*होली का रंग और दीवाली के पटाखे क्या शिर्क है*
छोटी छोटी बातों पर दोज़ख़ की ऐसी भयंकर सज़ाओं का डर फैलाते हैं कि एक सादा व्यक्ति आतंकित होकर ही रह जाता है. अगर इस्लाम की भली बातों का ज़िक्र ही ज़्यादा किया जाए तो बन्दा खुद ब खुद इस्लाम की तरफ लपकेगा. होली के रंग या दिवाली के पटाखों से इस्लाम को खतरा नहीं है, आप इस्लाम में बने रहके भी इन खेलों में हिस्सा ले सकते है।
गैरइस्लामी त्योहारों में आनन्द लेने के लिए कुछ खेलकूद के रिवाजों को बनाया गया होता है, किसी भी कल्चर में जिन रिवाजों का सम्बंध पूजापाठ से न हो, बल्कि ज़्यादा सम्बन्ध क्षेत्रीय रहन सहन रुचि और संस्कृति से हो, इस्लाम इंसान को ऐसी मुबाह और तफरीही चीज़ों से काटने का पैरोकार नही है, बल्कि इस्लाम सिर्फ इंसान के अक़ीदे को कुफ्र और शिर्क से पाक करने और हराम ठहराए गए कामों से रोकने का पैरोकार है,
मदीना के लोग जब इस्लाम नही लाये थे उनके यहां दो सालाना त्यौहार मनाए जाते थे जिसमें ये लोग खेलते नाचते और गाते बजाते थे, बाद में जब नबी सल्ल० वहां पहुँचे तो वहां के मुसलमानों को बताया कि इनसे बेहतर दो त्योहार अल्लाह की तरफ से तुम्हे दिए गए हैं,
बुख़ारी और मुस्लिम से पता चलता है कि मदीना में एक ईद (ईद का शाब्दिक अर्थ कोई भी त्योहार है, अरबी में गैरमुस्लिम त्योहारों के लिए भी ईद का शब्द प्रयोग किया जाता था) के दिन माँ आयशा रज़ि० के घर में दो अंसार लड़कियां गैरइस्लामी दौर का "बुआत की जंग" का गीत गा रही थीं और कोई वाद्ययंत्र बजा रही थीं, हज़रत आयशा उन्हें सुन रही थीं, और नबी सल्ल० उनके घर में मुँह दूसरी ओर करके लेटे हुए थे, जब आयशा रज़ि० के पिता अबूबक्र रज़ि० घर में आये तो क्रोध करने लगे, तब नबी सल्ल० ने हज़त अबूबक्र रज़ि० को रोक दिया और उन लड़कियों को गाने बजाने दिया,
फिर इस दिन हब्शी लोग ढाल और भालों के साथ करतब दिखाने का खेल करते थे, नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा को उनकी इच्छा पर ये करतब भी उनका दिल भर जाने तक दिखाए और करतब दिखाने वालों का उत्साह भी ये कह कहकर बढ़ाते रहे "ओ बनी अफरीदा, लगे रहो" (सही बुख़ारी, किताब-15 हदीस नम्बर-70)
एक दूसरी हदीस ये कहती है कि उस दिन कोई इस्लामी ईद थी, ख़ैर, हो सकता है ईद इस्लामी ही हो, लेकिन त्योहार मनाने के ये रिवाज़ इस्लामी नही हैं, ये रिवाज़ पहले से मनाए जाते रहे गैरइस्लामी त्योहार के थे, तो क्या त्योहार की खुशी मनाने के इन गैरइस्लामी रिवाज़ों गाना बजाना सुनने, और कलाबाजी देखने से नबी सल्ल० ने हज़रत आयशा रज़ि० को दूर रहने का हुक्म दिया ?? नही, बल्कि उन्होंने खुद उन्हें वो खेल तमाशे दिखाए, और खेल दिखाने वालों का उत्साहवर्धन भी करते रहे.... क्योंकि उन खेल तमाशों, गीत वगैरह का ताल्लुक आनन्द लेने से था शिर्क और कुफ्र से नही था.
वैसे पूरा वृतांत पढ़ने से तो यही लगता है कि उपरोक्त हदीस में कोई गैरइस्लामी त्योहार था, पर ये तर्क दिया जा सकता है कि उस दिन इस्लामी ईद थी, इस्लामी त्योहार पर मनोरंजन के काम कर सकते हैं, लेकिन जिस दिन गैरमुस्लिम त्योहार मना रहे हों उस दिन उनसे अलग दिखने के लिए आपको उनके किसी भी रिवाज़ में पार्टिसिपेट नही करना चाहिए, ताकि वो अपने शिरकिया अक़ीदे पर मुतमईन न हों
पर जब हम बुख़ारी, किताब-55, हदीस-609 पर ये हदीस पढ़ते हैं कि जब नबी सल्ल० मदीना आये तो यहां यहूदियों को दसवीं मुहर्रम का रोज़ा इस ख़ुशी में रखते देखा कि उस दिन हज़रत मूसा को फ़िरऔन से बचाया गया था, तो आप सल्ल० भी इस दिन रोज़ा रखने लगे कि हम तो मूसा अलैहिस्सलाम के ज़्यादा क़रीब हैं, ये रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ होने से पहले की बात है, पर क़ुरआन में अल्लाह की तरफ से न मुहर्रम के रोज़े का हुक्म रमज़ान के फ़र्ज़ होने के पहले आया था और न रमज़ान के बाद में आया,
ये एक ऐच्छिक रोज़ा है मुसलमान के लिए, वैसे ये तो इस्लाम में एक धार्मिक रिवाज़ पैदा करने की मिसाल है जिसका अधिकार सिर्फ़ नबी सल्ल० को था,
पर इस मिसाल से ये भी साबित होता है कि गैरमुस्लिमों के त्योहारों का बायकाट, और उनके त्योहारों पर उनके हर रिवाज से इसलिये विरक्त रहना कि कहीं उन्हें अपने शिरकिया मज़हब में बने रहने का बढ़ावा न मिले, ये नबी सल्ल० की सुन्नत से साबित नही होता,
बल्कि उस मौके पर नबी सल्ल० ने अपनी ये कोशिश की कि इस्लाम और यहूदियों में समरुपता को उभारा जाए जिससे गैरमुस्लिमों के दिल में भी मुस्लिमों के लिये जगह बने, एकता और प्रेम बने।
निस्संदेह इस हदीस से हम ये सीख ले सकते हैं कि गैरमुस्लिमों के त्योहार पर किसी ग़ैरधार्मिक गतिविधि में अगर हम सौहार्द के उद्देश्य से भाग ले लेते हैं तो ये गुनाह नही है
इस्लाम हमें नेक आदत वाले गैरमुस्लिमों से अच्छे रिश्ते बनाने का, उनके साथ नेक सुलूक और अच्छे ढंग से बातचीत करने का ही हुक़्म देता है, कुफ़्र और शिर्क या हराम के कामों को छोड़कर सब जगह नेक गैरमुस्लिमों के साथ रहने की इजाज़त मुसलमान को है, .
हमारे यहाँ होली और दीवाली इन दोनों त्योहारों के ख़ास रिवाज़ यानी रंग खेलना और आतिशबाजी करना ये रिवाज इंसान ने अपनी ज़ाती ख़ुशी को बढ़ाने के लिये ईजाद किये हैं, ये रिवाज़ उनकी पूजा का हिस्सा नही हैं, और पता ये भी चलता है कि ये रिवाज़ शुरू में इन त्योहारों में थे भी नहीं, इन खेलकूद के रिवाज़ों को वर्तमान रूप मुस्लिम बादशाहों और सूफ़ी सन्तों द्वारा ही दिया गया है,
गौर करें तो इन त्योहारों का ताल्लुक किसी एक मज़हब से भी नही है, बल्कि भारत की ज़मीन के कल्चर से है, ये किसी एक मज़हब से जुड़े त्योहार होते तो इन्हें सिर्फ़ एक मज़हब के ही लोग मनाते, लेकिन होली और दिवाली सिर्फ हिन्दू नही बल्कि सिख भी, जैन, आदिवासी और भारत के कई समुदायों के लोग अलग अलग कहानियां इन त्योहारों के पीछे मानकर, मनाते है, मतलब ये कि इस खास त्योहार को अपने से जुड़ा बताने के लिए लोगों ने अलग अलग कहानियां बाद में इस त्योहार पर फिट कर दी हैं
विशेषज्ञों की ये मान्यता है कि ये दोनों त्योहार मूलतः भारत के किसानों के त्योहार थे, होली रबी की फसल तैयार होने का और दिवाली खरीफ की फसल काटने का त्योहार है,
जब हम किसी गैर मुसलमान के त्यौहार में शरीक हो या उसे बधाई दे तो बस दो बातों ख्याल रखना चाहिए कि एक उसमे कोई शिरकीया काम नही करना और दूसरा उसमे कोई गैर अख़लाक़ी काम या हराम काम नही करना है। बाकी जो क़ुरान के बताए हराम हलाल के नियम है वो हर जगह हर समय लागू है (सूरह अल अराफ में)। वैसे किसी भी गैर ज़रूरी काम (क्या ज़रूरी है क्या नही, वो आप का निर्णय है) से बचना और किसी भी जायज़ काम मे ज़्यादती से बचाना या उसमें हद पार करने से बचना तो बहुत फायदे का सौदा है। पर बचना ही है ये कोई स्थायी नियम या ज़रूरी नहीं है।
ये वही क़ौम और उलेमा है जो कभी न्यूमेरिकल साइंस, प्रेस, घड़ी से नमाज़ टाइम देखना, लाउडस्पीकर से अज़ान, स्कूल-यूनिवर्सिटी, वेस्टर्न एजुकेशन, फोटो, वीडियो, टीवी, फिलोसॉफी और पता नही क्या क्या हराम कह चुके थे।
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भक्त प्रहलाद और हज़रत इब्राहीम
होलिका दहन - हिरणकश्यप और प्रहलाद.
आतिश-ए-नमरूद (नमरूद की आग) और हज़रत इब्राहीम.
हिरणकश्य एक बलशाली राजा था जो वह स्वयं को ही ईश्वर मानवाने लगा था।
नमरूद भी एक ताकतवर बादशाह था जो खुद को ही खुदा मनवाने लग गया था।
प्रहलाद का अपने पिता हिरण्यकश्यप के साथ ईश्वर की अवधारणा को लेकर मतभेद था तो वहाँ हज़रत इब्राहीम का अपने पिता आज़र साथ भी ईश्वर की अवधारणा को लेकर मतभेद था।
प्रहलाद के ऊपर उसके पिता यानि उस वक़्त के शासक हिरण्यकश्यप ने बड़े अत्याचार किये थे, उनको जीवित ही अग्नि में झोंक दिया था। ऐसा ही उस वक़्त के शासक बादशाह नमरूद ने भी हज़रत इब्राहीम के साथ भी किया और आग में डाल दिया था।
पर दोनों ही ईश्वर की कृपा से बचा लिए गये. नमरूद और हिरण्यकश्यप दोनों का अंत ईश्वर के दंड के परिणामस्वरुप हुआ था.
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पप्रहलाद और इब्राहीम
भक्त प्रहलाद और हज़रत इब्राहीम, दोनों ही लड़कपन की उम्र में थे जब उन्होंने अपने समुदाय में की जा रही झूठे भगवानों की पूजा का विरोध किया, और सच्चे ईश्वर की भक्ति करने की बात की।
हज़रत इब्राहीम के पिता आज़र और प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप, दोनों ही अपने पुत्रों के सख़्त दुश्मन बन गए थे।
भक्त प्रहलाद और हज़रत इब्राहीम दोनों ही को सच्चे ईश्वर की भक्ति के दण्ड स्वरूप मार डालने के अनेक प्रयास किये गए, उनमे भी साम्यता है, प्रहलाद को हिरण्यकश्यप ने हाथियों से कुचलवाने, व नागों से डसवाने के प्रयास किये, लेकिन भक्त प्रहलाद आश्चर्यजनक रूप से इन सभी वारों से बच गए, इसी प्रकार कहा जाता है कि हज़रत इब्राहीम के पैतृक समुदाय के शासक नमरूद ने हज़रत इब्राहीम को मार डालने के लिए उनको भूखे शेरों के पिंजड़े में डाल दिया था, लेकिन शेर बजाय बालक इब्राहीम को खाने के, उन्हें दुलार से चाटने लगे।
खुद को भगवान कहलाने वाला खलनायक हिरण्यकश्यप भक्त प्रहलाद का पिता था, और प्राचीन यहूदी साहित्य बताता है कि खलनायक नमरूद भी रिश्ते में इब्राहीम का पूर्वज होता था, नमरूद भी खुद को भगवान कहलाता था।
भक्त प्रहलाद और नबी इब्राहीम, दोनों ही को ये कहते हुए खलनायकों ने भयंकर आग में डाल दिया था कि अगर तुम्हारा ईश्वर इतना ही शक्तिशाली है, तो इस आग से तुम्हें बचाकर दिखाये... फिर उनके तमाम समुदाय ने देखा था कि जिस भयानक आग ने न जलने वाली चीज़ों को भी भस्म कर डाला था, उस आग से वो किशोरवय नायक इस तरह बिलकुल सुरक्षित निकल आये थे कि उनके शरीर पर आग के प्रभाव को छोड़िए, उनके कपड़ों तक पर कोई दाग धब्बा न आया था।
लेकिन इस महान चमत्कारिक घटना को देखने के बावजूद दोनों नायकों ही का विरोध उनके समुदाय में खत्म न हुआ, ये भी एक समानता है।
आज़र और हिरण्यकश्यप, दोनों ही अपने पुत्रों की हत्या कर डालना चाहते थे, इसके बावजूद उनके पुत्रों ने अपने ईश्वर से अपने पिता की भलाई की दुआ मांगी थी।
समानता कथा के सारांश में भी है कि भक्त और भगवान के बीच सीधा संबंध होता है, और जो भक्त ईश्वर में सच्ची आस्था रखता है, ऐसे भक्त का कोई शत्रु कुछ अहित नही कर सकता, बल्कि ईश्वर अपने सच्चे भक्त की हर संकट में सहायता करता है।
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हज़रत यूसुफ़ और श्री राम चन्द्र
हमारी कहानी के नायक के ही पूर्वज थे मनु जिन्होंने जल प्रलय के समय नौका में तमाम जीव जंतुओं को रखकर जीव जगत को पृथ्वी से मिटने से बचाया था, इन नौका वाले महानायक से ही संसार में मनुष्यों के सारे वंश चले, एक वंश चला प्रतिष्ठित नायक का जिनके नाम का प्रथम अक्षर "इ" मध्य में "शा" या इसके स्वर से मिलता जुलता अक्षर आता था, और अंतिम अक्षर "क" था।
हज़ारों वर्ष पूर्व कहीं किसी राज्य में एक बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, उनके एक से अधिक पत्नियों से कुछ पुत्र थे, परन्तु सबसे ज़्यादा प्रेम उन्हें उस पुत्र से था जो हमारी कथा का नायक है। लेकिन ऐसे सम्बन्धों के बीच किसी एक बेटे से असामान्य प्रेम के नतीजे में अन्य हिस्सेदारों में ईर्ष्या उपजती है। फलस्वरूप सौतेले भाइयों को पिता की ओर से ज़्यादा जायदाद मिले इसके लिये षणयंत्र करके पिता के उस चहीते पुत्र को एक भयावह जंगल में छोड़ आया जाता है और ये पुत्र अनेक वर्षों के लिये अपने परिवार से बिछड़ जाता है। इसको अत्यधिक प्रेम करने वाले पिता पुत्र वियोग में इतना रोते हैं कि अंधे हो जाते हैं,
इधर वन से निकल कर होनी हमारे नायक को एक ऐसे राज्य में पंहुचा देती है जहाँ नायक के लिये और नई समस्याएं इंतज़ार कर रही होती हैं। होता ये है कि हमारा नायक बहुत ज़्यादा सुंदर था, इतना ज्यादा कि उसे देखकर कोई भी स्त्री मोहित हुए बिना न रहती, सो राज परिवार की एक प्रभावशाली विवाहिता स्त्री, जिसके नाम का अंतिम अक्षर "खा" था, वो नायक पर मोहित हो गई, और एकांत में नायक के आगे प्रणय निवेदन करने लगी, नायक को व्यभिचार के लिये मजबूर करने की कोशिश करने लगी, मगर नायक धर्म की मर्यादाओं की रक्षा करने वाला उत्तम पुरुष था, नायक ने उस स्त्री के अनुचित प्रणय निवेदन को ठुकरा दिया। उस स्त्री को इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी नाक कटने जैसा क्षोभ हुआ और उसने राज्य के शासक को मजबूर किया कि वो नायक के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करे, शासक उस स्त्री की बातों में आकर हमारे नायक के विरुद्ध हो गया जिस कारण हमारे नायक को फिर वर्षों कष्ट उठाने पड़े। पर अंततः जिस राज्य ने हमारे नायक को वर्षों कष्ट दिए, कथा के अंत में हमारे नायक को उसी राज्य के राजदरबार में सर्वोच्च स्थान मिल जाता है, और उनका अपने बिछड़े हुए परिवार से पुनर्मिलन भी हो जाता है और इस तरह कथा का सुखान्त होता है !
ये कहानी महर्षि मनु (नौका वाले) के वंशज राजा "इक्ष्वाकु" के वंश में जन्मे मर्यादा पुरूषोत्तम राम की लगती है ? राम जी को ही उनके सौतेले भाई को राज्य का उत्तराधिकार दिलाने के लिये षणयंत्र करके वन वास भेज दिया गया था, और पुत्र वियोग में उनसे बहुत ज़्यादा स्नेह करने वाले पिता दशरथ का रो रो कर बुरा हाल हो गया था। वन में ही लंका के राजा रावण की बहन "शूर्पणखा" था वो राम जी पर मोहित हो गई थी, पर राम जी ने उसका प्रणय निवेदन ठुकरा दिया, तो अपनी नाक कटने का बदला लेने को उसने अपने भाई रावण को उकसाया था।
मगर मैंने तो नौका वाले हज़रत नूह के वंश में हुए "इस्हाक़" जिनको बाइबिल में "इशाक" कहा जाता है, की बात की थी न कि "इक्ष्वाकु" की। मैंने इस्हाक़ के वंश में हुए नबी यूसुफ़ की कहानी सुनाई थी, न कि राम जी की।
बाइबिल में इशाक के नामकरण की कहानी ये है कि इशाक के आगामी जन्म की भविष्यवाणी सुनकर उनकी बूढी माता अविश्वास से हंसी थीं, और जन्म के बाद इसी हंसी के कारण बालक का नाम "इशाक" रखा गया ! उधर इक्ष्वाकु का नामकरण यूँ हुआ कि उनके जन्म का कारण उनके पिता की छींक थी, तो इसी छींक पर बालक का नाम "इक्ष्वाकु" रखा गया। मुख की क्रियाओं पर एक जैसे नाम।
इब्राहीमी धर्मो के एक महत्वपूर्ण नबी हज़रत यूसुफ़ की कहानी सुना रहा था मैं। जिनके पिता याकूब पुत्र वियोग में अंधे हो गए थे, न कि मैंने राजा दशरथ की बात की जिनको "पुत्र वियोग दो अंधे लोगों के श्राप के कारण हुआ था"। और हाँ हज़रत युसूफ पर मोहित होने वाली स्त्री का नाम शूर्पणखा नही बल्कि "ज़ुलैख़ा" था।
रामायण में शुर्पनखा राम जी के आगे विवाह प्रस्ताव रखती है, लेकिन ज़ुलैख़ा केवल अनैतिक सम्बन्ध की मांग करती है। हज़रत युसूफ का ज़ुलैख़ा की मांग ठुकराना तो समझ आता है पर राम जी ने राजकन्या शुर्पनखा जिसका कोई पति न था, का वैध "विवाह प्रस्ताव" क्यों ठुकराया ये समझ नही आता। राक्षस कुल में विवाह होने के कई उदाहरण हैं पौराणिक ग्रन्थों में जैसे भीम और हिडिम्बा का प्रसिद्ध उदाहरण।। या स्वयं रावण और शुर्पनखा के ब्राह्मण पिता विश्रवा और राक्षसी माता कैकसी का उदाहरण है।
वाल्मीकि रामायण में राम जी के एकपत्नी व्रत का कहीं कोई उल्लेख नहीं है बल्कि उस समय में बहुपत्नी एक कॉमन चीज़ थी, राम के पिता दशरथ की ही तीन पटरानियां और अन्य कई पत्नियां थीं, फिर वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के 8 वें सर्ग के 12 वें श्लोक में राम सीता के विवाह के कुछ समय बाद राम के राज्याभिषेक को रोकने के लिये मन्थरा कैकयी से कहती है कि यदि राम राजा बन गए तो राम की पत्नियां तुम्हारी बहुओं पर हुक्म चलाएंगी, कैकयी मन्थरा की इस बात का कोई विरोध नही करतीं, जिससे स्पष्ट है कि राम के सीता से विवाह के बाद भी उनकी अन्य पत्नियों के होने की राम का परिवार अपेक्षा कर रहा था और ऐसा संभव नही है कि राम जी ने कोई एक पत्नी व्रत लिया हो और उस व्रत के बारे में उनके परिवारजनों को ही पता न हो।
हज़रत यूसुफ़ प्राचीन मिस्र में हुए एक नबी थे, इनका भी एक समुदाय था, वो समुदाय कहाँ गया? प्राचीन ग्रन्थ और लोगों के दावों के अनुसार इस समुदाय के लोग मिस्र से निकल कर इज़राइल अफगानिस्तान और वर्तमान पाकिस्तान तक के क्षेत्रों में फैल गए। हर नबी के समुदाय की तरह इनमे से भी बहुत से अपने नबी की पहचान भूलते चले गए.
मिस्र का इतिहास कहता है कि मिस्र में नूह अलैहिस्सलाम के बेटे हाम की संतानें आबाद हुईं, यहूदी ग्रन्थ में हाम के एक बेटे "कुश" और कुश के पुत्र "रामा" का नाम दीखता है। हालाँकि युसूफ हाम की नही बल्कि हाम के बड़े भाई "साम" की नस्ल से थे, पर यूसुफ़ जा बसे मिस्रियों के बीच तो मिस्रियों में ही उनका समुदाय बना। इस समुदाय के लोगों ने कुछ सौ वर्षों बाद आ रहे भटकावों के साथ युसूफ की कहानी में अपनी प्राचीन परम्पराओं और नामों को कब गड्डमड्ड कर दिया होगा, कहा नही जा सकता।
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Krishna=Musa=Moses
एक ही व्यक्ति के भिन्न भिन्न भाषाओं में भिन्न भिन्न नाम। पर जीवनी और कथा एक।
श्री कृष्ण की कथा जैसी कथा, एक नबी की क़ुरआन में भी मौजूद है और एक प्रोफेट की इंजील (बाइबिल) व तौरेत (तोराह) में भी। जिसे मुसलमान हज़रत 'मूसा' कहते है। और क्रिश्चियन और ज्यूस (यहूदी), उन्हें मोज़ेज़ (Moses) कहते है।
क्रूर शासक कंस को आकाशवाणी बताती है कि बहन देवकी का पुत्र कंस का काल बनेगा। ये सुनकर कंस, बहन और जीजा को बंधक बना लेता है। उनके जितने भी पुत्र जन्मते हैं उन्हें मार डालता है। एक प्रकरण ये भी है कि देवकी और वसुदेव से सहानुभूति रखने वाले अन्य लोगों के शिशुओं को भी मारा गया ताकि गुप्त रूप से कोई उनके नवजात को अपने पास रखना चाहे तो भी नवजात न बचा पाये।। लेकिन जब कृष्ण जी के जन्म का समय आया तो काराग्रह के सारे पहरेदारों को मूर्छा आ गई। वसुदेव ने नवजात बालक को टोकरी में डाला और काराग्रह के खुल चुके द्वारों को पार करते हुए, नदी के पार कृष्ण जी को अपनी दूसरी पत्नी के पास छोड़ आए। जब कृष्ण जी युवा हुए तो एक दिन अपने भाई बलराम के साथ मथुरा आये और कंस का अंत कर दिया।
क़ुरान, बाइबिल और तोराह के अनुसार..
इस्राइल वासियों पर फ़िरऔन (राजा) अत्याचार किया करता था। पुरोहितों ने भविष्यवाणी कि इस्राइली लोगों में एक लड़का जन्म लेने वाला है जो फ़िरऔन के अंत का कारण बनेगा। फ़िरऔन भी इस्राईल में जन्मते लड़कों की हत्या करवाने लगा। जब हज़रत मूसा जन्मे तो उनके माँ बाप ने उन्हें टोकरी में डाल कर नदी में बहा दिया। हज़रत मूसा की बहन उस टोकरे को छुपकर देखती रही कि वो कहाँ पहुंचता है। ये टोकरी फ़िरऔन की ही एक पत्नी के हाथ लगती है (बाइबल के मुताबिक फ़िरऔन की बेटी के)। वह निस्संतान थी, उसने फ़िरऔन से बच्चा पालने की प्राथना की। फ़िरऔन को खबर नही थी कि ये बच्चा इसरालियों का हो सकता है सो मूसा अपने ही दुश्मन के घर पलने लगे। युवा होते होते मूसा ने फ़िरऔन के इसराइलियों पर अत्याचारों का विरोध करना शुरू किया जिसमें बाद में उनके जैविक भाई हारून भी मदद करने लगे। और आख़िरकार फ़िरऔन मूसा और इस्राइलियों की हत्या के इरादे से पीछा करता है और समुद्र में डूबकर मारा जाता है।
मूसा और कृष्ण जी, दोनो राजकुमार के तौर पर पल रहे थे लेकिन चरवाहे का काम भी करते थे।
मूसा के किस्से में उनके कज़िन "कारून" का ज़िक्र आता है जो बेहद धनी है लेकिन मूसा के विरूद्ध था। कृष्ण जी का एक कज़िन ब्रदर "करण" है। वो। भी बेहद धनी है और कृष्ण जी के विरुद्ध है।
करण को पृथ्वी ने श्राप दिया था जिसके फलस्वरूप युद्ध में उसके रथ का पहिया ज़मीन में धंस गया था जिसके कारण करण का अंत हुआ। क़ारून ने हज़रत मूसा पर व्यभिचार का अभियोग लगाया था जिससे क्षुब्ध होकर मूसा ने उसे श्राप दिया था और क़ारून ज़मीन में धंस गया था और उसका अंत हो गया था।
मुसा के वंशज खुद को एक प्रतापी राजा "यहूदा" के कारण यहूदी कहते है यानी मूसावंशी नही कहलाये गए।
कृष्ण जी का वंश, एक प्रतापी राजा "यदु" के कारण "यादव" कहलाता है यानी कृष्णवंशी नही कहलाये गए।
मूसा ने अनुयायियों को नमाज़ पढ़ने की शिक्षा दी।
कृष्ण जी नअनुयायियों को योग की शिक्षा दी और योगीराज कहलाए। योग और नमाज़ मूलतः ईश्वर की साधना का साधन है। जिसमे शारीरिक और मानसिक अभ्यास है।
चारों में समानताएं और भी है, पर वो बाकी फिर कभी और। चारो धर्मों में इनकी कथा का वर्णन लगभग एक जैसा ही है।
वो एक निराकार ईश्वर, मनुष्यों के मार्गदर्शन और उद्धार के लिए, अपने ईशदूत इस पृथ्वी पर भेजता रहा है। प्रत्येक ईशदूत की तरह, मूसा, मोज़ेज़ या कृष्ण जी ने भी अंतिम दिन और महाप्रलय की भविष्यवाणी की है जिसके बाद, वो एक अजन्मा-अमर ईश्वर, अपने दिए आदेशों और अच्छे बुरे कर्मों के अनुसार नरक और स्वर्ग का निर्णय करेगा। क्योंकि उसका धर्म तो एक ही है जिसके लोगों ने टुकड़े कर लिए है।
हज़ारों साल पहले जब लेखन और उसे सहेज कर रखना सरल नही था। तब ईशदूतों की कहानियां कहते कहते एक से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती रहीं जिसमे लोग अपने अनुसार जोड़ घटा करते रहे। कहानिया भी थोड़ी बदलती रही। भाषाओं में नाम भी बदलते रहे। आज भी हर आदमी एक बात को अपने अनुसार अपने शब्दों में, अपनी याददाश्त के मुताबिक आगे किसी और को बताता है।
ऐसे ही अलग अलग धर्मों में आये ईशदूतों के नाम और कथाएं काफी समान है। जिनके नाम है:-
प्रथम पुरूष अर्थात आदिम या आदिपिता (वेदों, पुराणों में), आदम (क़ुरान में), एडम (बाइबल और तोराह में)!
प्रथम स्त्री अर्थात शतरूपा या हवव्यवती (पुराणों वेदों में), हव्वा (क़ुरान में), ईव (बाइबिल और तोराह में)।
महाजलप्लावन वाले वैवस्त मनु या न्यूह (वेदों में), नूह (क़ुरान में), नोहा (बाइबिल और तोराह में)।
अबिराम (पुराणों में), इब्राहिम (क़ुरान में), अब्राहम (बाइबिल और तोराह में)।
ईशा (पुराणों में), ईसा या मसि (क़ुरान में), यीशू या जीसस (बाइबिल में)!
पर इनकी कथाएं कभी और।
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वेदों के देव
अवेस्ता में enemy के तौर पर आए हैं और असुरों की प्रशंसा की गई है।
वहीं वेदों में असुर देव विरोधी रूप में आए हैं और देवो की प्रशंसा की गई है।
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*असूर* जिन्हें यहुदी Asshur लिखते है ये पैगंबर नूह (अ) का पोता और 'साम' का बेटा था.जिन के नामपर पहले शहर बना और फिर राष्ट्र.
*आर्य* जो दरअसल नूह (अ) का दुसरा पोता 'मादी' जिन्हे यहुदी Madai लिखते है की वंश से है.आर्य संबंधवाचक विशेषण है.इनका संबध *उर* शहर की अग्नी पूजा से रहा है इसलिए जब यह लोग *खोरासन* (अफगानीस्तान) पहुंचे तो यह आर्य कहलाऐं जो उस वक्त इराण का हिस्सा था.
इन सामी और याफ्त की नसलों में बहोत युद्ध हुवे है.यही से *देव* और *असूर* का टकराव है.
तूफान नूह (अ) के बाद आबाद हुई पहली बस्ती जो आज Nakhchivan यानी Azerbaijan के पडोस का डेडलाॕक छोटा सा मुल्क था. वो *देवभूमी* कहलाता था.इसलिए की वो अल्लाह के अजा़ब से बचे हुवे नेक लोगों की बस्ती थी.वहा के कबिला प्रमुख देव और वो बस्ती से बाहर नई जगह की तलाश में भटकनेवाले सामी नसल के लोग *असूर* थे.
यहा से देव और असूर शब्द और युद्ध की शुरवात है.फिर आगे इनके ग्रंथो में असूर का इस्तेमाल सब विरैधीयों के लिए मिलता है.
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*असूर* यह तौराह की वंशावली में नाम है.
हजरत नूह (अ) के चार बेटे थे.
१) साम Shem
२) हाम Ham
३) याफ्त Japeth
३) यम
यम काफीर था जो तूफान में डुबकर मर गया. तूफान के बाद जब कश्ती जूदी (आरारात) पहाडपर रूकी तो पहली बस्ती उसी पहाड के दामन मे बसाई गई.
अरबी इतिहासकार इमाम *तिबरी* का बयान है की नूह (अ) ने जमीन को अपने तीन बेटों में विभाजीत किया.
*साम* को मध्य एशिया यानीसिरीया,अरब,इराक,दरया-ए- नील का पूर्वी भाग, सेहोव, जेजोह और आसपास की इत्यादी जमीन दी.इनको साम वंशिय (semantics)लोग कहा जाता है.अरब,सिरीया,इराक,इराण के लोग इस नसल से है.
*हाम* दरया-ए-नील का पश्चिमी की तरफ की जमीन दी. (Egyptian यानी मिसर की पुरानी संस्कृती इन्ही के वंश से है.
आफ्रिकन लोग इस नसल से है.
*याफ्त* को दरया-ए-फेशो और उसके एतराफ का भाग दिया.तुर्की,मंगोलीया,रशिया,युरोप ये सब इस नसल से है.
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1️⃣ पैगंबर नूह (अ) का बेटा *साम* उनके 5 बेटे थे.
१) इयलाम Elam
२) असूर Asshur
३) अरफ्सद Arphaxad
४) लूद Lud
५) अराम Aram
2️⃣ पैगंबर नूह (अ) का बेटा *याफ्त* उनके 7 बेटे थे.
१) जमर Gomer
२) माजूज़ Magog
३) मादी Madai 🟢
४) यावान Javan
५) तोबल Tubal
६) मस्क Meshech
७) तबरास Tubras
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पौराणिक प्रलय- मिथक या इतिहास ?
दुनिया के सभी प्रमुख धर्म ग्रंथो में ऐसी मान्यता है की में प्राचीन काल में ‘ प्रलय’ आई थी। इसी प्रलय को हिन्दू धर्म ग्रंथो में ऐसा वर्णन है की मनु ने एक बेडा बनाया और उसमे दुनिया के सभी जीव जंतुओं को एकत्रित किया और उन्हें प्रलय के प्रकोप से बचाया , बाद में इन्ही बचे हुए प्राणियों से आगे वंश चले। इसी प्रलय की कथा बाइबिल और क़ुरान में आई है जब ‘नूह’ बेडा बनाते हैं और वो भी प्राणियों को प्रलय के प्रकोप से बचाते हैं। अवेस्ता में भी इसी घटना का होना दर्ज है। तो, विभिन्न प्राचीन पुस्तको में एक ही घटना का दर्ज होना आश्चर्यचकित करता है, ऐसे में यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है की प्रलय की घटना क्या केवल एक कपोल कल्पना भर है जो सभी प्राचीन पुस्तको के दर्ज है या इसके पीछे कोई सच्चाई? क्या तथा कथित ‘ प्रलय’ वैसी ही थी जैसा की प्राचीन ग्रंथो में वर्णित है अथवा इस घटना को बढ़ा चढ़ा के वर्णन किया गया है?।जिसे दैवीय कह कर और मनु/ नुह को ईश्वर भक्त कह कर इस इतिहासिक घटना को धर्म या मजहब का चश्मा पहना दिया गया है? इस ऐतिहासिक प्रलय की घटना को आचार्य चतुरसेन ने भी अपनी पुस्तक में बड़े ही प्रमाणिक तौर पर वर्णित किया है जो धार्मिक पुस्तको की कपोल कल्पनाओं के विपरीत सत्यता के बहुत निकट प्रतीत होता है। उन्ही के प्रमाणों को लेके हम लेख को आगे बढ़ाते है और जांचते है की वास्तविकता कितने सत्य के निकट है।
विश्व प्रशिद्ध यह घटना लगभग 3200-3300 ई. पू. आज के मेसोपोटामिया और पर्शिया के उत्तर पश्चिम प्रदेश में हुई थी। पर्शिया के पश्चिमोत्तर में अर्मिनिया प्रदेश है , वंहा के बर्फीले पर्वतों से निकल कर फरात नदी मेसोपोटामिया में आई है। यह नदी मेसोपोटामिया की ख़ास नदी है, यह नदी बहुत विशाल और विस्तार वाली है। मेसोपोटामिया एक और प्रमुख नदी है शतुल, यह ऐसी नदी है जिसमें समुन्द्र के जहाज भी आ जा सकते थे। कहा जाता है की प्राचीन बसरा शहर जो की 6 वीं ईसा में बसाया गया था उसमे एक लाख बीस हजार नहरे थी जिनमे नावे चला करती थी।इससे यह समझ सकते हैं की ये नदियाँ कितनी विशाल और गहरी रही होंगी। संभवत: बर्फ के बाँध टूटने के कारण इसी दजला नाम की नदी में भयंकर बाढ़ आई और उन सभी प्रदेशो को जो फारस की खाड़ी और कश्यप सागर( आज का केस्पियन ) के बीच थे समूचे प्रदेशो को डुबो दिया। परन्तु इन प्रदेशो में कुछ ऐसे स्थल भी थे जो काफी ऊँचे थे समुन्द्र से लगभग 17-18 हज़ार फिट जंहा संभवत: जल नहीं पहुच पाया था पर जो मैदानी और नीचले भूभाग थे वो पूरी तरह से नष्ट हो गये थे। जीव जंतु, मानव बस्तिया, बनस्पति आदि सभी पूरी तरह से नष्ट हो गयी। इनमे नष्ट होने वाली मुख्यत: अरार्ट जाती थी जो मैदानी इलाके में बसती थी, यह जाती महाराज अत्यरती जनन्त्पति की वंसज थी, महाराज अत्यराती के विषय में हम नीचे विस्तार से जानेंगे । इस प्रलय से सारा ईरान जलमग्न हो गया और वो मृत्यु लोक कहाया जाने लगा ,इस मृत्यु लोक का वर्णन पुराणों में भी है।इस प्रलय का कारण था वंहा के किसी ज्वालामुखी का विस्फोट का होना। इसी ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बर्फ की चट्टानें टूट गयी और पिघल कर दजला नदी में गिरी जिससे प्रलयंकारी बाढ़ और कश्यप सागर में उफान ने ईरान को जलमग्न कर दिया। कश्यप सागर प्रदेश में एक स्थान है बाकू जंहा आज भी प्रथ्वी से अग्नि निकलती है। इस स्थान को देखने सिकंदर भी गया था, यह प्रथ्वी से निकलने वाली अग्नि संभवत:उसी ज्वालामुखी विस्फोट के अवशेष है।
मत्स्यपुराण में इस प्रलयकारी घटना के वर्णन में कहा गया है की “मनु” को एक मत्स्य (मछली) मिली जिसने उन्हें बचाया। अब यह “मत्स्य” कौन थी इसको भी जान लीजिये , दरअसल यह मत्स्य कोई मछली नहीं थी बल्कि यह मानव ही थे जिनको “मत्स्य” कहा जाता था और यह बहुत अच्छे नाविक थे । बेबिलोनिया दंतकथाओ में इस जाती का जिक्र आता है,बेबिलोनिया में इन्ही मत्स्य जाती के लोगो का प्राचीन काल से राज था, प्रलय के समय इन्ही नाविक जातियों के राजा ने मनु की सहायता की और उसके परिवार और मवेशियो की रक्षा की। इसके बाद में मनु ने सुषा नगरी बसाई और अपनी राजधानी बनाई जिसकी वैभवता का वर्णन पुराणों और प्राचीन इरानियन प्राचीन पुस्तको में दिया है,बाद में यह नगरी भी उजाड़ गई.
प्रलय में जो अर्राट जाती नष्ट हुई थी वो महाराज अत्यराती जनान्न्पति के वंसज थी, महाराज अत्यराती चाक्षुस मनु के सबसे बड़े पुत्र थे । सरिया में एक नगर अत्यरत(Adbrot) भी इन्ही के नाम पर है और एक पर्बत का नाम भी अर्राट है जो इन्ही अत्यराती के वन्सजो के नाम पर है। चाक्षुस मनु के पांच पुत्र थे , सबसे बड़े अत्यराती, दुसरे अभिमन्यु (मनु),तीसरे थे उर, चौथे थे पुर और पांचवे थे तपोरत। अत्यराती चक्रवर्ती सम्राट थे उनके अधीन कई प्रदेश थे जिनमे बैकुंठ धाम जैसे प्रसिद्ध नगर भी थे जो एल्ब्रुज पर्वत पर अभी तक ‘ इरानियन पैराडाइज’ के नाम से आज भी प्रसिद्ध है। दुसरे भाई थे अभिमन्यु या मन्यु या मनु ( या नुह) प्राचीन अर्जनेम में मनु (APhumon) ट्राय युद्ध के विजेता यही है । इन्होने ही प्रलय के समय बेडा बना के अपने परिवार वालो ओर अपने मवेशिओ की रक्षा की जिसका वर्णन मैंने ऊपर किया है। प्राचीन काव्य ‘ओडेसी’ में इन्ही की गाथा है
तीसरे भाई उर ने अफ्रीका, सरिया, बेबिलोनिया, आदि देशो को जीता। इन्ही के वंशजो ने लगभग 2000 ईसा पूर्व अब्राहम को जीता था जिसका उल्लेख ईसाईयों के ओल्ड टेस्टोमोनी ( बाइबिल ) में भी है । आज भी उर बेबिलोनिया का एक प्रदेश है, प्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी इस उर प्रदेश की थी, ईरान के एक पर्वत का नाम उरल है, अफ्रीका का प्रदेश रायो-डी- ओरा है जो उर के नाम पर रखा गया है। उर के पुत्र अंगीरा थे जिन्होंने अफ्रीका जीता लिया था और पिक्युना के निर्माणकर्ता थे, माना जाता है की यही अंगीरा ने अधर्ववेद का भी निर्माण करवाया था। चौथे भाई पुर के नाम से ईरान के निकट एलबुर्ज के निकट पुरसिया नगर है, जो इनकी राजधानी थी,इन्ही के नाम से ईरान का नाम पर्शिया पड़ा। पांचवे भाई तपोरत ने भी ‘तपोरत’ नाम से अपना राज्य स्थापित किया , इनका प्रदेश ‘तपोरिया,‘ कहलाया। तपोरत के राजा आगे चल के देवराज कहलाये इंद्र इन्ही वंशधर थे।आज कल तपोरत प्रदेश को मंजादीन कहा जाता है।
आज के वैज्ञानिक उस सभ्यता को प्रोटो इलामईट (ताम्र सभ्यता) सभ्यता कहते है ,इसके अवशेष मैसोपोटामिया और उसके आस पास प्रदेशो में मिलते हैं। इस ताम्र सभ्यता के अवशेष कांस्य सभ्यता के अवशेषों के 6-7 फुट गहरे में मिलते हैं । इनके बीच 6-7 फुट चिकनी मिटटी की मोटी परत प्राप्त हुयी है , यह चिकनी मिटटी की मोटी परत वही मिटटी की परत है जो प्रलय यानि बाढ़ के साथ आई थी।
(केशव, आक्रोशित मन, संजय)
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बुद्ध और ज़ुलकिफ़ल
अरब के इस्लामिक विद्वान अब्दुल हमीद कादिर ने अपनी किताब ( बुद अल-अकबर हयातो वा फ़लसफतोह) में बताया कि कुरआन में बुद्ध का जिक्र है।
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