ञा कर ली! जबकि धर्मानुसार राम को एक बार बालि से भी बात करनी चाहिये थी, और उसका भी पक्ष सुनना चाहिये था! यही नही राम को प्रयास करना चाहिये था कि दोनो भाइयों मे समझौता करवा देते, सम्भव है कि बालि राम की बात मान जाता!
दूसरी बात जब राम ने बालि को पेड़ के पीछे से छुपकर मारा, तब बालि ने राम को धिक्कारते हुये कहा कि तुम कायर थे, अगर क्षत्रिय थे तो मुझे सामने से युद्ध मे हराते! तब राम ने जवाब दिया कि- "हे बालि! मै क्षत्रिय हूँ, और धर्मज्ञ राजा भी मृगया (शिकार) मे विभिन्न जानवरों का वध करते थे! हे बालि! तुम भी शाखामृग (बन्दर) हो, और मैने क्षत्रियों की भांति तुम्हारा शिकार किया है! शिकार चाहे सामने से करें या पीछे से छुपकर. उसमे निन्दा नही, अतः तुम्हारा वध अधर्म नही है"।
ये संस्कार थे भगवान श्रीराम के, एक सूरवीर राजा को पहले छुपकर तीर मार दिया और बाद मे सफाई दे दिया कि मैने तो तुम्हारा शिकार किया है!
वाह्ह प्रभु श्रीराम! क्या तर्क दिया आपने, धन्य हो आप। जिसे मारना था, उसे जानवर घोषित कर दिया और जिस सुग्रीव से आपको काम था उसे सीने से लगाये रखा। उक्त कथा वाल्मीकि रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-18 श्लोक-39-42 मे वर्णित है!
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सीता का जन्म
सीताजी के जन्म के बारे मे आमतौर पर लोग यही जानते हैं कि उनका जन्म भूमि से हुआ था। ऐसा इसलिये माना जाता है क्योंकि वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग-66 श्लोक-13-14 मे जनक ने सीता का परिचय देते हुये कहा है कि "एक दिन मै यज्ञ के लिये खेत जोत रहा था, और उसी समय जोती हुई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई! पृथ्वी से प्रकट होने के कारण मैने उसका नाम सीता रखा"
सबसे पहली बात तो भूमि के अन्दर से किसी मनुष्य का जन्म लेना अप्राकृतिक और अवैज्ञानिक दोनो है! दूसरी बात यदि कथानुसार जनक के राज्य मे कई सालों से आकाल (सूखा) पड़ा था, जिसके निवारण के लिये वे यज्ञ-हेतु भूमि जोत रहे थे। अगर यह सच है तो वर्षों तक वहाँ अकाल पड़ने से धरती बंजर होकर बिना पानी के पत्थर जैसी कड़क हो गयी होगी। जब धरती मे नमी थी ही नही तो हल जोता कैसे गया कि हल कि फाल (Coulter) धरती के इतना भीतर गया और सीता पैदा हो गयी?
खैर अब बात करते हैं कि सीता वास्तव मे पैदा कैसे हुई?
वाल्मीकि ने रामायण मे कई प्रसंग "गौण" भाव मे लिखे हैं। वाल्मीकि रामायण का सही अर्थ केवल वही विद्वान बता सकता है जो मनुस्मृति का ज्ञाता हो, क्योंकि वाल्मीकि ने बहुत सारी बातें मनुस्मृति के आधार पर अलंकारित करके लिखी है। राजा जनक द्वारा "खेत जोतने" की बात भी ऐसी ही "गौण" भाव मे लिखी गयी है।
मनुस्मृति-9/33 मे एक श्लोक लिखा है-
"क्षेत्रभूता स्मृता नारी बीजभूतः स्मृत पुमान।
क्षेत्रबीजसमायोगात् सम्भवः सर्वदेहिनाम् ।।"
अर्थात- स्त्री को क्षेत्र (खेत) रूप, तथा पुरुष को बीजरूप कहा गया है। खेत और बीज के संयोग से सभी जीवों की उत्पत्ति होती है।
इस श्लोक मे मनु ने स्त्री को खेतरूप माना है। बस.. वाल्मीकि ने भी मनुस्मृति के आधार पर ही स्त्री को खेत लिखा है, जिससे यह सारा भ्रम पैदा हुआ। वाल्मीकि ने जब रामायण लिखा होगा तब उन्होने सोचा भी नही होगा कि आगे ऐसे लोग इसका अनुवाद करेंगे जिन्हे उनके "गौण" भावों का अर्थ निकालना भी नही आता होगा। मनु ने केवल एक श्लोक मे नही, बल्कि अध्याय-9 श्लोक-34-35-36 और 37 मे स्त्री को खेतरूप ही लिखा है।
असल मे ये सीता के जन्म को लेकर सारी गड़बड़ी एक श्लोक का गलत अर्थ निकालना और उसके बाद पद्मपुराण पातालखण्ड मे इस कहानी को लिखकर और मजबूती दे देना ही है। वैसे पद्मपुराण पातालखण्ड भले ही सीता को भूमि से जन्मी मानता है, पर अन्त मे भूमि मे समाहित होने वाली बात को वह भी नकार देता है।
पद्मपुराण के पातालखण्ड अध्याय-33 मे साफ लिखा है कि जब सीता वाल्मीकि के आश्रम से वापस आयी तब महर्षि अगस्त्य ने सोने की सीता को हटाकर उसकी जगह असली सीता को बैठाया, और राम ने अपना यज्ञ पूर्ण किया। यही नही.... इसी अध्याय मे आगे लिखा है कि उसके बाद राम और सीता ने तीन अश्वमेध यज्ञ और भी किये। अर्थात पद्मपुराण यह नही मानता कि सीता जमीन मे समाहित हो गयी थी।
सीता का जन्म कैसे हुआ, और उनकी माँ कौन थी? इसका जवाब भी रामायण मे ही है। वाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्ड-118/88 और सुन्दरकाण्ड-28/2 मे सीता ने सुनैना (जनक की पत्नि) को अपनी "जननी" कहा है। अर्थात सुनैना ही सीता की माँ थी. राजा जनक ने जिस खेत की तरफ इशारा किया है वह कोई और नही बल्कि उनकी पत्नि सुनैना ही थी।
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क्या वाल्मीकि ब्राह्मण थे।
पहली बात तो वाल्मीकि जैसा कोई पात्र था भी या नही, यह भी एक प्रश्न हो सकता है, लेकिन यदि ऐसा कोई पात्र था तो वह एक विद्वान ब्राह्मण ही था।
पुराणों के अनुसार वाल्मीकि ब्रह्मर्षि थे, और किसी डाकू-लुटेरे का ब्रह्मर्षि बनना मुश्किल ही नही, नामुमकिन है।
वास्तव मे ये वाल्मीकि के डाकू-लुटेरे होने वाली कथा पद्मपुराण से आयी! इस कथा को तुलसीदास ने राम की महिमा का बखान करने के लिये मानस मे लिखकर घर-घर पहुँचा दिया।
तुलसी ने लिखा है- "उल्टा नाम जपा जग जाना। बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।।"
अर्थात- वाल्मीकि (डाकू-लुटेरा) भी राम का उल्टा नाम जपने से भी ब्रह्म के समान हो गया।
खैर अब हम वाल्मीकि की वास्तविकता का पता लगाने का प्रयत्न करते हैं।
वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग-96 श्लोक-19 (चित्र-1) मे वाल्मीकि ने खुद ही राम को अपना परिचय देते हुये कहा है कि "हे रघुनन्दन! मै प्रचेता का दसवाँ पुत्र वाल्मीकि हूँ"
वाल्मीकि ने यहाँ खुद को किसी भंगी या डाकू-लुटेरे का पुत्र नही बताया है, बल्कि प्रचेता का पुत्र कहा है। अब सवाल यह होता है कि प्रचेता कौन थे? प्रचेता को जानने के लिये मनुस्मृति का अध्ययन करना पड़ेगा।
मनुस्मृति अध्याय-1/34-35 (चित्र-2-3)मे स्वयं ब्रह्मा मनु से कहते हैं कि-
"अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सदुश्चरम् । पतीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश।। मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च।।"
अर्थात- मैने अतिकठोर तप करके सृष्टि सृजन की इच्छा से दस महान ऋषियों को पैदा किया। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वशिष्ठ, भृगु और नारद, ये उन दस ऋषियों के नाम हैं।
इन दोनो श्लोकों से स्पष्ट होता है कि प्रचेता ब्रह्मा के पुत्र थे और वाल्मीकि प्रचेता के। अर्थात, वाल्मीकि जन्म से भी ब्राह्मण ही थे और उनका जन्म एक ऋषि के घर मे हुआ था, न कि किसी लुटेरे के घर मे।
इसके अलावा भी वाल्मीकि की कथा स्कन्दपुराण मे भी मिलती है! स्कन्दपुराण आवन्त्यखण्ड अध्याय-286 (चित्र-3-5) मे वाल्मीकि की कथा निम्न प्रकार लिखी है- प्राचीनकाल मे सुमति नामक एक भृगुवंशी ब्राह्मण थे, जिनका पुत्र अग्निशर्मा लुटेरा हो गया था। एक बार उसने जंगल मे सप्तऋषियों को लुटने के लिये घेर लिया! सप्तऋषियों ने उससे कहा तुम लोगो की हत्या करके अपने माता-पिता के लिये जो लूटपाट करते हो, क्या उसके पाप मे तुम्हारे माता-पिता भी भागीदार होंगे?
अग्निशर्मा ने जब यही बात अपने माता-पिता से पूँछा तो उसके माता-पिता ने यह कहकर पाप का भागीदार होने से मना कर दिया कि हमारा भरण-पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है। इसके बाद अग्निशर्मा ने दुःखी होकर घोर तप किया! अग्निशर्मा ने ऐसा घोर तप किया कि उसके शरीर के ऊपर दीमकों मे अपनी बॉबी (वल्मीक) बना दी, और इसीलिये आगे चलकर उस (अग्निशर्मा) को "वाल्मीकि" नाम दिया गया।
इस कहानी मे भी अग्निशर्मा अर्थात वाल्मीकि को भृगुवंशी ब्राह्मण ही बताया गया है, न कि कोई भंगी।
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वाल्मीकि।
वाल्मीकि के बारे मे एक चौपाई कही जाती है, जो निम्न है-
"उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।।"
अर्थात- एक किवदंती के अनुसार वाल्मीकि ने राम के उल्टे नाम, अर्थात "मर - मरा" का जाप करके ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर ली थी।
यह कहानी आयी कहाँ से? संक्षिप्त भविष्यपुराण (गीताप्रेस) प्रतिसर्गपर्व - चतुर्थखण्ड, अध्याय-198 मे एक कथा लिखी है। कथानुसार प्राचीन काल मे मृगव्याध नामक एक अधम ब्राह्मण था, जो मार्ग मे आवागमन करने वाले यात्रियों को लूटता था। वह यात्रियों को मार भी डालता था, और खासकर ब्राह्मणों की हत्या करने मे उसे अधिक आनन्द आता था। एक बार उसने सप्तऋषियों को मारने के लिये रोक लिया! तब ऋषियों ने उसे समझाया कि तुम जीवहत्या करके जो महापाप कर रहे हो, उसे भरेगा कौन?मृगव्याध ने कहा कि मै और मेरे परिवार वाले। तब ऋषियों ने कहा कि तुम अपने परिवार वालों से पूँछकर आओ कि वे तुम्हारे पाप मे भागी होंगे? जब मृगव्याध ने यह बात अपने परिजनों से पूँछा तो उन्होने यह कहकर पाप मे भाग लेने से मना कर दिया कि हमारा पालन-पोषण करना तुम्हारा धर्म है, फिर हम तुम्हारे पाप मे भागी क्यों बने?
अब मृगव्याध को बड़ी ग्लानि हुई, और वह उन्ही ऋषियो के पास आकर अपने पाप के प्रायश्चित का मार्ग पूँछने लगा। तब ऋषियों ने कहा कि तुम "राम-राम" का जाप करो। अब मृगव्याध ने इतने अधर्म किये थे कि वह राम-राम न कह सका, पर मरा-मरा कहता रहा और इसी से वह पापहीन होकर ब्रह्मऋषि बन गया।
सबसे पहले तो सवाल यह है कि राम के नाम मे ऐसा क्या प्रभाव था कि उसे जपने से कोई ब्रह्मऋषि बन जाये? यदि राम का नाम सचमुच इतना प्रभावी था तो दशरथ राम-राम करते ही क्यों मर गये? आज के भाजपाई नेता रोज राम-राम चिल्लाते हैं, उनमे से कितने ऋषि बने? सबसे पहले तो यह समझना होगा कि राम के पास या उनके नाम मे कोई चमात्कारी शक्ति नही है। कहने को तो राम ने अपने चरणों के स्पर्श से अहिल्या को पापहीन कर दिया था, फिर वे उसी चरणों से छूकर सीता को पवित्र क्यों नही कर पाये? क्यों उन्हे वन मे भेजा? यदि राम के नाम का उल्टा जाप करने से एक महापापी ब्रह्मऋषि बन जाता है तो दशरथ तो रोज अपने बेटे (राम) को राम-राम करके बुलाते होंगे, फिर वे श्रवणकुमार के पिता के श्राप से मुक्त क्यों नही हुये।
यह कोई इकलौती कथा नही है, रामचरित मानस के अन्त मे गीताप्रेम ने तुलसीदास की जीवनी छापी है, जिसमे लिखा है कि जब तुलसीदास पैदा हुये तो वे रोये नही, बल्कि उनके मुँह से "राम" शब्द निकला था। एक बार मान लेते हैं कि तुलसीदास पर राम की बड़ी कृपा थी और वे पैदा होते ही राम-राम करने लगे, तो भाई...मरा-मरा करके वाल्मीकि ब्रह्मज्ञानी हो गये, और राम-राम करके तुलसीदास मूर्ख ही क्यों रहे? उन्हे सांप और रस्सी के बीच का फर्क नही पता चलता था, और यही नही, वे जीवन भर इधर-उधर ठोकरे खाते रहे।
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रामसेतु।
अगर राम का नाम लिख देने से पत्थर पानी मे तैर रहे थे तो फिर वानरो और भालुओं पर भी राम-राम लिखकर समुद्र मे उतार देना चाहिये था! यदि राम नाम के प्रभाव से पत्थर नही डूबे तो फिर वे भी न डूबते और ऐसे ही समुद्र पार कर लेते तथा पुल बांधने की जरूरत भी न पड़ती। अगर नल और नील जिस चीज को छूकर पानी मे फेंक देते थे वो डूबती नही थी, तो फिर वानरों और भालुओं को भी नल-नील छूकर समुद्र मे फेंक देते और वो भी बिना डूबे समुद्र पार कर लेते। सोचो यदि राम के पास ऐसे दो-दो विकल्प थे तो उन्हे क्या जरूरत थी पुल बनाने की?
राम-राम लिखने से पत्थर पानी मे नही डूबे थे, तो यह केवल किदवंती मात्र है! इस बात के कहीं भी कोई प्रमाण नही है। दूसरी बात नल-नील के छूने वाली है, जो तुलसीदास की दिमागी उपज है! बाबा तुलसी ने रामचरित मानस सुन्दरकाण्ड-59 मे लिखा है-
"नाथ नील नल द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।"
अर्थात- समुद्र राम से कहता है कि हे नाथ! आपकी सेना मे नल और नील दो भाई है, जिन्हे लड़कपन मे क्रोध मे आकर एक ऋषि ने आशिर्वाद दिया था कि उनके स्पर्श से भारी पहाड़ भी जल मे डूबेंगे नही।
तुलसीदास जबरन राम को भगवान और चमत्कारी पुरुष बनाने पर उतारू थे, और यह सब उसी कड़ी का एक हिस्सा था।
वाल्मीकि ने रामायण युद्धकाण्ड सर्ग-22 श्लोक-45-70 मे साफ लिखा है कि न तो कोई पत्थर तैरा और न ही किसी पत्थर पर राम का नाम लिखा गया। वाल्मीकि लिखते है कि समुद्र ने राम से कहा कि सौम्य! आपकी सेना मे जो नल नामक वानर है, वह विश्वकर्मा का औरसपुत्र है और शिल्पकर्म मे अपने पिता जैसा ही निपुड़ है!
यहाँ यह समझना चाहिये कि नल को एक इंजीनियर जैसा बताया जा रहा था, जिनके पास शिल्पकर्म की योग्यता थी। फिर राम ने नल से पुल बांधने के बारे मे पूँछा कि क्या यह सम्भव है? नल ने कहा कि प्रभु मै समुद्र पर पुल बांधने मे समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही कार्य प्रारम्भ कर दे।
अब जरा श्लोक-55-57 ध्यान से पढ़े! यहाँ लिखा है कि वानर बड़े-बड़े पत्थरों और वृक्षों को उखाड़कर समुद्र मे डाल रहे थे। वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षों से समुद्र पाटने लगे।
इन तीनों श्लोकों मे साफ दर्शाया गया है कि पत्थरों और विभिन्न प्रकार के पेड़ों से वानर समुद्र पाट रहे थे! वैसे हमे यह भी ज्ञात रहना चाहिये कि ये कोई आज की नही बल्कि साढ़े सात हजार साल पुरानी घटना है! तब से लेकर अब तक दुनिया की भौगोलिक स्थिति बहुत बदली है। सम्भवतः उस समय समुद्र इतना गहरा न रहा होगा, क्योंकि वैज्ञानिक भी मानते हैं कि समुद्र का जलस्तर पहले की अपेक्षा ऊपर हुआ है, और अभी भी लगातार बढ़ रहा है! शायद उसी का परिणाम है कि द्वारिका जैसे नगर समुद्र मे डूब गये, और जिसके अवशेष अभी भी समुद्र मे हैं।
वाल्मीकि आगे लिखते है कि कुछ वानर सूत पकड़े थे तो कुछ नापने के लिये दण्ड पकड़े थे तथा वे काष्ठों द्वारा भिन्न-भिन्न स्थानों पर पुल बांध रहे थे। वे वानर दानवों की तरह पहाड़ उठाकर समुद्र मे फेंक रहे थे और इसी तरह उन्होने पहले दिन चौदह योजन, दूसरे दिन बीस योजन, तीसरे दिन इक्कीस योजन, चौथे दिन बाइस योजन तथा पांचवे दिन तेइस योजन पुल बनाया! इस तरह सारे वानरों ने मिलकर पाँच दिनों मे सौ योजन लकड़ी और पत्थर का पुल बनाया। लेकिन पूरे रामायण मे वाल्मीकि ने यह कहीं नही लिखा है कि पत्थर तैर रहे थे, या वानरों ने पत्थर पर राम का नाम लिखा।
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राम के वर्णन में अश्लीलता।
हिन्दु धर्मशास्त्रों मे हनुमान को बहुत बुद्धिमान बताया गया है, "बुद्धिमतां वरिष्ठं" और "विधावान गुनि अतिचातुर" जैसे शब्दो से सुशोभित किया गया हैं!
अब मै आपको हनुमान की बुद्धिमानी का एक उदाहरण देता हूँ. यह बात तब की है जब हनुमान सीताजी को खोजते हुये लंका के अशोक वाटिका पहुँचे, हनुमानजी ने सीताजी से कहा कि मै श्रीराम का दूत हूँ. पर सीता नही मान रही थी, सीताजी बोली कि आप बताओ रामजी देखने मे कैसे है तो मै मान जाऊँ.
फिर हनुमान जी ने रामजी का वर्णन करना शुरू किया. हनुमानजी बोले कि रामजी के बाल घुँघराले और आँखे लम्बी है, और रंग सांवला है! यह सब बताते-बताते हनुमानजी सीता से बोले कि श्रीराम के केशों का अग्रभाग, अण्डकोष और घुटने ये तीनो बराबर है. स्तनो (छाती) का अग्रभाग धंसा है, पुष्ट (जांघे) सुडौल है और शिश्न (लिंग) चिकना है!
(गीताप्रेस, बाल्मीकि रामायण/सुन्दरकाण्ड सर्ग-35 श्लोक-17/18 पृष्ठ संख्या- 693)
हनुमान ने बड़ी गम्भीर बात कह दी, सवाल यह है कि हनुमानजी ने रामजी की जांघे,अण्डकोष और लिंग कब और कैसे देखा. अगर कभी अन्दर-बाहर देख भी लिया तो सीताजी को बताने कि क्या जरूरत थी! क्या यहीं हनुमान जी की बुद्धामानी है कि जिसे माँ कहते हैं उसी के सामने अण्डकोष और लिंग की बात कर रहें है, और सीताजी भी यह सुनकर क्या सोंच रही होगी!
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हनुमान।
गणेशजी की ही तरह हनुमानजी के स्वरूप और जन्म को लेकर भी काफी भ्रांतियाँ हैं। रामायण समेत तमाम पुराणों मे हनुमानजी के जन्म को लेकर अलग-अलग कहानियाँ लिखी हैं।
हनुमानजी के जन्म को लेकर सबसे पहली कथा रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-66 मे मिलती है! कथानुसार एक दिन अंजना पर्वत शिखर पर विचरण कर रही थी, तभी पवनदेव की दृष्टि उन पर पड़ी! अंजना की सुन्दरता को देखकर पवनदेव काम-मोहित हो गये, और झपटकर अंजना को अपनी भुजाओं मे भरकर सीने से लगा लिए! अंजना पतिव्रता नारी थी, उसने पवनदेव को धिक्कारते हुये कहा कि तुम कौन हो जो मेरा सतित्व नष्ट करने पर तुले हो? पवनदेव ने कहा कि मै वायु का देवता पवन हूँ, मै तुम्हारे सतित्व को नष्ट नही करूँगा, बस तुमसे मानसिक समागम करके अपने जैसा ही बलवान और वेगवान पुत्र उत्पन्न करूँगा! हे देवी! इससे मेरी इच्छा भी पूरी हो जायेगी और तुम्हारा सतीत्व भी बचा रहेगा!
इसके बाद पवनदेव ने जो समागम किया उसी का परिणाम था कि हनुमान का जन्म हुआ! इसीलिये हनुमान को "पवनपुत्र" भी कहा जाता है! (चित्र-1&2)
दूसरी कथा शिवपुराण शतरुद्रसंहिता अध्याय-10 मे लिखी है। इस कथानुसार जब विष्णु ने मोहिनी का रूप बनाया तो उस अद्वितीय सुन्दरता को देखकर शिवजी कामातुर हो गये और उनका वीर्यपात हो गया। तब सप्तऋषियों ने उस वीर्य को एक पात्र मे रख लिया और बाद मे उसी शिव-वीर्य को अंजना के कान-मार्ग से गर्भाशय मे स्थापित कर दिया और उसी के परिणाम-स्वरूप हनुमान का जन्म हुआ! यही कारण है कि हनुमान को शिव का रुद्रावतार भी कहते हैं। (चित्र-3)
वैसे शिवपुराण भले ही हनुमान को शिव का अवतार बताता है, पर पद्मपुराण पातालखण्ड अध्याय-119 मे तो शिव और हनुमान का युद्ध तक लिखा है, जिस युद्ध मे हनुमान अपने गदा से मार-मारकर शिव की पसलियां तोड़ डालते हैं! (चित्र-4 पढ़कर देख लें)
खैर हनुमान जन्म की तीसरी कथा स्कन्दपुराण वैष्णव-भूमिवाराहखण्ड अध्याय-73 मे लिखी है। यहाँ लिखा है कि अंजना का विवाह केशरी नामक वानर से हुआ, पर कई वर्षों बाद भी उन्हे संतान पैदा न हुई। इसके बाद अंजना ने मतंगऋषि के आज्ञानुसार वायुदेव की घोर तपस्या की. अंजना के तप से प्रसन्न होकर वायुदेव अंजना के पास ही रहने लगे तथा उनके आशिर्वाद से ही अंजना ने हनुमान को जन्म दिया। (चित्र-5)
इस पुराण मे जैसा लिखा है उससे तो नियोग वाला मामला लगता है। खैर जो भी हो, पर हनुमानजी के जन्म के बारे मे सत्य कहना मुश्किल ही है।वैसे मै यहाँ यह बताता चलूँ की हनुमान बन्दर नही बल्कि वानर थे। हनुमान जी कर्नाटक के आदिवासी समुदाय से आते थे जो वन मे रहने के कारण "वानर" कहे जाते थे।
आज भी आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय पशु कंगारू की वजह से "कंगारू" ही कहा जाता है, और न्यूजीलैण्ड के खिलाड़ियों को कीवी, पर वे न तो कंगारू हैं और न ही कीवी। बस ऐसा ही हनुमानजी के साथ भी हुआ था।
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हनुमान का जन्म।
हनुमान जी के कई उपनाम है, जिनमे दो हैं "पवनपुत्र और केसरीनन्दन"
इन दोनो का मतलब है कि पवन का पुत्र और केसरी का पुत्र!अब एक इंसान दो लोगो के पुत्र तो हो नही सकता, तो यह विचारणीय है कि हनुमान जी आखिर किसके पुत्र थे? हनुमान की माँ अंजना का विवाह केसरी से हुआ था, पर ये पवनपुत्र वाला उपनाम कहाँ से आया यह रामायण किष्किंधाकाण्ड सर्ग-66 मे बताया गया है!
एक दिन हनुमान की माँ अंजना पर्वत शिखर पर विचरण कर रही थी, अचानक पवनदेव की दृष्टि उनके ऊपर पड़ी! अंजना की सुन्दरता को देखकर पवनदेव काम-मोहित हो गये, और झपटकर अंजना को अपनी भुजाओं मे भरकर सीने से लगा लिए! अंजना एक उत्तम-व्रत का पालन करने वाली नारी थी, उसने पवनदेव को धिक्कारते हुये कहा कि तुम कौन हो जो मेरा सतित्व नष्ट करने पर तुले हो?
पवनदेव ने कहा कि मै वायु का देवता पवन हूँ, मै तुम्हारे सतित्व को नष्ट नही करूँगा, बस तुमसे मानसिक समागम करके अपने जैसा ही बलवान और वेगवान पुत्र उत्पन्न करूँगा! हे देवी! इसके बावजूद भी तुम्हारा सतीत्व बचा रहेगा!इसके बाद पवनदेव ने क्या किया होगा, यह बताने की जरूरत नही, और उसी समागम का परिणाम था कि हनुमान का जन्म हुआ! इसीलिये हनुमान को "पवनपुत्र" भी कहा जाता है!
खैर यहाँ सवाल यह है कि आखिर यह कैसे सम्भव है कि एक पुरुष किसी नारी से मैथुन करे तब भी नारी का सतीत्व तथा कौमार्य बचा रहे? महाभारत मे सूर्यदेव ने भी कुन्ती को ऐसे ही लुभावना देकर उससे समागम किया तथा कर्ण को पैदा किया! सूर्य ने कुन्ती से कहा था कि पुत्र उत्पन्न होने के बाद तुम फिर कौमार्य को प्राप्त होकर कन्या बन जाओगी!
हद है भाई, कौमार्य क्या हलवाई के दुकान की मिठाई है कि खरीदकर लाओ और दे दो! कन्या केवल उस बालिका को कहा जाता हैं जिसने कभी पुरुष-संसर्ग न किया हो! यहाँ तो पुत्र पैदा करने के बाद पुनः कौमार्य देने का प्रलोभन दिया जा रहा है! आखिर बच्चा पैदा होने के बाद देवता किस विधि से महिला की सर्जरी करते थे कि वह पुनः कौमार्य को प्राप्त हो जाती थी! वास्तव मे ये जितने देवता थे सब के सब कामपिपासु और स्त्रीलम्पट थे! इन्हे महान बनाकर भोले-भाले लोगो से पूजवाया जा रहा है, क्योंकि लोगो को इनकी सच्चाई पता ही नही है!
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