हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य हैं. भारत से समस्त मुसलमानों को. पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एकमात्र हल है. साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना
अत्यंत उपहासास्पद होगा । विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी । पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी? मुसलमानों के लिए काफिर हिन्दू सम्मान के योग्य नहीं है | मुसलमानों की भातृ भावना केवल मुसमलमानों के लिए है। कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का विरोधी है, इसीलिए काफिर हिन्दू सिर्फ घृणा और शत्रुता के योग्य हैं। मुसलमानों की निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश के प्रति होगी. इस्लाम सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट संबधी मानने की कभी आज्ञा नहीं देगा । संभवतः यही कारण था कि मौलाना मौहम्मद अली जैसे भारतीय मुसलमान भी अपने शरीर को भारत की अपेक्षा येरूसलम में दफनाना अधिक पसन्द किया । कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक साम्प्रदायिक चौकी जैसी है । इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । वो धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को इस्लामिक देश बनाने में जिहाद करने से भी संकोच नहीं करेंगे।"
(डॉ. भीमराव अम्बेडकर)
किताब: पाकिस्तान ऑर पार्टीशन आफ इंडिया
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हिन्दू कौन है? और इस शब्द की उत्पत्ति किसने की और कब की ???
हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं है परंतु यह एक जीवन जीने की शैली है। ऐसा कहना मेरा नहीं है ये इस देश के सर्वोच्च न्यायलय का कहना है क्योंकि हिन्दू शब्द का वर्णन या प्रयोग न तो चारों वेदों ( ऋग्वेद , सामवेद , यजुर्वेद , अथर्ववेद ) ,श्रीमद् भागवत और 18 पुराणों में है और न ही कहीं 120 स्मृतियों में ही कहीं मिलता है।
इस देश में सबसे पहले कबीलाई धर्म हुआ करता था जिनको मिटाकर विदेशी ब्राह्मणों ने अपना धर्म स्थापित किया जिसको पहले ब्राह्मण धर्म कहा जाता था परंतु बाद में अन्य लोगों में जागरूकता आने पर पर पैंतरा बदलकर इनको सनातन धर्म कहना शुरू कर दिया।
हिन्दू शब्द की वास्तविकता यह है कि जब मुगल आक्रमणकारियों ने हमारे देश को गुलाम बना लिया और यहाँ का शासक बन बैठा तब सिंधु नदी के इस तरफ रहनेवाले सभी लोगों को हिन्दू नाम से संम्बोधित करना शुरू कर दिया। हिन्दू फारसी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ होता है - चोर , डाकू , गुलाम , काफिर , काला आदि।
जो ब्राह्मण (RSS) सबसे ज्यादा आज हिन्दू - हिन्दू की रट लगाये हुए है ये 1922 के पहले अपने को हिन्दू नहीं मानता था और हिन्दू शब्द को एक गाली मानता था, यहाँ तक की आज भी ये ब्राह्मण दिल से अपने आपको हिन्नदू नहीं मानते हैं। अगर विश्वास न हो तो किसी ब्राह्मण से पूछ कर देख सकते की तुम कौन हो? जवाब मिलेगा मैं ब्राह्मण हूँ न कि हिन्दू? इस देश में जिस धर्म को आज हम हिन्दू धर्म के नाम से जानते हैं पहले ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना जाता था और यही शब्द वेदों में भी वर्णित है।
एक बात और सोचनें वाली है कि अगर ये लोग अपने आपको हिन्दू मानते तो क्या 1875 में दयानंद सरस्वती नामक ब्राह्मण आर्य समाज की स्थापना करते या फिर हिन्दू समाज की। यहाँ तक कि जब मुगलों द्वारा इस देश के हिंदुओं के ऊपर जब जजिया कर लगाया , तो ब्राह्मणों ने इस कर को यह कह कर मना कर दिया था कि मैं तो तुम्हारी तरह ही विदेशी हूँ और मैं ब्राह्मण हूँ कोई हिन्दू नहीं( हिन्दू शब्द इस देश के असली वाशिंदों के लिए प्रयुक्त किये गए थे)। ब्राह्मणों का ये भी कहना था कि एक विदेशी दूसरे विदेशी से कैसे कर ले सकता है? हिंदुओं से कर लिया जाय, हम लोगों से नहीं क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ हिन्दू नहीं।
इस बात को और आगे ले जाते हुए उनके दरबारों में न सिर्फ ये लोग मंत्री बन बैठे बल्कि अपने आपको हिन्दू कर( जजिया कर) से भी मुक्त करवा लिया। साथियों जब 1917 में रशिया में क्रांति हुई और ठीक उसी समय ब्रिटेन में भी प्रौढ़ मताधिकार का आंदोलन शुरू हुआ क्योंकि वहाँ लोकतंत्र तो था , लेकिन सभी लोगों को मत देने का अधिकार नहीं था। इस आंदोलन के डर से यहाँ के ब्राह्मणों ने एक बार पुनः पैतरा बदला और अपने आपको हिन्दू नाम की चादर में लपेट लिया, क्योंकि ब्रिटेन में अगर प्रौढ़ मताधिकार लागू होता तो भारत में भी ये लागु होना ही था क्योंकि भारत पर तब ब्रिटेन का शासन था।
इनको दर था की अगर भारत में प्रौढ़ मताधिकार लागू होता है (जैसा की बाद में हुआ भी) तो सत्ता ब्राह्मणों के हाथ से छीनकर यहाँ के शूद्रों के हाथों में चली जाती, क्योंकि लोकतंत्र में तो सत्ता चुनने का हक़ जानता के पास होता है और इस देश की 85% जनता शुद्र थी। इसलिए शासन - सत्ता पर कब्ज़ा करने के उद्देश्य से इन ब्राह्मणवादियों ने सिर्फ हिन्दू हिन्दू चिल्लाना शुरू किया बल्कि 1922 में हिन्दू महासभा का गठन करके उसपर अपना कब्ज़ा भी जमा लिया जो आज भी निरंतर जारी है और अपने को पहली बार मजबूरी में हिन्दू कहलाना स्वीकार किया वो भी राजनितिक स्वार्थ सिद्धि के लिए तथा अपने को अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक बनाने के लिए।
यही नहीं ठीक इसके 3 साल बाद 27 सितम्बर 1925 को इन्होने मनुसमिर्ती के सिद्धान्तों को लागु करने के लिए एक ब्राह्मण, हेडगेवार ने एक नया ब्राह्मणी संगठन बनाया, जिनको हम RSS के नाम से जानते हैं। जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कभी कोई हिस्सा नहीं लिया और जिसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ एक था इस देश में ब्राह्मणवाद स्थापित करना यानि वर्ण और जातिव्यवस्था को मजबूती से इस देश में पुनर्स्थापित करना, हिन्दू मुस्लिम दंगे करवाना और इन देश में आज़ादी के बाद भी धर्म के नाम की सत्ता स्थापित करना जिसमे वो आज़ादी के बाद से अब तक पूर्णतया सफल हैं क्योंकि हम इसके चल को समझ नहीं पते हैं और इलेक्शन के टाइम पर हिन्दू बनकर इनको जीत देते जो सत्ता पते ही पुनः हमें जातियों में बाँट देते हैं।
हम सबको पता होना चाहिए कि इस देश का 99 % मुसलमान कोई और नहीं बल्कि ब्राह्मणों के द्वारा सताया गया हिन्दू है जिन्होने ब्राह्मणवाद/उच-नीच से तंग आकर अपने आर्थिक और सामाजिक सम्मान पाने के लिए अपना धर्म त्याग किया था जो असल में हमारे ही भाई हैं।
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आर्य ब्राह्मण दिन रात ”हिन्दू”’ हिन्दू” क्यों चिल्लाते रहता है,इसका एक सनसनीखेज खुलासा*
४)जब की आर्य बाभन खुद यह जानता है की ,”हिंदू” नाम का कोई धर्म नही है …हिन्दू फ़ारसी का शब्द है ।
5)हिन्दू शब्द न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में ।
6)स्वयं आर्य बाभन जात ”दयानन्द सरस्वती” कबूल करते हैं कि "हिंदू" यह मुगलों द्वारा दी गई गाली है ।
7)1875 में आर्य बाभन ”दयानन्द सरस्वती” ने ”आर्य समाज” की स्थापना की ”हिन्दू समाज” की नहीं ।
8)अनपढ़ आर्य बाभन भी यह बात जानता है की आर्य बाभनो ने स्वयं को ”हिन्दू” कभी नहीं कहा। आज भी वे स्वयं को ”बाभन” ही कहते हैं, लेकिन सभी मूलनिवासी शूद्रों को हिन्दू कहते हैं ।
9)जब *शिवाजी* हिन्दू थे और मुगलों के विरोध में लड़ रहे थे तथा तथाकथित हिन्दू धर्म के रक्षक थे तब भी पूना के आर्य बाभनो ने उन्हें *शूद्र* कह राजतिलक से इंकार कर दिया । घूस का लालच देकर बाभन गागाभट्ट को बनारस से बुलाया गया । गागाभट्ट ने “गागाभट्टी” लिखा उसमें उन्हें विदेशी राजपूतों का वंशज बताया तो गया लेकिन राजतिलक के दौरान मंत्र “पुराणों” के ही पढे गए वेदों के नहीं ।तो शिवाजी को ”हिन्दू” तब नहीं माना।
10) आर्य बाभनो ने मुगलों से कहा हम ”हिन्दू” नहीं हैं बल्कि, तुम्हारी तरह ही विदेशी हैं परिणामतः सारे हिंदुओं पर जज़िया लगाया गया लेकिन आर्य बाभनो को मुक्त रखा गया ।
11) 1920 में ब्रिटेन में वयस्क मताधिकार की चर्चा शुरू हुई ।ब्रिटेन में भी दलील दी गई कि वयस्क मताधिकार सिर्फ जमींदारों व करदाताओं को दिया जाए । लेकिन लोकतन्त्र की जीत हुई । वयस्क मताधिकार सभी को दिया गया । देर सबेर ब्रिटिश भारत में भी यही होना था । तिलक ने इसका विरोध किया । कहा ” तेली,तंबोली ,माली,कूणबटो को संसद में जाकर क्या हल चलाना है” । आर्य ब्राह्मणो ने सोचा यदि भारत में वयस्क मताधिकार यदि लागू हुआ तो अल्पसंख्यक बाभन मक्खी की तरह फेंक दिये जाएंगे । अल्पसंख्यक बाभन कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन सकेंगे । सत्ता बहुसंख्यकों के हाथों में चली जाएगी । तब सभी आर्य ब्राह्मणों ने मिलकर 1922 में “हिन्दू महासभा” का गठन किया ।
12) मतलब एक विदेशी गया तो दूसरा विदेशी सत्ता में आ गया । हम अंग्रेजों के पहले बाभनो के गुलाम थे अंग्रेजों के जाने के बाद भी बाभनो के गुलाम हैं । यही वह ”हिन्दू” शब्द है जो न तो वेद में है न पुराण में न उपनिषद में न आरण्यक में न रामायण में न ही महाभारत में । फिर भी आर्य ब्राह्मण हमें हिन्दू कहते हैं ,और हिन्दू की आड़ में अल्पसख्य बाभन बहुसंख्य बन भारत का कब्ज्जा कर लेते है !!!
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कहा लिखा हुआ है कि ब्राह्मण आर्य विदेशी है?
1. ऋग्वेद में लिखा आर्य व् अनार्यो के युद्ध हुए ।
2. The Arctic Home At The Vedas बालगंगाधर तिलक (ब्राह्मण) के द्वारा लिखी पुस्तक में मानते है की हम बाहर आए हुए लोग है ।
3. जवाहर लाल नेहरु ने Discovery of India में लिखा कि आर्य मध्य एशिया से आये हुए लोग है। यह बात कभी भूलना नही चाहिए.
4. वोल्गा टू गंगा में “राहुल सांस्कृतयान” (केदारनाथ पाण्डेय) ने लिखा है कि आर्य बाहर से आये हुए लोग है और यह भी बताया की वोल्गा से गंगा तट (भारत) कैसे आए।
5. विनायक सावरकर ने (ब्राम्हण) सहा सोनरी पाने “इस मराठी किताब में लिखा की हम भारत के बाहर से आये लोग है।
6. इक़बाल “काश्मीरी पंडित ” ने भी जिसने “सारे जहा से अच्छा” गीत लिखा था की हम बाहर से आए हुए लोग है।
7. राजा राम मोहन राय ने इग्लेंड में जाकर अपने भाषणों में बोला था कि आज मै मेरी पितृ भूमि यानि अपने घर वापस आया हूँ।
8. मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने 1894 में दक्षिणी अफ्रीका के विधान सभा में लिखे एक पत्र के अनुसार हम भारतीय होने के साथ साथ युरोशियन है हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है।
9. मनुस्मृति में ब्राह्मण को उच्च कहा गया है।
10. लाला लजतपराय द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ २१-२२
11. पंडित श्यामबिहारी मिश्रा और सुखदेव बिहारी मिश्रा द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास,भाग १ पृष्ठ ६२ ओर ६३
12. पं.जनार्दन भट्ट एम.ए द्वारा लिखित -माधुरी मासिक - भारतीय पुरातत्व की नयी खोज १९२५ - पृष्ठ २७ ओर २९
13. हिँदी भाषा की उत्पति - आचार्य महावीर द्विवेदी
14. हिँदुत्व - पं.लक्ष्मीनारायण गर्दे, पृष्ठ - ८,९ ओर २९
15. आर्योँ का आदिम निवास -पं.जगन्नाथ पांचोली. 16. २९ वा अखिल भारतीय हिंदू महासमेलन रामानंद चॅटर्जी, मॉडर्न रिव्ह्यू का भाषण
16. काका कालेलकर रिपोर्ट
17. धर्मशास्राचा इतिहास - पा.वा.काणे करना
18. हिंदू सभ्यता - राधाकृष्ण मुखर्जी, पृष्ठ ४१,४७ ओर ५९
19. वोल्गा से गंगा - राहुल सांस्कृत्यायन
20. ना.गो.चाफेकर चित्पावन - पृष्ठ २९५
21. ग्रीक ओरिजन्स ऑफ कोकणस्थ चित्पावन -प्रताप जोशी
22. स्वामी दयानंद सरस्वती -सत्यप्काश ग्रंथ
23. टाईम्स ऑफ इंडिया का 2001 का DNA रिपोर्ट
डॉ. बाबासाहेब अबेडकरने शुद्र कौन थे इस पुस्तक मे आर्य विदेशी हे, की नहीं इसपर संशोधन होना बाकि हे, ऐसे लिखा था. और दूसरी जगह उन्होंने उसी पुस्तक मे आर्य विदेशी हे, ये कहा था, बाबासाहेब ने लोकमान्य टिळक का उदहारण देकर बताया था की, अगर आर्य उत्तर ध्रुव से आये हे, और उनका वाहन उस टाइम घोडा था.।परंतु बाबासाहेब ने उनके आखरी पुस्तक बुद्ध धम्म में सारनाथ के भाषण मे, आर्य ये विदेशी हे बताया था. आर्य भारत में आने से पाहिले नाग लोगोंकी संस्कृति थी याने नागवंशी लोगोंकी,यहा की संस्कृति नष्ट करने का काम आर्यो जे किया. आर्योंने घोड़े पे बैठ कर लढाई की तो यहा नागवंशी लोगों ने जमीन से लढाई की.
Dr.B.R.Ambedkar Writing and Speeches Vol.17 part 3 pg.no.431
ब्रह्म समाज के नेता सुब चन्द्र सेन ने 1877 में कलकत्ता कीएक सभा में कहा था कि अंग्रेजो के आने से हम सदियों से बिछड़े चचेरे भाइयों का (आर्य ब्रह्मण और अंग्रेज ) पुनर्मिलन हुआ है।
इस सन्दर्भ में अमेरिका के Salt lake City स्थित युताहा विश्वविधालय (University of Utaha’ USA) के मानव वंश विभाग के वैज्ञानिक माइकल बमशाद और आंध्र प्रदेश के विश्व विद्यापीठ विशाखा पट्टनम के Anthropology विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा सयुक्त तरीको से 1995 से 2001 तक लगातार 6 साल तक भारत के विविध जाति-धर्मो और विदेशी देश के लोगो के खून पर किये गये DNA के परिक्षण से एक रिपोर्ट तैयार की। " जिसमें बता गया कि भारत देश की ब्राह्मण जाति के मध्य यूरेशिया के पास जो “काला सागर ’Black Sea” है वहां के लोगो से मिलता है" ।
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*हंम तो DNA ओर इतिहासीक त्थय के तौर पर कह रहे है। की मनुवादी युरेश्यन अार्य भ्रामण भारतिय नही विदेशी है। ओर देख लो भारत के नामी पंडित भी इस बात को 100%सच मान रहे है।*
1. ऋग्वेद में श्लोक 10 में लिखा है कि हम (वैदिक ब्राह्मण ) उत्तर ध्रुव से आये हुए लोग है। जब आर्य व् अनार्यो का युद्ध हुआ ।
2. The Arctic Home At The Vedas बालगंगाधर तिलक (ब्राह्मण) के द्वारा लिखी पुस्तक में मानते है की हम बाहर आए हुए लोग है ।
3. जवाहर लाल नेहरु ने ( कश्मीरी पंडित ) उनकी किताब Discovery of India में लिखाहै कि हम मध्य एशिया से आये हुए लोग है। यह बात कभी भूलना नही चाहिए, ऐसे 30 पत्र इंदिरा जी को लिखे जब वो होस्टल में पढ़ रही थी।
4. वोल्गा टू गंगा में “राहुल सांस्कृतयान” (केदारनाथ के पाण्डेय ब्राहम्ण) ने लिखा है कि हम बाहर से आये हुए लोग है और यह भी बताया की वोल्गा से गंगा तट (भारत) कैसे आए।
5. विनायक सावरकर ने (ब्राम्हण) सहा सोनरी पाने “इस मराठी किताब में लिखा की हम भारत के बाहर से आये लोग है।
6. इक़बाल “काश्मीरी पंडित ” ने भी जिसने “सारे जहा से अच्छा” गीत लिखा था की हम बाहर से आए हुए लोग है।
7. राजा राम मोहन राय ने इग्लेंड में जाकर अपने भाषणों में बोला था कि आज मै मेरी पितृ भूमि यानि अपने घर वापस आया हूँ।
8. मोहन दास करम चन्द गांधी (वेश्य) ने 1894 में दक्षिणी अफ्रीका के विधान सभा में लिखे एक पत्र के अनुसार हम भारतीय होने के साथ साथ युरोशियन है हमारी नस्ल एक ही है इसलिए अग्रेज शासक से अच्छे बर्ताव की अपेक्षा रखते है।
9. ब्रह्म समाज के नेता सुब चन्द्र सेन ने 1877 में कलकत्ता कीएक सभा में कहा था कि अंग्रेजो के आने से हम सदियों से बिछड़े चचेरे भाइयों का (आर्य ब्रह्मण और अंग्रेज ) पुनर्मिलन हुआ है।
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प्रसिद्ध विद्वान् राहुल सांकृत्यायन जी अपनी पुस्तक 'वोल्गा टू गंगा ' में आर्य वैदिकों को बाहर (वोल्गा के उत्तर से) का आया तो बताते हैं , बाल गंगाधर तिलक जी भी अपनी पुस्तक ' the artic home in vedas' में आर्य वैदिकों को बाहर (उत्तरी ध्रुव)का आया बताते हैं ।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविधालय के पूर्व उपकुलपति डॉक्टर सत्यकेतु विद्यालंकार अपनी पुस्तक ' भारतीय संस्कृति और उस का इतिहास ' के पेज नंबर 12 में लिखते हैं " आर्यो की जो शाखाएं भारत में प्रविष्ट हुई , उसे इस देश में अनेक आर्यभिन्न जातियो के साथ युद्ध करने पड़े थे .आर्यो वैदिकों ने इस देश में विकसित हुई पूर्ववर्ती सभ्यताओ के स्थान पर अपनी सत्ता स्थापित की ।वेदों में इन्हें दस्यु या दास कहा गया । दस्यु या दास लोगो को अनास( नासिका हीन या छोटी नाक वाले जिनकी भाषा अलग होती थी) अच्छे किलो में निवास करते थे उन से विजय प्राप्त करने के लिए आर्यो को घनघोर युद्ध करने पड़ते थे "।
धर्म ग्रंथो में भी इसके स्पष्ट संकेत मिलते हैं की आर्य वैदिक का मूल स्थान भारत नहीं था ।ऋग्वेद पूरा आर्य और अनार्यो के युद्ध से भरा पड़ा है जैसे की -
इंद्र ने शंबर के 99 नगरो को नष्ट किया ( ऋग्वेद मंडल 5 , सूक्त 29 , मन्त्र 6)
इंद्र ने वृत आदि असुरो को 81 बार मारा ( ऋग्वेद 1/53/9)
इंद्र ने 30 हजार राक्षसो को मारा ( ऋग्वेद 4/30/21)
इंद्र ने युद्ध करने आये सुश्रवा नाम के राजा और उसके साथ 20 राजाओ , अनुचरों को पराजित किया ( ऋग्वेद 1/53/9)
इंद्र हमारी स्तुति जान के दस्यु के प्रति अस्त्र निक्षेप करो (1/103/3)
इसी प्रकार आर्यो -अनार्यो के युद्धों से ऋग्वेद का एक बहुत बड़ा भाग घेरे हुए है जिसमे आर्य वैदिक मुख्य निवासियो जिन्हें दस्यु /राक्षस / असुर कहा , उनसे युद्ध करते हैं और उनका संहार और हराते हैं ।
अब ये अनार्य कौन थे ?इसको स्पष्ट करते हुए दयानंद जी सत्यार्थ प्रकाश में कहते हैं "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विजो का नाम आर्य और शुद्रो का नाम अनार्य '( अष्टम समुल्लास )
प्रसिद्ध पुरात्तव विज्ञानी और इतिहासकार सर जान मार्शल ने सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता का तुलनात्मक अध्यन किया और निष्कर्ष निकाला -
1- आर्यो के जीवन में घोड़ो का बहुत अधिक महत्व था पर सिंधु घाटी के लोग इस से अपरचित मालुम होते है
2- सिंधु घाटी के लोग हाथी और सिंह से परचित थे पर आर्य अपरचित
3- सिंधु घाटी के लोग मूर्ति/ स्तूप पूजक थे जबकि वेदों में मूर्ति पूजा का विरोध है ( न तस्य प्रतिमास्ति)
ऋग्वेद में आर्य वैदिक द्वारा अपने आये रास्ते पर कब्जे का भी जिक्र करते हैं-
"जिस रास्ते से हमारे पितृ गए वह रास्ता अभी भी हमारे अधिकार में है"
( ऋग्वेद मंडल 10,सूक्त 14 मन्त्र 2)
आर्य वैदिक भारत में साथ नहीं आये थे बल्कि की अलग अलग समय में टुकड़ियों में आये थे और यंहा आने का जो मार्ग था ( तिब्बत आदि) वह उनके वंशजो को पता था । डी डी कोसंबी अपनी पुस्तक प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता में लिखते हैं कि आर्यो की पहली खेप सिन्धु सभ्यता के समय आई और उसे नष्ट किया।
(संजय)
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