Saturday, 20 June 2020

(F) मुताआ, 3 तलाक, हलाला, महिला खतना, औरत को पीटना, रेप सज़ा, शरिया।


मुताआ

मुहम्मद सल्लल्लाहु ने मुताआ को हराम  (अवैध ) करार दिया है 

दलील

ईमाम जोहरी कहतें हैं कि हम उमर बिन अजीज की मजलिस मे बैठे थे तभी उस मजलिस मे मुताआ का जिक्र चल गया तो रबीअ बिन सबरा नाम के एक व्यक्ति ने कहा : कि मे अपने पिता के बारें मे गवाही देता हूं कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने अंतिम हज्ज के मौके पर इसको मुताअ को एकदम हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया था ।

( सुनन अबु दाऊद भाग 1 हदीस नंबर 2072 )

दूसरा सबूत

रबीअ बिन सबरा अपने पिता से रिवायत करतें हैं कि मुहम्मद  सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज्ज के अंतिम अवसर पर महिलाओं से मुताअ करने को हराम ( अवैध ) घोषित कर दिया है ।

(सुनन अबू दाऊद भाग-1 हदीस नंबर 2073)

मुताअ किया है ? 

मुताह मैरिज एक कांट्रेक्ट मैरिज था जो अरब में इस्लाम पूर्व प्रचलित थी इस विवाह में विवाह एक निश्चित अवधि बाद स्वयंमेव टूट जाएगा ऐसा अनुबंध किया जाता था,  जब नबी सल्ल० का अवतरण हुआ, इस्लाम आया, तो धीरे धीरे शराब जुए और मुताहः जैसे अन्यायपूर्ण और खराब रिवाजों को खत्म कर दिया गया,इन रिवाजों को एक झटके में खत्म इसलिये नही किया गया क्योंकि ऐसा करने पर लोग अपनी लत छोड़ नही पाते और बुरे के बुरे रह जाते, तो बजाये इसके इस्लाम ने ये तरीका अपनाया कि लोगों का मस्तिष्क धीरे धीरे भलाई की बातें आत्मसात करता जाए, और फिर जब इन बुरे रिवाजों से उन्हें रोका जाए तो वे आसानी से इन ख़राब बातों को छोड़ दें तो ऐसा विवाह जिसमे विवाह से पहले ही औरत को तलाक देने की बात तय कर दी जाए यानी कॉन्ट्रैक्ट पर शादी की जाए, यही मुताह मैरिज है, और ऐसी शादी इस्लाम मे हराम है, ऐसी शादी के हराम होने का बयान और ऐलान बहुत सी अहादीस मे है, जैसे , 

सही बुखारी Vol.5/59/527, सही मुस्लिम 8/3259, सही मुस्लिम 8/3260, सही मुस्लिम 8/3262, सही मुस्लिम 8/3263, सही मुस्लिम 8/3264, सही मुस्लिम 8/3265 और अनेक अहादीस जिनमें नबी सल्ल० बार बार फरमाते हैं कि मुताह हराम है.!!

और मुताह मैरिज के हराम होने की वजह पवित्र कुरान की आयत 4:24 मे अल्लाह का ये हुक्म है कि ''शादी (मर्द और औरत, दोनों की पाक दामनी यानी यौन शुचिता) पाक दामनी की हिफाज़त करने के लिए करो, न कि नाजायज ढंग से जिस्मानी ताल्लुकात बनाने के लिए ''

यह एक जमाना ए जाहिलीयत मे के निकाह था कि लोग कुछ समय के निकाह कर लेते थे फिर अलग हो जाते थे जब इस्लाम पावर मे या इस्लामी हुकूमत कायम नहीँ हुई थी तो यह गलत प्रथा चलती रही ,

लेकिन जब इस्लामी हुकूमत आई तो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फतेह मक्का के अवसर पर  इस गलत प्रथा को हमेशा-हमेशा लिए हराम  ( अवैध ) घोषित कर दिया ।

(देखें :- किताबुल निकाह सुनन अबू दाऊद भाग - 1,  पेज नंबर 481 )

______________________________________________________________


तलाक, तीन तलाक़ और हलाला

क़ुरान के हिसाब से तलाक का सही तरीका 
अगर तलाक़ बोल भी दी (चाहे मुंह से कितनी ही बार क्यो न निकली हो) तो तलाक़ हो गयी। अब औरत को इद्दत में बैठना है। लेकिन उस दौरान अगर उनमे साथ रहने की सहमति हो जाती है तो पहली तलाक़ कैंसिल, और दोनों मियां बीवी की तरह साथ रह सकते है।

लेकिन अगर इद्दत पूरी हो गयी और उनमें साथ रहने की सहमति नही हुई तो लड़की को अब अपने मायके आना होगा। लेकिन उसके बाद ( मान लो 6 महीने या एक साल या 2 साल कभी भी) साथ रहने का मन हुआ तो उनका दुबारा निकाह पढ़ाया जाएगा फिर निकाह के बाद साथ रह सकते है।

लेकिन अगर फिर दुबारा भी तलाक़ हो गया। तो फिर से वही बात दोहराई जाएगी, तलाक़ हो जाएगी और लड़की को इद्दत में बैठना होगा। इस दौरान सहमति फिर बन गयी तो मियां बीवी की तरह रह सकते है। और इद्दत के वाद दोनों सातब रहने का मन बनाते है तो तिबारा निकाह पढ़ाया जाएगा। लेकिन ये दो तलाक़ मानी जायेगी। अल्लाह ने ये दो मौके दिए है साथ रहने और अपनी गलती सुधारने की।

लेकिन अब अगर तीसरी बार भी तलाक़ हो गयी तो अब कोई चारा नही अब दोनों साथ नही रह सकते। दोनों को कहीं और शादी करनी पड़ेगी। और इत्तेफ़ाक़ से नेचुरली वहां भी तलाक़ हो जाये या स्पाउस मर जाए। अब वो पहले वाले से फिर शादी कर सकती या सकता है।

सूरः बकरा की आयत न0 228 से 233 तक में आप गहराई से पढ़ेंगे तो आप पाओगे उसमे तीन बार तलाक़ का ज़िक्र है नाकि तीन बार मुंह से बोलने का।

और यही सबसे बड़ा फ़र्क़ पैदा करता है कि irrovacable तलाक़ का मतलब तीन बार तलाक़ है या तलाक़ तीन बार तलाक़ बोलने से है। ज़्यादातर मुस्लिम को ये मालूम ही नही तलाक़ के लिये तीन तलाक़ ज़रूरी ही नही। कोई अगर एक बार ही तलाक़ दे, और दोनों मियां और बीवी उसको मान ले तो भी तलाक़ हो गयी और लड़का लड़की दोनों आज़ाद है कहीं और शादी करने के लिये। अगर एक बार तालाक बोलने से भी तलाक़ हो जाती है फिर क्यो क़ुरान में तीन तलाक़ का ज़िक्र है। क्योंकि अल्लाह ने ये दो बार की छूट रखी है, अपनी गलती को सुधारने की। अगर अल्लाह ये चाहता कि एक बार मे ही तलाक़ हो जाय और उनको गलती सुधारने का मौका ना दिया जाए तो फिर अल्लाह तीन तलाक़ का ज़िक्र ही ना करता, क्योंकि एक बार बोलने से भी तलाक़ हो जाती है ही (अगर मियां बीवी साथ नही रहना चाहते है तो)

अल्लाह ने तीन तलाक़ का कानून ही इसलिये बनाया है कि कहीं अगर जल्दबाजी में, नादानी में, गुस्से में, किसी के बहकावे में, घरो के छोटे छोटे झगड़ो में आकर अगर तलाक़ दे भी दी तो उनको अल्लाह ने दो बार का मौके दिए है अपनी गलती को सुधारने को ताकि किसी का घर ना बिखरे। लेकिन अगर उसके बाद भी तीसरी बार भी तलाक़ हो गयी तो अब अल्लाह कहता है कि ये तो इनका रोज़ रोज़ का काम हो गया, छूट का नाजायज़ फायदा हो गया, तलाक़ जैसी चीज का मज़ाक बनाना हो गया, अब इसकी कोई वापसी नही। अब आपकी शादी आपस मे नही हो सकती। अब आप दोनों किसी और से शादी करो।

अब आप खुद फ़र्क़ देखो इंसानी तरीका एक साथ मुंह से तीन तलाक़ बोलने में और अल्लाह ने जो दो तलाक़ में गलती सुधारने का मौका और तीसरी तलाक़ में एक सज़ा का प्रावधान रखा है, इन दोनो तरीको में। जहां पहले तरीके में गलती सुधारने का कोई मौका ही नही मिलता।

अब लड़की दूसरी शादी करती है, वहां भी इत्तेफ़ाक़ से तलाक हो गयी या फिर बेवा हो गयी तो यहां भी अल्लाह ने उस औरत पर दरियादिली दिखाई की कोई नही, अब आप चाहे तो पहले वाले शौहर से ही शादी कर सकती हो। इसी सिस्टम को हलाला कहा जाता है। 

लेकिन जो आज हलाला का स्वरूप चल पड़ा है उसमें एक रात की शादी होती है, उसमे एक रात के बाद तलाक़ की शर्त रखी जाती है ये हलाला कैसे हुआ, ये तो निकाह भी नही हुआ, ये जिनाह हुआ। पहले तो एक साथ मुंह से निकले तीन बार तलाक़ के लफ्ज़ को तीसरी तलाक़ मान कर इंसान गुनाह करता है फिर लीपा पोती करने के लिये हलाला जैसा हराम काम करता है। हलाला जैसी सामाजिक बुराई का एक ही कारण है, मुंह से निकले लफ्ज़ को तलाक की गिनती मान लेना।

____________________________________________________________


3 तलाक़

क़ुरान मे सूरा  2 : 230 में जो बात कही गई है उसे इस प्रकार समझे :-

अगर किसी औरत से किसी आदमी का तलाक हो जाता है और तलाक की वजह यह है कि :-

औरत की परेशानी :- आदमी कम पैसे कमाता है इसिलए औरत बदजुबानी के कारण उससे झगड़ा करती है । 

आदमी की परेशानी :- यह है कि औरत बदजुबान है। झगड़ा करती है बार बार ।

अब दोनो में इसी बात को लेकर तलाक हो जाता है । 

अब अब दोनों आज़ाद हैं कहीं भी शादी कर सकते हैं । 

और दोनों शादी कर लेते हैं अलग अलग ।  

आदमी को दूसरी शादी में ऐसी औरत है जो पीठ पीछे वियभिचार करती है। 

और स्त्री को ऐसे आदमी से निकाह होता है जो शराब पीकर उसको हर रोज़ पीटता है । 

इस मसले पर दोनों बेहद परेशान है ।

इसी बात को लेकर फिर से तलाक हो जाता है ।

अब ओरत सोचती है  कि ओह्ह !  इससे तो मेरा पहला पति ही ठीक था जो कम कमाता था लेकिन मुझे शराब पीकर पीटता तो नही था । 

ऐसे ही आदमी सोचता है कि इससे तो मेरी पहली पत्नी ही ठीक थी जो बदजुबान थी लेकिन वियभिचार ( चरित्र हीन ) तो नही थी । 

ऐसी स्थिति में दोनों फिर से शादी कर लेते हैं । 

ये सब ब्यचान्स होता है , षडयंत्र के तौर पर नहीं। षडयंत्र के तौर किसी भी स्त्री से शादी करके उससे संभोग करना 100% हराम ( गलत है )

इससे हलाला नहीं बल्कि पुनः विवाह कहते हैं । 

ये क़ुरान सूरा बकर आयात 230 मतलब 

_____________________________________________________________

किया इस्लाम में हलाले का हुक्म है?

हलाला हराम है इस्लाम में लेकिन मिडिया इसलिए ये बात उछाल रही है ताकि नियोग जैसी घिनौनी प्रथा पर पर्दा डाल सके, आईये देखते है कि इस्लाम किया कहता है हलाले के बारे मे।

हलाला हराम है इस्लाम मे :-

सबूत नंबर 1:-

हदीस नंबर 1
इब्ने मसऊद रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि हलाला करने वाले जिस के लिए हलाला किया गया दोनो पर धिक्कार है ।
                (सहीह तिरमिजी हदीस नंबर   894 )

2.
हजरत उकबा बिन आमिर रजि0 से रिवायत है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु ने फरमाया कि " किया तुम्हें उधार के सांड की खबर न दू  ?  सहाबाओ  (साथी ) ने कहा कि कियों नहीं अल्लाह के रसूल!  मुहम्मद सल्लल्लाहु ने कहा कि "वह हलाला करने वाला है । अल्लाह ने हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो पर लानत फरमाई है ।
               (हसन इब्ने माजा हदीस नंबर 1572 )

3.
हजरत उमर फारूक रजि0 ने फरमाया कि मेरे पास हलाला करने वाले और जिस के लिए हलाला किया जाए दोनो लाए गए तो दोनो को कत्ल  (हत्या ) कर दूंगा ।
                       (इब्ने अबी शीबा 4/294 )

4.
हजरत उमर फारूक रजि0 से हलाले के बारें में मालूम किया आप ने फरमाया कि "दोनो बदकार है "
                         ( इब्ने अबी शीबा 4/294 )

5 हजरत उमर फारूक रजि0 फरमाते है कि रिसालत मे लोग हलाले को व्याभिचार मानते थे ।
(हाकिम 2/199 , तबरानी औसत कमा फिल मजमा   4/267)

----------------------------------------------------------------------------------------------

हलाला

यह कहा जा सकता है कि हलाला की अवधारणा (तसव्वुर) इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक्हा) का सबसे शर्मनाक मुद्दा है। शरीअत के अनुसार, अगर पति अपनी पत्नी को तीसरी बार तलाक़ दे देता है तो वह दोनों फिर से शादी नहीं कर सकते सिवाय इसके कि पत्नी किसी और से शादी कर ले और वहां से भी उसे तलाक़ हो जाये। इस क़ानूनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए धोखे और फ़रेब का यह रस्ता निकाला गया कि एक योजना के तहत औरत की किसी दूसरे मर्द से यह तय करके शादी करायी जाती है कि वह उसे तलाक़ दे देगा और इस तरह से पहला पति उससे फिर से शादी कर सकेगा।

कानूनविद (फुक्हा) ने इस पर यह शर्त भी लगा दी कि दूसरे मर्द  के तलाक देने से पहले यह ज़रूरी है कि उसके पत्नी से शारीरिक संबंध बने। धोखे और फरेब की इस योजना, जिसमें एक महिला की शादी दूसरे व्यक्ति से करायी जाती है ताकि वह शारीरिक संबंध बनाकर उसे तलाक़ दे और पहला पति क़ानूनी रूप से फिर से उससे शादी कर सके, को धार्मिक भाषा में हलाला कहा जाता है।

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह से योजना बनाना इस्लामी कानून और उसकी भावना से खेलना है। इसके अलावा शारीरिक संबंध बनाये जाने की शर्त रसूलअल्लाह (स.व) की बात और हिकमत (प्रज्ञता) को ठीक से ना समझने की वजह से पैदा हुई है।

इमाम बुखारी द्वारा सूचित हदीस पर गौर किया जाये तो यह साफ़ हो जाता है कि एक औरत ने दूसरे मर्द से शादी सिर्फ इसलिए की ताकि उससे तलाक लेकर वह क़ानूनी तौर पर पहले पति से फिर से शादी कर सके। उसने झूठ बोला कि उसका दूसरा पति नामर्द है और इस बुनियाद पर तलाक़ मांगी। रसूलअल्लाह (स.व) उसकी योजना समझ गए और फ़रमाया कि वह पहले पति के लिए सिर्फ तभी जायज़ हो सकती है जब दूसरे पति के साथ संबंध बन जाने के बाद उसे वहां से तलाक हो। इसका मतलब यह था कि अब दूसरा पति तो उसके दावे के मुताबिक नामर्द था इसलिए संबंध नहीं बना सकता था और ना वह पहले से शादी कर सकती थी, और अगर वह संबंध बन जाने की बात कहती तो दूसरे पति के नामर्द होने का दावा झूठा साबित हो जाता। रसूलअल्लाह (स.व) ने उस औरत के झूठ बोलने और कानून का मज़ाक बनाने की वजह से उस मामले में यह अंदाज़ अपनाया, इस अंदाज़ को कुरआन में सूरेह आराफ़ की आयत 40 के ज़रिये आसानी से समझा जा सकता है जिसमें फ़रमाया गया है कि घमंड करने वाला सिर्फ उस सूरत में जन्नत में जा सकता है जब एक ऊंट सुईं के नाके में दाखिल हो जाये, यानी दूसरे शब्दों में कहें तो जा ही नहीं सकता। इस हदीस से भी अगर कोई नतीजा निकल सकता है तो वह हलाला के निषेध (हराम) होने का ही निकल सकता है और कुछ नहीं। यह बात बिलकुल साफ़ है कि हलाला करना शरीअत से खेलना और कानून का मज़ाक बनना है।

हदीस इस प्रकार है:

इक्रामाह सूचित करते है कि रिफाअ ने अपनी पत्नी को तलाक दी और उसके बाद उसने अब्द अल्-रहमान अल्-कुरज़ी से शादी कर ली।आयशा (रज़ि.) कहती हैं कि वह हरा कपड़ा पहने उनके पास आयी और अपने पति की शिकायत की और अपनी चोट दिखायीं। जब रसूलअल्लाह (स.व) आये तो आयशा (रज़ि.) ने उनसे सारा मामला बयान किया। इक्रामाह बताते हैं कि उसके पति को मालूम चला तो वह भी अपनी दूसरी बीवी से हुए दो बेटों के साथ रसूलअल्लाह (स.व) के पास आया। अपने पति को देखकर उसने अपना कपड़ा हाथ में लटका कर कहा कि मेरी शिकायत सिर्फ यह है कि इसके पास जो कुछ है वह इस [मुलायम] कपड़े से ज़्यादा कुछ नहीं है। इस पर अब्द अल्-रहमान ने कहा “रसूलअल्लाह (स.व) यह झूठ बोल रही है, मैं इसकी सारी [शारीरिक] ज़रूरतें पूरी कर सकता हूँ। सच तो यह है कि यह नाफरमान है और रिफाअ के पास वापिस जाना चाहती है। रसूलअल्लाह (स.व) ने यह सुनकर फरमाया “अगर ऐसा है तो तुम रिफाअ के लिए तब तक जायज़ नहीं हो सकती जब तक अब्द अल्-रहमान से तुम्हारा संबंध ना बन जाये।” इसके बाद अब्द अल-रहमान के बेटों की तरफ देख कर पूछा कि क्या यह तुम्हारे बेटे हैं ? हाँ में जवाब मिलने पर आप (स.व) ने फरमाया “तुम इस तरह से झूठ बोलती हो [ऐ अब्द अल्-रहमान की पत्नी] । अल्लाह गवाह है ! जितना एक कौवा दूसरे कौवे से मिलता है यह [लड़के] अब्द अल्-रहमान से उससे भी ज़्यादा मिलते हैं।

--------------------------------------------------------------------------------------------------

क्या है हलाला? (Halala)

इस्लाम में निकाह एक इबादत है और साथ ही एक अनुबंध (Contract) है जब तक कि शादी के बाद दोनों का साथ में रहना मुमकिन न हो। क़ुरआन ने निकाह को निभाने के लिए कहा, क़ुरआन ने निकाह की इस प्रतिज्ञा को निभाने के लिए कहा, वे तुमसे दृढ़ प्रतिज्ञा भी ले चुकी है? (4:21)

निकाह की यह प्रतिज्ञा केवल यौन इच्छा को पूरा करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य जीवन में मानसिक शांति प्राप्त करना है।

और यह भी उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारी ही सहजाति से तुम्हारे लिए जोड़े पैदा किए, ताकि तुम उसके पास शान्ति प्राप्त करो।… (30:21)

पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए कपड़ों की तरह होते हैं। वस्त्र सजावट का कार्य करते हैं और सुरक्षा प्रदान करते हैं, इसी तरह पति-पत्नी एक-दूसरे के श्रंगार हैं और एक-दूसरे को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

वह तुम्हारे लिबास हैं और तुम उनका परिधान हो।… (2:187)

पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने एक अच्छी पत्नी को सबसे बेशकीमती संपत्ति घोषित किया और तलाक़ के लिए उन्होंने कहा कि यह अल्लाह की नजर में अनुमत कृत्यों में सबसे घृणित है। कुरआन ने पुरुषों को अपनी पत्नी के साथ समायोजित करने की सलाह दी, भले ही वह उन्हें नापसंद हों (4:19) और पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने पुरुषों को सलाह दी कि वे अपनी पत्नियों को उनके दुराचार के अलावा अन्य कारणों से तलाक न दें। (तबरानी)

उपरोक्त परिदृश्य का विकृत हलाला (Halala) की अवधारणा से कोई संबंध नहीं है। हलाला (Halala) की अवधारणा पर नीचे अलग से चर्चा की जा रही है।


हलाला (Halala)

क़ुरआन ने कहा, फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे (तीसरी बार),तो इसके पश्चात वह उसके लिए वैध न होगी,जबतक कि वह उसके अतिरिक्त किसी दूसरे पति से निकाह न कर ले। अतः यदि वह उसे तलाक़ दे दे तो फिर उन दोनों के लिए एक-दूसरे को पलट आने में कोई गुनाह न होगा, यदि वे समझते हो कि अल्लाह की सीमाओं पर क़ायम रह सकते है। और ये अल्लाह कि निर्धारित की हुई सीमाएँ है, जिन्हें वह उन लोगों के लिए बयान कर रहा है जो जानना चाहते हो (2:230)

एक आदमी दो तलाक़ के बाद अपनी पत्नी को दो बारा वापस ले सकता है और तीसरी बार तलाक़ देने बाद भी उसकी इद्दत की समाप्ति से पहले उसे वापस ले सकता है। लेकिन इसके बाद जब जुदाई बेबदल हो जाए, वह फिर अपनी पसंद के किसी अन्य व्यक्ति से शादी करने के लिए स्वतंत्र है। यदि फिर जीवन के सामान्य पाठ्यक्रम में उनके बीच एक विवाद पैदा होता है जिसके कारण उसके दूसरे पति से पहली तलाक़ हो जाती है, तो वह फिर से दूसरे पति सहित अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने के लिए स्वतंत्र है (पहले पति के साथ भी)। यहां प्रासंगिक बात यह है कि हलाला (Halala) की योजना पहले से नहीं बनाई जा सकती अगर वह ऐसा करती है। यहां प्रासंगिक बात यह है कि हलाला (Halala) की योजना पहले से नहीं बनाई जा सकती। अगर वह ऐसा करती है, तो यह दूसरे पति के साथ और पहले पति के साथ नाजायज संबंध होगा और साथ ही वह भी जिसके साथ वह पूर्व नियोजित हलाला के बाद रहने के लिए आई है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने ऐसे दोनों पुरुषों पर लानत फ़रमाई है जो हलाला करते हैं और जिनके लिए हलाला किया जाता है। दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर ने अपनी ख़िलाफ़त के दौरान फैसला सुनाया कि जो लोग पूर्व नियोजित हलाला करते हैं उन्होंने पत्थर मार-मार कर मौत की सज़ा दी जाए। इमाम सूफ़ियान सौरी कहते हैं, अगर कोई हलाल करने के लिए किसी महिला से शादी करता है (उसके पूर्व पति के लिए) और फिर उसे पत्नी के रूप में रखना चाहता है उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है, जब तक कि वह नए सिरे से निकाह नहीं करता, क्यूंकि पिछला निकाह गैरकानूनी था (तिर्मिज़ी)

___________________________________________________

प्रशन~  महिलाओं की खतना क्यों करते हैं।

उत्तर~कुरआन में खतना का ज़िक्र नहीं, दीने इबराहीम abrahamic religions अर्थात यहूद, इसाई और मुसलमान में आखरी पेगम्‍बर मुहम्‍मद सल्‍ल. ने इस्‍लाम में पिछले धर्मों की जिन अच्‍छी बातों को जारी रखा उनमें एक मर्दों की खतना है, महिलाओं की खतना का ज़िक्र सही अहादीस में नहीं मिलता, जिन हदीसों को कमजोर हदीस माना गया है उनसे पता चलता है कि उस दौर में जिस व्‍यक्ति को बुरे अंदाज में पुकारना होता था तो कहा जाता था कि ''ओ महिलाओं की खतना करने वाली के बेटे'' अर्थात अच्‍छी बात नहीं समझी जाती थी,  लगभग सभी बडे मुस्लिम इदारों को इसको ना मानने पर इत्‍तफाक है इसी कारण यह केवल इधर उधर छोटी मोटी जगह पर कमजोर हदीसों पर अडे हुए या उनको इलाकाई रस्‍म व रिवाज पर अड़े हुए लोगों जैसे की अफ्रीका आदि की सोच का नतीजा है, इंडिया पाकिस्‍तान बंग्‍लादेश यहां तक की अरब में भी यह बात मुसलमान भी नहीं जानते,  जानने पर हैरत का इजहार करते हैं,  इस लिए कुछ अड़े हुए लोगों की सोच का जिम्‍मेदार पूरी कौम को नहीं माना जा सकता, इधर कोई बुरी प्रथा नहीं जैसे कि सती प्रथा जिसे जबरदस्‍ती छूडवाया गया,

फिर भी जिसको यह बुरी प्रथा लगे वो मुस्लिम संस्‍थाओं की इस बात को फैलाए की इस बात को कमजोर हदीस का माना गया है इस लिए छोड दें।

_____________________________________________________________

*क्या कुरआन में औरत को पीटने का हुक्म है?*


◆कुरआन 4:34: "मर्दो का औरतों पर क़ाबू है क्योंकि अल्लाह ने बाज़ आदमियों को बाज़ अदमियों पर फ़ज़ीलत दी है और चूंकि मर्दो ने अपना माल ख़र्च किया है पस नेक बख्त बीवियॉ तो शौहरों की ताबेदारी करती हैं उनके पीठ पीछे जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त की वह भी हिफ़ाज़त करती है और वह औरतें जिनके नाफरमान सरकश होने का तुम्हें अन्देशा हो तो पहले उन्हें समझाओ और (उसपर न माने तो) तुम उनके साथ सोना छोड़ दो और (इससे भी न माने तो) मारो. पस अगर वह तुम्हारी मुतीइ (बात मान ले)हो जाऐं तो तुम भी उनके नुक़सान की राह न ढूढो अल्लाह तो ज़रूर सबसे बरतर बुजुर्ग है."


सुरः निसा की ये आयत पढ़कर अक्सर औरतें घबरा जाती हैं क्योंकि इसमें तो मर्दों को खुले तौर पर मारने की छूट दे दी है. गैर इस्लामी इस आयत को पढ़कर इस्लाम के औरत विरोधी होने का फतवा दे देते हैं. देखा जाए तो पूरी दुनिया में इस आयत को हथियार बनाकर इस्लाम में औरत के दोयम दर्जे की बात कही जा रही है. लेकिन क्या वास्तव में ये आयत यही मतलब बयान कर रही है? कहीं ऐसा तो नहीं की हमसे इस आयत का मतलब समझने में कोई भूल हो रही है?


एक मिसाल से अपनी बात की शुरुआत करते हैं. 


मान लिया एक मजदूर दिन भर अपनी मजदूरी की तलाश में जाने के बाद शाम को खाली हाथ घर लौटता है. उसकी औरत इस इन्तिज़ार में बैठी है की उसका शौहर कुछ कमाकर लाएगा तो दोनों के पेट में कुछ जाएगा. लेकिन उसे खाली हाथ देखकर उसका सब्र जवाब दे देता है. और वह शौहर को बुरा भला कहने लगती है. शौहर भी थका हुआ आया है और भूखा भी है. बीवी के ताने सुनकर उसे गुस्सा आता है और वह उसे मारने के लिए हाथ उठा देता है.


लेकिन उसी वक़्त उसे कुरआन की ये आयत याद आ जाती है और उसका उठा हुआ हाथ नीचे गिर जाता है. वह उसे समझाने लगता है और उनका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो जाता है. थोड़ी कसर रह जाती है, जिसकी वजह से दोनों रात को अलग अलग सोते हैं और सुकून से अपने और साथी के बारे में सोचते हैं. लिहाज़ा अगले दिन जब सोकर उठते हैं तो दोनों का गुस्सा ठंडा हो चुका होता है. बीवी ख़ुशी ख़ुशी अपने शौहर को विदा करती है और वह नए जोश के साथ काम की तलाश में निकल जाता है. दो जनाब देखा आपने, जो आयत आपको औरत विरोधी दिख रही थी उसने एक जाहिल औरत को जाहिल मर्द से पीटने से बचा लिया.


ये आयत हरगिज़ औरत विरोधी नहीं है बल्कि मनोविज्ञान (Psychology) की निहायत अच्छी मिसाल है. बहुत खूबसूरती के साथ इसमें मर्द और औरत दोनों को समझाया गया है. पहले मर्द से कहा गया की तुम चूंकि औरत से जिस्मानी तौर पर ताक़तवर होते हो इसलिए अपने पर काबू रखो. हो सकता है वह तुमसे ज्यादा फजीलत रखती हो (बाज़ को बाज़ पर फजीलत है से यही मतलब निकलता है.) इसके बाद औरत को समझाया गया चूंकि मर्द तुम्हारे लिए दिनभर मेहनत करता है कुछ कमाकर लाता है तो तुम्हारा भी फ़र्ज़ बनता है की अपनी इज्ज़त व शौहर के माल की हिफाज़त करो. इसके बाद फिर मर्द को सलाह दी गई है की अगर अपनी बीवी की किसी बात पर तुम्हें गुस्सा आ जाए तो उसे कमजोर और अपने को ताक़तवर समझकर उसे पीटना न शुरू कर दो बल्कि जो कुरआन कह रहा है उसपर अमल करो, तुम्हारा गुस्सा अपने आप ठंडा हो जाएगा.


ये आयत उस वक़्त नाजिल हुई थी जब एक नव-मुसलमान ने अपनी बीवी को तमांचा मार दिया था. और उससे पहले अरब में बीवियों को पीटना आम था. आगे कोई शख्स ऐसा क़दम न उठाये इसीलिये अल्लाह ने ऐसा हुक्म फरमाया. 


अब ये सवाल उठ सकता है की अल्लाह ने सीधे सीधे बीवी की पिटाई से क्यों नहीं मना किया? तो इसका जवाब ये है की अल्लाह बेइंसाफ नहीं है की एक को तो पूरी तरह पाबन्द कर दे और दूसरे को खुली छूट दे दे. बीवी को भी तो डर रहना चाहिए की वह हद से ज्यादा सरकश न हो जाए.  और फिर इस्लाम बिल्कुल आखरी में क्रिटिकल सिचुएशन में हल्की मार मारने की अनुमति देता है, ऐसा मार जिस से औरत को ज़्यादा तकलीफ हो इस से इस्लाम सख्ती से मना करता है और मुँह पर मारने से तो और भी ज़्यादा सख्ती से रोकता है। मगर, अगर क़ुरआन की इस आयत में दिए गए प्रोसेस का अनुकरण कोई करता है तो मारने की नौबत ही नही आएगी। इस तरह से क़ुरआन की इस आयत ने औरत को मर्दों की मार से सुरक्षित कर दिया है।


______________________________________________________



*इस्लाम में महिलाओं के साथ व्यभिचार (Adultery) से बचना और बलात्कार की सज़ा* 



( ए नबी (सल०!) मोमिन ( मुस्लिम ) पुरुषों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शरमगाहों ( गुप्तअंग )की रक्षा करें, यह उनके लिए बहुत पाकीज़गी ( पवित्रता ) की बात है और अल्लाह उन सभी बातों से परिचित है जोवे करते है । ( कुरआन सूरत नूर 30)



पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) से अचानक निगाह पड़ जाने के बारे में पूछा गया तो आपने फ़रमाया अपनी निगाह तुरंत हटा लेना नीची निगाह करना या इधर उधर देखने लग जाना अल्लाह की हराम की गई चीज़ को न देखना कुरआन की आयत का आदेश है. (सही मुस्लिम)




बलात्कार करने वाले के लिए मौत की सज़ा :


पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने फरमाया बालात्कारी, व्यभिचार (अवैध संभोग) करने वाले को सार्वजनिक सभा जगह पर पत्थरवाह किया जाए ।

यानि उसे जब तक पत्थरों से मरा जाए की जब तक उसके प्राण ना निकल जाये और यह सार्वजनिक जगह पर इस लिए हो की हर इन्सान इसको देख कर सबक हासिल करे की अगर मेने ऐसा करा तो मेरे साथ भी यहीं अंजाम होगा !

इस्लामी शरीयत बलात्कार करने वाले की सज़ा मौत करार देती है हमारे गैर मुस्लिम भाई डरते हैं कि इतनी बड़ी सज़ा ! बहुत से लोग इस्लाम को वहशी और ज़ालिम धर्म बताते हैं लेकिन उनकी यह सोच गैर तथ्य नीति है |


आज सैकड़ों गैर मुस्लिमों से पूछा गया कि भगवान ना करे कोई आपकी माँ , बहन , बीवी या बेटी के साथ बलात्कार करे और आपको न्यायाधीश बनाया जाए और अपराध करने वाले को आपके सामने लाया जाए आप उस बलात्कारी के लिए क्या सजा प्रस्ताव करेंगे? सबने कहा: "हम उसकी हत्या कर देंगे या हत्या की सजा दिलवाएंगे" और कुछ ने कहा की हम उसे तड़पा-तड़पा के मारने वाली सज़ा देंगे, अब अगर कोई उसकी पत्नी या बेटी या माँ के साथ बलात्कार करे तो आप दोषी की हत्या करना चाहेंगे लेकिन जब किसी और की माँ , बहन , बीवी या बेटी के साथ बलात्कार किया जाता है तो दोषी के लिए मौत को वहशयानह क्यों कहा जाता? अंत न्याय में यह दो मुंह नीति क्यूँ?


मान लें आप जब कोई भी इस्लामी शरीयत अपनाता है और कोई व्यक्ति किसी औरत की तरफ देखता है तो वह अपनी निगाह नीची कर लेता है. और हर औरत इस्लामी तरीके में रहती है इस स्थिति के बावजूद यदि कोई किसी के साथ बलात्कार करता है और अपराधी को मृत्युदंड दिया जाता है तो सवाल यह है कि इस तरह बलात्कार की दर बढ़ जाएगी, वही रहेगी या कम हो जाएगी? यक़ीनन कम हो जाएगी ।


इस्लाम उत्तम जीवन है क्योंकि इसकी शिक्षा केवल वैचारिक नहीं बल्कि यह मानवता की समस्याओं के लिए एक समाधान प्रदान करता हैं, इसलिए इस्लाम व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर बेहतर परिणाम प्राप्त करता है.



_______________________________________________________

शरीया।


मुसलमानो को शरिया क़ानून बंद करना चाहिए।


1.देखो भाई शरिया जो है वो सिर्फ मुसलमानो पर लागू होता है नकी सभी पर.... तो इससे किसी भी धार्मिक समूह को आपत्ति नही होनी चाहिए.


2.दूसरी बात ये है की भारत मे भी गौ हत्या प्रतिबंधित कायदा है. तो ये बंद करना चाहिए...क्योकि की ये भी शरिया की तरह मनुस्मृति का कानून है। तो बंद करोगे? 

नही ना क्युकी ये हिंदू भाइयो की आस्था है. इसी तरह शरिया लॉ भी मुसलमानो की आस्था है...इससे किसको कोई नुकसान नही है.


3.और शरिया कोई आम लॉ नही है कई देशो ने इसे अपना संविधान बनाया है.... यहातक की  कई देशो के कायदे शरीअत से लिए है.....  जैसे की रेप के बाद हमारे देश मे 7 साल की सजा होती है...इससे रेप के चान्सेस बढ़ जाते है... मैंने कई मुजरिम देखे है जो 3 बार रेप कर 21 साल जेल मे आराम से रहे... लेकिन शरिया कहता है की रेप करनेवाले को सजा ए मौत... इसलिए शरिया लॉ के देश मे दुनिया के सबसे कम रेप होते है...ना के बराबर.... क्युकी सजा बहोत डेंजर होती है.... 


4.ट्रिपल तलाक मे अगर कोई तलाक देता है और सिर्फ मज़े के लिए शादी करता है... या जल्दी तलाक़ देता है तो वो तलाक़ मंजूर नही होता...और इतना ही नही तलाक़ देने का हक़ मर्द और औरत दोनो को होता है इस्लाम मे ये असली शरिया लॉ है....अगर ले लॉ गलत होता तो कई देश इसे संविधान ना बनाते. और रही बात हलाला की तो इस्लाम मे हलाला करना या करवाना बहोत बडा जुर्म है.... 

लेकिन कुछ जोकर मौलानाओ की वजह से शरीअत और शरिया लॉ इंडिया मे बदनाम है.... और मै शरिया के खिलाफ नही हूँ लेकिन मै  उन मौलाना के खिलाफ हूँ जो औरतों को इंसाफ नही देते....इसमें शरिया की कोई गलती नही है, गलती जज मौलाना की है जो फैसला कुरान से नही खुदसे सुनाते है


5.मुझे एक बात बताओ अगर तुम्हे कोर्ट मे इंसाफ नही मिला तो क्या तुम संविधान को गलत बोलोगे? नही ना... संविधान तो अपनी जगह सही था लेकिन कोर्ट ने गलत फैसला दिया  तो कोर्ट गलत है न की संविधान..... यही बात शरिया लॉ की है।


6.शरिया हर जगह नही है कई मुस्लिम शरिया फॉलो नही करते जैसे की 

कई मुस्लिम देश सेक्युलर है जैसे की तुर्की, अल्बानिया, बोस्निआ, मलेसिआ, इंडोनेसिया, ब्रूनेई, , कोसोवो, कजाखस्तान, अज़रबैजान..... इनका अपना कानून है..  तो मुस्लिम सिर्फ इस्लामिक नही होते है वो भी Secularism को मानते है... कई सेक्युलर सोच के मुस्लिम है इस दुनिया मे.




(ग) वैदिक आतंक, क्रूरता और जिहाद।

कौन-से धर्म मे सबसे ज्यादा कत्ले-आम हुआ:-

इस पृथ्वी का नहीं बल्कि इस ब्रहमांड  का सबसे भयंकर युद्ध महाभारत का युद्ध हुआ था. अगर आप महाभारत आदि पर्व अध्याय 2 श्लोक संख्या 23-28 पढते हैं तो उसमें लिखा है कि

महाभारत युद्ध में:-
हाथी की संख्या।             = 21870
रथों की संख्या।              =  69870
पैदल सैनिकों की संख्या  =  1968300
घोडो की संख्या।            = 94610
इस युद्ध में 27 लाख लोगों की मृत्यु हुई ।

जबकि मुहम्मद साहब के 23 साल की अवधी में दोनों तरफ से लगभग 700 लोगों की मृत्यु हुई थी । *मान्यता है* की वेदव्यास ने गणेश जी  को यह कथा लिखने को कहा। दोनों तरफ से शर्तें रखी गयी। गणेश जी ने कहा कि बीच में रुकना नहीं चाहिए, वाणी अविरत रहे । व्यास जी ने शर्त रखी कि जो लिखें, अर्थ  समझने के बाद लिखें। इसका एक अर्थ तो यह निकलेगा कि काफी कुछ कूट में लिखा गया है। गणेश जी को वही लिखना था जो उनको कहा जा रहा था, शब्द बदलने नहीं थे लेकिन अर्थ समझने के बाद ही लिखना था। यहाँ सेनाओं के व्यूहों की बात है। सैनिक अपने शास्त्रों के संचालन के लिए कितनी जगह छोड़ेंगे ? हाथी के आस पास कितनी जगह रहेगी ? घोड़े की ?  रथों के आकार क्या थे और उनके लिए कितनी जगह लगती होगी ? अत: इतनी संख्या वास्तविक नहीं होगी. Will Durant भारत की ही संख्या 6 करोड़ से अधिक आँकता है।

____________________________________________________________


१।महाभारत के युद्ध में 1 अरब 66 करोड़ हिंदू मरे। इन्हें किसने मारा?

जवाब है कि हिन्दु राजाओं और हिन्दू सैनिकों ने।


२।राम रावण युद्ध में करोड़ों हिंदू मरे।

ऐसे ऐसे युद्ध बहुत हुए हैं।


३।क्या राम जी और सीता जी को कष्ट किसी मुस्लिम ने दिया या हिंदुओं ने?


४।रावण और धोबी, जिसने भी कष्ट दिया, वह हिंदू ही था।


५।रामायण के अनुसार शंबूक की गर्दन राम जी ने काटी तो शंबूक को भी किसी मुस्लिम से कष्ट न पहुंचा। तब शूद्रों को ज्ञान ध्यान की अनुमति नहीं थी और शूद्र भी हिंदू ही थे।


६।श्रीकृष्ण जी को तीर मार कर हिंदू ने घायल किया और वह उसी ज़ख़्म के कारण मर गये।


७।परशुराम जी ने इतने क्षत्रिय मारे कि इक्कीस बार धरती से क्षत्रिय मिटा दिये। ये क्षत्रिय भी हिंदू थे।


८। परशुराम के कारण ही प्रजापालक राजा अग्रसेन को क्षत्रिय से वैश्य बनना पड़ा। आज तक वर्ण व्यवस्था में उनकी औलाद का एक दर्जा कम चला आ रहा है।


९।आदि शंकराचार्य को ज़हर हिंदुओं ने दिया।


१०।गांधी को हिंदू ने ही क़त्ल किया। यह सब जानते ही हैं।


११।भीष्म पितामह कुछ लड़कियों का अपहरण कर लाए थे। क्या वह लड़कियाँ हिन्दू नहीं थीं?


____________________________________________________________


HINDU KINGS & ILLEGAL CONVERSION OF JAIN & BUDDHIST SHRINES


Those Saffrons, who are barking against Hagia Sophia (Ayasofya), must see their terror history first. They demolished 1000s of Jain & Buddhist shrines, and turned them into Hindu temples.


It's also about famous Hindu Temple 'Jagannath Temple [Puri (Orissa)]';


And it was admitted by #Vivekananda also, when he said:


"...because the temple of Jaganath is an old Buddhistic temple...!"



*•••The Complete Works of Swami Vivekananda, The Sages of India, Vol. 3, Page no. 264, Published by Advaita Ashram, Calcutta••*


```Online Source:``` https://www.ramakrishnavivekananda.info/vivekananda/volume_3/lectures_from_colombo_to_almora/the_sages_of_india.htm

____________________________________________________________


एवेद यूने युवतयो नमन्त

"जिस प्रकार युवतियें युवा पुरुष के प्रति नमती हैं.."

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यजुर्वेद में चोरों, तस्करों और डाकुओं को भी नमन किया गया है । उदाहरण के लिए देखिए यजुर्वेद अध्याय 16, मंत्र 21

नमो॒ वञ्च॑ते परि॒वञ्च॑ते अर्थात, छल से दूसरों के पदार्थों का हरण करने वाले और सब प्रकार से कपट के साथ व्यवहार करने वाले को प्रणाम

स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ चोरों के अधिपति को प्रणाम

तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ तस्करी/डकैती करने वाले के अधिपति को प्रण

____________________________________________________________

“ त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।। ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 )* 
अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है  और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे  !
भावार्थ : -  वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !
*Note : -* शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !

"हम लोग जिस से द्वेष करें और जो हम से द्वेष करे, उस को हम शेर आदि पशुओं के मुख में डाल दें।" 
[यजुर्वेद अध्याय 15 मंत्र 15]

____________________________________________________________

ऋग्वेद में अनेक जगह इन्द्र को मायी (धोकेबाज़) कहा गया हे। उदाहरण के तोर पर देखिए 

ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 11, मंत्र 7
मायाभिरिन्द्र मायिनं तवं शुष्णमवातिरः |
विदुष टे तस्य मेधिरास्तेषां शरवांस्युत तिर ||
"हे इन्द्रदेव! अपनी माया द्वारा आपने 'शुषण' को पराजित किया। जो बुद्धिमान आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें."

इस मंत्र का भावार्थ स्वामी दयानंद जी इस प्रकार करते हैं।
"बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्वर आगया देता है कि- साम, दाम, दंड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों क़ी निवृत्ति करके चक्रवर्ति राज्य क़ी यथावत उन्नति करनी चाहिए"

पंडित जी, साम, दाम, दंड और भेद को तो आप जानते ही होंगे.
साम : बहलाना फुसलाना
दाम : धन देकर चुप कराना
दंड : यदि बहलाने फुसलाने से न माने तो ताड़ना करना
भेद : फूट डालना

इसके अतिरिक्त ऋग्वेद 4/16/9 में दयानन्द जी नें भी अपने भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद 'निकृष्ट बुद्धियुक्त' किया है।


-------------------------------------------------------------------------------------------

तू [वेद निंदक] को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।"
[अथर्ववेद कांड 12 सूक्त 5 मंत्र 62] मंत्र - 14

इस ब्रह्मघाती (वैदविरोधी) के लोमों को काट डाल । इस की त्वचा (खाल) को उतार लो इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल । इसकी नसों को ऐंठ दे - कुचल दे । इसकी हड्डियों को मसल डाल । इसकी मज्जा को नष्ट कर डाल इसके सर्वाअङ्गों व जोड़ों को विश्रथय ढीला कर दे बिल्कुल पृथक् - पृथक् कर डाल ।कच्चे मांस को खा - जानेवाला इस ब्रह्मज्य को पृथिवी से धकेल दे और जला डाले ।
अथर्ववेद 12:5:68-73


-------------------------------------------------------------------------------------------

*Vedic God gives open freedom to kill Vedas* 
*( Atharva Veda 12: Sukta 5:  mantra 67,68,69,70,71 )* 
👉🏿||67|| Strike the head off the shoulder । 
👉🏿||68|| Take the hairs off his head, and take his skin off: 
👉🏿||69|| Tear his nose, because his flesh falls from his body into pieces । 
👉🏿||70|| Crush his bones together, strike and pull the marrow out of it । 
👉🏿||71|| Separate all its organs and joints।


--------------------------------------------------------------------------------------------

कुछ कुछ अपने ग्रंथों में भी पढ़ लिया करो, कत्ल गारित की कितनी बातें लिखी हुई है। 

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" 
[यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|”
[सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]

स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]

यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।

पंडित जी, मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या है? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे?

आर्यावर्त की सीमाओं के बाहर रहने वाले सारे मनुष्य म्लेच्छ, असुर और राक्षस हैं| सुनिए ज़रा, दयानन्द जी मनुस्मृति के आधार पर क्या कह रहे हैं,

आर्य्यवाचो मलेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः| [मनुस्मृति 10/45]

मलेच्छ देशस्त्वतः परः| [मनुस्मृति 2/23]

“जो अर्य्यावर्त्त देश से भिन्न देश हैं, वे दस्यु और म्लेच्छ देश कहाते हैं| इस से भी यह सिद्ध होता है कि अर्य्यावार्त्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव और पश्चिम देशों में रहने वालों का नाम दस्यु और म्लेच्छ तथा असुर है| और नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय दिशाओं में आर्य्यावर्त्त से भिन्न रहने वाले मनुष्यों का नाम राक्षस है| अब भी देख लो हब्शी लोगों का स्वरुप भयंकर जैसे राक्षसों का वर्णन किया है, वैसा ही दिख पड़ता है|” 
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 8, पृष्ट 225-226 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]

जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।


-----------------------------------------------------------------------------------------


"वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें"
[अथर्ववेद कांड 12 सूक्त 5 मंत्र 54]

अब प्रश्न ये है कि नास्तिक कोन हैं? केवल ईश्वर में आस्था न रखने वाले? चलिए देखते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती नास्तिक किसको कहते हैं.

"नास्तिक वह होता है, जो वेद ईश्वर की आज्ञा, वेदविरुद्ध पोपलीला चलावे"
[सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 11 पेज नंबर 255]

इस परिभाषा में वह सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि. इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है. स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,

"जिन्होंने अँगरेज़, मुसलमान, चंडाल आदि से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास ११]



वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें।
[अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,

“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|” 
[सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]

इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.

-----------------------------------------------------------------------------------------

■■ *वैदिक आतंकवाद  में  जानवरो  जैसे  क्रूरता* ■■

*(अथर्ववेद   12  : 5 : 62 )*
तू वेद-विरोधी नास्तिको ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) को  काट डाल   , चीर डाल  , फाड़ डाल  ,  जला दे , फूँक दे , भस्म कर दे ।

*( अथर्ववेद 12 : 5 : 68 - 71 )*
उस वेद-विरोधी नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) के लोमों को  काट  डाल  ; उसके खाल उतार  ले   ;  उसके  मांस के टुकड़ों को  बोटी बोटी कर दे  ;  उसके नसों को एंठ दे  ; उसकी हड्डियां मिसल डाल ; उसकी मींग निकाल दे  ; उसके सब अंगों  ओर जोड़ों को ढीला  कर दे   ।

*( अथर्ववेद 11 : 5  : 72 - 74 )*
मांसभक्षक अग्नि  द्वारा  उस वेद-निन्दक  नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू )   को  जला दे  ओर पृथिवी से निकाल दे  ; वायू  उसको  बड़े बिस्तार  अन्तरिक्ष  से  और  सृर्य  उसको  प्रकाश से  जला  देवे  ।

*( ऋगवेद  10: 87: 10 )*
मान-मनुहार के रूप में: तूम तीन टुकड़ों में उनके अंशों का प्रतिपादन कर दे। हे अग्नि , तेरा लौ उनकी पसलियों, , यदुधना की जड़ के साथ तुझे नष्ट कर दे।

*( अथर्ववेद 5: 20: 5 )*
दूरगामी आवाज को सुनकर, दुश्मन के रोआं-रोआं, जाग्रत, पीड़ित, अपने बेटे को प्रसन्न करते हुए, घातक हथियारों के संघर्ष के बीच अपने आतंक में आगे बढ़ें।

*( अथर्ववेद 10: 5: 42 )*
हम उस आदमी का शिकार करते हैं, हम उसे मारते हैं और उसे हमारी जानलेवा वार से मार देते हैं। हमने उसे परमेष्ठिन के खुले हुए जबड़े में चोट पहुंचाई है।

*( महाभारत 7: 198: (p.465) )*
यहां तक कि एक क्षत्रिय का कर्तव्य है। की नास्तिक (काफ़िर, गैर हिन्दू ) वेद-विरोधीयों को मारे  ।

*( अथर्ववेद 11 : 5  : 72 - 74 )*
मांसभक्षक अग्नि  द्वारा  उस वेद-निन्दक  नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू )  को  जला दे  ओर पृथिवी से निकाल दे  ; वायू  उसको  बड़े बिस्तार  अन्तरिक्ष  से  और  सृर्य  उसको  प्रकाश से  जला  देवे  ।

*( यजुर्वेद अध्याय ७ मंत्र २ / १८ )*
“हे इन्द्र ! तुम अपने शत्रुओं को वशीभूत कर लेते हो। इस नास्तिक (काफ़िर, गैर हिन्दू) को वशीभूत करो। यह तुम्हारे स्त्रोता का अहित करता है। इसके विरुद्ध तीक्ष्ण वीर को प्रेरित कर इसे नष्ट कर डालो.” 

------------------------------------------------------------------------------------------

हिंदू धर्म  में JIHAD ( जिहाद ) ??


( अथर्ववेद ५: ८: ४ )
भागो तुम , तुम परिश्रम करो, अब तक इंद्र के आदेश पर मुस्कुराओ और हत्या करो। जिस तरह एक भेड़िया एक भेड़ को डराते है, ऐसे ही  तुममे जीवन की  रहने तक उसे  तुमसे बचने न दें। उसकी सांस तेजी से रोकें।

( अथर्ववेद ४: ३१: ३ )
हे मनु, हम पर आक्रमण करने वालों को दूर करो। पर! तोड़कर, दुश्मनो  को कुचल कर मार डालो । वे तुम्हारी अड़ियल ताकत को नहीं रोक पाये : ताकतवर! एकमात्र ! उन्हें मार डालो ।

( अथर्ववेद १२: ५: )
६७ प्रहार करके कंधे से  सिर को अलग करो ।
६८ उसके सिर से बाल छीन लो, और उसके शरीर से खाल उतार दो:
६९ उसके नसो को फाड़ दो, क्योंकि उसका मांस को उसके शरीर  से टुकड़ों में गिरा दो ।
७० उसकी हड्डियों को एक साथ कुचल दो, हड़ताल करो और उसके बाहर मज्जा को निकाल दो ।
७१ उसके सभी अंगों और जोड़ों को अलग कर दो।

( रिग्वेद  १: १७६: ४ )
हर कोई जो कोई उपहार नहीं देता है, उसको  हत्या करो, जो मुश्किल से पहुंचता है, आपको प्रसन्न करता है। हमें वह धन दो जो उसका था : यह भी पूजा का इंतजार करता है

( रिग्वेद  १: १४२: १ )
असहाय, इंद्र मघवन, आपके द्वारा पुराने युद्ध में, हम उन पुरुषों से लड़ते हैं, जो हमारे खिलाफ  करते हैं, हमारे दुश्मन को मार डालो । इस दिन वह करीब है जो आपको ( इन्द्र ) सोम रस ओर बलिदान  देता है।  हे इन्द्र  हमे आशीर्वाद दो की हम युद्ध-धन आपस मे वाट सके , अपनी ताकत दिखाते हूए , युद्ध को बिगाड़ते हैं।

( रिग्वेद  १: ३१: ६ )
अग्नि, जब आप उसे पीछा कर रहे हैं, तब तक वह धर्मसभा में सबसे सुरक्षित रहेगा। जो बुरे तरीकों से चलता है। फिर भी, जब वीर युद्ध-धन के लिए लड़ते हैं, जो पुरुषो को दौड़ाते हैं,  घेरते  हैं,  युद्ध मे कुचलते ओर मारते हैं।

( अथर्ववेद १०: ५: ५० )
अच्छी तरह से कुशल, इस आदमी के खिलाफ मैंने पानी के बिजली को चार शूलो से उड़ा दिया, जिससे उसका सिर चकरा गया। उसके शरीर के सभी अगों को नष्ट कर दिया। देवताओं के पूरे यजमान को मेरा उद्देश्य मंजूर है।. .

___________________________________________________________

●● *अधिक "वैदिक- जिहाद ?"* ●● 

*( रिग्वेद १: १०३: ६ )*
उसे वास्तव में मजबूत करने के लिए, जिसके कर्म कई हैं, उसको मजबूत करने के लिए, *हे बैल हमें "सोम-रस" डालने दो  । हमारे  नायक, एक चोर की तरह घात में देखता है, नास्तिको  की संपत्ति को कब्जा करते हुए ।*

*( रिग्वेद  १: ८१: )*
*२* तू, नायक , एक योद्धा, तू विपुल की ध्वंस लीला करने वाला है। तनिक भी कमजोर नहीं है, तू यज्ञ करने वाले की सहायता करता है, तू अर्पित करने वाले को पर्याप्त धन देता है।

*३* जब युद्ध और लड़ाइयाँ होती हैं, तो पहले तेरे सामने  युद्धधन बिछा दिए जाते हैं | तू कीर्त्ति को तेरे अधीन कर लो। तू किसका वध कर रहा है और किससे समृद्ध? *हे इन्द्र, हमें "यूद्ध-धन" से धनवान बना दे।*
*( रिग्वेद १: १०२: ६ )*

उनकी (इन्द्र ) भुजाएँ परिजन जीतती हैं, उनकी शक्ति प्रत्येक कार्य में सर्वश्रेष्ठ होती है, सौ मदद के साथ, युद्ध के दीन हंगामा मचाने वाले  इन्द्र  होता है: कोई भी ताकत मे ऊससे विरोध नही कर  सकता है। *इसीलिए "युद्ध-धन" की लालस मे हम उसे पुकारते है*
*(  रिग्वेद ५: ३४: ७ )*

वह सभी कंजूस के *सामग्री को लूटने के लिए* हमको इकट्ठा करता है: उत्कृष्ट संपत्ति वह उसे देता है जो उपहार प्रदान करता है। यहां तक ​​कि व्यापक गढ़ में भी सभी लोक उसके सामनो टिक नही सकते हैं जिन्होंने उसको (इन्द्र ) गुस्सा करने के लिए उकसाया ।
*( रिग्वेद ५: ३५: १ )*

हे इन्द्र , हमारी सहायता के लिए तेरा सबसे प्रभावशाली शक्ति लाओ , जो हमारे लिए पुरुषों को जीतती है, और लड़ाई में *"युद्ध-धन",* अजेय हो कर।
*( रिग्वेद ९: ४१: ४ )*

हे इन्द्र , जब तुझे पुकारा जाता है, तो हम पर प्रचुर मात्रा में भोजन दो; हे इन्द्र  धन की खान और घोड़ा  और प्रचूर *"युद्ध-धन"*  ।
*( अथर्ववेद ४: २२: ७ )* 

शेर की तरह, उनके सभी गांव को लूट लो , बाघ की तरह उनको भागाओ।  हमारे भगवान और नेता इंद्र के साथ संबद्ध बनाकर अपने दुश्मनों क�

____________________________________________________________

●● *VED ( वेद ) के अनुसार सभी NASTIKs नास्तिक   को मार डालो ( काट डालो )  ??* ●●
[ चायण-आचार्य , निरूक्त , निघंतु  भाष्यम ]

*( अथर्ववेद ११: २: २३ )* 
श्रद्धांजलि उन्हें दस सकवारी छंदों के साथ दी जाती है, जो हवा के मध्य क्षेत्र में स्थापित होते हैं, *ईश्वर-त्याग करने वाले को काट कर !*

*( रिग्वेद  १: १७४: ८ )* 
इन पुराने पुराने कामों को नए गानों ने गाया है, हे इंद्र। तू ने विजय प्राप्त की, हमेशा के लिए कई जनजातियाँ को खतम कर दिया तू ने। जैसे तू दुर्गम हो गया -  *नास्तिको को कुचल दिया, और ईश्वर-त्याग करने वाले को मार डाला घातक हथियार*

*( रिग्वेद ३: २४: १ )*।
है अग्नि , हमारे विरोधीयो को  निष्क्रिय कर , और हमारे दुश्मनों को दूर भगा। *ईश्वर-त्याग करने वाले को मार डाल*: पूजा करने वाले को भव्यता दें।

*( रिग्वेद 6: 25: 9 )* 
इसलिए हमारे मेजबानों को *एक साथ युद्ध में शामिल होने का आग्रह करें*: और  ईश्वर-त्याग करने वालो के  खिलाफ  यूद्ध कर।

*(  रिग्वेद ७: ९३: ५ )* 
चमकदार कपड़े पहने हुए,  जब दो महान यजमान, भयंकर मुठभेड़ मे एक-दूसरे के विरुद्ध हो जाता हे , तो  तूम ईश्वर-त्याग करने वालो से भिड़ जाओ। और अभी भी सोम-रस देने वाले पुरुषों की सहायता करो ।

*२ मनुस्मृति*
*१०* लेकिन श्रुति ( दैविक आदेश - एक दूसरे से चुन चुन के ) का अर्थ वेद है, और स्मृति (परंपरा) द्वारा पवित्र कानून के संस्थान: उन दोनों मे किसी भी मामले में प्रश्न  नहीं बुलाया जाना चाहिए, क्योंकि उन दोनों से पवित्र कानून चमक गया।
*११* हर दो-बार जन्म लेने वाला व्यक्ति, जो द्वंद्वात्मक संस्थानों पर भरोसा करता है, उन दो स्रोतों (कानून के) की अवमानना ​​करता है, उस नास्तिक को पुण्यात्माओ द्वारा वेद-अवमाननाकारी  के रूप में निकाल देना  चाहिए

*( मनुस्मृति ३: १६१ )*  मिरगी से पीड़ित व्यक्ति, जो ग्रंथियों के टेढ़े-मेढ़े सूजन से पीड़ित होता है, सफेद कुष्ठ रोग से पीड़ित  व्यक्ति ,  मुखबिर, पागल, और अंधे , कोई भी  ��

__________________________________________________________

●● *VEDIC आतंकवाद* ●●

*( आतंकवाद  की जड़ें ??? )*

*अथर्ववेद संहिता*
*भाष्य : आचार्य वैद्यनाथ*

*कांड: ३ सूक्त: १ मंत्र सांख्य: २*
0 'ये शक्तिशाली सेना के लोग; * आप इस तरह की लड़ाइयों के समय फ़ौजियों पर हमला करते हैं, उन पर आ जाते हैं और उन्हें मार डालते हैं। * इन वसुओं को, * विशेषज्ञ सशस्त्र पुरुषों को कसाई इन दुश्मनों से निवेदन करने दें। * उनमें से वे विद्वान जो सभी रणनीतियों के साथ बातचीत करते हैं, जैसा कि दूत ने उन्हें मार डाला।

*कांड: ३ सूक्त: १९ मंत्र सांख्य:७ : टीकाकार: आचार्य वैद्यनाथ भावार्थ:*
आगे बढ़ें और विजयी हों, हे मनुष्यों, बहुत ताकतवर तुम्हारे हथियार हो और तीखे बाणों से लैस, शक्तिशाली हथियार रखने वाले और * अपने मजबूत हथियारों के साथ उन कमजोर दुश्मनों को मार डालो जिनके धनुष कमजोर हैं। *

*भाष्य: आचार्य वैद्यनाथ कांड: ३ सूक्त: १९ मंत्र सांख्य: ८*
धनुर्विद्या के कौशल के माध्यम से बने धनुष-बाण से निकले हुए तीर को उड़ने दें, दुश्मनों को मारें, उन्हें गिराएं, * उनमें से सबसे बहादुर को मारें और उनमें से एक को भी बलात्कार न करने दें।

*कांड: ४ सूक्त: १७ मंत्र सांख्य: ४*
* हे मनुष्य!  मर्दों को मारना * दूसरों पर अपने खुद के पैंतरेबाज़ी के साथ डिजाइन करना जो वे अनलकी पॉट के माध्यम से उपयोग करते हैं, जो कि वे जलसेक के माध्यम से नसों के नीले रक्त में उपयोग करते हैं, और जो वे चीरा के माध्यम से मांस में उपयोग करते हैं।

*कांड: ११ सूक्त: ९ मंत्र सांख्य: १४*

हे अयबुदी  * अपने वध में, जब आप एक आदमी को मारते हैं, तो दुश्मनों की महिलाओं को उनके स्तन और जांघों को पीटना छोड़ दें। *

स्तब्ध और उत्तेजित हो जाना, * उनके बाल जंगली होना और 'हेम रोना और रोना।'

0 अरबुडी * आप शत्रु महिलाओं को सुंदर और कुत्ते जैसे साथी के साथ दिखाई देते हैं।  जो गन्दी चीजों की इच्छा करते हैं, जो कप को चाटते हैं और * अंदर * और जिनके पास हिंसक स्वभाव है, जो अपनी क्रूरताओं में कुतिया हैं। * आप इन सभी को कांटे दिखाने की व्यवस्था करते हैं और उन्हें विस्फोटक हथियार भी दिखाते हैं।

*कांड: ३ सूक्त: १ मंत्र सांख्य: ३*
ओ 'शक्तिशाली शासक और ओ' दुश्मन-हत्या कमांडर;  * आप दोनों दुश्मनों की सेना को मारते हैं, जो हमें धमकी देती है और उन दुश्मनों के लोगों को जला देती है। *

*कांड: ४ सूक्त: ३६ मंत्र सांख्य: ४*
* मैं अपनी शक्ति से दुष्टों पर विजय प्राप्त करता हूं और उनके धनवानों को ले जाता हूं।  मैं उन सभी लोगों को मारता हूं जो दूसरों के साथ शत्रुता रखते हैं।

*कांड: ५ सूक्त: ८ मंत्र सांख्य: ७*
* हे राजा, शत्रुओं के हत्यारे फिर से उस परिश्रम को वापस कर देते हैं, जो कि वह आदमी कर रहा है, और जो परिश्रम उसे करना है, ताकि हमारे लोग उस आदमी को मार डालें।

*कांड: ५ सूक्त: २० मंत्र सांख्य: ८*
इसे कौशल के साथ उत्पन्न होने दें, इसकी आवाज़ के लिए भेजें, यह हमारे योद्धाओं को हथियार बनाने दें।  * यह युद्ध-ढोल दो।  जो बहादुरों का पसंदीदा नायक है, उसे सहयोगी के रूप में हमारे दुश्मनों को मारने दें।

*भाष्य: आचार्य वैद्यनाथ कांड: ८ सूक्त: ३ मंत्रसंकल्प: १५*
वह जो मनुष्य के मांस का हिस्सा बनाता है, वह जो घोड़े की तरह जानवरों के मिलने के साथ साझा करता है और * वह जो नायाब गाय के दूध की लूट करता है वह राक्षस है और उसे शासक द्वारा हड़ताली बल के साथ सिर कलम करना चाहिए। *

*कांड:८ सूक्त: ३ मंत्रसंकल्प: १८*
० राजा!  आप हमेशा शरारत करने वालों को मार डालते हैं, कभी भी लड़ाई में आप पर काबू पाने वाले व्यक्तियों को पैदा करने में परेशानी नहीं होती है, * अपने लोगों के साथ मांस खाने वालों को जला दें और उनमें से किसी को भी अपने शक्तिशाली अद्भुत हथियार से बचने न दें। *

*कांड: ८ सूक्त: ४ मंत्र सांख्य: १*
0 शक्तिशाली राजा और प्रमुख!  * दुष्ट आदमियों को जलाओ और उन्हें नष्ट करो, लोगों में निराशा फैलाना, क्रूर लोगों को भगाना, * उन्हें मारना और उन्हें पूरी तरह से जला देना, *समाज के लोगों के खून चूसने और खा जाने वाले पुरुषों का सफाया करते हैं।
____________________________________________________________

*The inspiration behind Hindutv terrorism*

Yajurved
*Devichand*

*O terrible chastiser, "burn" down the "irreligious" foes.*
13:12

The teacher and preacher *are deserving of praise,* who like the King and Commander of the army, the bestowers of happiness *andchastisers of the "irreligious" sinners,*...... 
33:76

. *O God drive away* a.. *a personwith evil designs for murdering cows ;* *a cow-killer for gallows  one who for hunger goes begging to a man who is cutting up a cow ;* *a leader ofmeat eaters bent on misdeed;* *the son of a depraved person,befriendinga sinner.* 
30:18

------------------------------------------------------------------------------------------

*Atharvaved*
*Bhashya : Aacharya Vaidyanath* 

Kand : 3  Sukta : 1  Mantra Sankhya : 2 
0' Ye mighty army men ; *you on the time of such battles attack the foemen, over-come them and kill them.* Let these Vasus, the *expert armed men being requested butcher these enemies.* The learned men among them who is conversant with all strategies, as messenger assail them.

Kand : 3  Sukta : 19  Mantra Sankhya : 7    Commentator : Aacharya Vaidyanath  Bhavarth :
Advance and be victorious, O ye men, exceedingly mighty be your arms and equipped with sharp arrows, possessing powerful weapons and *with your strong arms kill the feeble enemies whose bows are weak.*

Bhashya : Aacharya Vaidyanath  Kand : 3  Sukta : 19  Mantra Sankhya : 8
Let the arrow loosed from the bow-string made through the skill of archery fly away, assail the enemies, vanquish them, *kill the bravest of them and let not one of them scape.*

Kand : 4 Sukta : 17  Mantra Sankhya : 4
*O man ! Kill the men* having designs upon others with their own manoeuvering which they use through unleaked pot, which they use through infusion into the blue blood of nerves, and which they use through the incision into flesh.

Kand : 11  Sukta : 9  Mantra Sankhya : 14
O Aybudi. *In your slaughter, when you kill a man,let the women of foes left beating their breast and thighs.*
being shocked and aggrieved, *having their hair wild and keeping 'hem weeping and crying.* 
0 Arbudi *You make visible to enemies women beautiful and with dog like mates. who desire dirty things, who licks the cup and pots* *inside and who have a violent nature, who are the bitches in their cruelties.* You arrange all these to show thorn and also show them explosive weapons.

Kand : 3 Sukta : 1  Mantra Sankhya : 3
O' Powerful Ruler and O' enemy-killing Commander ; *you both assail the army of foes which threatens us and burn the men of those enemies.*

Kand : 4  Sukta : 36  Mantra Sankhya : 4
*I conquer the wicked with my power and take their wealthy away. I kill all those who bear hostility with others.* Let my intention bear success.

Kand : 5  Sukta : 8  Mantra Sankhya : 7   
*O King, the Killer of enemies turn back again the exertion which that man iS doing and the exertions which he has to do, so that our people kill that man.*

Kand : 5  Sukta : 20  Mantra Sankhya : 8
Let it produced with skill, send for its voice,let it make the weapon of our warriors bristle. *let this war-drum. which is the favourite of braves call out heroes and let it kill our enemies through allies.*

Bhashya : Aacharya Vaidyanath  Kand:8 Sukta:3 MantraSankhya:15 
He who partakes the flesh of human-being, he who shares with the meet of animals like the horse and *he who robs of the milk of unkillable cow is the monster and must be beheaded by the ruler with striking force.*

Kand:8 Sukta:3 MantraSankhya:18
0 King ! you always kill the mischief-manger, never have trouble creating persons overcome you in fight, *burn up the flesh-eaters with their person and let no one of them escape your mighty wonderful weapon.*

Kand: 8  Sukta : 4 Mantra Sankhya :1
0 powerful King and premier ! *Burn the wicked men and destroy them,* send downward the persons who 
disseminate gloom in the people, exterminate the cruel ones, *kill them and totally burn them,*
drive away and annihilate the men who suck and devour blood of the people in the society.

-----------------------------------------------------------------------------------------

■■*BRUTALITY  and EXTREMITIES  Of  VEDIC TERRORISM* ■■

*(ATHARVA VED 12: 5: 62)*
Cut, rip, tear, burn, burn, burn, and destroy the Anti-Vedic NASTIK AGNOSTICS (kafir).

*(ATHARVA VED 12: 5: 68 - 71)*
Cut the  Veins of that anti-Vedic AGNOSTICS (kafir); Take off his skin; Melt his pieces of flesh; Encourage his nerves; Put his bones like a stone; Remove his meang; Loosen all its organs and joints.


*(ATHARVA VED 11: 5: 72 - 74)*
By The carnivores FIRE ; BRUN that Anti-Vedic blasphemous ATHEIST AGNOSTICS (kafir) by fire and expel it from the earth;  Vayu burns him with a large bed space and the creation burns him with light.


*( RIG VED  10:87:10 )*
Look on the fiend mid men, as Man-beholder: rend thou his three extremities in pieces.Demolish with thy flame his ribs, O Agni, the Yātudhāna's root destroy thou triply.


*( ATHARVA VED  5:20:5 )*
Hearing the Drum's far-reaching voice resounding, let the foe's dame, waked by the roar, afflicted,Grasping her son, run forward in her terror amid the conflict of the deadly weapons.


*( ATHARVA VED  10:5:42 )*
We hunt that man, we beat him down and slay him with our murderous blows.We with the spell have hurried him to Parameshthin's opened jaws.


*MAHABHARATA 7:198:(p.465)* Even this is the duty of a Kshatriya, viz., to slay or be slain.

-----------------------------------------------------------------------------------------

■■*PARASHU RAMA  Commits GENOCIDE Because HE is ANGRY* ■■

*MAHABHARATA 1:II*

"The Rishis said, 'O son of Suta, we wish to hear a full and circumstantial account of the place mentioned by you as Samanta-panchaya.'

"Sauti said, 'Listen, O ye Brahmanas, to the sacred descriptions I utter O ye best of men, ye deserve to hear of the place known as Samanta-panchaka. In the interval between the Treta and Dwapara Yugas, PARASHU-RAMA (the son of Jamadagni) great among all who have borne arms, urged by impatience of wrongs, repeatedly smote the noble race of Kshatriyas. And when that fiery meteor, by his own valour,  annihilated the entire tribe of the Kshatriyas, he formed at Samanta-panchaka five lakes of blood. We are told that his reason being overpowered by anger he offered oblations of blood to the manes of his ancestors, standing in the midst of the sanguine waters of those lakes. It was then that his forefathers of whom Richika was the first having arrived there addressed him thus, 'O PARASHU RAMA, O blessed RAMA, O offspring of Bhrigu, we have been gratified with the reverence

-----------------------------------------------------------------------------------------

Hindu sacred texts on killing enemies of Vedas/Justifying the killings.

1. Atharva Veda 20.96.4: "..he slays, unasked, the enemies of Vedas."

2. Atharva Veda 2.12.6: "..Burn down the enemies of Vedas."

3. Atharva Veda 20.93.1 "…destroy the enemies of Vedas."

/1
4. Rig Veda 6.22.8: "..burn down the enemies of God, Vedas and the malice…"

5. Rig Veda 6.72.1: "…ye killed all darkness and the Gods’ blasphemers."

6. Rig Veda 6.52.3: "…cast your destroying weapon for the destruction of the enemies of Veda, wealth and crops."

/2
7. Rig Veda 2.23.14: "Burn up the disbelievers with thy fiercest (showing a heartfelt and powerful intensity.) flaming brand, those who have scorned thee in thy manifested might…"

8. Rig Veda 2.23.4: "…and preservest men; distress o’ertakes not him who offers gifts to..

/3
thee. You burns up the enemies of Vedas and Ishwar."

9. Rig Veda 2.23.8: "…Strike, O Brhaspati, the Gods’ revilers [or enemies] down, and let not the unrighteous come to highest bliss."

9. Rig Veda 6.61.3: "Thou castest down, Sarasvati, those who scorned the Gods…"

/4
10. ”Godly persons shall always be ready to kill irreligious people” -[Kshemkarandas Trivedi (Arya Samaj) on Atharva Veda 12.5.62, page 576] -Arya Samaj Website

11. Atharva Veda 12.5.54 ‘Vedic followers should destroy infidels”- page 574 Arya Samaj Website

/5
**KILLING THOSE WHO HATE ISHWAR AND WHOM ISHWAR HATES**

1. The entire hymn of Atharva 2.19 is dedicated in burning those who hate Ishwar and to whom Ishwar hates.

2. Atharva Veda 10.3.3 This charm shall conquer and cast down thy foemen. Be thou the first to slay the men who /6
hate thee.

3. ”…O Rohita (King) agitate destroy and entangle in snares the man doing wrong to Brahman.” Atharva Veda 13.3.1, Tr. Vaidyanath Shastri.

4. Atharva Veda 12.5.52: Rend, rend (tear something into pieces.) to pieces, rend away, destroy, destroy him utterly. /7
Destroy Angirasi! the wretch who robs and wrongs the Brahmans, born.

5. Atharva Veda 2.19.1: Burn thou, O Agni, with that heat of thine against the man who hates us, whom we hate.

6. Manu Smriti 8.417: A Brahmana may confidently seize the goods of (his) Sudra (slave); for, /8
as that (slave) can have no property, his master may take his possessions.
7. ”…By him we attack on him who hates us and whome we abhor(regard with disgust and hatred.). We overthrow and slay him through this knowledge, through this act and through this fatal.. /9
weapon.” Atharva Veda 10.5.15

8. Atharva Veda 10.5.25: "…from earth we bar him who hates us and whom we hate."
9. ”O resplendent Lord, brave and opulant, protect us this day against our foes with many and excellent defences, may the vile wretch who hates us fall before us; /10
May the breath of life depart from him whom we hate.” Rig Veda 3.53.21, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 4, page 1237

10. Yajur Veda 15.15: "This one in front, golden-tressed, with sunbeams; the leader of his host and his chieftain are Rathagritsa and Rathaujas, and /11
Puñjikasthalâ: and Kratusthalâ his Apsarases. Biting animals are his weapon, homicide his missile weapon; to them be homage: may they protect us, may they have mercy upon us. In their jaws we place the man whom we hate and who hates us."

/12
11. ”May you (O love divine), the beholder of the path of enlightenment, purifying our mind and destroying the infidels who refuse to offer worship, come and stay in the prime position of the eternal sacrifice.”- Rig Veda 9.13.9, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 11, page 3619

/13
12. ”May the fire divine chase away those infidels, who do not perform worship and who are uncivil in speech. They are niggards, unbelievers, say no tribute to fire divine and offer no homage. The fire divine turns those godless people far away who institute no.. /14
sacred ceremonies.”- Rig Veda 7.6.3, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 8, page 2369

13. ”Augmenting the strength of resplendent self, urging the waters and rejuvenating all noble acts and destroying the infidels.”- Rig Veda 9.63.5, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 11, pg. 3715

/15
14. One who does not offer Sacrifice is inhuman ”May your friend, the cloud, hurl that infidel down from heaven who differs from us in rites and rituals, is inhuman, who does not observe fire sacrificials, and who does not show reverence to Nature’s...

/16
bounties.”- Rig Veda 8.70.11, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 10, page 3319

15. ”O Lord of knowledge, this laudation is for you…destroy the godless and the malice of our enemy.”- Rig Veda 7.97.9, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 8, page 2613

/17
16. Rig Veda 1.84.8: When will he trample, like a weed, the man [Infidel] who hath no gift for him…

17. ”When, with his foot, will he trample the unworshipping man like a mushroom”- Nirukta 5.17

/18
Hindu holy book - Mahabharata is entire epic on war, war for property of Pandavs and thus finding justice by war. Millions got killed for that. It is said that even soil turned red in color by blood, Mahabharata is the only religious book which is complete violence based.

/19
Lord Parshuram - sixth avatar of Vishnu is known for his violence against kshtriyas (warriors). He killed his mother by cutting her head on father’s command and make earth rid of kshtriyas 21 times, killing kings, their successors and kids.

/20
Atharva Veda 12.5.62 ”Rend, rend to bits, rend through and through, scorch and consume and burn to dust, the one who rejects the Vedas”

Note: When you ask them about these statements, they say you have misinterpreted the verses and quoted out of context. /21
This is exactly what they do with the verses of the Qur'an and try to prove that Islam is not a religion of peace. However, these contexts and statements MIGHT be about war and self defence at the time it was written, killing is justified only in war according to the... /22,
of Sanatan dharma but why do hindus take verses from the Qur'an and misquote it when their own sacred texts are filled with this?

Friday, 19 June 2020

(e) मूर्तिपूजा, अवतार, शिवलिंग, श्रीकृष्ण ईश्वर।

प्रश्न) मूर्त्तिपूजा कहां से चली?

(उत्तर) जैनियों से।

(प्रश्न) जैनियों ने कहां से चलाई?

(उत्तर) अपनी मूर्खता से।

(प्रश्न) जैनी लोग कहते हैं कि शान्त ध्यानावस्थित बैठी हुई मूर्त्ति देख के अपने जीव का भी शुभ परिणाम वैसा ही होता है।

(उत्तर) जीव चेतन और मूर्त्ति जड़। क्या मूर्त्ति के सदृश जीव भी जड़ हो जायगा? यह मूर्त्तिपूजा केवल पाखण्ड मत है। जैनियों ने चलाई है। इसलिये इन का खण्डन 12 वे समुल्लास में करेंगे।

(प्रश्न) शाक्त आदि ने मूर्त्तियों में जैनियों का अनुकरण नहीं किया है क्योंकि जैनियों की मूर्त्तियों के सदृश वैष्णवादि की मूर्त्तियां नहीं हैं।

(उत्तर) हां! यह ठीक है। जो जैनियों के तुल्य बनाते तो जैनमत में मिल जाते। इसलिये जैनों की मूर्त्तियों से विरुद्ध बनाईं, क्योंकि जैनों से विरोध करना इन का काम और इन से विरोध करना मुख्य उन का काम था। जैसे जैनों ने मूर्त्तियां नंगी, ध्यानावस्थित और विरक्त मनुष्य के समान बनाई हैं। उन से विरुद्ध वैष्णवादि ने यथेष्ट शृङ्गारित स्त्री के सहित रंग राग भोग विषयासक्ति सहिताकार खड़ी और बैठी हुई बनाई हैं। जैनी लोग बहुत से शङ्ख घण्टा घरियार आदि बाजे नहीं बजाते। ये लोग बड़ा कोलाहल करते हैं। तब तो ऐसी लीला के रचने से वैष्णवादि सम्प्रदायी पोपों के चेले जैनियों के जाल से बच के इन की लीला में आ फंसे और बहुत से व्यासादि महर्षियों के नाम से मनमानी असम्भव गाथायुक्त ग्रन्थ बनाये। उन का नाम ‘पुराण’ रख कर कथा भी सुनाने लगे। और फिर ऐसी-ऐसी विचित्र माया रचने लगे कि पाषाण की मूर्त्तियां बनाकर गुप्त कहीं पहाड़ वा जंगलादि में धर आये वा भूमि में गाड़ दीं। पश्चात् अपने चेलों में प्रसिद्ध किया कि मुझ को रात्रि को स्वप्न में महादेव, पार्वती, राधा, कृष्ण, सीता, राम वा लक्ष्मी, नारायण और भैरव, हनुमान् आदि ने कहा है कि हम अमुक-अमुक ठिकाने हैं। हम को वहां से ला, मन्दिर में स्थापन कर और तू ही हमारा पुजारी होवे तो हम मनोवाञ्छित फल देवें। जब आंख के अन्धे और गांठ के पूरे लोगों ने पोप जी की लीला सुनी तब तो सच ही मान ली। और उन से पूछा कि ऐसी वह मूर्त्ति कहां पर है? तब तो पोप जी बोले कि अमुक पहाड़ वा जंगल में है चलो मेरे साथ दिखला दूं। तब तो वे अन्धे उस धूर्त्त के साथ चलके वहां पहुंच कर देखा। आश्चर्य होकर उस पोप के पग में गिर कहा कि आपके ऊपर इस देवता की बड़ी ही कृपा है। अब आप ले चलिये और हम मन्दिर बनवा देवेंगे। उस में इस देवता की स्थापना कर आप ही पूजा करना। और हम लोग भी इस प्रतापी देवता के दर्शन पर्सन करके मनोवाञ्छित फल पावेंगे। इसी प्रकार जब एक ने लीला रची तब तो उस को देख सब पोप लोगों ने अपनी जीविकार्थ छल कपट से मूर्त्तियां स्थापन कीं।

साभार महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश, ग्यारहवां समुल्लास


______________________________________________

दयानन्द मत भञ्जन भाग -2

स्वामी दयानन्द सरस्वती  सत्यार्थ_प्रकाश के ग्यारहवे समुल्लास में कह रहे है कि सनातन धर्म मे विग्रह पूजन  जैनियों द्वारा चलाई गई है सनातन धर्म मे विग्रह पूजन का उल्लेख कहीं नही है साथ ही साथ इन्होंने स्प्ष्ट कहा है कि महाभारत आदि(द्वापर युग) कालखण्ड में भी विग्रह पूजन का प्रमाण नही मिलता ||

उत्तरपक्ष:-- स्वामी दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश जब लिखने बैठे हो तो भांग खा कर ही बैठे होंगे वा उनका एक ही लक्ष्य होगा भारत मे सनातन धर्म के प्रति झूठा प्रचार इतना करो कि सनातन धर्म के प्रति लोगो का विश्वास ही उठ जाए ।

परन्तु उनके मन मे एक बार भी यह बिचार नही उठा कि सनातन धर्म मे जब जब धर्म बिरोधी विधर्मियो का जन्म हुआ तब तब सनातन धर्म मे रक्षण हेतु दिब्य विभूतियों का आविर्भाव भी हुआ

 श्रीरामचन्द्र ,श्रीकृष्ण,आद्य शङ्कराचार्य विभूतियों ने विधर्मियो के मतों का खण्डन और सनातन धर्म का मण्डन किया ऐसे में झूठा प्रचार करना उनके आर्य होने का प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है ।

 महाभारत (द्वपर) रामायण(त्रेता युग) से भी पूर्ववत अविचलधारा रूप से विग्रह उपासना चली आरही  है ।जिन ग्रन्थों का हवाला स्वामी दयानन्द सरस्वती ने दिया है हम उसी ग्रन्थ के माध्यम से उनके मतों का खण्डन करेंगे ।

महाभारत के द्रोण पर्व में स्प्ष्ट रूप से विग्रह पूजन को दिखलाया गया है ।

पूजयेद्विग्रहं यस्तु लिङ्गं चापि महात्मनः।
लिङ्गं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते।।

पूज्यमाने ततस्तस्मिन्मोदते स महेश्वरः।
सुखी प्रीतश्च भवति प्रहृष्टश्चैव शङ्करः।। (महाभारत द्रोण पर्व २०३/१४०-१२६)

केवल महाभारत ही क्यो रामायण में भी विग्रह पूजन को स्प्ष्ट रूप  से दिखलाया गया है ।

तत्र तां प्रवणामेव मातरं क्षौमवासिनीम् । 
वाग्यतां देवतागारे ददर्शायाचतीं श्रियम् ॥ 
कौसल्या अपि तदा देवी रात्रिम् स्थित्वा समाहिता ।
प्रभाते तु अकरोत् पूजाम् विष्णोह् पुत्र हित एषिणी ॥

देवकार्यनिमित्तम् च तत्रापश्यत् समुद्यतम्।
दध्यक्षतम् घृतम् चैव मोदकान् हविषस्तदा ॥
लाजान् माल्यानि शुक्लानि पायसम् कृसरम् तथा ।
समिधः पूर्णकुम्भाम्श्छ ददर्श रघुनम्दनः ॥ (वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड )

अब बिचार करिए कि जिस त्रेता युग मे  रघुकुल शिरोमणि राजा दशरथ ,राजा जनक  ,मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र ,महर्षि अगस्तस्य, महर्षि वशिष्ठ,महर्षि विश्वामित्र,जैसे धर्मज्ञ रहे हो ।

तथा द्वापर युग मे महर्षि संदीपनी, द्रोणाचार्य,पितामह
भीष्म ,कृपाचार्य ,धर्मराज विदुर तथा जगतपति स्वयं श्रीकृष्ण हो 

उस कालखण्ड में भी विग्रह उपासना अविचल श्रद्धा रूप से होती चली आ रही थी ।

वही विग्रह उपासना आज स्वामी दयानन्द के आंखों में शूल की तरह चुभने लगा था ऐसा क्यो ??
क्यो की वह परोक्ष रुप से ईशाइयों का एजेंट था ।

स्वामी दयानन्द सरस्वती अपने ग्यारहवे समुल्लास में यह भी स्वीकार करते है कि महाभारत में जो जो श्लोक आये है वह सत्य है । तो क्या स्वामी दयानन्द सरस्वती ने महाभारत का अध्ययन किये बिना ही यह उद्घोषणा कर बैठे ??
 सनातन धर्म मे विग्रह पूजा त्रेतायुग से भी अती प्राचिन है  ।
जैन बौद्ध ईशा इसाइलाम जैसे जितने भी मत पन्थ है वे सब के सब प्रतीक उपासना ही करते है ।यह सनातन धर्म की ही देन है जो प्रत्यक्ष ,और परोक्ष रूप से प्रतीक उपासना सभी करते है ।


*वेदों से भगवान के श्री विग्रह की पूजा के अनेकों प्रमाण*:-

ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में मूर्तिपूजा का उल्लेख इस प्रकार हुआ है:- 

*"अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत ।*
 *अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्णवर्चत ।।"* -ऋग्वेद-८/६९/८,

इस मन्त्र में ४ वार अर्च धातु का प्रयोग हुआ है । जिसका अर्थ है।
"पूजा करना" - "अर्च पूजायाम्"-पाणिनीय धातुपाठ 

*अर्थ*- हे ( प्रियमेधासो ) बुद्धिमान् पुत्रों ! तुम लोग इन्द्र की
( अर्चत) पूजा करो । (प्रार्चत) पूर्ण मनोयोग से पूजा करो ।
इस प्रकार अरनेक वार इन्द्र की पूजा पर ज़ोर डाला गया है।

मूर्ति के विना इन्द्र की पूजा तो हो नहीं सकती । इसलिए पूजा हेतु इन्द्र की मूर्ति आक्षेपलभ्य होगी। अत: मूर्तिपूजा वेदों से सिद्ध है।

एक बहुत सुस्पष्ट प्रमाण है मूर्ति विक्रय को लेकर-

*"क इमं दरशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः ।*
 *यदा वृत्राणि जंघनदथैनं मे पुनर्ददत् ।।"*
-ऋग्वेद-४/२४/१०,

*अर्थ*- हमारे इस इन्द्र को कौन १० गायों से ख़रीद रहा है ?
( ध्यातव्य है कि प्राचीनकाल में गायों द्वारा ख़रीदारी होती थी।)

इन्द्र देवता का हम लोगों की भाँति कोई प्रत्यक्ष स्वरूप तो
उपलब्ध नहीं हैं जिसका विक्रयण हो सके। अत: जिसे मन्त्र में बेचने की बात कही जा रही है वह निश्चित ही इन्द्र की मूर्ति है। अमूर्त इन्द्र देवता में क्रयणकर्मत्व बाधित होकर उनके मूर्ति की कल्पना=अनुमान, करा रहा है।

यदि कोई कहे कि हमें तो वेदों में प्रतिमा शब्द बताइये तब विश्वास करेंगे। तो उनके लिए यह मन्त्र प्रस्तुत हैं-

*"क्वासीत प्रमा "प्रतिमा" किं निदानमाज्यं परिधि: क आसीत् ।।"*
-ऋग्वेद-१०/१३०/३,
यहाँ साक्षात् "प्रतिमा" शब्द दिख रहा है ना ।

भगवान जगन्नाथ की दारुमयी मूर्ति का सुस्पष्ट उल्लेख ऋग्वेद में है-.-१०/१५५/३,
*"अदो यद्दारु प्लवते सिन्धोः पारे अपूरुषम् ।*
*तदा रभस्व दुर्हणो तेन गच्छ परस्तरम् ।।"*

*अर्थ*:- "वह दूर समुद्र के किनारे दारुमय जगन्नाथ भगवान् का शरीर जल के ऊपर है। विप्रकृष्ट देश में बर्तमान पुरुष निर्माण रहित जो दारुमय पुरुषोत्तम शरीर समुद्र के तट में विराजमान है उस शरीर का अवलम्बन वा उपासना करो , जो किसी से भी हनन नहीं होता उस दारुमय देव की उपासना करने से अतिशय उत्कृष्ट वैष्णव लोक का प्राप्त हो।

 यहां काष्ठमयी प्रतिमा का प्रमाण धर्म दूषकों की नाक में नकेल डाल रहा है।

"न तस्य प्रतिमाऽस्ति" का विवेचन प्रतिमा का अर्थ उपमा,
उपमान और सदृश भी होता है।

*"प्रतिमानं प्रतिबिम्बं प्रतिमा प्रतियातना* । *प्रतिच्छाया प्रतिकतिरर्चा पुंसि प्रतिनिधिः उपमोपमानं स्यात्।।"* ~ अमरकोश

यहाँ प्रतिमा प्रतिमान आदि शब्द उपमा उपमान अर्थ में
प्रस्तुत किये गये हैं। पर्ववर्ती मनीषी उपमा उपमान का सम्बन्ध प्रतिमा आदि शब्दों से करके अर्थ करते रहे हैं। 

इसीलिए वाल्मीकि रामायण में अप्रतिमा शब्द के प्रतिमा का अर्थ उपमा लेकर कहा गया-

*"कीर्ति चाऽप्रतिमां लोके प्रापस्यसे पुरुषर्षभ* -
तुम इस लोक में अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे।

 यहाँ  अप्रतिमा का  "अनुपम" अर्थ सुस्पष्ट है ।

सादृश्य अर्थ में प्रतिमा शब्द-

*"सा सुशीला वपुःश्लाघ्या रूपेणाप्रतिमा भुवि ।।*"-
वाल्मीकिरामायण,अरण्यकाण्ड-३४/२०,

अर्थ :- उसके रूप की समानता करने वाली भूमण्डल में दूसरी कोई स्त्री नहीं है ।-सीता के विषय में शूर्पणखा का वचन।

यहाँ पर जानकी जी तथा दूसरी कन्याओं के रूप की समानता का निषेध "अप्रतिमा" शब्द से किया जा रहा है ।
यहाँ प्रतिमा अर्थात् मूर्ति का निषेध नहीं बल्कि समानता का निषेध किया जा रहा है । ठीक वैसे ही वेद के उस वचन में भी मूर्ति का निषेध नहीं प्रत्युत समानता का निषेध किया गया है।

"न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यशः,-
यजुर्वेद-३२/३, 
में प्रतिमा का "सदृश" अर्थ लेकर उस परमात्मा के समान दूसरा कोई नहीं है -ऐसा कहा गया । 

इसी को उपनिषद् में स्पष्ट करते
हुए कह रहे हैं-
" न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।" -श्वेताश्वतरोपनिषद्-६/८

अर्थ:- उस परमात्मा के समान और अधिक कोई नहीं दिखायी देता ।

इस औपनिषद वचन से परमात्मा के सदृश दूसरे का निषेध
किया गया है । (यही अर्थ " न तस्य प्रतिमाऽस्ति" इस वेदवाक्य
का है ।) 

*न तस्य प्रतिमाऽ अस्ति यस्य नाम महद् यशः।* हिरण्यगर्भ ऽ
इत्य् एषः। मा मा हिमसीद् इत्य् एषा। यस्मान् न जात ऽ इत्य् एष॥
~यजुर्वेद (३२/३)

अर्थ इसका यह है, कि "जिस परमात्मा की महिमा का वर्णन 'हिरण्यगर्भं (यजुर्वेद २५/१०) 'यस्मान्न जात:' (यजुर्वेद ८/२३) तथा 'मा मा हिंसीत् (यजुर्वेद १२/१०२) आदि मंत्रों में किया गया है, 'यस्य नाम महद् यश:' जिसका नाम और यश ऐसा है उसकी तुलना में कोई नहीं वही आदित्य है, वही वायु है, चन्द्र, शुक्र, जल प्रजापति और सर्वत्र भी वही है, 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' ऐसा अद्वितीय रूप परमात्मा है उसके सदृश कोई और नहीं है।

___________________________________________________________


*मूर्ति पूजा के विरोध के पीछे क्या है आर्य समाज का तर्क?*

मूर्ति पूजा के विरोध में खड़े लोगों में सबसे पहले नाम आता है 'आर्य समाज' का. जिसकी स्थापना महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा अप्रैल 1875 में मुंबई में की गई थी. इस समाज के नियमों में ही है कि आप मूर्ति के उपासक नहीं हो सकते. गुरुकुल पौंधा देहरादून में धर्म विषय के आचार्य शिवदेव शास्त्री एक कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि जब दयानंद सरस्वती अपने बाल्यकाल अवस्था में थे, और उनका नाम मूलशंकर हुआ करता था. वो शिव के बहुत बड़े भक्त हुआ करते थे. वो प्रत्येक सोमवार और शिवरात्रि को व्रत रखा करते थे. इसी तरह एक बार शिवरात्रि के त्योहार पर रात को पूजा और भजन करने के बाद मूलशंकर अन्य सभी शिव भक्तों की तरह वहीं मंदिर में रुक गए. आधी रात के बाद जब बालक मूलशंकर की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि शिवलिंग पर चढ़ाए हुए प्रसाद पर चूहे चढ़े हुए हैं. वो बताते है कि दयानंद सरस्वती के दिमाग में उसी समय यह बात खटकी की जो मूर्ति में समाया हुआ भगवान एक छोटे से चूहे से अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो पूरे विश्व की क्या रक्षा करेगा?

इसी आधार पर आर्य समाज मूर्ति पूजा का पुरजोर विरोध करता है. बकौल, शिवदेव शास्त्री, महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुसार मूर्ति-पूजा कोई सीढ़ी या माध्यम नहीं बल्कि एक गहरी खाई है. जिसमें गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है और एक बार इस खाई में गिर जाता है वो इस खाई से आसानी से नहीं निकल सकता है।

------------------------------------------------------------------------------------

*मूर्ति पूजा की सच्चाई*

वेद में मूर्ति पूजा का विधान नहीं है | वेद तो घोषणापूर्ण कहते है --
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः*  | ( यजुर्वेद ३२ -३ )
अर्थात जिसका नाम महान यशवाला है उस परमात्मा की कोई मूर्ति , तुलना , प्रतिकृति , प्रतिनिधि नहीं है |

*प्रश्न उत्पन्न होता है कि इस देश में मूर्तिपूजा कब प्रचलित हुई और किसने चलाई ?*

महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में प्रश्नोत्तर रूप में इस सम्बन्ध में लिखते है --
प्र - मूर्तिपूजा कहाँ से चली ?
उ - जैनियों से |
प्र - जैनियों ने कहाँ से चलाई ?
उ - अपनी मूर्खता से |

*पण्डित जवाहरलाल नेहरु के अनुसार ,*  मूर्तिपूजा बौद्धकाल से प्रचलित हुई | वे लिखते है --
"यह एक मनोरंजक विचार है कि मूर्तिपूजा भारत में यूनान से आई | वैदिक धर्म हर प्रकार की मूर्ति तथा प्रतिमा-पूजन का विरोधी था | उस काल ( वैदिकयुग ) में देवमूर्तियों के किसी प्रकार के मंदिर नहीं थे ........ प्रारम्भिक बौद्ध धर्म इसका घोर विरोधी था .........पीछे से स्वयं बुद्ध की मूर्तियाँ बनने लगी | फ़ारसी तथा उर्दू भाषा में प्रतिमा अथवा मूर्ति के लिए अब भी बुत शब्द प्रयुक्त होता है जो बुद्ध का रूपांतर है | " ( हिन्दुस्तान की कहानी -पृ १७२ )

*एक अन्य स्थल पर वे लिखते है --*
"ग्रीस और यूनान आदि देशों में देवताओं की मूर्तियाँ पुजती थीं | वहाँ से भारत में मूर्तिपूजा आई | बौद्धों ने मूर्तिपूजा आरम्भ की | फिर अन्य जगह फ़ैल गई |" ( विश्व इतिहास की झलक - पृ ६९४ )

इन उद्धरणों से इतना निश्चित है कि मूर्तिपूजा हमारे देश में जैन-बौद्धकाल से आरम्भ हुई | जिस समय भारत में मूर्तिपूजा आरम्भ हुई और लोग मन्दिरों में जाने लगे तो भारतीय विद्वानों ने इसका घोर खण्डन किया | मूर्तिपूजा खण्डन में उन्होंने यहाँ तक कहाँ --

*गजैरापीड्यमानोsपि न गच्छेज्जैनमन्दिरम्*  ( भविष्य पु . प्रतिसर्गपर्व ३-२८-५
*अर्थात , यदि हाथी मारने लिए दौड़ा आता हो और जैनियों के मन्दिर में जाने से प्राणरक्षा होती हो तो भी जैनियों के मन्दिर में नहीं जाना चाहिए |*
लेकिन ... उपदेशकों और विद्वानों के कथन का साधारण जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन लोगों ने भी मन्दिरों का निर्माण किया | जैनियों के मन्दिरों में नग्न मूर्तियाँ होती थी , इन मन्दिरों में भव्यवेश में भूषित हार-श्रृंगारयुक्त मूर्तियों की स्थापना और पूजा होने लगी |

भारत में पुराणों की मान्यता है लेकिन पुराणों में भी मूर्तिपूजा का घोर खण्डन किया गया है |

*यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके | स्वधीः कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ||*
*यत्तीर्थबुद्धिः सलिले न कहिर्चिज् | जनेष्वभिज्ञेषु स एव गोखारः ||*  ( श्रीमद भागवत १०-८४-१३ )
*अर्थात , जो वात , पित और कफ -तीन मलों से बने हुए शरीर में आत्मबुद्धि रखता है , जो स्त्री आदि में स्वबुद्धि रखता है , जो पृथ्वी से बनी हुई पाषाण -मूर्तियों में पूज्य बुद्धि रखता है , ऐसा व्यक्ति गोखर - गौओं का चारा उठाने वाला गधा है |*

*न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः |
ते पुनन्त्यापि कालेन विष्णुभक्ताः क्षणादहो ||*  ( देवी भागवत ९-७-४२ )
अर्थात , पानी के तीर्थ नहीं होते तथा मिटटी और पत्थर के देवता नहीं होते | विष्णुभक्त तो क्षण मात्र में पवित्र कर देते हैं | परन्तु वे किसी काल में भी मनुष्य को पवित्र नहीं कर सकते |

दर्शन शास्त्रों में भी मूर्तिपूजा का निषेध है
न प्रतीके न ही सः ( वेदान्त दर्शन ४-१-४ )
प्रतीक में , मूर्ति आदि में परमात्मा की उपासना नहीं हो सकती , क्योंकि प्रतीक परमात्मा नहीं है | संसार के सभी महापुरुषों और सुधारकों ने भी मूर्तिपूजा का खण्डन किया है |

*श्री शंकराचार्य जी परपूजा में लिखते हैं --*

पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् |
स्वच्छस्य पाद्यमघर्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ||
निर्लेपस्य कुतो गन्धं पुष्पं निर्वसनस्य च |
निर्गन्धस्य कुतो धूपं स्वप्रकाशस्य दीपकम् ||

अर्थात , ईश्वर सर्वत्र परिपूर्ण है फिर उसका आह्वान कैसा ?
जो सर्वाधार है उसके लिए आसन कैसा ?
जो सर्वथा स्वच्छ एवं पवित्र है उसके लिए पाद्य और अघर्य कैसा ?
जो शुद्ध है उसके लिए आचमन की क्या आवश्यकता ?
निर्लेप ईश्वर को चन्दन लगाने से क्या ?
जो सुगंध की इच्छा से रहित है उसे पुष्प क्यों चढाते हो ? निर्गंध को धूप क्यों जलाते हो ? जो स्वयं प्रकाशमान है उसके समक्ष दीपक क्यों जलाते हो ?

*चाणक्य जी लिखते*
अग्निहोत्र करना द्विजमात्र का कर्तव्य है | मुनि लोग हृदय में परमात्मा की उपासना करते हैं | अल्प बुद्धि वाले लोग मूर्तिपूजा करते है | बुद्धिमानों के लिए तो सर्वत्र देवता है | ( चाणक्य नीति ४-१९ )

*कबीरदास जी कहते है --*
पाहन पूजे हरि मिले तो हम पूजे पहार |
ताते तो चाकी भली पीस खाए संसार ||

दादुजी कहते है --
मूर्त गढ़ी पाषण की किया सृजन हार |
दादू साँच सूझे नहीं यूँ डूबा संसार ||

गुरुनानकदेव जी का उपदेश है --
पात्थर ले पूजहि मुगध गंवार |
ओहिजा आपि डूबो तुम कहा तारनहार ||

*कुछ अज्ञात लोगों के कथन --*
पत्थर को तू भोग लगावे वह क्या भोजन खावे रे |
अन्धे आगे दीपक बाले वृथा तेल जलावे रे ||
यह क्या कर रहे हो किधर जा रहे हो |
अँधेरे में क्यों ठोकरें खा रहे हो ||
बनाया है स्वयं जिसको हाथों से अपने |
गजब है ! प्रभु उसको बतला रहे हो ||
बुतपरस्तों का है दस्तूर निराला देखो |
खुद तराशा है मगर नाम खुदा रखा है ||
सच तो यह है खुदा आखिर खुदा है और बुत है बुत |
सोच ! खुद मालूम होगा यह कहाँ और वह कहाँ ||

*महर्षि दयानन्द जी का कथन --*
"मूर्ति जड़ है , उसे ईश्वर मानोगे तो ईश्वर भी जड़ सिद्ध होगा | अथवा ईश्वर के समान एक और ईश्वर मानो तो परमात्मा का परमात्मापन नहीं रहेगा | यदि कहो कि प्रतिमा में ईश्वर आ जाता है तो ठीक नहीं | इससे ईश्वर अखण्ड सिद्ध नहीं हो सकता | भावना में भगवान् है यह कहो तो मैं कहता हूँ कि काष्ठ खण्ड में इक्षु दण्ड की और लोष्ठ में मिश्री की भावना करने से क्या मुख मीठा हो सकता है ? मृगतृष्णा में मृग जल की बहुतेरी भावना करता है परन्तु उसकी प्यास नहीं बुझती है | विशवास , भावना और कल्पना के साथ सत्य का होना भी आवश्यक है |" 
(दयानन्दप्रकाश - पृ २६४ )

*प्रश्न -*  मूर्ति पूजा सीढ़ी है | मूर्तिपूजा करते-करते मनुष्य ईश्वर तक पहुँच जाता है |
*उत्तर -*  मूर्तिपूजा परमात्मा -प्राप्ति की सीढ़ी नहीं है | सीढ़ी तो गंतव्य स्थान पर पहुँचने के पश्चात छूट जाती है परन्तु हम देखते है कि एक व्यक्ति आठ वर्ष की आयु में मूर्तिपूजा आरम्भ करता है और अस्सी वर्ष की अवस्था में मरते समय तक भी इसी दलदल से निकल नहीं पाता |
एक बच्चा दूसरी कक्षा में पढता है , उसे पाँच और छ का जोड़ करना हो तो वह पहले स्लेट अथवा कापी पर पाँच लकीरे खेंचता है फिर उसके पास छ लकीरे खेंचता है , उन्हें गिनकर वह ग्यारह जोड़ प्राप्त करता है | परन्तु तीसरी अथवा चौथी कक्षा में पहुँचने पर वह उँगलियों पर गिनने लग सकता है और पाँचवी -छठी कक्षा में पहुंचकर वह मानसिक गणित से ही जोड़ लेता है | यदि मूर्तिपूजा सीढ़ी होती तो मूर्तिपूजक उन्नति करते-करते मन में ध्यान करने लग जाते परन्तु ऐसा होता नहीं है , अतः महर्षि दयानन्द जी ने लिखा है --

"नहीं नहीं , मूर्तिपूजा सीढ़ी नहीं किन्तु एक बड़ी खाई है जिसमे गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है , पुनः इस खाई से निकल नहीं सकता किन्तु उसी में मर जाता है |" (सत्यार्थ प्रकाश , एकादश समुल्लास )

*ईश्वर प्राप्ति की सीढ़ी तो है महर्षि पतंजलि कृत - "अष्टांग योग" - जिसके अंग - यम , नियम , आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान और समाधि हैं | विद्वान , ज्ञानी और योगीजन ईश्वर प्राप्ति की सीढियाँ हैं , पाषाण आदि नहीं |*
( साभार स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती कृत --उपासना और मूर्ति पूजा )

और ये अष्ठ अंगों समेत ईश्वर की उपासना का प्रावधान आज के समय में सिर्फ मुसलमान कर रहा है नमाज के रुप में । सनातन धर्म मूल स्वरूप पवित्र कुरआन के रूप में पूर्णता सुरक्षित है जिसमें कण मात्र भी मिलावट नहीं है , इसलिये मेरी द्रष्टि में आज का सही सनातन धर्मी मुसलमान ही है ,अधिक जानकारी के लिये आप वेद और कुरआन और पैगम्बर मुहम्मद साहब की जीवनी का स्वयं अध्यन करें ।

(महेंद्र पाल सिंह)

____________________________________________________________

मूर्ति पूजा.

वेद में एक निराकार ईश्वर की उपासना का ही विधान है, चारों वेदों के 20589 मंत्रों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जो मूर्ति पूजा का पक्षधर हो ।

महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना ।

वेदों में परमात्मा का स्वरूप यथा प्रमाण –

* न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: ।
– ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 )
उस ईश्वर की कोई मूर्ति अर्थात् – प्रतिमा नहीं जिसका महान यश है ।

* वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम ।
– ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 8 )

विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है ।

* अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते ।
ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।।
– ( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 )

अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं , वह लोग घोर अंधकार ( दुख ) को प्राप्त होते हैं ।

हालांकि वेदों के प्रमाण देने के बाद किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं परंतु आदि शंकराचार्य , आचार्य चाणक्य से लेकर महर्षि दयानन्द सब महान विद्वानों ने इस बुराई की हानियों को देखते हुए इसका सत्य आम जन को बताया ।

बाल्मीकि रामायण में आपको सत्य का पता चल जाएगा की राम ने शिवलिंग की पूजा की थी कि वैदिक मंत्रों द्वारा संध्या हवन-यज्ञ करके सच्चे शिव की उपासना की थी ।

* यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ – केनोपनि० ॥ – सत्यार्थ प्र० २५४

अर्थात जो आंख से नहीं दीख पड़ता और जिस से सब आंखें देखती है , उसी को तू ब्रह्म जान और उसी की उपासना कर । और जो उस से भिन्न सूर्य , विद्युत और अग्नि आदि जड़ पदार्थ है उन की उपासना मत कर ॥

* अधमा प्रतिमा पूजा ।
अर्थात् – मूर्ति-पूजा सबसे निकृष्ट है ।

* यष्यात्म बुद्धि कुणपेत्रिधातुके
 स्वधि … स: एव गोखर: ॥ – ( ब्रह्मवैवर्त्त )

अर्थात् – जो लोग धातु , पत्थर , मिट्टी आदि की मूर्तियों में परमात्मा को पाने का विश्वास तथा जल वाले स्थानों को तीर्थ समझते हैं , वे सभी मनुष्यों में बैलों का चारा ढोने वाले गधे के समान हैं ।

* जो जन परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य की उपासना करता है वह विद्वानों की दृष्टि में पशु–  ( शतपथ ब्राह्मण 14/4/2/22 )

मूर्ति-पूजा पर विद्वानों के विचार

* नास्तिको वेदनिन्दक: ॥ – मनु० अ० १२
मनु जी कहते है कि जो वेदों की निन्दा अर्थात अपमान , त्याग , विरुद्धाचरण करता है वह नास्तिक कहाता है ।

* या वेदबाह्या: स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टय: ।
सर्वास्ता निष्फला: प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ता: स्मृता: ॥  – मनु० अ० १२

अर्थात जो ग्रंथ वेदबाह्य कुत्सित पुरुषों के बनाए संसार को दु:खसागर में डुबोने वाले है वे सब निष्फल , असत्य , अंधकाररूप , इस लोक और परलोक में दु:खदायक है ।

* प्रतिमा स्वअल्पबुद्धिनाम ।   – आचार्य चाणक्य
( चाणक्य नीति अध्याय 4 श्लोक 19 )

अर्थात् – मूर्ति-पूजा मूर्खो के लिए है ।

* नहीं नहीं मूर्ति-पूजा कोई सीढी या माध्यम नहीं बल्कि एक गहरी खाई है जिसमें गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है जो पुन: उस खाई से निकल नहीं सकता ।
 – ( दयानन्द सरस्वती स.प्र. समु. 11 में )

* अगर भला चाहते हो तो घंटा – संटा गंगा में बहाकर साक्षात मनुष्य की सेवा करो ।
– विवेकानंद पत्रावली भाग – 2

वेदों में मूर्ति – पूजा निषिद्ध है अर्थात् जो मूर्ति पूजता है वह वेदों को नहीं मानता तथा “ नास्तिको वेद निन्दक: ” अर्थात् मूर्ति-पूजक नास्तिक हैं ।

कुछ लोग कहते है भावना में भगवान होते है । यदि ऐसा है तो मिट्टी में चीनी की भावना करके खाये तो क्या मिट्टी में मिठास का स्वाद मिलेगा ?

इसी कारण हिन्दू जाति को हजारों वर्षो से थपेड़े खाने पड़ रहे है । मूर्ति-पूजा के कारण ही देश को लगभग एक सहस्र वर्ष की दासता भोगनी पड़ी । मध्यकालीन रूढ़िवादी , राष्ट्रद्रोह , धर्मांधता , सांप्रदायिकता , गलत को सहना , पाप , दुराचार , व समस्त बुराइयों की जड़ है।

* वेद ज्ञान बिन इन रोगों का होगा नहीं कभी निदान ।
कोरे  भावों  से  दोस्तों  कभी  न  मिलता  भगवान ॥

मूर्ति-पूजा के पक्ष में कुछ लोग थोथी दलीलें देते है वे घोर स्वार्थी अज्ञानी व नास्तिक हैं तथा अनीति के पक्षधर व मानवता के कट्टर दुश्मन है जिस प्रकार उल्लू को दिन पसंद नहीं होता , चोरों को उजेली रात पसंद नहीं होती इसी प्रकार स्वार्थियों को मूर्ति-पूजा का खंडन पसंद नहीं होता । कुछ धर्म प्रिय सच्चे लोग भी सत्य बताने वालों को धर्म खत्म करने वाला तक कह देते है और कहते है जो चल रहा है चलने दो ।


-------------------------------------------------------------------------


सृष्टि की सबसे पुरानी पुस्तक वेद (veda) में एक निराकार ईश्वर (Formless god) की उपासना का ही विधान है ।चारों वेदों के 20589 मंत्रों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है । जो मूर्ति पूजा (idol worship) का पक्षधर हो ।

महर्षि दयानन्द के शब्दों में – मूर्ति-पूजा वैसे है। जैसे एक चक्रवर्ती राजा को पूरे राज्य का स्वामी न मानकर एक छोटी सी झोपड़ी का स्वामी मानना।

वेदों में परमात्मा का स्वरूप यथा प्रमाण –

* न तस्य प्रतिमाsअस्ति यस्य नाम महद्यस: ।
– ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 )
उस ईश्वर की कोई मूर्ति अर्थात् – प्रतिमा नहीं जिसका महान यश है ।

* वेनस्त पश्यम् निहितम् गुहायाम ।
– ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 8 )
विद्वान पुरुष ईश्वर को अपने हृदय में देखते है ।

* अन्धन्तम: प्र विशन्ति येsसम्भूति मुपासते ।
ततो भूयsइव ते तमो यs उसम्भूत्या-रता: ।।
– ( यजुर्वेद अध्याय 40 मंत्र 9 )
अर्थ – जो लोग ईश्वर के स्थान पर जड़ प्रकृति या उससे बनी मूर्तियों की पूजा उपासना करते हैं । वह लोग घोर अंधकार ( दुख ) को प्राप्त होते हैं ।

हालांकि वेदों के प्रमाण देने के बाद किसी और प्रमाण की जरूरत नहीं । परंतु आदि शंकराचार्य , आचार्य चाणक्य (acharya chanakya) से लेकर महर्षि दयानन्द (maharishi dayanand) । सब महान विद्वानों ने इस बुराई की हानियों को देखते हुए इसका सत्य आम जन को बताया ।

बाल्मीकि रामायण (balmiki ramayan) में आपको सत्य का पता चल जाएगा । राम ने शिवलिंग (shivling) की पूजा नहीं की थी । वैदिक मंत्रों (vedic mantra) द्वारा संध्या (sandhya) हवन-यज्ञ करके सच्चे शिव की उपासना की थी । 

* यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
– केनोपनि० ॥ – सत्यार्थ प्र० २५४

अर्थात जो आंख से नहीं दीख पड़ता और जिस से सब आंखें देखती है । उसी को तू ब्रह्म जान और उसी की उपासना कर । और जो उस से भिन्न सूर्य , विद्युत और अग्नि आदि जड़ पदार्थ (Root stuff) है उन की उपासना मत कर ॥

* अधमा प्रतिमा पूजा ।
अर्थात् – मूर्ति-पूजा सबसे निकृष्ट है।
Idol worship is the worst.

* यष्यात्म बुद्धि कुणपेत्रिधातुके।
स्वधि … स: एव गोखर: ॥
– ( ब्रह्मवैवर्त्त )

अर्थात् – जो लोग धातु , पत्थर , मिट्टी आदि की मूर्तियों में परमात्मा को पाने का विश्वास तथा जल वाले स्थानों को तीर्थ समझते हैं । वे सभी मनुष्यों में बैलों का चारा ढोने वाले गधे के समान हैं ।

* जो जन परमेश्वर को छोड़कर किसी अन्य की उपासना करता है । वह विद्वानों की दृष्टि में पशु ही है ।
–  ( शतपथ ब्राह्मण 14/4/2/22 )

--------------------------------------------------------------------------------------------

क्या मूर्तिपूजा वेद-विरुद्ध है?
Is idol worship against the Vedas ?

मूर्ति-पूजा (idol-worship) पर विद्वानों के विचार।

* नास्तिको वेदनिन्दक: ॥
– मनु० अ० १२
मनु जी (manu) कहते है कि जो वेदों की निन्दा अर्थात अपमान , त्याग , विरुद्धाचरण करता है। वह नास्तिक (Atheistic) कहाता है ।

* या वेदबाह्या: स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टय: ।
सर्वास्ता निष्फला: प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ता: स्मृता:
॥  – मनु० अ० १२
अर्थात जो ग्रंथ वेदबाह्य कुत्सित पुरुषों के बनाए संसार को दु:खसागर में डुबोने वाले है। वे सब निष्फल , असत्य , अंधकाररूप , इस लोक और परलोक में दु:खदायक है ।

* प्रतिमा स्वअल्पबुद्धिनाम।
– आचार्य चाणक्य (chanakya)
(चाणक्य नीति अध्याय 4 श्लोक 19 )
अर्थात् – मूर्ति-पूजा मूर्खो के लिए है । Idol worship is for fools.

* नहीं नहीं मूर्ति-पूजा कोई सीढी या माध्यम नहीं बल्कि एक गहरी खाई है। जिसमें गिरकर मनुष्य चकनाचूर हो जाता है। जो पुन: उस खाई से निकल नहीं सकता ।
– ( दयानन्द सरस्वती स.प्र. समु. 11 में )


* अगर भला चाहते हो तो घंटा – संटा गंगा में बहाकर साक्षात मनुष्य की सेवा करो ।
– विवेकानंद पत्रावली भाग – 2


वेदों में मूर्ति–पूजा निषिद्ध है अर्थात् जो मूर्ति पूजता है वह वेदों को नहीं मानता । तथा “ नास्तिको वेद निन्दक: ” अर्थात् मूर्ति-पूजक नास्तिक हैं ।

कुछ लोग कहते है भावना में भगवान होते है । यदि ऐसा है तो मिट्टी में चीनी की भावना करके खाये तो क्या मिट्टी में मिठास का स्वाद मिलेगा ? बिलकुल नहीं !

* वेद ज्ञान बिन इन रोगों का होगा नहीं कभी निदान ।
कोरे  भावों  से  दोस्तों  कभी  न  मिलता  भगवान ॥

एक पक्षी को भी पता होता है कि कोई मूरत उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है । वह किसी मनुष्य की मूर्ति पर पेशाब कर देता है। बीट कर देता है उससे डरता नहीं है । कोई मूर्ति का शेर हमें खा नहीं सकता । कोई मूर्ति का कुत्ता काट नहीं सकता तो मनुष्य की मूर्ति मनोकामना कैसे पूरी करती है ? 

इसी कारण हिन्दू (hindu) जाति को हजारों वर्षो से थपेड़े खाने पड़ रहे है । मूर्ति-पूजा के कारण ही देश को लगभग एक सहस्र वर्ष की दासता भोगनी पड़ी । रूढ़िवादी , राष्ट्रद्रोह , धर्मांधता , सांप्रदायिकता , गलत को सहना , पाप , दुराचार व समस्त बुराइयों का मूल कारण यह वेद-विरुद्ध कर्म पाषाण-पूजा (idol worship) ही है।

मूर्ति-पूजा (idol worship) के पक्ष में कुछ लोग थोथी दलीलें देते है। वे घोर स्वार्थी अज्ञानी व नास्तिक हैं तथा अनीति के पक्षधर व मानवता (humanity) के कट्टर दुश्मन है । जिस प्रकार उल्लू को दिन पसंद नहीं होता , चोरों को उजेली रात पसंद नहीं होती। इसी प्रकार स्वार्थियों को मूर्ति-पूजा का खंडन पसंद नहीं होता

------------------------------------------------------------------------------------------

वेदों में अवतारवाद व मूर्त्ति-पूजा की गन्ध भी नहीं है। हठी, दुराग्रही व स्वार्थी लोग अर्थ का अनर्थ करते हैं । 

मूर्ति पूजा के पक्ष में दिये जाने वाले कुछ प्रमाणों की समीक्षा -

1. मूर्ति पूजक - अर्थववेद २/१३/४ में आया है - हे ईश्वर ! आओं इस पत्थर में ठहरो यह पत्थर तुम्हारा शरीर है |

समीक्षा - वाह पंडित जी आधा मन्त्र देकर अपना उल्ल्लू सीधा कर लिया | जरा इसी का अगला भाग पढिये -" कुण्वन्तु विश्वे देवा: आयुष्ते शरद: शतम " अर्थात सब देवता तुम्हारी आयु १०० वर्ष करे ..आपके अर्थ से तो ऐसा लग रहा है कि आप परमेश्वर को देवताओं से आशीर्वाद दिलवा रहे हो कि उसकी आयु देवता १०० वर्ष करे ..अर्थात आपका ईश्वर तो अनादि नही है बल्कि १०० वर्ष बाद मर जाएगा...आपने अर्थ का अनर्थ तो किया ही लेकिन परमेश्वर को देवता से आशीर्वाद दिलवा कर तुच्छ बना दिया यह मन्त्र ईश्वर के लिए नही बल्कि ब्रह्मचारी बालक के लिए है आपके ही सायण ने इसका निम्न प्रकार अर्थ किया है - 

" है माणवक ! एहि आगच्छअश्मान आतिष्ठ ,दक्षिणेन पादें आतुम | ते सर्वतनू: शरीर अश्मा भवतु अश्मवद रोगादिविनिर्मुक्त दृढभवन्तु | विश्वे देवाश्च ते तव शतसंवत्सर परिमित आयु कुर्वन्तु"  अर्थात - हे ब्रह्मचारी | तुम यहां आओ और अपना दाहिना पैर इस पत्थर पर रखो और इसकी तरह दृढ हो, तुम्हारा शरीर , निरोगी हो ओर देव तुम्हारी आयु सौ वर्ष करे | 

2. मूर्ति पूजक- अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है- “संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”

अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।”

समीक्षा - पंडित जी आपके भी अर्थ में कहां लिखा है कि ईश्वर की पत्थर की मूर्ति बना कर पूजो ? आपका अर्थ भी रात्री की प्रतिमा बता रहा है क्या रात्री की कोई मूर्ति आपने देखी है ? यहां रात्रि को ईश्वर की प्रतिमा अर्थात प्रतिरूप की उपमा दी गई है क्यूंकि रात्री में मनुष्य सो कर आनन्द भोगते है और अपनी थकान दूर कर नया जोश भर कर अपनी धन धान में उन्नति करते है | इसी मन्त्र का विनियोग पारस्कर ग्र्ह्सुत्र ३/२/१ में है- जिसमे ऋषि -प्रजापति और देवता रात्रि है ।

- हे रात्रि ! तू प्रजापति का प्रतिरूप है , हमारे आरोग्य धन धान को बढाने वाली तुझे हम जानते है | प्रतिमा का अर्थ प्रतिरूप इस प्रकार होगा - प्रतिमाम आतश्चोपसर्ग (पा. ६/३/१०६ ) प्रतिरूपम ..सम्वत्सर के निम्न अर्थ है समीप आने वाला - समीपम  आगच्छत सम्वत्सर (अ. ३/५/८ ) परमेश्वर - (पा. ४/१/३२ ) अब आप समझ गये होंगे यहा रात्रि को उपाधि दी है न कि ईश्वर की मूर्ति बनाना है |

3. मूर्ति पूजक- मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि 
[तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ]
अर्थात हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो |

समीक्षा- वेदों से आप ब्राह्मण .आरंडय ग्रंथो पर आ गये | लेकिन पोप जी आप ने किस शब्द का अर्थ यहा परमेश्वर लिया यह मुझे ज्ञात नही हो रहा क्यूंकि आपको आधी अधुरा प्रमाण दे कर अपनी बात रखना अच्छे से आता है | चलिए आपने यहा पर एक महावीर शब्द लिखा जिसे आप हनुमान जी की मूर्ति समझ रहे हो | लेकिन शतपथ ब्राह्मण में महावीर कोई मूर्ति नही बल्कि एक प्रकार का यज्ञ पात्र है - "कुशान्त्स स्तीर्य द्वंद पात्रा....भवति " (शत.१४/१/३/१ ) कुशाय बिछा कर दो दो पात्र रखो | उपयमनी, महावीर , परीशा , पिन्वन , रोहिंकपाल , और भी दुसरे पात्र | यहा महावीर पात्र का नाम है|

शतपथ १४/१/२/१७ में महावीर बनाने की विधि लिखी है - मिटटी लेकर एक बालिश्त ऊँचा , गढनेवाला , मध्य में खाली ,मेखला युक्त महावीर बनाये| यहां भी स्पष्ट है कि यह महावीर पात्र ही है ।आपका पूंछ वाला हनुमान नही, न ही कोई प्रतिमा | इसी में महावीर को घोड़े की लीद (पखाने ) में पकाने का उलेख हैं - देखे - शतपथ . १४/१/२/२० ..महावीर को पहले घोड़े के लीद में पकाओ फिर तीन मन्त्र पढ़ कर महवीर को घोड़े की लीद की धुप दो .. क्या पोप जी आप अपने महावीर की मूर्ति को घोड़े की लीद की धुप देते हो या नही ? तो इन ग्र्ह्सुत्रो .ब्राह्मणों में यह महावीर कोई मूर्ति नही बल्कि यज्ञ पात्र ही है |

4. मूर्ति पूजक- सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि |
[यजुर्वेद १५.६५]  हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं |

समीक्षा - पोप जी इस मन्त्र का देवता है विद्वान और यह विद्वान को कहा गया है न कि ईश्वर को । इस मन्त्र की व्याख्या शतपथ में ८/७/४/१०-११ में दी हुई है एक बार उसे भी देख लेते तो यह भ्रम ही न होता | शतपथ में भी यह ईश्वर को नही विद्वान को दी हुई उपमा है क्यूंकि विद्वान को ज्ञान होने से उसे यह उपमा दी है |

5. मूर्ति पूजक- अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत (अथर्ववेद-20.92.5) हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो |

समीक्षा - धन्य हो ! पोप जी इस मन्त्र में कही भी प्रतिमा मूर्ति शब्द तक नही लेकिन आपने प्रकट कर दिए | मन्त्र में दो शब्द हैं -एक पुरम जिसका अर्थ दुर्ग होता है | दूसरा धुरम जिसका अर्थ होता है शत्रुओ का धर्षण करने वाले  इस मन्त्र में ईश्वर को दुर्ग के समान बताया है | जैसे दुर्ग शत्रुओ के हमलो से बचाता है, उसी तरह ईश्वर भी रक्षा करता है इसलिए दुर्ग विशेषण प्रयुक्त हुआ है | इस मन्त्र का अर्थ होगा - 

हे विद्वानों /प्रियमेधो ! उस ईश्वर का भलि भान्ति अच्छे तरह पूजन करो जो निर्भय दुर्ग की तरह रक्षा करने वाला ओर शत्रुओ का धर्षण करने वाला है |अब बताइए कहां से मूर्ति ले आये ?

6. मूर्ति पूजक- ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय| 
[अथर्व ० १६.२.६ ]
अर्थात हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य पाषाण के लिए नमस्कार है |

समीक्षा-  पोप जी ! थोडा निरुक्त और व्याकरण भी देख लेते तो काहे भ्रम में रहते | मन्त्र में ऋषीणाम शब्द का निरुक्त में इन्द्रिय अर्थ किया है ।

देखे - " सप्त ऋषय: प्रतिहिता: शरीरे षडइन्द्रियानि विसप्तति (निरुक्त १२/३७ ) इन्द्रियणाम और दूसरा प्रस्तरा जिसका व्याकरण से अर्थ फैलाने वाला होता है देखे - प्रसारक: प्रश्वर असि ) तो मन्त्र का अर्थ होगा - 

हे परमेश्वर ! इन्द्रियों को फैलाने वाले ,देवो का विस्तार करने वाले तुम्हे नमन हो | यदि इस मन्त्र में ऋषीणा का अर्थ ऋषि ने तब भी आपके मन्तव्य की पुष्टि नही होती है देखे - इस में देवता -वाक् है जिसका अर्थ है वाणी .. अब भौतिक परख व्याख्या इस तरह से होगी -

हे वाणी | तु ऋषियों द्वारा विस्तार होने वाली है, तुझ देव स्वरूप सर्वत्र विस्तारित को नमन हो | यहा मन्त्र द्रष्टा विद्वानों द्वारा वेद वाणी को संसार में प्रचारित करने का भी उपदेश है | तो कहिये यहा भी आपके मूर्ति आदि सिद्ध नही होते है |

7. मूर्ति पूजक-  प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-

“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥" 

अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पसीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।

समीक्षा - हमने या आपने शायद ही ऐसी मूर्ति देखी हो जो नाचती गाती, खेलती कूदती ,खाती हो ,,ये तो सारी चेतन क्रियाएँ है तो जब आपकी मूर्तियां यह सब क्रियाएँ नहीं करती तो पूजते क्यों हो ?

- एक आर्य समाजी

------------------------------------------------------------------------------------------

*शिवलिंग पूजा, मूर्तिपूजा ,अवतारवाद व इनके पक्ष में दिए जाने वाले कुछ प्रमाणों की समीक्षा-*

शिवलिंग को भगवान विश्वनाथ क्यों कहते हैं ? जो शिवलिंग मुस्लिम आकर्मणकारियों से अपनी रक्षा नहीं कर पाया और जिसकी रक्षा के लिये चौबीस घंटे पुलिस तैनात रहती है वह भगवान वा विश्वनाथ कैसे ? बनारस में स्थापित शिवलिंग को काशी विश्वनाथ वा भगवान विश्वनाथ कहना क्या उचित है ? जो शिवलिंग मुसलमान आक्रमणकारियों से अपनी रक्षा नहीं कर पाया और जिसकी रक्षा के लिये चौबीस घंटे पुलिस तैनात रहती है वह भगवान वा विश्वनाथ कैसे ? क्या यह शिवलिंग सच में पूरे विश्व का नाथ है ?  आदि गुरु शंकराचार्य ने अपनी पुस्तक "परापूजा" के माध्यम से हर प्रकार की पाषाण पूजा अर्थात मूर्ति पूजा को गलत कहा है -

तीर्थेषु पशु यज्ञेषु काष्ठे पाषाण-मृण्मये प्रतिमायां मनो येषां ते नरा मूढचेतसः।। स्वगृहे पायसं त्यक्त्वा भिक्षामृच्छति दुर्मति:। शिलामृत् दारु चित्रेषु देवता बुद्धि कल्पिता।।

शंकराचार्य ने कहा है - लकड़ी, पत्थर, मिटटी आदि की मूर्ति मे जिनका मन है, वे मनुष्य मूढ़ मति (पशु यज्ञेषु) वाले है। जो अपने घर की खीर (अपने अन्दर के परमात्मा ) को छोड़कर पत्थर मिटटी लकड़ी आदि मे देवताओं की कल्पना करता है वह अज्ञानी है मूढ है । यह मूर्ति पूजा भीख मांगने के समान है । मनुष्य के द्वारा बनाये गये मूर्ति आदि पदार्थ जड प्रकृति के होते हैं। प्रकृति पूजा क्या है ? प्रकृति जड़ है, जैसे अग्नि के आगे सौ साल तक हाथ जोड़े रहो, पर जब उसमे हाथ ड़ालोगे, वह हाथ को जला ही देगी । जो व्यक्ति तैरना नहीं जानता, चाहे लाख पूजा कर ले, गंगा उसे डुबो ही देगी । अपने अंदर के ईश्वर पर भरोसा करो, क्योंकि किसी भी जड़ पदार्थ मे ना देखने की शक्ति और ना सुनने की शक्ति होती है । नवदा भक्ति, विग्रह पूजा, मूर्ति पूजा, ग्रह पूजा शिवलिंग पूजा, गणेश पूजा आदि स्वार्थी लोगों के मन की उपज है । यम नियमों का  पालन करते हुये ओम् का जप व ध्यान करना ही असली भक्ति है । पुराण कुरान बाईबल आदि अनार्ष ग्रन्थ हैं, इनमें वेदविरुद्ध बातों व काल्पनिक किस्से कहानियों की भरमार है । अठारह पुराण व्यास मुनि कृत नहीं हैं । लगभर दो हजार वर्ष पूर्व कुछ स्वार्थी लोगों ने अवतारवाद आदि को महिमामंडित करने के लिये इनकी रचना की थी । हमारे वास्तविक धर्म ग्रन्थ वेद हैं, वेदोंं में भी शिवलिंग पूजा आदि का कोई विधान नहीं है । ऋषि दयानंद जी ने तो अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में शिवलिंग पूजा वा मूर्ति पूजा को वेदविरुद्ध होने से पाप तक कहा है और इससे कई प्रकार की हानियां भी गिनाई हैं । यजुर्वेद 40.08 में स्पष्ट रुप से वर्णन है कि वह परमात्मा अजन्मा, अनन्त, काया रहित, रंगरुप रहित है और कभी नसनाडियों के बन्धन में नहीं आता ।

वेदों में न अवतारवाद है न मूर्त्ति-पूजा-

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महाद्यशः | हिरण्यगर्भः इत्येष मा मा हिंन्सिदितेषा यस्मान्न जातः इत्येषः ।। यजु ३२.३।। अर्थात उसकी कोई उपमा (तुलना : parallel, comparsion) नहीं है क्योंकि उसकी महिमा अनंत है (उसके गुण अनंत हैं) | वह सम्पूर्ण सृष्टि को अपने गर्भ में धारण करने वाला (हिरण्यगर्भ)है, सर्व व्यापक (यस्मान्न जातः) है वह हमारी सभी पापों (दुर्गुणों, त्रुटियों) से रक्षा करे | 

न तस्य प्रतिमाऽस्ति (यजु०:३२.३)। प्रतिमीयते यया तत्परिमापकं सदृशं तोलनसाधनं प्रतिकृतिराकृतिर्वा। 
(जिससे ईश्वर का स्वरूप मापा या अवधि जानी जा सके, ऐसी कोई क्रिया या मापकयन्त्र नहीं हो सकता; अर्थात् ईश्वर की प्रतिमा नहीं है।)

(२) ‘अर्च पूजायाम्’ धातु  का अर्थ है—पूजा करना, मान करना, सेवा करना। ‘पूज पूजायाम्’ धातु का अर्थ है—आराधना, सम्मान या सत्कार करना। पूजानाम सत्कार: सज्जनानाम्। 

इस प्रकार अर्चना और पूजा के अर्थ बनते हैं—ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना एवम् आज्ञा-पालन करना; जड़ वस्तु की शुद्धि एवं सदुपयोग करना और सज्जन मनुष्यों का सत्कार करना। 

(३) ‘इदि परमैश्वर्ये’ धातु से ‘इन्द्र’ ईश्वर का नाम है। निरुक्त में ‘इन्द्र’ शब्द के अन्य अर्थ हैं—आत्मा, प्राण, सूर्य, विद्युत्, राजा, विद्वान् इत्यादि।आकाश में जिसका दरबार लगता हो, ऐसा कोई इन्द्र कभी अस्तित्व में नहीं रहा। 

(४) मूर्त्ति के बिना इन्द्र की पूजा होती है। ईश्वर सर्वव्यापक है; उसकी मूर्त्ति सम्भव नहीं। आत्मा और प्राण की भी मूर्त्ति नहीं बन सकती। सूर्य और विद्युत् सबको दिखते हैं। राजा और विद्वान् के हम पास जा सकते हैं। माता, पिता, अतिथि और पुरोहित की पूजा तथा पेट- पूजा में मूर्त्ति कहाँ अपेक्षित है?

(५) अर्चत प्रार्चत प्रियमेधासो अर्चत। 
(ऋग्वेद : ८.६९.८)। मन्त्र-७ से ‘इन्द्र=परमात्मा’ अर्थ आता है।  अर्चत = पूजा करो; प्रार्चत= अच्छे प्रकार स्तुति गाओ; अर्चत = स्तुति, प्रार्थना और उपासना करो।

---------------------------------------------------------------------------------------

क्या मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथ पुत्र श्री राम चंद्र जी ईश्वर के अवतार है ???

लंका विजय के उपरांत जब सीता जी राम चंद्र जी से मिली तो झुककर चरण स्पर्श करने लगी , राम चंद्र जी ने उन्हे उठाया और ऐसा कार्य करने से मना किया और उन्हे एक शिक्षा दी एक मंत्र बताया जिसे तारक मंत्र कहा जाता है ,
*राम रामाय नमः*
जिसका अर्थ है कि राम के राम को नमन करो , यानि इस राम को नहीं जिसने इस राम को पैदा किया उस राम को नमन करिये ,

आइय्ये कुछ इस तरह भी समझते है , उनका पूरा नाम है रामचंद्र अर्थात राम का चंद्रमा ये नाम ठीक इसी प्रकार है जैसे अब्दुल्लाह य अब्दुल रहमान य ईश्वरदास ।यानि उनके घर वालों ने ईश्वर से अति लगाव की वजह से उनका नाम राम का चाँद रख दिया । आइय्ये कुछ इस तरह भी देखते है लंका विजय के पश्चात  उन्होने एक मन्दिर का निर्माण किया जिसे रामेश्वरम नाम दिया गया आज भी वो जगह इसी नाम के साथ प्रसिध्द हैं , रामेश्वरम का अर्थ होता है राम का ईश्वर , अगर वो सच में इश्वर होते तो ऐसा मन्दिर क्यों निर्माण करते ?? अब मन्दिर का अर्थ भी समझते है मन्दिर का अर्थ होता है ठहरने की जगह , जैसे विद्या मन्दिर यानि विद्या को सीखने के लिये ठहरने की जगह , इसी तरह मन्दिर ईश्वर उपासना की जगह का नाम था पहले उसमें कोई मूर्तियाँ नहीं होती थी सभी सच्चे मन से उस सर्व शक्तिमान ईश्वर की साष्टांग (अष्ठ अंगों सहित उपासना) किया करते थे । आज मन्दिर को हमने मूर्तियों के ठहरने की जगह बना दिया गया

हमारे धार्मिक ग्रंथ कहते है कि ...
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यश्यः नाम महादशः*
यानि उस सर्व शक्कितमान ईश्वर की कोई मूर्ति य प्रतिमा है ही नहीं तो यें मूर्तीया कहा से आ गई ?

हमारा ब्रह्मसूत्र कहता है कि ...
*एकम ब्रह्म द्विवतः नास्ति*
यानि ब्रह्म ईश्वर तो एक ही है दूसरा नहीं है अंश मात्र भी नहीं और हर तरीके की उपासना सिर्फ उसी के लिये ही होनी चाहिये, लेकिन हमने 33 करोड़ बना लिये है । हमारे कर्म हमारी धार्मिक पुस्तको के ठीक बिपरीत है हम कैसे सनातन धर्मी हो सकते है ??? ठीक इसी प्रकार श्री राम चंद्र जी ईश्वर भक्त थे न कि स्वयं ईश्वर , एक तरफ तो हम उन्हे पुरुषोत्तम कहते है यानि उत्तम पुरुष दूसरी तरफ ईश्वर भी कहते है , इसलिये दशरथ पुत्र रामचंद्र जी की जय जयकार छोड़ अगर हम उनके पैदा करने वाले राम की जय जयकार करेंगें तो हमें किसी को जबरदस्ती जय कहलवाने की जरूरत ही नहीं पढ़ेगी बल्कि पूरा विश्व स्वयं हमारे साथ जय जय कार करेगा । लेकिन ये होगा तभी जब हम सत्य को तलाशने का प्रयत्न करेगें ,सत्य का पता लगाने के लिये अपनी धार्मिक पुस्तको अध्यन करें ,और भी दूसरे सभी धर्मों की धार्मिक पुस्तको का अध्यन करें तभी आपको सत्य का पता चल सकता है और आपको मरणोपरांत जीवन में सफलता की प्राप्ति हो सकती है ।
क्यों कि किसी के घर में पैदा हो जाना य नाम रख लेने से  मनुष्य उस धर्म का मानने वाला नहीं हो जाता बल्कि उस धर्म की सही शिक्षाओं का पालन करने से ही मनुष्य उस धर्म का अनुयाई होता है।

(महेंद्र पाल सिंह)

_______________________________________________________________

Sanatan dharm and Avtaar-Waad [Re-incarnation of God]

A. Concept of Avtaar-wad

Avtaar-Wad or the Concept of reincarnation of God is fundamental belief of Hinduism [except aryasamaj]. According to this belief; God comes down to earth and takes form of human being or animal. Now-days, anyone who does good thing is considered re-incarnation of God [Avtaar of God].

1. This concept is not from the very beginning. During Vedic era people did not believe in it. Even idol worship was not practiced during Vedic era. By Vedic era i mean the period during which original ved was in life of people. I am not aware of any vedic mantr that preaches Avtaar-wad. Later on, with the adulteration in pure teachings of God, several new concepts came into existence. Avtaar-wad is one among them. Probably; puranas paved ways for this concept. People refer to a shlok in Shrimad bhagwad Puran and Bhagwad geeta for validity of Avtaar-Wad. No wonder – Aryasamajis strongly reject the concept of avtaar-wad. They say avtaar-wad is against Vedic teaching.

2. One of the ways of division of Hindus is through Shaiv (Prime worshipper of Shiva), Vaishnav (Prime worshipper of Vishnu) and Shakt (Prime worshipper of Shakti). Initially only vaishnav believed in Avtaar-wad. Shaiv and shakt did not believe in this concept earlier. But today almost all sects and groups of Hindus believe in it. So, initially –large population of hindus rejected it; but now they have accepted it.

3. How many avtaar (reincarnations of God) were there? Initially 10 avtaar of Vishnu were accepted, later on, this number was increased to 24. Today there is no limit to number of avtaar, everyone is considered avtaar.

According to hindu tradition; 10 avtaar of Vishnu (god) are:
Matasya Avtaar i.e. God reincarnated as Fish
Kaschap Avtaar i.e. God reincarnated as Tortoise
Varaah Avtaar i.e. God reincarnated as Pig
Narsingh Avtaar i.e. God reincarnated as Man-lion
Waman Avtaar i.e. God reincarnated as Dwarf
Ram. Believed to have come in Treta yug
Parshuram
Krishna. Believed to have come in Dwapar yug
Balraam. Believed to have come in Dwapar yug
Kalki Avtaar. The much awaited avatar.

B. AvtaarWad contradicts several mantr of Vedas

1. God is one, unique, master-sustainer of the universe:

“The Only Lord of all created beings. He fixed and holds up this earth and heavens.
Who by His grandeur has became sole ruler of the moving world that breaths and slumbers; He is Lord of men and Lord of cattle. By Him the heavens are strong and earth is steadfast, by Him light’s realm and sky-vault are supported: by Him the regions in mid-air were measured. What gods besides Him shall we adore with our oblation?" Rigved 10:121:1,3,5

"One who has control over the whole universe, established difference between day and night.” Rigved 10:190:2

“He alone is the master of the whole universe. Every creature bows down before Him. Only He is eligible to be worshipped.” Atharvaved 2:2:1

2. God is free from any shape, image, likeness, death, birth etc.

a. Na tasy pratima asti, yasya namah mahadhsha - There is no image of that God, remembering him itself is great act. Yajurved 32:3

b. He can not be grasped in any direction. Yajurved 32:2

c. Those who worship natural things enter into darkness of hell; those who worship man made things enter more into darkness of hell. Yajurved 40:9

d. sah akayam - He is bodiless and pure. Yajurved 40:8

e. Na mamar na jiiryati - He does not die,nor grows old. Atharvved 10:8:32

f. He is beyond the imagination of death. Atharvved 13:4:46

If you believe in anything contradictory to mentioned in above vedic quotation then you have to decide what portion of Vedas to accept and what to reject.

3. Can God be ideal for human being?

It is said that we should emulate Avtaar. Is it logical?
Almighty God is free from any error, any weakness [Refer Yajurved 10:8]. God can not commit mistake or sin. We human being is creature with weakness. We can be biased, we can err, we can sin, we can commit mistake. How can we try to emulate God? The logical alternative is that we should try to emulate human being who has very high level of piety, God consciousness and righteousness.  We should consider ish-dut or prophet to be ideal who can be followed. Only a human being can be ideal for human being.

C. Avtaar-wad is against common sense and logic

Look at the world around you. How big our earth is; great and huge mountains, immense oceans. What is the status of earth in our galaxy? Almost nothing. Our galaxy has more than 1000000000000 stars!!! Each star is thousands of time greater than earth!! How many galaxies are in the universe? More than 100000000000 So how many stars? Uncountable? How big our universe is? Infinite? And this gigantic universe is continuously expanding!!! Who is the creator of this huge universe? It’s Almighty GOD – who is the master, planner and sustainer of this ultra complex universe. When we say:
The creator of this universe took birth in India.
Almighty God married and had kids.
Almighty God died because of arrow.
Almighty God was searching his spouse.
Almighty God did not recognize his son.
Almighty God lived in uttar pardesh [India].

Then for sure we are demeaning the status of God. We are giving ungodly qualities to God. We are contradicting the definition of God. Don’t we require introspection regarding the subject reincarnation of God?

How can we imagine God taking any form? How can God be confined to time and space? How can you say that God was living in india? How can we think of God being man or animal? Why do we want to demean status of God? For sure – introspection is required regarding the concept of Avtaar-Wad.

D. yuga and Avtaar-Wad: how much compatible?

As per Hindu tradition - life time/era is divided in 4 yuga or era.
a. Sat yug – era of truth. 4 avtaar came
b. Dwapar yug – more truth, less evil. 3 avtaar came.
c. Treta yug – more evil, less truth. 2 avtaar came.
d. Kal yug – era of evil. 1 avtaar came.

All sects of Hinduism, including, aryasamaji believe in the concept of yug or era. Present era is Kal yug or era of evil. Very soon sat yug or era of truth will come. As per this concept; number of avtaar is 4,3,2,1 in Sat yug, dwapar yug, treat yug and kal yug respectively.

Ponder upon the number of avatar and intensity of evil present in the era. In sat-yug when everywhere there was peace, truth and happiness then god came down to earth 4 times. Please remember – the purpose of incarnation of God is to fight and destroy evil. When there was peace and happiness in sat-yug then why it was necessary for god to come down – [and fight evil powers]- to earth 4 times? On the contrary when it is kal-yug – era of evil, crime, filth – and then god comes down to earth only 1 time? There is logical inconsistency in the concept of yug and number of avatar in each era. In kal-yug – ideally – there should have been 4 avtaar and in sat-yug there should have been no avatar or only one avatar.

It’s very clear that as evil is increasing number of avtaar is decreasing which is against logic.

Please bear in mind: the purpose of avtaar was to destroy evil and establish truth. So if there is more evil then more avtaar should come. If there is only truth then there is no need of avtaar or very less number of avtaar.
Ideally one should expect 4 avtaar in kal yug and 1 avtaar in Sat yug but the philosophy says the opposite. It is not a divine concept.

E. Shri Ram chandr ji as avtaar

One of the most popular avtaar is Shri Ram chandr ji. His story is mentioned in the epic Ramayan. The Ramayana that you know is very different from the first book of Ramayana written by valmiki ji. For detail, refer to the article – “Difference between original Ramayan and the Ramayan you know”

1. As per the epic of valmiki ramayana; Shri Ram chandr ji was a human being. He had human qualities, some positive, some negative. He himself used to worship God.
2. He took birth, he married, he had children – these all are qualities of human being and not that of God.
3. His wife was abducted by Ravana. It took Shri Ram chandr ji several years to know whereabouts of his wife and rescue her.
“God knows all the domains, all the places and origins”. Yajurved 31:10
“God knows all dimensions and directions”. Rigved 6:9:3
“God knows everything”. Rigved 1:145:1
4. In the end; he died. Can God die?
5. Any honest person; after going through the story of Shri Ram chandr ji will agree that he could have been a great man or noble person. In no case he could be Almighty God. God is one, unique, the master-creator-sustainer of the universe.

F. Shri Krishn ji as avtaar

Another very popular avtaar is Shri Krishna. He is also worshipped by millions of our Hindu brethren. He forms the central character in Bhagwad Geeta. Bhagwad Geeta is nothing but few chapters from another great epic – Mahabharat. Mahabharat is an epic attributed to Ved vyas ji that speaks about the Great War. The advice given by Shri Krishna to Arjun in the battlefield is called Bhagwad Geeta.

1. Shri Krishna took birth just like any other human being takes.
2. He grew up old. His naughty activities during childhood and teenage are famous in hindu traditions.
3. He had 16000+ female friends called gopis with whom he shared romantic relationship.
4. At the end; he was killed by an arrow. The wound could not be healed and resulted in death. Can God suffer this fate?
“None can ever obstruct or deviate you from your path (Oh God!)”. Rigved 4:54:4
“God is the giver of life’s breath. He is the lord of death”. Rigved 10:121:2

No need to say that God does not take birth. God cannot be hit by arrow. God does not die. So Shri Krishna could have been a great person. To claim Shri Krishna to be God is exaggeration and against definition of God.

G. Substitute of Avtaar-Wad – DutWad [Prophet hood]

What is the solution? Shri Ram chandr ji or Shri Krishna ji could have been great men but in no case they could be Almighty God. God is not confined to time and space. God is not like anything, he is the creator, sustainer and planner of the whole universe. Hindu brethren need to introspect here and think about the concept of Avtaar-Wad. This concept is not divine. It is not given by God. The actual concept similar to Avtaar-wad is the concept of Prophet Hood. While Avtaar-Wad speaks about God coming down to earth for destruction of evil; concept of risalat or prophet hood says that Almighty God reveals his message to human being called messenger or the prophet. The messenger or the prophet then delivers the message of God to people. This concept is pretty well defined in Quran, bible etc. Even Hole Ved talks about prophet hood or dut-waad.

Which concept is more logical – AvatarWad OR Prophet hood?

Ved is considered to be God’s word. So how Vedas came into existence? Did God himself come to the world and uttered words of ved? No. Surprisingly; though our Hindu brethren love Shri Ram chandr ji and Shri Krishna ji to great extent, yet they never associate any of them with Vedas. No one claims that Vedas were brought by Shri Ram chandr ji or Shri Krishna ji. Then how come Vedas reached to us? Only option is: through human source.

Which is more probable situation? God came down to earth, took human form and spoke mantr of Vedas.
OR God inspired Vedic mantr to his chosen person called as Ish-Dut or rasul or Prophet.

To know more about the subject kindly read the book – “Lost prophets Of Hinduism and India”. Prophet Muhammad is the last messenger of God on whom Quran was revealed.

H. Conclusion

1. The concept of Avtaar-Wad is one of the fundamental beliefs of Hinduism. This belief is not divine; it’s not present in Vedas. This was gradually accepted by followers; earlier on vaishnav used to believe in this concept.

2. As per Avtaar-Wad - God take form of human being in order to destroy evils.

3. This concept is against the Vedic teachings. Ved speaks against AvtaarWad. Morever – it goes against logic and common sense.

4. The correct concept is Prophet Hood. Almighty God does not take human form rather he appoints human being as the messenger of Almighty God. The messenger or the prophet delivers the message of God.

5. Prophet Muhammad was the last and final messenger of Almighty God.

_______________________________________________________________


*गीता का वैदिक उपदेश*


*ईश्वर का स्वरुप:-*


*(1)* ईश्वर जन्म तथा मृत्यु से परे है।वह अवतार नहीं लेता। -(८.३.)


*(2)* ईश्वर अत्यन्त सूक्ष्म होने से बाहर की आंख तथा त्वचा से जानने योग्य नहीं।ईश्वर न आता है और न ही कहीं जाता है।क्योंकि वह दूर तथा पास सब स्थानों पर विद्यमान है,पर निराकार होने से दिखायी नहीं देता। --(१३.१५.)


*(3)* हे अर्जुन! यदि तू इस निराकार अत्यन्त सूक्ष्म और सर्वव्यापक ईश्वर को जानना चाहता है तो अपने ह्रदय में ही ध्यान करके जान सकता है वहीं मिल सकता है जहां आत्मा भी हो,दोनों का वास ह्रदय में ही है बाहर नहीं है।--(१८.३१.)


*(4)* हे अर्जुन! वह परमात्मा ही व्याप्त होकर इस सारे संसार को यन्त्र के समान चलाता है।--(१८.३१.)


*(5)* हे अर्जुन!उसी निराकार सर्वव्यापक संसार को बनाने तथा चलाने वाले की शरण में पूर्ण भावना सहित जा।उसी की शरण में जाने से सर्वोत्तम शान्ति तथा शाश्वत सुख मिल सकता है।--(१८.६२.)


*ओ३म् का जप और योगेश्वर कृष्ण:-*


*(१)* प्राणायाम के साथ दोनों आंखों के मध्य में ध्यान लगाकर,ओंम् का जाप करो।--(८,१०,१३)


*(२)* यह ओंम् ही उस 'ब्रह्म' सर्व सृष्टिकर्त्ता परमात्मा का मुख्य नाम है।इसी ओंम् को (मेरे से पूर्व भी) सब वैदिक विद्वानों ने ध्याया और गाया है।--(८.११.)


*(३)* इसी प्यारे ओंम् को जो भक्त नित्य नियम से जपता है,वह बार-बार के जन्म तथा मृत्यु के दुःख से बचकर परमगति(मोक्ष) को प्राप्त होता है।--(८-१४,१५)


*वेद और यज्ञ परमात्मा का उपदेश है:-*


यह यज्ञ-अग्निहोत्र आदि पवित्र कर्म वेद ने बताये हैं और वेद परमपिता परमात्मा का आदेश हैँ


*दो आवश्यक शंकाएं*


*(1) शंका:-*कृष्ण जी महाराज की गीता में वेद का खण्ड़न किया गया है?

*समाधान:-*अभी-अभी हम गीता के श्लोक ८.११ तथा श्लोक ३.१५ द्वारा यह लिख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ओंम् के जप तथा यज्ञ को वेद का आदेश कहकर अनिवार्य रुप से उसे आचरण में लाने का उपदेश कर रहे हैं।अन्यत्र भी गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि *वेदों में मैं सामवेद हूं।-(गीता-१०/१२)।*


इससे पता चलता है कि उनकी वेद के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी।इतिहास को देखने से पता चलता है कि उन्होंने अपने ब्रह्मचर्य काल में आचार्य श्री सन्दीपन ऋषि के चरणों में बैठकर वेद का अभ्यास किया था।जो लोग 'त्रैगुण्य' विषया वाले श्लोक से वेद का खण्ड़न दिखाने वाली बात किया करते हैं वे स्वयं श्रीकृष्ण द्वारा गीता में आये वेदों के प्रति श्रद्धा रखने वाले आदेशों का खण्ड़न करके कृष्ण महाराज के विरोधी सिद्ध होते हैं।


यहां इस 'त्रैगुण्यं' विषया वेदा' वाले श्लोक में भी गीता ने वेद का खण्ड़न न करके वेदों के नाम से प्रचलित दूसरे वेदविरुद्ध कर्मों का ही खण्ड़न किया है।आज भी लोगों ने अपनी मर्जी से पुराणों को बनाकर उसको पांचवां वेद कहना शुरु कर दिया है।


*(2) शंका:-*श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन को कहते हैं कि अर्जुन तू मेरा अनुसरण कर।इससे तो यही पता चलता है कि श्रीकृष्ण ही ईश्वर थे।


*समाधान:-*नहीं ऐसी बात नहीं है;यदि श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वर होते तो वे अध्याय १८ के ६१,६२ तथा अध्याय १३ के १३,१५ श्लोक में निराकार सर्वव्यापक ईश्वर की चर्चा न करके अपनी चर्चा करते।हम पूर्व इन श्लोकों के अर्थ लिख चुके हैं,ध्यान से पढ़े और गीता में भी देख लें।


वास्तविकता यह है कि जहाँ-जहाँ गीता में अपने आपको ईश्वर के स्थान पर 'मैं' या 'मेरा' ऐसा करके कहा है,वहां भी उनका संकेत ईश्वर की ही और है।जब कोई योगी व्यक्ति ईश्वर भक्ति या समाधि में लीन हो जाता है तो वहां पर केवल परमात्मा के ही आनन्द को मुख्य रुप से अनुभव किया करता है।इसके साथ ही यह भी जानने योग्य है कि जहाँ जहाँ कृष्ण महाराज ने मेरा ध्यान करो,मेरे पीछे चलो,ऐसा कहा है वहां वे ईश्वर की भक्ति में रंगे हुए यही कह रहे है कि मेरे भगवान् ओंम् का जाप करो और जिस ईश्वर के मार्ग पर मैं चलता हूं,तुम भी उसी मार्ग पर मेरे पीछे चलो।


मैंने एक युवक का कल्याण करने के लिए उपदेश किया कि प्रतिदिन व्यायाम,प्राणायाम तथा अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय करो ।यदि जीवन दुःखों से छुड़ाना चाहते हो तो मेरे पीछे चलो।


यहां 'मेरे पीछे चलो' का अर्थ यह नहीं कि अब मैं यदि सहारनपुर से दिल्ली जा रहा हूं तो वह भी मेरे साथ गाड़ी में बैठ जायें और आगे जैसे जैसे मैं गाड़ियों को बदलूं ,वैसा ही वह भी करते जायें।जैसा यहां पर पीछे चलने का वास्तविक अर्थ यही है कि वह मेरे बताये सत्यसनातन वैदिक मार्ग पर चलें,ठीक यही अभिप्राय योगेश्वर कृष्ण को बताने का अर्जुन को था।


वेदान्त दर्शन में इसी बात को सूत्र १.१.२९ द्वारा समझाया गया है कि जहाँ-जहाँ ईश्वर-भक्त ईश्वर के ध्यान में डूबा ,'मैं' शब्द का प्रयोग करता है;वहाँ उसको ईश्वर के लिए समझना चाहिये,न कि उस कहने वाले व्यक्ति के लिए ।

अतः इससे यही निश्चित होता है कि श्रीकृष्ण ईश्वर अवतार न थे अपितु वे तो ईश्वर तथा वेदों के भक्त थे और हम मनुष्यों को भी अपना कल्याण चाहने के लिए ईश्वर के मुख्य नाम ओंम् का श्रद्धापूर्वक जप करना व यज्ञ करना चाहिये।

अतः गीता पढ़ने वालों को चाहिये कि वे वेद की अवहेलना न करें।


_डा. श्री सम्पूर्णानन्द जी भू० राज्यपाल राजस्थान_ के शब्दों में,जो उन्होंने एक गीता सम्मेलन के विषय में कहे थे,ध्यान से पढ़िये--"गीता के गीत गाते रहना और उसकी चाहना करते रहना,पर जहाँ से यह गीता निकली है उस। ईश्वरीय वाणी वेद को भूल जाना ठीक वैसे ही है जैसे कि दूध की चाहना करना और गाय को भूल जाना।"


प्रस्तुति - भूपेश सिंह आर्य





पौराणिकों से 31 प्रश्न।

संसार के पौराणिक विद्वानों से 31 प्रश्न-आचार्य डॉ श्रीराम आर्य हम अपने पौराणिक विद्वानों से कुछ प्रश्न चिरकाल से करते चले आ रहे है, जिनका उत...