Friday, 19 June 2020

(1) नियोग


■*नियोग सह परिवार और वैदिक धर्म ( देवर, जेठ, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा सबके संग संभोग )*■

*आज भारत के ब्राह्मणों को यह भी नहीं पता कि वो कौन से वंश की संताने है।* क्यो कि प्राचीन भारत में *“नियोग”* नाम की एक विधि युरेशियनों अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में प्रचलित थी। जिस में अगर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बच्चे पैदा करने में असमर्थ होता था तो वो अपनी पत्नी किसी दुसरे ब्राह्मण को कुछ दिनों के लिए दे देता था। पत्नी दुसरे ब्राह्मण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा करती थी। 


◆*नियोग का अर्थ* ◆

वेदादिक शास्त्रों में पति द्वारा संतान उत्पन्न न होने पर या पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा नियमबद्ध उपाय है जिसके अनुसार *स्त्री अपने देवर, जेठ, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा सबके संग संभोग अथवा सम्गोत्री से गर्भाधान करा सकती है।* यदि पति जीवित है तो वह व्यक्ति स्त्री के पति की इच्छा से केवल एक ही और विशेष परिस्थिति में दो संतान उत्पन्न कर सकता है। इसके विपरीत आचरण राजदंड प्रायश्चित् के भागी होते हैं। वैदिक प्रथा के अनुसार नियुक्त पुरुष सम्मानित व्यक्ति होना चाहिए, मतलब सिर्फ ब्राम्हण।

इसी विधि के द्वारा पांडु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने नियोग किया 

महाभारत में वेद व्यास विचित्रवीर्य व चित्रांगद के  मर जाने के पश्चात् उन अपने भाइयों की स्त्रियों से नियोग कर के अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पांडु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की थी। 

नीचे तथ्यों पर आधारित नियोग विषय पर सभी शंकाओं का प्रश्नों का उत्तर दिया

*क्या प्राचीन काल में नियोग व्यवहार का प्रयोग होता था?*

*निस्संदेह होता था महाभारत/रामायण/पुराण/मनुस्मृति में नियोग के प्रमाण भरे पड़े है।*


■*महाभारत में नियोग* ■

*आज भारत के ब्राह्मणों को यह भी नहीं पता कि वो कौन से वंश की संताने है।* क्यो कि प्राचीन भारत में *“नियोग”* नाम की एक विधि युरेशियनों अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में प्रचलित थी। जिस में अगर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बच्चे पैदा करने में असमर्थ होता था तो वो अपनी पत्नी किसी दुसरे ब्राह्मण को कुछ दिनों के लिए दे देता था। पत्नी दुसरे ब्राह्मण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा करती थी। 

व्यासजी का काशिराज की पुत्री अम्बालिका से नियोग- *(महाभारत आदि पर्व अ 106/6)* 

वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में तेरा धर्म पिता उत्पन्न करने वाला जनक हूँ..! *(महाभारत वन पर्व 314/6)*

उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा- *(महाभारत आदि पर्व अ 104)*

कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे- *(महाभारत आदि पर्व 104/2)* 

उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा करते हैं-  *(महाभारत आदि पर्व 120/26)* 

परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- *(महाभारत आदि पर्व 103/10)* 

पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- *(महाभारत आदि पर्व 120/28)*


■ *रामायण में नियोग* ■

*आज भारत के ब्राह्मणों को यह भी नहीं पता कि वो कौन से वंश की संताने है।* क्यो कि प्राचीन भारत में *“नियोग”* नाम की एक विधि युरेशियनों अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में प्रचलित थी। जिस में अगर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बच्चे पैदा करने में असमर्थ होता था तो वो अपनी पत्नी किसी दुसरे ब्राह्मण को कुछ दिनों के लिए दे देता था। पत्नी दुसरे ब्राह्मण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा करती थी।

वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा पराकर्मी – *(वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/28)*

मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया –  *(वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15)*

राम द्वारा बाली के मारे जाने पर उसकी पत्नी तारा ने सुग्रीव से संग किया – *(गरुड़ पुराण उतर खंड 2/52)*


■ *मनुस्मृति में नियोग* ■

*आज भारत के ब्राह्मणों को यह भी नहीं पता कि वो कौन से वंश की संताने है।* क्यो कि प्राचीन भारत में *“नियोग”* नाम की एक विधि युरेशियनों अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में प्रचलित थी। जिस में अगर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बच्चे पैदा करने में असमर्थ होता था तो वो अपनी पत्नी किसी दुसरे ब्राह्मण को कुछ दिनों के लिए दे देता था। पत्नी दुसरे ब्राह्मण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा करती थी।

आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- *(मनु-स्मृति अध्याय 9 पद्य 58)*

नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए-  *(ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233)*

*मनु ऋषि ने नियोग के माध्यम से आर्य समाजियों (वैदिक धर्म वालों) को आपातकाल की पैदावार कहा है* 

*नियोग में भी जाति-भेद :* मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. केवल ब्राम्हण से हि नियोग कराएं। दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है.(कितने उच्च विचार है )


■ *पुराणों में नियोग* ■

*आज भारत के ब्राह्मणों को यह भी नहीं पता कि वो कौन से वंश की संताने है।* क्यो कि प्राचीन भारत में *“नियोग”* नाम की एक विधि युरेशियनों अर्थात ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों में प्रचलित थी। जिस में अगर कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य बच्चे पैदा करने में असमर्थ होता था तो वो अपनी पत्नी किसी दुसरे ब्राह्मण को कुछ दिनों के लिए दे देता था। पत्नी दुसरे ब्राह्मण के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा करती थी।

किसी कुलीन ब्राह्मण को बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई दोष नहीं हैं- *(देवी भगवत 1/20/6/41)*

व्यास जी के तेज से में भस्म हो जाऊगी इसलिए शरीर से चन्दन लपेटकर भोग कराया- *(देवी भगवत 1/20/65/41)*

भीष्म जी ने व्यास से कहा माता का वचन मानकर , हे व्यास सुख पूर्वक परे स्त्री से संतान उत्पत्ति के लिए विहार कर- *(देवी भागवत 6/24/46)*

पति के मरने पर देवर को दे- देवर के आभाव में इच्छा अनुसार देवे –
*(अग्नि पुराण अध्याय 154)*

राजा विशाप ने स्त्री का सुख प्रजा के लिए त्याग दिया। वशिष्ट ने नियोग से मद्यंती में संतान उत्पन्न की - *(विष्णु पुराण 4/4/69)*

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*नियोग*

हमारे कुछ आर्य-हिन्दू धूर्तो को ‘नियोग’ पर आपत्ति बनी रहती है, जब कि नियोग  “ वेद " से सिद्ध  है , ।। ब्राह्मण ग्रन्थ , उपनिषद , महाभारत , रामायण आदि आर्यो के सभी धार्मिक ग्रन्थों मे नियोग का प्रमाण मिलता हैं  ।।

चलिए आज हम आपको दिखाते हैं कि आर्यो-हिन्दू  के ग्रंथों में पति के अनुपस्थिति में स्त्री को कितने समय में गैर-मर्द के संग मौज उड़ाने की छूट मिलती है | ये विधान परम प्रमाणिक है और प्रत्येक आर्य-हिन्दू धूर्त इन्ही  की पैदाइश है | इनके आचार्य यथा शंकर, रामानुज, आदिइन कार्यो में दक्ष थे | 

*कथा देखिये —* “त्रिपाठी नाम का एक ब्राह्मण था, उसकी स्त्री का नाम कामिनी था | त्रिपाठी एक बार बाहर कथा (सत्यनारायण की) करने गया | अभी एक मास ही हुआ था कि कामिनी ने काम से व्याकुल होकर एक बलवान लकड़हारे को पांच रुपये देकर भोग करा लिया | फल स्वरुप उसको गर्भ ठहर गया, पैदा हुआ लड़के का त्रिपाठी ने जातकर्म संस्कार किया" *(भविष्य पुराण प्रतिसर्ग ख.१ अ.३३)*

यानि आर्य-हिन्दू नारीओ को गैर-मर्द चाहिए बस । किसी भी वर्ण का हो, बस हट्टा-कट्टा होना चाहिये, उसकी मौज ही मौज है | आर्य-हिन्दू महीने भर के लिये बाहर जाये बस |आर्य-हिन्दु अब घर मत छोड़ना | *आर्य-हिन्दू की घर की इज्ज़त की कीमत पांच रुपये।*

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●● *नियोग* ●●

*ऋग्वेदादीभाष्यभूमिक 21 विषय - नियोग विषय पेज न :- 261-266* में दयानन्द सरस्वती वेदों के जरिये से लिखते है ।

*स्त्री के लिए भी आज्ञा है, की जब किसी पुरूष की स्त्री मर जाय और संतानउत्पत्ति किया चाहे, तब स्त्री भी उस पुरुष के साथ नियोग ( यानी आज कल की भाषा कह सकते है नाजायज़ संबंध) करके उसको प्रजा युक्त कर दे |*

* हे स्त्री ! अपने मूर्तक पति को छोड़ के इस जीवनलोक मे जो तेरी इच्छा हो,तो दूसरे पुरुषों के साथ नियोग करके संतानों प्रप्त कर।

*वैदिक ईशवर मनुष्यों को आज्ञा देता है, की हे इंद्र पते ! तू इस स्त्री को वीर्यदान दे (समझदार को इशारा काफी है।)के सुपुत्र और सौ भाग्ययुक्त कर। पुरुष के प्रति वेद की यह आज्ञा है कि इस विवाहित वा नियोजित स्त्री में 10 बच्चे उत्पन्न कर । अधिक नही (तो क्या ? पूरी फ़ौज पैदा करुंगे बस 10 काफी है  ) और हे स्त्री ! तू नियोग 11 पति तक कर अर्थात एक तो उसमे प्रथम विवाहित पति है और 10 प्रयत्न पति कर कर अधिक नही।(तो क्या पुरो के साथ नियोग करुंगे क्या)*

* बड़े-बड़े वीर पुरूष को उतपन्न कर।( नियोग से कई बड़े-बड़े माह पुरूष पैदा हुए है जिसमे से कुछ नाम आप भी जानते होंगे कर्ण, परशुराम इत्यादि ) तो देवर की कामना करने वाली है, तो तेरा पति विवाहित पति ने राहे या वह रोगी हो या नपुंसक हो जाये तब दूसरे पति के साथ नियोग के जरिये संतान उत्पन्न कर। (वहा पति बीमार पढा है और पत्नी देवर के साथ मजे ले बहुत खूब)

* देवर की परिभाषा हिंदूइस्म में।

*जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है वैसे तुम भी करो। (यहा पर ऐसी घटिया शिक्षा दी जा रही है) विधवा का दूसरा पति होता है उसको देवर कहते है।(मतलब वहा पर उसका पति मरा नही की उस स्त्री पर देवर का हक़ हो जाता है वह कितनी अच्छी शिक्षा है। ये है हिंदूइस्म में औरोतो की इजजात बोहत खूब)

* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो(यहा पर देवर,पंडित,ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।)मर्त्य इस पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) *( ऋग्वेद 10:18:8)*

*( ऋग्वेद 10:10 )* 

भी पूरा नियोग का बयान है।

*NOTE :- कहते है, की वेद मानव उत्पति के साथ ही आगे थे ऋषि मुनियों को मिल गए ते और उस वक्क्त केवल आर्य ही थे, तो क्या ये कहानी अंतरिक्ष मे हो रही थी क्या ? क्योंकि जो चीज़ हो जाती है,यानी इतिहास बन जाती है (भूतकाल हो जाता है) उसीको लिखा और सुनाया जाता है।

*हे वीर्यसेचन हारे शक्तिशाली वर ! सौभाग्यशाली इस वधु को तू उत्तम पुत्रो वाली कर इसमे 10 पुत्रो को पैदा कर 11 तुझ पति को कर ।(11 पति तुही मेरा बच्चा बन जा)*

10 बच्चे पैदा करने की बात

* नियोग विषय के बारे में *अथर्वेद(18:3:1,2,3)*

*मनुसमूर्ति में अध्ययन (9:59,60,61,62) में* विस्तार पूर्वक लिखा है।

*इससे यह अच्छा ना होता कि एक विधवा जो बेचारी उसका पुनर्विवाह कार देते जिससे उसकी संतान की इच्छा भी पूरी हो जाती और उसको पति का सहारा भी मिल जाता बरहाल कोई मसला नही।

* आज विधवाओं का जो शोषण हो रहा है आश्रमों में उसके बारे में कोई बात नही करना चाहता। ना मीडिया किसको देखा रही है ना ही कोई व्यक्ति ध्यान इधर है खुद के घर मे अंधेरा है, और दुसरो के घर मे उजाला करने की कोशिश कर रहे है। बल्कि वहाँ पहले से ही उजाला है। (समझदारों को इशारा काफी है)

*और नियोग के नाम पर बलत्कार चलता है।*

* नियोग के लिए सबसे पहले ऋषि मुनि, पंडित,बृह्मचर्य को चुना जाता है। 

* पंडित , जोगी, मजे लेते है और खुद को बृह्मचर्य कहलाते है।

* अपने कभी ना कभी सुना होगा कि स्त्री को ऋषि मुनि ने वरदान दी और संतान मिल गई । या कोई चीज़ खाने को दिया थी । ये सब नियोग का नतीजा होता है।

* सूर्य से पुत्र हुआ, आम की चिरी देने से पुत्र हुआ , नहाते - नहाते शरीर के मेल से पुत्र हुआ, अंशु पीने से पुत्र हुआ इत्यादि ये सब नियोग काही नतीजा है।

* (मातृ योनि) किसी-किसी श्लोक में तो ऐसा लिखा है, की माता को छोड़ के सब स्त्रियों से मैथुन कर लेवे,इसमे कोई दोष नही। और किसी का यह भी मत है कि माता को भी न छोड़े।(छिई) और किसी मे लिखा है कि योनि में लीड (मनी) प्रवेश करके आलस्य छोड़कर मंत्र को जपे तो वह शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है।(मनी जल्दी ठहर जाता हैं) ये सब बाते पुराण में लिखी है।____________________________________________________________


*वैदिक धर्म में नियोग और नारी* 

*"नियोग"  प्रक्रिया :-* 

*वेद में  "नियोग" के आधार पर *एक स्त्री को ग्यारह तक पति रखने और उन से दस संतान पैदा करने  की छूट दी गई है.*

नियोग किन-किन हालतों में किया जाना चाहिए, इसके बारे में मनु ने  इस प्रकार कहा है :

विवाहिता स्त्री का विवाहित पति यदि धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति के लिए गया हो तो छ: और धनादि कामना के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देखने के पश्चात् नियोग करके संत्तान उत्पत्ति कर ले. जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त छूट जावे. *(१)* वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है कि पत्नी बंध्या हो तो आठवें (विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ न रहे), संतान हो कर मर जावे तो दसवें, कन्याएं ही पैदा करने वाली को ग्यारहवें वर्ष और अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ कर दूसरी स्त्री से नियोग करके संतान पैदा करे. *(मनुस्मृति  ९-७-८१)

* अब नियोग के बारे में आदेश देखिये : हे पति और देवर को दुःख न देने वाली स्त्री, तू इस गृह आश्रम में पशुओं के लिए शिव कल्याण करने हारी, अच्छे प्रकार धर्म नियम में चलने वाले रूप और सर्व शास्त्र विध्या युक्त उत्तम पुत्र-पौत्रादि से सहित शूरवीर पुत्रों को जनने देवर की कामना करने वाली और सुख देनेहारी पति व देवर को होके इस गृहस्थ-सम्बन्धी अग्निहोत्री को सेवन किया कर. *(अथर्व वेद १४-२-१८)* कुह…………सधसथ आ. *(ऋग्वेद १०.१.४०)* उदिश्वर…………बभूथ *(ऋग्वेद १०.१८.८)* हे स्त्री पुरुषो ! जैसे देवर को विधवा और विवाहित स्त्री अपने पति को समान स्थान शय्या में एकत्र हो कर संतान को सब प्रकार से उत्पन्न करती है वैसे तुम दोनों स्त्री पुरुष कहाँ रात्रि और कहाँ दिन में बसे थे कहाँ पदार्थों की प्राप्ति की ? और किस समय कहाँ वास करते थे ? तुम्हारा शयनस्थान कहाँ है ? तथा कौन व किस देश के रहने वाले हो ?इससे यह सिद्ध होता है देश-विदेश में स्त्री पुरुष संग ही में रहे और विवाहित पति के समान नियुक्त पति को ग्रहण करके विधवा स्त्री भी संतान उत्पत्ति कर ले. सोम:……………..मनुष्यज: *(ऋग्वेद मं १०,सू.८५, मं ४०)* अर्थात : हे स्त्री ! जो पहला विवाहित पति तुझको प्राप्त होता, उसका नाम सुकुमारादी गनयुक्त होने से सोम, जो दूसरा नियोग से प्राप्त होता वह एक स्त्री से सम्भोग करे से गन्धर्व, जो दो के पश्चात तीसरा पति होता है वह अत्युष्ण तायुक्त होने से अग्निसग्यक और जो तेरे चोथे से ले के ग्यारहवें तक नियोग से पति होते वे मनुष्य नाम से कहाते है. इमां……………………………. कृधि *( ऋग्वेद मं.१०,सू.८५ मं.४५)* अर्थात : हे वीर्य सिंचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष. तू इस विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्युक्त कर. इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उतन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान. हे स्त्री ! तू भी विवाहित पुरुष से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ.घी लेप कर नियोग करो :- मनु ने नियोग करने वाले के लिए यह नियम भी बनाया : विधवायां……….कथ्चन. *(मनुस्मृति  ९-६०)* अर्थात :- नियोग करने वाले पुरुष को चाहिए की सारे शरीर में घी लेपकर, रात में मौन धारण कर विधवा में एक ही पुत्र करे, दूसरा कभी न करें. नियोग में भी जाति-भेद : मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है…!!!

प्रस्तुत लेख को पढ़कर  मैं भी इस संदर्भ में कुछ प्रकाश डालना चाहूंगा जो आपके लिए लेख से भी संबंधित होगा एवं उसके अतिरिक्त भी जहां तक नियोग के नियम का प्रश्न है हमें पता है कि नियोग नियमानुसार

नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।

नियोग करने वाले पुरुष को चाहिए की सारे शरीर में घी लेपकर, रात में मौन धारण कर विधवा में एक ही पुत्र करे, दूसरा कभी न करें. नियोग में भी जाति-भेद : मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है

वेदादि शास्त्रों में पति द्वारा संतान उत्पन्न न होने पर या पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा नियमबद्ध उपाय है जिसके अनुसार स्त्री अपने देवर, जेठ, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा सबके संग संभोग अथवा सम्गोत्री से गर्भाधान करा सकती है।

इसी विधि के द्वारा पांडु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने नियोग किया ।

महाभारत में वेद व्यास विचित्रवीर्य व चित्रांगद के  मर जाने के पश्चात् उन अपने भाइयों की स्त्रियों से नियोग करके अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पांडु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की थी।

लेखक के अनुसार कर्म को तीन प्रकार से माना जाता है नंबर एक धर्म दूसरा अधर्म और तीसरा आपद्धर्म 

और आपने इस नियोग प्रक्रिया को आपद्धर्म मैं रखा है परंतु इस को साबित करने के लिए आपने शल्य चिकित्सक का  जो उदाहरण आपने प्रस्तुत किया है वह सही नहीं है क्योंकि शल्य चिकित्सक यदि धारदार हथियारों का प्रयोग करता है तो वह रोगी की पीड़ा को समाप्त करने हेतु उपचार करता है क्या करोगी उस पीड़ा से निजात पा सके परंतु नियोग धर्म जहां विवाहित स्त्री को व्यभिचार की गहरी खाई में धकेल देता है वही एक विधवा को भी पाप कर्म मैं संलिप्त कर देता है यह बात बुद्धि से बिल्कुल परे है कि आखिर विधवा स्त्री का नियोग क्यों कर किया जाए परंतु हमारे धर्म ग्रंथ में विधवा स्त्री के साथ विनियोग का प्रावधान किया गया है यहां तक के जब कोई स्त्री अपने पति के शव के निकट होती है तब नियोग का प्रस्ताव बिल्कुल अमानवीय प्रतीत होता है जिसके उदाहरण हमारे ग्रंथों में मिल जाते हैं।

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*वैदिक धर्म में नियोग और नारी*

वेद में नियोग के आधार पर एक स्त्री को ग्यारह तक पति रखने और उन से दस संतान पैदा करने की छूट दी गई है. नियोग किन-किन हालतों में किया जाना चाहिए, इसके बारे में मनु ने इस प्रकार कहा है : 

विवाहिता स्त्री का विवाहित पति यदि धर्म के अर्थ परदेश गया हो तो आठ वर्ष, विद्या और कीर्ति के लिए गया हो तो छ: और धनादि कामना के लिए गया हो तो तीन वर्ष तक बाट देखने के पश्चात् नियोग करके संत्तान उत्पत्ति कर ले. जब विवाहित पति आवे तब नियुक्त छूट जावे.(१) वैसे ही पुरुष के लिए भी नियम है कि पत्नी बंध्या हो तो आठवें ( विवाह से आठ वर्ष तक स्त्री को गर्भ न रहे ), संतान हो कर मर जावे तो दसवें, कन्याएं ही पैदा करने वाली को ग्यारहवें वर्ष और अप्रिय बोलने वाली को तत्काल छोड़ कर दूसरी स्त्री से नियोग करके संतान पैदा करे. *(मनु ९-७-८१)* 

*घी लेप कर नियोग करो :- मनु ने नियोग करने वाले के लिए यह नियम भी बनाया :*

*विधवायां..........कथ्चन.( मनु-स्मृति अध्याय ९- श्लोक ६० )* 

अर्थात :- नियोग करने वाले पुरुष को चाहिए की सारे शरीर में घी लेपकर, रात में मौन धारण कर विधवा में एक ही पुत्र करे, दूसरा कभी न करें.

नियोग में भी जाति-भेद : मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. *दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है.*

अब नियोग के बारे में आदेश देखिये : 


हे पति और देवर को दुःख न देने वाली स्त्री, तू इस गृह आश्रम में पशुओं के लिए शिव कल्याण करने हारी, अच्छे प्रकार धर्म नियम में चलने वाले रूप और सर्व शास्त्र विध्या युक्त उत्तम पुत्र-पौत्रादि से सहित शूरवीर पुत्रों को जनने देवर की कामना करने वाली और सुख देनेहारी पति व देवर को होके इस गृहस्थ-सम्बन्धी अग्निहोत्री को सेवन किया कर. *(अथर्ववेद कांण्ड १४ सुक्त २ मंत्र १८)*

*कुह............सधसथ आ.( ऋग्वेद मण्डल १० सुक्त १ मंत्र ४० )* *उदिश्वर............बभूथ (ऋग्वेद मण्डल १० सुक्त १८  मंत्र ८)*

अर्थात्: हे स्त्री पुरुषो ! जैसे देवर को विधवा और विवाहित स्त्री अपने पति को समान स्थान शय्या में एकत्र हो कर संतान को सब प्रकार से उत्पन्न करती है वैसे तुम दोनों स्त्री पुरुष कहाँ रात्रि और कहाँ दिन में बसे थे कहाँ पदार्थों की प्राप्ति की ? और किस समय कहाँ वास करते थे ? तुम्हारा शयनस्थान कहाँ है ? तथा कौन व किस देश के रहने वाले हो ?इससे यह सिद्ध होता है देश-विदेश में स्त्री पुरुष संग ही में रहे और विवाहित पति के समान नियुक्त पति को ग्रहण करके विधवा स्त्री भी संतान उत्पत्ति कर ले. 

*सोम:.................मनुष्यज:* 

*(ऋग्वेद मण्डल १० सुक्त ८५  मंत्र ४०)*

अर्थात : हे स्त्री ! जो पहला विवाहित पति तुझको प्राप्त होता, उसका नाम सुकुमारादी गनयुक्त होने से सोम, जो दूसरा नियोग से प्राप्त होता वह एक स्त्री से सम्भोग करे से गन्धर्व, जो दो के पश्चात तीसरा पति होता है वह अत्युष्ण तायुक्त होने से अग्निसग्यक और जो तेरे चोथे से ले के ग्यारहवें तक नियोग से पति होते वे मनुष्य नाम से कहाते है. 

*इमां.................................. कृधि* 

*( ऋग्वेद मण्डल.१०,सुक्त ८५ मंत्र ४५)* 

अर्थात : हे वीर्य सिंचन में समर्थ ऐश्वर्य युक्त पुरुष. तू इस विवाहित स्त्री व विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्युक्त कर. इस विवाहित स्त्री में दश पुत्र उतन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान. हे स्त्री ! तू भी विवाहित पुरुष से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ.

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हिन्दू धर्म में एक रस्म है जिसे नियोग कहते है, इस प्रथा के अनुसार किसी शादीशुदा महिला को बच्चे पैदा न हो रहे हो तो वो किसी भी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकती है। इसकी शर्त ये है के वह उसके पति के घर में उसके बिस्तर पर ही इस रस्म को निभाना होगा और इस प्रथा के तहत दस बच्चे तक पैदा किया जा सकते है। इस प्रथा के अनुसार नियोग करने वाली औरत ब्राह्मण न हो बल्कि निचली जात से हो और नियोग करने वाला सिर्फ ब्राह्मण ही हो सकता है उसे नियोग दाता कहते है।


नियोग प्रथा की सत्यता, प्रमाणिकता और व्यावहारिकता की पुष्टि के लिए महाभारत कालीन सभ्यता के दो उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लिखा है कि व्यास जी ने चित्रांगद और विचित्र वीर्य के मर जाने के बाद उनकी स्त्रियों से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न की। अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पाण्डु और एक दासी से विदुर की उत्पत्ति नियोग प्रक्रिया द्वारा हुई। दूसरा उदाहरण पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री का है। पाण्डु के असमर्थ होने के कारण दोनों स्त्रियों ने नियोग विधि से संतान उत्पन्न की। इतिहास भी इस बात का प्रमाण है। जहाँ तक उक्त ऐतिहासिक तथ्यों की बात है महाभारत कालीन सभ्यता में नियोग की तो क्या बात कुंवारी कन्या से संतान उत्पन्न करना भी मान्य और सम्मानीय था। वेद व्यास और भीष्म पितामह दोनों विद्वान महापुरुषों की उत्पत्ति इस बात का ठोस सबूत है। दूसरी बात महाभारत कालीन समाज में एक स्त्री पांच सगे भाईयों की धर्मपत्नी हो सकती थी। पांडव पत्नी द्रौपदी इस बात का ठोस सबूत है। तीसरी बात महाभारत कालीन समाज में तो बिना स्त्री संसर्ग के केवल पुरुष ही बच्चें पैदा करने में समर्थ होता था।

कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे- 
*(महाभारत आदि पर्व 104/2)*


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●● *नियोग  से बच्चे पैदा करो* ●● 

* हिन्दुइस्म  में बच्चे  पैदा  करने के लिए इतना जोर दिया  गया  है की  बच्चे पैदा  कर चाहे किसी के साथ  मुँह  काला  करना पढ़े  नियोग तो सब जानते है  कि क्या है अगर नहीं जानते हो  यहाँ  देख सकते है  !

*नियोग एक कलंक*

यदि  पति नामर्द  हो या फिर  बीमार हो या फिर कोई विधवा हो और बच्चे की चाहा  रखती हो  ,तो  किसी पंडित या  अपने देवर या जेट  या कोई भी पुरुष  के साथ मुँह काला करके नाजायज  सम्बन्ध बना कर बच्चे पैदा कर सकती  है , नियोग  के जरिये  ११ आदिमियो से काम ले सकती है  यानि बच्चे पैदा करने के चक्र  में  ११  लोगो के साथ  मुँह  काला  करने  की  इजाजत दी है  वेदोने  और वेदो के अनुसार स्त्री केवल बच्चे पैदा करने की मशीन  प्रतीत  होती है ?

* चाहे छोटा भाई हो या बड़ा स्त्री जिससे नियोग का काम करे उसे को देवर कहा जाता है ।

* जैसा कि पाण्डु राजा की स्त्री कुंती और माद्री आदि ने किया और जैसा व्यास जी ने  चित्राडद्र और विचित्रवीर्य के मारे जाने के बाद उन अपनी भाइयो की पत्नियों के साथ नियोग करके अम्बिका में धृतराष्ट्र और अम्बालिका में पाण्डु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की ये सब नियोग से हुई संतान है इत्यादि बात इतिहास से प्रमाणित है ।

*( सत्यार्थ  प्रकाश 4 समुल्लास  पेज नंबर 110 )*

ये सब नियोग की औलाद है?

* और वेद  तो नियोग से भरा पढ़ा है  , उस में से  एक  मन्त्र  लेते  चल ते है  जिसमे १ के बाद २  से  ३ से और ४ से नियोग करके बच्चे पैदा करना बताया है  !

* सोम की पत्नी पहली बार , गन्धर्व  तेरा  दूर पति , अगनी  तेरा तिरा पति और जो पहले से वो  चौथा पति  *( अर्थर्वेद  १४  : २ ; ३ )*

* अगर जिसको  ८ से १० लड़किया  हो गई  हो वो किसी दूसरे से मुँह  काला  करके भी  लड़का पैदा  करने के  लिए  नियोग कर सकता  है यह तक  बच्चे पैदा करने के लिए  हिन्दुइस्म आज्ञा  देता है  स्त्री है या कोई बच्चे पैदा करने की मशीन  ! 

* यह  हिन्दुइस्म की शिक्षा  ८ से  १०  बच्चे  पैदा करने के बाद छोड़ भी सकता  और  बहना  क्या है  अप्रिय बोलने वाली जब  ८ से १० साल तक साथ रहा जब अप्रिय  बोलने वाली नहीं थी जरा शर्म करो  नारी की इतनी इज्जत वेदो और हिन्दुइस्म  के अनुसार स्त्री केवल बच्चे पैदा करने की मशीन है  !
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*वेदकाल से ही नपुसकँ है आर्य ~*

● *नियोग या सिर्फ भोग ~* ●

अगर हम धार्मिक ग्रथोँ का अध्ययन करते है तो *वेदकाल* से ही आर्य राजा नपुसँक दिखते है और *ब्रहाचार्य* का चोला पहने ऋषी भोगी दिखते है । *ब्रहाचार्य* तो सिर्फ एक चौला था लेकिन ब्रहाचार्य का पालन किसी ने भी नहीँ किया कोई किसी राजा कि पत्नि के साथ *नियोग* कर रहा है। कोई किसी के साथ और वहीँ आर्य राजाओ को देखा जाए तो वो बेचारे *नपुसकँ* दिखते धार्मिक ग्रथोँ मे-

*राजा दशरत*
4 पत्नि पुत्र चारो नियोग से। 

*राजा जनक*
सिता जी उनकी पुत्रि नहीँ थी बल्कि खेत मे मिली थी जिसका जिकर स्वामी जी ने अपने *अमर ग्रथँ सत्यार्थ* मे किया है ।

*महाभारत* कि बात करे तो एक भी विवाह से सतानँ उत्तपन नहीँ हुई जहाँ *पाडवोँ* कि बात है वो कुतिँ कुवारी थी तभी नियोग कर लिया था।

*ध्रतराष्ट* वो भी *नियोग* से हुए। उनकी शादी हुई गाधारीँ के साथ पर पुत्र नहीँ हुए तभ एक से *नियोग* किया फिर आगे लिखा है वो 2 वर्ष तक गर्भवती रही फिर 100 पुत्रोँ का जन्म एक ही बार की डिलीवरी मेँ। 

आगे *भिष्म* जिन्हे बडा बहुत बडा *ब्रहाचारी* कहा जाता है वो भी *नियोगी* थे। 

अब *आर्यो* के ही *धार्मिक ग्रथोँ* से नियोग (कुकरम, बिना विवाह शारिरिक सबधँ ,गुनाह) के प्रमाण देखीये ~

*रामायण/महाभारत/स्मृति में नियोग के प्रमाण*

व्यासजी का काशिराज की पुत्री अम्बालिका से नियोग- *[महाभारत आदि पर्व अ 106/6]*

वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ-  *[महाभारत वन पर्व 314/6]*

उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा-  *[महाभारत आदि पर्व अ 104]*

कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे-  *[महाभारत आदि पर्व 104/2]*

उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा करते हैं- *[महाभारत आदि पर्व 120/26]*

परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- *[महाभारत आदि पर्व 103/10]*

पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- *[महाभारत आदि पर्व 120/28]*

सूर्ष ने कुंती से कहा- तू मुझसे भय छोड़कर प्रसंग कर- *[महाभारत आदि पर्व 111/13]*

किसी कुलीन ब्राह्मण को बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई दोष नहीं हैं- *[महाभारत आदि पर्व 101/23]*

सूर्य ने कुंती से कहा-भय मत करो संग करो- *[महाभारत आदि पर्व 111/13]*

वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा पराकर्मी– *[वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/28]*

मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया – *[वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15]*

जिसका पति मर गया हैं-वह 6 महीने बाद पिता व भाई नियोग करा दे- *[वशिष्ट स्मृति 17/486]*

किन्ही का मत हैं की देवर को छोड़कर अन्य से नियोग न करे- *[गौतम स्मृति 18]*

जिसका पति विदेश गया हो तो वह नियोग कर ले- *[नारद स्मृति श्लोक 98/99/100]*

देवर विधवा से नियोग करे- *[मनु स्मृति 9/62]*

आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- *[मनु 9/58]*

नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए- *[ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233]*

यदि राजा वृद्ध हो गया या बीमार रहता हो तो अपने मातृकुल तथा किसी अन्य गुणवान सामंत से अपनी भार्या में नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करा ले- *[कौटिलीय शास्त्र 1/17/52]*

जब कई भाई संग रहते हो और उनमें से एक निपुत्र मर जाये तो उसकी स्त्री का ब्याह पर गोत्री से न किया जाये-उसके पति का भाई उसके पास जाकर उसे अपनी स्त्री कर ले– *[व्यवस्था विवरण 25/5-10]*

यदि देवर नियोग से इंकार करे तो भावज उसके मुह पर थूके और जूते उसके पाव से उतारे- *[व्यवस्था 25/2]*

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【विधवा के साथ अमानवीय व्यवहार】

वेदों में विधवा के साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया ऐसा वर्णन भी मिलता है कि स्त्री का पति जो मृत्यु को प्राप्त होता है और उसकी देह का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ होता है कि उसकी पत्नी को किसी दूसरे पुरुष या उसके देवर को सौंप दिया जाता है स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार पति की मृत्यु के फौरन बाद ही उस विधवा का नियोग करवा दिया जाता था देखिए ऐसी पीड़ा की घड़ी में उस अभागन के मनोभावों उसके दुख से किसी को कोई वास्ता तक नहीं होता था अतः इस संदर्भ में ऋग्वेद के मंत्र को प्रस्तुत करना में बेहतर समझता हूं जिससे विधवा की स्थिति सामने आ जाती है 

"उदीष्र्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि: ।
हस्ताग्राभ्य दिधिषोस्तवेदं पातुर्जनित्वमभि सं बभूथ।।
(ऋग्वेद मण्डल -१० /१८/८)

अर्थात हे नारी उठो और सांसारिक जीवन को अपनाओ तुम व्यर्थ ही अब इस निष्प्राण व्यक्ति के पास लेटी है आओ अब तुम अपने इस नए पति का पत्नीत्व स्वीकार करो, जो तुम्हारा हाथ पकड़े हुए है और जो तुमसे स्नेह करता है इससे पता चलता है कि स्त्री को चल संपत्ति समझा जाता था जब जिसके जी मैं आया उसका तथाकथित स्वामी बन गया और रोटी के दो टुकड़ों पर उसका शरीर नोंचने लगता । 

विधवा स्त्री के साथ दूसरा अत्याचार यह किया जाता है कि उसके सर के बाल पति की मृत्यु के बाद काट दिए जाते थे अब भला पति की मृत्यु से स्त्री के बालों का क्या संबंध????? 

【दूसरा विवाह कईं नहीं 】

हैरत की बात यह है कि धर्म ग्रंथ किसी विधवा स्त्री के पुनर्विवाह को तो गलत मानते हैं परंतु मां समान भाभी के साथ उसके देवर द्वारा संभोग क्रिया को उचित मानते हैं अब आप देवर की व्याख्या न कीजिएगा के पति का भाई देवर होता है छोटा या बड़ा नहीं क्योंकि यदि छोटा भी हो तो भी वह अपनी भाभी के साथ संभोग करने के लिए तत्पर होता है भला नहीं हो की आड़ में एक स्त्री को भोग विलास की वस्तु तो बना ही दिया जाता है ऐसे में प्रश्न यह होता है कि उस स्त्री का किसी और पर इसके साथ होगा क्यों ना किया जाए आखिर दूसरा विवाह करने में क्या परेशानी है क्या किसी स्त्री की इच्छाएं उसके पति की मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती हैं ऐसे में यदि वह किसी पर पुरुष के साथ संसर्ग कर ले तो इस व्यभिचार का दोष केवल उस स्त्री पर ही क्यों उस समाज और धर्म शास्त्र पर किए हैं अफसोस की बात यह है कि दयानंद सरस्वती और उनके मानने वाले जो अपने आप को विस्तृत और खुले विचारों का मानते हैं वह भी इस मामले में अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हैं। 

【 *नियोग सन्तान उत्पत्ति के लिये नहीं* 】

इस व्यभिचार को संतान उत्पत्ति का नाम देना भी गलत है क्योंकि नियोग की जितनी भी घटनाएं आप देखेंगे जिनका वर्णन धर्म वह पुत्र प्राप्ति हेतु वर्णन किया गया अपने वंश को बढ़ाने के लिए पुत्र प्राप्ति हेतु नियोग कर्म किया जाता है जिसके उदाहरण में अन्य लेख में दे सकता हूँ।

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