*क्या बनू क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?*
क्या मुहम्मद ﷺ ने बनू-क़ुरैज़ा का कत्लेआम किया(नाउजुबिल्लाह) या उन्हें राजद्रोह की सजा मिली?_
इस्लाम की दावत देने की जिम्मेदारी हर मुसलमान पर है। और इस्लाम के विरोधियों ने इस्लाम पर कई तरह के *ऐतराज(आक्षेप)* लगाए हैं, जिससे आम जनता के मन में इस्लाम की गलत छवि बन गई है।
इन्हीं गलतफहमियों में से एक है; मदीना में मौजूद तीन कबीलों में से एक यहूदी कबीले *बनू-क़ुरैज़ा* से हुई जंग।
असल में ये युद्ध किसी जमीनी क्षेत्र या संसाधनों पर अधिकार के लिए नहीं लड़ा गया था, बल्कि मदीने की सुरक्षा के लिए मुसलमानों और *यहूदियों के मध्य हुई सन्धि को तोड़ने के जुर्म में राजद्रोह की सजा के फलस्वरूप यहूदियों से युद्ध किया गया था।*
मदीना में तीन यहूदी कबीले आबाद थे::
1⃣ बनू क़ैनकाअ– ये अंसार में से खज़रज के मित्र थे और इनकी आबादी मदीने के अंदर थी।
2⃣ *बनू क़ुरैज़ा, और*
3️⃣ बनू नज़ीर — *ये दोनों औस के मित्र थे* और इन दोनों की आबादी मदीने के बाहरी हिस्से में थी।
हम यहां पर सिर्फ यहूदियों के *बनू-क़ुरैज़ा* कबीले के बारे में बात करेंगे क्योंकि जो एतराज किया जाता है, वो इसी कबीले के बारे में किया जाता है।
ऐतराज यह किया जाता है कि मुहम्मद ﷺ ने बनू क़ुरैज़ा के लोगों का कत्ल-ए-आम किया, उनका नरसंहार किया। और इनके बीवी बच्चों को गुलाम बना लिया।
बनू क़ुरैज़ा को लाचार, बेबस, बेचारा, मासूम, बेगुनाह और दयनीय बता कर इनका बचाव किया जाता है। और मुहम्मद ﷺ पर इसका इल्ज़ाम लगा दिया जाता है।
यह ऐतराज करने वालों में अक्सर तो वही लोग होते हैं जो इस घटना के इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते हैं और बस जो सुना उसे नकल करते रहते हैं। कुछ वो होते हैं जो बस थोड़ा बहुत जानते हैं। और बहुत कम लोग वो होते हैं जो सब कुछ जानते हैं लेकिन फिर भी लोगों को गुमराह करने और इस्लाम पर इल्ज़ाम धरने की अपनी हर कोशिश करते हैं।
अब इसकी हकीकत क्या है ये हम पर जानना लाज़मी है। जब तक इसकी पूरी जांच पड़ताल नहीं की जाये तब तक सही निर्णय तक नहीं पहुंचा जा सकता है।
इस लेख में हम बिंदुवार तरीके से इस घटना का विश्लेषण करेंगे और यह भी जानेंगे कि मदीना में रसूल ﷺ के आगमन से ही यहूदियों का व्यवहार रसूलल्लाह ﷺ और मदीना की इस्लामी रियासत के साथ कैसा था?
वह बिंदु कुछ इस तरह से हैं:-
1️⃣ यहूद की मुसलमानों से दुश्मनी की मिसाल और सच मालूम होने के बाद भी यहूद का हठधर्मी दिखाना।
2️⃣ मुहम्मद ﷺ ने यहूदियों के साथ समझौता किया था और आज के यहूदी इतिहासकार इस बात को मानते हैं
3️⃣ यहूदियों का मदीना में दंगा भड़काने की कोशिशें
4️⃣ बनू क़ुरैज़ा ने खन्दक की जंग से पहले भी रसूलल्लाह से ﷺ जंग की थी, जिस पर उन्हें माफ कर दिया गया
5️⃣ जंग-ए-अहज़ाब(खंदक) और बनू- क़ुरैज़ा का धोखा
6️⃣ बनू क़ुरैज़ा का हथियार और रसद मुहैया करवाना
7️⃣ बनू क़ुरैज़ा का मदीना की औरतों और बच्चों पर हमलावर होने की कोशिशें
8️⃣ बनू-क़ुरैज़ा ने अपना मध्यस्थ(जज) खुद चुना और बनू-क़ुरैज़ा को उनके किये का फल मिला
9️⃣ बनू-क़ुरैज़ा का फैसला उनकी किताब तौरात (Old Testament) के आधार पर किया गया।
1️⃣0️⃣ क्या बनू क़ुरैज़ा के सारे मर्दों को क़त्ल कर दिया गया?
1️⃣1️⃣ बनू क़ुरैज़ा की घटना पर आलोचक ये भी आपत्ति करते हैं कि इसमें बच्चों को क़त्ल किया गया।
1️⃣2️⃣ यहूदी विरोधी पूर्वाग्रह (Anti-Semitism) का आरोप
1️⃣3️⃣ राजद्रोह के मामले में अंतरराष्ट्रीय कानून
हजरत मुहम्मद ﷺ के मदीना आगमन से पहले इन तीनों कबीलों का काम औस और खज़रज के बीच लड़ाई भड़काने का था और यह यहूदी कबिले( बनी क़ैनकाअ, बनी क़ुरैज़ा और बनी नज़ीर) तीनों अपने अपने ‘मित्रों’ को सूद पर कर्जा देते थे, और उनसे माल कमाते थे। जैसा कि आजकल भी कई विकसित देश अपने हथियार बेचने के लिए विकासशील देशों में हिंसा भड़का कर अपने स्वार्थ साधते हैं और इन यहूदी क़बीलों ने औस और खजरज पर इतना कर्ज़ा चढ़ा दिया था कि उन्हें अपनी जमीनें और बाग़ात से भी हाथ धोना पड़ा।
जारी है.......!!
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क्या बनू-क़ुरैज़ा ने राजद्रोह किया?
1️⃣ *यहूद की मुसलमानों से दुश्मनी की मिसाल और सच मालूम होने के बाद भी यहूद का हठधर्मी दिखाना।*
इस्लाम के प्रारंभिक दिनों से ही यहूदी लोग मुहम्मद ﷺ. को सच्चा नबी जानने के बावजूद घमंड में सच्चाई को झुठलाते रहे और उन्होंने इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगैंडा फैलाने में सबसे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और मुसलमान आबादी को हर किस्म से नुकसान पहुंचाने की साजिशें की।
⛔ इसकी कुछ मिसालें हमें इस तरह मिलती है:
जब अल्लाह के रसूल ﷺ मदीना में तशरीफ़ लाये तो उम्मुल मोमिनीन हज़रत सफिया के वालिद हुई बिन अखतब और हज़रत सफिया के चचा अबू यासिर, मुहम्मद ﷺ के पास आये और वापस आ कर कुछ बात की जिसको हज़रत सफिया रिवायत करती हैं
*हज़रत सफिया कहती हैं, मेरे चचा मेरे वालिद हुई बिन-अखतब से कह रहे थे कि*
*“क्या यह वही है?”*
*उन्होंने कहा, ‘हाँ, खुदा की कसम।’*
*चचा ने कहा, ‘आप उन्हें ठीक ठीक पहचान रहे हैं?’*
*पिता ने कहा, ‘हाँ।’*
*चचा ने कहा, ‘तो अब आपके मन मे उनके बारे में क्या इरादे हैं?*
*पिता ने कहा, ‘ दुश्मनी, खुदा की कसम, जब तक जिंदा रहूंगा।’*
📚 _इब्ने-हिशाम 1/555-556_
यह एक मिसाल थी जिसमें यहूदियों ने मुसलमानों से दुश्मनी जाहिर की है, इस दुश्मनी की आगे और मिसालें बयान की गई है। और इस दुश्मनी के पीछे क्या वजह है यह भी बताया जाएगा।
इसी की गवाही सहीह बुख़ारी की इस रिवायत से भी मिलती है, जिसमें हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम रज़ियल्लाहु अन्हु के मुसलमान होने की घटना बयान की गई है । वह एक बहुत ही ऊंचे यहूदी विद्वान थे । आपको जब बनू नज्जार में अल्लाह के रसूल ﷺ के आने की ख़बर मिली, तो वह आप ﷺ की सेवा में बिना देर किए हाज़िर हुए और कुछ सवाल किए, जिन्हें सिर्फ एक नबी ही जानता है और जब नबी की ओर से उनके जवाब सुने, तो वहीं उसी वक़्त मुसलमान हो गए, फिर अब्दुल्लाह बिन सलाम ने आप ﷺ से कहा:
“यहूदी एक बोहतान लगाने वाली क़ौम है । अगर उन्हें इससे पहले कि आप मेरे बारे में उनसे कुछ मालूम करें, अगर उन्हें मेरे इस्लाम लाने का पता लग गया, तो वे आपके पास बोहतान गढ़ेंगे।”
इसलिए अल्लाह के रसूल ﷺ ने यहूदियों को बुला भेजा, वे आए ( और उधर अब्दुल्लाह बिन सलाम घर के अन्दर छिप गए थे ), तो अल्लाह के रसूल ﷺ ने पूछा,”अब्दुल्लाह बिन सलाम तुम्हारे बीच में कैसे आदमी हैं ?”
उन्होंने कहा, “हमारे सबसे बड़े विद्वान हैं और सबसे बड़े विद्वान के बेटे है। हमारे सबसे अच्छे आदमी हैं और सबसे अच्छे आदमी के बेटे हैं।”
एक रिवायत के शब्द ये हैं कि “हमारे सरदार हैं और हमारे सरदार के बेटे हैं।” और एक दूसरी रिवायत के शब्द ये हैं कि, “हमारे सब से अच्छे आदमी हैं और सबसे अच्छे आदमी के बेटे हैं और हम में सबसे अफ़ज़ल हैं और सबसे अफ़ज़ल आदमी के बेटे हैं।”
अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया,” अच्छा यह बताओ, अगर अब्दुल्लाह मुसलमान हो जाएं तो ?”
यहूदियों ने दो या तीन बार कहा, “अल्लाह उनको इससे बचाए रखे।”
इसके बाद हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम निकले और फरमाया ‘अश्हदु अल-ला इला-ह इल्लल्लाह व अश्हदु अन-न मुहम्मदुर रसूलुल्लाह ( मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मैं गवाही देता हूं कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। )
इतना सुनना था कि यहूदी बोल पड़े,
‘यह हमारा सबसे बुरा आदमी है और सबसे बुरे आदमी का बेटा है। और (उसी वक़्त) उनकी बुराइयां शुरू कर दी।’
एक रिवायत में है कि इस पर हज़रत अब्दल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) ने फ़रमाया:
‘ऐ यहूदियों ! अल्लाह से डरो। उस अल्लाह की कसम, जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, तुम लोग जानते हो कि आप अल्लाह के रसूल है और हक़ लेकर तशरीफ़ लाए हैं ।’
लेकिन यहूदियों ने कहा कि ‘तुम झूठ कहते हो।’
📚 _सहीह बुखारी 4480_
📚 _सहीह बुखारी 3329_
यह पहला तजुर्बा था जो अल्लाह के रसूल ﷺ को यहूदियों के बारे में हासिल हुआ और मदीने में दाखिले के पहले ही दिन हासिल हुआ।
*यही अब्दुल्लाह बिन सलाम जो कि एक यहूदी विद्वान(आलिम) है, फरमाते हैं कि जब अल्लाह के रसूल ﷺ मदीना तशरीफ़ लाये तो लोग आपकी तरफ दौड़ पड़े और कहने लगे :-*
_“अल्लाह के रसूल आ गए”_
_“अल्लाह के रसूल आ गए”_
_“अल्लाह के रसूल आ गए”_
चुनाचे मैं भी लोगों के साथ आया ताकि आपको देखूं, *फिर जब मैंने आप ﷺ का चेहरा मुबारक देखा तो पहचान गया कि “ये किसी झूठे का चेहरा नहीं हो सकता।”*
📚 _जामेअ तिर्मिज़ी 2485 (सहीह)_
इसी तरह अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) से ही रिवायत है कि किस तरह यहूदी अपनी धार्मिक किताब यानी तौरात की आयतों को छुपाते थे और और समाज में बुराइयों के पनपने का मौका देते थे। आप (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) कहते हैं कि एक मौके पर यहूदी अल्लाह के रसूल सल्ल. की खिदमत में अपने में से एक शख्स का मुकदमा लेकर आये जिसने जिना(बलात्कार) किया था।
*अल्लाह के रसूल ने अपनी आदत के मुताबिक उनकी ही किताब यानी तौरात मंगवाई, और उसमें से इसकी सजा का हुक्म सुनाने के लिए कहा। जिस हुक्म को एक यहूदी ने अपने हाथ से छिपा लिया था, लेकिन तौरात के आलिम अब्दुल्लाह बिन सलाम (रज़ियल्लाहु अ़न्हु) ने उसकी ये खयानत पकड़ ली और तौरात के मुताबिक सजा दी गई जो रज्म की सजा थी।*
*इससे हमें ये भी पता चला कि यहूदियों ने अपनी ही किताब को छोड़ रखा था और नबी सल्ल. यहूदियों के फैसले उनके पास मौजूद आसमानी किताब के जरिये किया करते थे।*
📚 _सुनन अबू दाऊद 4446 (सहीह)_
यहूदियों की यह कुछ मिसाल है, ऐसी और भी मिसाल मिलती हैं।
अब इन दोनों घटनाओं की अच्छी तरह जांच करने के बाद मालूम होता है कि इन मे दो बात समान हैं।
1️⃣ एक तो यह कि यहूदियों को ये मालूम हो गया था कि ये जो रसूल आया है वही हमारा भी रसूल है।
2️⃣ और दूसरी यह कि यहूदी सत्य स्पष्ट हो जाने के बाद अब दुश्मनी निभाने का वादा कर चुके थे।
इन सब के पीछे एक बात समझ लेनी चाहिए कि *यहूदी* और *ईसाई* दोनों की *किताब तौरात और बाइबिल में लिखा था कि इस जमाने मे, इस जगह पर एक रसूल आएगा और यहूदी इस बात को भली भांति जानते भी थे यानी वो अल्लाह के रसूल सल्ल. से इतनी अच्छी तरह परिचित थे कि जैसे अपनी औलाद से होते हैं।*
📚 _क़ुरआन सूरह अनआम 6:20_
यहूदियों कि इस हठधर्मी की एक बड़ी वजह यह थी कि वो मानते थे कि नबी और रसूल, अल्लाह बस उन्हीं की कौम में भेजता है और भेजता रहेगा और किसी दूसरी कौम में नहीं भेजता और न ही भेजेगा। ऐसा इसलिए था कि वो मानते थे कि यहूदी अल्लाह की चुनी हुई कौम है और पिछले 3500 साल से नबी और रसूल उन्हीं में से आ रहे थे। इसलिए उन्हें गलत फहमी हो गयी कि अब नबी और रसूल बस हमारी कौम में ही आएंगे। इसलिए वो यह मानने को तैयार न थे कि किसी दूसरी कौम में रसूल आ सकता है और वो भी ऐसी कौम जिन्हें वो उम्मी (अनपढ, जाहिल और गैर यहूदी) समझते थे। बस यही वजह थी कि वो लोग मुहम्मद ﷺ के बारे में सच जान लेने के बाद भी झुठला रहे थे।
*इसी वजह से वो यह भी सोच कर बैठे थे कि जब हमारी कौम में वो रसूल आएगा तो हम(यानी यहूदी) रसूल के साथ मिल कर यसरीब(मदीना) की आबादी को मार काट कर यहां से भगा देंगे।*
जारी है......!!
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बनू क़ुरैज़ा।
जब मुस्लिमों की अच्छी छवि को कुछ लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते, तो वो बनु क़ुरैज़ा की मनगढ़ंत कहानियां सुनाकर मुस्लिमों की छवि खराब करने के प्रयास करने लगते हैं...
वैसे तो नबी सल्ल० के ज़माने के ढाई सौ साल बाद लिखी गई इन कहानियों की सच्चाई पर ही मैं यकीन नहीं करता, पर मुसलमानों की विशाल आबादी जो हदीसों को सही भी मानती है वो बेकुसूरों पर अत्याचार की बात तो नही करती ... देख लो.....
बनू कुरैज़ा एक यहूदी कबीला था जिसने मुसलमानों के साथ ये सन्धि की थी कि वे मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे काफिरों की सहायता नही करेंगे, बल्कि मदीना की हिफाज़त मे मुस्लिमों का साथ देंगे
लेकिन अस्ल मे उन यहूदियों के दिलों मे मुस्लिमों से नफरत और दुश्मनी भरी थी, और सन्धि उन्होंने केवल दिखावे के लिए की थी ताकि ये यहूदी खुद तो अन्दर ही अन्दर मुस्लिमों की जड़ें काटते रहें, पर मुस्लिम इन साज़िशों से अनजान रहें और इन यहूदियों के विरुद्ध कोई कदम न उठा पाएँ..
अपनी इसी छिपी रणनीति के तहत ये बनू कुरैज़ा के यहूदी मुस्लिमों के दुश्मनों की मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध मे चुपके चुपके मदद करते रहते थे, पहले बद्र की लड़ाई मे मुस्लिमों पर हमला करने वाले कुरैश की मदद बनू कुरैज़ा वालों ने हथियारों से की थी, जिसका पता भी प्यारे नबी सल्ल. को लगा, मगर उस वक्त रहमतुल्लिल आलमीन सल्ल. ने बनू कुरैज़ा का ये कसूर माफ कर दिया
फिर अहज़ाब की लड़ाई के वक्त ये यहूदी खुलकर सामने आ गए और इन यहूदियों ने खुद जा जाकर मुसलमानों के दुश्मनों को लड़ाई के लिए उकसाया , और उनको मुस्लिमों के विरुद्ध पूरी मदद देने के वायदे किए, ताकि तमाम मुसलमानों का इसी लड़ाई मे खात्मा हो जाए
अहज़ाब की लड़ाई मे बनू कुरैज़ा की इस गद्दारी की वजह से बहुत मुसीबतों का सामना करना पड़ा
इसलिए अहज़ाब की लड़ाई खत्म हो जाने के बाद बनू कुरैज़ा का घेराव किया गया, इन यहूदियों को सज़ा देना जरूरी था, वरना अगर मुस्लिम इन यहूदियों को सबक न सिखाते तो ये यहूदी हमेशा काफिरों को उकसा कर मुसलमानों पर हमले करवाते रहते, मुस्लिमों को खत्म करवाते रहते...
जब इन यहूदियों ने खुद को मुसलमानों की पकड़ मे पाया तो मुसलमानों के सामने ये मांग रखी कि "हज़रत साद बिन मुआज़ को हमारे (बनु कुरैज़ा) के मामले मे मुंसिफ (सरपंच) बना दिया जाए ,और जो फैसला साद बिन मुआज़ करें वो हमें भी मन्ज़ूर होगा, और उस फैसले को नबी सल्ल. भी मान लें ! "
आप सल्ल. ने यहूदियों की ये मांग मान ली, शायद यहूदियों की नज़दीकी हज़रत साद बिन मुआज़ से थी जिस वजह से बनू कुरैज़ा को फैसले मे हज़रत साद से यहूदियों की तरफदारी की उम्मीद थी ... मगर ज़रूरी तहकीकात के बाद हज़रत साद ने ये फैसला दिया कि मुसलमानों से युद्ध करने वाले बनू कुरैज़ा के वाले मर्दों को सज़ा ए मौत दी जाए, जबकि उनके साथ की औरतों और बच्चों को गुलाम बनाया जाए ..
ये बात ध्यान मे रखनी चाहिए खुद उन यहूदियों के चुने हुए न्यायाधीश ने उन यहूदियों के ही कानून के मुताबिक उन्हें सज़ा दी थी जिस तरह वो यहूदी अपने दुश्मनों को सज़ा देते थे ... इस तरह की सज़ा यहूदी और ईसाईयों द्वारा अपने दुश्मनों को देने का हुक्म आज भी बाइबल के लेविटिकस, अध्याय 20, आयत 10 मे आप देख सकते हैं .... सो अगर सज़ा सख्त थी तो इसके लिए इस्लाम को दोष नहीं दिया जा सकता , यदि दोष ही दिया जाए तो वह यहूदियों के अपने कानून को जाएगा ॥
और क्योंकि बनू कुरैज़ा का फैसला उन यहूदियों की ही मांग पर नबी सल्ल. ने नही किया था, इसलिए बनू कुरैज़ा को मिली सख्त सजा का दोष नबी सल्ल. को नही दिया जा सकता बल्कि नबी सल्ल. से नफरत या दुश्मनी के चलते बनू कुरैज़ा वालों ने नबी सल्ल. से अपना फैसला न करवाकर, और नबी सल्ल. से साद बिन मुआज़ का फैसला मानने का वादा लेकर अपना ही नुकसान कर लिया, वरना हमें पूरा यकीन है कि अगर बनू कुरैज़ा वालों ने अपना फैसला नबी सल्ल. पर छोड़ा होता तो उन यहूदियों को आप सल्ल. मौत की सज़ा तो न ही सुनाते , जैसे आप सल्ल. ने पहले भी ऐसे ही अपराधों पर बनू केनुक़ाअ और बनी नज़ीर जैसे कबीलों को मौत की सजा न दी थी
फिर भी आप सल्ल. ने मुसलमानों के खून के प्यासे इन बनू कुरैज़ा मे से भी कुछ की सज़ा माफ करवा दी थी, जैसे ज़ुबैर यहूदी और रिफ़ाआ बिन शमूईल यहूदी दोनों की जां बख्शी फरमा दी थी (तारीखे तबरी)
याद रखिए गुलाम बनाने या कत्ल करने की सजा उन्हीं स्त्री पुरुष और बच्चों को दी गई थी जो लोग युद्ध मे मुस्लिमों के विरुद्ध शामिल थे, और मुस्लिमों की हत्याओं के दोषी थे ... और एक बात और याद रखनी चाहिए कि मुस्लिमों द्वारा गुलाम बनाए गए लोगों का कुरान और हदीस के स्पष्ट आदेशों के कारण, कभी किसी तरह से शोषण नहीं किया जाता था, जैसा गम्भीर शोषण गैरमुस्लिम अपने युद्धबंदियों के साथ उन्हें गुलाम बनाकर करते थे ॥
कुछ विरोधियों ने ये साबित करने के लिए कि मुस्लिमों ने बनू कुरैज़ा के बच्चों को मारा, अबू दाऊद शरीफ़ की रिवायत 39/4390 दिखाई कि बनू कुरैज़ा के युद्ध अपराधियों को परीक्षित किया व जिनके शरीर पर युवावस्था के बाल निकल आए थे उन्हे मृत्युदण्ड दिया गया जबकि जिनके शरीर पर ये बाल नही निकले थे उन्हें जीवित छोड़ दिया गया ...
ज़रा वे खुद आँखे साफ कर के देखें कि हदीस से सिद्ध होता है कि केवल जवान पुरूषों को दण्ड दिया मुस्लिमों ने और कम उम्र लड़कों को अपराधी होने के बावजूद कड़े दण्ड से बचा लिया
जहाँ तक स्त्रियों और बच्चों की हत्याओं का प्रश्न है तो आजकल देख रहा हूँ कि साम्प्रदायिक दंगों के समय अल्पसंख्यकों के छोटे छोटे बच्चों को निर्ममता से काट डालने वालों की भर्त्सना तो छोड़िए, हमारे बंधुवर तो करोड़ों बच्चियों की भ्रूण हत्या, तान्त्रिकों द्वारा अनगिनत अबोध बच्चों की हत्या और धर्म के नाम पर अब तक जारी सती प्रथा पर भी मुंह नहीं खोलते, और हाय तौबा मचाते हैं मुस्लिमों द्वारा बनु कुरैज़ा के उन युवकों को मृत्युदण्ड दिए जाने पर जो कि मुस्लिमों की हत्या के दोषी थे...
वैसे जिस उम्र के यहूदी युद्ध अपराधियों को मुस्लिमों ने मृत्युदण्ड दिया आठ वर्ष पहले इसी उम्र के बलात्कारी को (निर्भया केस के नाबालिग 17 वर्षीय बलात्कारी के विषय मे) मृत्युदण्ड दिए जाने की मांग को लेकर देश के अधिकांश बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता ने आन्दोलन चलाया था ... यदि कमउम्र के जघन्य अपराधियों को कड़े दण्ड का पक्ष लेना क्रूरता है तो फिर यही कहा जाएगा कि हमारे देश का बुद्धिजीवी समाज सबसे बड़ा क्रूर है ॥
खैर, इस्लाम मे किसी कमउम्र लड़के को युद्ध के योग्य और उसी तरह युद्ध अपराधी मानने की दो शर्तें हैं पहली शर्त ये कि लड़का पन्द्रह वर्ष की आयु पार कर चुका हो (देखिए अबू दाऊद, 39/4392) 15 वर्ष से आशय कि इस उम्र तक लड़के पूर्ण बढ़त, कद पा चुके होते हैं , एवं इसके बाद वे युवावस्था (प्यूबर्टी) को भी पा चुके हों, क्योंकि नबी स. ने निर्देश दिया है कि अल्लाह युवावस्था प्राप्त करने से पहले की आयु के लड़कों के कर्मो (पाप) का हिसाब नहीं करता (अबू दाऊद, किताब 39, हदीस 4384, 4385, 4386, 4387, 4388 और 4389) इसलिए इनके अपराधों पर मुस्लिमों को भी इन्हें गम्भीर दण्ड देने का अधिकार नहीं ॥
स्वयं अरब के गैरमुस्लिम भी 15 वर्ष की आयु से पहले लड़कों को युद्ध मे नही ले जाते थे क्योंकि जिक्र मिलता है कि जब इस्लाम का कोई विधान अरब मे नही आया था तब भी नबी स. को पहली बार अपने चचाओं के साथ युद्ध मे तब जाना पड़ा था जब आप स. की उम्र 15 वर्ष थी ... स्पष्ट है कि बनू कुरैज़ा के यहूदियों ने भी 15 वर्ष से ऊपर की आयु के लड़के लड़कियों को अपने साथ युद्ध मे शामिल किया था
खैर, इसलाम नियमानुसार जिन (15 वर्ष की आयु के) लड़कों की बढ़वार ही न हो पाई हो ऐसे लड़कों को तो आब्वियस ही है कि बच्चा मानकर छोड़ दिया जाने का नियम है ....तो बनू कुरैज़ा के जिन लड़कों का कद अच्छी तरह बढ़ा हुआ था एवं जो मुस्लिमों के हत्यारे थे, केवल उन्ही की प्यूबर्टी को परीक्षित किया गया ... और अबू दाऊद शरीफ़ 39/4390 को रिवायत करने वाले अतिया अल कुरैज़ी जो मुस्लिमों के हत्यारे थे और कद मे पूरे थे, लेकिन उनके जिस्म पर बाल न पाए जाने के कारण मौत की सजा से बच गए
यहां एक बात और स्पष्ट कर दी जाए कि जिन बच्चों को गुलाम बनाने का आदेश साद बिन मुआज़ रज़ि. ने दिया था उन बच्चों से आशय 15 वर्ष के वे लड़के थे जिन्होंने मुस्लिमों को युद्ध मे हानि पहुंचाई थी या मुस्लिमों के कत्ल भी किए थे, लेकिन इन लड़को के शरीर पर बाल न निकले होने के कारण इनके साथ सख्त व्यवहार नहीं किया गया। खैर स्पष्ट ये होता है कि किसी अबोध बच्चे को मुस्लिमों ने गुलाम नहीं बनाया, बल्कि समझदार और पर्याप्त उम्र के अपराधी लड़कों को सजा के तौर पर बंधक बनाया जैसे निर्भया का बलात्कार करने वाले नाबालिग बलात्कारी को जेल मे बन्द कर के रखा गया है उसके 17 वर्ष के कमउम्र होने पर भी उसे छोड़ नही दिया गया।
तो मै नही समझता कि इस केस मे मुस्लिमो से कोई गलती हुई जिन यहूदियों ने अपने बच्चों (यदि इन्हें बच्चा माना जाए) को युद्ध मे झोंक दिया गलती तो उनकी थी, वो बच्चे दुश्मनों के हाथों मारे जा सकते थे, उनका किसी भी तरह का शोषण हो सकता था, इन सारी फिक्रो को दरकिनार कर के जब खुद वे यहूदी अपने बच्चों को लड़ाई लड़ने के लिए ले आए थे तो फिर उन्होंने तो अपने बच्चों को मार ही डाला था, ये तो मुस्लिम थे जिन्होंने उन बच्चों को अपने पारिवारिक सदस्य सा बना लिया कोई और तो जाने क्या करता
और एक बहुत बड़ा झूठ एक भारी संख्या मे बनू कुरैज़ा के पुरूषों की हत्या मुस्लिमों द्वारा किए जाने का बोला जाता है, जो कि पूरी तरह अस्वीकार्य है, चूंकि इस्लाम मे जान के बदले जान का नियम है, तिस पर भी माफी को वरीयता दी गई है, तो उन यहूदियों द्वारा यदि 40-50 से अधिक मुस्लिम नहीं मारे गए थे तो मृत्युदण्ड भी इससे अधिक लोगों को नहीं दिया जा सकता था ... उसपर इनमें से कई लोग अतिया की तरह अलग अलग कारणों से मौत की सजा से बच गए थे तो मौत की सजा पाने वालों का आंकड़ा 30-35 से ऊपर जा ही नही सकता।
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काबा बिन अशरफ
काब बिन अल अशरफ मदीना का एक यहूदी शायर था, ये इस्लाम का सख्त दुश्मन था और अपने शे'रों के जरिए काफिरो को मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जंग के लिए उकसाया करता था ..... इतिहासकार इब्न इस्हाक के मुताबिक़ बद्र की जंग मे मुस्लिमों की जीत से बुरी तरह खीज कर, काब मक्का गया और वहाँ जाकर अपने शे'रों के जरिए काफिरों को तब तक भड़काता रहा जब तक उन काफिरों ने मुस्लिमों से दोबारा जंग करने की ठान न ली
.... इसके बाद भी मुस्लिम औरतों के खिलाफ उकसाऊ शायरी लिखता सुनाता रहा जिससे काफिरो मे मुस्लिमों पर हमला कर के उनके साथ खूंरेजी करने और उनकी औरतों को उठा लेने की जोश और बढ़ा...
इसी जुर्म के कारण काब को सज़ा ए मौत दी गई कि वो मुस्लिमों के साथ कत्लोगारतगरी की वजह बन रहा था, और लगातार मुस्लिमों की सुरक्षा और जान माल को खतरे मे डाल रहा था, न कि उसे इसलिए मारा गया कि उसने नबी सल्ल. की तौहीन की, सही बुखारी और अबू दाऊद शरीफ़ की अहादीस मे भी ये कहीं नहीं लिखा कि रसूल सल्ल. ने काब को मारने का हुक्म अपनी शान मे गुस्ताखी के एवज मे दिया था, बल्कि अल्लाह और उसके रसूल सल्ल० को इज़ा (तकलीफ़) देने के अलफ़ाज़ का इशारा मुसलमानों पर हमले भड़काने की साज़िश से था .... अबू दाऊद शरीफ़ (English translation) की किताब 19, हदीस 2994 मे साफ लिखा है कि काब काफिरो को मुस्लिमों के खिलाफ उकसाया करता था और उसकी वजह से काफिर लोग मुस्लिमों पर बुरी तरह ज़ुल्म किया करते थे, काब ने जब अपनी इन हरकतों से बाज़ रहने की शर्त से इनकार कर दिया... तो हजारों लोगों की जान बचाने के लिये एक शख्स को मौत की सजा दी गई ...!!!
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*हज़रत ज़ैनब बिन्त ज़ैहस से निकाह का कारण और निवारण*
हमारे प्यारे नबी स. का अपना कोई बेटा नहीं था ,जो बेटे पैदा हुए भी उनका बहुत कमसिनी मे इन्तेकाल हो गया था, सो आप स. ने अपने एक आज़ाद किए हुए गुलाम जिनका नाम हज़रत ज़ैद बिन हारिस था को गोद लेकर अपना बेटा बना लिया था, मगर दोनों के बीच कोई खून का रिश्ता न था।
नबी स. चाहते थे कि हजरत ज़ैद रज़ि. की शादी बीवी ज़ैनब बिन्ते जहश से हो जाए, जबकि बीवी ज़ैनब के वालिदैन बीवी ज़ैनब की शादी खुद नबी स. से कराना चाहते थे।
लेकिन ये शादी ज्यादा दिन तक टिक न सकी हज़रत ज़ैद बिन हरिसा हज़रत मोहम्मद स,अ. के पास आते थे और अपनी इक्छा प्रकट करते थे कि अपनी पत्नी ज़ैनब को छोड़ देंगे क्योंकि उनके साथ उनकी बनती नही है और दोनों में वाद विवाद चलता रहता था।
और हजरत ज़ैद ने बीवी ज़ैनब बिन्त जहश रज़ि. को तलाक दे दी
क्योंकि ये शादी नबी स. के इसरार पर हुई थी इसलिए इस शादी के टूटने पर आप स. को बहुत रंज हुआ कि आप स. की वजह से बीवी ज़ैनब रज़ि. को इतनी तकलीफ पहुंची
*इस्लाम इस बात को पूर्णतया निषिद्ध (हराम) ठहराता है कि कोई बाप अपने जैविक पुत्र द्वारा तलाक दी हुई औरत से शादी करे*
लेकिन कुरान मे इस बात को भी स्पष्ट कर दिया गया है कि “गोद लिए हुए बेटे तुम्हारे असली बेटे नही हैं ” [Al-Quran, 33:4]
बीवी ज़ैनब रज़ि. का दुख दूर करने के लिए और अल्लाह के हुक्म पर बीवी ज़ैनब की शादी आप स. के साथ कर दी गई,
अस्ल मे इस्लाम हमें मुंहबोले रिश्तों के साथ खून के रिश्तों जैसा सुलूक करने से रोकता है, क्योंकि खून के रिश्तों मे तो प्रेम और मर्यादा अल्लाह पैदा करता है, जबकि मुंहबोले रिश्तों मे मर्यादा बनाने का प्रयास इनसान करता है , और इनसानी प्रयास मे असफलता की दर ज्यादा होती है, क्योंकि कृत्रिमता मे प्राकृतिकता वाला गुण बडे प्रयास से ही आ सकता है, वो भी शत प्रतिशत नहीं ... या बहुत बार व्यक्ति मुंहबोले रिश्ते बनाकर मर्यादा का केवल दिखावा करता है और दिल मे कपट छिपाकर बैठा होता है, इसलिए मुंहबोले रिश्तों मे अमर्यादित व्यवहार बहुत ज्यादा होते हम देखते हैं, जबकि खून के रिश्तों मे न के बराबर ...!!
हम अपने आसपास अक्सर देखते ही हैं कि वो युवा लड़का लड़की एक दूसरे के साथ घर से भाग जाते हैं, जो समाज की नजरों मे राखी भाई बहन थे .... अक्सर गुप्त प्रेमी प्रेमिका राखी के पवित्र बन्धन का इस्तेमाल अपने बेखौफ मेलजोल के बनाए रखने के लिए करते हैं , हमारा समाज उनको भाई बहन मानकर घुलने मिलने का पूरा मौका देता है जिसका नतीजा ये निकलता है . इस्लाम यही मौके नहीं देता मुंहबोले रिश्तों को ।
मुंहबोले रिश्तों के साथ जब खून के रिश्तों सा सुलूक न करने की सीमा बना दी गई तो ये मुंहबोले शून्य साबित हुए, और इन रिश्तों के शून्य होने से इनके बीच शादी होने की सम्भावना खुद पैदा हो गई ।
"मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के पिता नहीं हैं, परन्तु वह अल्लाह के सन्देष्टा और सन्देष्टाओं पर मुहर लगाने वाले (अन्तिम) हैं। और अल्लाह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है।"
(कुरआन सुराः अहज़ाब आयात 40 )
क़ुरआन को समझने के उसूल के अनुसार हम जब किसी भी आयत को समझेंगें तो उसके पसमंजर को साथ ने समझना बहुत आवश्यक है
इस आयत का शाने ए नज़ूल ये है की जब अल्लाह के रसूल(स) ने अपने मुँह बोले बेटे (हज़रत ज़ैद) की बीवी से उनके तलाक़ देने के बाद निकाह किया तो पैग़म्बर के विरोधियो ने ये आक्षेप लगाने शुरू किये की रसूल अल्लाह (स) ने अपनी बहु(हज़रत ज़ैनब (रज़ि)से निकाह कर लिया है और जो कतन सहीह नहीं है। इस जैसे आक्षेपो का खंडन करने के लिए ख़ुद अल्लाह रब्बुल आलमीन ने पैग़म्बर ए इस्लाम के लिए इस आयत को नाज़िल करके उनके विरोधियो के मुँह को बंद किया और उनकी तमाम आक्षेपो की जड़ काट दी।जैसा की उनका प्रथम आक्षेप ये था "मुहम्मद उर रसूल अल्लाह (स) ने अपनी बहु (ज़ैनब)से निकाह कर लिया है ! इसके जवाब में खुद अल्लाह ने कहा की " मुहम्मद तुम्हारे मर्दों में से किसी के बाप नहीं हैं"। अर्थात वे बेटा (ज़ैद-एक गुलाम जो पैग़म्बर के मुँह बोले बेटे थे)था ही कब जो उसकी छोड़ी हुई बीवी से निकाह हराम हो?
दूसरा आक्षेप ये था की अगर मुँह बोला बेटा वास्तविक बेटा नहीं है तब भी उसकी छोड़ी हुई पत्नी से निकाह कर लेना कुछ ज़रूरी तो न था। इसके जवाब में इस आयत में आगे कहा गया की " मगर वे अल्लाह के रसूल हैं ", अर्थात रसूल होने की हैसियत से उनके लिए ऐसा करना आवश्यक और अनिवार्य था की जिस हलाल चीज़/काम को तुम्हारी प्रथाओ ने अकारण हराम कर रक्खा है उसके बारे में सभी पक्षपातों को समाप्त कर दें और उसकी वैधता के विषय में किसी सन्देह की गुंजाईश बाक़ी न रहने दें।
फिर अतरिक्त ताकीद के लिए कहा गया "और वे नबियो के समापक है" अर्थात वो आख़री नबी हैं,अब उनके बाद कोई रसूल तो अलग रहा कोई नबी तक आने वाला नहीं है की क़ानून और समाज का कोई सुधार उनके समय में व्यहार में आने से रह जाये तो बाद का आने वाला नबी यह कमी पूरी कर दे, अतः ये और भी ज़रूरी हो गया था की अज्ञानता की इस प्रथा का अंत वे ख़ुद ही करके जाएँ।
इसके बाद आयत में और ज़ायदा ज़ोर देते हुए कहा गया " अल्लाह हर चीज़ का ज्ञान रखने वाला है"। अर्थात अल्लाह को मालूम है की इस समय मुहम्मद(स) के हाथो इस अज्ञानता की प्रथा को समाप्त करा देना क्यों ज़रूरी था और ऐसा न करने में क्या ख़राबी थी।
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Of Aisha’s Age at Marriage.
शादी के वक़्त हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र
ऐसा कहा जाता है कि जब हज़रत आयशा की उम्र छह साल थी तब आपका निकाह पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व.) के साथ हुआ, और जब आपकी उम्र नौ साल थी तब आप अपने शौहर के साथ रहने के लिए मदीना (हिजरत के बाद) मुंतक़िल हो गईं।
इस गुमराह करने वाली इत्तेला (सूचना) ने गलत तास्सुर दिया कि इस्लाम में बच्चों की शादी की इजाज़त है। ये क़ाबिले गौर है कि हदीस के मुस्तनद (प्रमाणिक) होने को साबित करने के लिए, रावियों, हालात और उस वक्त की कैफियत का तारीखी हक़ाएक़ (ऐतिहासिक तथ्यों) के साथ बाहमी ताल्लुक़ को देखा जाना चाहिए। इस सिलसिले में हिशाम की एक हदीस है जिसमें हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र नौ साल होने का इशारा मिलता है, जब वो अपने शौहर के साथ रहने के लिए आईं।
कई मुस्तनद (प्रमाणिक) हदीसें भी ज़ाहिर करती हैं कि हिशाम की रवायत नबी करीम (स.अ.व.) की ज़िंदगी की कई तारीखी हक़ाएक़ (ऐतिहासिक तथ्य) जिन पर इज्मा है, के गैर मुताबिक़ हैं। उमर अहमद उस्मानी, हकीम नियाज़ अहमद और हबीबुर्रहमान कांधोलवी जैसे उलमा के हवाले के साथ, इस हक़ीक़त के हक़ में कुछ दलीलें पेश करना चाहूंगी, कि हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र कम से कम 18 साल थी जब आपका निकाह हुआ और आपकी उम्र कम से कम 21 साल थीं जब आप नबी करीम (स.अ.व.) साथ रहने के लिए आप (स.अ.व.) के घर में मुंतक़िल हुईं।
उमर अहमद उस्मानी के मुताबिक़, सूरे अल-निसा में ये कहा गया है कि यतीमों (अनाथों) के वली उनका माल उन्हें वापस करने से पहले उनकी लगातार आज़ामाइश करते रहें, जब तक कि वो शादी की उम्र तक पहुँच जायें (4:6)। इससे उलेमा हज़रात ने ये नतीजा निकाला है कि क़ुरआन ने शादी की एक कम से कम उम्र तय की है जो कम से कम सने बलोगत है। चूंकि लड़की की मंजूरी एक कानूनी आवश्यकता है इसलिए वो नाबालिग नहीं हो सकती है।
हिशाम बिन उरवह इस हदीस के खास रावी हैं। उनकी ज़िंदगी दो दौरों में तकसीम की गयी हैः 131 A.H. में मदनी मुद्दत समाप्त हुई, और इराकी अवधि शुरू हुई, उस समय हिशाम की उम्र 71 साल थी। हाफ़िज़ ज़हबी ने बाद के समय में हिशाम की याददाश्त खराब हो जाने के बारे में बात की है। मदीना, में उनके तालिबे इल्मों इमाम मालिक और इमाम अबू हनीफह ने इस हदीस का ज़िक्र नहीं किया है। इमाम मालिक और मदीने के लोगों ने उन्हें उनकी इराकी हदीसों के लिए तंक़ीद (आलोचना) की है।
इस हदीस के सभी रावी इराकी हैं जिन्होंने हिशाम से उसे सुना था। अल्लामा कांधोलवी का कहना है कि हज़रत आयशा रज़ि. की उम्र के बारे में कहा गया शब्द ‘तिस्सह अशरह’ कहा गया है जिसका अर्थ 19 है, जब हिशाम ने सिर्फ तिस्सह सुना (या याद किया) जिसका मतलब 9 होता है। मौलाना उस्मानी का खयाल है कि इस तब्दीली को जान बूझ कर और बदनियती से बाद में बनाया गया था।
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हज़रत आइशा रजी. से कम उमरी में शादी की हिकमत । पोस्ट बड़ी है पर पढ़ना जरूरी है
अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत आइशा रज़ी. से कम उमरी में शादी क्यों की… इस के पीछे अल्लाह के रसूल सल्ल.की क्या हिकमत थी …इस विषय पर इस लेख में प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।
मुहम्मद सल्ल. के वैवाहिक जीवन पर एक नज़र डालने से कुछ बातें उभर कर सामने आती हैं
पहली बातः आप सल्ल. 25 वर्ष की अवधि ऐसे समाज में बिताते हैं जो हर प्रकार की बुराइयों से लतपत था परन्तु आप ऐसी अंधकार में बिल्कुल पवित्र और पाकदामन देखाई देते हैं।
दूसरी बातः 25 वर्ष की उम्र में एक महिला हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाह किया, जो उम्र में आप से 15 वर्ष बड़ी थीं, उस से पहले दो परुषों की पत्नी रह चुकी थीं।
तीसरी बातः पचास वर्ष तक (अर्थात् पूरे 55 वर्ष) इसी एक पत्नी पर गुज़ारा करते हैं, किसी अन्य महिला से विवाह की इच्छा तक व्यक्त नहीं की।.
चौथी बातः हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा की मृत्यु के बाद ‘अपनी उम्र के पचासवें वर्ष जिस महिला (हज़रत सौदा रज़ि.) से विवाह किया वह उनकी हम-उमर और विधवा थीं.शेष 9 पत्नियों से निकाह 53 वर्ष की उम्र से 60 वर्ष की उम्र के बीच हुआ।
यह सारी महिलाएँ (सिवाए हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के) दो या तीन पतियों की पत्नियाँ रह चुकी थीं।अपनी उम्र के अंतिम तीन वर्षों में जबकि अरब के बड़े भाग पर आपकी सत्ता स्थापित हो चुकी थी आपने कोई शादी नहीं की।.
उपरोक्त विवरण इस संदेह की जड़ काट देती है कि आपके बहुविवाह का उद्देश्य भोग विलास था। क्या यह आरोप उस व्यक्ति पर लगाया जा सकता है जो अपनी जवानी के दिन केवल एक महिला की संगत में बिताए और वह भी ऐसी जो उम्र में उस से 15वर्ष बड़ी हो और इस से पहले दो पतियों की पत्नी रह चुकी हो ?
इस मुद्दे पर दो पहलुओं से विचार करने की आवश्यकता है:
एक यह कि यदि आप पर यौन इच्छा हावी थी तो उसकी पूर्ति का अवसर वह था जब नबी बनने के पांचवें छठे वर्ष उनके विरोधी निमंत्रण को रोकने में पूरा ज़ोर लगा रहे थे और आपके सामने पेशकश कर रहे थे कि अगर तुम्हारे इस निमंत्रण का कोई सांसारिक उद्देश्य हो तो हम तुम्हें अपना सरदार बना लेते हैं, तुम्हारे कदमों में धन दौलत के ढेर लगा देते हैं और अरब की सबसे सुन्दर महिला से विवाह कर देते हैं लेकिन आपने उनकी इस पेशकश को बिल्कुल ठुकरा दिया ( तफ्सीर इब्ने जरीर 30187)
उस समय आपकी शादी में पचपन वर्ष की एक बूढ़ी महिला (हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा) थीं.
दूसरी बात यह कि जब आपने अपने संदेश की घोषणा की तो शत्रुओं तथा विरोधियों ने आप पर तरह तरह के आरोप लगाए, कवि कहा, पागल और जादूगर कहा, और अन्य आरोप लगाए, लेकिन आपके कट्टर से कट्टर दुश्मन ने भी आप पर यौन उत्तेजना का आरोप न लगाया. अगर उन्होंने इस सम्बन्ध में मुहम्मद सल्ल. के अंदर कुछ भी देखा होता तो उनके खिलाफ दुष्प्रचार का इस से बेहतर माध्यम कोई और नहीं हो सकता था।
आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाहः अब हम आते हैं आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से विवाह की हिकमत की ओर, मुहम्मद सल्ल. अल्लाह के अन्तिम संदेष्टा थे, आपके बाद कोई संदेष्टा आने वाला नहीं था और इस्लाम महा-प्रलय के दिन तक एक जीवन व्यवस्था के रूप में मानव का मार्गदर्शन करने वाला था, इस लिए इस धर्म को हर तरीक़े से पूर्ण करने की आवश्यकता थी, अतः आपकी पत्नी ख़दीजा रज़ी. का जब नुबूवत के दसवें वर्ष रमज़ान में देहांत हो गया तो आपने उसके चार वर्ष बाद यह आवश्यक समझा कि आपके वैवाहिक जीवन में कोई छोटी आयु की महिला प्रवेश करे जिसने अपनी आँखें इस्लामी वातावरण में खोली हो, और जो नबी सल्ल. के परिवार में आए ताकि उसकी उत्तम रूप में शिक्षा दिक्षा का प्रबंध हो सके और वह मुसलमान महिलाओं और पुरुषों में इस्लामी शिक्षाएं फैलाने का माध्यम बन सके। इस उद्देश्य के अंतर्गत अल्लाह ने आईशा रज़ि. का चयन किया और हिजरत से तीन वर्ष पूर्व शव्वाल के महीने (मई 620) में हज़रत आईशा रज़ि.से आपका निकाह हुआ, और तीन वर्ष के बाद जब वह अधिकतर विद्वानों के कथनानुसार 9 वर्ष की हो गईं और उनकी माता हज़रत उम्मे रूमान को संतुष्टि प्राप्त हो गई कि अब वह इस आयु को पहुंच चुकी हैं जिसमें उनकी विदाई की जा सकती है तो उनकी विदाई कर दी। ( सही मुस्लिम)
अल्लाह के रसूल सल्ल. का जो समय घर पर गुज़रता था उस में ऐसी समझदार और बुद्धिमान महिला की ज़रूरत थी जो आपकी एक एक बातों को याद करे, हज़रत आइशा पहले से ही इस्लामी वातावरण में आंखें खोली थीं, फिर जब अल्लाह के रसूल सल्ल. के घर आईं तो हम देखते हैं कि हज़रत आइशा रज़ि. ने अपनी कम-उमरी में क़ुरआन और हदीस की शिक्षाओं का ठोस ज्ञान प्राप्त कर लिया, और इसे बाद के लोगों तक पहुंचाया। हज़रत आइशा की अपनी कथनी के अतिरिक्त उन्हों ने मुहम्मद सल्ल. की जो हदीसें(कथनी और करनी) बयान की हैं उनकी संख्या 2210 है। अबू हुरैरा रज़ी. को छोड़ कर सब से अधिक रिवायत बयान करने वाली महिला आप ही हैं। यह है वह वास्तविक तत्वदर्शिता जिसके अंतर्गत अल्लाह के रसूल सल्ल. ने हज़रत आईशा रज़ि. का चयन किया।
दूसरी बात यह भी है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से शादी का सपना देखा था, सही बुखारी में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा बयान करती हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन्हें कहा: सपने में मुझे तू दो बार दिखाई गई थी, मैं तुझे रेशमी कपड़े में लिपटी हुई देखा, कहा गया कि यह तेरी पत्नी है जब कपड़ा हटा तो देखा कि तू है। मैंने कहा कि अगर यह अल्लाह की ओर से है तो फिर अल्लाह उसे पूरा करेगा। (सही बुखारी, हदीस संख्या 3682). फिर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा के अंदर बचपन में जो समझदारी और ज़ेहानत देखी थी, इस कारण उन से शादी करना पसंद किया ताकि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के संदेश को दूसरों तक भली भांति सही तरीके से नकल कर सके। फिर हुआ भी ऐसा ही कि आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा सहाबा के लिए ज्ञान का स्रोत बन गईं जिन से बड़े बड़े सहाबा धार्मिक ज्ञान के विषय में सम्पर्क करते थे।
अब यदि कोई इसके बावजूद अपने मन में किसी प्रकार का संदेह पाले हुआ हो तो उसकी सेवा में हम निम्नलिखित तथ्य प्रस्तुत करते हैं :
(1) हज़रत आईशा विदाई की क्षमता रखती थीं: सब से पहले इस्लाम में निकाह सही होने के लिए बालिग़ होना ज़रूरी नहीं है। (सूरः अल-माइदा 4) जबकि हज़रत आइशा के सम्बन्ध में प्रमाणित रूप में यह सिद्ध है कि उनकी शारीरिक शक्ति बहुत अच्छी थी, एक तो स्वयं अरब की गर्म हवा और वातावरण में महिलाओं के असाधारण विकास और प्रायद्वीप की क्षमता पाई जाती है, दूसरे साधारण रूप में यह भी देखा गया है कि जिस तरह कुछ लोगों में मानसिक विकास की असाधारण क्षमता होती है, उसी तरह कुछ लोगों के शरीर में वृधि की विशेष क्षमता होती है. इसलिए बहुत कम उम्र में ही वह शक्ति हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा में पैदा हो गई थी जो पति के पास जाने के लिए एक औरत में आवश्यक है. दाऊदी ने लिखा हैः “हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा बहुत उत्तम रूप में जवानी के चरम तक विकास की थीं” (नववी 456 / 3)
हज़रत आयशा की प्राकृतिक स्थिति तो ऐसी थी ही, उनकी मां ने उनके लिए ऐसा विशेष व्यवस्था किया था जो उनके लिए शारीरिक विकास में सहायक सिद्ध हुआ। अतः अबू दाऊद भाग 2 पृष्ठ 89 और इब्ने माजा पृष्ठ 642 में स्वयं हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा का बयान सूचीबद्ध है कि “मेरी माँ ने मेरे शारीरिक विकास के लिए बहुत सारी तदबीरें कीं. अंततः एक उपाय पर्याप्त लाभकारी सिद्ध हुआ, और मेरी शरीरिक परिस्थितियों में अच्छा परिवर्तन हो गया।
(2) अल्लाह के रसूल से पहले आइशा से शादी के लिए अबू बकर के पास पैग़ामे निकाह आ चुका थाः इस बिंदु को भी नहीं भुलना चाहिए कि अल्लाह के रसूल सल्ल. के आइशा से विवाह करने की इच्छा ज़ाहिर करने से पहले अबू बकर के पास किसी अन्य का पैग़ाम आ चुका था, इसी लिए जब अल्लाह के रसूल ने अबू बकर रजीयल्लाहु अन्हु से आईशा से विवाह के प्रति अपनी इच्छा प्रकट की तो उन्हों ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! आप से पहले एक साहब ने आइशा से विवाह करने की इच्छा प्रकट की है,पहले उन से पूछ लेते हैं फिर हम आपको उत्तर देंगे। जब वह उसके पास गए तो उसे नशे की स्थिति में पाया, अतः तुरंत वहां से लौट गए और अल्लाह के रसूल को जवाब भेज दिया कि हमें आपका रिश्ता मंजूर है। इस से ज्ञात यह होता है कि उस वातावरण में छ वर्ष की बच्ची का विवाह साधारण बात थी।
(3) आइशा की माँ ने अपनी इच्छा से विदाई की थीः फिर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि मुहम्मद सल्ल. की ओर से विदाई की मांग किए बिना हज़रत आईशा रज़ीयल्लाहु अन्हा को खुद उनकी माँ ने आपकी सेवा में भेजा था और दुनिया जानती है कि कोई माँ अपनी बेटी की दुश्मन नहीं होती, बल्कि लड़की सबसे ज़्यादा अपनी माँ की प्रिय और महबूब होती है. इसलिए असंभव है कि उन्होंने वैवाहिक संबंध स्थापित करने की क्षमता से पहले ही उनकी विदाई कर दी हो।
(4) अपवाद रूप में कोई लड़की अपनी आदत के खिलाफ़ 9वर्ष ही में बालिग़ हो सकती है: अगर थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि अरब में आम तौर पर लड़कियां 9 वर्ष में बालिग न होती हों तो इस में आश्चर्य की क्या बात है, चिकित्सा से यह सिद्ध है कि अपवाद रूप में अपनी ठोस स्वास्थ्य के कारण कोई लड़की अपनी आदत के खिलाफ़ 9वर्ष ही में बालिग़ हो जाएं। लेकिन जो मन और मस्तिष्क नकारात्मक सोच के आदी बन गए हों और वह केवल संदेह के जाल बुनने के आदी हों वह इस घटना को आश्चर्यजनक बनाकर ही पेश करेंगे, लेकिन जो लोग हर तरह की मानसिक शत्रुता और निष्पक्षता से बाहर निकलकर न्याय के साथ इतिहास का अध्ययन करना चाहते हैं वे जान लें कि बहुत प्रामाणिक तरीके से यह साबित होता है कि अरब में कुछ लड़कियां 9 वर्ष की मां और 18 वर्ष की उम्र में नानी बन गई हैं। सुनन दारक़ुतनी में हैः
حدثني عباد بن عباد المهلبي قال: أدركت فينا يعني المهالبة امرأة صارت جدة وهي بنت ثمان عشرة سنة ، ولدت تسع سنين ابنة ، فولدت ابنتها لتسع سنين فصارت هي جدة وهي بنت ثمان عشرة سنة .
(دارقطني 3/223 ط لاهور باكستان)
इबाद बिन इबाद महलबी ने मुझे बताया कि हमारे समुदाय महलब में एक लड़की 18 साल की उम्र में नानी बन गई, 9 साल की उम्र में एक बच्ची जनी, फिर इस की बच्ची को 9 साल की उम्र में ही एक बच्चा हुआ. इस तरह वह 18 साल की उम्र में नानी बन गई “. (दारकुत्नी भाग 3, पृष्ठ 223,)
स्वयं हमारे देश हिन्दुस्तान में यह सूचना काफी अनुसंधान के बाद प्रकाशित हुई है कि विक्टोरिया अस्पताल दिल्ली में सात साल से कम उम्र की लड़की ने एक बच्चा जना है. (देखिए पत्रिका “मदीना” बिजनौर, प्रथम जुलाई 1934 / संदर्भ नुसरतु हदीस पृष्ठ 171 )
जब हिन्दुस्तान जैसे नरम और संतुलित पर्यावरण तथा जलवायु वाले देश में सात वर्ष की लड़की में क्षमता पैदा हो सकती है तो अरब जैसे गर्म जलवायु वाले देश में 9वर्ष की लड़की में क्षमता का पैदा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है . यही कारण है कि हज़रत अली रज़ी. ने अपनी लड़की उम्मे कुल्सुम का निकाह उरवा बिन ज़ुबैर से और उरवा बिन ज़ुबैर ने अपनी भतीजी का विवाह अपने भतीजे से और अब्दुल्लाह बिन मस्ऊद रज़ी. की पत्नी ने अपनी लड़की का निकाह इब्नुल-मुसय्यिब बिन नुखबह से कम-उमरी में किया। (अल्फ़िक्हुल इस्लामी व अदिल्लतहु भाग 7, पृष्ठ 180)
इन लोगों का कम उमरी मैं अपनी लड़कियों का विवाह कर देना भी इस बात का खुला हुआ प्रमाण है कि कुछ लड़कियों में मामूली उम्र में ही शादी की क्षमता पैदा हो जाती थी, तो अगर हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा का निकाह 6वर्ष की उम्र में हुआ और विदाई 9 वर्ष की आयु में हुई तो इस में क्या विरोधाभास है कि उन में उस समय यौन क्षमता पैदा नहीं हुई हो. जैसा कि अभी साबित हो चुका है कि उनकी मां ने विशेष रूप में उनकी शारिरीक वृधि की ओर ध्यान दिया था। तात्पर्य यह कि पति से मिलने के लिए एक औरत में जो सामर्थ्य आवश्यक हो सकता है वह सब हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा में मौजूद था।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के अतिरिक्त सभी पत्नियाँ विधवा या तलाक शुदा थीं, हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा से कम उमरी में इसलिए निकाह किया गया ताकि वे अधिक समय तक आप से ज्ञान प्राप्त कर सकें. और हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के माध्यम से लोगों को धर्म व शरीयत से सम्बन्धित विभिन्न ज्ञान प्राप्त हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुहम्मद सल्ल. के देहांत के बाद हज़रत आईशा रज़ियल्लाहु अन्हा 48वर्ष जीवित रहीं, और समाज और उम्मत का सही पथ की ओर मार्गदर्शन करती रहीं।
(5)इस विषय को आपके युग के किसी शत्रु ने नहीं उठायाः सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि जब मुहम्मद सल्ल. ने लोगों को एक अल्लाह की ओर बोलाना शुरू किया तो लोगों ने हर प्रकार से आपका विरोध किया लेकिन किसी ने आपकी पवित्रता को दोषित करने के लिए हज़रत आईशा से आपके विवाह के विषय को नहीं उठाया…क्यों कि उनकी दृष्टि में मुहम्मद सल्ल. ने कोई आश्चर्यजनक काम नहीं किया था। बल्कि यह बात उनके बीच साधारण समझी जाती थी। और जब उस वातावरण में यह काम कोई दोषित नहीं था तो आज अपनी तुच्छ मानसिकता औऱ बुद्धिहीनता का प्रमाण पेश करते हुए मुहम्मद सल्ल. के इस विवाह के विषय को उछालना कहां का न्याय हो सकता है।
यह तथ्य है कि आप के सिवा कोई ऐसा व्यक्ति दुनिया में नहीं गुज़रा जो पूर्ण 23वर्ष तक हर समय और हर स्थिति में सब के सामने जीवन बसर कर ले, सैकड़ों हजारों आदमी उसकी एक एक हरकत की खोज में लगे हों. अपने घर में पत्नियों और अपने बच्चों के साथ व्यवहार करते हुए भी उसकी जाँच हो रही हो और इतनी गहरी नज़र के बाद न केवल यह कि उसके चरित्र पर एक काला छींट तक नजर नहीं आता, बल्कि यह साबित होता है कि आपने दूसरों को जो कुछ शिक्षा दिया, खुद आपका जीवन इस शिक्षा का पूरा आदर्श था, उस से आगे बढ़ कर यह साबित होता है कि इस लंबे जीवन में कभी एक पल के लिए भी आप न्याय तक़वा, सच्चाई और पवित्रता के उच्च स्थान से नहीं हटते हैं, बल्कि यह साबित होता है कि जिन लोगों ने आपको सब से निकट से देखा वही सब से अधिक आपके प्रेमी हुए।
इसी लिए एक इसाई वैज्ञानिक डा0 माइकल एच हार्ट अपनी पुस्तक The 100(एक सौ) में मानव इतिहास पर प्रभाव डालने वाले संसार के सौ अत्यंत महान विभूतियों का वर्णन करते हैं तो प्रथम स्थान इसाई होने के बावजूद ईसा अलै. को नहीं अपितु मुहम्मद सल्ल. को रखता है और उसका कारण यह बताता है कि “आप इतिहास के एक मात्र व्यक्ति हैं जो अन्तिम सीमा तक सफल रहे धार्मीक स्तर पर भी और सांसारिक स्तर पर भी”।
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हज़रत आयशा (रज़ि०) की छोटी ऐज़ में निकाह पर ऐतराज़ का जवाब"
आगे बढ़ने से पहले मैं कुछ बातें आप लोगों के सामने रखना चाहुंगा, जिस टापिक पर लिखने जा रहा हूं यह मेरी पसंदीदा किताबों में से एक "इस्लाम इलहाद और साइंस" नामी किताब से सेलेक्शन किया गया है, किताब दरअसल टफ़ उर्दू में लिखी गई है, इस लिए मैं कोशिश करूंगा कि आसान अंदाज़ में लिखूं, जहां दलील का रेफरेंस नहीं है वहां रेफरेंस ऐड कर दिया गया है, मेरी तालीम कोई ख़ास नहीं है, और मैं कहूं तो बेजा न होगा कि मेरी तालीम न के बराबर है! ख़ैर मुसन्निफ़ की बात की तरफ़ रुख़ करते हैं।
मुसन्निफ़ अपनी किताब में लिखता है, "सन १९३९ में पेरू के एक हास्पिटैल में एक पांच वर्ष की बच्ची लाई गई जिसके संबंधित शक था कि उसके पेट में रसोली है❶, डाक्टरों ने चेकअप के बाद जो खुलासा किया उसने माता पिता के पैरों तले से ज़मीन निकाल दी, डाक्टरों का खुलासा कुछ इस तरह था
"She is pregnant"
यह (बच्ची) गर्भवती है।❷
इस खुलासे ने साइंस की दुनिया को हैरत में डाल दिया, लीना मडीना नाम की उस बच्ची ने एक सेहतमंद बच्चे को जन्म दिया और दुनिया की कम ऐज़ में मां बनने का रिकॉर्ड बना डाला।❸
मुसन्निफ़ कहता है "जिस वक़्त वो मां बनीं उस वक़्त उनकी उम्र पांच साल सात महीने और इक्कीस दिन थी, आप शायद सोच रहे होंगे कि लीना मां बनते हुए मर गई होंगी ? जी नहीं! लीना आज भी ८३ साल की उम्र गुज़ार चुकी हैं, उनका वो बेटा इस दुनिया में ४० साल की भरपूर ज़िन्दगी गुज़ारे के बाद वफ़ात पा चुका।"
डाक्टरों के मुताबिक लीना मडीना तीन साल की उम्र में ही बालिग़ हो चुकी थी और उनके माहवारी वाले मामलात का आगाज़ हो चुका था, चार साल की उम्र में उनके पास वो तमाम अंग मौजूद थे जो एक जवान और बालिग़ लड़की के लिए जरूरी होते हैं, यह इसी सदी की बात है कोई चौदह सौ साल पुरानी बात नहीं है!
हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा की अपनी रवायत की गई हदीसों के अनुसार निकाह के वक़्त उनकी उम्र छ: साल और रुखसती के वक़्त नौ साल थी।❹
हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा ने बयान किया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मेरा निकाह जब हुआ तो मेरी उम्र छ: साल की थी फिर हम मदीना (हिजरत करके) आए और बनी हारिस बिन ख़ज़रज के यहां क़्याम किया यहां आकर मुझे बुख़ार चढ़ा और उसकी वजह से मेरे बाल गिरने लगे फिर मूंढों तक ख़ूब बाल हो गए फिर एक दिन मेरी मां उम्मे रोमान रज़िअल्लाहु अन्हा आईं, उस वक़्त मैं अपनी चंद सहेलियों के साथ झूला झूल रही थी उन्होंने मुझे पुकारा तो मैं हाज़िर हो गई मुझे कुछ मालूम नहीं था कि मेरे साथ उनका किया इरादा है आख़िर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर घर के दरवाज़ा के पास खड़ा कर दिया और मेरी सांस फूली जा रही थी थोड़ी देर में जब मुझे कुछ सुकून हुआ तो उन्होंने थोड़ा सा पानी लेकर मेरे मुंह और सर पर फेरा फिर घर के अंदर मुझे ले गईं वहां अंसार की चंद औरतें मौजूद थीं जिन्होंने मुझे देख कर दुआ दी कि ख़ैर व बरकत और अच्छा नसीब लेकर आई हो, मेरी मां ने मुझे उन्हीं के हवाले कर दिया और उन्होंने मेरी आराइश (सजावट) की उसके बाद दिन चढ़े अचानक रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मेरे पास तशरीफ़ लाए और उन्होंने मुझे आप के हवाले कर दिया मेरी उम्र उस वक़्त नौ साल थी।
(सहीह बुख़ारी: ३८९४ और सहीह मुस्लिम: १४२२)
इस रवायत में सराहत के साथ उम्र का बयान आया है।
मुसन्निफ़ आगे चलकर लिखता है:
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका रज़िअल्लाहु अन्हा की नौ साल की उम्र में शादी पर जो ऐतराज़ उठाया जाता है वह इंतिहाई बेहूदा वाहियात, ग़ैर अख़लाक़ी और ग़ैर साइंसी है, इस ऐतराज़ का न कोई सर है न पैर, इस ऐतराज़ पर मुसलमानों की कमज़ोरी केवल इतनी ही है कि कोई आप से यह पूछे कि आपकी मां को पहली बार माहवारी कब हुई थी और आप लाजवाब हो जाएं, किस से पूछेंगे ? मां से ? या पूछने वाले का मुंह तोड़ेंगे ?
यही वजह है कि इस सवाल को कभी जवाब के काबिल ही न समझा, कई बार ऐतराज़ करने वाले से पूछ लिया कि तुम्हारी मां उम्र में पहली बार माहवारी में कब मुब्तिला हुई थीं ? तो मत्था सिकोड़ लेते हैं।
मुझे अपने मुसलमानों भाईयों से भी गिला है कि बग़ैर किसी ऐतराज़ की क्वालिटी और संवेदनशीलता को समझे उस पर गुफ़्तगू शुरू कर देते हैं या जवाब देने की कोशिश करते हैं, या फिर अपनी मर्ज़ी से हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा की उम्र आज के प्रचलित अख़लाक़ी उम्र तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं, हर ऐरे गे़रे सवाल पर दलाइल के अंबार लगा देना ज़रूरी नहीं होता! असल अहमियत ऐतराज़ की क्वालिटी की होती है.
बुख़ारी व मुस्लिम की अहादीस के अनुसार हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा का निकाह नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से छः साल की उम्र में हुआ था और रुखसती नौ साल की उम्र में.
नास्तिक और ग़ैर मुस्लिम इस हदीस का बहुत ज़्यादा सहारा लेते हैं आम मुसलमानों को ज़च करने के लिए.
ज़रा अंदाज़ा लगाने की कोशिश करते हैं कि इस पर नास्तिक और ग़ैर मुस्लिम का नुकता-ए-ऐतराज़ क्या हो सकता है
१)_ क्या यह शादी किसी क़ुरआनी हुक्म के ख़िलाफ़ है?
२)_ क्या यह शादी साइंसी ऐतबार से न मुमकिन है?
३)_ क्या यह शादी अख़लाक़ी ऐतबार से ग़लत है?
यह तीन ऐतराज़ात मैंने रख दिए हैं, इसके अलावा आंशिक ऐतराज़ात भी हो सकते हैं मगर वो इसके अंदर ही आ जाएंगे, इन पर बात करते हैं.
क़ुरआन के अनुसार शादी के लिए केवल बुलूग़त यानी जवानी और शबाब की शर्त है और उम्र की कोई कैद नहीं है, ज़ाती सवाल करना मैं पसंद नहीं करता वरना अगर मैं इस पोस्ट को पढ़ने वाले हर शख़्स से डिमांड करुं कि वह अपनी बुलूग़त की उम्र बयान करे तो आपको अंदाज़ा होगा कि बुलूग़त का इन्सान में कोई प्रोपर प्वाइंट निर्धारित ही नहीं है, इसका संबंध आपकी आदात रुटीन आपकी महफ़िलें दोस्त अहबाब खूराक खान पान मौसम वगैरह की चीज़ों से होता है.
साइंसी लिहाज़ से भी बुलूग़त की कम से कम उम्र वही रिकोर्ड की गई है जो पोस्ट के शुरू में बयान की गई, यानी केवल तीन साल, ज़्यादा से ज़्यादा यह तेरह या चौदह साल भी हो सकती है, बुलूग़त की औसत उम्र जो बताई जाती है वो ग्यारह से बारह साल है, औसत उम्र का मतलब कि ज़्यादा तर लोग ग्यारह बारह साल की उम्र में बालिग़ हो जाते हैं, कुछ इससे भी पहले कुछ इसके बाद, मगर एक बात तै है, बुलूग़त की जो उम्र कानूनी समाजों में अट्ठारह साल बयान की गई है उसका बुलूग़त की पर्सनली उम्र से कोई संबंध नहीं, चाहे मर्द हो या औरत! वो बालिग़ होने में कभी भी अट्ठारह साल नहीं लगाता।
यानी अगर ऐतराज़ यह है कि हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा नौ साल की उम्र में बालिग़ नहीं हो सकतीं तो यह ऐतराज़ दुनिया के हर पैमाने पे झूठा साबित होता है, हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा शादी के वक़्त अबतक दुनिया में सबसे जल्दी बालिग़ हो जाने वाली ख़ातून से छः साल बड़ी थीं और आज भी दुनिया में प्रचलित बुलूग़त की औसत उम्र से सिर्फ़ दो साल छोटी, यानी नामुमकिन होना तो दूर की बात यह कोई हैरानगी वाली बात भी नहीं है, यही वजह है कि शुरू के कुफ़्फ़ार और मुशरिकीन की तरफ़ से यह ऐतराज़ कभी नहीं उठाया गया, यह ऐतराज़ सिर्फ़ उन्होंने उठाया जिन्होंने बुलूग़त के लिए दुनिया में प्रचलित अट्ठारह साल की कानूनी हद को तबई हद समझ लिया.
क़ानूनी हद तो समाज ने अपनी सहूलियत के लिए इस लिए सेट की है कि बुलूग़त की असल उम्र से ख़ुद बालिग़ होने वाले के सिवा कोई वाक़िफ़ नहीं होता, फ़र्ज़ करें एक पंद्रह साल का शख़्स किसी को क़त्ल कर दे तो उस शख़्स पर बालिग़ होने का या ना बालिग़ होने का फ़ैसला कौन करेगा जबकि अपनी बुलूग़त की असल उम्र सिर्फ़ ख़ुद क़ातिल को पता हो ? यह मसला हल करने के लिए उम्र की एक ख़ास हद एहतियातन अट्ठारह साल सेट की गई है।
अगर आप मुसलमानों के दौर का जायज़ा लें तो ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं! आज से महज़ पच्चीस पचास साल पहले हमारे इधर और एशिया में बहुत सारे जगह पर भी बच्चियों की शादी तेरह चौदह साल की उम्र में कर देने का रिवाज था, इन मामलात पे हैरान होने के लिए आपको दीनी साइंसी या अख़लाक़ी तालीम की ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ समाज के बदलते रिवाज आपको हैरान करने के लिए काफ़ी हैं!
आप समाजिक व्यक्ति होने के नाते बकरे और मुर्गी के गोस्त पर बैन लगा दें, पचास साल उस बैन को चलने दी जिए, फिर किसी को बकरा और मुर्गी का गोश्त खाता देखिए और हैरान रह जाइए, यकीन जानिए आपको उतनी ही हैरत होगी जैसे किसी चाइनीज़ को कीड़े खाते देख कर होती है, यह तो आपके अपने अख्तियार में है, आज आप अट्ठारह साल की उम्र में शादी कर लीजिए और समाज में पच्चीस साल की उम्र में शादी का रुझान पैदा करना शुरू कर दी जिए, फिर पच्चीस साल बाद अपने बच्चों को बताइए कि आप की शादी सिर्फ़ अट्ठारह साल की उम्र में हुई थी और उनको हैरान कर डालिए।
यानी यह कोई इतनी बड़ी राकेट साइंस नहीं है जो समझ न आए सके, किसी भी रिवाज को पचास साल के लिए छोड़ दें और उसके बाद दोबारा अपनायें तो वो अजीब लगेगा.
अख़लाक़ियात यानी नैतिकता की बात बाद में करेंगे पहले अक़्ल की उम्र की भी बात कर लेते हैं ताकि यह ऐतराज़ भी दूर हो जाए कि बच्ची की मर्ज़ी के बग़ैर उसका निकाह जाइज़ है या नहीं, उसे तो अक़्ल ही नहीं होती, आक़िल और बालिग़ में सिर्फ़ एक चीज़ का फ़र्क़ होता है,
बालिग़ शख़्स की बुलूग़त के बारे में या तो वो शख़्स ख़ुद जानता है या उसका रब अल्लाह जानता है मगर आक़िल शख़्स को कब अक़्ल आई यह उस शख़्स को ख़ुद को भी नहीं पता होता, यह सिर्फ़ रब ही जानता है, इन्सान के पास ऐसा कोई पैमाना मौजूद नहीं जिससे अक़्ल को नापा जा सके, बुलूग़त का ताअय्युन करना आसान है मगर अक़्ल का तआय्युन नामुमकिन! किसी को बहुत जल्दी अक़्ल आ जाती है किसी की पूरी ज़िन्दगी बेअक़्ली में गुज़र जाती है।
फिर मुसन्निफ़ और आगे चलकर लिखता है कि: "मोहम्मद बिन क़ासिम सत्तरह साल की उम्र में बतौर सिपेहसालार आता है और सिंध को फ़तह कर लेता है, हम सत्तरह साल की उम्र में पांच सौ का नोट लेकर सौदा लेने निकलें तो नोट गुम करा के मुंह लटकाए ख़ाली हाथ घर लौटें.
मैं जब सत्तरह साल का था तो इस बात पर यक़ीन करने को तैयार ही नहीं था कि मोहम्मद बिन क़ासिम की उम्र सत्तरह साल होगी, सत्तरह साल की उम्र में बतौर सिपेहसालार सिंध आया तो आग़ाज़ किस उम्र में किया होगा ? तलवार बाज़ी कब सीखी होगी ?
मेरा ख़्याल है कि कम से कम पच्चीस साल से तीस साल की उम्र में बंदा इस क़ाबिल हो सकता है कि किसी फ़ौज की कमान संभाल सके।
यह इन्सान की कमज़ोरी है कि वो किसी की अक़्ल की बरतरी बर्दाश्त नहीं करता, और अगर करनी पड़ जाए तो बहाने तराशता है, न्यूटन की क़िस्मत अच्छी थी कि जिस वक़्त सेब गिरा वो दरख़्त के नीचे बैठा था, अगर उस वक़्त उसकी जगह मैं बैठा होता तो मैं भी वही सोचता जो उसने सोचा, फिर लोग ग्रेविटी की खोज मुझसे मंसूब करते, अरफ़ा करीम अगर नौ साल की उम्र में साफ्टवेयर इंजीनियर बन गई❺ तो इसमें बड़ी बात क्या है ? उसे कोई रहस्यमय दिमाग़ी बीमारी थी जो अगर मुझे होती तो मैं पांच साल की उम्र में बन जाता!
मामला सिर्फ़ यूं है कि जो काम मेरी अक़्ल पे पूरा नहीं उतरेगा उसे या तो मैं इनकार कर दूंगा या उसको केवल एक चांस क़रार दे दूंगा।"
किसी की कम उम्री में आक़िल व बालिग़ हो जाना नामुमकिन नहीं है, आपके लिए उस बात को हज़म करना मुश्किल है तो यह आपका मसला है!
अब आ जाइए अख़लाक़ी ऐतराज़ की तरफ़
नास्तिकों के मुताबिक अख़लाक़ी ऐतबार से नौ साला बच्ची से शादी एक ग़ैर अख़लाक़ी हरकत है, सवाल यह है कि यह अख़लाक़ियात किसने सेट कीं ?
मुसन्निफ़ अपनी किताब में आगे लिखता है:
"नास्तिकों का हर मामले को सोचने का ढंग निराला है, एक मर्तबा एक नास्तिक से गुफ्तगू के दौरान मैंने नास्तिक से पूछा कि जानवरों के साथ जिंसी संबंध बनाने से उन्हें कौन सी अख़लाक़ियात रोकती हैं ?
तो जवाब मिला चाइल्ड अब्यूज मतलब बाल शोषण और जानवरों का मामला एक जैसा है, जिस तरह बच्चा इजाज़त देने से असमर्थ होता है इसी तरह जानवर भी इजाज़त देने में असमर्थ होता है, जिस पर मैंने ऐतराज़ किया कि फिर तो आप किसी जानवर का गोश्त भी नहीं खा सकते, जाहिर है जानवर को ज़बह भी उसकी इजाज़त के बग़ैर ही किया जाता है, यानी उससे ज़िंसी संबंध के लिए उसकी इजाज़त रुकावट है और काट खाने के लिए सिर्फ़ आपकी भूख काफ़ी है ? सुब्हान अल्लाह!
कोई मुझे अख़लाक़ियात के ऐसे उसूल मुरत्तिब करके तो दिखाए जो इस्लाम ने मुरत्तिब किए हैं, मैं तो ऐसे ऐसे नुक्ते उठाऊंगा जिनका जवाब देते देते उनकी नस्लें बूढ़ी हो जाएंगी!
आप एक जानवर के साथ ज़िना को हराम क़रार दें और उसको खाना हलाल ठहराएं तो उसकी कोई दूसरी वजह पेश कर ही नहीं सकते सिवाए इसके कि यह किसी ऐसी हस्ती का हुक्म है जिसको आप अपना रब मानते हो!
नौ साल की बच्ची में इतनी अक़्ल नहीं होती कि वो अपने हक़ में कोई मुनासिब फ़ैसला कर सके, और चूंकि वो ख़ुद फ़ैसला नहीं कर रही बल्कि अपने बड़ों की मर्ज़ी पे चल रही है लिहाज़ा यह शादी ग़ैर अख़लाक़ी है.
अगर मैं इस फ़लसफ़े से सहमत हो भी जाऊं तो इस बात का फ़ैसला कौन करेगा कि लड़की को अक़्ल किस उम्र में आती है ? साइंसी ऐतबार से अक़्ल का मय्यार साबित कर दीजिए और उसी उम्र को शादी की उम्र क़रार दे दीजिए, बताइए क्या पैमाना है ?
अब मेरे इस्तिदलाल का भी जवाब दे दे कोई कि एक बच्ची नौ साल की उम्र में अक़्ल नहीं रखती लिहाज़ा उसकी शादी ग़ैर अख़लाक़ी है, अब फ़र्ज़ करें कोई बच्ची अट्ठारह साल की उम्र में भी अक़्ल न रखती हो तो उसकी शादी करना अख़लाक़ी ऐतबार से दुरुस्त होगा या ग़लत ?
अगर छत्तीस साल की उम्र में भी अक़्ल न आई तब ?
फ़र्ज़ करें दिमाग़ी मरीज़ है, अक़्ल आनी ही नहीं सारी ज़िन्दगी तब ?
है कोई जवाब ?
और फिर इस बात का इनहिसार किसी और मौक़े के लिए छोड़ते हैं कि लड़की वो कौन सा कमाल करके दिखाएगी जिससे पता चले कि वो अपने संबंधित ख़ुद बेहतर फ़ैसला कर सकती है।"
अब आख़िरी ऐतराज़ का जवाब जो मोस्टली मुनकिरीन-ए-हदीस काफ़िरों की तरफ़ से आता है कि अगर हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा की शादी नौ साल की उम्र में दुरुस्त है तो आप अपनी बच्ची की शादी नौ साल की उम्र क्यों नहीं करते ? जो बात आप अपनी नौ साला बच्ची के बारे में सोच भी नहीं सकते वही बात आप आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा के संबंधित एक्सेप्ट करते हो ?
इसका जवाब समझदार लोगों के लिए तो ऊपर ही बयान हो गया कि क़ुरआन में निकाह की कोई उम्र बयान नहीं हुई बुलूग़त की शर्त बयान हुई है; क्या यह ज़रूरी है कि जिस उम्र में हज़रत आयशा रज़िअल्लाहु अन्हा बालिग़ थीं तमाम औरतें उसी उम्र में बालिग़ हो जाएं ?
यह बिल्कुल ऐसे ही है कि मैं लीना मडीना की पांच साल की उम्र में गर्भवती होने वाली हक़ीक़त को यह कहकर झुठला दूं कि यह अमूमी या सामान्य मामला नहीं है वरना इसका कोई और भी सबूत पेश किया जाए।
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IT is said that Hazrat Aisha was six years old when her nikah was performed with Prophet Muhammad (PBUH) in Makkah, and nine years old when she moved in to live with her husband in Madina after Hijra.
This piece of misinformation has led to the wrong view that child marriage has the sanction of Islam. It must be noted that establishing the authenticity of hadiths, the narrators’ circumstances and the conditions at that time have to be correlated with historical facts. There is only one hadith by Hisham which suggests the age of Hazrat Aisha as being nine when she came to live with her husband.
Many authentic hadiths also show that Hisham’s narration is incongruous with several historical facts about the Prophet’s life, on which there is consensus. With reference to scholars such as Umar Ahmed Usmani, Hakim Niaz Ahmed and Habibur Rehman Kandhulvi, I would like to present some arguments in favour of the fact that Hazrat Aisha was at least 18 years old when her nikah was performed and at least 21 when she moved into the Prophet’s house to live with him.
According to Umar Ahmed Usmani, in Surah Al-Nisa, it is said that the guardian of the orphans should keep testing them, until they reach the age of marriage, before returning their property (4:6). From this scholars have concluded that the Quran sets a minimum age of marriage which is at least puberty. Since the approval of the girl has a legal standing, she cannot be a minor.
Hisham bin Urwah is the main narrator of this hadith. His life is divided into two periods: in 131A.H. the Madani period ended, and the Iraqi period started, when Hisham was 71 years old. Hafiz Zehbi has spoken about Hisham’s loss of memory in his later period. His students in Madina, Imam Malik and Imam Abu Hanifah, do not mention this hadith. Imam Malik and the people of Madina criticised him for his Iraqi hadiths.
All the narrators of this hadith are Iraqis who had heard it from Hisham. Allama Kandhulvi says that the words spoken in connection with Hazrat Aisha’s age were tissa ashara, meaning 19, when Hisham only heard (or remembered), tissa, meaning nine. Maulana Usmani thinks this change was purposely and maliciously made later.
Historian Ibn Ishaq in his Sirat Rasul Allah has given a list of the people who accepted Islam in the first year of the proclamation of Islam, in which Hazrat Aisha’s name is mentioned as Abu Bakr’s “little daughter Aisha”. If we accept Hisham’s calculations, she was not even born at that time.
Some time after the death of the Prophet’s first wife, Hazrat Khadija, Khawla suggested to the Prophet that he get married again, to a bikrun, referring to Hazrat Aisha (Musnad Ahmed). In Arabic bikrun is used for an unmarried girl who has crossed the age of puberty and is of marriageable age. The word cannot be used for a six-year-old girl.
Some scholars think that Hazrat Aisha was married off so early because in Arabia girls mature at an early age. But this was not a common custom of the Arabs at that time. According to Allama Kandhulvi, there is no such case on record either before or after Islam. Neither has this ever been promoted as a Sunnah of the Prophet. The Prophet married off his daughters Fatima at 21 and Ruquiyya at 23. Besides, Hazrat Abu Bakr, Aisha’s father, married off his eldest daughter Asma at the age of 26.
Hazrat Aisha narrates that she was present on the battlefield at the Battle of Badar (Muslim). This leads one to conclude that Hazrat Aisha moved into the Prophet’s house in 1 A.H. But a nine-year-old could not have been taken on a rough and risky military mission.
In 2 A.H, the Prophet refused to take boys of less than 15 years of age to the battle of Uhud. Would he have allowed a 10-year-old girl to accompany him? But Anas reported that he saw Aisha and Umme Sulaim carrying goatskins full of water and serving it to the soldiers (Bukhari). Umme Sulaim and Umme Ammara, the other women present at Uhud, were both strong, mature women whose duties were the lifting of t
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हज़रत आएशा की उम्र
उस ज़माने में अरब का रिवाज था कि कोई भी शख्स 15 साल की उम्र से पहले किसी जंग में शामिल नही हो सकता था, ये बात कई अहादीस से साबित है, खुद बुख़ारी शरीफ़ (इंग्लिश ट्रांसलेशन) Book-59, Hadith-423 में इब्ने उमर रज़ि० से रिवायत है कि उहद की जंग के मौक़े पर उनकी उम्र 14 साल की होने की वजह से नबी सल्ल० ने उन्हें जंग में शामिल होने से रोक दिया, और 15 साल की उम्र होने के बाद ही उन्हें खन्दक की जंग में शामिल होने की इजाज़त दी.....
और बुख़ारी शरीफ में दूसरी तरफ ये लिखा हुआ है कि अम्मी आयशा रज़ि० जंगे उहद में शामिल हुई थीं (Sahih Bukhari, Book -52 , Hadith -131, और Book -58 , Hadith -156 ) . जंगे उहद 3 हिजरी में हुई थी यानी 2 हिजरी में अपनी रुखसती के वक़्त वो 14 साल की उम्र पार कर चुकी थीं, तभी तो 3 हिजरी में 15 साल की उम्र पार कर के जंग में शामिल हो सकीं....
सहीह बुख़ारी शरीफ में ही किताब 61 हदीस 515 में अम्मी आयशा रज़िअल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि वो सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त खेलने वाली उम्र की लड़की थीं, रिवायत में लफ्ज़ जारियाः आया है, जारियाः उन लड़कियों को कहा जाता था जो किशोरावस्था शुरू होने के आस पास की उम्र में हों.... आमतौर पर लड़कियों में किशोरावस्था 8-9 साल की उम्र में आती है.
ज्यादाते इस्लामी विद्वानों की राय है कि सूरह क़मर का नुज़ूल हिजरत से 8 साल पहले हुआ (The Bounteous Koran, M.M. Khatib, 1985) और हिजरत के दूसरे साल में अम्मी आयशा रज़ि० की रुखसती हज़रत मोहम्मद सल्ल० के घर हुई,
यानि सूरह क़मर अम्मी आयशा रज़ि० की शादी से 10 साल पहले नाज़िल हुई थी, यानि अगर सूरह क़मर के नुज़ूल के वक़्त अम्मी आयशा रज़ि० 8 या 9 साल की थीं तो10 साल बाद अपनी शादी के वक़्त 18 या 19 साल की ठहरती हैं...!!!
इसी तरह अल्लामा इब्न कसीर ने तफ़्सीर अल-बिदाया में लिखा है कि अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० की वफ़ात 73 हिजरी में हुई और तब उनकी उम्र 100 साल थी. अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० की बड़ी बहन थीं और माँ आयशा से उम्र में 10 साल बड़ी थीं, अब हिजरी सन की शुरुआत में अगर अस्मा बिन्त सिद्दीक़ रज़ि० की उम्र का हिसाब किया जाए तो (100-73=27) उनकी उम्र 27 साल निकलती है, और माँ आयशा रज़ि० की उम्र उनसे 10 साल कम यानि 17 साल होती है....
हज़रत आयशा रज़ि० की रुखसती नबी सल्ल० के घर 2 हिजरी में हुई , यानि माँ आयशा की उम्र (17+2=19) 19 साल होती है जब उनकी रुखसती हुई !!!
इस शादी का मकसद ये था कि औरतों के गुप्त विषयों में इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं, ये बात तमाम औरतों तक पंहुचाना... अब क्योंकि शर्म वाली बातें औरतें सीधे तो नबी सल्ल० से कह नही सकती थीं, इसलिये एक ऐसी मध्यस्थ औरत की ज़रूरत महसूस हुई जिसके और नबी सल्ल० के बीच शर्म का पर्दा न हो, और जो बहुत ज़्यादा होशियार भी हो और बातों को बहुत अच्छे ढंग से खुद भी समझ लेती हो और उतने ही अच्छे ढंग से अपनी बात दूसरों को भी समझा सकती हो.. ताकि वो औरतों के सभी गुप्त विषयों की बातें बगैर शरमाये नबी सल्ल० से पूछ सके और फिर खूब अच्छे ढंग से तमाम औरतों को समझा भी सके......
हज़रत आयशा रज़ि० में होशियारी और बात को अच्छे ढंग से समझने और समझाने के ये सारे गुण थे... और क्योंकि पति पत्नी के बीच में कोई पर्दा नही होता एक बीवी अपने शौहर से सारी गुप्त बातें कर सकती है, इसलिये माँ आयशा रज़ि० और नबी सल्ल० अल्लाह की प्रेरणा से एक दूसरे से शादी करने के लिए तैयार हो गए..!!!
इसके बाद माँ आयशा सिद्दिक़ा रज़िअल्लाहु अन्हा ने दीन की तब्लीग़ का काम बहुत ही खूबी के साथ और बड़ी ज़िम्मेदारी से निभाया, उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दिक़ा रज़ि० से मनसूब रिवायतों की तादाद इसीलिये अबु हुरैरह रज़ि० के के अलावा सबसे ज़्यादा हैं... जिन रिवायतों से इल्म लेकर आज तक मुसलमान मर्द औरत फायदा उठाते हैं !!!
-ZIA
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हज़रात आयेशा की उम्र.
बहुत से इस्लाम के विद्वान का मानना है की हज़रत आयशा की उम्र 17 या 19 साल थी शादी के समय, कुछ विद्वान कहते हे की 19 में अशरा यानि 10 गलती से छुट गया, पर ज़्यादातर इसके प्रमाण देते हे किताबों से! आपको जानना हे तो गूगल पे सिर्फ टाइप करें “Ayesha’s or Aaisha’s age was 17, not 9 at the time of marriage”. जिसका सबसे बड़ा सबूत ये है की हजरत आयशा और उनकी बहिन अस्मा सबसे पहले इस्लाम कबूल ने वालो में से थे, युवापन में! ये लिखा हुआ कई कई जगह! मतलब 3-4 साल की कम से कम माना जाए, क्योंकि मुंह से इस्लाम कुबोला होगा! और इनकी शादी पैग़म्बर साहब से क्का के 13 साल के आवधि के आखिर में हुई! तो इस हिसाब से मोटा मोटा गणित कहता हे की ये कम से कम 16 की होंगी! रिसर्च कीजिये अगर सही उम्र जानना हो तो !
पर फिर भी हम फिलहाल ये उम्र 9 साल मान के चलते है हालांकि उम्र 17 या 19 भी हो सकती हे, जिसके प्रमाण मौजूद है!! पर ये बात भी माननी पढेगी की उस कुछ सदी पहले तक 9 साल की उम्र में शादी आम बात थी! अगर अरब की इतिहास उठाएं तो जानेगे की कई मुस्लिम और यहूदी भी थे जिनकी उसी काल में शाद्दी 10-12 साल की उम्र में हो गयी थी! ये थे Abdul Mutallib, Hafsa ibn ' Omar, Hulai in Ahtal- the leader of the Jews.
हज़रत आयशा की 6 साल में शादी और 9 साल में गोवना या विदाई हुई तो :-
आपको ये पता होना चाहिए की उस वक़्त और उससे पहले या कुछ सदियों पहले तक अरब और यूरोप के रिवाज़ एक ही थे! तब लड्कोयों का शोषण होता था, शादी नहीं! मुहम्मद साहब ने ही शादी को व्यवहार व् दस्तूर बनया व् अनिवार्य बनाया! वयस्कता की उम्र पहले कम होती थी! बाइबल में भी शादी के समय जोसफ की उम्र 90 और मैरी की 12 थी, अब्राहम की 86 थी जब उन्होंने अपनी मैड हगर से सम्बन्ध बनाये और इश्मय्ल को जनम दिया! भगवन राम की 12 और सीता माता की शादी के समय उम्र 5 -6 साल थी! ये बातिएँ किसी धर्म का अपमान करने की लिए नहीं बताई बल्कि सदियों पहले विवाह के नियम और माहौल बताने के लिए कही है! पर इस सवाल की जवाब तिन हिस्सों में दिया जा सकता हे! क्योंकि इस सवाल की पूछने की 3 ही कारण हो सकते हे! वो है:-
दोनों की उम्र में अंतर?
ये अंतर होने कोई बढ़ी बात नहीं ये आप भी जानते है! ऐसे शादियाँ सिर्फ इसी आधार पे असफल हो जाती हे, ये सोचना मूर्खतापूर्ण है! आज भी बहुत सी शादियाँ में 20-25 साल का अंतर रहता है! मेरे खुद एक शिक्षक की 45+ थी जब उनकी शादी एक 20 साल की लड़की से हुई! प्लेबॉय का मालिक हूज हेफ्नर खुद 84 का है और उसकी संगनी हुर्रि 24 साल की हे! जेम्स वुड 66 का और संगनी क्रिस्टन 20 की है! ऐसे कई मिलंगे इनसे भी ज्यादा अंतर वाले जोडे! ढूंढोगे तो! क्या कोई ऐसा कानून है जो एक 14 साल की लड़की का 50 तो क्या 80 साल के आदमी से विवाह गगैरकानूनी करार देदे! नहीं ऐसा कोई कानून नहीं बना ! क्यों क्यंकि ऐसा जायजा और उचित है तभी नहीं बना! दोनों राज़ी और ज़िम्मेदार व्यक्ति हो एक दूसरे के अधिकार समझते हो तो कोई मना नहीं कर सकता! आप को क्यों परेशानी हो रही है जब ये किसी क़ानून को नहीं तोड़ रहा और नाहीं कोई किसी का शोषण कर रहा!
वैसे इतिहास में हमेशा से उन लोगो के साथी की उम्र में लम्बा फर्क पाया गया है जो अभी भी मिलता है! जो विज्ञानिक, दर्शनकी, विद्वान, राज्नितिक्ग्य और सम्मानित आदि आदी हो! इनकी बीवी हमेश छोटी उम्र की होती थी! इसे कोई दोष नहीं माना जाता! इसकी वजह शायद यही है की ऐसे लोगो से हर लड़की शाद्दी करने चाहती है, और हर माता पिता इनकी शरीफ इमेज भी दिमाग में राखते हे की ये कभी परेशांन नही करेंग लड़की को! आज भी आमिर, सरकारी नौकर, या कोई सामाजिक क्रांतिवीर या इज्ज़तदार की बीवी काफी छोटी मिल जाएगी !
50 साल पहले से 1400 साल के बिच उनके इस मुद्दे के खिलाफ कुछ नहीं लिखा कहा गया, क्योंकि ये सामान्य था, 50 साल पहले तक! फिर अब क्यों! क्योंकि शादी की उम्र अब बदली है! मुहममद साहब के वक़्त किसी भी दुश्मन ने इस शादी का विरोध नहीं किया! पता कर लों, न बाद में! गलत होता तो करते!
ये सोचना गलत होगा की मुहम्मद साहब 53 उम्र तक बुद्धे हो चुके थे क्योंकि हदीसों में आता हे की शादी के समय भी वह बहुत खूबसूरत और जवान मर्द दिखते थे, अन्तिम समय तक आप के बाल और दाढ़ी मुबारक मे बेहद कम सफेद बाल थे! आप की त्वचा बहुत कोमल थी, झुर्रियां भी नही थीं व् शारीरिक रूप से काफी बलशाली भी थे . जिन गुणों की कामना अपने भावी वर मे होने की कोई कुवारी कन्या करती है!
1000 साल बाद जब शादी की उम्र 50 साल तय हो जाएगी तो आप तब ये कह के इलज़ाम नहीं लगा सकते की देखो 21वि सदी में टेक्सास (अमेरिक) में लोग 14 साल में शादी कर लेते थे! हंसी आती हे ये सोचकर!
हज़रत आयशा की कम उम्र?
विज्ञानं कहता हे की योव्नारम्भ (puberty) की उम्र वातावरण जलवायु और खान पान पे निर्भर करता है! जेसे भूमध्य रेखा और गर्म स्थानों पे इस्की उम्र सबसे कम होती है! अगर 9 साल में भी आरम्भ तो ये सामान्य है! आज भी कई लड़कियां है जिनका योवानार्म्भ 9 साल में हो जाता है! गर्म जगह में 8 साल की उम्र योवानार्म्भ शुरू होना कोई बड़ी बात व् परेशानी की बात नहीं हे! वन्ही ठंडी जगह ये आने में 21 साल तक ले सकता है!
इस्लाम अनुसार योव्नारम्भ शुरू होने ही लड़का या लड़की शादी के लायक हो जाते है बशर्ते वो दोनों शारीरिक तौर पे शक्षम हो और खुद और माता पिता राज़ी हो! बचपन में रिश्ता को बढे होके तोड़ सकने की इजाज़त है पूरी! अगर किसी का शोषण हो तो वो इसे तोड़ सकता हे शादी के बाद भी!
ये भी भी ध्यान रखनी चाहिए की योवानाराबम्भ आने के साथ ही इंसान में सूझबूझ का निर्माण हो जाता हे और योव्नारम्भ तक एक शारीर अपना लगभाग मूल आकर ले चूका होता है!
ये भी देखिये की आज भी अफ्रीका और अरब इलाको, मिडल ईस्ट में स्त्रियाँ कम उम्र में ज्याद शारीरिक रूप से बढ़ी लगती हे! उनका रेहन सेहन, वातावरण, खान-पान, और जीन इसकी वजह हो स्कते हे! उस वक़्त भी ये कारक मौझूद थे!! आप यंहा की लड़की तो क्या लड़कों के शारीर की बनावट, सब-कोन्तीनेंत की लोगो से से नहीं मिला सकते! जिस प्रकार चीन शारीर को नीग्रो जाती से नहीं मिला सकते!
हज़रत आयशा की मुहम्मद साहब से बात चलने से पहले ही किसी और से शादी और रिश्ते की बात हो चुकी थी! ये बताता हे की इस उम्र में शादी वंहा आम थी तब! वेसे भी शादी करने के फ़ौरन बाद ही उनका जिसमानी मिलाप हुआ, ऐसे नहीं था! इसके समझाने के लिए कोई साक्ष्य नहीं, मुहम्मद साहब का चरित्र ही काफी है!
पुरे अरब की संसकिरित और रिवाज यही था की योवानारम्भ होते ही या पहले, शादी कर के लड़की लड़के के घर आके रहना शुरू कर देती और अपने पति और उस परिवार का हिस्सा बन उसे अपनाने की कोशिश करती थी! जिसका शारीरिक मिलाप वक़्त अनुसार और रजामंदी से होता था, ज़बरदस्ती नहीं! समाज में रिवाज था बचपन में शादी तय करना, फिर शादी करना, फिर गौव्ना या विदा करना! ताकि वो उस घर जाके शारीरिक संबंध बनाने से पहले सब से एक मानसिक और जज्बाती रिश्ता कायम कर ले! ताकि परिवार शुरू या बच्चे पैदा करने तक, उस परिवार का हिस्सा बन चुकी हो! रीती रिवाज़, माहौल, पति वगेरह को समझ व् जान चुकी हो!
भारत में भी पहले लड़की की बचपन शादी करके ससुराल आ जाती थी! घर में काम करना व् मेल मिलाप करने का प्रचालन था! जिसमे शारीरिक सम्बन्ध काफी बाद बनते थे! ये आप कई किताब व् फिल्मो में देख सकते हे!
अगर आप रेनेसां युग से पहले जाये तो पाएंगे की वयस्कता की उम्र 7 - 8 साल मानी जाती थी यूरोप में! क्रुसेडर्स भी इसी उम्र में बन जात थे! तो शादी इस उम्र में मामूली बात थी! जिसपे किसी देश समुदाय को ऐतराज़ न था! अगर होता तो हमारा इतिहास में इसके विरोध कंही तो लिखा पाते! कम उम्र शाद्दी का विरोध तो हम पिछली एक सदी से पाते है!
ये मुहम्मद साहब ही थे जिन्होंने जंग में जाने वालो की मिनिमम उम्र 15 साल राखी! जन्हा यूरोप में या काफी कम थी! अगर ये उम्र वो बढ़ा सकते है तो शादी की उम्र भी बढ़ा सकते थे, पर ऐसा नहीं किया क्योंकि ये प्रकति का नियम हे की योवानारम्भ होना शादी के लिए तैयार होना है! फिर मर्ज़ी आपकी आप शादी इसके आते ही कर दो या इंतज़ार करो, कोई ज़बरदस्ती नहीं!
अमरीका तक में 19वि सदी के पहले भाग में, 12 साल में शादी होने के प्रचालन था! मगर फिर धीरे धीरे ये बढ़ता गया, 14 फिर 16 और अब भी बढ़ रहा है! अमीरका में आज भी 16 साल उम्र में शादी करना जायज़ हे, वन्ही टेक्सास राज्य में, उनका अपना कानून 14 साल में शादी करने की इजजात देता है! क्या वंहा किसी 14 साल की लड़की तो 60 साल की व्यक्ति से शादी करने से कोई कानून रोक सकता हे, नहीं! और होती भी होंगी ऐसे शादीयां किसे पता! आज भी 14 साल! अगर आप कुछ 50 साल पहले भी देखे तो पाएंगे की शादी की उम्र 12 से 14 साल थी! गाँधी की भी शादी 13 साल में हो गयी थी! ये बताता हे की शादी योवानारम्भ शुरू होते ही करना सामान्य था कुछ वक़्त पहले तक! फिर यंहा तो हम 1400 साल पुराणी बात कर रहे थे! तब भी ये सामान्य था! कुछ सौ साल पहले 25 साल की उम्र में लडकियां नानी और दादी बन जाती थी! जितना पहले समय में पीछे जाओगे या तो जानोगे की शादी की उम्र कम से कम होती जा रही ही! वन्ही उल्टा अब शादी की उम्र आन वाले समय में बढती ही जाएगी!
ये जानना भी ज़रूरी है की अवश्क्ताओं अनुसार पहले के बच्चो की शरीरिक बनावट और शमता को आप आज के बच्चो से मिलान नहीं कर सकते! पहले सभी मेहनतकश होते तो आज की तरह आरामदायक नहीं! आज में किसी गाँव की मजदूर बच्चे को आप, किसी शहर के बच्चे से ज्यादा विराट और ताक़तवर पाएंगे ! मेने खुद एक ही उम्र के बच्चों की लड़ाई में गाँव वालो से शहर वालो की डरते और पिटते देखा है! क्या आप किसी आदिवासी बच्चे का किसी शहर के बच्चे से शारीरक सामर्थ्य मिला सकत है! नहीं! 500-1000 साल पहले लोग ज्यादा ताकतवर, हस्टपूष्ट, और और सक्षम होते थे! गाँव की स्त्रियाँ आज भी किसी शहर की वर्किंग वुमन को शारीरिक काम में हरा देगी जिसका कारन उनका शारीरिक शमता है!
हज़रत आएशा इतनी उम्र में भी शारीरिक व् मानसिक तौर पे हष्ट पुष्ट थी वरना उस वक़्त इस शादी को इस्लाम अनुसार कोई नहीं होने देता! वो खुद भी नहीं करती! सबसे बढ़ी बात मुहम्मद साहब होने ही नहीं देते जिन्होंने लोगो को मानवता के नियम सिखाये! मुहम्मद साहब का मानवता में योगदान आप उनकी जीवनी पढ़े बिना नहीं जान सकते! इलज़ाम लगाने से पहले इस्लाम पढ़ ले!
हम सभी के पूर्वज कोई 100 पहले तक. 10-12 साल की उम्र में शादी शुदा और बच्चों के मां-बाप बन चुके थे!
हज़रत आएशा की कम और मुहमम्द साहब की ज्याद उम्र शोषण का प्रातिक?
सबसे पहली बात पैग़म्बर मुहम्मद साहब ने पहली शादी 40 साल की औरत से की, वो भी तब जब वो खुद 24 साल के थे! क्या ये वासना का प्रतिक है, नहीं बिलकुल नहीं! आज भी कोई नहीं करे! उसके बाद उनकी शादी या तो विधवाओ से हुई या तलाकशुदा से! दिमाग लगाके सोचे तो पाएंगे की ऐसा व्यक्ति 50 साल की उम्र में ही क्यों कम उम्र की लड़की से शादी करेगा! जबकि उसके पास ऐसे करने के लिए पूरी उम्र पढ़ी थी! यकीनन इसका मकसद वासन नहीं हो सकता! कुछ और ही था! जब वो ये भी जानते हो की इससे आने वाली नस्लों पे उनकी बुरी छवि का प्रभाव पढ़ेगा! पर उन्होंने शादी की, क्योंकि, वासना आधारित नहीं बल्कि जायज़, ज़रुरत और आदेश अनुसार थी! जिसका फायदा मुस्लिम्स को भरपूर मिला! इस्लाम अनुसार शादी के लिए सबसे पहले सद्गुण देखे जाने चाहिए! जो हज़रत आएशा ने देखे और किसी में मुहम्मद साहब के सिवा इतने अधिक नहीं हो सकते थे और न अब हो सकते है! यही वजह रही उन्होंने कभी कोई शिकयत नहीं की ज़रा सी भी! हज़रत आयशा बहुत समझदार, परिपक्व और ज़हीन थी जिसका सबसे बड़ा उदहारण ये है की सबसे ज्यादा हदीस उन्ही की दर्ज कराइ गयी है! उनकी कम उम्र की वजह से ही, मुहम्मद साहब की कही बाते उनके के जाने की बाद, दसियों सालो तक लोगो को मार्गदर्शित करती रही! अगर उनकी कम उम्र न होती तो कौन इतना लम्बे वक़्त तक ये मार्गदर्शिका आने वाली कई नस्लों का करता! आज हर बीवी छोटी छोटी सी बात पे पति को कोसती है! अगर हज़रत आयशा का शोषण हुआ होता तो क्या नही कहती कंही! पर क्या कभी उन्होंने कोई भी बुरे शब्द कहे मुहमद साहब के लिए कहे! नहीं!
क्या हज़रत आयशा ने कभी को शिकायत कंही की, किसी को मुहम्मद साहब की बुराई करते सुना या पढ़ा, नही, कभी नहीं, क्योंकि ऐसा हुआ होता तो लिखा जाता न! जब पहले ही मुहामद साहब ने किसी बीवी के साथ ज्यादती नाइंसाफी नहीं की! तो इनके साथ भी नहीं की होगी, साधारण अनुमान हे ये ! ये कियास लगाना की शोषण हुआ होगा, सिर्फ आपका वेहम है, कोई सबूत नहीं! क्या आप दे सकते हे शोषण का सबूत! नहीं न! ये आरोप आधारहीन हे!
आपको पता होना चाहिए की अगर कोई लड़की का शुरवात में शारीरिक शोशान किया जाता हे तो वह लड़की या बच्चा निश्क्रिय और विफल रहता है जीवन भर! जिनका शोषण होता हे बचपन में उसकी पूरी उम्र शांति भंग रहती, वो परेशां रहते है कुन्थित, तनाव पूर्ण, डरे हुए, नफरत से भरे, खुद को अपराधी, गिल्टी, उन्डरएस्टीमेट करते हे! पर हज़रत आयशा यंहा पर एक शिक्षिका बनी, लीडर बनी, इस्लाम की विद्वान बनी,! वेह बहुत गहन थी, हज़रत आयशा ने कुरान नाजिल होने के 3 महीने बाद ही पूरा याद कर लिया था! उनके बताई 2600 से ज्याडा हदीसे हे, किसी से भी ज्यादा! क्या कोई शोषण के बाद, इतना योगदान दे पाता? नहीं!
मुहामद साहब ने अपना हर काम खुदा के इशारे पे किया, हर काम, जिसमे शादी भी थी,! उनके जितना रसूख वाला वरना कोई भी शक्श बिना शादी के, अरब में कितनी भी, किसी भी औरत के साथ रह सकता था! पर उन्होंने ये नहीं किया, खुदा के अनुसार शादी की आयशा से! जिसका नतीजा देखिये की! उसी हज़रत आएशा ने मुहामद साहब के गुजुर जाने के बाद अरब और दुनिया का मार्गदर्शक किया! लोगो की मसले सुलझाए! धर्म का रास्ता दिखया जैसा मुहमद साहब को घर और समाज में करते देखा! उनकी कही हर बात को दर्ज करवाया ताकि आने वाले लोग फायदा उठा सके! और ये काम उन की कम उम्र की वजह से ही आने वाले कई सालों तक चला! सोचिये अगर वो भी ज्यादा उम्र की होती तो 2-4 साल बाद ही इनकी भी मृत्यु हो जाती तो ये कमी पैदा हो जाती और आज मुहम्मद साहब की कही बातें हमारी पास इतनी संख्या में न होती, और उस समय मागदर्शक की कमी रहती! इसमें उनकी कम उम्र, ज़ेहन, समझदारी, योग्यता और परिपक्वता के कारण हुआ! शायद इन्ही गुणों की वजह से खुदा ने उन्हें चूना और मुहम्मद साहब ने कुबूला!
इस्लाम किसी भी तरह का फायदा उठाने को मना करता है! कभी मुहमद साहब के खिलाफ किसी का फायदा उठाने के आरोप का ज़िक्र नहीं! तो क्या हज़रत आएशा का उठाया होगा! नहीं बिलकुल नहीं! इतिहास तो यही कहते है! कुरान बिना लड़की लड़के की इज्ज़त के शादी को मना कारता है! मुहम्द साहब ने ज़िन्दगी में एक काम भी कुरान के खिलाफ किया हो, ऐसा कंही नहीं आता! तो शादी भी बिना हज़रत आयशा की मर्ज़ी नहीं की होगी! मुहम्द साहब ने हमेश इंसानियत के लिए कार्य किया! तो फिर शोषण केसे करेंगे!
मुहम्मद साहब ने कभी खुद खुच अपने आप नहीं किया! “वही” (खुदा का फरमान) के अनुसार किया! कभी खुद किसी स्त्री को नहीं चुना! उनसे ज्यादा किसी ने अपनी ख्वाशियों को नहीं दबाया और न आज कोई उतना कर सकता है! वो शक्श केसे शारीरक सुख के लिए ऐसा करेगा जबकि वो अच्छी तरह जनता हो की आने वाली नसले उसे ही अपना प्रेणना सोत्र मानेगी! क्या कोई इतना बुद्धिहीन हो सकता हे जो अपनी कोई कमजोरी इतिहास में लिखवाए! नहीं ! ये बात दर्शनीय है की ये कमजोरी नहीं बल्कि सामान्य व् उचित था!
हज़रत आयशा की पिता हज़रत अबू बकर खुद एक बहुत सम्मानित, आमिर, रसूखदार आदमी थे कोई उन्हें मजबूर या ज़र्बर्दास्ती नहीं कर सकता था ! वो खुद पैग़म्बर के बहट खास दोस्त थे! जिस नाते उन्हें मुहम्मद साहब की हर आदत चाहे बुरी या अच्छी पता थी! ज़ाहिर बुरी कोई आदत नहीं थी! तभी उन्होंने अपनी लड़की के दिया! वो क्यों अपनि लड़की का शोषण करवाएंगे! आम तौर पे कम उम्र की लड़की और ज्यादा उम्र के लड़के की शादी में ये पाया जाता हे की लड़कीवालों ने गरीबी या किसी मजबूरी में शादी कर दी! पर यंहा हज़रत अबू बकर को किसी चीज़ की कामी न थी न कोई उनपे जोर चलाने की हिम्मत कर सकता था! साफ़ हे बात! मुहम्मद साहब जो दुसरे के हक का इतना ख्याल रखते हो! की उनके इतिहास में किसी को सताने की बात न आई हो! ऐसे व्यक्ति से किसी लड़की का शोषण होना, बेवकूफी होगी!
आज की समय में सचिन, शाहरुख, सलमान या अमिताभ से हजारों15 साल की लड़कियां शादी करने को तैयार मिल जाएँगी! उनके मा-बाप भी राज़ी हो जायेंगे ख़ुशी से! और फिर इन लोगो का चरित्र और समाज में सममन, मुसलमान, पैग़म्बर मुहम्मद साहब के नाखून बराबर नहीं मानते है! तब भी यही जज़बा था लोगो का पैग़म्बर के प्रति!
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ह० मरयम के भीतर रूह फूंकना।
और वह नारी जिसने अपनी पवित्रता की रक्षा की थी, हमने "उसके भीतर अपनी रूह फूँकी और उसे और उसके बेटे को सारे संसार के लिए एक निशानी बना दिया" [सूरह अंबिया 21; आयत 91]
यहाँ पर अरबी शब्द 'अह्सनत फर्जहा' का अर्थ होता है अपनी पवित्रता (अर्थात इज्ज़त) की सुरक्षा। हज़रत मरयम की एक खूबी यहाँ यह बतायी गयी कि उन्हों ने अपनी शेह्वत (वासना) को काबू में रखा।
'आत्मा (रूह) फूंकने' का अर्थ है आत्मा का शरीर में प्रवेश कराना। इस प्रकार का जनम हज़रत मरयम और हजरत ईसा के साथ एक विशेष मामला था जिसके विशेष कारण थे। इस बात को सारे मनुष्यों पर लागू नहीं कर सकते।
हज़रत मरयम का बिना पति के संतान पैदा करना आधुनिक विज्ञान के अनुसार संभव था
आधुनिक विज्ञान ने एक नयी खोज कर ली है जिसमें बिना बाप के पुरुष संतान पैदा हो सकती है। इसको वैज्ञानिक भाषा में पार्थीनोजेनेसिस (parthenogenesis) कहा जाता है। पहले पहले यह केवल निचले कीड़े मकोड़ों में देखा जाता था, लेकिन 2 अगस्त 2007 को यह पता चल गया कि दक्षिण कोरया के वैज्ञानिक Hwang Woo-Suk ने parthenogenesis के माध्यम से पहला मनुष्य भ्रूण (embryo) पैदा किया।
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