Friday, 19 June 2020

(II) राम, रामायण, रामचरित्र, सीता।

राम कौन?

बौद्धों का कत्लेआम कराने वाला ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र सुंग ही काल्पनिक राम है. जब अयोध्या ही नहीं थी तो राम कहाँ पैदा हुआ था? इतिहास गवाह है कि आज जिसे अयोध्या कहते हैं उसका एतिहासिक नाम साकेत था जिसके बहुत से सबूत मौजूद हैं, अंतिम बौद्ध सम्राट बृहदत मौर्य का ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र ने घोखे धोखे से हत्या करके साकेत का राजा बन गया और बौद्धों का कत्लेआम कराया कत्लेआम इतना ज्यादा था कि साकेत के साथ घाघरा नदी सर से भर गया इस प्रकार जहां देखो सर ही सर दिख रहे हैं इसलिए घाघरा का नाम सर+युक्त =सरयू पड़ा है और आज भी अयोध्या के साथ वाले घाघरा नदी के हिस्से को सरयू कहते हैं। बौद्धो का कत्लेआम हुआ एक बौद्ध को ढूंढ कर कत्ल किया गया जो लोग भाग सके दूसरे देशों में चले गए इसलिए ही आज पूरी दुनिया में बुद्ध धम्म फैल गया साकेत में एक भी बौद्ध नहीं बचा ईस लिए साकेत का नाम अयोध्या रखा अ+योद्धा अर्थात योद्धा रहित। पुष्यमित्र सुंग का दरवारी कवि अग्निशर्मा जिसे वाल्मीकि के नाम से जाना जाता है वाल्मीकि ने ही अपने काल्पनिक रामायण के पात्र के रूप में पुष्यमित्र सुंग को ही राम और बृहदत मौर्य और उसके नौ मौर्य सम्राटों के सिर को जोड़ कर दस शिरो वाला रावण नाम दिया। इस प्रकार बौद्धो का कत्लेआम कराने वाला पुष्यमित्र सुंग ही राम है। और सभी घटनाएँ और पात्र काल्पनिक हैं जिसमें भालू, बंदर, आदि दक्षिण भारत के मूलवासियों के जातियो के नाम थे।

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क्या राम भगवान थे?

में राम को सिर्फ एक राजा समझता हु क्योकि एक भगवान कभी भी किसी का सहारा नहीं लेता जिस छल कपट से उसने रावन जेसे योधा को मारा वो यही सिद्ध करता है के राम भगवान हो ही नहीं सकता 

क्या आप में से कोई भी इस कथन से सहमत है के एक भगवान की आधी ज़िन्दगी जंगल में बंदरो और भालुओ के साथ गुज़री और तो और एक भगवान अपनी पत्नी को ढूँढने तक में सक्षम नहीं था इसीलिए बंदरो और भालुओ का सहारा लेकर एक साहसी योधा को पीठ पीछे वार करके मारा ! यह सारे गुण किसी भगवान के चरित्र को नहीं दरशाते बल्कि किसी भी व्यक्ति के देवालीयेपन का सबूत देते है

सीता की अग्नि परिक्षा इस बात का सबूत है के राम बुरा पति ही नहीं बल्कि एक शक्की मानसिकता का रोगी भी था जिसने सिर्फ एक मछुआरे की बात मानकर सीता को अग्नि मै छलांग लगाने के लिया कहा यह केसी मर्यादा है उस मर्यादा पुरूषोत्तम की के एक भगवान होकर भी वोह अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करता रहा रावन के साथ 2 वर्ष बिताने के बाद सीता कभी राम के साथ खुश नहीं रही और हमेशा राम ने उसका उत्पिरण किया

क्या एक भगवान को किसी राक्षस से युद्ध की ज़रुरत पड़ सकती है अगर है तो भगवान तो सारी सृष्टि का रचयेता है उसी ने मनुष्य राक्षस असुरो को बनाया फिर भी वोह भालू और बंदरो की फ़ौज लेकर एक योधा से लड़ा और उसके भाई को सत्ता और कुर्सी का लालच देकर साथ मिलाया! 

आज यह लक्षण हमारी राजनीती मै देखने को मिलते है जो राम ने हज़ारों साल पहले करा।

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सिद्ध करो राम थे या स्वीकार करो कि रामायण काल्पनिक ग्रंथ है...

(1). एक समय पर दो तरह के इंसान कैसे हो सकते हैं? एक पूंछ वाला और एक बिना पूंछ वाला. दोनों मनुष्य की तरह बोलते हैं दोनों के पिता राजा हैं क्या ऐसा संभव है??
(2). मेंढक से मंदोदरी कैसे बन सकती हैं/ पैदा हो सकती है?? 
(3). लंगोटी का दाग छुड़ाने से अंगद कैसे पैदा हो सकता है??  पक्षी मनुष्य की तरह कैसे काम कर सकता है जैसे  गिद्धराज?? 
(4). किसी मनुष्य के 10 सिर हो ही नहीं सकते इतिहास या पुरातत्व द्वारा आज तक ये सिद्ध नहीं हो पाया कि किसी इंसान के  10 सिर 20 भुजाओं वाला कोई मनुष्य नहीं है.
(5). जिस लंका की आप बात कर रहे हो,उसका नाम भी 1972 में लंका पड़ा। इसके पहले सिलोन व सीलोन से पहले सिहाली इत्यादि नाम थे तो असली लंका कहा है???
(6). घड़े से लड़की कैसे पैदा हो सकती है?  एक माह में मकरध्वज कैसे पैदा हुए? मछली से कोई  मनुष्य कैसे पैदा हो सकता है??  एक माह में मकरध्वज पातालपुरी में नौकरी करने लगे क्या ये संभव है?? अगर संभव है तो साबित करो.
(7). 5000 साल पुरानी द्रविड़ भाषा को कोई पढ़ नहीं सकता तो 70000 साल पहले अंगद किस भाषा शैली क्या थी??
(8). सम्राट अशोक के काल में अयोध्या का नाम साकेत था तो अयोध्या के बाद साकेत और साकेत के बाद अयोध्या नाम कैसे पड़ा??  पुरातत्व विभाग की तरफ से एक भी प्रमाण हो तो बताओ कि राम राज्य था??
(9). सात घोड़ों से सूर्य कैसे चल रहा है?? आपकी पुस्तकें कह रही हैं जबकि विज्ञान कह रहा है कि सूर्य चलता ही नहीं है. जब राम का राज्याभिषेक हो रहा था तब  सूर्य एक महीने के लिए रुक गया था, आपकी किताबों में लिखा है। जबकि सूर्य चलता ही नहीं है अगर सूर्य चलता है तो सिद्ध करो /साबित करो.
(10). सूर्य खाने गए हनुमान की स्पीड और कद क्या था?? जो हनुमान सूर्य की आग से नही जल सकता, वह पुंछ में लगी आग से कैसे जल सकता है??
(11). बालमीक रामायण कहती है चैत अमावस्या को रावण का वध होता है। तुलसीकृत रामायण कहती है कुमार दशहरा को रावण का वध होता है तो सच क्या है??
(12). सोने की खोज हुए 4000 साल हुए हैं तो 70000 साल पहले सोने की लंका कहां से आई थी??  सोने का गलनांक 3000℃ से अधिक होता है, तो बताओ पुंछ की आग से इतना तापमान कैसे बढ सकता है?? सोने का महल था या सोने की लंका? 6000 साल पूर्व सभी चमड़े का परिधान पहनते थे। तो 70000 साल पूर्व कपड़े राम कहां से पहनते थे??
(13). जब ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण पैदा हुआ तो भारत में ही क्यों पैदा हुआ?? जबकि ब्रह्मा ने ब्रह्मांड रचाया तो चीन अमेरिका थाईलैंड जापान दक्षिण कोरिया वगैरह वगैरह दुनिया के बाकी देशों में ब्राह्मणों क्यो पैदा नहीं हुआ या होता ?? आज भी बामण किसी के मुख से पैदा होते है या जननांग से।
(14) वह कोनसा सॉफ्टवेयर था जिसे पता चल जाता था कि लक्ष्मण रेखा को  सीता पार करे तो कुछ नही हुआ परन्तु रावण पार कर तो जल उठे???
(15). जिस धनुष को रावण उठा नही सका, उसी धनुष को उठाने वाली सीता को रावण कैसे उठा सकता है??

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अरण्यकांड ४७/४,११:- इस प्रकरण में हम स्पष्ट कर दें कि रामचंद्र जी को विवाह के २ वर्ष बाद वनवास हुआ था,नाकि १२ वर्षों बाद। देखिये:-

उषित्वा द्वादश समाः इक्ष्वाकुणाम निवेशने |
भुंजाना मानुषान भोगतसेव काम समृद्धिनी ||
(अरण्यकाण्ड ४७: ४)
(जग.टीका २८/७)

ध्यान दे की इस श्लोक में द्वा और दश शब्द अलग अलग है. येद्वादश यानि बारह नहीं बल्कि द्वा “दो” को और दश “दशरथ” को संबोधित करता है. इसमें माँ सीता, रावन से, कह रही है की इक्ष्वाकु कुल के राजा दशरथ के यहाँ पर दो वर्ष में उन्हें हर प्रकार के वे सुख जो मानव के लिए उपलब्ध है उन्हें प्राप्त हुए है। क्योंकि इस श्लोक में इक्ष्वाकु कुल का नाम सीता जी बोल रही हैं – लेकिन उस कुल में दशरथ पुत्र राम से उनका विवाह हुआ – स्पष्ट है – पुरे श्लोक में दशरथ नाम कहीं और भी नहीं लिखा है – इसलिए “द्वा” दो को और “दश” – महाराज दशरथ को सम्बोधन है।

इसे पूर्ण रूप से न समझ कर – कुछ ऐसा अर्थ किया जाता है – एक उदहारण –
“उस समय छोटे बच्चो को कमरे में बंद रखा जाता था” –
इसे कुछ इस तरह अर्थ किया गया –
“उस समय छोटे बच्चो को कमरे में बंदर खा जाता था” –
श्लोक का अर्थ थोड़ा गलत करने से पूरा मंतव्य ही बदल गया।

आगे देखिये:-
मम भर्ता महातेजा वयसा पंच विंशक ||३-४७-१० ||
अष्टा दश हि वर्षिणी नान जन्मनि गण्यते ||३-४७-११ ॥
( जग.टीका २८/६)

इस श्लोक में माँ सीता कह रही है की उस समय (विवाह के समय) मेरे तेजस्वी पति की उम्र पच्चीस साल थी और उससमय मैं जन्म से अठारह वर्ष की थी। औरवो करीब दो साल राजा दशरथ के यहाँ रही थी यानि माँ सीता की शादी अठारह साल की उम्र के आस पास हुई थी. ये केवल सोच और समझ का फेर है।

सिद्धाश्रम : श्री राम १४-१६वे वर्ष में ऋषी विश्वमित्र के साथ सिद्धाश्रम को गए थे। इस तथ्य की पुष्टि वाल्मीक रामायण के बाल काण्ड के वीस्वें सर्ग के शलोक दो से भी हो जाती है, जिसमे राजा दशरथ अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहते हैं- उनका कमलनयन राम सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ और उसमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता भी नहीं है।

उनषोडशवर्षो में रामो राजीवलोचन: न युद्धयोग्य्तामास्य पश्यामि सहराक्षसौ॥ (वाल्मीक रामायण /बालकाण्ड /सर्ग २० शलोक २)(जग.टीका ११/११)

चूँकि भगवान राम ऋषि विश्वामित्र के साथ पंद्रहअथवा सोलह वर्ष की उम्र में गए थे और उसके बाद ही उनका विवाह हुआ था इसे ये सिद्ध हो जाता है की प्रभु रामकी शादी सोलह वर्ष के उपरान्त हुई थी।

श्री राम और लक्ष्मण ने – ऋषि विश्वामित्र के आश्रम सिद्धाश्रम में करीब १२ वर्ष तक निवास किया और ऋषि विश्वामित्र ने उन्हें ७२ शस्त्रास्त्रों का सांगोपांग ज्ञान तथा अभ्यास कराया –

यदि श्री राम की आयु ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम में जाते समय १६ नहीं १४ भी माने तो ऋषि विश्वामित्र के आश्रम में विद्या ग्रहण करते हुए १२ साल व्यतीत हुए जिसका योग २६ वर्ष होता है –

उपरोक्त तथ्यों से सिद्ध है की श्रीराम की आयु मिथिला में स्वयंवर जाते समय २५-२६ वर्ष थी और माता सीता की आयु १८ वर्ष थी और दो वर्ष राजमहल में रहकर वनवास को प्राप्त हुये।

वे विवाह के दो वर्षों बाद ही वनवास गये,१२ नहीं ।इसकी पुष्टि महाराज दशरथ के इस वचन से होती है:-

व्रतैश्च ब्रह्मचर्यैश्च गुरुभिश्चोपकर्शितः । 
भोगकाले महत्कृच्छ्रं पुनरेव प्रपत्स्यते ॥ ८४ ॥ 

'हाय ! अब तक तो राम वेदों का अध्ययन करना, ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करना तथा अनेकानेक गुरुजनों की सेवा करने में संलग्न रहने से दुबले होते रहे हैं हैं ।अब जब उनके लिये सुखोपभोगका समय (अर्थात् गृहस्थाश्रम) आया है, तब वे वनमें जाकर महान कष्टमें पड़ने वाले हैं॥८४॥

( अयोध्याकांड सर्ग १२ श्लोक ८४)( जग.टीका ११/४४)

इससे सिद्ध है कि ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ में गये उनको २ ही वर्ष हुये थे अन्यथा १२ वर्ष के लंबे काल के बाद दशरथ जी नहीं कहते कि-"ब्रह्नचर्य, वेदाध्ययन और गुरुसेवा आदि व्रतों के पालन से कृशकाय शरीर होने के बाद उनके लिये सुखोपभोग का अवसर आया है"। "अब जब उनके लिये सुखभोग का समय आया है-" यह तभी समीचीन है जब वनवास का समय विवाह के २ वर्ष का माना जावे,न कि १२ वर्ष का। अस्तु।

{ हम इस स्पष्टीकरण और शोध के लिये आर्य श्री रजनीश बंसल जी और आर्यमंतव्य की टीम का हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।}

३:- इसमें क्या आपत्ति है? सीताजी जब १८ वर्ष की हुई अर्थात् यौवनसंपन्ना ,तब जनक जी को उनके विवाह की चिंता होने लगी।इससे यही सिद्ध है कि उनका विवाह युवावस्था में हुआ था।इससे हमारा कुछ नहीं बिगड़ता हां,आपका खंडन अवश्य होता है क्योंकि आगे आप सीता का विवाह ६ वर्ष की आयु में दिखाना चाहते हैं।

४:- अग्निवंश रामायण हमारे लिये किसी प्रमाणकोटि में नहीं है। ऊपर आप ही ने प्रमाण दिया है कि सीताजी का विवाह युवावस्था में हुआ और हम सिद्ध कर चुके ति विवाह के समय राम सीता दोनों युवावस्था में थे अतः वाल्मीकीय रामायण के विरुद्ध यह प्रमाण कोई मूल्य नहीं रखता।हां,ये बताते जाइये कि सीताजी के आक्षेप संख्या १ और २ के स्पष्टीकरण में आपने माना है कि "किशोर राम की आयु सीता से बहुत कम थी,अर्थात् राम सीता से छोटे थे-" आपकी इस बात का खंडन आपने यहां सीता को राम से छोटा दिखाकर कर दिया। दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं,इनमें से सच कौन झूठ कौन?

अग्निवंश रामायण का प्रमाण रोज सुबह शहद लगाकर चाटा करें,ये हमारे सामने कोई मूल्य नहीं रखता।

५:- अयोध्याकांड २०/४५:-लीजिये, हम श्लोक का मूलपाठ और अर्थ लिख देते हैं:-

दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव । 
आतीतानि प्रकाङ्‍क्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥ ४५ ॥ 

'राघव ! तुम्हारा उपनयनरूप द्वितीय जन्म होकर सतरह वर्ष हो चुके हैं (अर्थात तुम अभी सत्ताईस वर्षके हो चुके हो।) अभी तक मैं आशा धरकर चल रही थी कि अब मेरा दुःख दूर होगा॥४५॥

( जग.टीका में अनुपलब्ध)

इस श्लोक में "जन्म से १७ वर्ष" का तात्पर्य रामायण के एक प्रसिद्ध टीकाकार ने अपनी 'तिलक' टीका में " उपनयन रूपी द्वितीय जन्म " जो क्षत्रियों में कम से कम १० वर्ष में होता है,से किया है।गीताप्रेस की टीका में भी वही अर्थ है और यही उचित है।

क्योंकि विवाह के समय पूर्णरूपेण रामजी युवा थे,यह हम सिद्ध कर चुके हैं। यदि आपके हिसाब से चलें ,तो विवाह के बाद वे १२ वर्ष घर में रहे तोविवाह के समय उनकी आयु १७-१२=२ वर्ष हो गई। कहिये महोदय, यह किस प्रकार संभव है? और विश्वामित्र के आगमन के समय उनकी आयु लगभग १६ साल थी,उसका क्या? अतः आपका माना हुआ अर्थ अशुद्ध है और हमारा पूर्ण रूप से ठीक है।

६:- "स्याम गौर मृदु-इत्यादि।" मानस के लेख का स्पष्टीकरण हम पीछे लिख चुके हैं,जिससे सिद्ध है कि मानस के अनुसार भी श्रीराम और मां जानकी युवावस्था में विवाहित हुये थे।

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*सीता, बाली और शंबूक के साथ राम का अन्याय!*

आज मैं आपको *रामायण* के राम के विषय में कुछ अनजाने पहलू से अवगत कराउंगा? आप खुद ही विचार करके देखिए– क्या राम के ये कार्य एक अवतार के रूप में सही ठहराये जा सकते हैं? *आपकी टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।*

*बाली का धोखे से वध:*

राम ने *बाली* का धोखे से क़त्ल किया. *रामायण* में बाली ने *श्रीराम* के चरित्र और व्यक्तित्व का कितना उपर्युक्त चित्र खिंचा है. बाली,राम को संबोधित करते हुए कहते है- *“आप हतबुद्धि है।.आप धर्म-ध्वजी है.दिखाने के लिए धर्म का चोला पहने हुए है आप वास्तव में अधर्मी है* आपका आचार-व्यवहार पाप-पूर्ण है आप घास-फूंस से ढके हुए कूप के सामान धोखा देने वाले है. *(बाल्मीकि रामायण ४-७-२२)* आप कामेच्छा के गुलाम है,क्रोधी है,मर्यादा में न रहने वाले है,चंचल है राजाओं की मर्यादा का बिना विचार किये किसी को भी अपने तीर का निशाना बना सकते है.” 

*शम्बूक की ह्त्या:*

बाल्मीकि रामायण के *उत्तर कांड* तथा *उत्तर रामचरित नाटक* में वर्णित राम द्वारा शुद्र तपस्वी *शम्बूक* की ह्त्या से साफ़ जाहिर है कि *श्री राम* अत्यंत निर्दयी और अत्याचारी अवतार राजा थे. शम्बूक की हत्या को *रामायण* में बाल्मीकि ने श्रीराम के ही मुख से इस तरह वर्णन किया है-इस बात को तकरीबन सभी जानते हैं इस प्रसंग में *राम* ने घोर तपस्या करते *शम्बूक* से पूछा- “तुम्हे किस वस्तु के पाने की इच्छा है? तपस्या द्वारा संतुष्ट हुए *इष्ट-देवता* से वर के रूप में तुम क्या पाना चाहते हो-स्वर्ग अथवा दूसरी कोई वस्तु? कौन-सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिए तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरों के लिए दुष्कर है? तापस ! जिस वस्तु की प्राप्ति की इच्छा के लिए तुम इस घोर तपस्या  में लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ. *इसके सिवा यह भी सही-सही बताना की तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय? तीसरे वर्ग के वैश्य हो अथवा शुद्र?* तुम्हारा भला हो, मेरे इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर देना.

उस तपस्वी शम्बूक ने उत्तर दिया- हे महायशस्वी राम! मैं शूद्र योनि में उत्पन्न हुआ हूँ. मैं निसंदेह स्वर्ग लोक जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ मैं इसलिए यह उग्र तपस्या कर रहा हूँ “काकुत्स्थाकुल भूषण राम मैं झूठ नहीं बोलता . देव लोक पर विजय पाने की इच्छा से तपस्या में लगा हूं आप मुझे शुद्र जानिये मेरा नाम शुद्र है” राम के ही शब्दों में - *“उस शुद्र के मुहं से यह बात निकली ही थी, मैंने आव देखा ना ताव, अपने म्यान से तलवार खीच ली और उससे शम्बूक का सिर धड से अलग कर दिया.”* ये कहानी थोडा कम लिखी है “जब *ब्राह्मण* ने अपने बेटे की मौत का रोना राम के आगे रोया तब जाकर राम ने  मजबूरन शम्बूक को लुढ़काया था.”

*सीता के साथ अमानवीय बर्ताव:*

अपनी पत्नी *सीता* पर तो *राम* ने मुसीबतों के पर्वत ही तोड़ डाले. १४ वर्षों का बनवास काटने के पश्चात् उसके चरित्र पर संदेह किया गया यानी चरित्र की *शुद्धता* का सबूत देने के लिए उन्हें अग्नि में कूदना पड़ा सीता कहती है- *“मेरा चरित्र शुद्ध है, तो भी मुझे दूषित समझ रहे है मैं सर्वथा निष्कलंक हूँ. सम्पूर्ण जगत की साक्षी अग्नि देव ! मेरी रक्षा  करें."* सुमित्रानंदन! मेरे लिए चिता तैयार  कर दो। मेरे इस दुःख की एक ही दवा है. मिथ्या कलंक से कलंकित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती.” *(बाल्मीकि रामायण ६-२४-१)*

*अग्नि परीक्षा* के बाद भी *राम* की तसल्ली नहीं हुई. तंग आकर सीता को कहना पड़ा- “मैं मन, वाणी और क्रिया के द्वारा केवल श्रीराम की ही आराधना करती हूँ. यदि यह कथन सत्य है तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दे..” *(बाल्मीकि रामायण ६-९७-१५)* और “सभी लोगों के देखते-देखते जानकी (सीता) रसाताल को प्रयाण कर गई.”

*सीता* की आत्महत्या से राम के चरित्र का यह पक्ष की वह कितना निर्दयी और अत्याचारी था, अच्छी तरह उजागर हो जाता है.

*शराब पीना और पिलाना:*

बाल्मीकि रामायण, *उत्तराखंड, सर्ग ४२ श्लोक १७-२१* में राम सीता का राजकीय उद्यान विहार का वर्णन इस तरह किया है-

अशोक वनिका …१७…पान्वाश्न्गत:(२१) अर्थात: *रामचंद्र* ने अपने अंत:पुर से सटे हुए समृद्ध राजकीय उपवन में विहारार्थ प्रवेश किया और वे फूलों शोभित तथा ऊपर से कुश या बिछावन बिछाये हुए एक सुन्दर आसन पर बैठ गए. राजा काकुत्स्थ वंश में उत्पन्न *रामचंद्र* ने सीता जी को हाथ से पकड़ कर पवित्र मेरेय नामक मद्य को,जैसे इन्द्र शची को पिलाते है, वैसे ही पिलाया. *चाकर उत्तम पकाए हुए मांस तथा नाना प्रकार के फल रामचंद्र के भोजनार्थ शीघ्र लाये. रामचंद्र के समीप जाकर नाच-गान में प्रवीण अप्सराएँ, नाग-कन्याएं, किन्नरियाँ तथा अन्य गुणी और रूपवती स्त्रियाँ मदिरा के नशे में मतवाली होकर नाचने लगीं.*

उपरोक्त लिखित चंद प्रसंग जो की *बाल्मीकि रामायण* से लिए गए है अब आप ही बताये क्या ये प्रसंग कभी आज तक आपने किसी *रामलीला*!या किसी धारावाहिक में आज तक देखे या सुने है. हाँ कुछ खास घटनाओं को छोड़कर, उसमें भी राम की तारीफ में कसीदे ही गढ़े गए है. क्या कहीं आपने राम को शराब पीते और मांस खाते हुए सुना था.नहीं ना…? मगर ये सच है. *एक शुद्र की गर्दन धड से अलग कर देना क्या ये सही किया वो भी इसलिए कि शम्बूक एक शुद्र था.* क्या राम का मांस भक्षण करना जायज था. बाली का राम को कोसना यही बताता है की राम ने कितना बड़ा छल किया था. *अगर राम वाकई क्षत्रिय थे तो बाली को छुपकर मारने की क्या जरुरत थी पूरे होसले के साथ सामने आकर मारते।* तब तो कुछ बात भी थी। रामायण के अनुसार राम को बस आज्ञाकारी जरुर कहा जा सकता है। इसके अलावा उन्होंने कई ऐसे कार्य किए जो सही नहीं ठहराए जा सकते.
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■■*"शम्बूक" नामक शुद्र* को बिना किसी करना हत्या कर दिया भगवान् श्री राम ने? ■■

*( रामायण , उत्तर कांड7 , सर्ग  73 - 76 )*

*धर्मग्रंथ रामायण* में लिखा है कि उत्तराखंड में *एक दलित "शम्बूक"* नाम के बालक ने 12 वर्ष तक एक पेड़ पर उल्टा लटककर तपस्या की तो उसी समय वहां एक ब्राह्मण बालक का देहांत हो गया, जिसका पिताजी जीवित था। इस घटना का इल्जाम *"शम्बूक"* पर लगाया गया कि उसने दलित होते हुए तपस्या की, जिस कारण ब्राह्मण बालक का देहांत हो गया। इस बात की शिकायत ब्राह्मण बालक के पिता ने मर्यादा पुरूषोत्तम *राम* से की, *जिन्होंने वहां जाकर उस शूद्र बालक "शम्बूक" की गर्दन धड़ से अलग कर दी।* यह था मर्यादा पुरूष राम का दलितों के प्रति व्यवहार और अंधविश्वास भी।
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■■*SITA was 6 years old when She married Rama* ■■

*1.* Here is what Sita says to Ravana in aranya kanda 

*Sita says that when Rama left ayodhya for exile, Rama was 25 years old and sita says she was or is 18 years old* 
मम भर्ता महातेजा वयसा पंच विंशकः ||
अष्टा दश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते |
(Aranya Kanda 47 Sarga 11 sloka)
"My great-resplendent husband was of  twenty-five years of age at that time, and to *me eighteen years* are reckoned up from my birth. "

*.2.* Here is what Sita says to Hanuman
समा द्वादश तत्र अहम् राघवस्य निवेशने || ५-३३-१७
भुन्जाना मानुषान् भोगान् सर्व काम समृद्धिनी | I
ततः त्रयोदशे वर्षे राज्येन इक्ष्वाकु नन्दनम् || ५-३३-१८
अभिषेचयितुम् राजा स उपाध्यायः प्रचक्रमे |
*I stayed in Rama's house there for twelve years*, enjoying the worldly pleasures belonging to human kind and fulfilling all my desires."

ततः त्रयोदशे वर्षे राज्येन इक्ष्वाकु नन्दनम् || ५-३३-१८
अभिषेचयितुम् राजा स उपाध्यायः प्रचक्रमे |
Thereafter, in the thirteenth year, King Dasaratha along with his preceptors started to perform anointment of the kingdom to Rama, a celebrity of Ikshvaku dynasty."

Now if you calculate maths then sita says to ravana she is 18 years and she also says to Hanuman she stayed in Rama s home for 12 years before exile ....  so if this is the case then it  concludes that *Sita was 6 years old when she married Rama*


◆◆ *शादी के समय सीता  की उम्र  6 साल थी जब रामचंद्र ने उससे  सम्भोग की* ◆◆

*1.* *यहा पर सीता जी रावण से कहती हैं जब राम ने वनवास के लिए अयोध्या छोड़ा.
*[ वाल्मीकि रामायण  , अरण्य कांड , ३-४७-१० ]*
[*मम भर्ता महातेजा व्यसा पंच विंशकः ||
अष्टा दश हिंतिनी मम जन्मिनी गण्यते |* ] ।।।
*"बनवास"  के समय  मेरी अठारह वर्ष* मेरी जन्म से ।"

*2* यहां सीता हनुमान से कहती हैं
*[ वाल्मीकि रामायण, सुन्दर काण्ड  ५-३३-१७ ]* 
*सम द्वादश तत्र अहम् राघवस्य निवेशने ||*
*भुन्जाना मानुषांग भोगंग सर्व कार्य समृद्धिनी |* 
*मैं बारह वर्षों तक राम के घर में रहा।*, मानव से संबंधित सांसारिक सुखों का आनंद लेकर और अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करके । "

[ *वाल्मीकि रामायण, सुन्दर काण्ड  ५-३३-१८* ]
*ततः त्रयोदशे वर्षे राज्येन इक्ष्वाकु नन्दनम् ||* 
*अभिषेचयितुम् राजा स उपाध्यायः प्रचक्रमे*  ।।।
*तेरहवें वर्ष में, राजा दशरथ ने* अपने पूर्वजों के साथ मिलकर इक्ष्वाकु वंश की हस्ती राम को राज्य का अभिषेक कराना शुरू किया। ”

अब यदि आप गणित की गणना करते हैं तो सीता रावण से कहती है कि वनवास  के समय उसकी आयु 18 वर्ष है और वह हनुमान से यह भी कहती है कि वह वनवास से पहले 12 वर्षों तक राम के घर में रही थी
इससे  यह सिद्ध है कि शादी के समय लगता है *सीता जी ( 18-12 ) = 6 वर्ष की थी जब राम चंद्र ने उससे सम्भोग कीया*


●● *विवाह के समय सीता जी की आयु 6 वर्ष थी* ●●

*At the time of marriage* ‘सीता की आयु 6 वर्ष थी‘, जो लोग बाल्मीकि रामायण को प्रमाण मानते हैं वे इस तथ्य को झुठला नहीं सकते।-

*दुहिता जनकस्याहं मैथिलस्य महात्मनः।।3*
*।। सीता नाम्नास्मि भद्रं ते रामस्य महिषी प्रिया।।*
‘ब्रह्मन ! आपका भला हो। मैं मिथिलानरेश  जनक की पुत्री और अवध नरेश श्री रामचन्द्र जी की प्यारी रानी हूं। मेरा नाम सीता है‘।।3।।

*उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने ।। 4 ।।*
*भुन्जाना मानुषान् भोगान् सर्वकामसमृद्धिनी ।।*
‘विवाह के बाद बारह वर्षों तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहां सदा मनोवांछित सुख-सुविधाओं से सम्पन्न रही हूं‘।। 4 ।।

*तत्र त्रयोदशे वर्षे राजातन्त्रयत प्रभुः।। 5।।*
*अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमन्त्रिभिः।।*
‘तेरहवें वर्ष के प्रारम्भ में सामर्थ्यशाली महाराज दशरथ ने राजमन्त्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचन्द्र जी का युवराज पद पर अभिषेक करने का निश्चय किया‘ ।। 5 ।।

*मम भर्ता महातेजा वयसा पञ्चविंशकः ।।10।।*
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते ।।
‘उस समय मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था पच्चीस साल से ऊपर की थी और मेरे जन्मकाल से लेकर वनगमनकाल तक मेरी अवस्था वर्ष गणना के अनुसार अठारह साल की हो गयी थी ।।10।।

*(श्रीमद्बाल्मीकीय रामायणे, अरण्यकाण्डे, सप्तचत्वारिंशः सर्गः, पृष्ठ 598 , सं. 2051 तेरहवां संस्करण)*
*(अनुवादक- साहित्याचार्य पाण्डेय पं. रामनारायण दत्त शास्त्री ‘राम‘)*
*(प्रकाशक - गीता प्रेस , गोरखपुर)*

रामचन्द्र जी का असली चरित्र रमणीय और आदर्श ही होना चाहिये, ऐसा मेरा मानना है। बौद्धिक जागरण के इस काल में तर्क को परंपरा का हवाला देकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। रामचन्द्र जी के चरित्र को सामने लाने के लिए देश की रामकथाओं के साथ साथ मलेशिया आदि विदेशों में प्रचलित रामकथाओं पर भी नज़र डालना ज़रूरी है। यदि ऐसा किया जाए तो सच भी सामने आएगा, रामकथा का व्यापक प्रभाव भी नज़र आएगा और हो सकता है कि श्री रामचन्द्र जी का वास्तविक जन्म स्थान वर्तमान अयोध्या के अलावा कोई और जगह निकले, तब राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद भी स्वतः ही हल हो जाएगा। सच से मानवता का कल्याण होगा। सच कड़वा होता है तब भी इसे ग्रहण करना चाहिये क्योंकि सच हितकारी होता है, कल्याणकारी होता है, समस्याओं से मुक्ति देता है।


★★6 साल की उम्र में हुआ था सीता का विवाह, वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड★★

श्रीराम से विवाह के समय सीता की आयु 6 वर्ष थी, इसका प्रमाण वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड में इस प्रसंग से मिलता है। इस प्रसंग में सीता, साधु रूप में आए रावण को अपना परिचय इस प्रकार देती हैं-
श्लोक
उषित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकूणां निवेशने।
भुंजना मानुषान् भोगान् सर्व कामसमृद्धिनी।1।
तत्र त्रयोदशे वर्षे राजामंत्रयत प्रभुः।
अभिषेचयितुं रामं समेतो राजमंत्रिभिः।2।
परिगृह्य तु कैकेयी श्वसुरं सुकृतेन मे।
मम प्रव्राजनं भर्तुर्भरतस्याभिषेचनम्।3।
द्वावयाचत भर्तारं सत्यसंधं नृपोत्तमम्।
मम भर्ता महातेजा वयसा पंचविंशक:।
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मनि गण्यते।।

अर्थ- सीता कहती हैं कि विवाह के बाद 12 वर्ष तक इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ के महल में रहकर मैंने अपने पति के साथ सभी मानवोचित भोग भोगे हैं। मैं वहां सदा मनोवांछित सुख-सुविधाओं से संपन्न रही हूं।
तेरहवे वर्ष के प्रारंभ में महाराज दशरथ ने राजमंत्रियों से मिलकर सलाह की और श्रीरामचंद्रजी का युवराज पद पर अभिषेक करने का निश्चय किया।
तब कैकेयी ने मेरे श्वसुर को शपथ दिलाकर वचनबद्ध कर लिया, फिर दो वर मांगे- मेरे पति (श्रीराम) के लिए वनवास और भरत के लिए राज्याभिषेक।
वनवास के लिए जाते समय मेरे पति की आयु 25  साल थी और मेरे जन्म काल से लेकर वनगमन काल तक मेरी अवस्था वर्ष गणना के अनुसार 18 साल की हो गई थी।

इस प्रसंग से पता चलता है कि विवाह के बाद सीता 12 वर्ष तक अयोध्या में ही रहीं और जब वे वनवास पर जा रहीं थीं, तब उनकी आयु 18 वर्ष थी। इससे स्पष्ट होता है कि विवाह के समय सीता की आयु 6 वर्ष रही होगी। साथ ही यह भी ज्ञात होता है कि श्रीराम और सीता की उम्र में 7 वर्ष का अंतर था।

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■■*चरित्रहीन सीता की अग्नि परिक्षा?* ■■

*( रामायण  , युद्ध कांड  , सर्ग  115 - 118 )*

भगवान्  श्री राम  को पहले तो अपनी  *पत्नी सीता की सतीत्व  पर शक  हुआ  और  सीता को  अग्नि परीक्षा देने के लिए विवश किया, फिर भी इस भगवान राम का शक कम नहीं हुआ और एक धोबी के कहने पर अपनी पत्नी को घर से निकल दिया वो भी तब जब सीता गर्भवती थी। सीता को अग्नि से गुजार दिया*
*फिर भगवान श्री राम ने अपनी चरित्रहीन पत्नी सीता को घर से निकल दिया वो भी तब जब सीता गर्भवती थी।*
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Characterless Seeta

संपूर्ण *रामायण* में मुश्किल से एक शब्द *सीता* की प्रशंसा में लिखा गया है।

1)वह *राम(असली नाम-पुष्यमित्र शुंग=जात ब्राम्हण)* की अपेक्षा आयु में बड़ी है। उसका जन्म संदेह जनक और आपत्ति युक्त था। *(अयोध्या कांड,६६ अध्याय)* 

2) वह कहती है की “मैं धुल में पाई गयी, इसीलिए मेरे माता–पिता के न होने के वजह से बहुत दिनों तक कोई मुझसे प्रेम करने को तैयार न होने के कारन मेरी अवस्था बड़ी हो गयी।

3) विवाह हो जाने के पश्चात कुछ समय बाद वह *भरत* द्वारा अलग कर दी गयी।

4) *राम* ने *सीता* को बताया की *“तुम भारत द्वारा प्रशंसा की पात्र नहीं हो"*। *(अयोध्या कांड, अध्याय)*

5) *सीता* ने *राम* को स्वयं बताया की *“मैं उस भरत के साथ नहीं रहना चाहती ,जो मुझसे घृणा करता है।”*

6) वह अपने पति *राम* को *सिडिं* तथा *मुर्ख* कहा करती थी।

७) वह *राम* से कहती थी की *“तुम मानवीय-गुणों से रहित हो।”*

8) *"तुम आकर्षण-शक्ति तथा हाव-भाव से रहित मनुष्य हो।”*

9) "तुम उस स्त्री व्यापारी से अच्छे नहीं हो, जो अपनी स्त्री को किराये पर उठा कर जीविका चलाता हो, तुम मुझसे लाभ उठाना चाहते हो।” 

10) *सीता* ने यह जानकर की *राम* हमेशा मेरे चरित्र के विषय में संदेह किया करता है। सीता ने कहा *“राम! तुम मुझे बचाने वाले हो, मैं केवल तुम्हारे प्रेम के अतिरिक्त किसी के प्रेम पर विश्वास नहीं करती हूँ, मैंने इस बात को कई बार तुम्हारी शपथ खाकर कहा, तथापि तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते।”*

11) *राम* ने कहा *“मैं तुम्हारी परीक्षा कर चूका हूँ।"*  *(अ.घां.6 से 11 अ.)*

12) *राम* ने *सीता* को ठाठ-बाट और नीचता का स्मरण कर सीता से कहा,की *“तुम्हें अपने आभूषण उतार देने चाहिये,यदि तुम मेरे साथ वनवास चलना चाहती हो।”* *(अयोध्या कांड,30 अध्याय)*

13) *सीता* ने *राम* के कथनानुसार ही किया, किन्तु अन्य आभूषण पहने रही। *(अयोध्या कांड,39 अध्याय)*

14) *कौशल्या* जो की *सीता* के चरित्र को जानती थी, सीता से एक सज्जन तथा सुचरित्रवती महिला की भांति आचरण करने को कहा, *"कभी अपने पति का अपमान न करना।”* सीता ने अपनी सास को असभ्यतापूर्ण उत्तर देते हुये कहा की *“मैं यह सब जानती हूँ“* और उसने अपने आभूषण नहीं उतारे। *(अयोध्या कांड,39 अध्याय)*

15) जब राम और लक्ष्मण *वल्कल वस्त्र (पेड़ों की छाल के कपडे)* धारण किये हुये थे, तब *सीता* ने ऐसे वस्त्र पहनने से इंकार कर दिया। *(अयोध्या कांड, 37 अध्याय)*

16) दूसरी स्त्रियों ने जो *सीता* के वन जाने की अनिच्छा से अवगत थी, सीता के प्रति दयालुता प्रकट की और उसे अपने साथ न ले जाकर यहीं(अयोध्या में) छोड़ देने की *राम* से प्रार्थना की तो भी *राम* ने *सीता* को छाल के कपडे पहनने के लिए बाध्य किया और उसे वन में साथ ले गए ,जैसा की कैकई दूसरी स्त्रियों के विचारों से सहमत न थी। *(अयोध्या कांड,37,38 अध्याय)*

17) तथापि *सीता* ने दिए गए संपूर्ण परामर्श की और ध्यान न दिया। उसने सुंदर वस्त्र और आभूषण पहने। इससे स्पष्ट है की *भरत* सीता से घृणा करता था और यह की कैकई यह न चाहती थी ,की *सीता* अयोध्या में रहे। सीता को वन ले जाने के यही उपरोक्त कारण हैं।

18) वनवास जाते समय नदी(गंगा) पार करते हुये *सीता* ने गंगा नदी से प्रार्थना की थी की, *“हे नदी गंगा! यदि मैं सकुशल अयोध्या लौट आऊंगी, तो मैं तुम्हें हजारों गाय और मदिरा(शराब) से परिपूर्ण बर्तन चढ़ाऊँगी।"* *(अयोध्या कांड,52 अध्याय )*

19) वनवास में जब कभी *सीता* निकट भविष्य के खतरे से भयभीत होती, तो वह मन में कहा करती थी की मेरे दुखों से *कैकई* प्रसन्न और संतुष्ट होती होगी। इस प्रकार वह *कैकई* से अपनी शत्रुता प्रकट करती थी।

20) जब कभी *राम सीता* को न देखकर उदास होता, तो लक्ष्मण कहा करता की *“तुम एक साधारण स्त्री के लिए क्यों परेशान होते हो ?”* *(अयोध्या कांड,66 अध्याय)*

21) *लक्ष्मण* कहा करता था, की *सीता* का चरित्र आपत्ति जनक है। *(आरण्य कांड,18 अध्याय)*

22) *राम* हिरण की खोज में बाहर गया था। *सीता राम* की सहायता के लिए *लक्ष्मण* को तैयार कर रही थी। सीता ने देखा की मुझे अकेला छोड़कर जाने में हिचकिचाता है। तब सीता ने लक्ष्मंपर बुरा प्रभाव डालते हुये कहा की *“राम के जीवन को बचाने में लापरवाही करके मुझे फुसलाने के लिए तुम यहाँ देर कर रहे हो। क्या तुम राम के सच्चे भक्त होकर वन में आये हो(अर्थात नहीं) तुम लुच्चे तथा दगाबांज हो। तुम मेरे साथ भोग विलास करने के उद्देश से राम को मार डालने के लिए आये हो। क्या भरत ने इसी उद्देश से तुम्हें हमलोगों के साथ भेजा है? मैं तुम्हारी तथा भरत की इच्छा को कभी पूरा न होने दूंगी।”*

23) जब *लक्ष्मण* ने *सीता* के प्रति मातृवत सन्मान प्रदर्शित करते हुये सीता से कहा की *“तुम्हें ऐसी निर्लज्जता प्रकट शोभा नहीं देता है।”* तब उसने *लक्ष्मण* से कहा, *“तुम स्वावलंबी हो ,तुम मेरे साथ आनंद करने के लिए मेरे साथ विश्वास-घात करते हो और इस प्रकार तुम मेरे सतीत्व नष्ट करने के लिए अवसर ढूंड रहे हो।”* *(उपरोक्त दोनों संकेत अयोध्या कांड के 45वे अध्याय में देखे जा सकते हैं।)*

24) *रावण* ने *सीता* को ले जाने के उद्देश से उसकी मनोस्थिति को बड़े ध्यान से देखा। उसकी सुंदरता को देख वह उसके ऊपर मोहित हो गया और उसकी और बढ़ा। *वह उसके स्तनों और जादूभरी जाँघों की प्रशंसा करने लगा।* इन सब बातों से सीता की क्या प्रतिक्रिया हुई होगी? क्या सीता ने रावण से घृणा की? क्या उसे अस्वीकार किया? क्या उसने उसे फटकारा? नहीं ,बिलकुल नहीं। *रावण* की इस समय सन्मान पूर्ण आगवानी की(स्वागत किया) बिना अपनी अवस्था अधिक प्रकट किये ,उसने रावण के समक्ष अपने सुंदर यौवन की प्रशंसा की। *(अयोध्या कांड,46 ,47 अध्याय)*

25 ) जब *रावण* ने *सीता* को बताया की *“मैं राक्षसों का प्रधान रावण हूँ ,तब सीता ने उससे घृणा की।”*

26) जब *रावण* उसे अपनी गोड में लिए जा रहा था ,तब वह *अर्धनग्*  थी। तब वह स्वयं अपने *स्तन* खोले हुये थी। *(अयोध्या कांड, 58 अध्याय)*

27) जैसे ही उसने अपने पैर रावण के महल में रखे। *सीता का रावण के प्रति आकर्षण उत्तरोत्तर बढ़ता गया।* *(अयोध्या कांड, 45 अध्याय)*

28) *रावण* ने अपने यहाँ *सीता* से कहा की *“आओ हम दोनों मिलकर आनंद(संभोग) करें।”* तब सीता अद्धोन्मिलित आँखों –युक्त सिसती भरती रही। *(अयोध्या कांड,55 अध्याय)*

29) रावण ने कहा *“हे सीते! हमारा तुम्हारा मिलन ईश्वरकृत है। यह ह्रुषियों की भी माया है।”* *(अयोध्या कांड,55 अध्याय)*

30) सीता ने कहा *“तुम मेरे अंगो का आलिंगन करने के लिए स्वतंत्र हो। मुझे उसकी रक्षा करने की आवश्यकता नहीं। मुझे इस बात का पश्चाताप नहीं की मैंने भूल की है।”* *(अयोध्या कांड,56 अध्याय)* इससे इस परिणाम पर पहुंचा जा सकता है, की सीता ने रावण को अपने साथ दुर्व्यवहार करने की अपनी(स्पष्ट) अनुमति नहीं दी।

31) *राम* ने *सीता* से कहा की रावण ने तुम्हें बिना तुम्हारा सतीत्व नष्ट किये कैसे छोड़ा होगा। *राम* द्वारा इस दोषारोपित सीता ने निम्नांकित उत्तर दिया, जो की उपरोक्त कथन की पुष्टि करते हैं।

32) *सीता* ने उत्तर दिया की *“तुम सत्य कहते हो, किन्तु तुम्ही बताओ, की मैं क्या कर सकती थी? मैं केवल अबला हूँ। मेरा शरीर उसके अधिकार में था। मैंने स्वेच्छा से कोई भूल नहीं की है- तथापि मैं मन से तुम्हारे निकट रही हूँ। ईश्वर की ऐसी ही इच्छा थी ।”* सीता ने केवल इतना ही कहा–किन्तु सीता ने दृढ़तापूर्वक यह नहीं कहा ,की रावण ने मेरा सतीत्व नहीं भंग किया। *(युद्ध कांड,118 अध्याय)*

33) *सीता* का गर्भ देखकर *राम* का संदेह और पुष्ट हो गया। उसने प्रजा द्वारा सीता के प्रति लगाये गए आरोपों की शरण ली और उसे जंगल में छोड़ देने की *लक्ष्मण* को आज्ञा दी, तब *सीता* ने *लक्ष्मण* को अपना पेट दिखाते हुये कहा, *की देखो में गर्भवती हूँ।* *(उत्तर कांड,48 अध्याय)*

34) जंगल में उसने दो पुत्रों को जन्म दिया। *(उत्तर कांड,66 अध्याय)* 

35) अंत में जब *राम* ने इस सम्बन्ध में सीता से शपथ खाने को कहा तो अस्वीकार करते हुये वह मर गयी। *(उत्तर कांड,97 अध्याय)*

36) *रावण* ने *सीता* को सिर झुकाकर बड़े सन्मानपूर्वक अपनी और आकर्षित होने को कहा, *इसका तात्पर्य तह है कि रावण ने सीता के प्रति अपनी किसी शक्ति का प्रयोग नहीं किया बल्कि सीता स्वयं उस पर मोहित हो गयी थी।* सीता ने रावण की विषयेच्छा का स्वयं अनुसरण किया था, रावण पर मोहित न होने की दशा में वह सीता को छु तक नहीं सकता था, क्योंकि रावण को श्राप दिया गया था कि यदि वह किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरूद्ध छुएगा, तो वह भस्म हो जायेगा। *अंत: रावण ने किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध न तो छुआ न कभी छु सकता था*।

37) *रावण* से *सीता* को वापिस प्राप्त करके तथा उसे अपनी स्त्री के रूप में पुनः स्वीकार करके *राम* अयोध्या में राज्य कर रहा था। उसकी *साली “कुकवावती”* ने राम के पास जाकर कहा की, *“श्रेष्ठ! तुम अपने की अपेक्षा सीता को कैसे अधिक प्यार करते हो? मेरे साथ आओ और अपनी प्यारी सीता के ह्रदय की वास्तविकता को देखो वह अब भी रावण को नहीं भूल सकी है, वह रावण के ऐश्वर्य पर गर्व करती हुई, उसका चित्र अपने विजन(पंख) पर बनाये हुये, उसे अपनी छाती पर चिपकाये हुये,अद्धोन्मिलित नेत्र-युक्त अपनी चारपाई पर लेटी हुई है।”* इसी समय राम के *“दुर्मुहा”* नामक एक गुप्तचर ने राम के निकट आकर उसे बताया की, *”रावण के यहाँ से सीता को लाकर पुनः अपनी स्त्री बना लेना प्रजा में तुम्हारी निंदा और उपहास का विषय बना हुआ है।”** यह सुनते ही राम तिलमिला गया और उसे क्रोध आ गया। उस समय *राम* को मन ही मन अपने अपमान और दुःख का अनुभव हुआ, जो की उसके चेहरे से प्रकट होता था। उसने आहे भरी और अपनी साली के साथ सीता के कमरे में गया। राम ने सीता को अपने विजन पर रावण का चित्र बनाये हुये, उसे अपनी छाती पर चिपकाये हुये सोती हुई पाया। *(यह बात “श्रीमती चंद्रावती “द्वारा लिखित बंगाली रामायण”के पृष्ठ 199 और 200 में पाई जाती है।)* घटनाओं के गंभीर अध्ययन से प्रकट होता है ,की राम ने सीता में उसके गर्भवती होने में दोष पाया, राम ने रावण के यहाँ से सीता को वापिस लाकर पुनः उसे अपनी स्त्री के रूप में स्वीकार करके अयोध्या वापस आने के ठीक एक महीने के अंदर, राम द्वारा सीता के गर्भवती होने का समय हो सकता है।

38) *श्री.सी.आर.श्रीनिवास आयंगर* की *“रामायण”पर टिप्पणी“* नामक पुस्तक के अनुसार *राम* ने *सीता* को रंगे हाथ पकड़ लिया था। क्योंकि उसने *रावण* का चित्र खिंचा था।

39) *सीता* ने *रावण* अपनी वास्तविक अवस्था से कम अवस्था बताई थी। वो जब खाना परोसते समय *रावण* से बाते कर रही थी तब वह *13 वर्ष* की थी। उसने पुनः बताया की मेरा विवाह हो जाने के बाद मैं *12 वर्ष तक अयोध्या में रही,* उसने पुनः कहा की *जब मैं वनवास में आई, तब में 18 वर्ष की थी, यह कैसी अनुकूलता???*

40) *रामायण* के अनुसार हम कह सकते हैं, कि *राम* एक अयोग्य व्यक्ति था और *सीता* एक व्यभिचारिणी स्त्री थी। *राम* ने *सीता* को अकेले जंगल में छुड्वाया इसके प्रमाणस्वरूप बहुत से दृष्टांत है। जहाँ तक *सीता* का सम्बन्ध है, *रावण* के साथ अनुचित-संसर्ग करने के कारण धर्म निति के अनुसार पवित्र नहीं थी। यदि *राम कृत्य* उचित मान लिया जाये, तो यह सभी को स्वीकार कर लेना चाहिए, की *सीता रावण द्वारा गर्भवती हुई थी।* यदि यह मानकर,की *सीता* ने कोई नैतिक अपराध नहीं किया था, वह राम के द्वारा गर्भवती हुई थी, *सीता की रक्षा की जाये* –तो यह सभी को स्वीकार कर लेना चाहिए की *राम द्वारा अबोध गर्भवती को जंगल में अकेले छुडवाने का कार्य मानवोचित नहीं है।* *राम ने सीता के गर्भ के विषय में अन्वेषण किया था,* तब ही उसने दुसरे दिन प्रातःकाल उसे जंगल में छुडवा दिया था। ऐसी दशा में यह सिद्ध करना की ना तो *सीता* भ्रष्ट थी और न *राम गुंडा* तथा विश्वास-घाती प्रकट करता है, कि यह भ्रष्टता और नीचता क्षम्य नहीं है। तब यह कथन कैसे सत्य कहा जा सकता है कि *राम ने आर्य (ब्राम्हण) धर्म नित्यानुसार मानव-मात्र को उपदेश देने के हेतु तथा सीता ने स्त्री-मात्र को सदाचरण तथा सतीत्व की शिक्षा देने के निमित्त अवतार लिए।* यदि *ब्राम्हणों* के इस उपदेश का प्रतिपादन करने वाले दृष्टिकोण को अपनाया जाये की राम और सीता ने जो कुछ भी किया था ,वह उचित ही है, *तो क्या यह बेचारे अबोध व बुद्धिहीन मानव-मात्र को पथ-भ्रष्ट करना नहीं है?? सुधारक इस मुर्खता-पूर्व हास्यास्पद मत को कैसे सहन कर सकते हैं??* इन कारणों से हम अधिकार-पूर्वक कह सकते हैं,की *“राम और सीता चरित्र-हिन् थे”*

*[सच्ची रामायण, (लेखक:- पैरियर ई .व्ही रामास्वामी नायकर)]*

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Pornography in Ramayan

Dr. Charles claims that Ramayana contains much pornographic material and cannot be read in public. He gives the following examples: Rama’s description of Sita’s beauty which is lewdly detailed (refer to C.R. Srinivasalyengar’s translation of Aranya Kandam – chapter 46).

In Kiskind Kandam, Rama explains to Lakshmana of his sexual experience with Sita. According to Ramayana, the Aryans (Brahmins) used to drink liquor (nine different kinds), eat meat, marry many wives and prostitution was an accepted way of life amongst the priests and gods.

Ramayana also recounts the “story of King Dasharatha who, in order to have a baby son, made a big sacrifice (yaham) of sheep, cattle, horses, birds and snakes. He then delivered his three wives Kaushaliya, Sumatirai and Kaikeyi to three priests. These holy men, having fully satisfied their carnal desire, returned the ladies to the King. By this means, the King was able to have three sons – Ram, Lakshman and Bharat (Bala Kandam, Chapter 14. For more details on yaham, refer to the book “Gnana Surian”, published by Kudi Arasu Press).

The Ramayan tells us much about the unlawful relationship of incest but we do not feel it appropriate or decent for us to go into details. (Please refer to Aranya Kandam, chapter 45, verses 122, 123, 124 & 125).
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पतत्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा |
*अवसद्रजनीमेकां* कौसल्या धर्मकाम्यया || 
Kausalya desiring the results of ritual disconcertedly *resided one night with that Horse* that flew away like a bird. 
[valmiki ramayana  1-14-34. Translator  Desiraju Hanumanta Rav]

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*ताडन शब्द का सही अर्थ*

*#भुमिका*

तुलसिदास रामायण मे एक *'चौपाई'* है
ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ये सब ताडन के अधिकारी *(सुंदरकांड 61/3)*

इसपर सब आक्षेप लेते है. इसलिए *धर्म* कि इज्जत बचाने के लिए इन्होंने एक युक्ती खोज निकाली *ताडन* शब्द का मनमाना अर्थ लगाकर आम लोगो कि आंखो मे धुल झोंकना। इसलिए व्यापक स्तरपर होने वाले इस दुष्प्रचार का खंडन होना आवश्यक है!

*#आप्टे_कोश* 
आप्टे संस्कृत-हिंदी कोश के अनुसार *ताडन* शब्द का अर्थ है।
1. मारने-पीटने की क्रिया या भाव
2. किसी को दिया जाने वाला दुख या कष्ट
3. किसी को उत्पीड़ित या परेशान करने की क्रिया
4. प्रहार; आघात।

*#नालंदा_विशाल_शब्दसागर*
नालंदा विशाल *शब्द सागर(पृष्ठ 510)* के अनुसार
ताडना(संज्ञा,स्त्री)
1.मार,प्रहार
2.डांट डपर,दंड शासन,धमकी
3.उत्पिडन कष्ट
4. मारपिट कर भगाना
5. कष्ट पहुंचाना

इस से सिद्ध है कि *ताडना शब्द मारने पिटने से हि संबंधीत है.* इसका अगल अर्थ लगाकर सत्य नही बदला जा सकता. क्योंकी *रामचरित्रमानस* मे शुद्र और स्त्रीओ के लिए नफरत अन्य स्थानो पर भी दिखती है.

*#इतर_कांड*

*बालकांड* मे तुलसिदास लिखते है की नारी स्वभाव से ही मुर्ख और नासमज होती है।

*(बालकांड 143/2)*
स्त्री स्वभाव से ही अपवित्र होती है

*(अरण्यकांड 6)*
नारी अवगुणो कि जड पिडा देने वाली और सब दुखों कि खान है

*(अरण्यकांड 55)*
नारी स्वतंत्रता के पात्र नही.

*(किष्किंधाकांड 16/4)*
नारी का ह्रदय कपटों पापों और अवगुणों कि खान है.

*(अयोध्याकांड 162/2)*
*शुद्र द्वेष*

तुलसिदास *शुद्र* जातीओ पर लिखते है की तेली कुंभार श्वपच किरात कलार आदि निच वर्ण है

*(उत्तरकांड 157/3)*
शुद्र यदि गुणवान और ज्ञानी भी हो तो भी उसका पुजन नही करना चाहिए. 

*(अयोध्याकांडा 40/1)*
संसार मे एक ही पुण्य है, मन कर्म वचन से ब्राह्मणों कि पुजा.

*(उत्तरकांड 67/4)*
शुद्र कलियुग मे ब्राह्मणों को उपदेश दे रहे है और जनेऊ पहनकर दान ले रहे है जिसके वे पात्र नही.

*(उत्तरकांड 99(ख) 1)*

*निष्कर्ष*

*ताडना* शब्द का अर्थ बदलने की कोशिश करने वालो का इसपर क्या मत है. *स्त्री शुद्र के बारे मे नफरत तो रामचरित्रमानस मे अन्य स्थानो पर भी है* धर्म की इज्जत बचाने के लिए आप किस किस शब्द का अर्थ बदलोगे?
*ताडना* शब्द का अर्थ बदलने की कोशिश करना मतलब 21 वी सदी मे कालबाह्य धर्मकी इज्जत बचाने कि कोशिश करना है

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रामायण बुद्ध के बाद लिखी गई है यह साफ सिद्ध है :

सम्राट अशोक के शिलालेखों में राम का कोई उल्लेख नहीं है! जबकि रामायण में बुद्ध का वर्णन है ! इससे यह साबित होता है कि रामायण की रचना पुष्यमित्र शुंग के समय से रचनी शुरू हुई. तथा रामायण में बुद्ध के सबूत देखिए, जिनमें बुद्ध के प्रति ईर्ष्या को प्रदर्शित किया गया है — 

“निन्दाम्यहं कर्म पितुः कृतं , तद्धस्तवामगृह्वाद्विप मस्थबुद्धिम्। 
बुद्धयाऽनयैवंविधया चरन्त , सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम्।।”
– अयोध्याकाण्ड, सर्ग – 109. श्लोक : 33
• सरलार्थ :- हे जावाली! मैं अपने पिता (दशरथ) के  इस कार्य की निन्दा करता हूँ कि उन्होने तुम्हारे जैसे वेदमार्ग से भ्रष्ट बुद्धि वाले धर्मच्युत नास्तिक को अपने यहाँ रखा। क्योंकि ‘बुद्ध’ जैसे नास्तिक मार्गी , जो दूसरों को उपदेश देते हुए घूमा-फिरा करते हैं , वे केवल घोर नास्तिक ही नहीं, प्रत्युत धर्ममार्ग से च्युत भी हैं ।

“यथा हि चोरः स, तथा ही बुद्ध स्तथागतं।
नास्तिक मंत्र विद्धि तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानाम् 
स नास्तिकेनाभिमुखो बुद्धः स्यातम् ।।”
— (अयोध्याकांड, सर्ग -109, श्लोक: 34 
•सरलार्थ :- जैसे चोर दंडनीय होता है, इसी प्रकार ‘तथागत बुद्ध’ और और उनके नास्तिक अनुयायी भी दंडनीय है ।

आगे यह भी कि, राम, कृष्ण आदि गढे गये बहुजन पात्रों के मुंह में वर्णाश्रमवाद ब्राह्मणवाद उच-नीचतादि सामाजिक गुनहगारी की बातें, अर बहुजन समाज के मन में जैसे ये अपने आदमी होने का अहंगंड। भ्रमित होना कुदरत को मंजूर नहीं। अंधेरे में भी कांटे पर पांव पडने पर कांटा चुभता है। और चेतना में झूठ प्रोपागंडा के धंसे कांटे तो बड़ा दुख।

अलख संग्यान सूं खोजी बन,
बोधि धरम जन  जाने, जीये।

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तुलसीदास एक वैष्णव ब्राह्मण थे, और जब उन्होने रामचरित मानस लिखा तो वे उसका प्रचार-प्रसार काशी मे भी करना चाहते थे। उन दिनों काशी शैव-ब्राह्मणों का गढ़ था, और शैवों को यह स्वीकार नही था कि कोई वैष्णव आकर यहाँ किसी भी उपास्य को शिव के बराबर या उनसे श्रेष्ठ बताये। जबकि तुलसीदास ने तो मानस मे बड़ी चालाकी से शिव को राम भक्त तक लिख दिया था। एक जगह तुलसीदास लिखते है-

"राम नाम सिव सुमिरन लागे।
जानेहु सती जगतपति जागे।।"
अर्थात- जब शिवजी ने राम-राम कहना शुरू कर दिया, तब सती ने जान लिया कि अब भगवान जाग गये हैं।

यहाँ तुलसीदास बताना चाहते थे कि शिव भी राम नाम का जाप करते थे! तुलसीदास यहीं नही रुके, वे तो कहते थे कि-

"चतुराई चूल्हे गयी, घूरे पड्यो आचार।
तुलसी बिन राम भजन के चारो वरण चमार।।"
अर्थात- जो मानव राम का भजन नही करता, वह चमार के जैसा है, चाहे वह चारों वर्णों मे से जिस भी वर्ण का हो।   बस, तुलसीदास की इन्ही हरकतों से काशी के पंडे नाराज थे, और वे रामचरित मानस को जला देना चाहते थे, तथा तुलसीदास की पिटाई भी करना चाहते थे। 

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■■ *रामायण में अहल्या  के  सतीत्व  लूटने वाले इन्द्र भगवान* ■■

● *वाल्मीकि रामायण (आर्य समाज),बालकाण्ड,सर्ग 23,श्लोक 5*

हे राम! पूर्वकाल मे यह गौतम का आश्रम था। इस आश्रम ने उन्होने बहोत समय  तक अहल्या के साथ तप किया था॥५॥

हे राम! एक दिन गौतम कही दूर निकल गये। गौतम को आश्रम मे अनुपस्थित देखकर इन्द्र गौतम का रूप धारण कर आश्रम मे आये  और अहल्या से बोले-' हे सुंदरी! मै तेरे साथ मैथुन करना चाहता हूँ॥६॥

हे रघुनन्दन! मुनि वेष धारण किये हुए इन्द्र को पहचानकर भी दुष्टा अहल्य ने प्रसन्नतापूर्वक इन्द्र के साथ सम्भोग किया॥७॥ 

हे राम! इस प्रकार अहल्य से समागम करके गौतम के डर से शंकित इन्द्र कोटी से बाहर निकला॥८॥

जैसे ही इन्द्र बाहर निकाला उसने गौतम को कुटी मे प्रवेश करते हुए देखा।गौतम को देखते ही इन्द्र भयभीत हो गया और उसका चेहरा पीला पड़ गया॥ ९॥

गौतम ने इन्द्र को अपना रूप धारण किये हुए देख और उनके मुखमण्डल से असत् कर्म करके आ रहे है़ उन्हे क्रोध मे भरकर यह शाप दिया-॥१०॥

अरे दुष्ट! मेरा रूप धारण करके तूने यह कुकर्म किया है़, अतः तू नपुंसक हो जा॥११॥

इन्द्र को शाप देकर गौतम ने अहल्य को भी शाप दिया-तू कठोर तप करती हुई इस भूमि के ऊपर शयन करती हुई बहोत वर्षो तक यहा निवास कर॥१२॥

यही चीज़ वाल्मीकि रामायण (सनातनीयो कि), बालकाण्ड,सर्ग 48 मे है़।

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अयोद्धया कंहा कंहा है।


न तो "वाल्मिकी रामायाण" और ना गोस्वामी तुलसीदास की लिखी "राम चरित मानस" में कहीं भी "श्रीलंका" का ज़िक्र है बल्कि "लंका" का ज़िक्र है। "रावण की लंका" और दूसरी बात यह कि जो आज वर्तमान श्रीलंका है वह हमेशा से "सीलोन" (अंग्रेजी Ceylon) था, जिसे 1972 में बदलकर "लंका" तथा 1978 में इसके आगे सम्मानसूचक शब्द "श्री" जोड़कर श्रीलंका कर दिया गया। तो "रावण की लंका" यदि "श्रीलंका" को मिलते जुलते नाम के कारण समझा जा रहा है तो गलतफहमी दूर कर लीजिए। 13 लाख साल पहले जन्में त्रेतायुग के राम पर कई देशों का दावा है , जिनका दावा है कि राम उनकी धरती पर जन्म लिए। इंडोनेशिया , नेपाल , पाकिस्तान और थाईलैंड। थाईलैंड की तो अभी तक चली आ रही राजशाही ही राम की वंशज कहलाती है।


इंडोनेशिया :- इंडोनेशिया 90% मुस्लिम जनसंख्या वाला देश है , पर वहाँ के हर एक के लिए "राम" के प्रति सम्मान है। वहाँ राम को लेकर जो पुस्तक पढ़ी जाती है उसे "रामकथा" कहते हैं। साल 1973 में यहां की सरकार ने "अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मलेन" का आयोजन भी किया था। ये अपने आप में काफी अनूठा आयोजन था क्योंकि घोषित रूप से कोई मुस्लिम राष्ट्र पहली बार किसी अन्य धर्म के धर्मग्रन्थ के सम्मान में इस तरह का कोई आयोजन कर रहा था। इंडोनेशिया में आज भी "रामकथा" का इतना गहरा प्रभाव है कि देश के कई इलाकों में रामायण के अवशेष और पत्थरों तक की नक्‍काशी पर रामकथा के चित्र आसानी से मिल जाते हैं"। इंडोनेशिया की मान्यता है कि राम उसकी धरती पर जन्म लिए थे और वह जगह "योग्या" के नाम से स्थित है , योग्या में राम का जन्मस्थान से लेकर पूरा महल मौजूद है। यहां राम कथा को ककनिन, या 'काकावीन रामायण' नाम से जाना जाता है। राम कथा , ककनिन, या ‘काकावीन रामायण’ जिसके रचयि‍ता "कवि योगेश्वर" हैं। इंडोनेशिया की रामायण में नौसेना के अध्यक्ष को "लक्ष्मण" कहा जाता है, जबकि सीता को "सिंता" कहते हैं। हनुमान तो इंडोनेशिया के सर्वाधिक लोकप्रिय पात्र हैं।  हनुमान की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी हर साल इस मुस्लिम आबादी वाले देश के आजादी के जश्न के दिन यानी की 27 दिसंबर को बड़ी तादाद में राजधानी जकार्ता की सड़कों पर युवा हनुमान का वेश धारण कर सरकारी परेड में शामिल होते हैं. बता दें कि हनुमान को इंडोनेशिया में ‘अनोमान’ कहा जाता हैं।


थाईलैंड :- थाईलैंड में एक अयोध्या है जिसे युनेस्को ने असली अयोध्या के रूप में प्रमाणित किया और भारत की अयोध्या का दावा खारिज किया। थाईलैंड की राजधानी बैंकाक से 80 किमी दूर स्थिति यह "अयोध्या" सन 1285 से भी पहले की है इसका सबूत यह है कि वहाँ सन् 1285 ईस्वी में लिखा एक शिलालेख मिला है जो आज भी बैंकाक के राष्ट्रीय संग्राहलय में रखा हुआ है। इसमें राम के जीवन से जुडी घटनाओं और भौगोलिक क्षेत्रों का विवरण मिलता है। आपको संभवतः पता नहीं होगा तो बताता चलूं कि दुनिया में देह व्यापार के सबसे बड़े बाज़ारों में शामिल थाईलैंड में आज भी संवैधानिक रूप में "रामराज्य" है। बौद्ध होने के बावजूद थाईलैंड के लोग वहां अपने राजा को राम का वंशज होने से विष्णु का अवतार मानते हैं , इसलिए, थाईलैंड में एक तरह से राम राज्य है l वहाँ आज भी ‘राम दशम’ का राज है जो अपने आप को भगवान राम का वंशज मानते हैं। "वजीरालंगकोर्न" यानी ‘राम दशम’ 16 अक्टूबर 2017 को 64 वर्ष की आयु में लेकिन अपने पिता की मृत्यु के 50 दिवसीय शोक के बाद 1 दिसंबर 2016 को राजगद्दी पर आसीन हुए थे। थाईलैंड में संवैधानिक लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई थी। थाईलैंड का प्राचीन नाम "सियाम" था ! यह ऐतिहासिक सच है कि सन् 1612 तक सियाम की राजधानी अयोध्या ही थी। लोग इसे वहाँ की भाषा "अयुतथ्या" के नाम से जानते हैं। सन् 1612 ईस्वी में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक शिफ्ट की गई थी। इस स्थान पर "यूनेस्को" के संरक्षण में आज भी पुरातात्विक साक्ष्यों की खोज में खुदाई का काम चल रहा है। इस पुरानी अयोध्या की इमारतों की भव्यता देखने लायक है। भगवान श्री राम से संबंधित इतने भव्य साक्ष्य तो भारत में भी उपलब्ध नहीं है। पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर थाईलेंड(सियाम) में स्थित अयोध्या को ही यूनेस्को ने असली मानते हुए अपनी वैश्विक पैत्रक (Patriarchy) लिस्ट में जगह दी है। इसके लिए जो भारत का दावा था कि असली अयोध्या उसके यहाँ फैजाबाद में स्थित है उसे "यूनेस्को" ने खारिज कर दिया था। थाईलैंड के लोग इसे “महेंद्र अयोध्या” भी कहते है l अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या l थाईलैंड के जितने भी राम (राजा) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं l सनातन धर्म के "भगवान राम" के वंशजों की यह स्थिति है कि उन्हें निजी अथवा सार्वजनिक तौर पर कभी भी विवाद या आलोचना के घेरे में नहीं लाया जा सकता है वे पूजनीय हैं। थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रन्थ "रामायण" है l जिसे थाई भाषा में ‘रामिकिन्ने’ कहते हैं l जिसका अर्थ "राम-कीर्ति" होता है।


नेपाल :- नेपाल के प्रधानमंत्री के अनुसार ओली के अनुसार राम का जन्मस्थान और उनकी अयोध्या नेपाल के वीरभूमि जिले की "थोरी" शहर में है। तो भारत में यह मान्यता पहले से ही है कि सीता जी नेपाल के "जनकपुर" की थीं।  नेपाल में "सीता" का एक महत्व है , वहाँ सीता के "जानकी मंदिर" लगभग हर जगह मिल जाएँगे। यही नहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन मंदिरों में अपनी हर यात्रा में दर्शन भी कर चुके हैं। ओली के दावे का आधार जनकपुर और उससे कुछ दूर बसा "थोरी" शहर है जहाँ रामजन्मस्थान और उनका पूरा महल मौजूद है।


पाकिस्तान :-भारतीय पुरातत्व विभाग के पूर्व अधिकारी "जस्सू राम’ और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अन्य पुरातत्वविदों (एएसआई) के शोध पत्रों का हवाले से यह दावा किया जाता है कि असली अयोध्या पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत (अब खैबर पख्तूनख्वा) के डेरा इस्माइल खान जिले में है।”  वहाँ खुदाई में ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिससे यह दावा किया जाता है कि वहाँ दो अयोध्या है। एक अयोध्या का निर्माण राजा रघु द्वारा करवाया गया था, जो राम के परदादा थे, जबकि दूसरी अयोध्या का निर्माण भगवान राम ने स्वयं करवाया था।   “जस्सू राम" ने ‘एनशियंट जियोग्राफी ऑफ द रामायण’ मे कहा है कि दोनों अयोध्या पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत (अब खैबर पख्तूनख्वा) के डेरा इस्माइल खान जिले में है।”


भारत:- मौजूदा भारत में ही रामजन्मस्थान को लेकर  7 जगह दावे किए जाते हैं ?  बाबरी मस्जिद की जगह मौजूदा बन रहे राम मंदिर में तो 13 लाख साल पहले त्रेतायुग के राम जी कुल 33 साल पहले जन्म लिए थे। खुद भारत की अयोध्या में 6 ऐसे मंदिर हैं जहाँ रामजनस्थान मानकर 1989 के पहले तक पूजा होती रही है उसमें एक तो राजा दशरथ के "कनक महल" में स्थित मंदिर है। एक जन्मस्थान , कुरुक्षेत्र में है और वहाँ भी "राम जन्मस्थान" मंदिर है , वहाँ के लोग इस आधार पर दावा करते हैं कि चुँकि महारानी कौशल्या कुरुक्षेत्र की थीं और पहला बच्चा जन्म देने महिलाएँ मायकें आती थीं इसलिए राम इस स्थान पर जन्में थे।


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Ram's Character

(श्री रामजी अपने पिता राजा दशरथ के बारे में कहते है कि वो स्त्री से मोहित और बूढ़े हो गए है तभी उन्हें वनवास पर भेज रहे है)
[रामायण:2:53:10 & 12]

(श्री रामजी कहते है कि स्त्रियों की बात का विश्वास मत करो और उन्हें कोई राज़ मत बताओ)
[रामायण: 2:100:49]

Sexualtiy and obscene words for women body such as h*ps, thig*s, bre*st , Nip*les are mentioned in Ramayan.
[Valmiki Ramayan:Arnaykand : 3:46:19-20, 35]

कच्चिद्धारयए तात राजा यत्त्वमिहागतः |
कच्चिन्न दीनः सहसा राजा लोकान्तरं गतः || 
[ Ramayana. २-१००-६]
“My dear brother! Is the king alive, that you have come here? I hope the miserable king has not indeed departed to the other world, all of a sudden.”

कच्चित् स्त्रियः सान्त्वयसि कच्चित् ताः च सुरक्षिताः |
कच्चिन् न श्रद्दधास्य आसाम् कच्चिद् गुह्यम् न भाषसे || 
[ Ramayana २-१००-४९]
“I hope you are pacifying the women well. Are they protected by you? I hope you are not believing the words of these women and not telling them the secrets.”

आयः ते विपुलः कच्चित् कच्चिद् अल्पतरो व्ययः |
अपात्रेषु न ते कच्चित् कोशो गग्च्छति राघव ||
[ Ramayana २-१००-५४]
“I hope your income is abundant and expenditure, minimum. I hope your treasure does not reach undeserving people, Bharata!”

Idam vyasanam aalokya raaj~naH ca mati vibhramam |
kaamaeva ardha dharmaabhyaam gariiyaan iti me matiH || [Ramayana  2-53-9]
“Reflecting on this misfortune of the king and his mental derangement, I deem that passion alone is greater than early gain and religious merit.”

Ko hi avidvaan api pumaan pramadaayaaH kR^ite tyajet |
chanda anuvartinam putram taataH maam iva lakSmaNa || [ Ramayana 2-53-10]
“what man however deluded, what father on account of a woman, at his own will and pleasure, abandon a son like myself?

Artha dharmau parityajya yaH kaamam anuvartate |
evam aapadyate kSipram raajaa dasharatho yathaa || 
[ Ramayana 2-53-13]
“He who pursues sensuous pleasures neglecting his real interests and discipline soon comes to distress; in the same way as king Dasaratha has.”

(What does Seeta think of Rama, when Ravana is describing the worthless Rama to Seeta ?)

Na deveSu na yakSeSu na ga.ndharveSu na R^iSiSu |
aham pashyaami lokeSu yo me viirya samo bhavet || 3-55-20
“I behold none matchable to my vitality is existent among gods; among yaksha-s – no; among gandharva-s – no; among sages – no, nor anyone in any world. [Ramayan 3-55-20]

Raajya bhraSTena diinena taapasena padaatinaa |
kim kariSyasi raameNa maanuSeNa alpa tejasaa || 3-55-21
“What can you achieve with that dethroned, hapless, seer, vagrant Rama who is short-lived, for after all, he is a human with littlest vitality? [Ramayan 3-55-21]

Sthaapayitvaa priyam putram raaj~naa dasharathena yaH
|manda viiryaH suto jyeSThaH tataH prasthaapito vanam || 
“Though Rama is the eldest son, king Dasharatha established his dear son Bharata as king, and because Rama is spineless he is put to flight to forests, and now, what is he and what am I, in matter of sovereignty. [Ramayan 3-48-15]

Tena kim bhraSTa raajyena raameNa gata cetasaa |
kariSyasi vishaalaakSi taapasena tapasvinaa || 3-48-16
“Rama is subverted from kingdom, thus dwindled is valour, thus winded down is his anima, thus he has become a pitiable one, thus he became an ascetic as nothing else is there for him to undertake, oh, broad-eyed lady, what do you aspire to do with such a Rama? [Ramayan 3-48-16]

(Seeta was a lonely, frustrated Nepalian woman.)

ईदृशम् गर्हितम् कर्म कथम् कृत्वा न लज्जसे |
स्त्रियाः च हरणम् नीच रहिते च परस्य च || ३-५३-७
“A woman, that too a lonely one, that too the other man’s wife, that too an abduction, but not winning or wooing her… you knave, on your undertaking such a kind of deplorable deed, how unashamed are you? [Ramayan 3-53-7]
(Note – SEETA MAIYA DID NOT SAY THAT SHE WAS ALONE. SHE SAID SHE WAS LONELY)

(Ravana touched Seeta with intent of lust. He described Seeta’s body. People say that Ravana DID NOT TOUCH THE BODY OF SEETA.  Ravana touched her body, waist and thighs. 
It is said that if Ravana touched any woman with intent of lust, he would die. RAVANA DID NOT DIE ! WHICH MAY MEAN THAT SEETA MAIYA WENT WITH RAVANA WILLINGLY?)

ताम् अकामाम् स काम आर्तः पन्नग इन्द्र वधूम् इव |
विवेष्टमानाम् आदाय उत्पपात अथ रावणः || ३-४९-२२
Ravana who is “infatuated with lust” picked her up, which lady is disinclined for any kind of sensuality and who is verily writhing like the wife of King Cobra, and then he surged skyward and flew off with her in his air-chariot.
[Ramayan 3-49-22]

वामेन सीताम् पद्माक्षीम् मूर्धजेषु करेण सः |
ऊर्वोः तु दक्षिणेन एव परिजग्राह पाणिना || ३-४९-१७
He that Ravana grabbed the lotus-eyed Seetha on lifting her up with his left hand at her plait of hair at nape, and with his right hand at her thighs. [Ramayan 3-49-17]

ततः ताम् परुषैः वाक्यैः अभितर्ज्य महास्वनः |
अंकेन आदाय वैदेहीम् रथम् आरोपयत् तदा || ३-४९-२०
Then he whose voice is strident that Ravana lifted her up by her waist and got Vaidehi up on the air-chariot intimidating her with bitter words. [Ramayan 3-49-20]

(Rama's mother had intercourse with a Horse.)

होता अध्वर्युः तथ उद्गाता हस्तेन समयोजयन् |
महिष्या परिवृत्त्या अथ वावाताम् अपराम् तथा || १-१४-३५
Queen Kausalya desiring the results of ritual disconcertedly resided one night with that horse that flew away like a bird. [Ramayana: 1-14-34]

(Hanuman describes Rama to Seeta Chammiya in Chapter 35 of Sundara Kandam)

“His wrists, Fists and Chest are strong; his eyebrows, arms and foot are long. his knees, foot , hair ends are even; testicles; stomach and chest are elevated; his forehand, foot,eyecorners are red; lines on his soles, hair in the head and tip of his penis is smooth.”
“He has 3 folds in neck and belly. his nipples, soles, lines on the soles are depressed. He has a foot which does not show off the nerves, hair roots with single hair, small membrame virile, a navel without any flesh and a round head.

Reference:

[https://sundaragandam.wordpress.com/2012/07/08/chapter-35hanuman-describing-the-qualities-of-rama-continued/]

[WW]

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