६ करोड़ साल पहले के डायनोसोर कि हड्डियां मिल गई मगर वेद लिखने वाले का कुछ अता पता नहीं है ।
स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा है सुर्य, चंद्र और तारों पर मानव रहते हैं, स्वामीजी के इस ज्ञान विज्ञान के बारे में क्या विचार है आप के। जब हनुमान सूरज को निगल सकता है तो आर्य समाजी सूरज तक नही पहुंच सकते क्या?
दूसरा हलाला विवाह है एक तरह का राक्षस विवाह की तरह नहीं है जो मनुस्मृति, बौध्याना सूत्र, धर्म सूत्रों में आया है।
नियोग की तरह 11-11 से नहीं।
गंधर्भ विवाह प्रेम मिलन बिना वैदिक रूप अग्नि के भी जायज है आज की भाषा में कहें तो live in relationship.
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● सत्यार्थ प्रकाश ११ वें समुल्लास में स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने साफ साफ लिखा है कि महाभारत यज्ञ और युद्ध में कहां से लोग आये थे। आप सच को नकार नहीं सकते।
● नियोग : ऋग्वेदादीभाष्यभूमिक 21 विषय - नियोग विषय पेज न :- 261-266 में दयानन्द सरस्वती वेदों के जरिये से लिखते है ।
*स्त्री के लिए भी आज्ञा है, की जब किसी पुरूष की स्त्री मर जाय और संतानउत्पत्ति किया चाहे, तब स्त्री भी उस पुरुष के साथ नियोग ( यानी आज कल की भाषा कह सकते है नाजायज़ संबंध) करके उसको प्रजा युक्त कर दे |*
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● *मौत के डर से दयानंद का गृहत्याग*
दयानंद के पाँच भाई बहन थे, जिसमें से दो बहनें थीं ,उस में एक १४ वर्षीय बहन कि हैजे से मौत हो गई थी पहली बार मौत को देखकर दयानंद सरस्वती डर गया तब उसकी उम्र १६ साल कि थी फिर कुछ दिनों बाद उसके चाचा कि भी हैज से मौत हो गई बहन और चाचा कि मौत से वो सोचने लगा कि एक दिन में भी मर जाऊंगा। *इस बात का ज़िक्र स्वयं दयानंद ने अपने आत्मचरित के पृष्ठ संख्या ६ में किया है*
मौत के डर से दयानंद सरस्वती ने उम्र के २० वे साल में गृहत्याग कर दिया, लेकिन जिस मौत से स्वामी जी बचना चाहते थे,उस मौत ने आखिरकार स्वामीजी को ढूंढ ही लिया। *और आर्य समाजी कहते हैं कि दयानंद सरस्वती ने सत्य की खोज में गृहत्याग किया था*
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● *२००% सत्य है दयानंद सरस्वती कि दुर्दशा कोई भी नियोगी समाजी इसे नकार नहीं सकता है*
*पुस्तक “श्रीमद्दयानन्द प्रकाश" में आप पढ़ेंगे कि:—* यह व्यक्ति किस तरह दुर्गति को प्राप्त होकर मरा? जिसे पढ़कर कलेजा मुंह को आता है। पुस्तक *दयानन्द चरित के पेज 217* में आप स्वयं पढ़ें महर्षि दयानन्द की दुर्दशा।
यदि दयानंद महान योगी तथा साधक था तो फिर वो नकली महर्षि दयानंद 40 दिनोँ तक अपने वस्त्रोँ मेँ टट्टी पेशाब करके तड़प तड़प कर बुरी दुर्गति से क्योँ मरा था ?
अपनी योग साधना से वो क्योँ अपने बुरे कर्मोँ के फलोँ को नष्ट नहीँ कर पाया ?
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● सत्यार्थ प्रकाश पेज 101 पर लिखा है
“महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे , अगर न रहा जाये तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे”
{स्म्मुलास ४ पृष्ट 101 }
स्वामी दयानन्द ने विधवा विवाह न करने का कारण बताया है ” पुन : विवाह करने से स्त्री का पतिव्रता धर्म नष्ट हो जायेगा“
पृष्ट 99 स्म्मुलास ४ में ही लिखा है।
विधवा स्त्री ग्यारह पुरुषों के साथ नियोग { सम्भोग } पशु तुल्य व्यवहार कर सकती है ! दयानन्द जी लिखते हैं ऋग्वेद 10:85:40 के हवाले से की एक स्त्री 11 पुरुषों तक से नियोग कर सकती है *(१)* उसी तरह एक पुरुष 11 स्त्रियों से नियोग कर सकता है।
● आप स्वयं नीचे दिए कुछ रेफरेन्स जाके देखें और बताएं कि यह क्या वेश्यावृत्ति की बात नहीं लगती? और उस स्त्री की संतान पे क्या असर पड़ेगा जिसके 11-11 बाप हों?
1.आर्ष साहित्य द्वारा प्रकाशित बाली सत्यार्थ प्रकाश के 4 समुल्लास में पृष्ठ 100 पे।
2. आर्य निर्मात्रि सभा की सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ 117-118
3. The english translation of satyarth prakash by Durga Prashad published from virjanand press ( lahore) page: 160.
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● *दयानंद यजुर्वेद और चुतड*
स्वयं को वैदिक वैदिक कहते नहीं थकने वाले समाजी यों जरा दयानंद के इस *( यजुर्वेद अध्याय २५ मंत्र ६ )* भाष्य को पढकर बताए कि चुतड कौन सा वैदिक शब्द है। दयानंद ने ये चुतड शब्द कौन से वैदिक शब्दकोश से निकाला है.?
क्या वैदिक काल में ऐसे अश्लील शब्द चलन में थे.? क्या ये ऋषि की भाषा हो सकती है.? क्या वेद सम्मत है.?
खैर जिसका दिमाग ही चुतड जैसा हो वो यही सब लिख सकता है दयानंद के भाष्य करने का तरीका देखकर तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया में जितने भी अश्लील प्रवृत्ति के जिनके जिव्हा पर सदैव चुतड, योनि, रांड विर्य आदि ही रहता है सब के सब दयानंद की भाँति सर्वश्रेष्ठ भाष्यकार एवं महर्षि बनने की योग्यता रखते हैं.!
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● गुदा से साँप लेने की आज्ञा वेद में?
अब आप स्वामी जी के अण्ड बण्ड कहने का उदाहरण भी देख लीजिए-
‘हे मनुष्यो, तुम मांगने से पुष्टि करने वाले को स्थूल गुदा इंद्रिय के साथ वर्तमान अंधे साँपों को गुदा इंद्रियो के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि से नीचे के भाग से, अंडकोष को आंड़ों से, घोड़ों लिंग और वीर्य से, संतान को पित्त से, भोजन को पेट के अंगों को गुदा इंद्रिय से और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओ। (-यजुर्वेद 25/7 पर स्वामी दयानंद जी का भाष्य पृ.876)
स्वामी दयानंद जी ने अपने पूरे जीवन में ईश्वर की इस आज्ञा का पालन नहीं किया और इस आज्ञा का पालन करना संभव भी नहीं है।
(87) आखि़र कोई मनुष्य गुदा से अंधे साँपों को कैसे ले सकता है ?
(88) और अगर किसी तरकीब से कोई ले भी ले तो आखि़र क्यों ले ले ?
(89) अंधे साँपों को गुदा से लेकर क्या फ़ायदा होगा ?
(90) क्या वास्तव में यह ईश्वर की आज्ञा है ?
(91) ईश्वर मानव जाति को ऐसी आज्ञा क्यों देगा जिससे कोई लाभ न हो ?
(92) क्या यही धर्म है ?
(93) धर्म ऐसा कैसे हो सकता है जिसका पालन ही संभव न हो ?
(94) वेद के अश्लील अर्थ करने पर सत्यार्थप्रकाश, द्वादशसमुल्लास, पृ. 279 पर स्वामी दयानंद जी ने महीधरादि को भांड, धूर्त और निशाचरवत् कहा है। उन्होंने ख़ुद वेद का अर्थ अश्लील के साथ निरर्थक भी कर डाला तो अपने इस कर्म पर उन्होंने ख़ुद को क्या कहा या आर्य समाज ने उन्हें क्या कहा?
● *( दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१ )*
पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह्लुत आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिनग्वगं शेपेन प्रजाग्वं रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः॥ ~यजुर्वेद {अध्याय २५, मंत्र ७}
दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इस मंत्र का अर्थ यह लिखते हैं कि — “हे मनुष्यों! तुम मांगने से पुष्टि करने वालों को स्थूल गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान, अंधे सर्पों को गुदेंद्रियों के साथ वर्तमान विशेष कुटिल सर्पों को आंतों से, जलों को नाभि के नीचे के भाग से, अंडकोष को आंडों से, घोडे के लिंग और वीर्य से संतान को, पित्त से भोजनों को, पेट के अंगो को गुदेंद्रिय और शक्तियों से शिखावटों को निरंतर लेओं।"
समीक्षक — अब कोई इन आर्य समाजीयों से यह पूछे कि उन्हें दयानंद द्वारा किये गये अधिकांश मंत्रो के ऐसे अर्थ अश्लील क्यों नहीं लगते? तो अब नियोगी समाजी हमें बताए कि दयानंद के इन भाष्यों के बारे में उनकी क्या राय है? दयानंद द्वारा किया यह अर्थ उन्हें अश्लील लगता है या नहीं। उचित होता यदि दयानंदी गुरु आज्ञा का पालन करते हुए स्वामी जी की ही गुदा में दो चार अंधहीन सर्प छोड़ देते, और स्वामी जी को निरंतर अश्व का लिंग ग्रहण कराते रहते, तब जाकर कहीं गुरु आज्ञा का फल प्रकट होता।
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● सूपस्था ऽ अद्य देवो वनस्पतिर् अभवद् अश्विभ्यां छागेन सरस्वत्यै मेषेणेन्द्राय ऽऋषभेणाक्षँस्तान् मेदस्तः प्रति पचतागृभीषतावीवृधन्त पुरोडाशैर् अपुर् अश्विना सरस्वतीन्द्रः सुत्रामा सुरासोमान्॥
~यजुर्वेद {२१/६०}
स्वामी जी अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि:— “हे मनुष्यों! प्राण और अपान के लिए दु:ख विनाश करने वाले छेरी आदि पशु से, वाणी के लिए मेंढ़ा से, और परम ऐश्वर्य के लिए बैल से भोग करें”
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● वेद मे योनी लिंग का जिक्र (आर्यो के शब्दो मे फुर्ज,व जकर शब्द का स्तेमाल):- देखिये स्वामी दयानंन्द सरस्वती यजुरवेद भाष्य एकोनविंशोsध्या: मंत्र ७६ (रेतोमुत्रं विजहाति योनिंप्रविशदिंद्रियम् गर्भो जरायुनाव्रतsउल्बं जहातिजन्मना रितेनात्यमिंद्रियंविपान शुक्रमन्धसsइंद्रियमिंदपयोsम्रतं मधु!!७६!!
पदार्थ:(इंद्रिम्) पुर्ष(मर्द) का लिंग(penis)(योनिम्) स्त्री (औरत) की योनि (प्रविशत) मे प्रवेश करता हुआ(रेत:) विर्य(मनी) को ( विजहाति) विशेषकर छोडता है.
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स्वामी जी की कसौटी पर ही उनका मत झूठा ठहरा। स्वामी जी क़ुरआन का विरोध करते हुए यह तक कह गए-
‘जो दूसरे मतों को कि जिसमें हजारों क्रोड़ों मनुष्य हों झूठा बतलावे और अपने को सच्चा उससे परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है? (सत्यार्थप्रकाश, चतुर्दश. पृष्ठ सं. 378)
स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश के 13 अध्यायों में नानक पंथ, कबीर पंथ, दादू पंथ, गोकुलिगोस्वामी मत, स्वमीनारायण मत, ब्राह्म समाज मत, शाक्तवैष्णव मत, शैव मत, वाम मार्ग, बौद्ध मत, जैन मत, चारवाक मत, अद्वैत मत, ईसाई मत आदि को झूठा बताया और 14वें अध्याय में बताया कि.. ‘जो दूसरे मतों को कि जिसमें हजारों करोड़ों मनुष्य हों झूठा बतलावे और अपने को सच्चा उससे परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है?’
स्वामी जी को चाहिए था कि जो कुछ वह कह रहे थे, उस पर वह अपना मत भी परख कर देख लेते।
(98) क्या अपने कथन के अनुसार उनका मत सबसे ज़्यादा झूठा मत सिद्ध नहीं होता?
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स्वामीद दयानंद के यजुर्वेद भाष्य मे बकरी के बजाय बकरे का दूध पीने की बात क्यो कही गई है !
(दयानंद कृत यजुर्वेदभाष्य, भाष्य-१)
होता यक्षद् अश्विनौ छागस्य हविष ऽ आत्ताम् अद्य मध्यतो मेद ऽ उद्भृतं पुरा द्वेषोभ्यः पुरा पौरुषेय्या गृभो घस्तां नूनं घासे ऽ अज्राणां यवसप्रथमानाम्ँ सुमत्क्षराणाम्ँ शतरुद्रियाणाम् अग्निष्वात्तानां पीवोपवसानां पार्श्वतः श्रोणितः शितामत ऽ उत्सादतो ङ्गाद्-अङ्गाद् अवत्तानां करत एवाश्विना जुषेताम्ँ हविर् होतर् यज॥ ~यजुर्वेद {२१/४३}
दयानंद अपने यजुर्वेदभाष्य में इसका अर्थ करते हुए अपने लाडले शिष्यों के लिए कहते है कि-- “हे (होत:) देनेहारे! जैसे, (होता) लेनेवाला,,,, (छागस्य) बकरा आदि पशुओं के, (मध्यत:)- बीच से, (हविष:)- लेने योग्य पदार्थ, (मेद:)- अर्थात घी, दूध आदि,,,,,, (आत्ताम्) लेवें वा,,,,, (नूनम्) निश्चय करकें, (घस्ताम्) खावें वा,,,,,, (हवि:) उक्त पदार्थों से खाने योग्य पदार्थ का,,,,,, (जुषेताम्) सेवन करें”
भावार्थ में स्वामी जी लिखते हैं कि "जो छागस्य (अर्थात बकरा) आदि पशुओं की रक्षा कर उनके दूध घी आदि का अच्छी प्रकार सेवन करते हैं उनके सब अंग रोग मुक्त हो सुख को प्राप्त करते हैं
समीक्षक-- वाह रे! सत्यार्थ प्रकाश के रचने वाले, वेद ऋचाओं के अर्थ का अनर्थ करने वाले, क्या कहने तेरे! (छागस्य) अर्थात बकरा आदि पशुओं से लिए दूध घी आदि का अच्छी प्रकार सेवन करें, धन्य हे! निर्बोधानंद तेरी बुद्धि, अच्छी शिक्षा लिखीं हैं अपने लाडले शिष्यों को बस यही शेष रह गया था, सो भी तुमने अपने शिष्यों को कथन कर दिया, अभी तुम्हारे चेले कम नमूने थे जो उन्हें नर बकरे का दूध घी खाना लिख दिया, इस श्रुति का अर्थ लिखने से पूर्व जरूर स्वामी जी ने (छागस्य) बकरे का दूध पिया होगा, जिससे उनकी मति भ्रष्ट हो गई, इसी कारण स्वामी जी इस श्रुति में (छागस्य) नर बकरे का दूध घी खाना लिखते हैं, बकरी का नहीं खास बकरों का, धन्य हे! ऐसा भाष्यकार और धन्य है ऐसे भाष्यों को मानने वाले अक्ल से पैदल समाजी, अब आपको स्वामी जी की बुद्धि के बारे में क्या कहें? स्वामी जी ने इस श्रुति के अर्थ का कैसा अनर्थ किया है वह आप लोगों के सामने ही है, ये दयानंदी कहते हैं कि हम वैदिक है और हमें केवल दयानंद कृत वेदभाष्य ही मान्य है, हम जितने भी कार्य करते हैं उसी के अनुकूल करते हैं,
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इसके बावजूद स्वामी दयानंद जी पति-पत्नी को बताते हैं कि वे सहवास की परम गोपनीय क्रिया कैसे संपन्न करें?, देखिए-
‘पुरूष वीय्र्यस्थापन और स्त्री वीर्याकर्षण की जो विधि है उसी के अनुसार दोनों करें। जहां तक बने वहां तक ब्रह्मचर्य के वीय्र्य को व्यर्थ न जाने दें क्योंकि उस वीय्र्य वा रज से जो शरीर उत्पन्न होता है वह अपूर्व उत्तम सन्तान होता है। जब वीय्र्य का गर्भाशय में गिरने का समय हो उस समय स्त्री और पुरूष दोनों स्थिर और नासिका के सामने नासिका, नेत्र के सामने नेत्र अर्थात् सूधा शरीर और अत्यन्त प्रसन्नचित्त रहैं, डिगें नहीं। पुरूष अपने शरीर को ढीला छोड़े और स्त्री वीय्र्यप्राप्ति समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच कर वीर्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थित करे। पश्चात् दोनों शुद्ध जल से स्नान करें।‘ (सत्यार्थप्रकाश, चतुर्थसमुल्लास)
स्वामी जी के बताए तरीक़े से सहवास किया जाए तो वीर्ये गर्भाशय तक न पहुंच सकेगा बल्कि बाहर ही गिर जाएगा। स्वामी जी बताते हैं कि जब वीर्य का गर्भाशय में गिरने का समय आए तो दोनों अपने शरीर के अंगों को सीधा कर लें। इस क्रिया के दौरान औरत-मर्द जैसे ही अपनी अपनी टाँगें सीधी करेंगे, लिंग गर्भाशय से दूर हो जाएगा। लिंग छोटा हुआ तो बाहर ही निकल जाएगा। पेट मोटा हुआ तो भी यही होगा। औरत का क़द मर्द से थोड़ा छोटा होता है और कुछ मामलों में तो पत्नी का क़द अपने पति के मुक़ाबले डेढ़-दो फ़ुट तक छोटा होता है। ऐसे में पत्नी को पति की नाक के सामने अपनी नाक और उसकी आँखों के सामने अपनी आँखें लाने के लिए थोड़ा सा ऊपर को सरकना होगा। थोड़ा सा ऊपर को सरकते ही लिंग उसके गर्भाशय से और ज़्यादा दूर हो जाएगा या बाहर ही निकल जाएगा। सही बात का पता न हो तो आदमी को चुप रहना चाहिए। उसमें दख़लअंदाज़ी करना और अपनी कल्पना को वैज्ञानिक बताना लोगों के जीवन से खेलना है।
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दयानंद ने मेक्समूलर के भाष्य को कॉपी कर जैसे तैसे हिन्दी मे अनुवाद तो कर दिया पर अपनी मूर्खता को छिपा न सके “यजुर्वेद अध्याय १६ मंत्र १" में दयानंद लिखते है:-
नमस्ते रूद्र मन्यव उतो त इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥
( यजुर्वेद १६ / ९ ) हे ( रूद्र )- दुष्ट शत्रुओं को रूलाने हारे राजन्, (ते)- तेरे, (मन्यवे)- क्रोधयुक्त वीरपुरूष के लिये, (नम:)- वज्र प्राप्त हो, (उतो)- और, (इषवे)- शत्रुओं को मारने हारे, (ते)- तेरे लिये, (नम:)- अन्न प्राप्त हो, (उत)- और (ते)- तेरे, (बाहुभ्याम्)- भुजाओं से, (नम:)- वज्र शत्रुओं को प्राप्त हो ।
भावार्थ – जो राज्य किया चाहे, वे हाथ पांव का बल युद्ध की शिक्षा तथा शस्त्र और अस्त्रों का संग्रह करें ॥१॥
इस दयानन्द ने किस प्रकार अर्थ का अनर्थ किया है वो आपके सामने है अन्य शब्दों का तो छोडिए एक सामान्य सा शब्द ( नम: ) तीन बार लिखा और तीनों का अर्थ ऐसा लिखा जैसा कोई मूर्ख भी नही करता ।
( नम: )- वज्र प्राप्त हो, ( नम: )- अन्न प्राप्त हो, ( नम: )- वज्र शत्रुओं को प्राप्त हो।
प्रथम तो आर्य समाजी ये बताए कि वेद ईश्वर की स्तुति करता है या फिर राजा की जैसा कि इस धूर्त ने लिखा है:-
हे ( रूद्र ) - *“दुष्ट शत्रुओं को रूलाने हारे राजन्,"* आश्चर्य की बात है कि इस धुर्त ने इस मंत्र से ईश्वर को ही गायब कर दिया ईश्वर के स्थान पर राजा की स्तुति करने लगा चलिए।
अब एक नजर इसके सही अर्थ भी डाल लेते हैं नमस्ते रूद्र मन्यव उतो त इषवे नमः। बाहुभ्यामुत ते नमः॥
( यजुर्वेद- अध्याय १६, मंत्र ९ )
हे (रूद्र)- {दुष्टों को उनके द्वारा किए गए दुष्टता का फल भोगाकर रूलाने वाले} रूद्रदेव, (ते)- आपके, (मन्यवे)- अनिति दमन के लिए क्रोध के प्रति, (नम:)- हमारा नमस्कार है, (उतो)- और, (इषवे)- दुष्टों का नाश करने वाले के प्रति (नम:)- हमारा नमस्कार है, (ते)- आपके, (बाहुभ्याम्)- विराट भुजाओं के प्रति, (नम:)- हमारा नमस्कार है ।
भावार्थ :- हे ( दुष्टों को उनके द्वारा किये गए दुष्टता का फल भोगाकर रूलाने वाले ) रूद्रदेव आपके मन्यु ( अनिति दमन के लिए क्रोध के प्रति ) हमारा नमस्कार है दुष्टों का नाश करने वाले के लिए हमारा नमस्कार है। आपकी विराट भुजाओं के लिए हमारा नमस्कार है ॥१॥
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(दयानंद कृत ॠग्वेदभाष्य, भाष्य-१)
सोम: प्रथमो विविदे गन्ध्र्वो विविद उत्तरः।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तु रीयस्ते मनुष्यजाः॥
~ऋ० {मं० १०, सू० ८५, मं० ४०}
दयानंद अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—
“हे स्त्री! जो (ते) तेरा (प्रथमः) पहला विवाहित (पतिः) पति तुझ को (विविदे) प्राप्त होता है उस का नाम (सोमः) सुकुमारतादि गुणयुक्त होने से सोम जो दूसरा नियोग होने से (विविदे) प्राप्त होता वह, (गन्धर्व:) एक स्त्री से संभोग करने से गन्धर्व, जो (तृतीय उत्तरः) दो के पश्चात् तीसरा पति होता है वह (अग्निः)- अत्युष्णतायुक्त होने से अग्निसंज्ञक और जो (ते) तेरे (तुरीयः) चौथे से लेके ग्यारहवें तक नियोग से पति होते हैं वे (मनुष्यजाः) मनुष्य नाम से कहाते हैं | जैसा (इमां त्वमिन्द्र) इस मन्त्रा में ग्यारहवें पुरुष तक स्त्री नियोग कर सकती है, वैसे पुरुष भी ग्यारहवीं स्त्री तक नियोग कर सकता है!!
(दयानंद कृत ऋग्वेदभाष्य, भाष्य-३)
उदीर्ष्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि।
हस्तग्राभस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि सं बभूथ॥
~ऋ० {मं० १०, सू० १८, मं० ८}
अपने ऋग्वेदभाष्य में इसका अर्थ यह लिखते हैं कि—
“हे (नारि) विध्वे तू (एतं गतासुम) इस मरे हुए पति की आशा छोड़ के (शेषे) बाकी पुरुषों में से (अभि जीवलोकम) जीते हुए दूसरे पति को (उपैहि) प्राप्त हो और (उदीष्र्व) इस बात का विचार और निश्चय रख कि जो (हस्तग्राभस्यदिधिषो:) तुम विध्वा के पुनः पाणिग्रहण करने वाले नियुक्त पति के सम्बन्ध् के लिये नियोग होगा तो (इदम्) यह (जनित्वम्) जना हुआ बालक उसी नियुक्त (पत्युः) पति का होगा और जो तू अपने लिये नियोग करेगी तो यह सन्तान (तव) तेरा होगा। ऐसे निश्चययुक्त (अभि सम् बभूथ) हो और नियुक्त पुरुष भी इसी नियम का पालन करे”
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दयानन्द की महाअज्ञानता (गायत्री मंत्र).
दयान्नद ने गायत्री मंत्र की नकल की है कही से उसको खुद भी नही मालूम गायत्री मंत्र क्या है.. चलो हम बता देते है… जिसको आर्य समाज गायत्री मंत्र बोलता है वो कोई मंत्र नही है बल्कि ” यजुर्वेद अध्याय 36 का श्लोक 3″ है जिसमे ओम् नही है ..ओम इन लोगो ने अपने घर से लगाया है .. वेद ज्ञान दाता ने ओम नही लगाया है.. ओम को किसी के साथ लगाकर जाप करना वेद और गीता ज्ञान दाता के विधान को तोडना है…
विवेचन:- हिन्दुओं द्वारा नित्य जाप किए जाने वाले गायत्री मंत्र का किसी को पता नहीं था कि यह गायत्री मन्त्र कहां से उद्घत किया गया है। महर्षि दयानन्द ने अपने द्वारा लिखी पुस्तक ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ के समुल्लास-3 पेज-38 पर (वैदिक यति मण्डल दयानन्द मठ दीनानगर से प्रकाशित तथा आचार्य प्रिन्टिंग प्रैस दयानन्द मठ गोहाना मार्ग रोहतक से मुद्रित) गायत्री मन्त्र का उल्लेख किया है, लिखा है '‘भूः भुवः स्वः’’ ये तीन वचन तैतरीय आरण्यक के हैं। मंत्र के शेष भाग के विषय में महर्षि दयानन्द मौन है। उन्हें यह नहीं पता कि यह कहां से लिया गया है।
इससे सिद्ध हुआ कि महर्षि दयानन्द को वेद ज्ञान नहीं था। यदि वेद ज्ञान होता तो स्पष्ट कहता कि यह मंत्र जिसे गायत्री मंत्र कहते हैं, यजुर्वेद अध्याय-36 का मंत्र तीसरा है। ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ की रचना सन् 1875 में करके, समाज में पढ़ने के लिए प्रवेश कर दिया। उसके दो वर्ष बाद वेदों का अनुवाद करना प्रारम्भ किया। यजुर्वेद का अनुवाद जनवरी सन् 1877 में प्रारम्भ किया तथा नवम्बर 1882को छः वर्ष में पूरा किया।
यजुर्वेद अध्याय-36 के मंत्र 3 का अनुवाद महर्षि दयानन्द का अपना ज्ञान है तथा सत्यार्थ प्रकाश में इसे गायत्री मंत्र बनाकर अनुवाद लिखा है। यह महर्षि दयानन्द ने किसी की नकल करके लिखा है। इसलिए एक दूसरे से मेल नहीं करता। जब महर्षि दयानन्द यजुर्वेद का अनुवाद कर रहा था। इसको यह भी याद नहीं था कि मैंने इस मंत्र का अनुवाद सत्यार्थ प्रकाश में क्या किया है? इससे सिद्ध है कि महर्षि दयानन्द का ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ का ज्ञान वेद ज्ञान विरूद्ध है। क्योंकि सत्यार्थ प्रकाश में लिखे गायत्री मंत्र के अंश का ज्ञान कराया है कहा है कि ये तीन वचन (भूः भुवः स्वः) तैतरीय आरण्यक के हैं। यदि वेद ज्ञान होता तो लिखता कि यह मंत्र यजुर्वेद अध्याय-36 मंत्र-3 है।
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*सत्यार्थ प्रकाश में दयानद सरस्वती यही बात करते है।*
*इस व्यवस्था को कभी न तोड़े की जो-जो युद्ध मे जिस-जिस भृत्य (सैनिक) वा अध्यक्ष ने रथ, घोड़ा, हाथी,छत्र, धन,धान्य, गाय, आदि पशु और स्त्रीया तथा अन्य प्रकार के सब द्रव्य और घी इत्यादि युद्ध मे जाते उस-उस को ग्रहण करे (यानी लूट लो) यही बात मनुस्मृति में कई जगह पर लिखी है।
*तो क्या स्त्रीयो के साथ नियोग के नाम पर बलत्कार करें। (वाह भाई वाह) क्या बात है (6 समुलास पेज नम्बर126) इसके आगे लिखा है कि किसको कितना हिस्सा मिलना चाहिए।
*और ऋग्वेदादीभाष्यभूमिक में लिखा है कि युद्ध ही एक मात्र धन प्रप्ति का जरिया हैं इसी लिए उसे निघण्टु कहा जाता है (यानी महाधन का जरिया) दूसरों को लूटो धन जमा करो और ये बात मनुसमूर्ति में भी है। (22-10 राजप्रजाधर्मविषय पेज नम्बर 285)
*(और मुगलों को लुटेरा बोलते है बल्कि यही यही पैदा होय और यही उनकी क़बर है। और अपना इतिहास भूल गए विदेशोंयो बोहत खूब)
*एक आर्य समाज वाले एक व्यक्ति के मेरी बात चीत में उसने खुद कहा है, की वेदों से कि इन्शान में क़ुर्द्ध आती है (यानी आतंक की भावना आती है)
* ईस्वर आज्ञा देता है कि सब मनुष्यों को वैदिक बनाओ। (यजुर्वेद 2:1) बोहत अछि जर्बदस्त है।
*और भी बोहत बाते है ये चंद पेश किया है नही तो वेद ऐसी चीजों से भार-पढ़ा है।
*स्त्रियो और विधवाओं को नियोग के नाम पर बलत्कार करना । पंडितो ने खूब मजे लिए है। जिसका ex. आसाराम , रामरहीम इत्यादि इस दौर में मौजूद है।क्यों कि वेद ऐसी शिक्षा देता है उनमें उन बेचारो का क्या कसूर है। वो तो वेद के अनुसार चल रहे थे !
*ये जो भी लिखा है वेदों के समुन्दरो से केवल एक बूंद है,अभी तो पूरा समुन्द्र बाकी है।
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*वेदों के ज्ञाता महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा हैः-*
1. प्रसूता छह दिन के पश्चात् बच्चे को दूध न पिलावे। (2-3) (4-68)
2. 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम है अर्थात् स्वामी जी के मतानुसार लड़के की उम्र लड़की से दूना या ढाई गुना होनी चाहिए। (4-20) (14-143) (3-31)
3. गर्भ स्थिति का निश्चय हो जाने पर एक वर्ष तक स्त्री-पुरुष का समागम नहीं होना चाहिए। (2-2) (4-65)
4. जब पति अथवा स्त्री संतान उत्पन्न करने में असमर्थ हों तो वह पुरुष अथवा स्त्री नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकते हैं। (4-122 से 149)
5. यज्ञ और हवन करने से वातावरण ‘शुद्ध होता है। (4-93)
6. मांस खाना जघन्य अपराध है। मांसाहारियों के हाथ का खाने में आर्यों को भी यह पाप लगता है। पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्यों की हत्या करने वाले जानिएगा। (10-11 से 25)
7. मुर्दों को गाड़ना बुरा है क्योंकि वह सड़कर वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देते हैं। (13-41, 42)
8. लघुशंका के पश्चात् कुछ मुत्रांश कपड़ों में न लगे, इसलिए ख़तना कराना बुरा है। (13-31)
9. दण्ड का विधान ज्ञान और प्रतिष्ठा के आधार पर होना चाहिए। (6-27)
10. ईश्वर के न्याय में क्षणमात्र भी विलम्ब नहीं होता। (14-105)
11. ईश्वर अपने भक्तों के पाप क्षमा नहीं करता। (7-52)
12. सूर्य केवल अपनी परिधि (Axis) पर घूमता है किसी लोक के चारों ओर (Orbit) नहीं घूमता। (8-71)
13. सूर्य, चन्द्र, तारे आदि पर भी मनुष्य आदि सृष्टि हैं। (8-73)
14. सिर के बाल रखने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम हो जाती है। (10-2)
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सत्यार्थ प्रकाश 14 समुलास !
* प्रशन : - 5 ,6 ,7 ,8 , 9 ?
उत्तर : -
अर्थात : - हे परमेश्वर आपकी जो यह अच्छे प्रकार के गुणों को प्रकाश करने वाली वेदविद्या है। उससे हम लोगो की स्तुति को प्राप्त हो। (यजुर्वेद 2 : 14 )
* वाह अपने ही लोगो से तारीफ खुद करवा रहा है वैदिक ईश्वर की मेरी वेद विद्या ?
* वैदिक ईश्वर उपदेश करता है ,सब मनुष्य को वैदिक बनाओ। काफी अच्छी जबरदस्ती है ? (यजुर्वेद 2 : 1)
* खुद अपने मानने वालों से तारीफकर वा राह है वैदिक ईश्वर।
* वैदिक ईश्वर की दम्भ की बात है?
* कहते है कि वेदों को मानने और जानने वाले ही ईश्वर के प्रिय है ? यानी आर्य , क्षत्रिय, वैश्य वह क्या? भेद भाव और शूद्र कहा गए?
अर्थात : - हे मनुष्य जैसे में जिस परमात्मा में ब्राह्मण और क्षत्रिय तथा वेश्य मिल कर काम करते है। ( यजुर्वेद 20 : 25 )
* तो शुद्र कहा गए क्या वेद अनार्य ( शुद्रो )
लोगो को मानव नही मानता क्या ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य को ही मनुष्य मानता है और शुद्रो को जानवर समझता है ?
* शुद्रो का अर्थ होता है अनाड़ी या वेदों को न जानने वाला ?
* दयानंद सरस्वती जी का कहना है कि यूनान, मिस्र , यूरोपीय देशों, इत्यादि , हब्शी ,मगोलिन अरब देशों में बसने वाले सब शुद्र है , की इन्होंने वेदों को देखा नही नाही सुना ?
( सत्यार्थ प्रकाश 7 समुलास )
* यही तो हमारा भी कहना है कि वेद शिर्फ़ ब्राह्मणों ( आर्य ) के लिए है नाकि पूरी मानव जाति के लिए ?
* तो वैदिक ईश्वर बाकी लोगो को मार्ग नही दिखला सकता , तो फिर वेद और वैदिक ईशवर कोई काम का नही रहा ?
* किसी को शुद्र और किसी ब्राह्मण (आर्य ) बनाने का नियम वैदिक ईश्वर के खजाने में है ?
* क्या भला कोई शेर का जन्म ले सकता है क्या पता ? उसने कोनसा पाप किया होगा ? उसको शेर का जन्म मिला ?
*जो वो देता है वही देता है वो सब मनुष्य के लिए होना चाहिए ना केवल एक समाज के लिए ?
* वेद अगर ईश्वरीय ग्रन्थ होता तो सबके लिए एक व्यहार करता किसी को नीचा और किसी को ऊंचा नही बल्कि सबको समान अधिकार देता ?
* वेद सबके लिए नही बल्कि ब्राह्मणों ( आर्यो ) के लिए है , ये कितना भी आज लोगो को कहले की ऐसा नही वैसा परंतु इतिहास गवाह है की इन चीजों का , इन्होंने अनार्य लोगो का शोषण किया है ।
* अगर बेचारा कोई गलती से वेदों को सुन भी लेता तो उसके साथ क्या हाल कर थे कि आत्मा भी कांप जाती उसके कानों में शीसा पिघला कर डाल देते थे ।
* दुसरो को अछूत वाली परिभाषा कहा से आई या वैदिक ईश्वर के दूसरे मानव भक्त नही ?
* दयानद सरस्वती अपनी किताब सत्यार्थ प्रकाश में एक जगह पर लिखता है ,की जैनी धर्म के लोग वश्या ( गंदा काम करने वाली स्त्री की तरह ) की तरह होते है ,और अपने पुराने गुरु घंटाल को भी अशुद्ध शब्दों का प्रयोग किया है इस आम आदमी भी आसानी से समझ जाएंगे कि वेदों लोगो का अपमान , और ऊंच नीच का पाठ देता है । 12 समुलास
* इससे पता चला कि वेद ईश्वरी ज्ञान नही ?
* अगर जो वेद विरोधी है उनका क्या हाल करना चाहिए ये वेद बताता है, वाह क्या जरबदस्ती है ।
* काट डाल, चिर डाल, फाड् डाल, जला दे,फुंक दे,भस्म कर दे। (अथर्वेद 12:5:62)
*तुम करके बांध लिए गए,कुचल गए,अनिष्ट चिन्तक को आग में जला डाल(अथर्वेद12:5:61)
* (वेदविरोधी) उन लोगो को काट डाल, उसकी खाल उतार दे, उसके मांस के टुकडो को बोटी-बोटी कर दे,उसके नसों को एठ दे,उसकी हड्डियों को मसल डाल उसकी मिंग निकाल दे, उसके सब अडो (हस्सो) और जुडो को ढीला कर दे (अथर्वेद 12:5:7)
*अब दूसरे देश या अनार्य लोगो को वहां लूट -मार और दुर्लभ व्यवहार करे।
*यह वज्र सत्य धर्म(वैदिक धर्म) की तुर्ति करे , इस शत्रु की राज्य की (उसकी सल्तनत) नाश करके उसके जीवन को नाश कर देवे (वहां अच्छी शिक्षा है)उसकी गले की नाडियो को काटे और गुददी नाड़ियो को तोड़ डाले। (अथर्वेद6:135:1)
* उचे लोगो से नीचे-नीचे और गुप्त होकर जमीन से कभी न ऊठे और दंड से मार डाला गया पढ़ा रहे।(अथर्वेद6:135:2)
* हिंसको को मार डाल औऱ गिरा दे,जैसे वायु पैड को (NOTE:- )गौ, घोड़ा और पुरूष को मत छोड़ो(या तो इसका एक मतलब है,की मार डालो या फिर गुलाम बनालो)है हिंसा शील(मजलूम को हिंसक कहा जा रहा बल्कि खुद हिंसा कर रहे है।)यहां से लौट कर प्रजा की हानि के लिए जगह दे (अथर्वेद10:1:17)
*कहते है, की लौहे की बनी तलवार घर है(अथर्वेद10:1:20)
*तेरी गिरवा की निडियो और दोनो पैरो को भी मैं काटूँगा निकल जा।(सब को निकाल दो ,तुम लोग रहो).(अथर्वेद 10:1:12). . .
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स्वामी दयानन्द द्वारा रचित “सत्यार्थ प्रकाश ” में समाजनाश की झलक।
'‘सत्यार्थ प्रकाश’’ का ज्ञान। कृपया देखें समुल्लास-4 प ष्ठ-70, समु.-4 पृष्ठ-71 पर लिखा है कि कैरी आँखों वाली लड़की से विवाह मत करो,
दांत युक्त लड़की से विवाह करो, किसी का नाम पार्वती, गोदावरी, गोमति आदि नदियों और पर्वतों पर हो उस लड़की से विवाह मत करो।
क्या महर्षि दयानन्द के विद्यान अनुसार बच्चों का विवाह हो सकेगा? नोट करे फिर तो शिव ने भी गलती कर दी पार्वती से शादी करके।
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-4 पृष्ठ-71 पर ही लिखा है कि 24 वर्ष की स्त्री 48 वर्ष के पुरूष का विवाह करना उत्तम है। क्या ये सही है ?
सत्यार्थ प्रकाश>> समुल्लास-4 प ष्ठ-70 पर लिखा है की विवाह के समय पिता के गोत्र तथा माता के कुल (गोत्रा) की छः पीढियों को छोड़ कर लड़के -लड़की का विवाह करें।
जिस किसी कुल में किसी एक व्यक्ति को निम्न रोगों में से एक भी रोग हो तो उस पूरे कुल के लड़के तथा लड़की से विवाह न करें। वे रोग हैं:-
बवासीर, दमा, खांसी, अमाश्य (पेट की गड़बड़ी) मिरगी, श्वेत कुष्ट और गलित कुष्ट रोग तथा जिन व्यक्तियों के शरीर पर बड़े-2 बाल हों उनके पूरे कुल को त्याग दें। जो वेदों का अध्ययन न करते हों उनके कुल को त्याग दें।
अगर ये रोग विवाह के बाद हो जाये तो क्याबीवी बच्चो को छोड दे.
सत्यार्थ प्रकाश>> फिर महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-8 पृष्ठ
197,198 पर लिखा है की सूर्य पर पृथ्वी की तरह सब प्रजा बसती हैं। इसी प्रकार सर्व पदार्थ हैं। इन्हीं वेदों को सूर्य (आग के गोले) पर रहने वाले मनुष्य पढ़ते हैं। क्या सूर्य पर कभी प्रजा हो सकती है ?
सत्यार्थ प्रकाश पेज 101 पर लिखा है की “महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे , अगर न रहा जाये ?
तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे” {स्म्मुलास ४ पृष्ट 101 }
स्वामी दयानन्द ने विधवा विवाह न करने का कारण बताया है ” पुन विवाह करने से स्त्री का पतिव्रता धर्म नष्ट हो जायेगा “। पृष्ट 99 स्म्मुलास ४ में ही लिखा है विधवा स्त्री ग्यारह पुरुषों के साथ नियोग { सम्भोग } पशु तुल्य व्यवहार कर सकती है ! वाह रे दयानन्द क्या यह कुकर्म करने के बाद उस स्त्री का पतिव्रता धर्म सुरक्षित रहेगा ?
सत्यार्थ प्रकाश के सम्मुल्लास चार के पेज 100 पर लिखा है की अगर किसी महिला का पति विदेश में धन कमाने के लिए गया हो ! तो वह महिला तीन साल पति का इंतजार करे उसके बाद किसी दुसरे पुरुष के साथ :” नियोग” {सम्भोग } करके बच्चा पैदा कर ले !
अगर किसी कारण वश दुसरे पुरुष से गर्भ धारण न हो तो तीसरे आदमी से, और उस से भी न हो तो, चोथे -पांचवे -छ्टे अर्थात ग्यारहवें पुरुष से सम्बन्ध बना कर बच्चा उत्पन्न कर ले ! और दुसरे या ग्यारहवें पुरुष से प्राप्त हुई संतान उसके पति कि ही मानी जाएगी !! क्या ये सही है ?
सत्यार्थ प्रकाश समु.-4 के पृष्ठ- 96,97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है की विधवा स्त्री का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए नियोग करें।
महर्षि दयानन्द का नियोग नियम:> स्त्री यदि विधवा हो जाए तो उसको चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष से गर्भ धारण करले। वह सन्तान स्त्री के विवाहित पति की ही मानी जाएगी। उसी का गोत्र होगा। वीर्य दाता का नहीं। गर्भ धारण (करने के) पश्चात् उस स्त्री व गैर पुरूष का कोई नाता न रहे बच्चों की परवरिश भी अकेली स्त्री स्वयं करें। वीर्य दाता बच्चों के पालन में कोई सहयोग न दे। अपने- अपने घर में रहें।
सत्यार्थ प्रकाश पेज 101 पर लिखा है की महिला अगर गर्भवती है तो पुरुष उस महिला के साथ 1 वर्ष तक सम्भोग न करे , अगर न रहा जाये ?
तो किसी विधवा स्त्री से “नियोग ” सम्भोग कर लेवे और संतान उत्पत्ति कर लेवे।
सत्यार्थ प्रकाश समु.- 4 पृष्ठ-102 पर ही लिखा है की यदि किसी का पति मारता पीटता हो तो उस स्त्री को चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष के पास जाकर गर्भ धारण करले तथा सन्तान उत्पति करले। वह गैर सन्तान भी विवाहित जीवित पति की मानी जाएगी। उसकी सम्पत्ति की भागीदार मानी जाएगी।
समु.-4 के पृष्ठ- 96,97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है की विधवा स्त्री का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रत धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए नियोग करें।
सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास-4 पृष्ठ-82 पर लिखा है की नवजात बच्चे को माता केवल छः दिन दूध पिलाए फिर अपने स्तनों से दूध बन्द करने के लिए कोई पदार्थ लगाए। बच्चे को दूध पिलाने के लिए ऐसी दाई रखो जिसके स्तनों में दूध हो वह उस नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाए। विचार करें यदि एक गांव में एक दिन तीन-चार स्त्रियों को बच्चा उत्पन्न हो जाऐं तो इतनी दाई कहां से उपलब्ध होगी। एक दाई कोई मिल्क प्लांट नहीं है कि सर्व बच्चों को दूध पिला देगी या ये जरूरी नही. उसी समय सर्व दाईयाँ भी बच्चों को जन्म दें. फिर दयानन्द के विधान अनुसार वे अपने बच्चों को पालेंगी या अन्य के बच्चों को ?
महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के समु.-4 पृष्ठ-102 में अपने अनुयाईयों की सुहागिन स्त्रियों को भी आदेश दिया है कि वे भी किसी गैर पुरूष से पशु तुल्य कर्म अर्थात् नियोग करें। लेकिन निम्न परिस्थितियों में:- यदि किसी का पति धन कमाने विदेश गया हो और तीन वर्ष घर न आए तो वह स्त्री किसी गैर पुरूष से गर्भधारण करके सन्तान उत्पति करले। वह सन्तान उसके जीवित विवाहित पति की ही मानी जाएगी।
समुल्लास-7 पृष्ठ-154 पर लिखा है परमात्मा निराकार है। समुल्लास-7 पृष्ठ-155 तथा 163 पर लिखा है कि परमात्मा साधक के पाप नाश नहीं कर सकता। महर्षि दयानन्द का यह भी कहना है कि ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में वेदों का ज्ञान ही सरल करके लिखा है। जबकि यजुर्वेद अध्याय-8 मंत्र 13 में छः बार लिखा है कि परमात्मा दान देने वाले अपने भक्त के घोर पाप को भी नाश कर देता है। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ वेद विरूद्ध ज्ञान युक्त है अर्थात् “”झूठार्थ प्रकाश”” है।
पुस्तक ‘‘श्रीमद्दयानन्द प्रकाश का पेज 445. ये सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधी सभा 3/5 महर्षि दयानन्द भवन नई दिल्ली से प्रकाशित है।
इसमे लिखा है की महर्षि दयानंद का मल-मूत्र वस्त्रों में ही निकल जाता था। दयानन्द को अतिसार (दस्त) लगे हुए थे। ठाकुर भूपाल सिंह के हाथों पर ही कई बार मल- मूत्र निकल जाता था।
इस प्रकार महापीड़ा को भोगकर, भुगत कर, म्रत्यु को प्राप्त हुआ महर्षि दयानन्द। धिक्कार है ऐसी भक्ति साधना को तथा महर्षि को जिससे भक्त के पाप कर्म का कष्ट समाप्त नहीं हुआ।
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सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी जी कहते हैं
" *किसी समय उचित समझे, दुश्मन को चारों ओर से घेर कर रोक रखे और उसके देश को तकलीफ पहुंचा कर चारा खुराक पानी और अन्य सामान को नष्ट और खराब कर दे।”*
*"शत्रु के तालाब, नगर के प्रकोट और खाई को तोड़ फोड़ दे, रात्रि में उनको भय देवें और जीतने का उपाय करें ।"*
*सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 6 पेज नंबर 135, आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट*
कैसे कैसे आदेश दिए है स्वामी जी ने आर्यों को। एक जगह और स्वामी जी कहते हैं सत्यार्थ प्रकाश में।
" *अपने मतलब की पूर्ति के लिए* *उचित या अनुचित समय* में दुश्मन के साथ जो अपने किसी दोस्त की गलती करने वाला हो लड़ना, अर्थात इसी दो प्रकार के आधार पर जंग करना चाहिए ।''
(सत्यार्थ प्रकाश अध्याय 6 पेज नंबर 132)
पंडित क्षेमकरण दास कौन हैं।
"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]
वेद निन्दक कोन है? कहीं आपको कोई आर्यसमाजी किसी शब्द जाल में न उलझाए, इस लिए में शास्त्रों के आधार पर ही व्याख्या कर देता हूँ| सुनिए आप के गुरु स्वामी दयानन्द क्या कहते हैं,
“परमेश्वर की बात अवश्य माननीय है| इतने पर भी जो कोई इस को न मानेगा, वह नास्तिक कहावेगा, क्योंकि "नास्तिको वेदनिन्दकः"| वेद का निन्दक और न मानने वाला नास्तिक कहाता है|” [सत्यार्थ प्रकाश, समुल्लास 3, पृष्ट 74, प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
इस परिभाषा में वे सारे लोग आते हैं जिन की वेदों में आस्था नहीं है जैसे मुस्लिम, ईसाई, जैनी, बोद्ध आदि। इस से यह स्पष्ट होता है कि वेद अन्य धर्मों के लोगों को नष्ट करने की शिक्षा देता है.
और सुनिए, स्वामी दयानंद सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में ब्रह्मोसमाज और प्रर्थ्नासमाज की आलोचना करते हुए लिखते हैं,
"जिन्होंने अँगरेज़, यवन, अन्त्याजादी से भी खाने पीने का अंतर नहीं रखा। उन्होंने यही समझा कि खाने और जात पात का भेद भाव तोड़ने से हम और हमारा देश सुधर जाएगा लेकिन ऐसी बातों से सुधार कहाँ उल्टा बिगाड़ होता हे।" [सत्यार्थ प्रकाश, समुलास 11, पृष्ट 375 प्रकाशक: श्रीमद दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश न्यास, उदयपुर, जुलाई 2010]
यवन का अर्थ मुसलमान और अन्त्यज का अर्थ चंडाल होता है।
आर्य समाज विमान
वेदृषि रामायण, बालकाण्ड_सर्ग_2
आर्य समाज की वेदृषि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग - 2 के श्लोक संख्या 2 में लिखा है कि " देवर्षि नारद " आकाश मार्ग से चले गए। और आकाश मार्ग से जाने की व्याख्या करते हुए पृष्ठ के अंत में लिखा है कि " उस काल में अनेक लोगों के पास छोटे छोटे विमान होते थे। नारद जी भी विमान से गए थे"।
● अब मैं सब आर्य समाजियों से पूछना चाहता हूं कि एक तरफ तो तुम्हारे अग्निवर्त जी बोलते हैं कि योगबल से उड़ना सम्भव है, विभूतिपाद की सिद्धियां भी सत्य हैं; और हनुमान जी योगबल से उड़कर गए थे। वहीं दूसरी तरफ तुम अपनी रामायण में ये लिखते हो कि "देवर्षि नारद" प्लेन से गए थे। मतलब एक व्यक्ति जो ऋषि से भी ऊंचा "देवर्षि" है वो तो जा रहा है प्लेन पर, और हनुमान जी गए थे उड़कर? कमाल हो गया। जब हनुमान जी मे योगबल से सिद्धियां आ सकती हैं, तो देवर्षि नारद में योगबल नहीं था क्या? बड़ी अजीब बात है। तो मतलब एक देवर्षि के योग का स्तर वन में रहने वाले वानर से भी घटिया था? फिर उनको देवर्षि कहना ही नहीं चाहिए। फिर वे देवर्षि की उपाधि के लायक ही नहीं। फिर क्यों उन्हें देवर्षि कहा गया? और यदि उस ज़माने में प्लेन अनेक लोगों के पास होते थे, तो ये बात कहीं ग्रन्थों में तो लिखी नहीं हुई। बल्कि तुम लोगों ने अपने मन से बनाकर जोड़ी है। अगर अनेक लोगों के पास विमान होते तो बताओ ईंधन क्या डलता था उनमें? जब तुमने ये बात खोज ली है कि अनेक लोगों के पास विमान होते थे, तो ईंधन की भी जानकारी दो। हवाई पट्टी/ हवाई अड्डों की भी जानकारी दो।
● अगले श्लोक में तुमने संस्कृत के "देवलोक" का अर्थ हिंदी में "देवाश्रम" कैसे किया? लोक और आश्रम में अंतर समझ नहीं आता तुम लोगों को? क्योंकि तुम लोग देवलोक/ स्वर्गलोक में मानते ही नहीं हो, इसलिए।
[विमान केवल देवलोक के देवताओं और महान राजाओं के पास होते थे वो भी मन के संकल्प से उड़ने वाले, लेकिन आर्य समाज देवलोक के अस्तित्व को मानता ही नहीं ]
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■ **नियोग** ■
*ऋग्वेदादीभाष्यभूमिक 21 विषय - नियोग विषय पेज न :- 261-266* में दयानन्द सरस्वती वेदों के जरिये से लिखते है *की जब किसी पुरूष की स्त्री मर जाए और संतानउत्पत्ति किया चाहे, तब वे किसी दूसरे स्त्री के साथ नियोग ( यानी संबंध) करके सन्तान पैदा कर सकते है |* *और स्त्री के लिए भी आज्ञा है जव उसके पति मर जाए तो वह भी किसी दुसरे पुरूष के साथ "नियोग" करके संत्तान उत्पन्न कर सखते है*
* हे स्त्री ! अपने मूर्तक पति को छोड़ के इस जीवनलोक मे जो तेरी इच्छा हो, तो दूसरे पुरुषों के साथ नियोग करके संतानों प्रप्त कर।
*वैदिक ईशवर मनुष्यों को आज्ञा देता है, की हे इंद्र पते ! तू इस स्त्री को वीर्यदान दे के सुपुत्र और सौ भाग्ययुक्त कर। पुरुष के प्रति वेद की यह आज्ञा है कि इस विवाहित वा नियोजित स्त्री में 10 बच्चे उत्पन्न कर। और हे स्त्री ! तू नियोग 11 पति तक कर अर्थात एक तो उसमे प्रथम विवाहित पति है और 10 प्रयत्न पति कर कर अधिक नही।*
* बड़े-बड़े वीर पुरूष को उतपन्न कर। (नियोग से कई बड़े-बड़े माह पुरूष पैदा हुए है जिसमे से कुछ नाम आप भी जानते होंगे कर्ण, परशुराम इत्यादि ) तो देवर की कामना करने वाली है, तो तेरा पति विवाहित पति ने राहे या वह रोगी हो या नपुंसक हो जाये तब दूसरे पति के साथ नियोग के जरिये संतान उत्पन्न कर।
*देवर की परिभाषा ।*
*जैसे विधवा स्त्री देवर के साथ संतानोत्पत्ति करती है वैसे तुम भी करो। (यहा पर ऐसी घटिया शिक्षा दी जा रही है) विधवा का दूसरा पति होता है उसको देवर कहते है।(मतलब वहा पर उसका पति मरा नही की उस स्त्री पर देवर का हक़ हो जाता है वह कितनी अच्छी शिक्षा है। ये है हिंदूइस्म में औरोतो की इजजात बोहत खूब)
* हे स्त्री जीवित पति को लक्षय करके उठ खड़ी हो(यहा पर देवर, पंडित, ऋषि मुनि, इत्यदि की बात हो रही है।)मर्त्य इस पति के पास क्यों पड़ी है, आ हाथ ग्रहण करने वाले नियुक्त इस पति के साथ संतान जनने को लक्षय में रखकर संबंध कर।(नियोग कर) *( ऋग्वेद 10:18:8)*
*( ऋग्वेद 10:10 )* में भी पूरा नियोग का बयान है।
*NOTE :- कहते है, की वेद मानव उत्पति के साथ ही आगे थे ऋषि मुनियों को मिल गए ते और उस वक्क्त केवल आर्य ही थे, तो क्या ये कहानी अंतरिक्ष मे हो रही थी क्या ? क्योंकि जो चीज़ हो जाती है,यानी इतिहास बन जाती है (भूतकाल हो जाता है) उसीको लिखा और सुनाया जाता है।
*हे वीर्यसेचन हारे शक्तिशाली वर ! सौभाग्यशाली इस वधु को तू उत्तम पुत्रो वाली कर इसमे 10 पुत्रो को पैदा कर 11 तुझ पति को कर। (11 पति तुही मेरा बच्चा बन जा)*
● *10 बच्चे पैदा करने की बात*
*"नियोग"* विषय के बारे में *अथर्वेद(18:3:1,2,3)*
*मनुसमूर्ति में अध्ययन (9:59,60,61,62) में* विस्तार पूर्वक लिखा है।
*इससे यह अच्छा ना होता कि एक विधवा जो बेचारी उसका पुनर्विवाह कार देते जिससे उसकी संतान की इच्छा भी पूरी हो जाती और उसको पति का सहारा भी मिल जाता बरहाल कोई मसला नही।
* आज विधवाओं का जो शोषण हो रहा है आश्रमों में उसके बारे में कोई बात नही करना चाहता। ना मीडिया किसको देखा रही है ना ही कोई व्यक्ति ध्यान इधर है ।। खुद के घर मे अंधेरा है, और दुसरो के घर मे उजाला करने की कोशिश कर रहे है। बल्कि वहाँ पहले से ही उजाला है।
● *"नियोग" के नाम पर*
* नियोग के लिए सबसे पहले ऋषि मुनि, पंडित,बृह्मचर्य को चुना जाता है।
* पंडित , जोगी, मजे लेते है और खुद को बृह्मचर्य कहलाते है।
* अपने कभी ना कभी सुना होगा कि स्त्री को ऋषि मुनि ने वरदान दी और संतान मिल गई । या कोई चीज़ खाने को दिया थी । ये सब नियोग का नतीजा होता है।
* सूर्य से पुत्र हुआ, आम की चिरी देने से पुत्र हुआ , नहाते - नहाते शरीर के मेल से पुत्र हुआ, अंशु पीने से पुत्र हुआ इत्यादि ये सब नियोग काही नतीजा है।
* (मातृ योनि) किसी-किसी श्लोक में तो ऐसा लिखा है, की माता को छोड़ के सब स्त्रियों से मैथुन कर लेवे,इसमे कोई दोष नही। और किसी का यह भी मत है कि माता को भी न छोड़े।(छिई) और किसी मे लिखा है कि योनि में लीड (मनी) प्रवेश करके आलस्य छोड़कर मंत्र को जपे तो वह शीघ्र ही सिद्ध हो जाता है।(मनी जल्दी ठहर जाता हैं) ये सब बाते पुराण में लिखी है।
*और भी कई बाते है वेदों में*
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*आर्य समाजियों में ब्राह्मणवाद* - *डॉ. धर्मकीर्ति*
आर्य समाजी यह कहते हैं कि दयानंद जी वर्ण-व्यवस्था को कर्म के आधार पर मानते थे और वह छुआछूत पर विश्वास नहीं करते थे। लेकिन यह बात आधारहीन और ग़लत है। जबकि कटु सत्य यह है कि दयानंद पक्के ब्राह्मणवादी और छुआछूत पर विश्वास करने वाले व्यक्ति थे। मैं अपने कथन को सत्यार्थ प्रकाश के दशमसमुल्लास से उदाहरण देना चाहूँगा, जिससे दयानंद की मानसिकता ज्ञात हो सकेगी। एक व्यक्ति ने दयानंद से प्रश्न किया, "कहो जी! मनुष्य मात्र के हाथ की, की हुई रसोई, उस अनाज को खाने में क्या दोष है? क्योंकि ब्राह्मण से ले के चाण्डाल पर्यन्त के शरीर हाड़, माँस, चमड़े के हैं और जैसा रूधिर ब्राह्मण के शरीर में है, ऐसा ही चाण्डाल आदि के, पुनः मनुष्य मात्र के हाथ की पाकी हुई रसोई खाने में क्या दोष है?"
दयानंद उत्तर देते हैं, "दोष है, क्योंकि जिन उत्तम पदार्थों के खाने-पीने से ब्राह्मण और ब्राह्मणी के शरीर में दुर्गन्धादि दोषरहित रज-वीर्य उत्पन्न होता है, वैसा चाण्डाल और चाण्डालों के शरीर में नहीं। क्योंकि चाण्डाल का शरीर दुर्गन्ध के परमाणुओं से भरा हुआ होता है, वैसा ब्राह्मणादि वर्णों का नहीं। इसलिए ब्राह्मण उत्तम वर्णों के हाथ का खाना और *चाण्डालादि भंगी, चमार आदि का न खाना।* भला जब कोई तुमसे पूछेगा कि चमड़े का शरीर माता, सास, बहन, कन्या, पुत्र-वधु का है, वैसा ही अपनी स्त्री का तो क्या माता आदि स्त्रियों के साथ भी स्वस्त्री के समान बरताएँगे? तब तुमको संकुचित होकर चुप रहना पड़ेगा। जैसा उत्तम अन्न हाथ और मुख से खाया जाता है, वैसे दुर्गन्ध भी खाया जा सकता है, तो क्या मदादि भी खाओगे? क्या ऐसा भी कोई हो सकता है?"
दयानंद ने अपनी पुस्तक यज्ञ करने की विधि में बताया है कि यज्ञ करने के लिए चाण्डाल आदि नीच जातियों के घर से आग नहीं लानी चाहिए, क्योंकि चाण्डाल के घर की आग अपवित्र होती है और ब्राह्मण आदि के घर से लाई हुई अग्नि पवित्र होती है। दयानंद सरस्वती के द्वारा ऊपर कही गयी बातों पर तर्कशास्त्र एवं वैज्ञानिक आधार पर निम्नलिखित टिप्पणियाँ की जा सकती हैं:
1. क्या दयानंद एक वैज्ञानिक व्यक्ति थे कि उन्होंने ब्राह्मण और ब्राह्मणी एवं चाण्डाल, चमार व भंगी आदि के वीर्य व रज को अपने हाथ से निकलकर स्वयं विज्ञान की प्रयोगशाला में जाकर प्रयोग किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने ऐसी अवैज्ञानिक बात कही?
2. दयानंद के पास ऐसा कौन सा प्रमाण है जिसके आधार पर वह कहते हैं कि सभी ब्राह्मण शुद्ध व पवित्र खाना खाते हैं और उसके विपरीत चाण्डाल, चमार, भंगी गँडे खाना खाते हैं?
3. दयानंद स्वयं एक ब्राह्मण थे, इसलिए वह ब्राह्मणवाद के मनोरोग से स्वयं ग्रसित थे। असल में एक ब्राह्मणवादी मानसिकता से पीड़ित व्यक्ति से और क्या अपेक्षा की जा सकती है?
4. दयानंद के उपर्युक्त कथन प्रज्ञा, तर्कशास्त्र व इंसानियत पर नहीं टिक पाता, बल्कि ये विचार मूर्खता एवं ब्राह्मणवादी हैवानियत की उपज मालूम पड़ते हैं।
5. एक तो दयानद कर्म के आधार पर वर्णों व जातियों का निर्धारण करते हैं, तो दूसरी ओर इस प्रकार की अवैज्ञानिक एवं वाहियात बात कहकर अपनी विकृत बुद्धि का परिचय देते हैं। जिनके विचारों में स्पष्ट रूप से विरोधाभास दिखाई देता है।
6. कोई भी प्रज्ञावान एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति दयानंद की इस प्रकार की अवैज्ञानिक एवं बेतुकी बात पर अवश्य ही हँसेगा।
7. अग्नि को पवित्र देवता माना जाता है, जो सबको जलाकर भस्म कर देती है और उसमें भी यह भेद करना कि यह चाण्डाल के घर की अग्नि है और यह ब्राह्मण के घर की। इस प्रकार की बात करना ब्राह्मणवादी मानसिकता की पहचान है।
आर्य समाजी कोरे गाल बजाते रहते हैं। इस मामले में आर्य समाजी पाखण्डी, छुपे रुस्तम और धोखेबाज़ नम्बर एक होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि समस्त आर्य समाजी ब्राह्मणवादी होते हैं और वे सनातनी हिन्दुओं की तरह जातिवाद, भेदभाव और छुआछूत पर विश्वास एवं व्यवहार करते हैं।
* पुस्तक:ब्राह्मण बनाम ब्राह्मणवाद, पृष्ठ 33, 34*
*लेखक: डॉ. धर्मकीर्ति*
(M.A., M.Ed., M.Phil., Ph.D. (मनोविज्ञान), Ph.D. (दर्शनशास्त्र), Ph.D. (बौद्ध अध्ययन), D.Litt.(दर्शनशास्त्र).
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क्या स्वामी दयानन्द सरस्वती ईसाई एजेंट थे।
स्वामी दयानंद न केवल ईसाई संस्था थियोसोफिकल सोसायटी के अहम सदस्य थे बल्कि थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों को पत्र लिखकर उसे भारत में लाने वाले भी दयानंद ही थे ! 1878 से लेकर अपनी मृत्यु 1883 तक स्वामी जी ने ईसाई मिशनरीओं के साथ मिलकर न केवल काम किया ! बल्कि भारत में ईसाई धर्म के फलने फूलने के लिये पैर जमाने में पुरा सहयोग दिया ! आजकल इस संस्था की शाखाएँ 55 देशों में हैं तथा इसके कार्यकर्ताओं की संख्या 35 हजार से अधिक है ! स्वामी दयानंद कब और कैसे थियोसोफिकल सोसायटी के साथ जुड़े आपको विस्तार में बताते हैं !
ये बात है सन 1875 की जब स्वामी जी पंडित कृपाराम शास्त्री से भेंट करने के लिये देहरादून आये हुए थे वहीं पर दयानंद ने ईसाई मिशनरी के दो धर्मप्रचारकों मैडम हैलना पैट्रोवना ब्लैवाटस्की और कर्नल हेनरी स्टील आल्काट के बारे में सुना और उनसे मिलने का फैसला किया ! इसके बाद स्वामी दयानंद देहरादून से सहारनपुर गए वहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक मैडम ब्लैवाटस्की और कर्नल आल्काट से भेंट की !
स्वामी दयानंद ने उन दोनों के कार्यों की प्रशंसा की और सनातन धर्म के विरुद्ध लड़ाई में उनका सहयोग मांगा फिर दयानंद इन दोनों के साथ मेरठ गए कुछ दिनों इन दोनों के साथ धर्म प्रचार किया उसके बाद ये दोनों मुम्बई चले गए जहाँ दयानंद ने इनकी सहायता से 10 अप्रैल 1875 में आर्य समाज की स्थापना की और ईसाई मिशनरी के साथ मिलकर काम करने से स्वामी दयानंद को ब्रिटिश सरकार का भी अच्छा खासा समर्थन मिलने लगा !
5-6 महिने दयानंद के साथ धर्म प्रचार करने के बाद कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की न्यूयॉर्क के लिये चले गए जहाँ उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की ! 13 दिसम्बर 1878 में स्वामी दयानंद ने कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की को पत्र लिखकर थियोसोफिकल सोसायटी का प्रधान कार्यालय मुंबई में लाने का निमंत्रण दिया ! स्वामी दयानंद के निमंत्रण पर फरवरी 1879 में सोसाइटी का प्रधान कार्यालय न्यूयार्क से मुम्बई में लाया गया और आर्य समाज कार्यालय का नाम बदल कर "थियोसोफिकल सोसायटी आफॅ द आर्य समाज रखा गया !
1879 में ही स्वामी दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य बने जिसका प्रमाण स्वामी दयानंद का हस्ताक्षर किया हुआ वो पत्र है जो मैंने पोस्ट के साथ Attached किया हैं 1879 से लेकर 1886 तक थियोसोफिकल सोसायटी और आर्य समाज ने साथ में काम किया और इतने समय में दयानंद की सहायता से थियोसोफिकल सोसायटी ने लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया ! दयानंद ने थियोसोफिकल सोसायटी के लिये यह कार्य कैसे किया वो भी समझ लिजिये !
दयानन्द सरस्वती के बारे में क्वीन्स कॉलेज के प्राचार्य रुडॉल्फ होर्नले ने यह बात लिखी — दयानन्द हिंदुओं के मन में यह बात भर देना चाहते हैं कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जायेगी तो वह तुरंत हिंदूधर्म का त्याग कर देंगे और ईसाई बन जायेंगे।
तब दयानन्द के लिये उन्हें वैदिक स्थिति में वापस ले जाना सम्भव न होगा, ऐसी स्थिति में हिंदुओं को एक विकल्प की खोज होगी जो उन्हें हिंदू से ईसाई धर्म की ओर ले जायेगी ! स्वामी दयानंद और थियोसोफिकल सोसाइटी इसी प्रकार काम करती थी दयानंद हिन्दुओं के मन मे ये बात भर देते थे कि आज का हिंदूधर्म, वैदिक हिन्दू धर्म के पूर्णतया विपरीत है, और जब यह बात हिन्दुओं के मन में बैठ जाती तो उनमें से कुछ आर्य समाज से जुड़ जाते और बाकीयों को थियोसोफिकल सोसायटी के धर्म प्रचारक ईसाई बना देते ! बदले में स्वामी दयानंद और आर्य समाज को ब्रिटिश सरकार का समर्थन मिलता था !
जिस किसी भी आर्य समाजी को मेरी बातों पर अंश मात्र भी संदेह हो कि दयानंद ईसाई मिशनरी के ऐजेंट( अर्थात दलाल) थे वो कृपया थियोसोफिकल सोसायटी की साइट पर जाकर चेक करें और साथ में उस पत्र की भी जांच कर लें जो थियोसोफिकल सोसायटी की ओर से जारी किया गया जिस पर दयानंद के हस्ताक्षर हैं ! आर्य समाज किस प्रकार थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ा हुआ था ! और यदि इसमें अब भी किसी को किसी प्रकार कोई संदेह हो कि दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य थे या नहीं तो वो जाकर दयानंद की 1882 में तैयार कराई वसीयत के बारे में पढे ! स्वामी दयानंद ने अपनी वसीयत जो कि उन्होंने मेरठ में पंजीकृत कराईं थी जिसमें कुल 18 लोग थे जिन्हें दयानंद ने अपनी अंत्येष्टि करने तथा निजी वस्त्र, पुस्तक , मंत्रालय आदि का अधिकार दिया था जिसमें थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापक कर्नल आल्काट और मैडम ब्लैवाटस्की का भी नाम है !
मुझे लगता है अपनी बात को सिद्ध करने के लिये अब मुझे और कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं है दयानंद की ये वसीयत ही ये सिद्ध कर देती है ईसाई मिशनरीयों के साथ दयानंद के कितने अच्छे और गहरे संबंध थे। जो काम ईसाई मिशनरी पिछले 150 सालों में न कर सकी दयानंद के समर्थन से मात्र 7 वर्षों मे ईसाई मिशनरी के धर्म प्रचारको ने लाखों सनातनीयों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाया बडे आश्चर्य कि बात है कि स्वंय को वैदिक कहने वाले दयानंद को ईसाई मिशनरीयों के साथ मिलकर धर्म प्रचार करने में सनातन धर्म के टुकडे करने में तो कोई परहेज नही था पर अपने हिन्दु भाई आँखों मे खटकते थें ऐसा शायद इसलिये क्योकी स्वामी दयानंद और ईसाई मिशनरी का उद्देश्य एक ही था किसी भी प्रकार सनातन संस्कृति को पुरी तरह से समाप्त करना था !
शायद यही कारण रहा कि दयानंद ने अपने तथाकथित ग्रंथ के प्रथम संस्करण में 1875 से लेकर 1883 तक केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी है सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम संस्करण में जो वैदिक-यंत्रालय प्रयाग में छापी गई थी उसमे दयानंद की मृत्यु (30 अक्टूबर 1883 ई०) तक केवल 11 समुल्लास ही छपे थे ! जिसमें केवल सनातन धर्म की ही आलोचना करी गई थी ईसाई या मुस्लिम मत के खिलाफ एक शब्द नहीं लिखा था शेष 3 समुल्लास उनके निधन के बाद 1884 में वैदिक-यंत्रालय प्रयाग द्वारा दुसरे संस्करण मे छापा गया ! दयानंद सरस्वती की विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिये डीएवी कालेज की स्थापना लाला हंसराज ने सन 1886 में लाहौर में की थी ! जिसने दयानन्द एंग्लो-वैदिक महाविद्यालय के नाम से अंग्रेजों के सहयोग से गुरुकुलों को समाप्त करने और अंग्रेजी शिक्षा पध्यति को बढ़ने में ईसाईयों की मदद की ! क्योंकि अंग्रेजों के स्कूल में भारतीय अपने बच्चे नहीं पढ़ते थे तो अंग्रेजों ने लाला हंसराज की मदद से दयानन्द एंग्लो-वैदिक महाविद्यालय की स्थापना की और उसकी स्थापना के लिये लाला हंसराज को जमीन और पैसे से मदद की ! डीएवी के अंतर्गत आज 667 शिक्षण संस्थाएं हैं, जिनमें 461 हाईस्कूल हैं ! जिसकी वार्षिक बजट करीब 400 करोड़ से भी अधिक है ! इन स्कूलों का संचालन दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज ट्रस्ट और प्रबंधन सोसाइटी के द्वारा ही किया जाता है ! आर्य समाजी अपने को शिक्षा, समाज-सुधार एवं राष्ट्रीयता का आन्दोलनकर्ता बतलाते हैं जबकि भारत के 85% स्वतंत्रता संग्राम सेनानीयों को मुखबिरी करके इन लोगों ने या तो पकड़वा दिया या फिर मरवा दिया !
यह पोस्ट उन मूर्खों के मुहँ पर तमाचा है जो दयानंद को वैदिक धर्म का प्रचारक और हिन्दुओं का हितैषी बोलते हैं जबकि सत्य तो यह है कि दयानंद सरस्वती ईसाई मिशनरी के बहुत बड़े ऐजेंट थे ! इसीलिए आज भी आर्य समाजी सनातन देवी देवताओं के पूजा पाठ, कर्मकाण्ड और ज्योतिष आदि वैदिक ज्ञान का विरोध करते हैं !
योगेश कुमार मिश्र, अधिवक्ता, तरंग दर्शन
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*क्या कोई आर्य समाजी इन प्रश्नों के उत्तर दे सकता है*
आर्य समाजी भी स्वयं को हिन्दू मानते हैं तो पौराणिक समाज छोड़कर आर्य समाज बनाने का क्या कारण था ।
पौराणिक समाज हिंदू धर्म के सभी ग्रंथों को मान्यता देता हैं। इस के विपरित आर्य समाजी पुराणों का विरोध क्युं करते हैं।
वेद तो ब्रम्हा जी ने दिया है, फिर पौराणिक और आर्य समाजियों के वेद भाष्य अलग अलग क्युं है। पौराणिक आर्य समाजियों के वेद भाष्य को नहीं मानते हैं, और आर्य समाजी पौराणिक को के वेद भाष्य नहीं मानते है इसलिए कोई भी आर्य समाजी यु ट्युबर अपने चैनल पर वेदों का भाष्य नहीं दिखाते है। फिर इन दोनों के वेद भाष्य में से ब्रम्हा जी ने दिये हुए असली वेद कौन सा है, कोई आर्य समाजी बता सकता है।
पौराणिक हिंदू समाज भगवानों में आस्था रखते है। इस के विपरित आर्य समाजी मंदिरों में जाकर पुजा नही करते है। ना ही वो किसी भगवान कि मुर्ती कि पुजा करते हैं। दयानंद सरस्वती ने अपनी किताब जीवन चरित्र और सत्यार्थ प्रकाश में मंदिरों और मुर्ती पुजा और मुर्ती पुजको का भरपूर विरोध किया है। कोई आर्य समाजी बता सकता है कि दयानंदी समाज मंदिरों और मुर्ती पुजा और मुर्ती पुजको का विरोध क्युं करते है ।
सनातन हिंदू धर्म एक ही है तो दयानंद सरस्वती ने हिंदू समाज कि स्थापना क्युं नहीं कि और नये सनातन वैदिक धर्म के लिए आर्य समाज कि स्थापना क्युं कि क्या पौराणिक समाज सनातन धर्म नहीं है।
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*इन प्रश्नों के उत्तर मांगने पर आर्य समाजी भाग क्युं जाते है*
दयानंद सरस्वती ने अपनी किताब *जीवन चरित्र* में अपने आप को आर्य समाजी ( वैदिक धर्मी ) कहा है हिन्दू नहीं कहा। उनका मानना है कि हिंदू शब्द मुगलों व्दारा दि हुईं गाली है, इस आधार पर उन्होंने अपने जीवन काल में कभी भी अपने आप को हिंदू नही कहा । दयानंद सरस्वती स्वयं को आर्य समाजी कहते थे लेकिन पौराणिको को मुर्ती पुजको को हिंदू कहते थे ऐसा क्युं।
आर्य समाजी भी स्वयं को हिन्दू मानते हैं तो पौराणिक समाज छोड़कर दयानंद सरस्वती को अपना अलग वैदिक धर्म आर्य समाज क्युं बनाना पड़ा ।
पौराणिक समाज हिंदू धर्म के सभी ग्रंथों को मान्यता देता हैं। इस के विपरित आर्य समाज पुराणों का विरोध क्युं करता हैं।
वेद तो ब्रम्हा जी ने दिया है, फिर पौराणिक और आर्य समाजियों के वेद भाष्य अलग अलग क्युं है। पौराणिक आर्य समाजियों के वेद भाष्य को नहीं मानते हैं, और आर्य समाजी पौराणिक को के वेद भाष्य नहीं मानते है इसलिए कोई भी आर्य समाजी यु ट्युबर अपने चैनल पर वेदों का भाष्य नहीं दिखाता है। फिर इन दोनों के वेद भाष्य में से ब्रम्हा जी ने दिये हुए असली वेद कौन सा है, कोई आर्य समाजी बता सकता है।
पौराणिक हिंदू समाज भगवानों में आस्था रखते है। इस के विपरित आर्य समाजी मंदिरों में जाकर पुजा नही करते है। ना ही वो किसी भगवान कि मुर्ती कि पुजा करते हैं। दयानंद सरस्वती ने अपनी किताब जीवन चरित्र और सत्यार्थ प्रकाश में मंदिरों और मुर्ती पुजा और मुर्ती पुजको का भरपूर विरोध किया है। कोई आर्य समाजी बता सकता है कि दयानंदी समाज मंदिरों और मुर्ती पुजा और मुर्ती पुजको का विरोध क्युं करता है ।
सनातन हिंदू धर्म एक ही है तो दयानंद सरस्वती ने हिंदू समाज कि स्थापना क्युं नहीं कि और नये सनातन वैदिक धर्म के लिए *“1875 में आर्य समाज"* कि स्थापना क्युं कि, क्या पौराणिक समाज सनातन धर्म नहीं है।
आचार्य सायण जिन के वेद भाष्य को आज के बड़े बड़े विद्वान मानते हैं, उनके वेद भाष्य में देवी देवताओं का नाम आया है जैसे इंद्र, विष्णु, ब्रम्हा,। आर्य समाजियों का मानना है कि वेदों में देवी-देवताओं का नाम ही नहीं है, और आर्य समाजी देवी देवताओं को नहीं मानते है । और वेद विरुद्ध देवी देवताओं का विरोध करते हैं। देवी देवताओं का विरोध करने का क्या कारण हो सकता है।
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दयानन्द के बारे में एक बात बहुत बढ़ चढ़ के प्रचारित की गयी कि वो बहुत बड़े योगी थे । चलिए उनके उस योगी रूप के प्रचार के कुछ उदाहरण देखिये ।
1) गुप्त अभिप्राय का ज्ञान
“किसी मनुष्य को अपने पास आता देखकर ही स्वामी जी जान लेते थे , वह किस अभिप्राय से उनके पास आया है ” ( पृष्ट 212)
2) मृत्यु की भविष्यवाणी
“लाहौर की स्तिथि के समय कुछ विधार्थी दयानन्द के पास संस्कृत पढ़ने आते थे ,उसमे एक गणपतिराय को दयानन्द ने कहा, तुम विवाह न करना , तुम्हारी उम्र 30 के अंदर है , और वो 28 में काल का ग्रास बन गया “( पृष्ट 401 )
3) शेर भी डर गया
” गंगा तट पर विचरते हुए वन में जा पहुंचे , वंहा सामने से एक सिंह अत दिखाई दिया ,वे सीधे चलते गए , वे सीधे चलते गए , और जब सिंह के निकट पहुचे तो सिंह ने मुह फेर लिया और जंगल में घुस गया ” ( पृष्ट 404 )
—- ऐसी कुछ और भी भविष्यवाणी या गुप्त बाते दयानन्द के बारे में बताई गयी , जिसमे एक घटना है कि किसी को रस्ते में सांप दिखा तो , दयानन्द के पास पहुंचा तो दयानन्द ने खुद ही कह दिया , रास्ते में सांप दिखा क्या ? प्रमाण ध्यान नही है , एक भालू वाली घटना है ।
—— अब इसके विपरीत कुछ बाते देखिये ।
1) विषाक्त भोजन
“एक दिन एक मनुष्य भोजन और पान लेकर आया , दयानन्द ने भोजन नही किया , पान जैसे ही खोला , वो मनुष्य भाग गया ‘ बाद में ज्ञानत हुआ , कि पान में विष था ” ( पृष्ट 193 )
2) पान में विष
” एक ब्राह्मण ने मूर्ति पूजा से रुष्ट होकर उन्हें पान में विष दे दिया था , उन्होंने न्यौली कर्म करके उसे शरीर से निकल दिया और स्वस्थ हो गए ” ( पृष्ट 211 )
3) जहर मृत्यु का कारण
” महाराज दुग्ध पीकर पी कर सो गए , पर बीच में ही उदरशूल के कारन उनकी नींद भंग हो गयी । ( पृष्ट 651 )
( ये 27 सितम्बर की घटना है ,जिसके बाद एक महीने स्वामी जी की बहुत बुरी हालत हुयी और फिर मृत्यु हो गयी थी ।)
—– अब मेरे मित्रो अगर उनका महिमामण्डन जैसा कि ऊपर है , वो आते ही जान लेते थे , मौत तक की भविष्यवाणी कर देते थे , शेर उनसे डर जाता था , तो वो निचे जिन लोगो ने विषय दिया , उनके दिल की क्यों नही जान पाये ?
और उनकी मृत्यु के वक़्त इतनी बुरी हालात कैसे उनको पता नही लगी , ओरो की तो वो भविष्यवाणी कर देते थे ??
अब या तो ऊपर झूठा महिमामण्डन किया गया , या निचे गलत है , ये फैसला मैं आपके विवेक पर छोड़ता हूँ ।
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*दयानंद सरस्वती जीवन चरित्र अध्याय २*
हरिद्वार से रामनगर तक मूर्तिपूजा, तीर्थों व अवतारों आदि का खण्डन- स्वामी देवेन्द्र सरस्वती, जो स्वामी शंकरानन्द के शिष्य हैं, वे भी उपस्थित थे । उनका कथन है कि स्वामी दयानंद सरस्वती मूर्ति पूजा , भागवत पुराण तथा पौराणिक को का वहाँ बड़ी प्रबलता से खंडन करते रहे । वेदान्त को कदाचित् मानते थे परन्तु तीर्थों, अवतार , मूर्तियों, व्रतों और श्राद्ध का प्रबल युक्तियों से खंडन करते थे ।
अपने जीवन काल में आर्य समाजी संस्थापक दयानंद सरस्वती ने कभी भी स्वयं को हिंदू नही कहा है। इस से साबित होता है, आर्य समाजी हिंदू, हिंदू कि मिठी वाणी बोलकर पौराणिक को मुर्ख बना रहे है। जब कि आर्य समाजी स्वयं मुर्ति पुजा और मंदिर विरोधी हैं, लगता है आर्य समाजियों का उद्देश्य है हिंदू-मुस्लिम को लड़वाना। जिस में फायदा आर्य समाजियों का ही है,क्युं कि आर्य समाजी अपने समाज के अतिरिक्त किसी भी समाज को उच्च नहीं मानते हैं। चाहे वो पौराणिक हो बुद्धिस्ट हो या सिख हो या मुस्लिम हो,या फिर ईसाई धर्म हो । स्वयं आर्य समाजी संस्थापक दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में सभी धर्मों का खंडन किया है।
दयानंद सरस्वती कि इसी विचार धारा को आगे बढ़ाते हुए, उसके चेलों ने अब सोशल मीडिया पर हिंदूत्ववादी एजेंडा चला रखा है। सोचने वाली बात ये है कि आर्य समाजी कभी अपने आप को हिंदू नही कहते हैं,ये लोग स्वयं को आर्य समाजी हि कहते है। मगर ये ३% आर्य समाजी सोशल मीडिया पर हिंदू नाम का चोला ओढ़कर पौराणिको को दुसरे धर्मों के खिलाफ भड़काने कि जोरदार कोशिश कर रहे हैं। और कुछ पौराणिक बिना सच्चाई जाने, मुर्ख समाजियों का समर्थन कर रहे हैं,सच तो ये है आर्य समाजी ब्रम्हसमाज ( पौराणिक ) को खत्म करके सब हिंदू ओं का आर्य समाज में धर्म परिवर्तन कर रहे हैं।
आर्य समाज ये १५० वर्ष पहले दयानंद सरस्वती द्वारा बनाया गया समाज है।जिसका उद्देश्य है पौराणिक धर्म के लोगों को आर्य समाजी बनाना और पौराणिक को के वेद भाष्य को बदलकर आर्य समाजियों द्वारा उन वेदों के किए गए नये भाष्य को मानना। और धीरे-धीरे पौराणिक को कि परंपराओं को मिटाकर आर्य समाजियों के संस्कारों को लागू करना। कुछ हद तक आर्य समाजी उस काम में सफलता भी प्राप्त कर चुके हैं, जैसे कि वे पौराणिक को के पुराणों को ब्राम्हण ग्रंथों और श्राद्ध, उपवास,तिर्थयात्रा जैसी चीजों को पहले से ही नकार चुके है। आर्य समाजी अगर इसी मार्ग पर कार्य करते रहे तो एक दिन १५० वर्ष पहले जन्म लेने वाला आर्य समाज, लाखों वर्ष पुराने ब्रम्हसमाज ( पौराणिक समाज ) को मिटाकर अपना अस्तित्व पुरे भारत में स्थापित कर देगा।
अब पाठकों को अगर ये बातें ग़लत लगती है, और आर्य समाज के षड्यंत्रोंको जानना चाहते हैं। तो वे दयानंद सरस्वती की किताबें जीवन चरित्र और सत्यार्थ प्रकाश अवश्य पढ़ें। आर्य समाज नाम का अंधकार जो ब्रह्मसमाज ( पौराणिक समाज ) के अस्तित्व के विनाश का कारण बन रहा है, उस अंधकार से और अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए पौराणिक को को स्वयं ही ये लड़ाई लड़नी है।
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