【औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में】 -१
" तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना। कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।"
औरंजेब के बारे में बताने से पहले में इतना ज़रूर कहूँगा कि इतिहास यदि एक ही घटना के दो तथ्य दो कारण एक दूसरे के विपरीत प्रस्तुत करता है तो उस में से एक सही होता है परंतु कौन सा सही है इस का पता लगाने के लिए यह देखा जाएगा कि कौन सा तथ्य की दलील सबसे मजबूत है ।
दूसरी बात यह कि यदि हम एक को सही और दूसरे को गलत अपनी आस्था की बिना पर कहते हैं तो हम इतिहास पर अन्याय करते हैं ।
में औरंगज़ेब से संबंधित कोई भी बात अपनी और से प्रस्तुत नहीं करूंगा बल्कि प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार की खोज और उनके तथ्यों ,प्रमाणों पर आधारित औरंगज़ेब की तस्वीर सामने रखूंगा ताकि पाठकगण किसी भी प्रकार का पक्षपात का दोष मुझपे न लगाएं ।
पांडेय जी लिखते हैं ..........
जब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैसे बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ो को उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी। इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया।
डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया.
【औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में -२】
नोट :- ज्ञात रहे औरंगज़ेब के संबंध में कि यह एक खोज है जिसे बी एन पाण्डे भूतपूर्व राज्यपाल उड़ीसा,राज्य सभा सदस्य एवं प्रसिद्ध इतिहासकार ने की है
अब आगे .........
भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृस्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे हैं। औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हकूमत का प्रतीक मान रखा है। उसके बारें में वे क्या विचार रखते हैं इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ाः तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना। कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।
औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बर्बाद नहीं किया जाएँ, अलबत्ता नए मन्दिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’ इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया।
पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है।
बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान।
【 औरंगज़ेब इतिहास की दृष्टि में -】-३
( *औरंगज़ेब के न्यायप्रिय होने के प्रमाण*)
औरंगज़ेब अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आते थे। इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमानिण हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिएए हमारे दरबार में ने आना पडे। इस फ़रमान पर *11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई*.) की तारीख़ दर्ज है।
इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर *पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि.* की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि *ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दया गया*।
फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि *शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई*। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग(शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।’’ इस फ़रमान से केवल यही तक नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाव नहीं बरता था।
【 *औरंगज़ेब का हिंदुओं को पूजा स्थल के लिये ज़मीन देना* 】
जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है। *औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की*। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहम्णें एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश- प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना कने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जाए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’
लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था। हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहम्ण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया।
(अहसान फ़िरोज़ाबादी)
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ग़ज़नवी
ज़िन्हें लगता है कि महमूद_गजनवी मंदिर लूटने आए थे उन पाखंडियों को शर्म आनी चाहिए, #देवदासी प्रथा की बंदी महिलाओं को छुड़ाने के लिए गजनवी ने हर मंदिर-मंदिर ढ़ूढ़ा महिलाओं को मुक्त कराया##आप भी पढ़े पुस्तक का अंश##हालांकि ये पुस्तक भारत सरकार बैन कर चुकी है!!##
#गुजरात का सोमनाथ आज फिर दलितों के अत्याचार पर अपने हक़ीक़ी मोहसिन को पुकार रहा है।
.......... महमूद गजनवी का ज़हूर एक ऐसे समुद्री तूफ़ान की तरह था जो अपनी राह में मौजूद हर मौज को अपनी आगोश में ले लेती है , वह ऐसा फातेह था जिसकी तलवार की आवाज़ कभी तुर्किस्तान से आती तो कभी हिंदुस्तान से आती , उसके कभी न् थकने वाले घोड़े कभी सिंध का पानी पी रहे होते तो कुछ ही लम्हो बाद गांगा की मौजों से अटखेलियां करते ।
वह उन मुसाफिरों में से था जिसने अपनी मंजिल तै नही की थी , और हर मंजिल से आगे गुजर जाता रहा..... उसे फ़तेह का नशा था , जीतना उसकी आदत थी , वैसे तो वह इसी आदत की वजह से अपने परचम को खानाबदोश की तरह लिए फिरता रहा और जीतता गया , पर अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उसे एक अज़ीम काम के लिए चुना था .. और अल्लाह अपना काम ले कर रहता है।
................ भारत का पुराना इतिहास खगालने पर यहाँ का यहाँ का सामाजिक ताना बाना पता लगता है , वेस्ट एशिया से एक फ़तेह कौम का भारत पर वर्चस्व हुआ , तो उन्होंने अपनी रिहायश के लिए , हरे भरे मैदान चुने और हारे हुए मूल निवासियों को जंगल दर्रों और खुश्क बंजर ज़मीनों पर बसने के लिए विवश किया गया , चूँकि मूल भारतियों की तुलना में आर्य कम थे इसलिए उन्होंने सोशल इंजीनियरींग का ज़बरदस्त कमाल् दिखाते हुए , मूल भारतियों को काम के हिसाब से वर्गों में और जातियों में बाँट दिया , और इस व्यवस्था को धर्म बता कर हमेशा के लिए इंसानो को गुलामी की न् दिखने वाली जंजीरों में जकड़ लिया। ब्राह्मणों ( आर्य) के देवता की नज़र में , मूल भारतीय एक शूद्र , अछूत , और पिछले जन्म का पाप भोगने वाले लोगों का समूह बन गया , ब्राह्मणों के धर्म रूपी व्यवस्था की हिफाज़त के लिए एक समूह को क्षत्रिय कहा गया , वह क्षत्रिय, ब्राह्मणों के आदेश को देवता का हुक्म मानते और इस तरह सदियों सदियों से लेकर आज तक वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था से शूद्र बाहर नही निकल सके , महमूद गजनवी को राजा नन्दपाल की मौत की खबर मिल चुकी , अब ग़ज़नवी की फौज नन्दना के किले को फ़तेह करने के लिए बेताब थी , इधर तिर्लोचन पाल को राज़ा घोसित करके गद्दी सौंप दी गयी , त्रिलोचन पाल को जब ग़ज़नवी के फौजों की पेश कदमी की खबर मिली तो उसने किले की हिफाज़त अपने बेटे भीम पाल को सौंप दी , भीम पाल की फ़ौज गज़नबी के आगे एक दिन भी न ठहर सकी, उधर कश्मीर में तिरलोचन ने झेलम के शुमाल में एक फ़ौज को मुनज्जम किया जो एक सिकश्त खोरदा लश्कर साबित हुई।
रणवीर एक राजपूत सरदार का बेटा था जो भीम सिंह से साथ नन्दना के किले पर अपनी टुकड़ी की क़यादत कर रहा था , रणवीर बहुत बहादुरी से लड़ा और यहाँ तक कि उसके जौहर देख कर गज़नबी मुतास्सिर हुए बिना न् रह सका , वह तब तक अकेला ग़ज़नवी के लश्कर को रोके रहा जब तक उसके पैरों में खड़े रहने की ताकत थी , उसके बाद ज़मीन पर गिर कर बेहोश हो गया, आँखे खोली तो गज़नबी के तबीब उसकी मरहम पट्टी कर रहे थे , रणवीर ने गज़नबी के मुताल्लिक बड़ा डरावनी और वहशत की कहानियां सुनी थीं , लेकिन यह जो हुस्ने सुलूक उसके साथ हो रहा था , उसने कभी किसी हिन्दू राज़ा को युद्ध बंदियों के साथ करते नही देखा । उसे लगा कि शायद धर्म परिवर्तन करने के लिए बोला जायेगा इर तब तक अच्छा सुलूक होगा , मना करने पर यह मुस्लिम फ़ौज उसे अज़ीयत देगी , उसने इस खदशे का इज़हार महमूद से कर ही दिया , कि अगर तुम क़त्ल करना चाहते हो तो शौक से करो पर मै धर्म नही बदलूंगा , उसके जवाब में ग़ज़नवी के होंठों पर बस एक शांत मुस्कराहट थी , गज़नबी चला गया, रणवीर के जखम तेज़ी से भर रहे थे , वह नन्दना के किले का कैदी था पर न् उसे बेड़ियां पहनाई गयी और न् ही किसी कोठरी में बंद किया गया।
कुछ वक़्त गुजरने के साथ ही कैदियों की एक टुकड़ी को रिहा किया गया जिसमें रणबीर भी था , रिहाई की शर्त बस एक हदफ़ था कि वह अब कभी गज़नबी के मद्दे मुकाबिल नही आएंगे, यह तिर्लोचन पाल के सैनिकों के लिए चमत्कार या हैरान कुन बात थी , उन्हें यक़ीन करना मुश्किल था , खैर रणवीर जब अपने घर पहुंचा तो उसे उम्मीद थी कि उसकी इकलौती बहन सरला देवी उसका इस्तकबाल करेगी और भाई की आमद पर फुले नही समाएगी , पर घर पर दस्तक देने बाद भी जब दरवाज़ा नही खुला तो उसे अहसास हुआ कि दरवाज़ा बाहर से बंद है , उसे लगा बहन यहीं पड़ोस में होगी , वह पड़ोस के चाचा के घर गया तो उसने जो सुना उसे सुन कर वह वहशीपन की हद तक गमो ग
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*चलिए एक सवाल का जवाब दीजिए। सवाल थोड़ा कड़वा है। भारत में मुसलमान बादशाह हुए तो हिन्दू राजा भी हुए।*
औरंगज़ेब की दी हुई सरकारी ज़मीन पर चित्रकूट और उज्जैन के महाकाल मंदिर से लेकर इलाहाबाद का बेनी माधव मंदिर बना और इतिहासकार प्रोफेसर वी एन पांडे के पुस्तक में दिए दस्तावेज बताते हैं कि इन मंदिरों को बनाने में औरंगज़ेब ने सरकारी मदद की।
टीपू सुल्तान के किले "श्रीरंगपट्टनम" में "रंगनाथ मन्दिर" था और आज भी है, रंगनाथ मन्दिर को टीपू ने सात चांदी के कप और एक रजत कपूर-ज्वालिक पेश किया जो आज भी उस मंदिर में है, इसके अतिरिक्त टीपू सुल्तान ने हिंदू मन्दिरों को तमाम तोहफ़े पेश किए। मेलकोट के मन्दिर में सोने और चांदी के बर्तन है, जिनके शिलालेख बताते हैं कि ये टीपू ने भेंट किए थे। टीपू सुल्तान ने कलाले के लक्ष्मीकान्त मन्दिर को चार रजत कप भेंटस्वरूप दिए थे। 1782 और 1799 के बीच, टीपू सुल्तान ने अपनी जागीर के मन्दिरों को 34 दान के सनद जारी किए। इनमें से कई को चांदी और सोने की थाली के तोहफे पेश किए। ननजनगुड के श्रीकान्तेश्वर मन्दिर में टीपू का दिया हुआ एक रत्न-जड़ित कप है। ननजनगुड के ही ननजुनदेश्वर मन्दिर को टीपू ने एक हरा-सा शिवलिंग भेंट किया।
इलाहाबाद में संगम के किनारे अकबर के किले में आज भी अक्षय वट मंदिर है जिसमें महारानी जोधा पूजा करती थीं। सरकारी दस्तावेज देखिए तो आप पाएँगे कि नवाब आसिफुद्दोला की दी हुई ज़मीन और मदद से योगी जी का "गोरखनाथ" मंदिर बना। अलाउद्दीन खिलजी और अन्य बादशाहों का मन्दिरों के निर्माण का इतिहास और प्रमाण लिखने लगूँ तो पोस्ट लम्बी हो जाएगी इसलिए फिलहाल यह तीन चार बादशाहों का उदाहरण काफी है। अब आप इस देश के सैकड़ों हिन्दू राजाओं के महलों और किलों में या बाहर कहीं भी एक भी ऐसा उदाहरण बताईए जहाँ उन्होंने एक "मस्जिद" बनाई हो।
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*●● ज़िन्हें लगता है कि महमूद गजनवी मंदिर लूटने आए थे उन पाखंडियों को शर्म आनी चाहिए, ●●*
*देवदासी प्रथा की बंदी महिलाओं को छुड़ाने के लिए गजनवी ने हर मंदिर-मंदिर ढ़ूढ़ा महिलाओं को मुक्त कराया* आप भी पढ़े पुस्तक का अंश हालांकि ये पुस्तक भारत सरकार बैन कर चुकी है!! गुजरात का सोमनाथ आज फिर दलितों के अत्याचार पर अपने हक़ीक़ी मोहसिन को पुकार रहा है।
महमूद गजनवी का ज़हूर एक ऐसे समुद्री तूफ़ान की तरह था जो अपनी राह में मौजूद हर मौज को अपनी आगोश में ले लेती है , वह ऐसा फतेह था जिसकी तलवार की आवाज़ कभी तुर्किस्तान से आती तो कभी हिंदुस्तान से आती , उसके कभी न थकने वाले घोड़े कभी सिंध का पानी पी रहे होते तो कुछ ही लम्हो बाद गांगा की मौजों से अटखेलियां करते ।
वह उन मुसाफिरों में से था जिसने अपनी मंजिल तै नही की थी , और हर मंजिल से आगे गुजर जाता रहा.....
उसे फ़तेह का नशा था , जीतना उसकी आदत थी , वैसे तो वह इसी आदत की वजह से अपने परचम को खानाबदोश की तरह लिए फिरता रहा और जीतता गया , पर अल्लाह रब्बुल इज्जत ने उसे एक अज़ीम काम के लिए चुना था .. और अल्लाह अपना काम ले कर रहता है।
भारत का पुराना इतिहास खंगालने पर यहाँ का सामाजिक ताना बाना पता लगता है ,वेस्ट एशिया से एक फ़तेह कौम का भारत पर वर्चस्व हुआ , तो उन्होंने अपनी रिहायश के लिए , हरे भरे मैदान चुने और हारे हुए मूल निवासियों को जंगल दर्रों और खुश्क बंजर ज़मीनों पर बसने के लिए विवश किया गया , चूँकि मूल भारतियों की तुलना में आर्य कम थे इसलिए उन्होंने सोशल इंजीनियरींग का ज़बरदस्त कमाल दिखाते हुए , मूल भारतियों को काम के हिसाब से वर्गों में और जातियों में बाँट दिया , और इस व्यवस्था को धर्म बता कर हमेशा के लिए इंसानो को गुलामी की न दिखने वाली जंजीरों में जकड़ लिया ।ब्राह्मणों (आर्य) के देवता की नज़र में , मूल भारतीय एक शूद्र ,अछूत ,और पिछले जन्म का पाप भोगने वाले लोगों का समूह बन गया , ब्राह्मणों के धर्म रूपी व्यवस्था की हिफाज़त के लिए एक समूह को क्षत्रिय कहा गया ,वह क्षत्रिय, ब्राह्मणों के आदेश को देवता का हुक्म मानते और इस तरह सदियों सदियों से लेकर आज तक वह ब्राह्मणवादी व्यवस्था से शूद्र बाहर नही निकल सके , महमूद गजनवी को राजा नन्दपाल की मौत की खबर मिल चुकी , अब ग़ज़नवी की फौज नन्दना के किले को फ़तेह करने के लिए बेताब थी , इधर तिर्लोचन पाल को राज़ा घोसित करके गद्दी सौंप दी गयी , त्रिलोचन पाल को जब ग़ज़नवी के फौजों की पेश कदमी की खबर मिली तो उसने किले की हिफाज़त अपने बेटे भीम पाल को सौंप दी।
भीम पाल की फ़ौज गज़नबी के आगे एक दिन भी न ठहर सकी ,उधर कश्मीर में तिरलोचन ने झेलम के शुमाल में एक फ़ौज को मुनज्जम किया जो एक सिकश्त खोरदा लश्कर साबित हुई। रणवीर एक राजपूत सरदार का बेटा था जो भीम सिंह से साथ नन्दना के किले पर अपनी टुकड़ी की क़यादत कर रहा था , रणवीर बहुत बहादुरी से लड़ा और यहाँ तक कि उसके जौहर देख कर गज़नबी मुतास्सिर हुए बिना न रह सका ,वह तब तक अकेला ग़ज़नवी के लश्कर को रोके रहा जब तक उसके पैरों में खड़े रहने की ताकत थी , उसके बाद ज़मीन पर गिर कर बेहोश हो गया, आँखे खोली तो गज़नबी के तबीब उसकी मरहम पट्टी कर रहे थे , रणवीर ने गज़नबी के मुताल्लिक बड़ा डरावनी और वहशत की कहानियां सुनी थीं , लेकिन यह जो हुस्ने सुलूक उसके साथ हो रहा था ,उसने कभी किसी हिन्दू राज़ा को युद्ध बंदियों के साथ करते नही देखा । उसे लगा कि शायद धर्म परिवर्तन करने के लिए बोला जायेगा इर तब तक अच्छा सुलूक होगा , मना करने पर यह मुस्लिम फ़ौज उसे अज़ीयत देगी ,उसने इस खदशे का इज़हार महमूद से कर ही दिया , कि अगर तुम क़त्ल करना चाहते हो तो शौक से करो पर मै धर्म नही बदलूंगा ,उसके जवाब में ग़ज़नवी के होंठों पर बस एक शांत मुस्कराहट थी ,गज़नबी चला गया,रणवीर के जखम तेज़ी से भर रहे थे , वह नन्दना के किले का कैदी था पर न उसे बेड़ियां पहनाई गयी और न ही किसी कोठरी में बंद किया गया। कुछ वक़्त गुजरने के साथ ही कैदियों की एक टुकड़ी को रिहा किया गया जिसमें रणबीर भी था , रिहाई की शर्त बस एक हदफ़ था कि वह अब कभी गज़नबी के मद्दे मुकाबिल नही आएंगे, यह तिर्लोचन पाल के सैनिकों के लिए चमत्कार या हैरान कुन बात थी ,उन्हें यक़ीन करना मुश्किल था ,खैर रणवीर जब अपने घर पहुंचा तो उसे उम्मीद थी कि उसकी इकलौती बहन सरला देवी उसका इस्तकबाल करेगी और भाई की आमद पर फुले नही समाएगी ,पर घर पर दस्तक देने के बाद भी जब दरवाज़ा नही खुला तो उसे अहसास हुआ कि दरवाज़ा बाहर से बंद है , उसे लगा बहन यहीं पड़ोस में होगी ,वह पड़ोस के चाचा के घर गया तो उसने जो सुना उसे सुन कर वह वहशीपन की हद तक गमो गुस्से से भर गया ,उसकी बहन को मंदिर के महाजन के साथ कुछ फ़ौजी उठा कर ले गए , चाचा बड़े फ़ख्र से बता रहा था कि , रणवीर खुश किस्मत हो जो तुम्हारी बहन को महादेव की सेवा करने का मौका मिला है , लेकिन यह लफ्ज़ रणवीर को मुतास्सिर न करसके , रणबीर चिल्लाया कि किसके आदेश से उठाया ,चाचा बोले ,पुरोहित बता रहा था कि सोमनाथ से आदेश आया है कि हर गाँव से तीन लड़कियां देव दासी के तौर पर सेवा करने जाएंगी, हमारे गाँव से भी सरला के साथ दो और लड़कियां ले जाई गयी हैं। रणवीर खुद को असहाय महसूस कर रहा था , कहीं से उम्मीद नज़र नही आ रही थी ,ज़हनी कैफियत यह थी कि गमो गुस्से से पागल हो गया था , वह सोच रहा कि वह एक ऐसे राज़ा और उसका राज़ बचाने के लिए जान हथेली पर लिए फिर रहा था ,और जब वह जंग में था तो उसी राज़ा के सिपाही उसकी बहन को प्रोहित के आदेश पर उठा ले गए , उसने सोचा कि राज़ा से फ़रयाद करेगा , अपनी वफादारी का हवाला देगा ,नही तो एहतिजाज करेगा,,, चाचा से उसने अपने जज़्बात का इजहार किया ,चाचा ने उसे समझाया कि अगर ऐसा किया तो धर्म विरोधी समझे जाओगे और इसका अंजाम मौत है। उसे एक ही सूरत नज़र आ रही थी कि वह अपने दुश्मन ग़ज़नवी से अपनी बहन की इज़्ज़त की गुहार लगायेगा। लेकिन फिर सोचने लगता कि ग़ज़नवी क्यू उसके लिए जंग करेगा ,उसे उसकी बहन की इज़्ज़त से क्या उज्र ,वह एक विदेशी है और उसका धर्म भी अलग है ,लेकिन रणवीर की अंतरात्मा से आवाज़ आती कि उसने तुझे अमान दी थी ,वह आबरू की हिफाज़त करेगा, और बहन के लिए न सही पर एक औरत की अस्मिता पर सब कुछ दाव पर लगा देगा ,क्यू कि वह एक मुसलमान है।
रणवीर घोड़े पर सवार हो उल्टा सरपट दौड़ गया। इधर सोमनाथ में सालाना इज़लास चल रहा था , इस सालाना इज़लास में सारे राज़ा और अधिकारी गुजरात के सोमनाथ में जमा होते ,जो लड़कियां देवदासी के तौर पर लायी जातीं उनकी पहले से डांस की ट्रेनिंग दी जाती , जो लड़की पहले नं.पर आती उस पर सोम नाथ के बड़े भगवान का हक़ माना जाता ,बाकी लड़कियां छोटे बड़े साधुओं की खिदमत करने को रहतीं और अपनी बारी का इंतज़ार करतीं , उन सभी लड़कियों को कहा जाता कि साज़ श्रृंगार और नाज़ो अदा सीखें , जिससे भगवान को रिझा सकें ।
एक दिन ऐसा आता कि जितने वाली लड़की को कहा जाता कि आज उसे भगवान ने भोग विलास के लिए बुलाया है , उसके बाद वह लड़की कभी नज़र नही आती , ऐसा माना जाता कि महादेव उस लड़की को अपने साथ ले गए और अब वह उनकी पटरानी बन चुकी है।
यह बातें रणवीर को पता थीं ,उसकी सोच सोच कर जिस्मानी ताक़त भी सल हो गयी थी , ताहम उसका घोडा अपनी रफ़्तार से दौड़ रहा था, ग़ज़नवी से मिल कर उसने अपनी रूदाद बताई ,एक गैरत मन्द कौम के बेटे को किसी औरत की आबरू से बड़ी और क्या चीज़ हो सकती थी ,वह हिंदुत्व या सनातन को नही जानता था , उसे पता भी नही था कि यह कोई धर्म भी , और जब परिचय ही नही था तो द्वेष का तो सवाल ही नही था , हाँ उसके लिए बात सिर्फ इतनी थी कि एक बहादुर सिपाही की मज़लूम तनहा बहन को कुछ पाखंडी उठा ले गए हैं और जब उसका भाई उससे मदद की गुहार लगा रहा है , वह गैरत मन्द सालार अपने दिल ही दिल में अहद करलिया कि वह एक भाई की बहन को आज़ाद कराने के लिए अपने आखरी सिपाही तक जंग करेगा , ग़ज़नवी जिसके घोड़ो को हर वक़्त जीन पहने रहने की आदत हो चुकी थी , और हर वक़्त दौड़ लगाने के लिए आतुर रहते , वह जानते थे कि सालार की बेशतर जिंदगी आलीशान खेमो और महलों में नही बल्कि घोड़े की पीठ पर गुजरी है , गज़नबी फ़ौज को सोमनाथ की तरह कूच का हुक्म दिया ।
यह अफवाह थी कि सोमनाथ की तरफ देखने वाला जल कर भस्म हो जाता है ,और गज़नबी की मौत अब निश्चित है , वह मंदिर क्या शहर में घुसने से पहले ही दिव्य शक्ति से तबाह हो जायेगा ,अफवाह ही पाखंड का आधार होती है , गज़नबी अब मंदिर परिसर में खड़ा था , बड़े छोटे सब पूरोहित बंधे पड़े थे , राजाओं और उनकी फ़ौज की लाशें पुरे शहर में फैली पड़ीं थीं जिन्हें चील कवे खा रहे थे , और सोमनाथ का बुत टूट कर कुछ पत्थर नुमा टुकड़ों में तब्दील हो गया था ,, दरअसल सबसे बड़ी मौत तो पाखंड रूपी डर की हुई थी, कमरों की तलाशी ली जा रही थी जिनमे हज़ारो हज़ार जवान और नौ उम्र लडकिया बुरी हालत में बंदी पायी गईं , वह लड़कियां जो भगवान के पास चली जाती और कभी नही आती , पूछने पर पता चला कि जब बड़े पूरोहित के शोषण से गर्भवती हो जातीं तो यह ढोंग करके कत्ल करदी जाती , इस बात को कभी नही खोलतीं क्यू कि धर्म का आडंबर इतना बड़ा था कि यह इलज़ाम लगाने पर हर कोई उन लड़कियों को ही पापी समझता ।
महमूद ने जब अपनी आँखों से यह देखा तो हैरान परेशान , और बे यकीनी हालात देख कर तमतमा उठा , रणवीर जो कि अपनी बहन को पा कर बेहद खुश था , उससे गज़नबी ने पुछा कि क्या देवदासियां सिर्फ यहीं हैं , रणवीर ने बताया कि ऐसा हर प्रांत में एक मंदिर है।
उसके बाद गज़नबी जितना दौड़ सकता था दौड़ा , और ब्राह्मणवादी जुल्म , उनके बुत कदों को ढहाता चला गया , पुरे भारत में न कोई उसकी रफ़्तार का सानी था ,और न कोई उसके हमले की ताब ला सकता था , सोमनाथ को तोड़ कर अब वह यहाँ के लोगों की नज़र में खुद एक आडंबर बन चूका था ,दबे कुचले मज़लूम लोग उसे अवतार मान रहे थे , गज़नबी ने जब यह देखा तो तौहीद की दावत दी ,वह जहाँ गया वहां प्रताड़ित समाज स्वेच्छा से मुसलमान हो उसके साथ होता गया , उसकी फ़ौज में आधे के लगभग हिन्दू धर्म के लोग थे जो उसका समर्थन कर रहे थे ।उसकी तलवार ने आडंबर , ज़ुल्म और पाखंड को फ़तेह किया तो उसके किरदार ने दिलों को फ़तेह किया । वह् अपने जीते हुए इलाके का इक़तिदार मज़लूम कौम के प्रतिनिधि को देता गया और खुद कहीं नही ठहरा । वह एक लुटेरा नही , इज़्ज़ातो का अमीन था। वह जो महमूद गज़नबी था।।
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