कौन-से धर्म मे सबसे ज्यादा कत्ले-आम हुआ:-
इस पृथ्वी का नहीं बल्कि इस ब्रहमांड का सबसे भयंकर युद्ध महाभारत का युद्ध हुआ था. अगर आप महाभारत आदि पर्व अध्याय 2 श्लोक संख्या 23-28 पढते हैं तो उसमें लिखा है कि
महाभारत युद्ध में:-
हाथी की संख्या। = 21870
रथों की संख्या। = 69870
पैदल सैनिकों की संख्या = 1968300
घोडो की संख्या। = 94610
इस युद्ध में 27 लाख लोगों की मृत्यु हुई ।
जबकि मुहम्मद साहब के 23 साल की अवधी में दोनों तरफ से लगभग 700 लोगों की मृत्यु हुई थी । *मान्यता है* की वेदव्यास ने गणेश जी को यह कथा लिखने को कहा। दोनों तरफ से शर्तें रखी गयी। गणेश जी ने कहा कि बीच में रुकना नहीं चाहिए, वाणी अविरत रहे । व्यास जी ने शर्त रखी कि जो लिखें, अर्थ समझने के बाद लिखें। इसका एक अर्थ तो यह निकलेगा कि काफी कुछ कूट में लिखा गया है। गणेश जी को वही लिखना था जो उनको कहा जा रहा था, शब्द बदलने नहीं थे लेकिन अर्थ समझने के बाद ही लिखना था। यहाँ सेनाओं के व्यूहों की बात है। सैनिक अपने शास्त्रों के संचालन के लिए कितनी जगह छोड़ेंगे ? हाथी के आस पास कितनी जगह रहेगी ? घोड़े की ? रथों के आकार क्या थे और उनके लिए कितनी जगह लगती होगी ? अत: इतनी संख्या वास्तविक नहीं होगी. Will Durant भारत की ही संख्या 6 करोड़ से अधिक आँकता है।
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१।महाभारत के युद्ध में 1 अरब 66 करोड़ हिंदू मरे। इन्हें किसने मारा?
जवाब है कि हिन्दु राजाओं और हिन्दू सैनिकों ने।
२।राम रावण युद्ध में करोड़ों हिंदू मरे।
ऐसे ऐसे युद्ध बहुत हुए हैं।
३।क्या राम जी और सीता जी को कष्ट किसी मुस्लिम ने दिया या हिंदुओं ने?
४।रावण और धोबी, जिसने भी कष्ट दिया, वह हिंदू ही था।
५।रामायण के अनुसार शंबूक की गर्दन राम जी ने काटी तो शंबूक को भी किसी मुस्लिम से कष्ट न पहुंचा। तब शूद्रों को ज्ञान ध्यान की अनुमति नहीं थी और शूद्र भी हिंदू ही थे।
६।श्रीकृष्ण जी को तीर मार कर हिंदू ने घायल किया और वह उसी ज़ख़्म के कारण मर गये।
७।परशुराम जी ने इतने क्षत्रिय मारे कि इक्कीस बार धरती से क्षत्रिय मिटा दिये। ये क्षत्रिय भी हिंदू थे।
८। परशुराम के कारण ही प्रजापालक राजा अग्रसेन को क्षत्रिय से वैश्य बनना पड़ा। आज तक वर्ण व्यवस्था में उनकी औलाद का एक दर्जा कम चला आ रहा है।
९।आदि शंकराचार्य को ज़हर हिंदुओं ने दिया।
१०।गांधी को हिंदू ने ही क़त्ल किया। यह सब जानते ही हैं।
११।भीष्म पितामह कुछ लड़कियों का अपहरण कर लाए थे। क्या वह लड़कियाँ हिन्दू नहीं थीं?
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HINDU KINGS & ILLEGAL CONVERSION OF JAIN & BUDDHIST SHRINES
Those Saffrons, who are barking against Hagia Sophia (Ayasofya), must see their terror history first. They demolished 1000s of Jain & Buddhist shrines, and turned them into Hindu temples.
It's also about famous Hindu Temple 'Jagannath Temple [Puri (Orissa)]';
And it was admitted by #Vivekananda also, when he said:
"...because the temple of Jaganath is an old Buddhistic temple...!"
*•••The Complete Works of Swami Vivekananda, The Sages of India, Vol. 3, Page no. 264, Published by Advaita Ashram, Calcutta••*
```Online Source:``` https://www.ramakrishnavivekananda.info/vivekananda/volume_3/lectures_from_colombo_to_almora/the_sages_of_india.htm
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एवेद यूने युवतयो नमन्त
"जिस प्रकार युवतियें युवा पुरुष के प्रति नमती हैं.."
लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यजुर्वेद में चोरों, तस्करों और डाकुओं को भी नमन किया गया है । उदाहरण के लिए देखिए यजुर्वेद अध्याय 16, मंत्र 21
नमो॒ वञ्च॑ते परि॒वञ्च॑ते अर्थात, छल से दूसरों के पदार्थों का हरण करने वाले और सब प्रकार से कपट के साथ व्यवहार करने वाले को प्रणाम
स्तायू॒नां पत॑ये॒ नमो॒ चोरों के अधिपति को प्रणाम
तस्क॑राणां॒ पत॑ये॒ नमो॒ तस्करी/डकैती करने वाले के अधिपति को प्रण
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“ त्वमसि सहमनोs............ हिष्महि "।। 5 ।। ( अथर्वेद 19 : 32 : 5 )*
अर्थात : - है वैदिक ईश्वर तू वश ( कब्जे ) में करने वाला है और में भी बलवान ( ताकतवर) हु ,हम दोनों बलवान हो कर विरोधियों को हम वश में करे !
भावार्थ : - वीर पुरुष वैदिक ईश्वर के साथ मिल के और सब साथियो को मिला कर शत्रुओं का नाश कर !
*Note : -* शत्रु यानी हम जो वेदों की निंदा करे , वेद विरोध है और जो वेदों को नही मानते , जो अनार्य है वे सब इन के शत्रु ( दुश्मन ) है !
"हम लोग जिस से द्वेष करें और जो हम से द्वेष करे, उस को हम शेर आदि पशुओं के मुख में डाल दें।"
[यजुर्वेद अध्याय 15 मंत्र 15]
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ऋग्वेद में अनेक जगह इन्द्र को मायी (धोकेबाज़) कहा गया हे। उदाहरण के तोर पर देखिए
ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 11, मंत्र 7
मायाभिरिन्द्र मायिनं तवं शुष्णमवातिरः |
विदुष टे तस्य मेधिरास्तेषां शरवांस्युत तिर ||
"हे इन्द्रदेव! अपनी माया द्वारा आपने 'शुषण' को पराजित किया। जो बुद्धिमान आपकी इस माया को जानते हैं, उन्हें यश और बल देकर वृद्धि प्रदान करें."
इस मंत्र का भावार्थ स्वामी दयानंद जी इस प्रकार करते हैं।
"बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्वर आगया देता है कि- साम, दाम, दंड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों क़ी निवृत्ति करके चक्रवर्ति राज्य क़ी यथावत उन्नति करनी चाहिए"
पंडित जी, साम, दाम, दंड और भेद को तो आप जानते ही होंगे.
साम : बहलाना फुसलाना
दाम : धन देकर चुप कराना
दंड : यदि बहलाने फुसलाने से न माने तो ताड़ना करना
भेद : फूट डालना
इसके अतिरिक्त ऋग्वेद 4/16/9 में दयानन्द जी नें भी अपने भाष्य में 'मायावान' का अनुवाद 'निकृष्ट बुद्धियुक्त' किया है।
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तू [वेद निंदक] को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।"
[अथर्ववेद कांड 12 सूक्त 5 मंत्र 62] मंत्र - 14
इस ब्रह्मघाती (वैदविरोधी) के लोमों को काट डाल । इस की त्वचा (खाल) को उतार लो इसके मांस के लोथड़ों को काट डाल । इसकी नसों को ऐंठ दे - कुचल दे । इसकी हड्डियों को मसल डाल । इसकी मज्जा को नष्ट कर डाल इसके सर्वाअङ्गों व जोड़ों को विश्रथय ढीला कर दे बिल्कुल पृथक् - पृथक् कर डाल ।कच्चे मांस को खा - जानेवाला इस ब्रह्मज्य को पृथिवी से धकेल दे और जला डाले ।
अथर्ववेद 12:5:68-73
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*Vedic God gives open freedom to kill Vedas*
*( Atharva Veda 12: Sukta 5: mantra 67,68,69,70,71 )*
👉🏿||67|| Strike the head off the shoulder ।
👉🏿||68|| Take the hairs off his head, and take his skin off:
👉🏿||69|| Tear his nose, because his flesh falls from his body into pieces ।
👉🏿||70|| Crush his bones together, strike and pull the marrow out of it ।
👉🏿||71|| Separate all its organs and joints।
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कुछ कुछ अपने ग्रंथों में भी पढ़ लिया करो, कत्ल गारित की कितनी बातें लिखी हुई है।
ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः
"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |"
[यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|”
[सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।
पंडित जी, मुसलमान और ईसाई कितने ही सदाचारी हों, स्वामी जी के अनुसार उनके साथ खाना उचित नहीं। यह पक्षपात नहीं तो और क्या है? क्या आप अब भी ऐसे 'आर्य समाज' में रहना पसंद करेंगे?
आर्यावर्त की सीमाओं के बाहर रहने वाले सारे मनुष्य म्लेच्छ, असुर और राक्षस हैं| सुनिए ज़रा, दयानन्द जी मनुस्मृति के आधार पर क्या कह रहे हैं,
आर्य्यवाचो मलेच्छवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः| [मनुस्मृति 10/45]
मलेच्छ देशस्त्वतः परः| [मनुस्मृति 2/23]
“जो अर्य्यावर्त्त देश से भिन्न देश हैं, वे दस्यु और म्लेच्छ देश कहाते हैं| इस से भी यह सिद्ध होता है कि अर्य्यावार्त्त से भिन्न पूर्व देश से लेकर ईशान, उत्तर, वायव और पश्चिम देशों में रहने वालों का नाम दस्यु और म्लेच्छ तथा असुर है| और नैऋत्य, दक्षिण तथा आग्नेय दिशाओं में आर्य्यावर्त्त से भिन्न रहने वाले मनुष्यों का नाम राक्षस है| अब भी देख लो हब्शी लोगों का स्वरुप भयंकर जैसे राक्षसों का वर्णन किया है, वैसा ही दिख पड़ता है|”
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 8, पृष्ट 225-226 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
जिस ईश्वर ने वेदों में गैर लोगों से ऐसे भयंकर व्यव्हार की शिक्षा दी है और उनको दस्यु, राक्षस, और असुर के ख़िताब दिए हैं, वह ईश्वर पक्षपाती अवश्य है।
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"वेदानुयायी सत्यवीर पुरुष नास्तिकों का नाश करें"
[अथर्ववेद कांड 12 सूक्त 5 मंत्र 54]
अब प्रश्न ये है कि नास्तिक कोन हैं? केवल ईश्वर में आस्था न रखने वाले? चलिए देखते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती नास्तिक किसको कहते हैं.
"नास्तिक वह होता है, जो वेद ईश्वर की आज्ञा, वेदविरुद्ध पोपलीला चलावे"
[सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 11 पेज नंबर 255]
इस परिभाषा में वह सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि. इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है. स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, मुसलमान, चंडाल आदि से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।"
[सत्यार्थ प्रकाश, समुलास ११]
वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें।
[अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|”
[सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
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■■ *वैदिक आतंकवाद में जानवरो जैसे क्रूरता* ■■
*(अथर्ववेद 12 : 5 : 62 )*
तू वेद-विरोधी नास्तिको ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) को काट डाल , चीर डाल , फाड़ डाल , जला दे , फूँक दे , भस्म कर दे ।
*( अथर्ववेद 12 : 5 : 68 - 71 )*
उस वेद-विरोधी नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) के लोमों को काट डाल ; उसके खाल उतार ले ; उसके मांस के टुकड़ों को बोटी बोटी कर दे ; उसके नसों को एंठ दे ; उसकी हड्डियां मिसल डाल ; उसकी मींग निकाल दे ; उसके सब अंगों ओर जोड़ों को ढीला कर दे ।
*( अथर्ववेद 11 : 5 : 72 - 74 )*
मांसभक्षक अग्नि द्वारा उस वेद-निन्दक नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) को जला दे ओर पृथिवी से निकाल दे ; वायू उसको बड़े बिस्तार अन्तरिक्ष से और सृर्य उसको प्रकाश से जला देवे ।
*( ऋगवेद 10: 87: 10 )*
मान-मनुहार के रूप में: तूम तीन टुकड़ों में उनके अंशों का प्रतिपादन कर दे। हे अग्नि , तेरा लौ उनकी पसलियों, , यदुधना की जड़ के साथ तुझे नष्ट कर दे।
*( अथर्ववेद 5: 20: 5 )*
दूरगामी आवाज को सुनकर, दुश्मन के रोआं-रोआं, जाग्रत, पीड़ित, अपने बेटे को प्रसन्न करते हुए, घातक हथियारों के संघर्ष के बीच अपने आतंक में आगे बढ़ें।
*( अथर्ववेद 10: 5: 42 )*
हम उस आदमी का शिकार करते हैं, हम उसे मारते हैं और उसे हमारी जानलेवा वार से मार देते हैं। हमने उसे परमेष्ठिन के खुले हुए जबड़े में चोट पहुंचाई है।
*( महाभारत 7: 198: (p.465) )*
यहां तक कि एक क्षत्रिय का कर्तव्य है। की नास्तिक (काफ़िर, गैर हिन्दू ) वेद-विरोधीयों को मारे ।
*( अथर्ववेद 11 : 5 : 72 - 74 )*
मांसभक्षक अग्नि द्वारा उस वेद-निन्दक नास्तिक ( काफ़िर,गैर हिन्दू ) को जला दे ओर पृथिवी से निकाल दे ; वायू उसको बड़े बिस्तार अन्तरिक्ष से और सृर्य उसको प्रकाश से जला देवे ।
*( यजुर्वेद अध्याय ७ मंत्र २ / १८ )*
“हे इन्द्र ! तुम अपने शत्रुओं को वशीभूत कर लेते हो। इस नास्तिक (काफ़िर, गैर हिन्दू) को वशीभूत करो। यह तुम्हारे स्त्रोता का अहित करता है। इसके विरुद्ध तीक्ष्ण वीर को प्रेरित कर इसे नष्ट कर डालो.”
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हिंदू धर्म में JIHAD ( जिहाद ) ??
( अथर्ववेद ५: ८: ४ )
भागो तुम , तुम परिश्रम करो, अब तक इंद्र के आदेश पर मुस्कुराओ और हत्या करो। जिस तरह एक भेड़िया एक भेड़ को डराते है, ऐसे ही तुममे जीवन की रहने तक उसे तुमसे बचने न दें। उसकी सांस तेजी से रोकें।
( अथर्ववेद ४: ३१: ३ )
हे मनु, हम पर आक्रमण करने वालों को दूर करो। पर! तोड़कर, दुश्मनो को कुचल कर मार डालो । वे तुम्हारी अड़ियल ताकत को नहीं रोक पाये : ताकतवर! एकमात्र ! उन्हें मार डालो ।
( अथर्ववेद १२: ५: )
६७ प्रहार करके कंधे से सिर को अलग करो ।
६८ उसके सिर से बाल छीन लो, और उसके शरीर से खाल उतार दो:
६९ उसके नसो को फाड़ दो, क्योंकि उसका मांस को उसके शरीर से टुकड़ों में गिरा दो ।
७० उसकी हड्डियों को एक साथ कुचल दो, हड़ताल करो और उसके बाहर मज्जा को निकाल दो ।
७१ उसके सभी अंगों और जोड़ों को अलग कर दो।
( रिग्वेद १: १७६: ४ )
हर कोई जो कोई उपहार नहीं देता है, उसको हत्या करो, जो मुश्किल से पहुंचता है, आपको प्रसन्न करता है। हमें वह धन दो जो उसका था : यह भी पूजा का इंतजार करता है
( रिग्वेद १: १४२: १ )
असहाय, इंद्र मघवन, आपके द्वारा पुराने युद्ध में, हम उन पुरुषों से लड़ते हैं, जो हमारे खिलाफ करते हैं, हमारे दुश्मन को मार डालो । इस दिन वह करीब है जो आपको ( इन्द्र ) सोम रस ओर बलिदान देता है। हे इन्द्र हमे आशीर्वाद दो की हम युद्ध-धन आपस मे वाट सके , अपनी ताकत दिखाते हूए , युद्ध को बिगाड़ते हैं।
( रिग्वेद १: ३१: ६ )
अग्नि, जब आप उसे पीछा कर रहे हैं, तब तक वह धर्मसभा में सबसे सुरक्षित रहेगा। जो बुरे तरीकों से चलता है। फिर भी, जब वीर युद्ध-धन के लिए लड़ते हैं, जो पुरुषो को दौड़ाते हैं, घेरते हैं, युद्ध मे कुचलते ओर मारते हैं।
( अथर्ववेद १०: ५: ५० )
अच्छी तरह से कुशल, इस आदमी के खिलाफ मैंने पानी के बिजली को चार शूलो से उड़ा दिया, जिससे उसका सिर चकरा गया। उसके शरीर के सभी अगों को नष्ट कर दिया। देवताओं के पूरे यजमान को मेरा उद्देश्य मंजूर है।. .
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●● *अधिक "वैदिक- जिहाद ?"* ●●
*( रिग्वेद १: १०३: ६ )*
उसे वास्तव में मजबूत करने के लिए, जिसके कर्म कई हैं, उसको मजबूत करने के लिए, *हे बैल हमें "सोम-रस" डालने दो । हमारे नायक, एक चोर की तरह घात में देखता है, नास्तिको की संपत्ति को कब्जा करते हुए ।*
*( रिग्वेद १: ८१: )*
*२* तू, नायक , एक योद्धा, तू विपुल की ध्वंस लीला करने वाला है। तनिक भी कमजोर नहीं है, तू यज्ञ करने वाले की सहायता करता है, तू अर्पित करने वाले को पर्याप्त धन देता है।
*३* जब युद्ध और लड़ाइयाँ होती हैं, तो पहले तेरे सामने युद्धधन बिछा दिए जाते हैं | तू कीर्त्ति को तेरे अधीन कर लो। तू किसका वध कर रहा है और किससे समृद्ध? *हे इन्द्र, हमें "यूद्ध-धन" से धनवान बना दे।*
*( रिग्वेद १: १०२: ६ )*
उनकी (इन्द्र ) भुजाएँ परिजन जीतती हैं, उनकी शक्ति प्रत्येक कार्य में सर्वश्रेष्ठ होती है, सौ मदद के साथ, युद्ध के दीन हंगामा मचाने वाले इन्द्र होता है: कोई भी ताकत मे ऊससे विरोध नही कर सकता है। *इसीलिए "युद्ध-धन" की लालस मे हम उसे पुकारते है*
*( रिग्वेद ५: ३४: ७ )*
वह सभी कंजूस के *सामग्री को लूटने के लिए* हमको इकट्ठा करता है: उत्कृष्ट संपत्ति वह उसे देता है जो उपहार प्रदान करता है। यहां तक कि व्यापक गढ़ में भी सभी लोक उसके सामनो टिक नही सकते हैं जिन्होंने उसको (इन्द्र ) गुस्सा करने के लिए उकसाया ।
*( रिग्वेद ५: ३५: १ )*
हे इन्द्र , हमारी सहायता के लिए तेरा सबसे प्रभावशाली शक्ति लाओ , जो हमारे लिए पुरुषों को जीतती है, और लड़ाई में *"युद्ध-धन",* अजेय हो कर।
*( रिग्वेद ९: ४१: ४ )*
हे इन्द्र , जब तुझे पुकारा जाता है, तो हम पर प्रचुर मात्रा में भोजन दो; हे इन्द्र धन की खान और घोड़ा और प्रचूर *"युद्ध-धन"* ।
*( अथर्ववेद ४: २२: ७ )*
शेर की तरह, उनके सभी गांव को लूट लो , बाघ की तरह उनको भागाओ। हमारे भगवान और नेता इंद्र के साथ संबद्ध बनाकर अपने दुश्मनों क�
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●● *VED ( वेद ) के अनुसार सभी NASTIKs नास्तिक को मार डालो ( काट डालो ) ??* ●●
[ चायण-आचार्य , निरूक्त , निघंतु भाष्यम ]
*( अथर्ववेद ११: २: २३ )*
श्रद्धांजलि उन्हें दस सकवारी छंदों के साथ दी जाती है, जो हवा के मध्य क्षेत्र में स्थापित होते हैं, *ईश्वर-त्याग करने वाले को काट कर !*
*( रिग्वेद १: १७४: ८ )*
इन पुराने पुराने कामों को नए गानों ने गाया है, हे इंद्र। तू ने विजय प्राप्त की, हमेशा के लिए कई जनजातियाँ को खतम कर दिया तू ने। जैसे तू दुर्गम हो गया - *नास्तिको को कुचल दिया, और ईश्वर-त्याग करने वाले को मार डाला घातक हथियार*
*( रिग्वेद ३: २४: १ )*।
है अग्नि , हमारे विरोधीयो को निष्क्रिय कर , और हमारे दुश्मनों को दूर भगा। *ईश्वर-त्याग करने वाले को मार डाल*: पूजा करने वाले को भव्यता दें।
*( रिग्वेद 6: 25: 9 )*
इसलिए हमारे मेजबानों को *एक साथ युद्ध में शामिल होने का आग्रह करें*: और ईश्वर-त्याग करने वालो के खिलाफ यूद्ध कर।
*( रिग्वेद ७: ९३: ५ )*
चमकदार कपड़े पहने हुए, जब दो महान यजमान, भयंकर मुठभेड़ मे एक-दूसरे के विरुद्ध हो जाता हे , तो तूम ईश्वर-त्याग करने वालो से भिड़ जाओ। और अभी भी सोम-रस देने वाले पुरुषों की सहायता करो ।
*२ मनुस्मृति*
*१०* लेकिन श्रुति ( दैविक आदेश - एक दूसरे से चुन चुन के ) का अर्थ वेद है, और स्मृति (परंपरा) द्वारा पवित्र कानून के संस्थान: उन दोनों मे किसी भी मामले में प्रश्न नहीं बुलाया जाना चाहिए, क्योंकि उन दोनों से पवित्र कानून चमक गया।
*११* हर दो-बार जन्म लेने वाला व्यक्ति, जो द्वंद्वात्मक संस्थानों पर भरोसा करता है, उन दो स्रोतों (कानून के) की अवमानना करता है, उस नास्तिक को पुण्यात्माओ द्वारा वेद-अवमाननाकारी के रूप में निकाल देना चाहिए
*( मनुस्मृति ३: १६१ )* मिरगी से पीड़ित व्यक्ति, जो ग्रंथियों के टेढ़े-मेढ़े सूजन से पीड़ित होता है, सफेद कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति , मुखबिर, पागल, और अंधे , कोई भी ��
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●● *VEDIC आतंकवाद* ●●
*( आतंकवाद की जड़ें ??? )*
*अथर्ववेद संहिता*
*भाष्य : आचार्य वैद्यनाथ*
*कांड: ३ सूक्त: १ मंत्र सांख्य: २*
0 'ये शक्तिशाली सेना के लोग; * आप इस तरह की लड़ाइयों के समय फ़ौजियों पर हमला करते हैं, उन पर आ जाते हैं और उन्हें मार डालते हैं। * इन वसुओं को, * विशेषज्ञ सशस्त्र पुरुषों को कसाई इन दुश्मनों से निवेदन करने दें। * उनमें से वे विद्वान जो सभी रणनीतियों के साथ बातचीत करते हैं, जैसा कि दूत ने उन्हें मार डाला।
*कांड: ३ सूक्त: १९ मंत्र सांख्य:७ : टीकाकार: आचार्य वैद्यनाथ भावार्थ:*
आगे बढ़ें और विजयी हों, हे मनुष्यों, बहुत ताकतवर तुम्हारे हथियार हो और तीखे बाणों से लैस, शक्तिशाली हथियार रखने वाले और * अपने मजबूत हथियारों के साथ उन कमजोर दुश्मनों को मार डालो जिनके धनुष कमजोर हैं। *
*भाष्य: आचार्य वैद्यनाथ कांड: ३ सूक्त: १९ मंत्र सांख्य: ८*
धनुर्विद्या के कौशल के माध्यम से बने धनुष-बाण से निकले हुए तीर को उड़ने दें, दुश्मनों को मारें, उन्हें गिराएं, * उनमें से सबसे बहादुर को मारें और उनमें से एक को भी बलात्कार न करने दें।
*कांड: ४ सूक्त: १७ मंत्र सांख्य: ४*
* हे मनुष्य! मर्दों को मारना * दूसरों पर अपने खुद के पैंतरेबाज़ी के साथ डिजाइन करना जो वे अनलकी पॉट के माध्यम से उपयोग करते हैं, जो कि वे जलसेक के माध्यम से नसों के नीले रक्त में उपयोग करते हैं, और जो वे चीरा के माध्यम से मांस में उपयोग करते हैं।
*कांड: ११ सूक्त: ९ मंत्र सांख्य: १४*
हे अयबुदी * अपने वध में, जब आप एक आदमी को मारते हैं, तो दुश्मनों की महिलाओं को उनके स्तन और जांघों को पीटना छोड़ दें। *
स्तब्ध और उत्तेजित हो जाना, * उनके बाल जंगली होना और 'हेम रोना और रोना।'
0 अरबुडी * आप शत्रु महिलाओं को सुंदर और कुत्ते जैसे साथी के साथ दिखाई देते हैं। जो गन्दी चीजों की इच्छा करते हैं, जो कप को चाटते हैं और * अंदर * और जिनके पास हिंसक स्वभाव है, जो अपनी क्रूरताओं में कुतिया हैं। * आप इन सभी को कांटे दिखाने की व्यवस्था करते हैं और उन्हें विस्फोटक हथियार भी दिखाते हैं।
*कांड: ३ सूक्त: १ मंत्र सांख्य: ३*
ओ 'शक्तिशाली शासक और ओ' दुश्मन-हत्या कमांडर; * आप दोनों दुश्मनों की सेना को मारते हैं, जो हमें धमकी देती है और उन दुश्मनों के लोगों को जला देती है। *
*कांड: ४ सूक्त: ३६ मंत्र सांख्य: ४*
* मैं अपनी शक्ति से दुष्टों पर विजय प्राप्त करता हूं और उनके धनवानों को ले जाता हूं। मैं उन सभी लोगों को मारता हूं जो दूसरों के साथ शत्रुता रखते हैं।
*कांड: ५ सूक्त: ८ मंत्र सांख्य: ७*
* हे राजा, शत्रुओं के हत्यारे फिर से उस परिश्रम को वापस कर देते हैं, जो कि वह आदमी कर रहा है, और जो परिश्रम उसे करना है, ताकि हमारे लोग उस आदमी को मार डालें।
*कांड: ५ सूक्त: २० मंत्र सांख्य: ८*
इसे कौशल के साथ उत्पन्न होने दें, इसकी आवाज़ के लिए भेजें, यह हमारे योद्धाओं को हथियार बनाने दें। * यह युद्ध-ढोल दो। जो बहादुरों का पसंदीदा नायक है, उसे सहयोगी के रूप में हमारे दुश्मनों को मारने दें।
*भाष्य: आचार्य वैद्यनाथ कांड: ८ सूक्त: ३ मंत्रसंकल्प: १५*
वह जो मनुष्य के मांस का हिस्सा बनाता है, वह जो घोड़े की तरह जानवरों के मिलने के साथ साझा करता है और * वह जो नायाब गाय के दूध की लूट करता है वह राक्षस है और उसे शासक द्वारा हड़ताली बल के साथ सिर कलम करना चाहिए। *
*कांड:८ सूक्त: ३ मंत्रसंकल्प: १८*
० राजा! आप हमेशा शरारत करने वालों को मार डालते हैं, कभी भी लड़ाई में आप पर काबू पाने वाले व्यक्तियों को पैदा करने में परेशानी नहीं होती है, * अपने लोगों के साथ मांस खाने वालों को जला दें और उनमें से किसी को भी अपने शक्तिशाली अद्भुत हथियार से बचने न दें। *
*कांड: ८ सूक्त: ४ मंत्र सांख्य: १*
0 शक्तिशाली राजा और प्रमुख! * दुष्ट आदमियों को जलाओ और उन्हें नष्ट करो, लोगों में निराशा फैलाना, क्रूर लोगों को भगाना, * उन्हें मारना और उन्हें पूरी तरह से जला देना, *समाज के लोगों के खून चूसने और खा जाने वाले पुरुषों का सफाया करते हैं।
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*The inspiration behind Hindutv terrorism*
Yajurved
*Devichand*
*O terrible chastiser, "burn" down the "irreligious" foes.*
13:12
The teacher and preacher *are deserving of praise,* who like the King and Commander of the army, the bestowers of happiness *andchastisers of the "irreligious" sinners,*......
33:76
. *O God drive away* a.. *a personwith evil designs for murdering cows ;* *a cow-killer for gallows one who for hunger goes begging to a man who is cutting up a cow ;* *a leader ofmeat eaters bent on misdeed;* *the son of a depraved person,befriendinga sinner.*
30:18
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*Atharvaved*
*Bhashya : Aacharya Vaidyanath*
Kand : 3 Sukta : 1 Mantra Sankhya : 2
0' Ye mighty army men ; *you on the time of such battles attack the foemen, over-come them and kill them.* Let these Vasus, the *expert armed men being requested butcher these enemies.* The learned men among them who is conversant with all strategies, as messenger assail them.
Kand : 3 Sukta : 19 Mantra Sankhya : 7 Commentator : Aacharya Vaidyanath Bhavarth :
Advance and be victorious, O ye men, exceedingly mighty be your arms and equipped with sharp arrows, possessing powerful weapons and *with your strong arms kill the feeble enemies whose bows are weak.*
Bhashya : Aacharya Vaidyanath Kand : 3 Sukta : 19 Mantra Sankhya : 8
Let the arrow loosed from the bow-string made through the skill of archery fly away, assail the enemies, vanquish them, *kill the bravest of them and let not one of them scape.*
Kand : 4 Sukta : 17 Mantra Sankhya : 4
*O man ! Kill the men* having designs upon others with their own manoeuvering which they use through unleaked pot, which they use through infusion into the blue blood of nerves, and which they use through the incision into flesh.
Kand : 11 Sukta : 9 Mantra Sankhya : 14
O Aybudi. *In your slaughter, when you kill a man,let the women of foes left beating their breast and thighs.*
being shocked and aggrieved, *having their hair wild and keeping 'hem weeping and crying.*
0 Arbudi *You make visible to enemies women beautiful and with dog like mates. who desire dirty things, who licks the cup and pots* *inside and who have a violent nature, who are the bitches in their cruelties.* You arrange all these to show thorn and also show them explosive weapons.
Kand : 3 Sukta : 1 Mantra Sankhya : 3
O' Powerful Ruler and O' enemy-killing Commander ; *you both assail the army of foes which threatens us and burn the men of those enemies.*
Kand : 4 Sukta : 36 Mantra Sankhya : 4
*I conquer the wicked with my power and take their wealthy away. I kill all those who bear hostility with others.* Let my intention bear success.
Kand : 5 Sukta : 8 Mantra Sankhya : 7
*O King, the Killer of enemies turn back again the exertion which that man iS doing and the exertions which he has to do, so that our people kill that man.*
Kand : 5 Sukta : 20 Mantra Sankhya : 8
Let it produced with skill, send for its voice,let it make the weapon of our warriors bristle. *let this war-drum. which is the favourite of braves call out heroes and let it kill our enemies through allies.*
Bhashya : Aacharya Vaidyanath Kand:8 Sukta:3 MantraSankhya:15
He who partakes the flesh of human-being, he who shares with the meet of animals like the horse and *he who robs of the milk of unkillable cow is the monster and must be beheaded by the ruler with striking force.*
Kand:8 Sukta:3 MantraSankhya:18
0 King ! you always kill the mischief-manger, never have trouble creating persons overcome you in fight, *burn up the flesh-eaters with their person and let no one of them escape your mighty wonderful weapon.*
Kand: 8 Sukta : 4 Mantra Sankhya :1
0 powerful King and premier ! *Burn the wicked men and destroy them,* send downward the persons who
disseminate gloom in the people, exterminate the cruel ones, *kill them and totally burn them,*
drive away and annihilate the men who suck and devour blood of the people in the society.
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■■*BRUTALITY and EXTREMITIES Of VEDIC TERRORISM* ■■
*(ATHARVA VED 12: 5: 62)*
Cut, rip, tear, burn, burn, burn, and destroy the Anti-Vedic NASTIK AGNOSTICS (kafir).
*(ATHARVA VED 12: 5: 68 - 71)*
Cut the Veins of that anti-Vedic AGNOSTICS (kafir); Take off his skin; Melt his pieces of flesh; Encourage his nerves; Put his bones like a stone; Remove his meang; Loosen all its organs and joints.
*(ATHARVA VED 11: 5: 72 - 74)*
By The carnivores FIRE ; BRUN that Anti-Vedic blasphemous ATHEIST AGNOSTICS (kafir) by fire and expel it from the earth; Vayu burns him with a large bed space and the creation burns him with light.
*( RIG VED 10:87:10 )*
Look on the fiend mid men, as Man-beholder: rend thou his three extremities in pieces.Demolish with thy flame his ribs, O Agni, the Yātudhāna's root destroy thou triply.
*( ATHARVA VED 5:20:5 )*
Hearing the Drum's far-reaching voice resounding, let the foe's dame, waked by the roar, afflicted,Grasping her son, run forward in her terror amid the conflict of the deadly weapons.
*( ATHARVA VED 10:5:42 )*
We hunt that man, we beat him down and slay him with our murderous blows.We with the spell have hurried him to Parameshthin's opened jaws.
*MAHABHARATA 7:198:(p.465)* Even this is the duty of a Kshatriya, viz., to slay or be slain.
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■■*PARASHU RAMA Commits GENOCIDE Because HE is ANGRY* ■■
*MAHABHARATA 1:II*
"The Rishis said, 'O son of Suta, we wish to hear a full and circumstantial account of the place mentioned by you as Samanta-panchaya.'
"Sauti said, 'Listen, O ye Brahmanas, to the sacred descriptions I utter O ye best of men, ye deserve to hear of the place known as Samanta-panchaka. In the interval between the Treta and Dwapara Yugas, PARASHU-RAMA (the son of Jamadagni) great among all who have borne arms, urged by impatience of wrongs, repeatedly smote the noble race of Kshatriyas. And when that fiery meteor, by his own valour, annihilated the entire tribe of the Kshatriyas, he formed at Samanta-panchaka five lakes of blood. We are told that his reason being overpowered by anger he offered oblations of blood to the manes of his ancestors, standing in the midst of the sanguine waters of those lakes. It was then that his forefathers of whom Richika was the first having arrived there addressed him thus, 'O PARASHU RAMA, O blessed RAMA, O offspring of Bhrigu, we have been gratified with the reverence
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Hindu sacred texts on killing enemies of Vedas/Justifying the killings.
1. Atharva Veda 20.96.4: "..he slays, unasked, the enemies of Vedas."
2. Atharva Veda 2.12.6: "..Burn down the enemies of Vedas."
3. Atharva Veda 20.93.1 "…destroy the enemies of Vedas."
/1
4. Rig Veda 6.22.8: "..burn down the enemies of God, Vedas and the malice…"
5. Rig Veda 6.72.1: "…ye killed all darkness and the Gods’ blasphemers."
6. Rig Veda 6.52.3: "…cast your destroying weapon for the destruction of the enemies of Veda, wealth and crops."
/2
7. Rig Veda 2.23.14: "Burn up the disbelievers with thy fiercest (showing a heartfelt and powerful intensity.) flaming brand, those who have scorned thee in thy manifested might…"
8. Rig Veda 2.23.4: "…and preservest men; distress o’ertakes not him who offers gifts to..
/3
thee. You burns up the enemies of Vedas and Ishwar."
9. Rig Veda 2.23.8: "…Strike, O Brhaspati, the Gods’ revilers [or enemies] down, and let not the unrighteous come to highest bliss."
9. Rig Veda 6.61.3: "Thou castest down, Sarasvati, those who scorned the Gods…"
/4
10. ”Godly persons shall always be ready to kill irreligious people” -[Kshemkarandas Trivedi (Arya Samaj) on Atharva Veda 12.5.62, page 576] -Arya Samaj Website
11. Atharva Veda 12.5.54 ‘Vedic followers should destroy infidels”- page 574 Arya Samaj Website
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**KILLING THOSE WHO HATE ISHWAR AND WHOM ISHWAR HATES**
1. The entire hymn of Atharva 2.19 is dedicated in burning those who hate Ishwar and to whom Ishwar hates.
2. Atharva Veda 10.3.3 This charm shall conquer and cast down thy foemen. Be thou the first to slay the men who /6
hate thee.
3. ”…O Rohita (King) agitate destroy and entangle in snares the man doing wrong to Brahman.” Atharva Veda 13.3.1, Tr. Vaidyanath Shastri.
4. Atharva Veda 12.5.52: Rend, rend (tear something into pieces.) to pieces, rend away, destroy, destroy him utterly. /7
Destroy Angirasi! the wretch who robs and wrongs the Brahmans, born.
5. Atharva Veda 2.19.1: Burn thou, O Agni, with that heat of thine against the man who hates us, whom we hate.
6. Manu Smriti 8.417: A Brahmana may confidently seize the goods of (his) Sudra (slave); for, /8
as that (slave) can have no property, his master may take his possessions.
7. ”…By him we attack on him who hates us and whome we abhor(regard with disgust and hatred.). We overthrow and slay him through this knowledge, through this act and through this fatal.. /9
weapon.” Atharva Veda 10.5.15
8. Atharva Veda 10.5.25: "…from earth we bar him who hates us and whom we hate."
9. ”O resplendent Lord, brave and opulant, protect us this day against our foes with many and excellent defences, may the vile wretch who hates us fall before us; /10
May the breath of life depart from him whom we hate.” Rig Veda 3.53.21, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 4, page 1237
10. Yajur Veda 15.15: "This one in front, golden-tressed, with sunbeams; the leader of his host and his chieftain are Rathagritsa and Rathaujas, and /11
Puñjikasthalâ: and Kratusthalâ his Apsarases. Biting animals are his weapon, homicide his missile weapon; to them be homage: may they protect us, may they have mercy upon us. In their jaws we place the man whom we hate and who hates us."
/12
11. ”May you (O love divine), the beholder of the path of enlightenment, purifying our mind and destroying the infidels who refuse to offer worship, come and stay in the prime position of the eternal sacrifice.”- Rig Veda 9.13.9, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 11, page 3619
/13
12. ”May the fire divine chase away those infidels, who do not perform worship and who are uncivil in speech. They are niggards, unbelievers, say no tribute to fire divine and offer no homage. The fire divine turns those godless people far away who institute no.. /14
sacred ceremonies.”- Rig Veda 7.6.3, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 8, page 2369
13. ”Augmenting the strength of resplendent self, urging the waters and rejuvenating all noble acts and destroying the infidels.”- Rig Veda 9.63.5, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 11, pg. 3715
/15
14. One who does not offer Sacrifice is inhuman ”May your friend, the cloud, hurl that infidel down from heaven who differs from us in rites and rituals, is inhuman, who does not observe fire sacrificials, and who does not show reverence to Nature’s...
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bounties.”- Rig Veda 8.70.11, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 10, page 3319
15. ”O Lord of knowledge, this laudation is for you…destroy the godless and the malice of our enemy.”- Rig Veda 7.97.9, Tr. SatyaPrakash Saraswati, Vol 8, page 2613
/17
16. Rig Veda 1.84.8: When will he trample, like a weed, the man [Infidel] who hath no gift for him…
17. ”When, with his foot, will he trample the unworshipping man like a mushroom”- Nirukta 5.17
/18
Hindu holy book - Mahabharata is entire epic on war, war for property of Pandavs and thus finding justice by war. Millions got killed for that. It is said that even soil turned red in color by blood, Mahabharata is the only religious book which is complete violence based.
/19
Lord Parshuram - sixth avatar of Vishnu is known for his violence against kshtriyas (warriors). He killed his mother by cutting her head on father’s command and make earth rid of kshtriyas 21 times, killing kings, their successors and kids.
/20
Atharva Veda 12.5.62 ”Rend, rend to bits, rend through and through, scorch and consume and burn to dust, the one who rejects the Vedas”
Note: When you ask them about these statements, they say you have misinterpreted the verses and quoted out of context. /21
This is exactly what they do with the verses of the Qur'an and try to prove that Islam is not a religion of peace. However, these contexts and statements MIGHT be about war and self defence at the time it was written, killing is justified only in war according to the... /22,
of Sanatan dharma but why do hindus take verses from the Qur'an and misquote it when their own sacred texts are filled with this?