Wednesday, 17 June 2020

(A) भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान (फिरोजाबादी)


【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-१

आजकल भगवा सरकार एवं कुछ तथाकथित धर्मात्मा जिन्हें  भारतीय धर्म ग्रंथों का तनिक भी ज्ञान नहीं वह भारतीय धर्म ग्रंथों की दुहाई एंव नारी सम्मान की बात करते हैं परंतु  उनके निशाने पर मुसलमान होते हैं जिन्हें मानसिक एवं शारीरिक यातना पहुंचाना उनका उद्देश्य होता है। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि  पश्चिमी दुनिया के साथ-साथ भारतीय नारियों में भी आज़ादी को लेकर बहुत अधिक स्वतंत्रता बढ़ती जा रही है वह  स्वच्छं यौन संबंध , लिविंग रिलेशन , विवाह पूर्व यौन संबंध,  सेक्स पर खुलकर चर्चा,  भड़काऊ एवं जिस्म दिखऊ परिधान से तनिक भी परहेज नहीं कर रही हैं। इसके पीछे  सदियों  से चली आ रही नारी दुर्बलता उत्पीड़न  एवं धर्म की आड़ में किए गए अमानवीय अत्याचार हैं। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि हिंदू राष्ट्र की कल्पना जिन लोगों द्वारा  पेश पेश की जाती  है एवं भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का जो लोग सपने देख रहे हैं और इससे अनभिज्ञ लोग जो इन संप्रदायिकता वादियों अंध भक्त एवं समर्थक बने हुए हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि पहले तो यह देश हिंदू राष्ट्र नहीं बन सकता अगर मान भी लिया जाए कि यह देश हिंदू राष्ट्र बनाने में कुछ सांप्रदायिक ताकतें कामयाब हो जाती हैं तो याद रखिए कि सर्व प्रथम यहां वर्ण व्यवस्था कायम की जाएगी जहाँ ब्राह्मण प्रभत्व होगा और समस्त स्त्रियों एवं जातियों पर पशुओं की भाँति अत्याचार होगा । यह केवल कल्पना मात्र नहीं है बल्कि एक ऐसी सत्यता है जिससे भारतीय धर्म ग्रंथ भरे पड़े हैं।  हम वर्ण व्यवस्था पर भी चर्चा करेंगे परंतु सर्वप्रथम भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी पर किए गए अत्याचारों पर एक दृष्टि डालते हैं ।

■ नारियों की पूजा का छल ■

भारतीय धर्म ग्रंथों के वह हितैषी जो नारी सम्मान की बात करते हैं वह निम्न श्लोक उद्धत करते हुए नारी सम्मान पर जोर देते हैं श्लोक इस प्रकार

" यत्र नार्यस्तु पूजन्यते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रोतास्तो न पूज्यन्ते सर्वास्त्राफला: क्रिया :"
  ( मनु स्मृति, 3-56)
अर्थात "जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवताओं का वास होता है और जहां इनकी पूजा नहीं होती वहां सब क्रियाएं असफल होती हैं।"

उक्त श्लोक प्रस्तुत करने वाले का वास्तविक आवश्यक क्या है इस पर तो हम कुछ नहीं कह सकते परंतु उक्त मंत्र द्वारा भारतीय संस्कृति एवं भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी  सम्मान को बड़ा ही उच्च स्थान प्राप्त दिखाया गया
है । परंतु भारतीय धर्म ग्रंथों का गहराई के साथ अध्ययन करने पर पता चलता है कि नारी हमेशा उपेक्षित ही रही। यही महर्षि मनु अपने विशाल धर्म ग्रंथ मनुस्मृति जिसे हिंदुओं की शरीयत या संविधान होने का दर्जा प्राप्त है मैं क्या लिखते हैं देखिए.....

◆ मनुस्मृति के अनुसार नारी का स्थान ◆

मनुस्मृति बुद्धिमानो को स्त्रियों से दूर रहने का उपदेश देती है । देखें....

पुरुषों को खराब करना स्त्रियों का स्वभाव ही है अतः बुद्धिमानो को इनसे बचना चाहिए।
(मनुस्मृति अध्याय 2/  श्लोक 213)

मनु महाराज का कहना है कि....
"पुरुष विद्वान हो चाहे अविद्वान स्त्रियों उसे बुरे रास्ते पर डाल ही देती हैं 
(मनुस्मृति अध्याय 2 /श्लोक 214)

देखिए मनुस्मृति कितना अच्छा ज्ञान दे रही है वह विद्वान पुरुषों को ही नहीं अपितु  अज्ञानियों  को भी स्त्रियों से दूर रहने की शिक्षा देती है और यह लांछन भी लगाती है कि स्त्रियां पुरुषों को बुरे रास्ते पर लगा देती हैं।
मनुस्मृति स्त्रियों पर केवल इतना ही आरोप नहीं लगाती अपितु उनको ऐसे स्थान पर लाकर खड़ा कर देती है जहां से दुष्ट चरित्र महिलाओं एवं पवित्र और सती महिलाओं में कोई अंतर नजर नहीं करती मनुस्मृति कहती है कि.....

"स्त्रियों को बचा कर रखना चाहिए, वो सुंदर या  कुरूप का भी ध्यान नहीं करती वह किसी भी पुरुष की हो जाती हैं"
(मनुस्मृति , 9 -14)

मनुस्मृति स्त्रियों को मूर्खों की श्रेणी में रखती है
देखिये.....
"स्त्रियों के संस्कार वेद मंत्रों से नहीं करना चाहिए वह मूर्ख होती हैं वह अशुभ होती है   
(मनुस्मृति , 9-1)

यहां हर स्त्रियों का मान केवल मूर्ख कहकर ही नहीं करते बल्कि उन्हें अशुभ भी करार देते हैं। हर स्त्री पुरुष को जो रूप मिला है वह परमपिता परमेश्वर द्वारा दिया गया अतः किसी को उसने गोरा बनाया किसी को काला किसी को सावला किसी को लंबा किसी को कमलंबा आदि अतः इसमें किसी मनुष्य का अपना कोई कारनामा नही है परंतु महान ग्रंथ मनुस्मृति स्त्रियों के विवाह के संबंध में स्त्रियों को ही दोषी मानते  हुए उनसे विवाह ना करने का आदेश देती है। देखें..

"ललाई लिए भूरे रंग वाली, छः उंगलियों वाली, ज्यादा बालों वाली, बिना बालों वाली ,ज्यादा बोलने ,वाली स्त्री के साथ विवाह ना करें"
(मनुस्मृति अध्याय 3 /श्लोक 8)

जरा सोचिए कि ऐसी कन्याएं क्या करें क्या माता पिता ऐसी कन्याओं को जिसमें उनका कोई दोष नहीं है सारी उम्र घर में ही अविवाहित रखें?  या वह आत्महत्या कर लें ? या अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति हेतु स्वतंत्र रूप से अपनी कामवासना को शांत करें?

इसी प्रकार विवाह से संबंधित एक और नियम मनुस्मृति पेश करती है
देखें......
"जिसका कोई भाई ना हो इसके साथ विवाह नहीं करना चाहिए'
( मनुस्मृति अध्याय 3 श्लोक 11)

अब अगर किसी स्त्री का कोई भाई नहीं है तो उसमें उस बेचारी स्त्री का क्या दोष।

【अर्थशास्त्र मैं नारी का स्थान】

प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र का भारतीय धर्म ग्रंथों में एक प्रमुख स्थान है अतः आचार्य चाणक्य के नारी विषय पर विचार जानने की उत्सुकता उत्पन्न हो जाना भी स्वाभाविक ही है । आचार्य चाणक्य "चाणक्य नीति दर्पण" देखिए जिसमें लिखा है कि.......

" स्त्रियां एक के साथ बात करती हैं, दूसरे की और देख रही होती हैं और दिल में किसी तीसरे का चिंतन हो रहा होता है इन्हें किसी एक से प्यार नहीं होता 
( चा0/अध्याय 16/2 श्लोक)

सदियों से भारतीय दार्शनिक यह कहते चले आ रहे हैं कि भारतीय नारी दया भावना प्रेम की मूरत होती है परंतु चाणक्य द्वारा स्त्रियों के चरित्र का जो चित्रण पेश किया गया है वह नारी अस्मिता पर वीभत्स प्रहार है जो भारतीय धर्म ग्रंथों को कटघरे में खड़ा कर देता है। यही नहीं हर बुरे कार्य की कल्पना स्त्रियों द्वारा धर्म ग्रंथ करते हैं अतः आगे लिखा हुआ है कि.....

" ऐसा कौन सा दुष्कर्म है जो स्त्रियां नहीं करती"
( चाणक्य नीति दर्पण, अध्याय 10/ श्लोक 4)

आज के लेख में भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान का अंश मात्र ही प्रस्तुत किया गया है अतः हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना में भारतीय स्त्रियों का क्या स्थान होगा इसको भली-भांति समझा जा सकता है।

【भारतीय धर्मग्रंथों में नारी का स्थान】-२(अ)

पिछले लेख में हमारे भाइयों द्वारा जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं सामने आईउसमें से हमारे एक प्रिय हिंदू मित्र ने इस्लाम पर उंगली उठाते हुए कहा कि इस्लाम में नारी भोग विलास की वस्तु मात्र है और वह हलाला तीन तलाक एवं बहु विवाह का दंश झेलती है। पहले तो यह के हमारे लेख का यह विषय है ही नहीं इस पर अलग से बात की जा सकती है उन्हें भारतीय धर्म ग्रंथों का भली-भांति अध्ययन करना चाहिए उसके बाद ही किसी धर्म, पंथ आदि पर उंगली उठाना चाहिए। वैसे तो मैं नारी से संबंधित है भारतीय धर्म ग्रंथों में दिए गए उपदेशों एवं नारी चित्रण पर कोई बात नहीं रखना चाहता था परंतु जो प्रक्रिया सामने आई हैं इसके बाद में रिवर्स के भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी को भोग विलास की वस्तु मात्र समझा।

■नारी सौंदर्य का अश्लील वर्णन■

ऋषि महर्षि तपस्वी एवं धर्म ध्वजा के रक्षक हमारे शास्त्र कारों ने अपने सभी ग्रंथों में सामान्य जन के लिए नारी के रूप सौंदर्य और तन के भोग को  पाप कर्म बताया है। भारतीय धर्म ग्रंथों में कामकला की गहरी पैठ की छाप दिखाई पड़ती है । भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी सौंदर्य का बड़ा ही लज्जाहीन वर्णन मिलता है जो इस बात का घोतक है की रामायण काल एवं महाभारत काल में नारी की स्थिति इतनी दयनीय थी के उसको बड़े ही अश्लील एवं अभद्र शब्दों से पुकारा जाता था।  वाल्मीकि रामायण जोकि सर्वमान्य है उसमें नारी का बहुत ही  घटिया चित्रण प्रस्तुत किया देखें ।

◆ रामायण में  नारी सौंदर्य का अश्लील वर्णन ◆

रावण द्वारा स्वर्ग विजय के अवसर पर कैलाश पर सेना सहित पड़ाव डालने के बाद रात के समय अप्सरा उपरंभा उधर से निकली उस अप्सरा का सौंदर्य वर्णन बाल्मीकि में इस प्रकार हुआ!

" उसका मुख चंद्रमा के समान मनोहर था दोनों सुंदर भौयें कमान सी दिखती थीं और वह नीले रंग की साड़ी से अपने अंगों को ढके हुए थी , उसकी जांघों का उतार-चढ़ाव हाथी की सूंड के समान था दोनों हाथ ऐसे कोमल थे मानो नए-नए पल्लव हो वह सेना के बीच से होकर जा रही थी अत: रावण ने उसको देख लिया। जिसके बाद बाल्मीकि ने जो चित्रण पेश किया है उसको देखना उपरंभा को देखकर रावण ने कहा

सुंदरी कहां जा रही हो किस की इच्छा पूरी करने के लिए स्वयं चल पड़ी हो किसके भाग्योदय का समय आया है??? जो तुम्हारा उपभोग करेगा नीलकमल जैसे तुम्हारे सुगंधित मुख के अमृत समान रस को कौन चूस कर तृप्त होगा?? सोने के कलश जैसे मोटे और गोल गोल स्तन किस भाग्यशाली के वक्ष स्थल से सटेंगे ????  तुम्हारे गोल मटोल भारी और चौड़े नितंब(कूल्हे) साक्षात स्वर्ग के समान है आज इस स्वर्ग पर कौन सवारी करेगा।"
(वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड षड्विंश सर्ग21/22/23/24/25 )

◆  स्त्री द्वार स्त्री की सुंदरता का अश्लील वर्णन◆

नारी का नारी द्वारा अश्लील वर्णन करने में वाल्मीकि ने तनिक भी चुक नहीं की। शूर्पणखा अपने नाक कान काटने का वर्णन इस प्रकार करती हैं 
" उसका सुंदर शरीर तपाए हुए सोने जैसा है नाखून ऊंचे और लाल हैं वह शुभ लक्षणों से संपन्न है उसके सभी अंग सुडोल हैं तथा कटिभाग सुंदर और पतला है वह विदेही राजा जनक की कन्या है और सीता उसका नाम है महान भुजाओं वाले..... विशाल कूल्हों और कड़े कूचों वाली उस स्त्री को जब मैं तुम्हारी पत्नी बनाने के लिए लाने लगी तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह से कुरूप कर दिया"
(वाल्मीकि रामायण , आरण्यक काण्ड ,सर्ग-34/1७/२०/२१ )

रामायण का रचयिता भला यहां कहां रुकने वाला था उसने सीता माता से भी ऐसे शब्द जिसे शायद ही कोई लज्जावान स्त्री अपने मुख से कहे ..... परंतु रामायण के रचयिता कहां मानने वाला था देखें ....

"मेरी पलकें शंख के आकार की,मेरी भौंहें मिली हुई और बाल काले एवं पतले हैं। मेरी दोनों जांघें गोल हैं जिन पर तनिक भी बाल नही हैं वो चिकनी हैं। मेरे हाथ,पैर, एवं जांघें सुडोल और उँगलियाँ बराबर हैं । मेरे दोनों स्तन आपस मैं सटे हुए एवं बड़े बड़े हैं, मेरे इन दोनों स्तनों के चूचक भीतर की और धंसे हुए हैं।  मेरी नाभी गहरी और सामने से दिखाई देती है। मेरी छाती एवं कूल्हे उठे हुए एवं उभरे हुए हैं।"
(रामायण, युद्धकाण्ड,49वां सर्ग, 10-11)

【भारतीय धर्मग्रंथों में नारी का स्थान】-२(ब)

पिछले लेख में हमने बताया था कि  भारतीय धर्म ग्रंथों में  नारी का बड़ा ही अश्लील चित्रण प्रस्तुत किया गया है अतः प्रसिद्ध भारतीय धर्म  रामायण के द्वारा द्वारा भी इस बात के प्रमाण दिए गए थे आज रामायण के चंद और उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं

*◆रामायण के अन्य उदाहरण*◆

कौशल्या अर्थात श्री राम की माँ कौशल्या का पुत्रेष्टि यज्ञ करवाना, पुत्रेयष्टि यज्ञ उस यज्ञ को कहा जाता है जिस में पुराहित रानी के साथ घोड़े को संभोग के लिये नियुक्त किया जाता है जिसे पुरोहित संपन्न करता है ।  इसका विस्तार पूर्वक वर्णन यजुर्वेद में दिया गया है । 
(देखें -रामायण, बालकाण्ड,चौदवां सर्ग, 33-34-35-36)

मुनि तपस्वी चूली जब तपस्या कर रहे थे उर्मिला की पुत्री सोमदा जो कुंवारी थी उनकी सेवा मैं रहती है अत: महाऋषी चूली ने खुश हो कर उससे कहा  " मैं तुमसे प्रसन्न हूँ तुम्हारा क्या करूँ?" अर्थात तुम्हे क्या वरदान दूँ ?
यह सुनकर वह बोली......

" मैं किसी की पत्नी नहीं हूँ आपकी शरण मैं आई हूँ आप पुत्र देने योग्य हैं"  
अत: ऋषी चूली ने उस कुँवारी गन्धर्वी स्त्री के साथ पुत्र उत्पन्न किया 
(देखें- रामायण तैन्तीस्वा सर्ग, 15-16)

उस पुत्र का नाम कुशनाभ था । जो बड़े ही तेजस्वी हुए । 
रामायण मैं महाऋषि गौतम द्वारा इंद्र एवं उनकी पत्नी अहिल्या को श्राप देने का वर्णन मिलता है । वृतांत इस प्रकार है  । अहिल्या एवं इंद्र ने गौतम की अनुपस्तिथि मैं आपस मैं समागम(forplay) किया था। जो इस प्रकार है ...
"इंद्र ! आश्रम मैं महा ऋषि गौतम की अनुपस्तिथिति जान कर मुनि वेश धारण कर के आये और अहिल्या से बोले  " हे सुन्दरी संभोग की इच्छुक हेतु ऋतु काल की प्रतीक्षा नहीं करते हे सुन्दर कमर वाली! मैं तुम्हारे साथ संभोग करना चाहता हूँ" अत: अहल्या जो यह जान गयी थी कि मुनि के भेष मैं देवता इंद्र हैं फिर भी उसने संभोग करने की अभिलाषा की। (रामायण बालकाण्ड, उन्चास्वां सर्ग,17-19) 

संभोग के पश्चात अहल्या संतुष्ट मन से बोली 'हे सुरश्रेष्ठ आपने जो मेरे साथ संभोग किया मैं अपने आपको धन्य समझती हूँ अब आप यहाँ से शीघ्र ही चले जाइये" 

यह सुनकर इंद्र ने  हँसते हुए कहा  " हे सुंदर नितंबों वाली मैं संतुष्ट हुआ अब मैं वहां जाता हूँ जहाँ से आया हूँ।" 
(बालकाण्ड, उनचास्वां सर्ग, 20-21)

पर देवता इंद्र और अहल्य को किया मालूम था के उसी समय महा ऋषी गौतम टपक जायेंगे अत: महा ऋषी गौतम ने दोनों को श्राप दिया जिससे इंद्र के अंडकोष धरती पर ही गिर गये ।
(रामायण, बालकाण्ड,  उनचास्वां सर्ग, 24-27-28-30)

विश्वा मित्र को धार्मिक ग्रंथों मैं बहुत बड़ा तपस्वी और महा ऋषी माना गया है यह ब्राह्मण नहीं थे परन्तु अपनी कठोर तपस्या के बल पर ऋषी पद प्राप्त करना चाहते थे, जब हजारों वर्षों की तपस्या के बाद देवताओं  द्वारा इन्हें उच्च ऋषि पद प्राप्त हुआ तो कुछ समय बाद मेनका नाम की अप्सरा ने अपना नग्न काया दिखा कर इनकी सारी तपस्या भंग कर दी वर्णन इस प्रकार है।  "इसके बाद बहुत समय बीत जाने पर मेनका नाम की परम सुन्दरी तालाब मैं स्नान करने आई अत: विश्वा मित्र ने काम भावना के वशीभूत हो कर कहा "मुझ काम के मारे पर कृपा करो और मेरे साथ आश्रम मैं रहो। देखें (त्रेसठवां सर्ग, मेनका निर्वास,4-5)

अत: यही मेनका दस वर्ष तक विश्वा मित्र के साथ उनकी कुटिया मैं रहती है और दस वर्ष तक विश्वामित्र मेनका के साथ अवैध संबंध  बनाते हैं और दस वर्षों तक मेनका के साथ संभोग का आनंद उठाने के बाद इस ख्याल से मेनका को विदा कर देते हैं कि यह देवताओं की कोई चाल है।
(मेनका निर्वास, 6-10, 11-13)

विश्वामित्र का यह शक बिलकुल सही था क्यों कि चौसाठवां  सर्ग मैं इंद्र अप्सरा रंभा से अश्लील हरकतें करकेविश्वामित्र को लुभाने की बात कहते है रंभा इंद्र से क्या कहती है सुनिए

"बुद्धिमान इंद्र द्वारा इस प्रकार कहने पर रंभा लज्जित हुयी औए हाथ जोड़ कर इंद्र से बोली: हे सुरपति। महामनु विश्वामित्र बहुत भयानक हैं वह मुझपे संदेह एवं क्रोध करेंगे

अतः यहां इससे स्पष्ट होता है वैदिक काल में वह स्त्रियां जो देवताओं एवं राजाओं के वशीभूत थीं उनका इस्तिमाल ऐसे ही किया जाता था जैसे आजकल बड़े बड़े-बड़े धन दौलत वाले कांट्रेक्ट हासिल करने के लिए अपने अंडर में काम करने वाले लड़कियों को दूसरे का बिस्तर गर्म करने के लिए बातें करते हैं । एक और उदाहरण देखिये ...

राम के भाई भरत जब श्री राम की खोज मैं ऋषि भारद्धाज के पास पहुंचे तो भरत की सेना के सत्कार के लिए भारद्धाज ने देवताओं से आग्रह करके स्त्रीयों को बुलाया।

" वन मैं बीस हजार स्त्रीयां आयीं जिनको देखते ही पुरुष पागल के समान हो जाएं, अलंबुषा मिस्र्केशी पुन्डरीका एवं वामना नामकी सुन्दर अप्सराएं भरत के सामने निर्त्य करने लगीं। 
(अयोद्ध्याय कांड, 45-47) 

रामायण आगे कहती है:-
इसके बाद भूखे लोगों ने अपनी इच्छानुसार मांस खाए , एक एक सेनिक के हिस्से मैं आठ आठ स्त्रीयां आयीं जिन्होंने शराब पिलायीं सैनिकों को नहलाया और आनंद उठाया।
(अयौद्ध्याय कांड, एक्क्यन्वा सर्ग 52-54)

देखिये यह  ऋषियों के सत्कार का तरीका था। रामायण के रचियता बाल्मिक ने पता नहीं कौन सा  tonic पीकर रामायण लिखी अगर वह चाहते तो इशारों मैं भी बात कह सकते थे परन्तु उनहोने तनिक भी ऐसा नहीं किया। देखिये

रावण ने सीता से कहा " हे सुन्दर जाँघों वाली तुम्हारे दांत समान नुकिले श्वेत चिकने हैं। तुम्हारी जांघे भरी हुयी एवं टाँगे हाथी की सूंड के समान हैं। तुम्हारे स्तन  ऊँचे गोल,एक दुसरे से मिले हुए,।सुडोल, मौटे, नुकीले, सुन्दर, चिकने, ताड़ (कठोर फल) के समान आकर्षक हैं। तुम सुन्दर केशों वाली एवं आपस मैं सटे हुए स्तनों वाली हो। तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि मुट्ठी मैं आ जाये इसी प्रकार रामायण मैं रावण की पत्नियों का वर्णन हनुमान जी द्वारा बड़ा ही अश्लीलतम किया गया है।

" कुछ पत्नियों के वस्त्र अपने शरीर से हटे हुए थे  कुछ के हार उनके स्तनों के बीच मैं सोये हुए हंसों के समान जान पड़ते थे।" 
देखिये ....(रामायण सुन्दर काण्ड, 9वां सर्ग, 46-47-49)

हनुमान जी माते सीता के चमकते हुए सुन्दर अंगों को देखकर पहचानते हैं और सोचते हैं इसी लिए प्रभु राम के मन मैं सीता के लिए कामवासना है।
(सुन्दर काण्ड, 16वां सर्ग47-50)

रामायण कहती है कि एक बार सीता मय्या के मन मैं यह विचार आया कि मेरा तुम्हारी पत्नी रहना बेकार है वो कहतीं हैं कि..

"मेरे पीछे तुम राम.... बड़ी बड़ी आँखों वाली स्त्रीयों से संम्भोग करोगे
(सुन्दर कांड, 28वाँ सर्ग, 13-14)

इसी बात को सोच कर सीता मय्या अपनी चोटि से गला घोंट कर मरने का इरादा करतीं हैं  इस दुखद घटना के वर्णन को भी वाल्मीकि कामुक  बनाने से नहीं चूकते

"फिर इस (आत्महत्या के इरादे) के बाद समस्त कोमल अंगों वाली सीता पेड़ की शाख पकड़ के खड़ी हो गयी। 
(सुन्दर काण्ड, 28वां सर्ग, 17-18)

आगे रामायण कहती है सीता की परस्पर सटी हुयी टांगों मैं से हाथी की सूंड के समान मोटी और अति सुन्दर बायीं जांघ फड़क कर मानो यह कह रही थी कि राम सामने ही खड़ें हैं। (सुन्दर काण्ड 3-4)

हनुमान जो इसी समय वहां आ जाते हैं वो भी सीता मय्या के बारे पूछते हैं के वह कौन हैं तो वह भी सीता के शरीर की ही प्रशंसा करके पूछते हैं।
(देखें- सुन्दर काण्ड, 33वां सर्ग, 3-4-5-7)

हनुमान जी जो सीता को अपनी माँ मानते थे कई जगह उन्होंने सीता मय्या के लिए सुन्दर अंगों वाली सुन्दर यौवन वाली कह कर ही बात की है भला कोई अपनी माँ के लिए ऐसे शब्द प्रयोग करता है। यह हनुमान जी भी कोई आम क्रिया से पैदा नही हुए थे बल्कि इनकी माँ से  मरुत देवता जिन्हें वायु देवता भी कहते हैं,  ने बिना शादी के पैदा किया था। ऐसा कब हुआ देखिये

" पर्वत पे खड़ी हुयी अंजना (हनुमान की माता) को वायु देव ने धीरे धीरे उसके वस्त्रों को उतार कर नग्न कर दिया उसके बाद मारुत ने अन्जना की गोल-गोल परस्पर सटी हुई जांघें, बड़े बड़े एक दुसरे से मिले हुए स्तन, विशाल नितंबो एवं सुन्दर मुख को देखा उस भारी -भारी नितंबों वाली, क्षिणकटी वाली को देखकर मरुत काम मोहित हो गए और पवन देवता ने अपनी विशाल भुजाओं मैं भर लिया। 
(रामायण , 66वां सर्ग, 13-15,)

इसके बाद कामवासना का खेल चलता है हनुमान की माँ सिर्फ इतना ही कह पाती है कि "यह कौन मेरा कोमार्य भंग कर रहा है?"

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-३(अ)

किसी कारणवश पिछले 2 लेखों के बाद तृतीय लेख आने में विलंब हुआ उसके लिए क्षमा चाहता अतः इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए आज भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान का तीसरा भाग प्रस्तुत किया जा रहा है!

◆शब्द दुहिता एवं कन्या का अर्थ◆

इसे दुर्हिता भी कहा जाता है। वेदों के बाद उनके व्याख्यान रूप ब्राह्मण ग्रंथ आते हैं इनमें ऐतरेय ब्राह्मण नाम का ग्रंथ सर्वाधिक मान्य एवं प्रसिद्ध है विभिन्न मतभेद होने के बावजूद लगभग 2500 ईसा पूर्व का बताया जाता है इसमें हरिश्चंद्र नारद संवाद में दिखाया गया है कि नारद कहते हैं कि.....

" कृपणां ह दुहिता "
( ऐतरेय ब्राह्मण 7-3-1-)
अर्थात पुत्री कष्टप्रदा ,दुखदाई होती है

पाठकगण समझ गए होंगे के दुर्हिता का अर्थ क्या है  ऐतरेय ब्राह्मण के उक्त अंश का भाषण करते हुए विद्वान प्राचीन भाषा कार जोकि  सर्वाधिक प्रचलित हैं और उसी से ही अन्य विद्वान भाषय किया करते हैं उन्होंने एक प्राचीन श्लोक उद्धत किया है जिसका अर्थ इस प्रकार है

" जब कन्या उत्पन्न होती है तब सगे संबंधियों के लिए दुख का कारण बनती है, जब उसका विवाह किया जाता है तब वह धन का अपहरण करती है, युवावस्था में बहुत गलतियां कर बैठती है इसलिए वह हृदयदारिका कहलाती है" 

ह्रदय दारिका का अर्थ होता है हृदय को चीरने या तकलीफ देने वाली।
इसी प्रकार ईसा से लगभग 800 वर्ष पूर्वयास्काचार्य निरुक्त नामक  एक ग्रंथ लिखा जो के सर्वाधिक मान्य एवं सब मातावलंबी उसको मानते हैं बेटी के विषय में वे लिखते हैं कि...

बेटी को दुहिता इसलिए कहा जाता है कि वह बुरे कर्म करने वाली होती है इसलिए उससे दूर रहने में ही भलाई है वह "दोगधा" अर्थात माता पिता के धन को चूसने वाली होती है!
( ते हैं निरुक्त अध्याय 3 खंड 4)

यह वह महान ऋषि एवं भाष्यकार  हैं जिनके आदेश एवं उपदेश एवं उनका लिखा हुआ उस वक्त का समाज धर्म समझकर पालन करता था।
इसी पुस्तक के अगले अध्याय में कन्या शब्द पर प्रकाश डालते हुए यास्काचार्य बताते हैं कि कन्या को कन्या कहने का अर्थ यह है कि ज्यों ही वह पैदा होती है त्यों ही  वह चिंता उत्पन्न करने लगती है कि उसे किसके गले मढ़ा जाए ?  देखिए.... (निरुक्त अध्याय 4 खंड 15). इन उदाहरणों से तत्कालीन भारतीय संस्कृति की नारी के जन्म के प्रति कल्पित दृष्टिकोण का पता चलता है।

■भारतीय धर्म ग्रंथों में नियोग द्वारा नारी अस्मिता पर प्रहार ■

भारतीय धर्म ग्रंथ भारतीय नारी को किसी भी स्थिति में चाहे पति की मृत्यु एवं पति द्वारा अत्याचार किए जाने पर पुनर्विवाह की अनुमति नहीं देते यह भी बुद्धि से परे बात है कि यदि किसी स्त्री का किसी पुरुष के साथ निभा हो पा रहा हो या पति द्वारा उस पर दिन प्रतिदिन अत्याचार किए जा रहे हैं या पति व्यभिचारी हो फिर क्यों वह पत्नी उससे विवाह विच्छेद करके किसी और के संग शादी क्यों ना कर ले ???? या फिर किसी जवान स्त्री के पति की मृत्यु के बाद वह पुनर्विवाह क्यों ना करे। भारतीय धर्म ग्रंथों के पुनर्विवाह के स्त्री को पुनर्विवाह की अनुमति तो नहीं देते परंतु नियोग जैसे घृणित  एवं अश्लील कार्य द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार करते हैं।
हमारे बहुत से पाठक करें एवं प्रिय बंधुओं के बारे में जानते हैं अतः उस पर प्रकाश डालना अति आवश्यक समझता हूं।

【नियोग एक व्यभिचार】 -१

◆नियोग क्या है◆

अगर किसी पुरुष की स्त्री मर गई है और उसके कोई संतान नहीं है तो वह पुरुष किसी नियुक्त विधवा स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर संतान उत्पन्न कर सकता है। गर्भ स्थिति के निश्चय हो जाने पर नियुक्त स्त्री और पुरुष के संबंध खत्म हो जाएंगे और नियुक्ता स्त्री दो-तीन वर्ष तक लड़के का पालन करके नियुक्त पुरुष को दे देगी। 

इसी प्रकार विधवा स्त्री एवं निसंतान स्त्री द्वारा नियोग का प्रावधान किया गया जिसके अंतर्गत एक विधवा स्त्री दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य पुरुषों के लिए अर्थात कुल 10 पुत्र उत्पन्न कर सकती है। इसके लिए वह 10 पुरुषों से भी संबंध स्थापित कर सकती है. (यहाँ यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यदि कन्या उत्पन्न होती है तो नियोग की क्या ‘शर्ते रहेगी ?) इसी प्रकार एक विधुर दो अपने लिए और दो-दो चार अन्य विधवाओं के लिए पुत्र उत्पन्न कर सकता है।  ऐसे मिलकर 10-10 संतानोत्पत्ति की आज्ञा वेद में है।

इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु।
दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि।
(ऋग्वेद 10-85-45)
भावार्थ- ‘‘हे वीर्य सेचन हार ‘शक्तिशाली वर! तू इस विवाहित स्त्री या विधवा स्त्रियों को श्रेष्ठ पुत्र और सौभाग्य युक्त कर। इस विवाहित स्त्री से दस पुत्र उत्पन्न कर और ग्यारहवीं स्त्री को मान। हे स्त्री! तू भी विवाहित पुरुष या नियुक्त पुरुषों से दस संतान उत्पन्न कर और ग्यारहवें पति को समझ।’’ (4-125)

वेद की आज्ञा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्णस्थ स्त्री और पुरुष दस से अधिक संतान उत्पन्न न करें, क्योंकि अधिक करने से संतान निर्बल, निर्बुद्धि और अल्पायु होती है।  दूसरी बात है जो कि उक्त मंत्र से स्पष्ट है कि नियोग की व्यवस्था केवल विधवा और विधुर स्त्री और पुरुषों के लिए नहीं है बल्कि पति के जीते जी पत्नी और पत्नी के जीते जी पुरुष इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। (4-143)

नियोग का अध्यन करने से यह बात भी पता चलती है कि कहीं भी संतान उत्पत्ति या कन्या उत्पत्ति का उल्लेख नहीं है हर जगह पुत्र प्राप्ति हेतु नियोग करने का आदेश है वही नपुंसक पति या हम कह सकते हैं कि औलाद पैदा करने में असमर्थ व्यक्ति की पत्नी भी नियुक्त पुरुषों द्वारा नियोग कर सकती है।

आ घा ता गच्छानुत्तरा युगानि यत्र जामयः कृराावन्नजामि।
उप बर्बृहि वृषभाय बाहुमन्यमिच्छस्व सुभगे पति मत्।
(ऋग्वेद 10-10-10)
अर्थात ‘‘नपुंसक पति कहता है कि हे देवि! तू मुझ से संतानोत्पत्ति की आशा मत कर। हे सौभाग्यशालिनी! तू किसी वीर्यवान पुरुष के बाहु का सहारा ले। तू मुझ को छोड़कर अन्य पति की इच्छा कर।’’

इसी प्रकार संतानोत्पत्ति में असमर्थ स्त्री भी अपने पति महाशय को आज्ञा दे कि
" हे स्वामी! आप संतानोत्पत्ति की इच्छा मुझ से छोड़कर किसी दूसरी विधवा स्त्री से नियोग करके संतानोत्पत्ति कीजिए।"

अगर किसी स्त्री का पति व्यापार आदि के लिए परदेश गया हो तो तीन वर्ष, विद्या के लिए गया हो तो छह वर्ष और अगर धर्म के लिए गया हो तो आठ वर्ष इंतजार कर वह स्त्री भी नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती है। ऐसे ही कुछ नियम पुरुषों के लिए हैं कि अगर संतान न हो तो आठवें, संतान होकर मर जाए तो दसवें और कन्या ही हो तो ग्यारहवें वर्ष अन्य स्त्री से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकता है। पुरुष अप्रिय बोलने वाली पत्नी को छोड़कर दूसरी स्त्री से नियोग का लाभ ले सकता है। ऐसा ही नियम स्त्री के लिए है। (4-145)

अगर स्त्री गर्भवती हो और पुरुष से न रहा जाए और पुरुष दीर्घरोगी हो और स्त्री से न रहा जाए तो ऐसी स्थिति में दोनों किसी से नियोग कर पुत्रोत्पत्ति कर ले, परन्तु वेश्यागमन अथवा व्यभिचार कभी न करें। (4-149)

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-३(ब)

पिछले लेख में भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी पर नियोग के नाम पर जो अत्याचार हुए हैं उस पर प्रकाश डाला गया था अतः पिछले लेख में यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि नियोग को एक धार्मिक कार्य का दर्जा प्राप्त था और आज भी जो लोग हिंदू राष्ट्र एवं वर्ण व्यवस्था के कायल हैं वह  नियोग का समर्थन करते हैं यदि हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना पूर्ण होती है तो  नारी को नियोग के नाम पर जो एक धार्मिक कार्य माना गया है  केवल भोग विलास की वस्तु समझा जाएगा । नियोग प्रथा केवल  एक अत्याचार ही नहीं उठा अपितु उसको धर्म की चादर किस प्रकार उड़ाई गई के  नियोग के नियम भी बनाए गए अब आगे.....

【नियोग के नियम 】

नियोग अपने वर्ण में अथवा उत्तम वर्ण और जाति में होना चाहिए। एक स्त्री 10 पुरुषों तक और एक पुरुष 10 स्त्रियों तक से नियोग कर सकता है। अगर कोई स्त्री अथवा पुरुष 10वें गर्भ से अधिक समागम करे तो कामी और निंदित होते हैं। (4-142) विवाहित पुरुष कुंवारी कन्या से और विवाहित स्त्री कुंवारे पुरुष से नियोग नहीं कर सकती।

नियोग करने वाले पुरुष को चाहिए की सारे शरीर में घी लेपकर, रात में मौन धारण कर विधवा में एक ही पुत्र करे, दूसरा कभी न करें. नियोग में भी जाति-भेद : मनु ने इस सम्बन्ध में कहा है : द्विजों को चाहिए कि विधवा स्त्री का नियोग किसी अन्य जाति के पुरुष से न कराये. दूसरी जाति के पुरुष से नियोग कराने वाले उसके पतिव्रता स्वरूप को सनातन धर्म को नष्ट कर डालते है।वेदादि शास्त्रों में पति द्वारा संतान उत्पन्न न होने पर या पति की अकाल मृत्यु की अवस्था में ऐसा नियमबद्ध उपाय है जिसके अनुसार स्त्री अपने देवर, जेठ, ससुर, ताऊ, चाचा, मामा सबके संग संभोग अथवा सम्गोत्री से गर्भाधान करा सकती है। इसी विधि के द्वारा पांडु राजा की स्त्री कुन्ती और माद्री आदि ने नियोग किया । महाभारत में वेद व्यास विचित्रवीर्य व चित्रांगद के  मर जाने के पश्चात् उन अपने भाइयों की स्त्रियों से नियोग करके अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पांडु और दासी से विदुर की उत्पत्ति की थी।नीचे तथ्यों पर आधारित नियोग विषय पर सभी शंकाओं का प्रश्नों का उत्तर दिया गया है।

महाभारत में नियोग

【विधवा के साथ अमानवीय व्यवहार】

वेदों में विधवा के साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया गया ऐसा वर्णन भी मिलता है कि स्त्री का पति जो मृत्यु को प्राप्त होता है और उसकी देह का अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ होता है कि उसकी पत्नी को किसी दूसरे पुरुष या उसके देवर को सौंप दिया जाता है स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार पति की मृत्यु के फौरन बाद ही उस विधवा का नियोग करवा दिया जाता था देखिए ऐसी पीड़ा की घड़ी में उस अभागन के मनोभावों उसके दुख से किसी को कोई वास्ता तक नहीं होता था अतः इस संदर्भ में ऋग्वेद के मंत्र को प्रस्तुत करना में बेहतर समझता हूं जिससे विधवा की स्थिति सामने आ जाती है । देखें,

"उदीष्र्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुप शेष एहि: ।
हस्ताग्राभ्य दिधिषोस्तवेदं पातुर्जनित्वमभि सं बभूथ।।
(ऋग्वेद मण्डल -१० /१८/८)
अर्थात हे नारी उठो और सांसारिक जीवन को अपनाओ तुम व्यर्थ ही अब इस निष्प्राण व्यक्ति के पास लेटी है आओ अब तुम अपने इस नए पति का पत्नीत्व स्वीकार करो, जो तुम्हारा हाथ पकड़े हुए है और जो तुमसे स्नेह करता है इससे पता चलता है कि स्त्री को चल संपत्ति समझा जाता था जब जिसके जी मैं आया उसका तथाकथित स्वामी बन गया और रोटी के दो टुकड़ों पर उसका शरीर नोंचने लगता । 

विधवा स्त्री के साथ दूसरा अत्याचार यह किया जाता है कि उसके सर के बाल पति की मृत्यु के बाद काट दिए जाते थे अब भला पति की मृत्यु से स्त्री के बालों का क्या संबंध?????

【महाभारत में नियोग】

आगे अब महाभारत के कुछ उदाहरण भी देख लेते हैं...

व्यासजी का काशिराज की पुत्री अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अ 106/6

वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ- महाभारत वन पर्व 314/6

उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा- महाभारत आदि पर्व अ 104

कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे- महाभारत आदि पर्व 104/2

उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा करते हैं- महाभारत आदि पर्व 120/26

परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि पर्व 103/10

पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- महाभारत आदि पर्व 120/28

पुराणों में नियोग

किसी कुलीन ब्राह्मण को बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई दोष नहीं हैं- 
(देवी भगवत 1/20/6/41)

व्यास जी के तेज से में भस्म हो जाऊगी इसलिए शरीर से चन्दन लपेटकर भोग कराया- 
(देवी भगवत 1/20/65/41)

भीष्म जी ने व्यास से कहा माता का वचन मानकर , हे व्यास सुख पूर्वक परे स्त्री से संतान उत्पत्ति के लिए विहार कर-
( देवी भागवत 6/24/46)

पति के मरने पर देवर को दे- देवर के आभाव में इच्छा अनुसार देवे – 
(अग्नि पुराण अध्याय 154)

राजा विशाप ने स्त्री का सुख प्रजा के लिए त्याग दिया। वशिष्ट ने नियोग से मद्यंती में संतान उत्पन्न की- 
(विष्णु पुराण 4/4/69)

इस के अतिरिक्त रामायण में भी इसके प्रमाण मिलते हैं ।।

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-४

एक बार फिर मैं इस बात को बता  देता हूं कि हमारे इन लेखों का उद्देश्य किसी को धार्मिक ठेस पहुंचाना नहीं अपितु सरकारों द्वारा बहु विवाह , बहुपत्नी विवाह ,तलाक , हलाला आदि के नाम पर जो प्रोपेगंडा किया जा रहा है और उसे धर्म विशेष की कुरीतियां बताया जा रहा है साथ ही साथ हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना को भी पेश किया जा रहा है कि हिंदू राष्ट्रीय यदि कायम होता है तो उसमें नारी का बहुत उच्च स्थान होगा।
परंतु यदि हम भारतीय धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि भारतीय धर्म ग्रंथों में जब इन धार्मिक नियमों का पालन किया जा रहा था उस समय नारी स्थिति अति दयनीय थी जैसा कि पिछले लेखों द्वारा जो बातें सामने आई हैं उसके आगे बढ़ाते हुए यह लेख प्रस्तुत है।
अब आगे...........

◆ भारतीय धर्म ग्रंथों में  स्त्री निंदा एवं नारी अत्याचार ◆

भारतीय धर्म ग्रंथ स्त्रियों की निंदा करने के लिए उन्हें अत्यधिक नीच दिखाते हुए दर्शाते एवं उनकी अस्मिता पर इस प्रकार प्रहार करते हैं कि.... भारतीय धर्म ग्रंथों में ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि धर्म के नाम पर उनका पशुओं के साथ संभोग करवाया जाता प्रमाण के लिए हम केवल यजुर्वेद की एक घटना का यहां वर्णन करते हैं मंत्रों की अधिकता के कारण सिर्फ यहां उसका भाष्य ही प्रस्तुत किया जा रहा है यजुर्वेद में लिखा है कि......

"गणानां त्वा............................... त्वंजासि
               ( यजुर्वेद 23/ 19)

" अर्थात यजमान की सब पत्नियां अश्व की तीन मंत्रों से परिक्रमा करती हैं ,अश्व की स्तुति करती हुई कहती हैं... हे अश्व (घोड़े) तुम गण रूप से पालक हो ! 

प्रियाओं के पालक हो और सुख की निधि हो,  हे घोड़े तुम मेरे पति बन जाओ पत्नियों और पुरोहित द्वारा पशु के शुद्धि कर देने के बाद मुख्य पत्नी घोड़े के समीप होती है और प्रार्थना करती है:-  हे घोड़े मैं गर्भ  स्थापित करने वाला वीर्य खींचकर फेंकती हूं तू उस गर्भ स्थापित करने वाले वीर्य को  खींच कर फेंकता है । "

इतना ही नहीं इस क्रिया को पूर्ण कराने के लिए पुरोहित आदेश देते हुए कहता है कि.....

" ता उभौ चतुर.....    ................ दधातु"

"अर्थात हे घोड़े और हे मुख्य पत्नी तुम दोनों दो दो  टांगों को फैलाओ फिर अधर्व्यु (पुरोहित) कहता है कि यज्ञ भूमि को ढक दो शामियाना वगैरा लगा दो तब यजमान की मुख्य पत्नी घोड़े के लिंग को खींचकर अपनी योनि में स्थापित करती है और कहती है कि यह वीर्य सींचने वाला घोड़ा मुझ में वीर्य स्थापित करे।
(यजुर्वेद , 23/ 20)

इतना ही नहीं इस कार्य को संपन्न कराने वाला अधर्वयु पत्नी के पति द्वारा कहलवाता है कि.......

"हे घोड़े मेरी पत्नी की गुदा के ऊपर के भाग पर तुम वीर्य फेंको , तुम अपना लिंग को फैलाओ और योनि में प्रविष्ट कराओ क्योंकि यह लिंग योनि में जाकर स्त्रियों को जीवित और आनंदित करता है" 
( यजुर्वेद ,  23/21)

आगे इतना अश्लील वर्णन है कि मैं और लिखना उचित नहीं समझता।
पाठक गण समझ लें कि यह एक विशेष प्रकार की क्रिया है जिसे अश्वमेघ यज्ञ या पुत्रयेष्टि यज्ञ कहते हैं , जो पुत्र प्राप्ति हेतु किया जाता है। जिसमें राजा की पत्नी और उसकी सौतन या दासिया इस कार्य में भाग लेती हैं और मुख्य पत्नी के साथ अश्व यानी घोड़ा संबंध स्थापित करता है क्योंकि इन्हीं मंत्रों में बताया गया है कि पहले यह अश्व !अग्नि देवता हुआ करता था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी भी इसी पुत्रयेष्टि यज्ञ द्वारा उत्पन्न हुए जिसमें ब्रह्मा जी ने आकर माता कौशल्या को पायस दिया जिसे सभी रानियों ने खाया और वो सभी गर्भवती हुईं।

■ बहुपति प्रथा  द्वारा  नारी अत्याचार ■

इससे पूर्व भारतीय धर्म ग्रंथों में बहुपत्नीत्व लेख में हम यह प्रमाण रख चुके हैं कि भारतीय धर्म ग्रंथों में बहु पत्नी विवाह का प्रमाण मिलते हैं परंतु भारतीय धर्म ग्रंथ हमें यह जानकारी भी प्रदान करते हैं कि  जिस प्रकार एक आदमी की बहुत सी पत्नियां होती थीं उसी प्रकार बहुत से आदमियों की संयुक्त पत्नी भी हुआ करती थी अर्थात कई पुरषों की एक पत्नी ।
यह दरअसल नारी अत्याचार का एक धार्मिक कर्मकांड था उदाहरण के लिए देखें

" आ रोह सूर्य अमृतस्य लोकं स्योंनं  पतिभ्यो वहतुं कृणुत्वं" 
अर्थात " हे वधू दहेज पर आरोहा कर और इसे अपने पतियों के लिए शुभकारी बना "
(अथर्ववेद 14/1/ 61) 

इसी प्रकार एक और अन्य स्थान पर अथर्ववेद में लिखा
हुआ है कि....." आत्मनवत्युर्वरा  .......बीजमस्याम्।
अर्थात "हे पुरुषों उस उर्वरा नारी में बीजारोपण करो अर्थात उसे गर्भवती बनाओ"

◆ भारतीय धर्म ग्रंथों द्वारा वेश्यावृत्ति के कारणों का पता लगाना ◆

भारतीय धर्म ग्रंथों का यदि अध्ययन किया जाए तो हमें पता चलता है कि वेश्यावृत्ति के सर्वप्रथम मूल कारण क्या रहे। वेदों में दासी प्रथा का वर्णन मिलता है ऋग्वेद में दास और दासियों को दान और उपहार के तौर पर दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं  और वो उनकी दासियां होती थी तब वह इन दासियों को एक-दूसरे को उपहार के रूप में भेंट करते थे राजा लोग अपने परिजनों और पुरोहितों को दासियों से भरे रथों के रथ दान देते थे उदाहरण के लिए । देखें ........

ऋग्वेद ( 6/ 27- 28 , 8 /68/ 17)

राजा त्रसदस्यु मैं सौभरि कण्व को 50 दासिया प्रदान की देखें .......

(ऋग्वेद 8/19 /38 /5/47/ 6)

इसके अतिरिक्त और भी उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
ये दसियां उस व्यक्ति की हुआ करती थी जिसने शत्रुओं की स्त्रियों को युद्ध में उन्हें छीना हो या जिसे दहेज में यह मिली हों इन दासियों के साथ उस व्यक्ति के ही लैंगिक संबंध होते थे जिसकी यह होती थी। लेकिन.... कुछ दासिया ऐसी भी रखी जाती थीं जो कबीले या गांव की साझी संपत्ति समझी जाती थी अर्थात उनसे हर व्यक्ति लैंगिक संबंध कायम कर सकता था। ये गांव या कबीले की संपत्ति दासियां वैदिक काल की वेश्याएं बनी।
इतना ही नहीं इससे बढ़कर एक और रास्ता वेश्यावृत्ति का पैदा हुआ वो क्या था देखिये ....

" द वर्ल्ड ऑफ कार्टिजन्स" के लेखक मोती चंद्र का मत है कि भाई वहीं लड़कियों को भी बहुत बार वेश्या बना दिया जाता था देखें इस पुस्तक की पृष्ठ संख्या 10

यह वेश्याएं आज तक भारत में चली आ रही हैं इन्हें वेदों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है 
जैसे .... अतित्वरी  (यजुर्वेद,30/15) , अतिकद्वरी (यजुर्वेद30/15) , अप्शक़द्वरी( तैतरीय ब्राह्नमण और रामायण में इन्हें गणिका कहा गया है।

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-5 (अ) 】

पिछले लेखों मैं भारतीय धर्म ग्रंथों में प्रमाण सहित नारी की दयनीय स्थिति का चित्रण किया गया था| आज इस अंक में एक अलग ही स्वरूप को प्रस्तुत किया जाएगा भारतीय धर्म ग्रंथों के हितेषी यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का बहुत ही पवित्र रूप प्रस्तुत किया गया है वहीं धर्म ग्रंथ अश्लीलता एवं नारी विवरण एवं भोग विलास से पूर्णत: मुक्त है परंतु इन धर्म ग्रंथों के रचनाओं के दावे की कल्पना उनके रचे ग्रंथों को पढ़ने के बाद बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है यदि इन धर्म ग्रंथों का अवलोकन किया जाए तो नारी के प्रति कामुकता लोलुप्ता एवं अश्लीलीलता का पूर्ण वर्णन मिलता है ।

【 रामायण में नारी देह एवं सौंदर्य का अश्लील वर्णन】

विभिन्न रामायणों में नारी देह का अति सूक्ष्म अश्लील वर्णन किया गया है परंतु यहां हम केवल सर्वाधिक पढ़ी माने जाने वाली एवं सुप्रसिद्ध वाल्मीकि रामायण के प्रमाण प्रस्तुत किए जाते हैं देखें

जब रात के समय अप्सरा उपरंभा सैनिकों के बीच में से निकली तो रामायण के रचयिता ने बड़ा ही अश्लील वर्णन किया , साथ ही साथ रावण के मुख से उप रंभा के सौंदर्य की जो प्रशंसा करवाई जो इस प्रकार है
"सुंदरी कहां जा रही हो किस की इच्छा पूरी करने के लिए स्वंय चल पड़ी हो किसके भाग्योदय का समय आया है जो तुम्हारा उपभोग पड़ेगा नीलकमल जैसे तुम्हारे सुगंधित मुख के अमृत समान रस को चूस कर  कौन तृप्त होगा? सोने के कलश कैसे मोटे और गोल गोल स्तन किस भाग्यशाली के वक्ष स्थल से सटेंगे???

तुम्हारे गोल मटोल भारी और विस्तृत नितंब ( कूल्हे) साक्षात स्वर्ग के समान है आज इस वर्ग पर कौन सवारी करेगा ????
( श्री वाल्मीकि रामायण उत्तरकांड षडविंशसर्ग)

शूर्पणखा के नाक कान काटने का वृत्तांत तो सभी को मालूम ही है अब ज़रा देखिए कि किस प्रकार शूर्पणखा सीता माता के सौंदर्य का वर्णन रावण के सामने करती है

" उसका सुंदर शरीर तपाए हुए सोने जैसा है नाखून ऊंचे और लाल हैं वह शुभ लक्षणों से संपन्न है उसके सभी अंग सुडोल हैं, तथा कटी भाग सुंदर और पतला है वह विदेह राजा जनक की कन्या है और सीता उसका नाम है।

महान भुजाओं वाले विशाल कूल्हों और कड़े कूचों वाली उस स्त्री को जब मैं तुम्हारी पत्नी बनाने के लिए लाने लगी तब क्रूर लक्ष्मण ने मुझे इस तरह से कुरूप कर दिया। "
(वाल्मीकि रामायण ,अरण्यकांड, सर्ग  34 )

वाल्मीकि रामायण में यह वृतांत भी लिखा हुआ है कि जब महाबली और ब्रह्मचारी हनुमान लंका में प्रवेश करते हैं तो वह रावण के महल के जिन कमरों में झांक कर देखते हैं सैंकड़ों  अस्त-व्यस्त दशा में नग्न और अर्धनग्न सोती स्त्रियां  उन्हें मिलती एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा

"मृदुष्वं गेषु ......................भूषणराजय: " 
अर्थत " केनी सुंदरियों के कोमल अंगों में तथा स्तनों के सामने वाले भाग पर उभरी हुई आभूषणों की सुंदररेखाएं नए गहनों के समान ही शोभा पाती थीं।" ( वाल्मीकि रामायण सुंदरकांड सर्ग -९ / ५२-५३)

महर्षि एवं रामायण के रचयिता वाल्मीकि ने जहां रावण द्वारा सीता माता के सौंदर्य की प्रशंसा अश्लील शब्दों में करवाई
(आरण्यक कांड ,सर्ग 46 / 17-18-19-20)

वहीं अपनी कामुक लेखनी द्वारा हिसाब बराबर करने के लिए सीता माता से खुद अपनी प्रशंसा में अश्लील शब्द कहलवाए। सीता मय्या अपनी तारीफ करते हुए कहती है कि ------

" मेरी जांघें गोल एवं रोम रहित अर्थात चिकनी हैं। मेरी पलकें शंख के आकार की,मेरी भौंहें मिली हुई और बाल काले एवं पतले हैं। मेरी दोनों जांघें, घुटने सुडौल हैं। मेरे हाथ , ,पैर , एवं जांघें सुडोल और उँगलियाँ बराबर हैं । मेरे दोनों स्तन आपस मैं सटे हुए एवं बड़े बड़े हैं, मेरे इन दोनों स्तनों के चूचक भीतर की और धंसे हुए हैं। मेरी नाभी गहरी और सामने से दिखाई देती है। मेरी छाती एवं नितंब (कूल्हे ) उठे हुए  एवं उभरे हुए हैं।"
(रामायण, युद्धकाण्ड , 48/ 10-11)

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान-5 (ब) 】

पिछले अंक में नारी सौंदर्य का भारतीय धर्म ग्रंथों में जिस प्रकार अश्लील वर्णन किया गया है उसका चित्रण प्रस्तुत किया गया था इसी सिलसिले की कड़ी को आगे बढ़ाया जाता है।
जैसा कि पाठको को मालूम है कि रामायण त्रेता युग में लिखी गई उसके बाद द्वापर युग आया इस द्वापर युग में सबसे महान ग्रंथ महाभारत का वर्णन मिलता है । वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत मैं सभी अश्लील, गप्प एवं झूठी कहानी किस्से की बात हम यहां नहीं कहते केवल अपने विषय पर ही बात करेंगे अयोध्या नरेश हर्यश्व यायाति की कन्या माधवी को देख कर गालव मुनि को संबोधित करते हुए कहते हैं

"हर्यश्वस्त्वब्रवीद...... नखानि च: "
अर्थात "इसके बाद राजाओं में श्रेष्ठ राजा हर्यश्व ने उस कन्या के बारे में बहुत सोच विचार कर संतान उत्पन्न करने की कामना से गर्म गर्म लंबी सांसें खींची और मुनि ने कहा श्रेष्ठ ब्राह्मण इस कन्या वह के 6 अंग जो ऊंचे होने चाहिए ऊंचे हैं पांच अंग जो सूक्ष्म ने चाहिए सूक्ष्म हैं , तीन अंग जो गंभीर होने चाहिए गंभीर है तथा पांच रक्त वर्ण के हैं, दो नितंब दो जांघें माथा और नाक यह 6 अंग ऊंचे हैं उंगलियों के पर्व, बाल, रोयें,  नाखून व त्वचा इन पांचों अंगों को पतला होना चाहिए और ऐसे ही वे हैं उंगलियों के पर्व बाल रोयें नाखून व त्वचा इन पांच अंगों पतला होना चाहिए और ऐसे ही वे हैं स्वर अंत करण और ना भी यह तीनों गहरे हैं तथा हथेली पैरों के तलवे बाईं तथा दाहिनी आंख के आसपास का हिस्सा यह पांचो अंग लाल रंग के हैं।
देखे।.......
( महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 116)

इतनी गहराई से नारी का शरीर का नाप तोल करने वाले वेदव्यास का मासालता प्रेम तो पूरे महाभारत में बिखरा पड़ा है परंतु कुछ प्रश्न तो पढ़ने वालों के मस्तिक मैं स्वत: ही उत्पन्न हो जाएंगे जैसे कि आखिर यह माजरा क्या है?  और यह कौन ययाति है और कौन यह गालव ऋषि और यह हर्यश्व क्यों इस प्रकार की अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहा है और यह स्त्री माधवी कौन है आदि। आईये इसको समझने के लिए उस वृतांत की ओर चलें जिससे यह सारा राज खुल जाता है। दरअसल महाभारत की एक कथा है जिसमें ब्राह्मण श्रेष्ठथा और राजा के दोषों का बयान इस कथा में भरपूर होता है विश्वामित्र के एक ब्राह्मण शिष्य थे जिनका नाम था  "गालव"  गालव ऋषि गुरु दक्षिणा में अपनी गुरु को कुछ देना चाहते थे अतः गुरु दक्षिणा में विश्वामित्र ने उनसे 800 श्याम कर्ण सफेद घोड़े मांगे अतः गालव ऋषि राजा ययाति के पास गया राजा का जो ब्योरा महाभारत ने दिया है वह देखने वाला है कहा गया

"यष्टा तु क्रतु.................. दानपति प्रभु"
अर्थात हजारों यज्ञ करने वाले दाता दान शील इत्यादि।
कहने का तात्पर्य है राजा की महानता के लक्षण वही है जो ब्राह्मण तंत्र को मजबूत करते हैं यानी राजा का खूब यज्ञ करवाना ब्राह्मणों को पर्याप्त दान देना यही उसकी महानता है राजा ने गालव से जो कुछ कहा वह भी आश्चर्य चकित करने वाला है उसने कहा

" अघ में सफलं .........तक्षरर्य तवायनघ"
अर्थात" आपने हमारा जन्म सफल कर दिया मेरा कोई उत्तर गया आज यह सारा देश तर गया उक्त दोनों उदाहरण उद्योग पर्व अध्याय 115 से हैं इसके बाद ययाति अपनी बेटी माधुरी गालव ऋषि को दे देता है और कहता है कि ......

"यह इतनी सुंदर है कि इससे बेचोगे तो बड़ी संपदा कोई भी राजा देगा " 
गालव का नामक ब्राह्मण ऋषि लड़की को बेचने के लिए निकल पड़ता है पाठक गढ़ ध्यान दें कि इससे पहले मैंने बताया था कि वेश्यावृत्ति किन किन कारणों से वजूद में आई अब आप यह भी समझ लें कि महर्षि समझे जाने वाले ऐसे पंडों ने इतने घिनौने कार्य किए थे कि बेचारी नारी को वेश्या बना कर रख दिया । अतः ऋषि गालव सबसे पहले इक्ष्वाकुवंशीय  राजा हर्यश्व के पास जाता है। यह विक्रय बेहद दिलचस्प है राजा हर्यश्व लड़की लेकर 200 घोड़े दे देता है और उस सुंदर कन्या को अपने यहां रख लेता जिससे एक संतान पैदा करने के बाद उसे वापस लौटा देता है यह समझा जा सकता है कि राजा ने कितने दिनों तक अपने पास रखा होगा के लड़की एक संतान जन्म दे  देती है इससे नारी की दुर्दशा भी का भी अंदाजा लगाइए की एक बाप अपनी बेटी को किस प्रकार दान दे देता है और एक महान ऋषि इसे उस कन्या को किसी अन्य को बेच देता है वैसे यह हमारा विषय नहीं है परंतु यहां बता दें कि महाभारत काल में ब्राह्मणों का वर्चस्व इस कदर था कि वह जो चाहते मांग लेते और किसी में इतनी हिम्मत भी ना होती कि वह उसको मना करता अगर वह मना करता तो वह अधर्म होता।
ऋषि गालव इतने पर ही बस नहीं करता बल्कि उस लड़की और घोड़े को वापस ले जाने के बाद भी उस लड़की को बारी-बारी अन्य राजाओं राजा दिवोदास और राजा उशीनर को भी बेचता है और उनसे भी धन के अतिरिक्त  200 -200 घोड़े लेता है अतः इस प्रकार 600 घोड़े लेकर गालव घोड़े और लड़की अपना गुरु विश्वामित्र को दे देते हैं क्योंकि विश्वामित्र ने 800 घोड़े मांगे थे और गुरु दक्षिणा में उन्हें गालव ऋषि केवल 600 घोड़े ही दे पाए अतः विश्वामित्र बाकी 200 घोड़ों के बदले उस अबला नारी माधवी के साथ दो सौ घोड़ों के बदले अपने पास रख लेते हैं और उसके साथ संभोग करते हैं जिससे उन्हें एक बच्चा भी पैदा होता है।" 
देखिए इतना घृणित कार्य करने के बाद भी यह सारे के सारे लोग महान बने रहते हैं धार्मिक ग्रंथ महाभारत में महान बने रहते हैं खुद उस अबला नारी को बेच बेच कर धन कमाने वाला ऋषि गालव ही महान बना रहता है जिसे महाभारत गरुड़ धर्मात्मन् के नाम से संबोधित करती है।
अन्य  उदाहरण भी देखते चलिए...

महाभारत के एक प्रसंग में उर्वशी के शारीरिक सौंदर्य का वर्णन इस प्रकार किया गया है।

निर्गम्य चंद्रोदयने ........... .जघनं निर्बध्वत् 
अर्थात " संध्या को जब चारों ओर जब चाँदनी  छिटक गयी तभी , उस समय विशाल नितंबों (कूल्हों)  वाली अप्सरा अपने भवन से निकल कर अर्जुन के निवास की ओर चल पड़ी , चलते समय सुंदर गहनों से सजे उर्वशी के उभरे स्तन जोर से हिल रहे थे इन स्तनों पर सुगंधित मसालों का लेप लगा था इनकी चोंचें भी मनोहर थीं एवं उन पर चंदन का लेप लगा था स्तनों के बोझ से उर्वशी हर कदम पर झुक झुक जाती थी उसके पेट पर पड़ने वाली तीन सिलवटें बहुत सुंदर लग रही थी सुंदर महीन कपड़ों से ढका हुआ नितंबों (कुल्हों) का जोड़ा कामदेव का मंदिर लग रहा था नाभि के नीचे स्थित नितंब पर्वत के समान ऊंचे और मोटे दिख रहे थे कमर में बंधी करधनी( कपड़ों को साधने वाला विशेष प्रकार की खनकदार लट) की लड़ियां नितंबों को और सुंदर बना रही थीं इन नितंबों की शोभा देखकर तो देवलोक में रहने वाले महाऋषियों का चित भी चंचल हो सकता था।
(महाभारत ,वन पर्व, अध्याय 46/ 5/8 /9/ 10/11)

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित नारी सौंदर्य का वर्णन यदि  हम बात करें तो उस वर्णन में दो बातें प्रमुख होती है और उसके बगैर नारी के सौंदर्य वर्णन कल्पना भी नहीं की जा सकती है इस तरह के वर्णन में अति अश्लील वार्ता में नितंबों का वर्णन जरूर मिलता है जिसके बगैर धार्मिक ग्रंथों की कोई बात बनती ही नहीं है भारतीयों का मन तो नितंब दर्शन से ही चंचल हो जाता है जरा देखिए विभांडक नामक ऋषि का इकलौता लड़का श्रष्यश्रृंग हमेशा लड़कियों से दूर रखा गया था उस बेचारे बालक ने जब पहली बार "बाला" को देखा तब अपनी उस रोचक भेंट। का वर्णन पिता से जिन शब्दों में किया उनको पढ़कर वेदव्यास की अनुभवी पकड़ का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। देखें

आश्चर्यरूपा .......... यथेम् ।।
अर्थात उसके गले में एक ऐसी चीज की जो आकाश में चमकने वाली बिजली की तरह चमक रही थी उसके गले के नीचे के छाती पर मांस के दो पंडित हैं जिन पर हमें नहीं थे यह मांस पिंड अत्यंत आकर्षक है उसकी नाभि के आसपास का भाग बहुत पतला था पर नितंब बहुत मोटे थे उसकी कमर में सोने की करधनी उस प्रकार बंधी हुई थी जैसे मेरी कमर को पीर के नीचे मूंज की मेखला बंधी है।
(वनपर्व , अध्याय 112 , 3/4 )

उपरोक्त वर्णन दो श्रषयश्रंग ऋषि द्वारा  किया गया जो कि अभी बालिग भी नहीं हुए हैं परंतु वेदव्यास नाबालिक लड़कियों के रूप का वर्णन जिस निर्लज्जता अश्लीलता से करते हैं और उम्र भी बताते हैं कि उसके उम्र साढ़े 13 साल की है। देखें
(जैमिनीयाशवमेध पर्वणि अध्याय 53 / ३९/४३/४७/४८)

इस अश्लील वर्णन की हद तो तब हो जाती है जब कन्याएं कपड़े उतारकर सरोवर में नग्न प्रवेश कर नहाने लगती हैं और पवन देवता भी काम वश उनके कपड़े उड़ा कर ले जाने में असफल होते हैं

"सूक्ष्मणयपि........... ययौ "
अर्थात उस समय पवन का उन सूक्ष्म रेशमी कपड़ों को उड़ाने मैं समर्थ ना हो सका क्योंकि वह उन कन्याओं के गुणमय पाशो से बंध कर निश्चल हो चुका था।"

अब बताइए 13- 14 वर्ष की अव्यस्क अबोध बालाओं के तन और अंगों का इस प्रकार वर्णन धर्म नीति और दर्शन द्वारा किस प्रकार से उचित है , समझ में नहीं आता इन छोटी बालिकाओं के हास परिहास का यह स्तर व्यास महिमा का चमत्कार ही प्रतीत होता है। 

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-६ (अ)

पिछले सभी लेखों में यह बताया गया था कि नारी का भारतीय धर्म ग्रंथों में क्या स्थान है उससे पूर्व भारतीय धर्म ग्रंथों में बहु विवाह पर भी प्रकाश डाला गया था इसका मकसद केवल यह है कि जो लोग भारतीय धर्म ग्रंथों को सर्वोपरि मानकर नारी सम्मान एवं नारी उदारता की बात करते हैं और दूसरे धर्म विशेष एवं संप्रदाय पर उंगली उठाते हैं एवं सत्ता में पहुंचने पर उनके विरुद्ध कार्रवाई हेतु कानूनी बिल लाने की बात करते हैं वह शायद खुद भारतीय धर्म ग्रंथों से पूर्णत परिचित नहीं हैं आज इस विषय अंतिम लेख दो हिस्सों में प्रस्तुत किया जा रहा है।

[नारी अत्याचार की दास्तान]

【 बाल विवाह एवं सती प्रथा द्वारा नारी अत्याचार भारतीय धर्म ग्रंथों की देन】

धार्मिक इतिहासकारों ने देखा कि आपातकाल में जितनी रक्षा पति अपनी पत्नी की कर सकता है अतः उन्होंने कन्या को शीघ्र से शीघ्र पत्नी बनाने की व्यवस्था ही का डालें कुछ लोग इसका उचित तर्क देने का प्रयास करते हैं अगर उनके तर्क को उचित मान भी लिया जाए परंतु प्रणाम कठोर रहा है फलत: आज समाज में बाल विवाह केंद्र पड़ गई। जो किताब रजस्वला होने तक अपनी कन्या को रोके रखें उसे नरक का भय दिखाया गया अतः उस काल में कितनी ही दूधमुहि बालिकाओं के हाथों में विवाह के कंकड़ में दिए गए। इसी प्रकार हमारे देश में सती प्रथा का आविर्भाव कब हुआ इसका भी कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं दिया जा सकता है परंतु ऐसा मानना है कि अपने पति के साथ प्राणों को क्या करने की प्रथा पौराणिक काल में विद्यमान थी परंतु वेदों में इसका कोई वर्णन नहीं मिलता ईसा से 400 के आसपास संस्कृत भाषा में महाभारत लिखा गया था इस ग्रंथ से पता चलता है कि कौरवों की मृत्यु के बाद उनकी रानियां सती हो गई थी महाभारत के बाद से ही धार्मिक ग्रंथों में सती प्रथा का उल्लेख मिलने लगा । भारत में सती प्रथा के तीन रूप प्रचलित रहे हैं पहला सह मरण प्रथा दूसरा अनु मरण प्रथा तीसरा समूह मरण प्रथा ! एक समय था कि जब सती प्रथा इतनी जोरों पर थी कि पति की मृत्यु के समय यदि कोई स्त्री गर्भवती होती थी तो वह बच्चा पैदा करने के बाद अपने पति की वस्तु के साथ जल जाती थी कहना गलत न होगा कि महाभारत के समय में अर्थात महाभारत काल में जितनी स्त्री निंदा मिलती है और जितनी स्त्री से संबंधित कथाएं वजूद में आए उतने किसी काल में नहीं  आयी ।  महाभारत में कहा गया

नाहि स्त्रीभ्य......... ....................मयजाविभौ।।
अर्थात " स्त्रियां सबसे ज्यादा पाप करने वाली होती हैं।
मदमस्त स्त्रियां जलती आग के समान होती हैं वह मय दानव की माया होती हैं ।
"क्षुर धारा विषं सर्पो ...............   महाबाहो यानी छोरे की धार जहर सांप आग एक तरफ और स्त्री दूसरी तरफ"

महाभारत में ही स्त्री के लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया कि उसे तो केवल पुरुष चाहिए होता है रूपवान हो या कुरूप आदि आदि ।  नारी निंदा से समाज को भर देने के बाद यही महाभारत सती प्रथा का आविर्भाव इस प्रकार करती है कि वह धर्म बन जाए दूसरी ओर हम देखते हैं कि वह स्त्री जिसका पति मर जाता है उसके पास केवल दो ही रास्ते होते पहला यह कि वह उस पति के साथ अपने प्राणों की आहुति दे दे और दूसरा यह कि उसका नियोग उसके देवर अथवा नियुक्त पुरुष के साथ करवा दिया जाये।
अतः इस  स्थिति में अधिकतम स्त्रियों ने जीवित रहने के उद्देश्य हेतु नियोग को करवाना स्वीकार कर लिया । इससे पहले कि लेख में हम नियोग पर प्रकाश डाल चुके हैं विस्तार के लिए पिछला लेख पढ़ें।

【कन्यादान】

प्रथम तथा द्वितीय  लेख में हम कन्या शब्द की परिभाषा वैदिक धर्म के अनुसार बता चुके हैं फिर भी याद धानी के लिए कन्या शब्द की निरुक्त की व्याख्या यहां पर रखते हैं कन्या शक्ति देते हुए आचार्य यास्का लिखा है कि कन्या कन्या कहने का मतलब यह है कि ज्यों ही वह पैदा होती है त्यों  ही यह चिंता यह चिंता होने लगती है कि इसे किसके गले मढेंगे???? 
( देखें निरुक्त अध्याय4 खंड 15)

कन्या को विवाह द्वारा दूसरे के सुपुर्द करने को दान कहा गया अर्थात इसमें धार्मिक पहलू दान का जोड़ दिया गया जिससे माता पिता को स्वर्ग की प्राप्ति के सपने दिखाए गए अतः किसी भी प्रकार के दान के साथ दक्षिणा दिए जाने का नियम है अतः इसे दहेज का नाम दिया गया धार्मिक ग्रंथों में हम देखते हैं कि रथ के रत भर भर के दहेज दिए गए सवाल यह पैदा होता है कि क्या कन्या कोई संपत्ति है जिसे दान दिया जा सके विवाह तो विवाह से 2 ह्रदयों का मधुर मिलन है। यदि विवाह के अवसर पर कन्यादान की प्रथा आवश्यक ही है तो फिर पुत्र के विवाह के अवसर पर पुत्र दान आदि क्यों नहीं? 

【भारतीय धर्म ग्रंथों में असहाय नारी एवं हिंसा】-६ ( ब )

भारतीय धर्म शास्त्रों में वर्णित देवताओं ऋषि-मुनियों भगवानों पंडितों पुजारियों राजाओं आदि महापुरुषों ने महिलाओं पर बहुत अत्याचार किये महिलाओं के लिए बहुत ही बुरी बुरी और बड़ी ही अपमानजनक बातें लिखी जैसा कि इससे पूर्व लेख में आ चुका है और उसे धर्म का नाम दिया।
जिस महाभारत को धार्मिक दर्जा हासिल है उसके सबसे बड़े युद्ध को धर्म युद्ध कहा गया भीष्म पितामह क्योंकि एक महान पुरुष का दर्जा हासिल था  अपने कुल की वधु को सार्वजनिक रूप से निर्वस्त्र होते देखते रहे जुआ खुलकर खेला जाता रहा और उस मैं पांडवों ने अपनी स्त्री तक की बाजी लगा दी स्त्री की पीड़ा तो देखिए  कि वह द्रोपदी जिससे 5 लोग अपनी भार्या बना लेते हैं वह पांच पांच वीर योद्धा  अपनी पत्नी को  सरेआम  नंगा होते हुए देखते हैं यह एक अलग बात की कौरव अपनी भाभी द्रोपति को निर्वस्त्र करने में कामयाब नहीं हो पाते । एक राजा द्वारा परशुराम के माता पिता की हत्या एवं उसकी संपत्ति को लूटने का वृत्तांत आया है जिसके बाद परशुराम कई बार क्षत्रियों का ऐसा सर्वनाश कर देते हैं कि पृथ्वी क्षत्रिय विहीन हो जाती है अर्थात क्षत्राणीयों को विधवा कर दिया जाता है जिसका विस्तृत बयान आदि पर्व अध्याय नंबर 64 में किया गया

"पृथ्वी कृत्वा नि: क्षत्रिय" अर्थात पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया गया।।
उसके बाद इस घटना पर पर्दा डालने के लिए यह प्रसंग जोड़ा गया कि
" ब्राह्मण क्षत्रिय सुतार्थनयो  अभी चक्रम "
अर्थात ब्राह्मणों के पास  क्षत्राणियां संतान पाने के लिए आईं "
यह एक बनावटी वाक्य प्रतीत होता है जो बाद में जोड़ा गया भला किसी भी समाज में विशेष रूप से विकसित समाज में यह स्थिति संभव नहीं होती है कि पति की हत्या करने वालों के पास मारे गए लोगों की विधवाएं अपनी खुशी से संतान उत्पत्ति के लिए जाएं निश्चय ही यह बरसों से चले एक सामूहिक बलात्कार की घटना थी। 

भारतीय धर्म ग्रंथों के ब्राह्मण ने स्त्री दासता की जो व्यवस्थाएं की उन में से एक यह भी है कि पत्नी को पति से पहले मरना चाहिए अध्याय 157 में है कि

"व्यूष्टि रेषा ...... प्रागतिम् "
अर्थात स्त्रियों का यह सौभाग्य होता है कि पति से पहले मर जाएं"

यदि भारतीय धर्म ग्रंथों की शिक्षाओं पर आज अमल किया जाए तो हमारी हिंदू बहनों को ऐसे प्रयोजन करने पड़ेंगे कि वह अपने पति से पहले ही मर जाएं अर्थात अपनी जान खुद ले लें जिसे आत्महत्या कहा जाता है। अथर्ववेद में तो स्त्री को पीटते हुए घर लाने का वर्णन मिलता है।

【भारतीय धर्म ग्रंथों के बलात्कारी पूजनीय 】

आज पूरे देश में बलात्कारियों के विरुद्ध गुस्सा पाया जाता है और आए दिन बलात्कार के विरुद्ध सख्त से सख्त कानून बनाने की आवाज़ें उठ रही हैं परंतु भारतीय धर्म ग्रंथों के महापुरुष बलात्कार करने के बाद भी पूजनीय बने रहे।

देवताओं के गुरु बृहस्पति ने अपने भाई उतथ्या की पत्नी ममता के साथ बलात्कार किया, और उससे जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसके भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए उसे असहाय स्थिति में छोड़ कर चले गए
( श्रीमद्भागवत महापुराण नवम स्कंध अध्याय 20 पृष्ठ संख्या 91 -92)

इसी प्रकार ब्रह्माजी के पौत्र चंद्रमा ने बृहस्पति की पत्नी तारा को जबरदस्ती अपनी पत्नी बना दिया था और उसके साथ बलात्कार करते रहे
(श्रीमद्भागवत महापुराण नवम स्कंध अध्याय 14 पृष्ठ संख्या 62)

इसी प्रकार सूर्य देवता ने कुंती द्वारा उन्हें बाल स्वाभाव वश बुला लिया और पास जाने पर उसे गर्भवती बना दिया कुंती उस समय बहुत ही कम उम्र की थी (श्रीमद् भागवत महापुराण नवम स्कंध अध्याय 24 पृष्ठ संख्या 107)

इंद्र देवता ने भी इसी तरह गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ बलात्कार किया था। वेदों में पिता द्वारा पुत्र को और भाई द्वारा बहन को गर्भवती बनाने के उदाहरण भी नीचे जाहिर है कि यह सब बलात्कार द्वारा संभव हुआ पिता द्वारा पुत्र को गर्भवती बनाना का उदाहरण इस प्रकार

पिता यस्यां दुहितरमधीशकान्क्षयारेत: संजगमानो शिंषनचित् ,
स्वाधयो जन्यंब्रह्म देवा वास्तोष्पांति व्रतपां निरतक्षन.

अर्थात " जब पिता ने अपनी पुत्री के साथ संभोग किया पृथ्वी के साथ मिलकर उस समय वीर्य शिंचन और सुकृति देवों में इससे व्रत रक्षक  देवता (रूद्र) का निर्माण किया। 
(ऋग्वेद 10/ 61/7)"

इसी प्रकार पिता और भाई की कामुकता से दुखी बहन के ऊपर हुए अत्याचार को इस प्रकार दिखाएं गया है क्या कि वह किसी सज्जन से अपना भाई के अत्याचार की शिकायत करती है जिस पर वह आश्वासन देता है।

देखें 
यस्त्वा स्वप्ने......................... क्लिबरूपांस्तिरीटिन:
अर्थात  " 
तेरे सो जाने पर यदि तेरा भाई और पिता कभी तेरे साथ संभोग करते हैं तो हम दोनों को नपुंसक बनाकर मार डालेंगे। 
( अथर्व वेद 8/6/ 7)

यस्त्वा भ्राता ..................  नाशयामसि . 
अर्थात " जो तेरा भाई होते हुए भी जार की तरह तुझ पर टूट पड़ता है जो तेरी संतान को मारना चाहता है हम उसे नष्ट करते हैं । " 
( अथर्व वेद 20/96 /15)

【भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान】-६ (स)

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भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी पर जहां विभिन्न प्रकार से अत्याचार हुए वहीं भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी सौंदर्य एवं उसके चरित्र चित्रण बड़े ही भद्दे और अश्लील अंदाज में मिलते है । नारी के सौंदर्य कि इतनी सुनता से प्रशंसा की गई और स्वयं उसके जरिए से करवाई गई यदि उसका अध्ययन किया जाए तो आंखें शर्म से नीची हो जाते हैं। वैदिक काल से ही नारी को भोग विलास की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया गया जहां वे असहाय एवं मौन मूर्ति बनकर अत्याचार सहती रही वही ब्राह्मण वर्ग ने उसको स्वतंत्रता एवं उसको उसका पर्याप्त हक दिलाने के नाम पर उसको भोग विलास की वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया । आज़ादी की कामना करने वाली स्त्रियों को भारतीय धर्म ग्रंथों ने यह पढ़ाना शुरू किया कि वह अपने रूप यौवन के जरिए से समाज में एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकती है जैसा कि आजकल की पाश्चात्य संस्कृति ने नारी स्वतंत्रता के नाम पर नारी सौंदर्य को प्रस्तुत किया है अतः हम कह सकते हैं कि इस बिगाड़ की देन भी प्राचीन भारतीय धर्म ग्रंथ हैं जिन्होंने धर्म की आड़ में अधर्म का ऐसा खेल खेला। जिस प्रकार आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य प्रसाधन कंपनियां नारी को रूपवती बनाने के सपने दिखाती है उसी प्रकार धार्मिक ग्रंथों में भी नारी को अधिक से अधिक सुंदर बनाने के लिए बहुत से नुस्खे दिए लेकिन भारतीय धर्म ग्रंथों की यह चपलता एवं चालाकी कहिए के नारी सौंदर्य की प्राप्ति को उन्होंने ब्राह्मणों के दान एवं सेवा से जोड़ दिया और तरह-तरह के टोटके बताए। 
अतः जहां सुंदरता बढ़ाने की चाह में आजकल की स्त्रियां रसायनों विभिन्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों तथा यौगिक क्रियाओं का प्रयोग कर रही हैं यह सब वैदिक युग से  चला आ रहा है अतः  हम देखते हैं कि  अक्षय रूप सुंदर लोकमत  की आकांक्षा के लिए तंत्र और मंत्र का प्रयोग भी कई अंधविश्वास ही परिवार करते रहें  किंतु स्त्रियों की स्वाभाविक कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी झुलनिया भरने का जो प्रयत्न सदियों पहले भारतीय पंडितों पुरोहितों और शास्त्र कारों ने शुरू किया ऐसा शायद ही किसी अन्य देश में हुआ हो लूट खसूट का यह प्रयत्न आज भी सफलतापूर्वक  उनके आदर्श द्वारा लगातार चल रहा है भारत सरकार जोके भली-भांति जानती है कि इन कंपनियों द्वारा रूप यौवन की प्राप्ति क्षणिक है जबकि इसके नुकसान बहुत ज्यादा आगे चलकर होते हैं आइए अब देखते हैं कि कितनी चालाकी से भारतीय धर्म ग्रंथों ने नारी के रूप योवन प्राप्ति का वर्णन किया है।

(अत्यधिक कुरूप नारी की सौंदर्य प्राप्ति)

आप चाहे कितनी भी कुरूप हों रति के समान सुंदर हो सकती हैं इसके लिए आपको नर्मदा नदी से प्राप्त वाणलिंग का पूजन करना चाहिए पूजा में स्वर्ण रत्न और धन काम में लाना चाहिए तथा पूजन के पश्चात सब सामग्री का दान गुरु जी को कर देना चाहिए।
(संक्षिप्त शिव पुराण पृष्ठ 551 जनवरी 1962 का कल्याण विशेषांक)

[भगवान शिव की पत्नी पार्वती का रूपवान होना ]

वैदिक काल में संभवत पुरोहितों ऋषि-मुनियों को ऐसा प्रतीत होता होगा कि इन सब बातों पर स्त्रियां सरलता से विश्वास नहीं करेंगी अतः उन्होंने इन सब बातों के साथ मां  देवी पार्वती जी का नाम एक कहानी के साथ जोड़ दिया जो इस प्रकार है।

पार्वती जी काली थी एक दिन शिव जी ने हास परिहास में उन्हें काली कलूटी कह दिया इस पर पार्वती जी ने गुस्सा होकर ब्रह्मा जी की पूजा की और ब्रह्मा जी ने उनका काला रंग बदलकर उन्हें गोरी बना दिया तब ही से उनका नाम गौरी पड़ गया देखें
(संक्षिप्त शिव पुराण पृष्ठ 470 )

पार्वती जी जो तापस्य द्वारा गोरा रंग प्राप्त कर चुकी थी अतः  भारतीय धर्म ग्रंथों के रचनाकारों ने उनके मुख से स्वयं के  कहलवाया कि किस अंग को सुंदर बनाने के लिए क्या दान किया जाए अतः महाभारत में देवी उमा द्वारा अरुंधति को इस विषय में विस्तार पूर्वक समझाने का प्रसंग मिलता है हरिवंश पुराण के 80 वें अध्याय में है कि इसमें  नेत्र नितंब स्तन कमर और अन्य अंगों को सुगठित एवं सुंदर बनाने के उपाय बताए गए हैं। देखें

◆ होठों को सुंदर एवं लाल बनाने का उपाय◆

होठों को सुंदर बनाने के लिए स्त्री को 1 वर्ष तक मिट्टी के बर्तन में पानी पीना चाहिए और 1 वर्ष बाद ब्राह्मण को मूंगा दान करने से उस स्त्री के होंठ लाल हो जाएंगे।
देखें ( हरिवंश पुराण, 80/ 23 )

◆ दांतो को सुंदर बनाने का उपाय◆

मोती जैसे सुंदर दांतो की कामना करने वाली स्त्री को शुक्ल पक्ष की अष्टमी का उपवास 1 वर्ष तक करना चाहिए तथा 1 वर्ष पूरा होने पर चांदी के दांत बनवाकर उन्हें शुद्ध दूध में डालकर दांतो सहित वह दूध ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए।
(देखें हरिवंश पुराण 80/  25)

◆ चेहरे को सुंदर बनाने का उपाय◆

यह उपाय थोड़ा सा और खर्चीला है इसके लिए स्त्री को 1 साल तक प्रत्येक पूर्णिमा को ब्राह्मण को दूध से बनी मिठाई खिलानी होगी तथा 1 साल बाद सोने या चांदी का चंद्रमा बनवाकर ब्राह्मण को दान करना होगा!
देखें .....( हरिवंश पुराण , 80/  27-29)

◆ देह आकृति को सुंदर एवं आकर्षक बनाने का उपाय ◆

आधुनिक युग में जहां रूप यौवन  की चकाचौंध है वहाँ चेहरे की सुंदरता काफी नहीं है अतः शरीर का सुगठित आकर्षण अतिआवश्यक है आकर्षक देह पाने की चाह में धनाढ्य परिवारों से संबंधित स्त्रियां पैसा पानी की तरह बहाने में जरा भी गुरेज नहीं करती अतः यह हाल केवल धनी परिवार की स्त्रियों का भी नहीं है अपितु निर्धन परिवार से संबंधित स्त्रियां अभिनेत्रियों एवं मॉडलों जैसी आकर्षक देह पाने की चाहत दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है उसकी प्रमुख कारण यह भी है कि कामुक एवं आकर्षक देह धन कमाने का बहुत अच्छा साधन बनती जा रही है, छोटा बड़ा पर्दा की चकाचौंध हो या टिक टॉक, लाईकी जैसी एप्लीकेशन हर जगह आकर्षक देह की मांग प्रतिदिन बढ़ रही है। अतः भारतीय धर्म ग्रंथ हमेशा से ही इसके हितैषी एवं कर्णधार रहे हैं।

आकर्षक देह के लिए भारतीय धर्म ग्रंथों के उपाय देखिए

◆आकर्षक स्तन पाने का उपाय ◆

जो स्त्री यह चाहती है कि दोनों स्तन ताड़ के फलों के समान भरे हो वह प्रत्येक दशमी तिथि को मौन रखकर बिना मांगे हुए अन्य का भोजन करें और 1 वर्ष पूर्ण होने पर सोने के बने हुए दो सुंदर बैल जितात्मा ब्राह्मण को दक्षिणा सहित दान में दे वह स्त्री ऊंचे स्तन धारण कर लेगी।

◆ पतली कमर पाने का उपाय◆

पतली कमर की इच्छा रखने वाली स्त्री को 1 साल तक एकांत में भोजन करना चाहिए और प्रतीक पंचमी को उबला हुआ भोजन करना चाहिए तथा 1 साल बाद ब्राह्मण को चमेली की लता का दान दक्षिणा सहित करना चाहिए ! ( देखें हरिवंश पुराण 80 / 33 - 34)

◆ आकर्षक एवं भारी नितंब पाने का उपाय)

जो स्त्री भारी नितंब चाहती है उसे 1 साल तक प्रत्येक त्रयोदशी ( तेरस) को एक समय भोजन करना चाहिए तथा 1 साल बाद प्रजापति के मुख के आकार की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर लाल वस्त्र सहित ब्राह्मण को दान देना चाहिए ऐसा करने पर मन के अनुकूल नितंब प्राप्त होते हैं

देखें....( हरिवंश पुराण 80/  37-39)

यह तो मैंने केवल हरिवंश पुराण के प्रमाण रखे हैं परंतु अन्य धर्म ग्रंथों में भी स्त्री को भोग विलास की वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उसके शरीर को सुंदर एवं आकर्षक बनाने के लिए भी ऐसे ही उपाय प्रस्तुत किये गये उदाहरण के तौर पर मनुस्मृति के अध्याय के श्लोक 22/8/ 30 में सुंदर और आकर्षक नेत्रों की प्राप्ति के लिए दीपक का दान अच्छे चेहरे के लिए चांदी का दान और अच्छे शरीर की चाहत रखने वाली के लिए वस्त्रों का दान देने की बात कही गई है इस प्रकार स्त्री को हर प्रकार से संतुष्ट कर दिया गया कि मात्र दान देकर ही रूप मिल सकता है ! भारतीय धर्म ग्रंथों की यह भोली भाली नारी सदियों से पाखंडीयों द्वारा दिए गए आश्वासनों पर विश्वास कर अपना धन लुटाती रही और आज भी भगवाधारी सरकार में एक सुंदर रूप यौवन पाने के लिए अपना धन विदेशी कंपनियों पर विश्वास कर खर्च कर रही है परंतु उसे यह नहीं मालूम इस बाजारू दुनिया में वह केवल भोग विलास की वस्तु बनकर रह गई है। इसी के साथ "भारतीय धर्म ग्रंथों में नारी का स्थान" नामक लेख समाप्त होते है।

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