【गणेश (गणपति) की वास्तविकता , ईश्वर का ही नाम 】
जिस प्रकार समय-समय पर परमपिता परमेश्वर की शिक्षाओं के साथ धर्म के ठेकेदारों ने अपनी अज्ञानता अभिधा एवं झूठे कहानी किस्सों का समावेश कर दिया उसी प्रकार उसने ईश्वर के सत्य स्वरूप को भी बिगाड़ कर प्रस्तुत किया अतः ब्रह्मा विष्णु महेश आदि ईश्वर के वास्तविक सत्य स्वरूप का नाम है उसे अपनी कल्पना अनुसार आकार देकर मूर्ति पूजा आदि में लगा दिया ठीक इसी प्रकार पौराणिक पंडितों द्वारा ईश्वर के सत्य स्वरूप गणेश को भी बदल कर एक हाथी की सूंड वाले विचित्र व्यक्ति को भगवान के रूप में प्रस्तुत किया और उनसे तरह-तरह की पौराणिक कथाएं को जोड़ दिया आज इसकी वास्तविकता पर प्रकाश डाला जाएगा।
{वेदों के अनुसार गणेश(गणपति) का वास्तविक स्वरूप }
वेदों में एक ईश्वर के अनेक नाम बताये गए है। ईश्वर का हर नाम ईश्वर के गुण का प्रतिपादन करता हैं। ईश्वर के असंख्य गुण होने के कारण असंख्य नाम हैं । शिव, शंकर, गणेश, महादेव, शक्ति, भगवान आदि सब नाम एक ही ईश्वर के हैं। मुख्य नाम "ओ३म्" है।
*सर्वव्यापक,सर्वनियन्ता ईश्वर का "गणेश वा गणपति" नाम इसलिए है कि वह गणों अर्थात् समूहों का ईश अर्थात् स्वामी(पति) है।*
*इस संसार में आँखों से दिखाई पड़ने वाले और न पड़ने वाले जड़ -चेतन पदार्थों व प्राणियों के समूहों का एकमात्र स्वामी वही ईश्वर है अन्य कोई नहीं !*
*उसी एकमात्र निराकार परमात्मा के गुणवाचक नाम गणेश (गणपति) का उल्लेख ऋग्वेद और यजुर्वेद में है -*
ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे क॒विं क॑वी॒नामु॑प॒मश्र॑वस्तमम् ।* *ज्ये॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पत॒ आ न॑: शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑: सीद॒ साद॑नम्॥ ऋग्वेद 2.23.1(ऋषि- प्रजापतिः देवता-गणपतिः, छन्द- शक्वरी जगती, गायन स्वर- निषादः) इस मंत्र में परमेश्वर का वर्णन है ।
*भावार्थ:-* हे मनुष्यों ! जैसे विद्वान लोग सबके अधिपति, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अन्तर्यामी परमेश्वर की उपासना करते हैं वैसे तुम भी सब गणों के स्वामी परमेश्वर की उपासना किया करो।
ग॒णानां॑ त्वा ग॒णप॑तिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधिनां त्वा निधिपतिं हवामहे। वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्॥ -यजुर्वेद 23.19
पदार्थ: (ग॒णानां॑) समूहों के बीच, (ग॒णप॑तिं) समूहपालक, (त्वा) आपको, (हवामहे) स्वीकार करते हैं, (प्रियाणां) अतिप्रिय सुन्दरों के बीच, (प्रियपतिं) अतिप्रिय सुन्दरों के पालक, (त्वा) आपकी, (हवामहे) प्रशंसा करते हैं, (निधिनां) विद्या आदि पदार्थों की पुष्टि करने वालों के बीच, (निधिपतिं) विद्या आदि पदार्थों के रक्षक, (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते हैं, (वसो) आपमें सब प्राणी वसते हैं, अतः आप (मम) मेरे हो जाईये। (गर्भधमा) जिस जगत को गर्भ के समान धारण करने वाले (त्वम्) आप (अजासि) जन्म से रहित हैं, उस (गर्भधम्) प्रकृति के धारणकर्त्ता आपको, (अहम्) मैं ,(आ) अच्छे प्रकार से (अजानि) जानूँ।
*भावार्थ:-* हे परमपिता परमात्मा आप समस्त समूहों के राजा हैं हम आपकी प्रजा हैं इसलिए मैं आपको गणपति अर्थात् गणेश नाम से पुकार रहा हूँ आप प्रिय पदार्थों के पति हैं, आप समस्त धन सम्पत्तियों, खजानों आदि के स्वामी हैं, आप मेरे अर्थात् हम सबको वसाने वाले वसु हैं, आप जन्म आदि दोष से रहित हैं, मैं अपनी अविद्या को दूर फेंक दूँ। हे प्रभु मैं समस्त प्रकृति को गर्भ में रखने वाले आप को जान सकूँ। ऐसी आपसे विनम्र प्रार्थना है।
*वेद के जिस मंत्र में ईश्वर का नाम गणपति बताया है, उसी में उसे अजन्मा भी बताया है।आदरणीय सज्जनों हम पूरी विनम्रता पूर्वक प्रश्न करते है की क्या पुराणों में जन्म लेने वाला गणपति क्या वही वेद वाला अजन्मा गणपति है?*
*निःसंदेह नहीं। अतः आप जिस की पूजा कर रहे है वह वेद में बताया ईश्वर नहीं है।*
*पुराणों और वेद के ऐसे ही विरोधाभास के बीच हमने वेद को सत्य और पुराणों को काल्पनिक माना है । आप किसे मानते है किसे नहीं , यह निर्णय आप करें !!!*
*अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह शौच सन्तोष तप स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान आदि यम नियमों का पालन करते हुये परमात्मा का नित्य ध्यान करना और वेदों में वर्णित परमात्मा की आज्ञाओं का पालन करना ही सच्ची गणेश पूजा है । आर्ष ग्रन्थों में "ओ३म्" तथा "अथ" शब्द से मंगलाचरण होता है न कि श्री गणेशाय नमः से । वेद मंत्रों के पाठ व यज्ञ से हर कार्य का शुभारंभ करना चाहिये । पुजारी लोग जो गणेश पूजा करवाते हैं वह मात्र एक ढकोसला है, धन प्राप्ति का साधन है ।*
नोट:- इसके अतिरिक्त जो कुछ भी गणेश के नाम पर पेश किया जाता है वह सब काल्पनिक एवं पौराणिक है जिसमें एक सूट वाले पेट निकले हुए विचित्र व्यक्ति को जन्म दिया है।
(अहसान फिरोज़ाबादी)
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*आर्यो की किताब वैदिक गणपति में है ये सवाल*
*प्रश्न 1. क्या माता पार्वती जी प्रतिदिन नहाती थीं या कभी-कभी? यदि प्रतिदिन नहाती थीं तो घर की रखवाली कौन करता था और यदि कभी-कभी नहाती थीं तो वह भगवान् शिव की पत्नी कैसे हो सकती थीं क्योंकि भगवान् की पत्नी होकर कभी-कभी नहाना उचित नहीं लगता।*
*प्रश्न 2. क्या माताश्री, भगवान शिवशंकर के घर से बाहर जाने के बाद ही नहाती थीं? यदि हाँ तो शिवजी कहाँ जाते थे? यदि कहो कि वे ध्यान करने कहीं दूसरे स्थान पर जाते थे तो क्या उनका ध्यान घर पर नहीं लगता था? वे किसी का ध्यान करते थे? हिन्दू भाई शिव-शंकर को ही सदाशिव अर्थात् ईश्वर मानते हैं क्या ईश्वर किसी दूसरे ईश्वर का ध्यान करता है? ईश्वर एक है या अनेक?*
*प्रश्न 3. माता पार्वती इस से पहले भी नहायी होंगी तो उन्होंने इसी प्रकार से अपने कान की मैल से बच्चों को उत्पन्न किया था यदि हाँ तो उनके नाम कौन से हैं और उनका वर्णन किस पुराण में है ?इसी से प्रमाणित होता है कि शिव पुराण की यह कथा दन्तकथा है जिसका कोई आधार या प्रमाण नहीं होता।*
*प्रश्न 4. क्या माता जी के शरीर पर इतना उबटन लगा था। कि एक बच्चे का पिण्ड बन सकता था? यह भी कल्पित है। मनुष्य का कान इतना छोटा और उसमें इतनी अधिक मैल होना यह मेल नहीं खाता।*
*प्रश्न 5. क्या कैलास पर्वत में अनेक लोगों का आना-जाना था कि घर की देख-भाल के लिये एक पहरेदार की आवश्यकता पड़ती थी? पहरेदार की आवश्यकता तभी पड़ती है जब कोई बिना पछे घर में घुस आता है या फिर घर के द्वार पर ताला नहीं होता। भगवान शिव के घर पहरेदार की आवश्यकता क्योंकर पड़ी? वैसे भी भगवान कहाने वाले मनुष्य ही होते हैं, ईश्वर नहीं।*
*प्रश्न 6. क्या माता जी अपनी सहेलियों के संग करोडों वर्ष तक नहाती रहीं और किसी को भी ठंड नहीं लगी? कैलास पर्वत सदा बर्फ से ढका रहता है और वहाँ लम्बे काल तक नहाया नहीं जा सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि जिस व्यक्ति ने 'शिव पुराण' लिखा होगा वह अवश्य ही किसी रेगिस्तान का निवासी रहा होगा क्योंकि न तो उसे कैलास पर्वत के बारे में कोई ज्ञान रहा होगा, न ही वह बफ़ीले स्थान के विषय में कुछ जानता होगा। नहीं तो वह इस प्रकार का वर्णन नहीं करता, मैदानी इलाकों का होता है। लगता है (शिव पुराण)'की कहानी काल्पनिक है, या जिसने भी लिखी है, हमारी सनातन संस्कृति का मज़ाक उड़ाने के लिये ही लिखी है वरना 'शिव पुराण' में इतने सारे गपोड़े नहीं होते।जैसा*
*प्रश्न 7. घर के बाहर अनेकों वर्षों तक घमासान युद्ध चलता रहा और उसकी आवाज माता जी को सुनाई नहीं दी? या उनके कानों में इतनी मैल जम जाती थी कि उसे युद्ध की आवाज़ बिल्कुल सुनाई नहीं दी? लगता है माता पार्वती ने नहाने में ही बिताया होगा पूरा जीवन*
*प्रश्न 8. क्या गणेश जी बिना खाए-पीये इतने लम्बे समय तक लड़ते रहे और बच्चे के बच्चे ही रहे? (बालक गणेश इतने वर्षों तक लड़ता रहा और उसकी आयु उतनी ही रही) सम्भव है?*
*प्रश्न 9. क्या त्रिलोकी नाथ शंकर भगवान को मालूम ही कैसे नहीं पड़ा कि वह उनका ( पार्वती) पुत्र है? यदि मालूम नहीं पड़ा तो वे कैसे 'त्रिलोकी नाथ'-तीनों लोकों के स्वामी-कहाते हैं?*
*प्रश्न 10. समस्त संसार का संहार करने वाला शिव-शंकर एक नन्हे बालक 'गणेश' से युद्ध में परास्त हो गया भगवान और अपनी जान बचाने के लिये उसे 'ब्रह्मा' और 'विष्णु' तथा उनकी सेना की सहायता मॉँगनी पड़ी? (सब का संहार करने वाला 'शिव' जिसका दूसरा नाम 'महेश' भी है, वह एक बालक से लड़ नहीं पाया! कैसी अनहोनी बात है?)*
*प्रश्न 11. क्या गणेश इतना. शक्तिशाली था कि उसके समक्ष 'ब्रह्मा', 'विष्णु', और स्वयं महेश' (शिवजी ) तीनों तथा उनकी समस्त सेना भी मुकाबला नहीं कर पाईं? (यह तीनों के लिये अपमानजनक बात लगती है जो असम्भव है।)*
*प्रश्न 12. जिस शंकर भगवान् के क्रोधित होने पर पुरा ब्रह्माण्ड थर-थर काँपता है, वह ब्रह्मा और विष्णु के कहने पर छल-कपट से गणेश को मृत्यु के घाट उतारता है ऐसा अनुचित कर्म एक योगी के लिये कहाँ तक उचित है? क्या भगवान् भी किसी बेकुसूर प्राणी की धोखे से हत्या करता है?यदि हत्या करता है तो वह भगवान कहाने योग्य नहीं हो सकता! है न?*
*प्रश्न 13. पार्वती की माँग पर शिवजी ने अपनी सेनाओं को गणेश जी के कटे सिर को ढूँढ़ने का आदेश दिया परन्तु कटा सिर नहीं मिला। (क्या तीनों लोकों के नाथ 'त्रिलोकी नाथ' को भी मालूम नहीं पड़ा कि सिर कट कर कहाँ गिरा था?)*
*प्रश्न 14. माता पार्वती की ज़िद्द पर शिवजी ने गणेश को फिर से जीवित किया और चूँकि बालक गणेश का कटा हुआ सिर बहुत ढूँढ़ने पर भी नहीं मिला और उसके स्थान पर एक हथिनी के नवजात शिशु का सिर काटकर लगाया गया और वह बालक 'गणपति' के नाम से प्रसिद्ध हो गया| यहाँ अनेक शंकाएँ उत्पन होती हैं: 1. एक बालक के कटे धड पर हथिनी के नवजात शिशु का सिर किसने लगाया अर्थात वह शल्यक्रिया किस वैद्य या डॉक्टर ने की थी? 2. आप ही बताएँ कि क्या किसी हाथी का सिर एक मनुष्य के बच्चे की गर्दन पर लगाया जा सकता है? नहीं 3.मान लो कि वह सम्भव हो भी गया तो हाथी के सूंड वाले सिर का मुँह ऊपर आकाश की ओर होना चाहिये, परन्तु जब हम लोक में गणपति की तस्वीर को देखते हैं तो उसमें वह सामने की ओर है जो एक हास्यास्पद अनहोनी कथा है।*
*प्रश्न 15. मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों का केन्द्र मस्तिष्क होता है। हाथी के मस्तिष्क में पशुओं की ज्ञानेन्द्रियाँ होंगी तो गणपति का स्वभाव कैसा होना चाहिये? सिर पशु का और धड़ मनुष्य का हो ऐसा प्राणी न कभी हुआ है, और न ही कभी हो सकता है !प्रकृति नियम के विरुद्ध होने से गणपति की प्रतिमा मात्र काल्पनिक है जिससे अनेक बातें सीखी जा सकती हैं । इससे यही प्रमाणित होता है कि पुराणों में अनेक घटनायें मिश्रित हैं ।*
*प्रश्न 16. शाकाहारी पशु मात्र घास, हरी सब्जियाँ अथवा फल फूल ही खाता है परन्तु हमारे गणपति महाराज मात्र मोदक (लड्डू) ही क्यों खाना पसन्द करते हैं? (इसका सरल समाधान है कि जो मिष्टान्न पण्डितों को प्रिय लगता है, गणपति को भी उसी का भोग करने-कराने का ढोंग करते हैं। इसी भोग के बहाने पण्डितों का पेट भरता है। क्यों न हो, पाषाण (मिट्टी की) होने के कारण, प्रतिमा किसी भी पदार्थ का भोग नहीं लगा सकती है खाना-पीना जीवितों के लिये सम्भव है जड़ मूर्तियों के लिए नही*
*प्रश्न 17. कोई भी बुद्धिजीवी मनुष्य रोज मर्रा की सवारी के लिये तेज़ रफ्तार वाला वाहन रखना चाहता है परन्तु श्री गणेश जी ने अपना वाहन एक मूषक ( चूहे) को चुना। भला एक छोटा सा प्राणी को कैसे उठा कर भाग सकता है? वास्तव में मूषक किसी भी सवारी के काम नहीं आता चूहा इतनी भारी काया वाले श्री गणेश जी*
*प्रश्न 18. थोड़ा सा विचारिये कि क्या बैल (शिवजी की सवारी),शेर (माता पार्वती की सवारी) और चूहा (गणेश जी की सवारी)तीनों एक ही घर में एक साथ रह सकते हैं? क्या हमारे पूज्यनीय देवी-देवताओं को और कोई सवारी नहीं मिली ?*
*प्रश्न 19. कैलास पर्वत पर इतनी कड़ाके की सर्दी में क्या ऐसी तीनों सवारियाँ रह सकती हैं? उनकी खुराक क्या होगी तथा कहाँ से आती होगी?*
*प्रश्न 20. पहरे के लिये गणेश को बनाने की क्या आवश्यकता थी, घर में शिवजी का न्दी बैल और माता जी का शेर तो पहले से ही विद्यमान था। है ना ?*
*प्रश्न 21. हाथी का शरीर काला होता है परन्तु गणपति का मुँह और शरीर के सब अंग गोरे रंग के होते हैं, भला यह कैसा रहस्य है? ऐसे अनेक प्रश्न हो सकते हैं जिनका उत्तर सभी जानना चाहेंगे। संक्षेप में गणपति जी की काल्पनिक प्रतिमा से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण रहस्यों की जानकारी प्रस्तुत करते हैं।*
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Trinity and Deities
The Vedas as rightly said do not mention the Trinity Brahma , Vishnu And Shiva as much as the other deities as Indra, Varuna , Agni. Shiva is not mentioned at all, excepting in Sri Rudram as Sivaaya Ca, Sivadharaya ca. No mention of Brahma either. But we have references to Vishnu and Narayana as Narayna Suktham ,Vishnu Suktham. Devis Lakshmi and Durga are mentioned , Sri Suktham and Durga Suktham. Vishnu is mentioned six times, in the Rig Veda. Ganapati Upanishad is found in the Atharva Veda. Vedas speak of Para Brahmanas Nirguna, with out Attributes. Saguna, Gods with attributes were limited to what we now consider as minor deities, like Indra, Varuna and the others.
Deities mentioned in the Rig Veda.Numbers indicate the number of times the Gods were mentioned. Indra 289, Agni 218, Soma 123 (most of them in the Soma Mandala), The Asvins 56, Varuna 46 [1], the Maruts 38, Mitra 28[1], Ushas 21, Vayu (Wind) 12, Savitr 11, the Rbhus 11, Pushan 10, the Apris 9, Brhaspati 8, Surya (Sun) 8, Dyaus and Prithivi (Heaven and Earth) 6, plus 5.84 dedicated to Earth alone, Apas (Waters) 6, Adityas 6, Vishnu 6, Brahmanaspati 6, Rudra 5, Dadhikras 4, the Sarasvati River / Sarasvati 3, Yama, Parjanya (Rain) 3,.Vāc (Speech) 2 (mentioned 130 times, deified e.g. in 10.125), Vastospati 2, Vishvakarman 2, Manyu 2, Kapinjala (the Heathcock, a form of Indra) 2,
Minor deities (one single or no dedicated hymn)..
Manas (Thought), prominent concept, deified in 10.58, Dakshina (Reward for priests and poets), prominent concept, deified in 10.107, Jnanam (Knowledge), prominent concept, deified in 10.71, Purusha (“Cosmic Man” of the Purusha sukta 10.90), Aditi, Bhaga, Vasukra, Atri, Apam Napat, Ksetrapati, Ghrta, Nirrti, Asamati, Urvasi, Pururavas, Vena, Aranyani, Mayabheda, Tarksya, Tvastar.
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मनु-महाराज (नुह व नुहा अ०) ने बताए धर्म के *10* लक्षण।।
"आर्य समाज व हिन्दू अक्सर" मुसलमानो से ये कहते हुए दिखेंगे की इस्लाम को धर्म या क़ुरआन को धर्मिक पुस्तक सिद्ध कर के कोई बता दे।
बहरहाल मनु जी ने धर्म के जो 10 लक्षण गिनवाए है वो किसी खास धर्म के ऊपर ही आधारित नही है बल्कि जिस पंत में भी ये 10 लक्षण पाएं जाएंगे उसका वो हिस्सा धर्म है। बाकी अधर्म है या नहीं ये एक अलग बहस है क्योंकि हमारा मानना ये है कि ईश्वरीय शिक्षा में बदलते हुए दौरों में मिलावट हुई है, इसलिए धर्म के कई हिस्से उन मिलावटो की वजह से खो गई अब अगर कोई असल धर्म की शिक्षा है तो वो सिर्फ क़ुरआन है जो बात उससे टकराए वो अधर्म है और जो उससे मिले वही धर्म है। मनु ने धर्म के 10 लक्षण जो गिनवाए है वो क्या है उसे देखे और अपने इल्म में इज़ाफ़ा करें।
।।धर्म के दस लक्षण।।
मनु-महाराज जी के अनुसार इस्लाम धर्म व क़ुरआन धर्मिक पुस्तक सिद्ध हुई ।।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः ।धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।6/92
(आर्ष भाष्य)
धर्म के दश लक्षण -
1.पहिला लक्षण - धृति (धैर्य) " धैर्य का अर्थ है किसी खुशी, मुसीबत, दुःख और परेशानी आदि के वक्त में खुद को काबू में रखना।
" ऐ नबी (सल्ल०) धैर्य से काम किए जाइये, और तुम्हारा यह धैर्य अल्लाह ही कि तौफीक (अता) से है, उनलोगों (दुष्टों) की हरकतों पर रंग व ग़म मत करो और न ही उनकी चालबाजियों पर दिल तंग हो-क़ुरआन 16:128।
"ऐ लोगो जो ईमान ले आये है (अर्थात मुसलमानो), धैर्य और नमाज़ से मदद लो, अल्लाह धैर्य रखने वालों के साथ है-क़ुरआन 2:153।
"तुम धैर्य और धर्म-परायणता की नीति पर जमे रहो तो ये बहुत ही साहस का काम है- क़ुरआन 3:186।
"और धैर्य से काम लो, यकीन्न अल्लाह धैर्य रखनेवालों के साथ है-क़ुरआन 8:46।
"धैर्यवानो को अल्लाह पसन्द करता है-क़ुरआन 3:146।
"जो भी मुसीबत उनपर आती है उसपर धैर्य से काम लेते है-क़ुरआन 22:35।"
2. दूसरा लक्षण - (क्षमा) क्षमा का अर्थ है किसी के द्वारा किये गये अपराध या गलती पर स्वेच्छा से उसके प्रति भेदभाव और क्रोध को समाप्त कर देना।
"जो लोग अपने माल अल्लाह के मार्ग में खर्च करते है और खर्च करके फिर एहसान नही जताते, न दुःख देते है, उनका बदला उनके रब के पास है और उनके लिए किसी रंज और ख़ौफ़ का मौका नहीं, एक मीठा बोल और किसी अप्रिय बातों पर तनिक आंख बचा जाना (अर्थात क्षमा कर जाना) उस दान से अच्छा है जिसके पीछे दुःख हो। बेसक अल्लाह निस्पृह है और सहनशीलता उसका गुण है-क़ुरआन 2:262-263।
"तुममे से जो लोग वैभववान है और सामर्थ्यवान है वे इस बात की कसम न खा बैठे कि अपने नातेदार, मोहताज और अल्लाह की राह में घर-बार छोड़नेवाले की मदद न करेंगे। उन्हें क्षमा कर देना चाहिए और दरगुज़र कर देना चाहिए। क्या तुम नहीं चाहते कि अल्लाह तुम्हे क्षमा करें ? और अल्लाह का गुण यह है कि वह क्षमाशील और दयावान है-क़ुरआन 24:22।
"बुराई का बदला वैसे ही बुराई है (अर्थात बुरा चीज़ बुरा ही ठहरता है)। फिर जो उसे क्षमा कर दें, और (उसकी) सुधार करें उसका बदला अल्लाह के जिम्मे हैं, अल्लाह ज़ालिमों को पसन्द नही करता- क़ुरआन 42:40।
3. तीसरा लक्षण- दम (नफ़्स को काबू रखना अर्थात बुराई से बचना)
दम का अर्थ है मन को सदा धर्म में प्रवृत्त कर अधर्म से रोक देना अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न उठे।
"तिलावत (पढ़ा) करो उस किताब को जो तुम्हारी ओर वह्य (प्रकाशना) के द्वारा भेजी गई है और नमाज़ कायम करो, यक़ीनन नमाज़ अश्लील और बुरे कामों से रोकती है और अल्लाह का जिक्र इससे भी ज्यादा बड़ी चीज़ हैं-क़ुरआन 29:45।
"नमाज़ कायम करो, नेकी का आदेश दो, बुराई से रोको, और जो मुसीबत भी पड़े उसपर धैर्य रखो, ये वो बाते है जिनपर तुम्हें बड़ी ताकीद (चोकन्य) रहने को कही गई है-क़ुरआन 31:17।
"जो लोग ईमान ले आए, और अच्छे काम करने लगे उन्होंने पहले जो कुछ खाया-पिया उसपर कोई पकड़ न होगी, शर्त यह है कि वे आगे उन चीज़ों से बचे रहे जो अवैध ठहराई गई हैं, और ईमानदारी पर जमे रहे और अच्छे काम करें, फिर जिस-जिस चीज़ से रोका जाए, उससे रुके रहें, और जो ईश्वरीय आदेश (अर्थात धर्म) हो उसे माने, फिर अल्लाह से डरते हुए अच्छी नीति अपनाएं तो अल्लाह ऐसे अच्छे चरित्रवालों को पसन्द करता है-क़ुरआन 5:93।
4. चैथा लक्षण- अस्तेय (चोरी न करना) अस्तेय का अर्थ है बिना आज्ञा वा छल - कपट, विश्वास - घात वा किसी व्यवहार तथा विरूद्ध उपदेश से पर-पदार्थ का ग्रहण करना, चोरी और इसको छोड देना साहुकारी कहाती है।
"ऐ ईमान वालों, जानते-बुझते अल्लाह और उसके रसूल के साथ विश्वघात न करो अपनी अमानतों (अपनी अमानतों का मतलब यह है कि वे सभी दायित्व हैं जो किसी पर विश्वास करके उसे सौंपा जाए) में गद्दारी के दोषी न बनो-क़ुरआन 8:27।
"और चोर, चाहे औरत हो या मर्द, दोनों के हाथ काट दो, यह उनकी कमाई का बदला है और अल्लाह की ओर से शिक्षाप्रद सज़ा। फिर अगर जुल्म करने के बाद माफी मांग लें और अपने आपको सुधार ले तो अल्लाह की कृपा-दृष्टि फिर उसकी और लौट जाएगी अल्लाह बहुत क्षमाशील और दयावान है-क़ुरआन 5:38-39।
5. पांचवां लक्षण- शौच (सफाई)
शौच के अर्थ है की भीतरी (आत्मा) और ऊपरी सतह को पवित्र रखना।
"यकीन्न सफलता पा गया जिसने आत्मा को विशुद्ध एवं विकसित किया, और असफल हुआ वह जिसने उसको दबा दिया-क़ुरआन 91:9-10।
"न धन कोई लाभ पहूँचाएगा और न सन्तान, सिवाय इसके कि कोई व्यक्ति पवित्र दिल (मन) लिए हुए अल्लाह के पास हाज़िर हो-क़ुरआन 26:88-89।
"सफल हो गया वह शख़्स जिसने पवित्रता अपनाई, और अपने रब का नाम याद किया, फिर नमाज़ पढ़ी-क़ुरआन 87:14-15।
"और उससे दूर रखा जाएगा वह अत्यन्त परहेज़गार, जो पवित्र होने के ध्येय से अपना धन देता है-92:17-18।
"तुम उनके मालो में से सदका (दान) लेकर उनको पवित्र करो और नेकी की राह में उन्हें बढ़ाओ-क़ुरआन 9:103।
"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, तुम नमाज़ के करीब मत जाओ जबतक की नहा-धो न लो-क़ुरआन 4:43।
"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो चाहिए के अपने मुँह और हाथ कोहिनियों तक धो लो, सिरों पर हाथ फेर लिया करो और हाथ कोहिनियों तक धो लिया करो, और नहाना अनिवार्य हो तो नहाकर पवित्र हो जाओ-क़ुरआन 5:6।
6. छठा लक्षण- इन्द्रिय ग्रिह।
हवा के द्वरा पांच बहारी विषयो (रूप, रस,गंध,स्पर्श,शब्द) का सही इस्तेमाल करना अर्थात अधर्म चरणों से रोक के धर्म में चलना।
इन इंद्रियों को काबू में रखने के लिए सबसे बहतर तरीका रोज़ा है रोज़ा से बहतर तरीका और कोई नही।
"ऐ ईमान वालों तुमपर रोज़े अनिवार्य किये गए है जिस तरह तुमसे पहले लोगो पर अनिवार्य किये गए थे। ताकि इससे तुममे परहेज़गारी का गुण पैदा होगा-क़ुरआन 2:183।
रोज़ा के फायदे:
1.रोज़ा जिस्मानी शेहत को बरकरार रखती है बल्कि इसे बढ़ाती भी है। कम से कम साल में अवश्य एक महीने का रोज़ा शेहत के लिए काफी फायदेमंद होती है।
2. रोज़े से दिल की पवित्रता, आत्मा की स्वछता और नफ़्स की शुद्धि हासिल होती है।
3. रोज़े दौलत मन्दों को व्यावहारिक रूप से बाख़बर रखती है ताकि वो आगे दान देने में कोई कंजूसी न करे। रोज़ा अमीर गरीब सभी को एक लाइन में खड़ा कर देती है।
4. रोज़ा मुश्किल हालात में लड़ने का आदि बनाता है।
5. रोज़े से इंसान की दिमागी और रूहानी एकाग्रता हासिल होता है।
6. रोज़ा बहुत से गुनाहों (पापों) से इंसान को महफूज़ रखता है।
7. रोज़ा नेक कामो के लिए इंसान को उभारता है।
8. रोज़ा एक गुप्त और खामोश इबादत है जो कपट और प्रदर्शन से बरी है।
"रसूल अल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया अल्लाह पाक फरमाता है इंसान का नेक अमल खुद इसी के लिए है मगर रोज़ा के वो (अमल) खास मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा, और रोज़ा गुनाहों की एक ढाल है, अगर कोई रोज़े से हो इसे फहास-गोई (बेहयाई) न करनी चाहिए, और न सोर मचाएं, अगर कोई शख्स इसको गाली दें या लड़ना चाहे तो इसका जवाब सिर्फ यह है कि मैं एक रोज़ेदार आदमी हूँ (अर्थात मेरे तमाम अंग रोज़े की सूरत में है इसलिए मैं तुमसे उलझना नही चाहता)-हदीस बुखारी-3:31:128।
7. सातवां लक्षण- घी (सत्य और असत्य का फैसला करना)
"अल्लाह न्याय और भलाई और नातेदारों के हक़ अदा करने का आदेश देता है और बुराई और अश्लीलता और जुल्म व ज्यादती से रोकता है। वह तुम्हें नसीहत करता है ताकि तुम शिक्षा लो-क़ुरआन 16:90।
"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, अल्लाह के लिए औचित्य पर कायम रहनेवाला और इंसाफ की गवाही देने वाला बनो। किसी गिरोह (समुदाय) की दुश्मनी तुमको इतना उत्तेजीत न कर दें कि इंसाफ से फिर जाओ। इंसाफ करो, यही ईशभक्ति और विनम्रता के अधिक अनुकूल है-क़ुरआन 5:8।
"ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, इंसाफ के ध्वजवाहक और अल्लाह के लिए गवाह बनो यद्यपि तुम्हारा इंसाफ और तुम्हारी गवाही ख़ुद तुम्हारे अपने या तुम्हारे माँ-बाप और नातेदारों के विरुद्ध ही क्यों न पड़ती हो। मामले से सम्बन्ध रखनेवाला पक्ष चाहे मालदार हो या गरीब, अल्लाह तुमसे अधिक उनका हितैषी है। अतः अपनी इच्छा के अनुपालन में न्याय से न हटो। और अगर तुमने लगी लिपटी बात कही या सत्य से पहलू बचाया तो जान रखो कि जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी खबर है-क़ुरआन 4:135।
"अल्लाह तुम्हें इस बात से नही रोकता कि तुम उनलोगों के साथ नेकी और इंसाफ का बरताव करो जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध नही किया है और तुम्हें तुम्हारे घरो से नहीं निकाला है। अल्लाह इंसाफ करने वालो को पसन्द करता है-क़ुरआन 60:8।
8. आठवां लक्षण- विधा (ज्ञान)
"प्रथना करो ऐ पालनहार मुझे और अधिक ज्ञान प्रदान कर-क़ुरआन 20:114।
"आप (सल्ल०) ने फ़रमाया ज्ञान हासिल करना हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है चाहे वो मर्द हो या औरत-हदीस सुन्न इब्ने माज़ा 1:1:224।
9. नववां लक्षण- सत्य (सच बोलना)
"ऐ ईमान वालों अल्लाह से डरो और सच्चे लोगो का साथ दो- क़ुरआन 9:119।
"ईमान लाने वालों में से ऐसे लोग मौजूद है जिन्होंने अल्लाह से की हुई प्रतिज्ञा को सच्चा कर दिखाया है। उनमें से कोई अपनी मन्नत पूरी कर चुका और कोई समय आने के इंतेज़ार में है। उन्होंने अपनी व्यवाहर-नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया, यह सबकुछ इसलिए हुआ ताकि अल्लाह सच्चो को उनकी सच्चाई का बदला दे-क़ुरआन 33:23-24।"
10. दशवां लक्षण- अक्रोध (क्रोध न करना)
"जो प्रत्येक दशा में अपने माल खर्च करते है चाहे बुरे हाल में हो या अच्छे हाल में, जो क्रोध को पी जाते है और दूसरे के कसूर क्षमा कर देते है ऐसे नेक लोग अल्लाह को बहुत प्रिय है-क़ुरआन 3:134।
"जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते है और अगर क्रोध आ जाये तो क्षमा कर देते है-क़ुरआन 42:37।
जिस मत व व्यक्ति में ये 10 लक्षण पाए जाए मनु-महाराज के अनुसार वो धर्म है व धर्मिक शख़्स है।
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क्या अल्लाह निराकार है वेदो में बतलाये गए ईश्वर के सिद्धांत की तरह।
सर्वप्रथम यह समझिए कि सनातन धर्मानुसार ईश्वर का निराकार स्वरूप किसे कहते हैं -
परम-तत्त्व के निराकार स्वरूप को ब्रह्म कहते है। ब्रह्म का स्वरूप निर्गुण और असीम है।
न तस्य कार्यं करणं च विद्यतेन तत्समश्वाभ्यधिकश्च दृश्यते।- -श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.८
भावार्थः - उसके (शरीर रूप) कार्य और अन्तःकरण तथा इन्द्रिय रूप कारण नहीं है। उससे बड़ा और उसके समान भी दूसरा नहीं दीखता।
यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम्। नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म तदव्ययं यद्भूतयोनि परिपश्यन्ति धीराः॥
- मुण्डकोपनिषद् १.१.६
भावार्थः - वह जो जानने में न आने वाला, पकड़ने में न आने वाला, गोत्र आदि से रहित, रंग और आकृति से रहित, नेत्र, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से भी रहित और हाथ, पैर आदि कर्मेन्द्रियों से भी रहित है, तथा वह जो नित्य, सर्वव्यापक ( हर जगह मौजूद कण कण में उपस्थित ) , सब में फैला हुआ, अत्यन्त सूक्ष्म और अविनाशी परब्रह्म है.
अतएव ब्रह्म ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों, रंग और आकृति से रहित नित्य, सर्वव्यापक ( हर जगह मौजूदा ) निराकार है और उससे बड़ा कोई और नहीं है। जो निराकार ब्रह्म की उपासना करते है उन्हें ज्ञानी कहते है।
इस्लाम मे अल्लाह की सत्ता
जमीन और आसमान ६ दिन में बनाने के बाद अल्लाह का सिंहासन पर विराजमान होना -
तुम्हारा पालन्हार अल्लाह है जिस ने आसमानों और जमीन को छ (६) दिन में बनाया फिर अर्श ( सिंहासन ) पर मुस्तवी ( विराजमान ) हुआ । वही हर काम का इन्तिज़ाम करता है । उस की अनुमति के बिना कोई सिफारिश् नहीं कर सकता वही तुम्हारा रब है इस लिए तुम उसी की इबादत् करो । पस् तुम नसीहत क्यों नहीं पकड़ते ? ( क़ुरआन सूरा यूनुस ३)
उस जैसी कोई चीज़ नहीं और वह खूब देखने वाला सुनने वाला है। ( क़ुरआन सूरा शूरा ११ )
अल्लाह का जिब्राईल नामक फरिश्ते के माध्यम से अपनी वाणी क़ुरआन को मोहम्मद साहब पर अवतरित करना -
और यह कुरआन अल्लाह रब्बुल आलमीन की ओर से नाज़िल किया हुआ है । इसे हजरत जिब्रील लेकर आए फिर उस ने तुम्हारे दिल में डाला ( यानी मोहम्मद साहब को बतला कर याद करवाया ) ताकि तुम लोगों को डराने वालों में से हो जाओ। और यह कुरान साफ स्पष्टअरबी ज़बान ( भाषा ) में है । ( क़ुरआन सूरा शूरा १९२- १९५ )
अल्लाह का पैगम्बर से बात करना -
और अल्लाह ने मूसा से कलाम ( बात ) किया ।
( क़ुरआन सूरा निसा १६४ )
और जब मूसा हमारे निर्धारित समय पर तूर नामक पहाड़ी पर आये और उन के रब ने उन से बात की ।
( क़ुरआन सूरा अराफ १४३ )
अल्लाह का केवल अर्श ( सिंहासन ) पर मुस्तवी होना और सर्वव्यापी न होना ( हर जगह मौजूद न होना )-
वह रहमान ( अल्लाह ) है जो अर्श ( सिहांसन ) पर मुस्तवी ( विराजमान ) हुआ । ( क़ुरआन सूरा ताहा ५ )
कयामत के दिन बंदों का फैसला करने के लिए अल्लाह का तशरीफ़ लाना-
तो ज़मीन जब कूट कूट कर पस्त कर दी जायेगी और तुम्हारा रब आयेगा और फरिश्ते कतार दर कतार (पंक्तिबद्ध होकर ) आ पहुँचेंगे और उस दिन जहन्नम ( नरक) को लाया जायेगा तो आदमी को उस दिन समझ आ जायेगी लेकिन उस दिन समझ आने से क्या फाइदा ? ( क़ुरआन सूरा फज्र २१, २२, २३ )
अल्लाह का चेहरा -
और तेरे रब् का चेहरा जो जलाल व अज्मत् वाला है केवल बाकी रहेगा । ( कुरआन सूरा रहमान २७ )
अल्लाह की दो वास्तविक आंखे -
और एक नाव हमारे आदेश से हमारी आँखों के सामने बनाओ।( क़ुरआन सूरा हूद ३७ )
अल्लाह के दो खुले हुए हाथ , दायां हाथ और मुट्ठी -
बल्कि उस के दोनों हाथ खुले हुये हैं। वह जिस तरह चाहता है खर्च करता है। ( क़ुरआन सूरह मायदा ६४ )
और उन्हों ने अल्लाह की कदर व ताज़ीम ( सम्मान तथा आदर ) जैसी करनी चाहिए थी नहीं की। और कयामत के दिन तमाम जमीन उस की मट्ठी में होगी और सारे आसमान उस के दाहिने हाथ में होंगे । और अल्लाह की जात उन के शिर्क से पवित्र तथा बहुत बुलन्द है । ( क़ुरआन सूरा जुमर ६७ )
अल्लाह के दो पैर -
जहन्नम बराबर यही कहती रहेगी कि क्या कुछ और है क्या कुछ और है आखिर अल्लाह अपना पैर इसमें रख देगा वह कह उठेगी बस बस मैं भर गई ।
( सहीह बुखारी हदीस ६६६१ )
यह है इस्लाम मत की पुस्तको के कुछ हवाले जिन से यह पूर्णतया सिद्ध है कि अल्लाह निराकार नहीं केवल साकार है क्योंकि निराकार उसे कहते हैं जो चेहरा, आंख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से रहित और हाथ, पैर आदि अंगो से भी रहित हो , और जो नित्य, सर्वव्यापक ( हर जगह मौजूद कण कण में उपस्थित हो ) और हर स्थान में फैला हुआ हो , अत्यन्त सूक्ष्म हो , ऐसी सत्ता को निराकार कहते हैं ।
जबकि इस्लाम मत में अल्लाह की सत्ता ऐसी नहीं है उपरोक्त इस्लामी पुस्तको के हवालों से यह सिद्ध हुआ कि अल्लाह की सत्ता ६ दिन में जमीन और आसमान का निर्माण कर के अर्श पे विराजमान होती है जो कि आसमान में है और अल्लाह केवल अर्श पे मुस्तवी है वह हर जगह मौजूद नहीं जबकि निराकार ईश्वर हर जगह मौजूद होता है कण कण में होता है जो कि अल्लाह नहीं है इसी प्रकार अल्लाह ने जिब्राईल नामक पैगम्बर के माध्यम से क़ुरआन का संदेश मोहम्मद साहब पर अवतरित किया यानी अल्लाह निराकार नही ( हर जगह मौजूद नही ) अगर हर जगह मौजूद होता तो वह किसी फरिश्ते के माध्यम से किताब अवतरित नही करता बल्कि मोहम्मद साहब के हृदय में प्रकट करता इसीलिए अल्लाह निराकार नही और कयामत के दिन अल्लाह की सत्ता का तशरीफ़ लाना ( हाज़िर होना ) भी कहा गया है जो कि निश्चय ही साकार स्वरूप है , क्योंकि निराकार सत्ता हर जगह मौजूद होती वह एक जगह तशरीफ़ नही लाती ।
और अल्लाह की सत्ता पैगम्बर मूसा से कलाम ( बात ) भी करती है यानी वह निराकार नही ।
क़ुरआन में अल्लाह के चेहरे , आंख , दोनो हाथ , दायां हाथ और मुट्ठी के बारे में बतलाया गया है जबकि निराकार ईश्वर अंगों से रहित होता है , और हदीस में अल्लाह के पैरों का ज़िक्र आया है। इसके साथ साथ क़ुरआन और हदीस का कोई भी एक ऐसा वचन नही है जिसमें यह लिखा हो कि अल्लाह निराकार है और उसकी सत्ता हर जगह मौजूद है ।
इन सब से यह सिद्ध हुआ अल्लाह निराकार नही केवल साकार है ।
ईश्वर के निराकार स्वरूप का वर्णन सनातन धर्म मे है जो कि सूफियों ने संभवतः यहीं से लिया और मुस्लिम समाज मे निराकार के सिद्धांत को प्रचारित किया जो कि इस्लाम के विरुद्ध सिद्धांत है ।
सूफियों ने इस्लामी साकार ईश्वर के सिद्धांत से हटकर तीन तरह के सिद्धांत बना लिए थे जो की इस प्रकार है -
वहदतुल वुजूद ( यानी सारी कायनात का अस्तित्व एक खुदा का ही अस्तित्व है ), #वहदतुल_शुहूद ( यानी हर चीज़ में खुदा की सत्ता समाई हुई है यानी वह हर जगह मौजूद है या सर्वव्यापी है निराकार है ) और वहदतुल हुलूल ( यानी भक्त खुदा की इबादत करते करते इतना महान हो जाता कि खुदा की सत्ता उसमे समा जाती है। )
चूंकि इस्लाम मत के अनुसार इस्लाम मे वही सिद्धांत मान्य हैं जिनका आदेश अल्लाह और मोहम्मद साहब ने दिया है , इसे छोड़कर अन्य सिद्धांत को इस्लाम मत में बिदअत ( मत में नई चीज़ ) कहा और माना जाता है जो कि निषेध और इस्लाम मे पूर्णतया मना है । इसीलिये सूफियों का निराकार वाद ( वहदतुल शुहूद ) का सिद्धांत इस्लाम मे अमान्य है यह सिद्धांत इस्लाम के विरुद्ध है और अल्लाह और मोहम्मद साहब की अवज्ञा है जिसका इस्लाम मत में कोई स्थान नही है ।
इसीलिये वह समस्त मुस्लिम प्रचारक जो अल्लाह के निराकार होने का मिथ्याप्रचार करते हैं , उन को समझना चाहिए कि वह इस्लाम मत के विस्तार और प्रचार हेतु असत्य का सहारा तो ले ही रहें और स्वयं अपने इस्लाम मत के विरुद्ध सिद्धांत भी रख रहें कि अल्लाह निराकार है और इस्लाम मत की अवज्ञा भी करे रहें , जिनमे अल्लाह और मोहम्मद साहब की अवज्ञा सर्वप्रथम शामिल है ।
अत्यंत दुःखद है कि असत्य के आधार पर और अपने ही सिद्धांतो के विरुद्ध जा कर अपने मत का प्रचार प्रसार आज मुस्लिम प्रचारक कर रहे हैं ।
इसीलिये जो कोई भी मुस्लिम अल्लाह और मोहम्मद साहब में पूर्ण आस्था रखते हैं , उन्हें अल्लाह के निराकार होने का दुष्प्रचार बंद करना चाहिए ।
ईश्वर समस्त मुस्लिम मिथ्याप्रचारकों को सद्बुद्धि दे ।
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