Thursday, 18 June 2020

(क) काफ़िर का अर्थ, काफिरों पर आयतें।


एक शब्द काफ़िर गाली सा लगता है जाने आखिर काफिर होता कौन है?

*काफिर शब्द के 3 अर्थ है, और ये उन तीनों अर्थो में क़ुरआन में प्रयोग हुआ है।

पहला अर्थ है" नहीं मानने वाला या इनकार करने वाला"।

अगर मै किसी से कोई अपना काम कहूं और सामने वाला मना कर दे, इंकार कर दे, या ज़बान से इंकार ना भी करे लेकिन बार बार मेरी रिक्वेस्ट के बावजूद , बैठा रहे ,सुना अनसुना कर दें, तब भी यही कहा जाएगा के इंकार कर दिया, लेकिन अगर मैंने सामने वाले से कुछ  कहा ही ना हो और फिर भी मै कहूं ये इंकार कर रहें हैं, तो मुझे क्या अधिकार है ये कहने का के ये मना कर रहे या इंकार कर रहे ?
अब काफिर का मतलब तो है इंकार करने वाला लेकिन किस बात का इंकार?, इस्लाम को नहीं मान रहा,लेकिन, इस्लाम क्या है? कहते हैं शांति का धर्म है, अगर है शांति का धर्म तो इसे हमें सिद्ध भी करना होगा, दावा तो नहीं चलेगा खाली,, हमें अपने आचरण से , अमल किरदार से,उसके बाद बातचीत से , ये सिद्ध करना होगा। अगर व्यवहारिक रूप में सिद्ध नहीं किया है तो हमें कोई हक नहीं है किसी को काफिर कहने का।

दूसरा अर्थ है "छिपाने वाला"।

अगर कभी किसी काल में कुछ ब्राह्मणों ने वेदों को आम लोगों से छुपाया तो वो भी काफिर थे। अगर कभी किसी काल में कुछ पादरियों ने बाइबिल की सही शिक्षा लोगो से छुपाई तो वो काफिर थे। अगर कभी कुछ मौलवियों ने क़ुरआन की शिक्षाओं को लोगो से छुपाया तो काफिर। तो यहां छिपाने वाला भी काफिर हुआ, फिर बाकियों को तो नहीं कह सकते।

और तीसरा अर्थ है "अकृत्यज्ञ ,या ना शुक्री करने वाला"।

ना शूक्री किसी नेमत की होती है, मुसलमानों का दावा है के मुक्ति या निजात का सही साधन हमारे पास है ये बहुत बड़ी नेमत है। तो जिसके पास कोई बड़ी नेमत होगी ना शुकरी तो वहीं करेगा जिसके पास नहीं होगी वो कैसे करेगा। अब दूसरो को काफिर कहने का अधिकार कहां बचा क्यूंकि नशुक्रे तो उनमें से ही निकलेंगे जो कह रहे के हमारे पास नेमत है,

ये तो था काफिर शब्द का सही मतलब जो कुरआन में इस्तेमाल हुआ,
इसके अलावा काफिर होना भी बूरी बात नहीं अगर आप गलत या बूरी बातो का इंकार करे, क्यूंकि कुरआन ने ईमान वालो को भी काफिर कहा है एक जगह ,के जो " काफिर बना तागूत (शैतान या शैतानी निज़ाम) का और आस्तिक बना एक ईश्वर का तो उसने बहुत ऊंची कामयाबी हासिल की"। तो हमे काफिर बनना चाहिए शैतान का और आस्तिक बनना चाहिए ईश्वर का, लेकिन काफिर कहने का अधिकार नहीं है किसी को, ये तो अल्लाह के यहां तय होगा के किसने ईश्वर के सामने समर्पण किया था या किसने नहीं। हम कौन होते हैं ये तय करने वाले, जबकि हमने अपना ही हक ( खूबसूरत अंदाज़ में पहुंचाने और हुज्जत कायम करने की ज़िम्मेदारी) अदा ना किया हो।

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काफिर_कौन?

काफिर एक ऐसा शब्द है जिसके बारे में ना केवल ग़ैर मुस्लमान बल्कि मुसलमानों में भी ग़लतफ़हमी है। इस शब्द का सही अर्थ इसलिए भी जानना ज़रूरी है क्यूंकि हमारे समाज में काफिर शब्द की ग़लत परिभाषा समझने से लोग इस्लाम के बहुत सारे सिद्धांतों की ग़लत व्याख्या करते है । अब जब शब्द का अर्थ ही ग़लत समझा गया हो, तो वह शब्द जहाँ जहाँ प्रयोग होगा उससे उत्पन धारणा भी ग़लत होगी। काफिर शब्द का माद्दा या मूल-धातु है – कुफ्र। जिसके अरबी भाषा में 3 अर्थ होते हैं:-

1. छिपाने वाला
2. अकृतज्ञ ( नाशुक्रा )
3. इनकार करने वाला

हो सकता है आपने काफिर शब्द की ये व्याख्या पहले कभी नहीं सुनी होगी, क्यूंकि जैसा मैंने पहले लिखा है कि अधिकतर मुस्लमान भी इस शब्द का सही अर्थ नहीं जानते । इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि मुसलमानों की बड़ी संख्या अरबी भाषा नहीं जानती है। इसी वजह से वह भी काफिर शब्द का वही मतलब समझते हैं जो आप समझते हैं। आईये क़ुरआन से कुछ प्रमाण देखते है और फिर फैसला करते हैं कि क्या काफिर शब्द का अर्थ छिपाने वाला, अकृतज्ञ ( नाशुक्रा ) और इनकार करने वाला ही होता है या कुछ और।

1. छिपाने वाला

क़ुरआन की एक आयत में किसान को भी काफिर कहा गया है, क्यूंकि किसान ख़ेती के लिए धरती में बीज छिपाता है ।
كَمَثَلِ غَيْثٍ أَعْجَبَ الْكُفَّارَ نَبَاتُهُ
सूरह हदीद ( 57:20 )

अर्थात, उसकी मिसाल उस बारिश की तरह है जिससे किसान को उसकी पैदावार अच्छी लगे…

इस आयत में कुफ्फार ( कुफ्र करने वाला ) शब्द का अर्थ किसान इसलिए लिया है क्यूंकि किसान छिपाना वाला है – धरती में बीज।
अरबी भाषा का एक मुहावरा है
کَالکَرمِ اِذ نادٰی من الکَافورِ
अर्थात, जैसे अंगूर ग़िलाफ़ से ज़ाहिर होता है।

इस मुहावरे के अनुसार अंगूर के छिलके को काफिर कहा गया है क्यूंकि अंगूर का छिलका अंगूर को छिपा लेता है।

2. अकृतज्ञ ( नाशुक्रा )

काफिर शब्द का एक और अर्थ है – अकृतज्ञ ( नाशुक्रा )।
क़ुरआन में बहुत सारी आयतों से यह प्रमाण मिलता है कि काफिर शब्द का अर्थ अकृतज्ञ या नाशुक्रा है। उदाहरण;
إِنَّا هَدَيْنَاهُ السَّبِيلَ إِمَّا شَاكِرًا وَإِمَّا كَفُورًا
सूरह इन्सान ( 76:3 )

निसन्देह हमने उसको हिदायत का रास्ता दिखाया, अब चाहे वह शुक्र गुज़ार हो जाये नाशुक्रा ( अकृतज्ञ ) हो जाये ।
قالَ هٰذا مِن فَضلِ رَبّي لِيَبلُوَني أَأَشكُرُ أَم أَكفُرُ ۖ وَمَن شَكَرَ فَإِنَّما يَشكُرُ… لِنَفسِهِ ۖ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ رَبّي غَنِيٌّ كَريمٌ     
( सूरह नम्ल 27:40 )

कहने लगे ये महज़ मेरे परवरदिगार का फज़ल व करम है ताकि वह मेरा इम्तेहान ले कि मै उसका शुक्र करता हूँ या नाशुक्री करता हूँ और जो कोई शुक्र करता है वह अपनी ही भलाई के लिए शुक्र करता है और जो शख़्स नाशुक्री करता है तो मेरा परवरदिगार यक़ीनन सख़ी और करम करने वाला है ।

3. इनकार करने वाला

यहाँ एक सवाल ये उठता है कि किसका इनकार? इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये समझना ज़रूर है कि कोई व्यक्ति किसी भी चीज़ का इनकार तब करता है जब उस तक वह बात पहुँच जाती है और साथ में सिद्ध भी कर दी जाती है। मुस्लमान अगर ये दावा करते हैं कि इस्लाम शान्ति का धर्म है तो क्या उन्होंने ये बात सिद्ध भी की है कि इस्लाम शान्ति का धर्म। बिना किसी बात को सिद्ध करे क्या किसी मुस्लमान के लिए ये उचित है कि वह किसी के लिए ये कह सके कि इन्होने शान्ति का इनकार किया। संसार में हर इंसान शान्ति चाहता है, अगर किसी को समझ आजाये कि इस काम या मार्ग से शान्ति प्राप्त होगी तो भला वह उसका इनकार क्यों करेगा।

यह काफिर शब्द के तीन अर्थ हैं – छिपाने वाला, अकृतज्ञ ( नाशुक्रा ), इनकार करने वाला। यहाँ दो अर्थ छिपाने वाला और अकृतज्ञ (नाशुक्रा) क्या आज के मुसलमानों पर सही नहीं बैठते। आप सोच रहे होंगे वह कैसे? अगर क़ुरआन और मुसलमानों के अनुसार इस्लाम शान्ति है और यह सन्देश हमने लोगों तक इस तरह नहीं पहुंचाया कि उनके समझ में भी आगाया, तो  छिपाने वाला कौन हुआ ?

अगर मुस्लमान यह समझते हैं कि इस्लाम उनके लिए ईश्वर की ओर से सबसे बड़ी नेमत है, तो इस नेमत की नशुक्रि सबसे ज़्यादा कौन कर सकता है? काफिर शब्द को लेकर पूरी दुनिया में ग़लतफ़हमी है। इसकी एक वजह मुसलमानो का व्यवहार और क़ुरआन से दूरी है। और एक वजह ग़ैर मुसलमानो का इस्लाम की आधी-अधूरी बातों पर विश्वास करना।

काफिर का मतलब हिंदी, यहूदी या ईसाई नहीं, ये सब तो क़ौमें है जो क़ुरआन में स्पष्ट रूप से बताई गयी है। परन्तु काफिर शब्द तीन अर्थ में प्रयोग किया जाता – छिपाने वाला, अकृतज्ञ ( नाशुक्रा ), इनकार करने वाला। नैतिक बात यह है कि हमें हर बुरी चीज़ का इनकार करना चाहिए और हर वह बात जो हमारा मार्गदर्शन करे उसे मानना चाहिए।जैसे क़ुरआन ने कहा की तुम शैतान के काफिर हो जाओ और ईश्वर के आस्तिक बन जाओ।

لا إِكراهَ فِي الدّينِ ۖ قَد تَبَيَّنَ الرُّشدُ مِنَ الغَيِّ ۚ فَمَن يَكفُر بِالطّاغوتِ وَيُؤمِن بِاللَّهِ فَقَدِ استَمسَكَ بِالعُروَةِ الوُثقىٰ لَا انفِصامَ لَها ۗ وَاللَّهُ سَميعٌ عَليمٌ
( सूरह बक़रा 2:256 )

धर्म में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस मनुष्य ने झूठे ताग़ूत से इंकार किया और ईश्वर पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और ख़ुदा सब कुछ सुनता और जानता है।


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शब्द ‘काफ़िर’ का अर्थ :


काफ़िर शब्द तीन अरबी मूल अक्षरों ‘क-फ़-र’ से बना है। क़ुरआन में इस मूल से बने 54 शब्दों में से 51 शब्द जो (74 अध्यायों (सूरा) की 479 आयतों में 521 बार आए हैं), निम्नलिखित भाव में प्रयुक्त हैं। इन सारे शब्दों का मूल शब्द ‘कुफ़्र’ है; काफ़िर का अर्थ है ‘कुफ़्र$ करने वाला’। कुफ़्र के कई अर्थ हैं। उदाहरणतः इन्कार करना, छिपा लेना, हटा देना, दूर कर देना, प्रतिकूल कार्य करना, दबा देना, मिटा देना, अवहेलना करना, छोड़ देना आदि। (किसान के ज़मीन में बीज दबा देने के लिए भी अरबी में ‘कुफ़्र’ शब्द प्रयुक्त होता है)।


पारिभाषिक अर्थ : इस्लाम (और क़ुरआन) की पारिभाषिक शब्दावली में ‘कुफ़्र’ शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। जैसे: इस्लाम की वास्तविकता समझ लेने के बाद उस पर ईमान लाने के बजाय, इस्लाम का इन्कार कर देना, मन-मस्तिष्क पर ‘सत्य’ स्पष्ट हो जाने के बाद भी उसे छिपा लेना, दबा देना, तिरस्कृत कर देना। यह शब्द स्वयं मुसलमानों के भेस में, कपटाचारियों (Hypocrites, मुनाफ़िक़ों) के उस कृत के लिए भी प्रयुक्त हुआ है जो इस्लाम की कुछ बातों पर अमल करने और कुछ को छोड़ देने, अल्लाह की आंशिक या पूर्ण अवज्ञा (नाफ़रमानी), ऊपर से ईमान लेकिन अन्दर से ईमान के विरोध आदि के रूप में किया जाए। इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) जो ईश-ग्रंथ क़ुरआन के वाहक हैं, ने स्वयं मुसलमानों के लिए कहा: ‘‘जिसने जान-बूझकर नमाज़ छोड़ दी उसने कुप्ऱ$ किया।’’ क़ुरआन की छः आयतों (8:29, 39:35, 48:5, 64:9, 65:5, 66:8) में अल्लाह ने स्वयं अपने लिए यह शब्द प्रयोग किया है; ‘‘...तो अल्लाह तुम से तुम्हारी बुराइयों, गुनाहों को दूर कर देगा ।’’ एक आयत (2:271) में फ़रमाया, ‘‘...इससे तुम्हारी बुराइयां मिट जाती हैं।’’


यह एक ‘पहचान तय करने वाला शब्द’ (Word of Identitification) है। यह ‘ईमान लाने वाले’ (मोमिन/मुस्लिम) व्यक्ति के विपरीत ‘ईमान (इस्लाम) का इन्कार कर देने वाले’ व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। उदाहरणतः ‘ग्रेजुएट’ के विपरीत ‘नान-ग्रेजुएट’ का शब्द, जो निस्सन्देह पहचान (Identity) के लिए है, न कि अपमान के लिए या गाली के तौर पर।


क़ुरआन की नीति। ‘काफ़िर’ के लिए क़ुरआन में मोटे तौर पर दो क़िस्म की बातें आई हैं। एक: इस जीवन (वर्तमान इहलौकिक जीवन) के लिए। दो: मृत्युपश्चात (पारलौकिक) जीवन के लिए। चूंकि क़ुरआन (अर्थात् इस्लाम) का सामान्य नियम है कि हर मनुष्य को यह अधिकार प्राप्त है कि वह ईमान (इस्लाम) को चाहे तो स्वीकार कर ले चाहे अस्वीकार कर दे, ‘दीन’ (इस्लाम धर्म) में ज़ोर- ज़बरदस्ती नहीं है (2:256), इसलिए काफ़िर के प्रति न्याय, सत्यनिष्ठा, मानवीय मूल्यों तथा पूरे इन्साफ़ व मानवाधिकार के तक़ाज़ों के अनुकूल व्यवहार किया जाएगा। ‘काफ़िरों’ के बारे में क़ुरआन में जो भी बातें पकड़ने, मारने, क़त्ल करने की आई हैं उन्हें पूरे संदर्भ (Context) के साथ पढ़ा जाए तो मालूम होगा कि यह युद्ध से संबंधित आदेश थे। मुसलमानों (और पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰) को मक्का के काफ़िरों ने 13 वर्ष तक सताया था, प्रताड़ित व अपमानित किया था, दो बार मुसलमानों को मक्का छोड़कर हब्शा (इथोपिया) प्रवास पर मजबूर किया था, यहां तक कि मक्का (जन्म-भूमि, अपना नगर, अपना घर-बार, सामग्री, आजीविका; यहां तक कि बीवी-बच्चे, माता-पिता, परिवार भी) छोड़कर 450 किलोमीटर दूर मदीना नगर के प्रवास (हिजरत, Migration) पर विवश कर दिया था। इसके बाद भी अपनी सेनाएं और संयुक्त सेनाएं (अहज़ाब Allied Armies) लेकर मुसलमानों पर बार-बार चढ़ आते थे, और पूरे अरब प्रायद्वीप में जगह-जगह इस्लाम और मुसलमानों का अरब से सर्वनाश कर देने के लिए हमलों की तैयारियां जारी रहती थीं तब जाकर अल्लाह ने मुसलमानों को इजाज़त दी कि इन से युद्ध करो, जहां पाओ...पकड़ो, क़त्ल करो। यह ऐसे काम की इजाज़त या आज्ञा (आदेश) थी जो मानवजाति के पूरे इतिहास में, युद्ध- स्थिति में सदा मान्य रही है। शान्ति-स्थापना के लिए हर सभ्य समाज ने ऐसे युद्ध को मान्यता दी है। इतिहास साक्षी है कि इस्लामी शासन-काल में मुसलमानों ने जितने युद्ध लड़े, वे या तो आत्म-रक्षा के लिए थे, या अरब व आस-पास के भूखण्डों में शान्ति- स्थापना हेतु आक्रमणरोधक युद्ध (Pre-emptive war) के तौर पर लड़े गए। यथा-अवसर तथा यथा-संभव उन्होंने सदा ‘सुलह’ को ‘युद्ध’ पर प्राथमिकता दी। शान्ति-समझौतों को हमेशा वांछनीय विकल्प माना।


मृत्यु पश्चात जीवन के लिए ईश्वर ने काफ़िरों (धर्म के इन्कारियों) के लिए क़ुरआन में अनेक स्थानों पर इन्कार के प्रतिफल-स्वरूप,नरक की चेतावनी दी है। यह बिल्कुल ईश्वर और उसके बन्दों के बीच का मामला है। और ईश्वर, जो अपने तमाम

बन्दों का रचयिता, पैदा करने वाला, प्रभु-स्वामी, पालक-पोषक  (Provider, Sustainer, रब) है वह अपने बन्दों के बारे में, (उनके कर्मानुसार) जो भी फैसला परलोक जीवन के लिए करे, इसका उसे अधिकार है, इसमें किसी मुसलमान की कोई भूमिका (Role) नहीं; न ही किसी भी व्यक्ति का आक्षेप (Interference) संभव है।


काफ़िरों के प्रति व्यवहार ऐसे ‘काफ़िरों’ के साथ, जो मुसलमानों (ईमान वालों) से लड़ते नहीं, उन्हें सताते नहीं, उन पर अत्याचार के पहाड़ नहीं तोड़ते, उन्हें उनकी आबादियों, बस्तियों, नगरों से निकालते नहीं, उनके ख़िलाफ़ युद्धरत नहीं होते, कमज़ोरों को दबा-दबाकर उनका जीना अजेरन नहीं करते; इस्लाम ने सौहार्द्र, प्रेम-व्यवहार, आदर, इन्साफ़ और शान्तिमय रूप से रहने, अच्छाइयों में सहयोग करने, सहयोग देने, शान्ति-संधि समझौता करने तथा ठीक मुसलमानों ही की तरह उनके मानव-अधिकार देने तथा उनके अधिकारों की रक्षा करने की शिक्षा व आदेश दिया है।


निष्कर्ष यह कि ‘काफ़िर’ शब्द एक गुणवाचक संज्ञा (Qualitative Noun) है; इसका किसी विशेष जाति, नस्ल, क़ौम, क्षेत्रवासी समूह या रंग व वर्ग से कुछ संबंध नहीं। जो भी इस्लाम का इन्कार करे वह पहचान के तौर पर ‘इन्कारी’ (अर्थात् कुफ़्र करने वाला) कहलाता है।

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क्या क़ुरआन कहता है कि जहा काफिरों को पाओ उन्हें मार डालो?

क़ुरआन मे है:
"फिर, जब रमजान (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो काफिरों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"
(-कुरान 9:5)

कुरआन के खिलाफ़ बोलने वाले  लोग अक्सर इस आयात को पेश करते है और कहते है कि अल्लाह मुसलमानों को काफिरों को मारने का हुक्म देता है, और वो इसके आगे पीछे की आयतों को छुपा जाते है इससे आप उनकी नियत का अंदाज़ा लगा सकते है कि अगर कुरआन पर उंगली उठाने वाले यह लोग सच्चे होते तो आगे पीछे की आयते ज़रूर पेश करते ताकि इसका पूरा प्रसंग समझा जा सके क्यूँकि किसी भी बात को अगर उसके प्रसंग (पसमंज़र) से अलग करके बयान किया जाए तो अर्थ का अनर्थ किया जा सकता है, इससे ज़ाहिर होता है इनका मक़सद सिर्फ इस्लाम के विरुध्द दुष्प्रचार करना है।

अब इस आयत को आगे पीछे की आयतों के साथ पढ़ें तो बात समझ मे आयेगी-
*(सूरह अत-तौबा, 9*)

9:1 "मुशरिकों (बहुदेववादियों) से जिनसे तुमने संधि की थी, विरक्ति (की उदघोषणा) है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से।"

9:2 "अतः इस धरती में चार महीने और चल-फिर लो और यह बात जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और यह कि अल्लाह इनकार करनेवालों को अपमानित करता है।"

9:3 "सार्वजनिक उदघोषणा है अल्लाह और उसके रसूल की ओर से, बड़े हज के दिन लोगों के लिए, कि "अल्लाह मुशरिकों के प्रति ज़िम्मेदारी से बरी है और उसका रसूल भी। अब यदि तुम तौबा कर लो, तो यह तुम्हारे ही लिए अच्छा है, किन्तु यदि तुम मुँह मोड़ते हो, तो जान लो कि तुम अल्लाह के क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते।" और इनकार करनेवालों के लिए एक दुखद यातना की शुभ-सूचना दे दो।"

9:4 "सिवाय उन मुशरिकों के जिनसे तुमने संधि-समझौते किए, फिर उन्होंने तुम्हारे साथ अपने वचन को पूर्ण करने में कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे विरुद्ध किसी की सहायता ही की, तो उनके साथ उनकी संधि को उन लोगों के निर्धारित समय तक पूरा करो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

9:5 "फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है।"

9:6 "और यदि मुशरिकों में से कोई तुमसे शरण माँगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले। फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दो, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं।"

9:7 "इन मुशरिकों को किसी संधि की कोई ज़िम्मेदारी अल्लाह और उसके रसूल पर कैसे बाक़ी रह सकती है? - उन लोगों का मामला इससे अलग है, जिनसे तुमने मस्जिदे-हराम (काबा) के पास संधि की थी, तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तब तक तुम भी उनके साथ सीधे रहो। निश्चय ही अल्लाह को डर रखनेवाले प्रिय हैं।"

सारी आयतों से साफ पता चलता है कि यहाँ बात एक विशेष प्रकार के लोगो के बारे मे चल रही है, जिनकी मुसलमानो से संधि थी इस अध्याय (सूरह) मे उस संधि का ज़िक्र भी है, जब मक्का के उन मुशरिको ने संधि करने के बाद उसे तोड़ा और मुसलमानों से जंग के लिये अमादा हो गए तो अल्लाह ने भी मुसलमानों को प्रोत्साहित करने के लिए यह बाते कही जो कि आम तौर पर हर आर्मी चीफ़ अपनी सेना से कहता है कि दुश्मन को जहा पाओ मार डालो लेकिन अचंभे की बात यह है कि इसी अध्याय मे अल्लाह ने इसके साथ यह भी हुक्म दिया कि अगर जंग के मैदान में भी कोई तुमसे अमन की बात करें तो जंग को भूल कर अपनी जान पर खेलकर उसकी हिफाज़त करो और उसे महफूज़ जगह पहुचा कर आओ।

ऐसा आदेश दुनिया का कोई भी कमांडर नहीं दे सकता। और इसी अध्याय की दूसरी आयात मे अल्लाह ने यह भी वाज़ेह कर दिया कि यह आदेश सिर्फ उन मुशरिको के लिए है जिन्होंने संधि तोड़ कर तुमसे ऐलान ए जंग किया है, और बाक़ी जिन्होंने मस्जिद ए हराम (काबा) के पास तुमसे संधि की आदि के लिए नहीं है, उनके साथ तुम अच्छा सुलूक रखो और संधि को पूरा करते रहो।

"जिन लोगो ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुमको तुम्हारे घरो से निकाला, उनके साथ भलाई और इन्साफ का सुलूक करने से अल्लाह तुमको मना नहीं करता, अल्लाह तो इन्साफ करने वालो को दोस्त रखता हैं।"
(कुरान 60:08). 11

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क्या क़ुरआन की सूरह तौबा में काफिरों को क़त्ल का आदेश है ?

उत्तर ~जिस सूरह  तौबा 9/आयत 5 ज़िक़्र किया जाता है उसको पूरा बता देते हैं. यह सूरः तब नाज़िल हुई जब मुसलमानों और मक्का के मुशरिकों(बहुदेवावादियों) के बीच हुई संधी को मक्का के मुशरिकों ने तोड दिया और मुसलमानों पर आक्रमण का प्रपंच रचनें लगे.मुसलमानो पर जुल्म करने लगे मुसलमानो को उनके घरो से निकलने लगे तब अल्लाह ने यह सूरः नाज़िल की और उन मुशरिको को, जिन्हों ने संधी तोड़ी थी, को 4 महीने का समय दिया. अगर इन चार महीनों में यह सीधे रास्ते पर नहीं आते हैं तो इन से जंग करो और जंग के समय में, जंग में (डरो नहीं), जहाँ पाओ इन का क़त्ल करो. ज़ाहिर सी बात है कोई भी दुश्मन से अपनी आत्म रक्षा के लिये यही निर्णय लेगा व ऐसा आदेश पारित करेगा.वह जंग अपनी रक्षा के लिए था शांति की अस्थापना करने के लिए था 

जो की यह एक साधाहरण सी मानवीय प्रवर्ती है. प्रश्न उठता है कि आरोप लगानें वालों को इसके आगे वाली आयत(6) नहीं दिखती, क्यू? क्यूंकि भ्रम और अराजकता फैलानें वलों को सिर्फ ऐसी ही चीज़ें दिखती हैं, जिसको वोह गलत ढंग से पेश कर के लोगों में बैर पैदा कर सकें. -- आगे की आयत में अल्लाह कहता है

(सूरह तौबा 9 आयत 6) में "जो लोग तुम्हारे संरक्षण में आते हैं (शान्ति चाहते है) उनको अपनी सुरक्षा में एक ऐसी सुरक्षित जगह पर ले जा कर पहुँचा दो, जहां पर वोह अल्लाह का पैगाम (शान्ति का पैगाम) सुन लें, अर्थात सुरक्षित हो, क्यूंकि यह वोह लोग हैं जो ग्यान नहीं रखते. इन लोंगों को आयत नंबर 4 और 7 भी नहीं दिखती.सूरह तौबा 9 आयत4 में अल्लाह कहता है "जिन मुशरिकों से तुम्हारी संधी है और उन्होने तुम्हारे विरुद्ध दूसरों का साथ दिया है, तो उनके साथ सन्धि, संधी के समय तक पूरी करो.सूरह तौबा 9 आयत 7 में अल्लाह कहता है "जिन लोगों ने तुम्हारे साथ "खाना-ए-क़ाबा" के पास सन्धि की थी और अगर वोह इस को क़ायम रखना चाहे तो तुम भी सन्धि को क़ायम रखो. --- . सूरः तौबा में 129 आयतें हैं, लेकिन शैतानी प्रवित्ति के लोगों को सिर्फ आयत नंबर "5" दिखती हैं, क्यूंकि इस आयत को बिना संदर्भ के उधृत कर के लोगों में गलत बात फैलाई जा सकती हैं. 

यहाँ देखें 

जिन लोगों ने तुमसे दीन के बारे में जंग नहीं की और न तुम को तुम्हारे घरों से निकला,उन के साथ भलाई और इंसाफ का सुलूक करने से ख़ुदा तुम को मना नहीं करता । ख़ुदा तो इंसाफ करने वालों को दोस्त रखता है ।

-कुरआन, सूरा 60 , आयत-8

ख़ुदा उन्हीं लोगों के साथ तुम को दोस्ती करने से मना करता है , जिन्होंने तुम से दीन के बारे में लड़ाई की और तुम को तुम्हारे घरों से निकला और तुम्हारे निकलने में औरों की मदद की , तो जो  लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे , वही ज़ालिम हैं ।

-क़ुरआन , सूरा 60 , आयत- 9

इस्लाम के दुश्मन के साथ भी ज्यादती करना मना है देखिये:

और जो लोग तुमसे लड़ते हैं, तुम भी ख़ुदा की राह में उनसे लड़ो , मगर ज्यादती न करना की ख़ुदा ज्यादती करने वालों को दोस्त नहीं रखता ।

-क़ुरआन , सूरा 2 , आयत-190

इस्लाम द्वारा, देश में हिंसा ( फ़साद ) करने की इजाज़त नहीं है । देखिये अल्लाह का यह आदेश: 

लोगों को उन की चीज़ें कम न दिया करो और मुल्क में फ़साद न करते फिरो।

-क़ुरआन , सूरा 26 , आयत-183 

इस्लाम में किसी को जोर ज़बरदस्ती से मुस्लमान बनाने की सख्त मनाही है । क़ुरआन माजिद में अल्लाह के ये आदेश :

और अगर तुम्हारा परवरदिगार ( यानि अल्लाह ) चाहता, तो जितने लोग ज़मीं पर हैं, सब के सब इमा ले आते । तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो की वे मोमिन ( यानि मुस्लमान ) हो जाएं ।

-क़ुरआन, सूरा 10 , आयत-99 

दिने इस्लाम में ज़बरदस्ती नहीं है ।

-क़ुरआन , सूरा 2 , आयात-256 

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया :

इस्लामी हुकूमत में किसी ऐसे गैर मुस्लिम नागरिक पर जिसकी जान-माल, इज्जत आबरु की हिफाजत का मुसलमानों ने समझोता किया है, जो व्यक्ति जुल्म करेगा, या उसका हक मारेगा या उस पर उसकी ताकत से अधिक बोझ डालेगा या गैर मुस्लिम नागरिकों की कोई चीज उसकी रजामंदी के बगैर ले लेगा तो मैं अल्लाह की अदालत में दायर होने वाले मुकदमे में उस गैर-मुस्लिम नागरिक की ओर से वकील बनूंगा

(सुनन अबु दाऊद : 3052)

इस्लाम जंग का भी तरीका बताता है 

जिंग में भी किसी निहते पर वॉर नही करना है 

कोई आत्मसमपर्ण कर दे तो उसे महफूज़ जगह तक छोड़ आना है जहाँ उसका कोई नुकसान ना पहुचे जंग में हारे पेड़ पौदे बुढे बच्चों और औरतो को नुकसान नही पहुचाना है ।

लेकिन कुछ ना समझ अमन के दुश्मन समाज में जहर घोलने वाले लोग क़ुरआन की बिच बिच का आयत कोड करके यह बोल कर की देखो क़ुरआन में यह लिखा है समाज में जहर फ़ैलाने का काम करते है 

जब की इन्हें क़ुरआन तो क़ुरआन अपने खुद की धर्म ग्रंथो के बारे में कुछ जानकारी नही होता है 

अब देखिये वेद क्या कहता है और मनुस्मृति की क्या आज्ञा है 

ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः

"हम लोग जिस से अप्रीति करें और जो हम को दुःख दे उसको इन वायुओं की बीडाल के मुख में मूषे के सामान पीड़ा में डालें |" [यजुर्वेद 16:65 दयानन्द भाष्य]

वृश्च प्र वृश्च सं वृश्च दह प्र दह सं दह |

"तू वेद निन्दक को, काट डाल, चीर डाल, फाड़ डाल, जला दे, फूँक दे, भस्म कर दे।" भावार्थ: धर्मात्मा लोग अधर्मियों के नाश में सदा उद्यत रहें [अथर्ववेद काण्ड12: सूक्त 5: मंत्र 62 पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी भाष्य]

जो आर्यावर्त देश से भीन देश वाले है वह दस्यु और म्लेच्छ है 

मनुस्मृति 10 /45 मनुसमृति 2/23

सत्यार्थ प्रकास समुलास 8 पृश्ट 225 _226

_________________________________________________________________

*Part-1*

*सवाल-*
*क्या क़ुरआन में उसे काफिर  को मारने का आदेश मिला है   ?????*

*जवाब*

सबसे पहले लफ्ज़ जिहाद और काफिर को समझ लीजिये,

*जिहाद:*
*जिहाद अरबी भाषा के शब्द 'जेहद' से बना है जिसका अर्थ है "इशमार्ग में अमन और शांति के लिए निरंतर प्रयास करना।"*
निर्दोष लोगों को मारना, उनके दिल में डर पैदा करना जिहाद नहीं आतंकवाद है, और ऐसा करने वाले मुजाहिदीन नहीं, आतंकवादी है।

*काफिर:*
*काफिर का मतलब कोई गाली नहीं है, काफिर अरबी भाषा के शब्द 'कुफ्र' से बना है जिसका अर्थ- इंकार करना, ढांकना, और छिपाना होता है।*
*इस्लाम के अनुसार काफिर वो है जो एक ईश्वर अल्लाह का, उसके भेजे ऋषियों (पैगम्बरों) का, ईश्वरीय ग्रंथो आदि का इंकार करता है। उसे अवज्ञाकारी, या नास्तिक भी कह सकते है।*

*इस्लाम के अनुसार काफिर (अवज्ञाकारी) दो प्रकार के है-*
*एक वो जो बिना कारण ईश्वर भक्त मुसलमानों को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई ना कोई युक्ति करते ही रहते हैं और उनके घरों पर कब्जे करना चाहते हैं, उन्हें मारना चाहते हैं, या लाचार लोगों पर ताक़त का दुरुपयोग करते है।*

क़ुरआन में जहां कहीं भी काफिरों से जिहाद करने की, लड़ने की बात आई है ये इन्हीं अवज्ञाकारियों के लिए है, और ये लड़ना भी तब है जब शत्रु आपके भेजे शांति के प्रस्तावों को ठुकराकर मैदान में आमने सामने आ जाये और तब आप आत्मरक्षा के लिए उससे लड़े।

इस्लाम के अनुसार आप केवल आत्मरक्षा (अपनी जान, माल, बच्चों, बूढ़ो, औरतों की इज़्ज़त आबरू बचाने के लिए) या फिर किसी पर अत्यचार हो रहा हो तो उस अत्याचार को रोकने के लिए ही लड़ सकते हो।

क़ुरआन की ये आयतें देखें-
*जिन लोगों से लड़ाई की जाती है उन्हें अनुमति दी गई कि वो भी लड़े, इसलिए कि उन पर अत्याचार हुआ.... वह लोग जिन्हें उनके घर से अनुचित निकाल दिया गया, सिर्फ इसलिए कि वह कहते है हमारा रब अल्लाह है।*
*(क़ुरआन 22:39,40)*

*क्या तुम उन लोगों से नहीं लड़ोगे जिन्होंने (शांति बनाए रखने की) क़समों को तोड़ डाला.... और उन्होंने ही पहले पहल तुमसे लड़ाई की।*
*(क़ुरआन 9:13)*

*तुम उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ते हैं, और तुम उन्हें निकाल दो , जहां से उन्होंने तुम्हें निकाला है (यानि जिन लोगों ने तुम्हारे घरों पर कब्ज़ा कर लिया है, उनसे अपने घर वापस लो) और अगर वो रुक जाए तो अल्लाह बड़ा कृपाशील है (यानि तुम भी रुक जाओ)।*
*(क़ुरआन 2:190)*

*और ईश्वर के मार्ग में युद्ध ना करने में तुमको क्या आपत्ति हो सकती है जबकि बहुत से दबे कुचले पुरूष, स्त्रियां, और बच्चे (लाचार होकर) प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि, 'हे हमारे पालनहार इस बस्ती से हमको निकाल ले जिसके रहने वाले बड़े अत्याचारी है और अब तू किसी को अपनी ओर से हमारा सरंक्षक बनाकर खड़ा करदे और हमारे लिए अपनी ओर से किसी विशेष सहायक को भेज दे।*
*(क़ुरआन 4:75)*

इसके अतिरिक्त मुसलमानों के ऊपर युद्ध के नियम भी आवश्यक किए गए, जैसे-
*-युद्ध करो लेकिन बेईमानी न करना, ना गद्दारी करना, और ना किसी लाश का अनादर करना।*
(मुसनद अहमद 23418, जामे सग़ीर 1958)

*-यदि अत्याचारी लड़ाई से रुकना चाहे, तो युद्ध तुरंत रोक देने का आदेश है।*
(सुरः बक़र 2:190-193)

*-यदि युद्ध के बीच भी दुश्मन सेना की ओर से संधि का प्रस्ताव आए, तो चाहे मुस्लिम सेना का पलड़ा भारी हो, तब भी संधि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए।*
(सूरः अन्फाल 8:61)

*-युद्ध के बीच कोई दुश्मन सैनिक शरण मांगे तो उसे शरण देते हुए सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाए।*
(सूरः तौबा 9:6)

*-युद्ध में महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों, और मजदूरों की हत्या न की जाए।*
(सहीह मुस्लिम किताबुल जिहाद वस्सीर, अबू दाऊद किताबुल जिहाद)

*-कोई फलदार पेड़ ना काटा जाए, कोई फसल ना उजाड़ी जाए।*

*-शत्रु के धार्मिक स्थलों को और ना उनके धर्म ग्रंथों को कोई हानि पहुंचाई जाए, और ना ही उनके धर्मगुरुओं को मारा जाए।*
(अबू दाऊद किताबुल जिहाद, किताबुल खिराज)

*-शत्रु सेना के शहर की इमारतों को ना तोड़ा जाए, न उनके जानवरों को नुकसान पहुंचाया जाए।*
(अबू दाऊद किताबुल जिहाद, अबी यूसुफ 121)

*-जो सैनिक युद्ध करने आए सिर्फ उससे लड़े, युद्ध के बाद जो लोग घरों में है उनके साथ कोई दुर्व्यवहार ना किया जाए।*
(अबू दाऊद किताबुल जिहाद बाब फ़ी क़त्ल निसा व सहीहा अल्बानी)

(किसी देश को जीतने, अपनी सत्ता स्थापित करने, सीमाएं बढ़ाने, इस्लामी शासन लागू करने, किसी को बलपूर्वक इस्लाम कुबूल कराने के लिए शस्त्र उठाने की अनुमति नहीं है।)

*Part-2*

*सवाल-*
*क्या क़ुरआन में उसे काफिर  को मारने का आदेश मिला है   ?????*

ऐसा नहीं है कि सिर्फ क़ुरआन में ही ईश्वर विरोधी अत्याचारियों से युद्ध करने के लिए कहा गया है, यदि हम विश्व की बड़ी आबादी वाले ईसाई धर्म और हिन्दू धर्म की धार्मिक किताबो का अध्ययन करें, तो पता चलता है कि यहां भी ईश्वर विरोधी अत्याचारियों से इस्लाम से कहीं बढ़ चढ़कर युद्ध के विषय में लिखा है।

*हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार-*

जो लोग क़ुरआन की आयत *"अल्लाह काफिरो (अवज्ञाकारियों, नास्तिकों) का शत्रु है।"* पेश करके लोगों को भ्रमित करते है उन्होंने हिन्दू धार्मिक ग्रंथ पढ़े ही नहीं है।

वेदों के अनुसार-
*"ईश्वर नास्तिकों (काफिरों) का शत्रु है। जो ईश्वर की स्तुति नहीं करते, उनको वो नाश कर देता है।"*
(ऋग्वेद 8:2:14)

एक मुसलमान अत्याचारियों के विरुद्ध युद्ध क्यों करता है, जवाब वेदों में है-
*"मनुष्य को चाहिए कि वो कभी हिंसकों, एवं अत्याचारियों के वश में कभी ना हो।"*
(ऋग्वेद 8:2:15)

वेदों के अनुसार ईश्वर विरोधियों को कई प्रकार से मारने के विषय में लिखा है-

*"तू देवनिंदक पापी का सिर काट डाल*
*तेरे द्वारा मारे गए, नष्ट भ्रष्ट हुए दुष्टबुद्धि शत्रु को अग्नि जला दे।"*
(अथर्ववेद 12:5:60,61)

*"तू (देवनिंदक) को काट, अधिक काट, अच्छी प्रकार से काट, जला, अधिक जला, अच्छी प्रकार से जला।"*
(अथर्ववेद 12:5:62)

*"पापी देवशत्रु मानव का सिर और कंधे सौ नोक वाले क्षुर (उस्तरे) के समान धार वाले तीक्ष्ण वज्र से काट डाल।"*
(अथर्ववेद 12:5:64-67)

*"उस (देवशत्रु) के लोम को काट डाल, उसकी खाल उतार ले, उसके मांस को काट डाल, उसकी नसों को ऐंठ दे, उसकी हड्डियों को पीड़ा दे, उसकी मज्जा को नष्ट कर, उसके सब जोड़ो को ढीला करदे।"*
(अथर्ववेद 125:68-71)

ईश्वर विरोधी अत्याचारियों को सिर्फ काटने, मारने, जलाने की ही बातें नहीं लिखी बल्कि ये भी लिखा है कि उनके नगरों को नष्ट करदो उनके पशु, धन, भूमि को भी हड़प लिया जाए।

*"इंद्र शत्रु के नगरों को नष्ट करता है,"*
*"सैनिकों ने सोमरस पीकर उत्साह बढ़ाया, विजय प्राप्त की, और शत्रु के नगरों को तोड़ दिया।"*
(ऋग्वेद 9:61:1-3)

*"इंद्र शत्रुओं और उनकी नगरियों का नाशक है।"*
(ऋग्वेद 10:111:10)

*"उत्तम वीर पुरुष होकर शत्रु के धनों को जीतेंगे।"*
(ऋग्वेद 9:61:23)

*"शत्रु लोग निहत्थे हो जाए, उनके अंगों को हम शिथिल करते है, फिर हे इंद्र, उनके सब धनों को हम सैकड़ों प्रकार से आपस में बांट ले।"*
(अथर्ववेद 6:66:3)

जो हमारे हिन्दू भाई क़ुरआन के अनुसार युद्ध के बाद शत्रु सेना से प्राप्त माले ग़नीमत (युद्ध के बाद प्राप्त हुए धन) को गलत कहते है, वो वेदों की इन शिक्षाओं के विषय में क्या कहेंगे???

*"हे इंद्र...... शत्रुओं में भय उत्पन्न कीजिये, वे डर कर भाग जाए, और उनका गाय आदि धन हमें मिल जाये।"*
(अथर्ववेद 6:67:3)

*"(शत्रुओं पर विजयी होने के बाद) हमारे लिए घोड़े, गौवें, और सोने आदि सहस्रों प्रकार का धन प्राप्त हो।"*
(ऋग्वेद 9:61:3)

हिन्दू भाई बहनों में सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले ग्रंथ गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उभारते हुए कहते है-

*हे पृथानन्दन, अपने आप प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्ग के खुले हुए द्वार जैसा है, जो सौभाग्यशाली क्षत्रियों को ही प्राप्त होता है, युद्ध में मरकर या तो तुम स्वर्ग जाओगे, या विजयी होकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे, इसलिए हे कौन्तेय, तुम युद्ध के लिए निश्चय करके खड़े हो जाओ।*
(गीता 2:37)

दोस्तों, मैंने हिन्दू धार्मिक ग्रंथों से बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार हमें दुष्टों, अत्याचारियों का सामना करना है।
*"अत्याचार को रोकने और आत्मरक्षा के लिए शस्त्र उठाने की अनुमति देने वाले क़ुरआन की शिक्षाओं को जो हिंसक और मानवता विरोधी कहते है वो वेदों और गीता की शिक्षा के विषय में क्या कहेंगे???"*
अगली पोस्ट में बाईबल से जानेंगे।

*Part- 3*

*सवाल-*
*क्या क़ुरआन में उसे काफिर  को मारने का आदेश मिला है   ?????*

*जवाब-*

आज जिन लोगों ने इस्लाम के कानून "जिहाद" को आतंकवाद साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी उनमें अमेरिका और इस्राएल देशों के लोग सबसे ज़्यादा है। आज ये भी बुद्धिजीवियों से छिपा नहीं है कि किस तरह इन देशों ने इस्लाम के नाम पर खुद आतंकवादी खड़े किए, उन्हें हथियार पहुंचाए और उसके बाद "इस्लामोफोबिया" का खेल खेला।

*आइये जानते है कि, बाईबल के अनुसार जो ईश्वर विरोधी अत्याचारी है, उनके लिए युद्ध निर्देश क्या है-*

जब इस्राएली मिस्र में थे और वहां उन पर मिस्रियों द्वारा अत्याचार बहुत ज़्यादा बढ़ गया तब परमेश्वर ने मूसा नबी से कहा-

*"मैंने अपनी प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं उनके दुःख को निश्चय देखा है, और उनकी जो चिल्लाहट परिश्रम करानेवालों के कारण होती है उसको भी मैंने सुना है, और उनकी पीड़ा पर मैंने चित्त लगाया है। इसलिए अब मैं उतर आया हूँ कि उन्हें मिस्रियों के वश से छुड़ाऊँ, और उस देश से निकालकर एक अच्छे और बड़े देश में जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है, अर्थात् कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी लोगों के स्थान में पहुँचाऊँ।"*
(निर्गमन 3:6,7)

और उसके बाद जो युद्धों का सिलसिला शुरू हुआ, और उन युद्धों में क्या क्या हुआ, इसके  लिए बाईबल के कुछ वचन देखें-

*"फिर जब तेरा परमेश्‍वर यहोवा तुझे उस देश में जिसके अधिकारी होने को तू जाने पर है पहुँचाए, और तेरे सामने से हित्ती, गिर्गाशी, एमोरी, कनानी, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी नामक, बहुत सी जातियों को अर्थात् तुम से बड़ी और सामर्थी सातों जातियों को निकाल दे, और तेरा परमेश्‍वर यहोवा उन्हें तेरे द्वारा हरा दे, और तू उन पर जय प्राप्त कर ले, तब उन्हें पूरी रीति से नष्ट कर डालना, उनसे न वाचा बाँधना, और न उन पर दया करना।*
(व्यवस्थाविवरण 7:1,2)

पता चला कि बाईबल के अनुसार शत्��

*Part- 4*

*सवाल*
*क्या क़ुरआन में उसे काफिर  को मारने का आदेश मिला है   ?????*

*जवाब-*

दोस्तों, आपने क़ुरआन में पहले उन काफिरों (अवज्ञाकारियों) के बारे में जाना जिनसे जिहाद करने के लिए कहा गया है। अब दूसरे प्रकार के काफिरों के बारे में जानते है।
दूसरे प्रकार के काफिर वो है जो ईश्वर भक्त मुसलमानों से नहीं लड़ते, उनके लिए बुरी युक्तियां नहीं करते, परन्तु उनके साथ शांति से रहना चाहते हैं, उन काफिरों (गैर मुस्लिमों) के लिए क़ुरआन का साफ आदेश देखें-

*"जो लोग तुमसे तुम्हारे धर्म के बारे में नहीं लड़ते और न तुम्हें घरों से निकालते, उन लोगों (गैर मुस्लिमों) के साथ सद व्यवहार करने और उनके साथ न्याय से पेश आने से ख़ुदा तुम्हें मना नहीं करता, बेशक ख़ुदा इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है।"*
(सुरः मुमतहीना 60:8)

दोस्तों, क़ुरआन की यह एक आयत ही आपत्ति करने वालों के जवाब में बहुत है। लेकिन आपत्ति करने वाले कह सकते है कि-

*"क्या पैग़म्बर मुहम्मद (स०) और उनके सहाबा (अनुयायियों) ने इस आयत का पालन किया है?"*

जी हाँ, नबी और उनके अनुयायियों की तो पूरी ज़िंदगी ही ग़ैर मुस्लिमों के साथ भलाई करते बीती है। युद्ध तो उन्होंने सिर्फ अत्याचारियों से किए हैं, और अधिकतर तो उन्हें भी माफ ही किया है।
आइये इसके कुछ चंद नमूने मैं आपके सामने रखता हूँ।

*"एक दिन नबी ने देखा कि एक गैर मुस्लिम गुलाम आटा पीस रहा है और दर्द से कराह रहा है, आप उसके पास गए तो पता चला कि वो बहुत बीमार है और उसका मालिक उसको छुट्टी नहीं देता। नबी ने उसको आराम से लिटा दिया और सारा आटा स्वयं पीस दिया, और कहा, "जब तुम्हें आटा पीसना हो तो मुझे बुला लिया करो।"*
(सहीह अब्दुल मुफ़रद 1425)

*"एक देहाती ने मस्जिद में पेशाब कर दिया, लोग उसे पीटने के लिए दौड़े, तो नबी ने उनको रोक कर कहा-" इसे छोड़ दो और इसके पेशाब पर पानी डाल दो इसलिए कि तुम सख्ती करने वाले नहीं, आसानी करने वाले ब�

*Part- 5*

*सवाल*
*क्या क़ुरआन में उसे काफिर  को मारने का आदेश मिला है   ?????*

*जवाब-*

जब भी इस्लाम को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाने वालों की बात आती है, उनमें सबसे ज़्यादा नाम यहूदियों का आता है। यहां तक कि बहुत से मुसलमानों के दिल में ये बात बैठ गई है कि हमें यहूदियों से कोई वास्ता रखना ही नहीं है।
उन लोगों का ऐसा सोचना कितना ठीक है, इसके लिए हमें नबी मुहम्मद (स०) और उनके सहाबा की ज़िंदगी को देखना होगा।

*इस्लाम में यहूदियों के साथ नेक व्यवहार (अच्छा सुलूक) करने का हुक़्म-*

क़ुरआन का सही प्रकार से अध्ययन करने से हमें पता चलता है कि जो यहूदी इस्लाम का उपहास उड़ाते या मुसलमानों को अपना स्वंय ही दुश्मन बनाते है, सिर्फ उनसे अल्लाह ने दोस्ती करने को मना किया है।
*(देखें क़ुरआन 5:57-59)*

इसके अतिरिक्त यदि नबी मुहम्मद (स०) के और आपके सहाबा के जीवन पर दृष्टि डाले तो आपने पूरी ज़िंदगी यहूदियों के साथ नेक व्यवहार किया है। इसके कुछ उदाहरण में आपके सामने पेश करता हूँ-

*"नबी को कोई यहुदी अपने घर खाने की दावत देता तो आप उसे कुबूल करते और उसका पेश किया खाना खाते।"*
(तफ़्सीर इब्ने कसीर, सूरः माएदा, आयत 8)

*"यहूदियों के यहाँ अगर कोई बच्चा भी बीमार होता तो नबी उसकी ख़ैरियत पूछने जाते।"*

*"यहूदियों की मय्यत भी शहर की गलियों से निकलती और नबी यदि वहां बैठे होते तो मय्यत को देखकर खड़े हो जाते ताकि उनके साथ हमदर्दी का प्रदर्शन हो।"*
(बुखारी, किताबुल जनाइज़, मुस्लिम किताबुल जनाइज़)

कोई यहूदी अगर नबी को बद्दुआ भी देता तो आप उससे नर्मी से पेश आते।

*"यहूदियों का एक गिरोह आया और शरारत से नबी को अस्सामु अलैकुम कहा जिसका अर्थ है तुम पर हलाकत हो। हज़रत आइशा ने तुरंत जवाब दिया कि तुम्हारे ऊपर हलाकत और लानत हो परन्तु नबी ने समझाया- ऐ आइशा! बेशक अल्लाह हर बात में नर्मी को पसन्द करता है।"*
(बुखारी, किताबुल अदब)

अंदाज़ा लगाएं यहूदी हला��

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