जिसे मनुष्य द्वारा धारण किया जा सके वही धर्म है, जब से मानव है तब से धर्म, क्यूंकि धर्म मानव मात्र के लिए ही है, धर्म एक जीवन शैली है जिसे एक मात्र सनातन सत्ता कल्याण कारी परमेश्वर ने मानव मात्र के कल्याण के लिए मनुष्यों में से ही अपने संदेष्टाओं के माध्यम से धरती पर भेजा जिनका बुनियादी संदेश पहले सन्देष्टा आदम(स्वयंभू मनु) (शान्ति हो उन पर) से लेकर आख़िरी संदेष्टा मोहम्मद (शांति हो उन पर) साहब तक एक समान रहा है।
1) उपासना के लायक सिर्फ एक ईश्वर है उसकी महिमा अनोखी है वो अकेला है उसके साथ किसी को साझी ना समझो है, उसके जैसा भी कोई दूसरा नहीं है, जीवन देने वाला, मृत्यु देना वाला और पालने वाला वही एक मात्र सत्ता है,
2) धरती पर जीवन कैसे गुज़ारा इसका हिसाब किताब मरने के बाद ईश्वर के समक्ष उपस्थित होकर देना होगा,
3) ईश्वर के आखिरी संदेष्टा मोहम्मद साहब के साथ साथ सभी सच्चे संदेष्टाओं के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए उनके दिखलाए मार्ग अनुसार आचरण करना
ईश्वर एक है तो उसका धर्म भी एक होगा। धर्म एक जीवन शैली है जिसे ईश्वर ने संदेष्टाओं या संदेशवाहकों के माध्यम से धरती पर भेजा जिनका मूल प्रथम सन्देष्टा आदिं (स्वयंभूमनु, एडम, आदम) से लेकर अंतिम संदेष्टा महामद (नराशंस, पराक्लीत, मोहम्मद साहब) साहब तक एक समान रहा है। अलग हो भी नहीं सकता वरना धर्म भी अलग अलग हो जाएंगे। तो वो
1) उपासना के लायक सिर्फ एक ईश्वर है। वह निराकार है। उसके जैसा भी कोई नहीं। वही एक मात्र सत्ता है,
2) धरती पर जीवन कैसे गुज़ारा इसका हिसाब किताब सभी को मरने के बाद अंतिम दिन यानी महाप्रलय के दिन , ईश्वर के समक्ष उपस्थित होकर देना होगा।
3) ईश्वर के आखिरी संदेष्टा मोहम्मद साहब के साथ साथ सभी सच्चे संदेष्टाओं के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए उनके दिखलाए मार्ग अनुसार आचरण करना
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धर्म की स्थापना ईश्वर ने की थी !
यदि ईश्वर एक है परब्रम्ह एक है और सदा से है एवं उसी को अलग अलग भाषाओं में अल्लाह, भगवान या गॉड कहा जाता है तो यह असम्भव है के वो इतने सारे धर्म संसार को दे । बहुत से धर्म अवश्य ही मानव जाति के अपने बनाए हुए होंगे। ईश्वर ने तो एक ही धर्म की स्थापना की थी। यही वेद कहते है यही कुरआन ने बताया है।
"जहां आकाश और प्रथ्वी मिले हुए थे और फिर अलग अलग हुए वहां जो धर्म की बुनियाद ईश्वर ने रखी थी, उसी को पुनः पाकर विश्व के ऋषिगण स्वयं भी शांत होंगे और विश्व को भी शांति प्रदान करेंगे।"
(ऋग्वेद १:६२:६, ७, ११)
क्या (इस अंतिम ग्रंथ, कुरआन को भी वेद ) ना मानने वालो ने (अपने सर्वमान्य वेदों में) नहीं देख लिया के "आकाश और प्रथ्वी परस्पर मिले हुए थे और फिर हमने उन्हें अलग अलग किया और हमने वहां के अमृत जल से हर चीज को जीवन धर्म प्रदान किया?
तो क्या अब भी वह लोग इस वेद (ब्रम्हा का निज्ज्ञान) अर्थार्त कुरआन पर ईमान नहीं लाएंगे?"
(कुरआन २१:३०)
एक ईश्वर ने जो धर्म स्थापित किया था उसमे आगे चल कर अनेक कमियां आगई , अतः उसी प्राचीन वा शाश्वत धर्म को स्थापित करने हज़रत मनु (उन पर शान्ति हो) आए तथा धर्म ग्रंथ "वेद" संसार को दिए। फिर उसी ईश्वर की इक्षा पूर्ति के लिए हज़रत मूसा (उन पर शान्ति हो)धर्म ग्रंथ "तौरेत " के साथ आए। हज़रत ईसा (उन पर शान्ति हो)भी इंजील में वहीं संदेश लाए तथा अंत में मुहम्मद ( उन पर शांति हो) कुरआन के साथ भी उसी एक धर्म को स्थापित करने आए। एक ईश्वर की इच्छा प्रत्येक युग के मनुष्यो के लिए भिन्न नहीं हो सकती। मूल मान्यताएं एक ही होंगी।
लेकिन फिर यह कैसे हुआ कि आदिकाल में मनु ने मनुष्यो को हिन्दू धर्म सिखाया , मूसा ने हजारों वर्षों बाद आकर उन्हें यहूदी बना दिया , ईसा ने फिर उन्हें इसाई बनाया तथा अंत में मोहम्मद ने मुसलमान बनने को कहा,। ऐसा तो नहीं हो सकता। हमसे अवश्य ही भारी भूल हो रही है। यदि यह सभी ईश्दूत ,यह सभी ऋषिगण सच्चे थे और अवश्य ही सच्चे थे, तो उन सभी ने एक ही धर्म की शिक्षा दी होगी। नाम उस धर्म का भले ही उन्होंने अपनी अपनी भाषा में बताया हो।
कुरआन इसे इस प्रकार बताता है,
"उस ईश्वर ने तुम्हारे लिए वही धर्म नियुक्त किया जो उसने नूह (मनु) पर अवतीर्ण किया था और जो हमने (हे मोहम्मद) तुम पर अवतीर्ण किया और वहीं जो हमने इब्राहिम वा मूसा वा ईसा पर यह कहते हुए उतारा था कि( इसी) धर्म को स्थापित करना तथा इसमें परस्पर टुकड़े टुकड़े ना हो जाना। (४२ :१३)
कुरआन बताता है ,
" और इंसान तो एक ही मत के मानने वाले थे। फिर बाद में उन्होंने परस्पर मतभेद किया।" (१०:१९)
इस सदा से चले आ रहे धर्म का नाम कुरआन ने अरबी भाषा में ' इस्लाम ' बताया।
इस्लाम धर्म का ही पर्यायवाची या दूसरा नाम कुरआन, "सनातन धर्म" या शाश्वत धर्म (दीन - ए- क़य्यीम) बताता है (३०:४३)
हज़रत मोहम्मद ने कुरआन के धर्म को "स्वधर्म" तथा "स्वभाव नियत कर्म" (दीन - ए- फितरत) बताया है।
अब स्वयं देख लें कि मानव जाति के प्रथम सिरे पर जो सनातन धर्म/शाश्वत धर्म/स्वभाव नियत कर्म/स्वधर्म ,ईश्वर ने स्थापित किया था, अन्त तक , कुरआन भेजते समय तक, उसका नाम भी नहीं बदला। और यह बताया कि धर्म तो सदा से यही रहा है। परन्तु लोगो ने अपनी इच्छा अनुसार परस्पर विरोध करके भिन्न भिन्न मत बना लिए। सच्चाई जानना ज़रा भी मुश्किल नहीं है। हैं इसके लिए अपने आडंबरों को अवश्य त्यागना होगा। ईश्वरीय ग्रन्थ मौजूद है। ईमानदारी से तुलना करके देख लीजिए। वेद उठा कर देखे, कुरआन पढ़ कर देखें , मूल मान्यताएं एक ही हैं। मूल धर्म भी एक है । धर्म का नाम भी एक है। जब पहले सिरे और अंतिम सिरे पर आने वाले धर्म ग्रंथ एक ही धर्म प्रस्तुत करते हो तो अवश्य ही बीच के सारे ग्रंथो ने भी वहीं एक धर्म दिया होगा।
फिर मतभेद क्यों हुआ? यह इतनी भारी भूल कैसे हुई? इतने बहुत से धर्म, सबकी अलग अलग मान्यताएं, यह कैसे हुआ? इसका कारण है अपने अपने मान्य धर्म ग्रंथो को ना समझ पाना। मुसलमान सिर्फ १४०० वर्ष पुरानी धार्मिक कौम है पर इन डेढ़ हज़ार वर्षों में ही उन में यह बिगाड़ पैदा होगया की वह कुरआन पढ़ते तो है, परंतु अधिकतर लोग उसका अर्थ नही समझते। हिन्दू सबसे पुरानी धार्मिक कौम है कभी उनमें भी यह बिगाड़ आया होगा कि वह वेद पढ़ते होंगे परंतु उसका अर्थ नही जानते होंगे। फिर एक समय ऐसा आया होगा के वेद सिर्फ उनके घर की शोभा बढ़ाने के लिए रह गए होंगे। उनका पाठ तक बंद होगया होगा। और आज हजारों साल बाद यह स्थिति है कि करोड़ों हिन्दू संसार में आते है और वेदों के एक बार भी दर्शन किए बिना ही चले जाते है। रामायण और महाभारत को वह स्वयं ऋषियों मुनियों की कृतियां कहते है। परन्तु उनके घर में यह पुस्तके तो होती है परन्तु वेद नहीं होते। यही कारण है के धर्म को देवक्रत धर्म ग्रंथो से ना प्राप्त करने से इतने बहुत से अलग अलग धर्म बन गए।
यदि ऐसा न हुआ होता तो सारी मानव जाति आज एक धर्म पर होती। क्यूंकि सारे धर्म ग्रंथ एक दूसरे की पुष्टि करते हैं।
कुरआन सभी देव क्रत ग्रंथो में सबसे अन्त में आया। अपने से पहले के सारे ईश्वरीय ग्रंथो की पुष्टि करते हुए आया। एक मुसलमान के लिए उन सभी में आस्था रखना अनिवार्य है, अन्यथा कुरआन के कथानुसार वह मुसलमान नहीं रह सकता।
कुरआन कहता है
"और हमने सत्य के साथ तुम(मोहम्मद) पर किताब(कुरआन) उतारी जो इससे पहले आने वाले सभी ग्रंथो की पुष्टि करती है और उन पर निग्रान है"
(५:४८)
और कुरआन स्पष्ट तौर पर वेदों की तरफ संकेत करते हुए कहता है
" निश्चय ही यह कुरआन आदि ग्रंथो में मौजूद है ।
(२६:१९६)
आज तक कुरआन के विद्वानों ने यह ना सोचा कि संसार में मात्र एक ही धार्मिक कौम ऐसी है जो आदि ग्रंथ रखने का दावा करती है। उन्होंने वेदों को कभी इस दृष्टिकोण से देखने का प्रयत्न नहीं किया के कुरआन के बताए हुए आदि ग्रंथ यही तो नहीं? वह निरंतर यही मानते चले आ रहे के आदि ग्रंथ संसार में कभी थे, लेकिन अब उनका अस्तित्व नहीं है।
हिन्दू उनसे बड़े अपराधी है। उन्होंने कभी मुसलमानों को यह नहीं बताया के तुम्हारे कुरआन में वर्णित आदि ग्रंथ हमारे पास है। वह यह वेद ही तो है। वह बताते भी कैसे। वह तो स्वयं वेदों से पूर्णतया कट चुके थे।
खैर, कुरआन वेदों की पुष्टि करता है और वेद उसके बारे में क्या कहते है ? आइए देखते है।
"ऊर्ध्व मुख वाली अर्णी पर नीचे मुख वाली अरणी को रखो तत्काल गर्भ वाली अरणी ने कामनाओं की वर्षा करने वाली अग्नि को प्रकट किया।" ( ऋग्वेद ३:२९:३)
"अरणी" वेदों की अलांकरत भाषा में "ज्ञान" को कहा गया है। इस मंत्र का अर्थ है कि सबसे पहले वाले ज्ञान के उपर सबसे अंतिम वाले ज्ञान को रखो अर्तार्थ कुरआन के प्रकाश में वेदों में शोध करोगे तो तुरंत अग्नि का वह रहस्य पा जाओगे जिसकी सदा से कामना थी। यह स्पष्ट रहे कि "अग्नि" , वेदों में ऐसा ज़बरदस्त रहस्य है जिस पर शोध करने पर बहुत ज़ोर दिया गया है और यह बताया है कि जब " अग्नि का रहस्य खुल जाएगा तो तुम मनुष्यो का नेतृत्व करोगे ।
(ऋग्वेद ३:२९:५)
इस प्रकार हमने देखा कि यह दोनों प्रथम और अंतिम ग्रंथ एक दूसरे की पुष्टि करते है। एक दूसरे कि ओर भेजते हैं)
निष्कर्ष यह निकलता है कि यह समस्त ईश्वरीय ग्रन्थ जिनके एक सिरे पर वेद है दूसरे सिरे पर कुरआन, एक ही धर्म को लेकर आए थे। यह पूरी एक श्रृंखला है। इन सभी में आस्था रखना सभी के लिए आवश्यक है । इनकी सहायता से वह असली सनातन धर्म समझा जा सकता है जो ईश्वर की इच्छा है और जो सदा से चला आ रहा एक ही सतधर्म है।
और जब समस्त संसार का धर्म एक होगा तो नफरतें समाप्त होजाएंगी। आतंकवाद खत्म हो जाएगा। यही समाधान है। आइए उस सनातन धर्म की खोज करे जो वेदों में है जो कुरआन में है।
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अखंड भारत का एक आश्चर्य जनक प्रमाण मुसलमानों की मूल उपासना नमाज़ से मिलता है, नमाज़ अरबी भाषा का शब्द नहीं है।
कुरआन में ये शब्द कहीं नहीं आया। अरबी में इसे सलात कहते हैं। जब मुस्लिम धर्म विद्वानों से पूछा गया तो उन्होंने बताया के यह फारसी भाषा का शब्द है। परन्तु फारसी में हमे इसका मूल नहीं मिलता। जैसे संस्कृत में हर शब्द की एक मूल धातु होती है ऐसे ही अरबी और फारसी में भी होता है। जिसे फारसी में मस्दर कहते हैं। नमाज़ का मस्दर यदि नम हो तो नम का अर्थ होता है गीला या भीगा। इससे नमाज़ का कोई अर्थ नहीं निकलता है। विश्व की एक ही भाषा है जहां नम शब्द से नमाज़ का अर्थ बनता है। नम संस्कृत में सर झुकाने को कहते हैं !
ध्यान रहे मुहम्मद साò के जीवन काल में मुस्लिम व्यापारियों के जरिए इस्लाम दक्षिण भारत में फैलना शुरू होगया था। ईरान में तो इस्लाम बहुत बाद में उमर रजी० के शासन काल में पहुंचा था।
भारत में प्रारंभिक नव मुस्लिमो ने सातवीं शताब्दी ही में सलात का नाम अपनी मातृ भाषा संस्कृत में नमाज़ रख लिया था और तभी से पूरे भारत के मुसलमान अपनी मूल उपासना का नाम अरबी के बजाए संस्कृत में लेते चले आ रहे है।
अब आएं इस अदभुत हकीकत की तरफ के केवल भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान , बांग्लादेश , नेपाल वा श्रीलंका के मुसलमान भी सलात शब्द नहीं बोलते बल्कि नमाज़ बोलते है। यह देश तो कुछ समय पूर्व तक भारत का हिस्सा थे ही लेकिन आश्चर्य की बात यह है के पश्चिम में अफगानिस्तान, ईरान, मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान , उज़्बेकिस्तान, कज़ाकस्तान, आदि और पूर्व में बर्मा, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, और कोरिया आदि सभी देशों में सलात के बजाए नमाज़ शब्द ही प्रचलित है। अदभुत बात यह है के उन सभी देशों में नमाज़ शब्द प्रचलित है जिनका कभी भारत का अंग होना माना जाता था। जबकि अन्य सभी देशों के मुसलमान इसे सलात ही कहते हैं। इस प्रकार मुसलमानों की मूल उपासना से भी प्राचीन भारत की सीमाएं सिद्ध होती है।
विभाजन_का_ज़िम्मेदार_कौन ?
हमारा भारत छोटे छोटे टुकड़ों में कब बटा था , यह एक प्रश्न है लेकिन ज़्यादा अहम सवाल ये है के विभाजन क्यू हुए थे। रोग की सही पहचान हो जाए तो बीमारी का बढ़ना ना केवल रुक सकता है बल्कि रोग जड़ से उखाड़ के दूर भी किया जा सकता है। विभाजन के कारण जानना ज़रूरी है ताकि भविष्य में तो रोक लगे ही और क्या पता टूटे हुए अंग भी वापिस जुड़ जाएं। यह असम्भव लगता होगा। निराश होने की बजाए आइए कारण पर तो विचार कर ले। 1947 में देश के विभाजन का ज़िम्मेदार कुछ लोग मुसलमानों को ठहराते हैं। कुछ लोग सनातन धर्मी हिन्दुओं पर ज़िम्मेदारी डालते हुए कहते हैं के अगर उन्होंने बहुसंख्यक होने का लाभ उठाते हुए मुसलमानों को उनकी संख्या अनुसार प्रतिनिधित्व देने की मांग ना ठुकराई होती तो जिन्ना के गुब्बारे से हवा निकल जाती। कुछ अन्य लोगो का विचार है के ना मुसलमान ज़िम्मेदार है ना हिन्दू , बल्कि अंग्रेज़ो ने दोनों को लड़वा कर विभाजन की स्थिति पैदा कर दी। सच चाहे जो हो लेकिन 1947 में होने वाला विभाजन पहला नहीं बल्कि अंतिम विभाजन था। आधुनिक इतिहास से पहले बहुत विभाजन हो चुके है। मुसलमानों का भारत में प्रवेश तो आधुनिक इतिहास की बात है। भारत पाक विभाजन से पहले जब देश टूट टूट कर बिखर रहा था तब मुसलमान ना थे। तब अंग्रेज़ भी ना थे और ना विश्व में उनका कोई उल्लेखनीय स्थान था।
जब पहले कई विभाजन हुए जो शायद शताब्दियों तक होते रहे, तब देश में केवल सनातन धर्मी हिन्दू थे। उन दर्जनों विभाजन का ज़िम्मेदार कौन था?
नफरतों_को_प्रेम_में_बदलना_है
सत्य यह है के विभाजन की ज़िम्मेदारी किसी भी समुदाय पर नहीं होती। विभाजन की असली ज़िम्मेदार होती है नफरत। जब दो सगे भाइयों में नफरत पैदा होती है तो घर में दीवार खड़ी हो जाती है। दिलो में इतनी कम जगह रह जाती है के आधी ईंट की दीवार पर भी लड़ते है। उसके लिए भी अपना हक छोड़ने को तैयार नहीं होते।लेकिन अगर नफरतों में कमी हो जाती है तो दीवार में खिड़की भी खुल जाती है, और यदि नफरत मुहब्बत में बदल सके तो ऐसा भी हो जाता है के दीवार तोड़ दी जाती है। पूर्व वा पश्चिम जर्मनी के बीच की दीवार टूट गई। हमे यह करिश्मा अजीब क्यों लगता है? ज़रूरत है दृढ़ आत्म विश्वास की और प्रेम के प्रचार की। तभी अखंड भारत का स्वप्न साकार होगा।
यह कितना ही असम्भव कैसा ही काल्पनिक प्रतीत होता हो परन्तु हमारा यह अटूट विश्वास है के ना केवल 1947 में खड़ी होने वाली दीवार गिराई जाएगी बल्कि हमारा पुराना महान विशाल अखंड भारत हकीकत बनेगा।
धर्म_ही_जोड़ेगा।
धर्म तोड़ता नहीं जोड़ता है यह सबने सुना होगा परन्तु फिर भी धर्म के नाम पर नफरत फैलाना भी बहुत आसान रहा है। विभिन्न धर्मो के मानने वालो को धर्म के नाम पर स्थाई रूप से जोड़ पाना असम्भव रहा है। समस्या यह है के धर्म अनेकों थे कहां। अनेकों मत हो सकते हैं, धर्म नहीं। धर्म ईश्वर का दिया हुआ है। ईश्वर ने इंसान को प्रथ्वी पर किसी उद्देश्य से ही भेजा था। उसने जो कुछ चाहा उसे धारण करने का नाम धर्म है।
जब ईश्वर एक है तो धर्म भी एक है। उसी एक धर्म के, उसके दूतों पर भिन्न कालो में भिन्न भाषाओं में बहुत से इशग्रंथ अवतरित हुए। वेद से कुरआन तक सभी उसी एक धर्म के ग्रंथ है।
हम मत - मतांतरो को त्याग कर वेद और कुरआन के एक धर्म पर एकत्रित हो जाएं। तब ईश्वर हमसे प्रसन्न होगा और इस लोक में भी हमें शांति देगा तथा परलोक में स्वर्ग।
#यह_धर्म_है_शुद्ध_एकेश्वरवाद_का_।#उसके_समक्ष_अपने_कर्मो_का_हिसाब_देने_में_विश्वास_का
#उसके_भेजे_हुए_ग्रंथो_के_अनुसार_यहां_परीक्षा_का_जीवन_बिताने_का_और_उसकी_सृष्टि_से_प्रेम_का
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इस्लाम ने लिंग आधारित भेदभाव (Gender Bais) नहीं रखा है इस्लाम मर्दों को औरतों से सुपीरियर नहीं मानता। लेकिन जिसने पैदा किया और जिसने बनाया उसे पता है के किसको क्या सलाहियत दी है वो फील्ड वो मैदान जहां मर्द ज़्यादा capable हैं वहां उनकी ज़िम्मेदारियां भी ज़्यादा रखी है उनके rights या हुकूक भी ज़्यादा है। और जहां औरते ज़्यादा capable हैं मर्दों के मुकाबले में वहां उनकी जिम्मेदारी भी ज़्यादा है और rights भी ज़्यादा है।
इस्लाम ये नहीं कहता के दोनों बराबर है। इस्लाम कहता है दोनों different है। ये नहीं कहता के एक, दूसरे से ऊंचा है। ये गलत तसव्वुर है जो मुसलमानों में फैलाया गया है।
मसलन ये एक बायोलॉजिकल फैक्ट है एक हकीकत है के फिजिकली मर्द ज़्यादा स्ट्रॉन्ग होता है। औरत फिजिकली इतनी स्ट्रॉन्ग नहीं होती। अब ये फैक्ट अपनी जगह पर है।अब इसके लिए मर्दों के राइट्स ज़्यादा रखे गए और साथ में ज़िम्मेदारी भी ज़्यादा है। उसकी ज़िमेदारी है के प्रोटेक्शन दे और मदद करे उसकी जो फिजिकली कमजोर है।उसका शोषण ना करे। इसी तरह अगर मर्द और औरत में झगड़ा होजाता है और बच्चा छोटा है तो मां को दिया जाएगा।उसका हक ज़्यादा रखा है। पूछा मोहम्मद सलाल्लहु अलैही वसल्लम से एक सहाबी ने ।अल्लाह और उसके रसूल के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा काबिले एहतेराम या सबसे ज़्यादा आदर किसका होना चाहिए। तो रसूल ने फरमाया के "तुम्हारी मां", फिर पूछा उसके बाद कौन?। फिर फरमाया "तुम्हारी मां", अब तीसरी बार फिर पूछा के उसके बाद नेक्स्ट कौन। तो फिर वही जवाब मिला "तुम्हारी मां"। फिर सवाल किया के उसके बाद?.फिर फरमाया "तुम्हारे पिता"..
100 में 75% माता को हक दिया 25% पिता का। क्योंकि मां की कुर्बानियां ज़्यादा है पिता के मुकाबले। इसीलिए राइट्स भी ज़्यादा।।
लेकिन वो मैदान के जहां सलाहियत मर्दों की ज़्यादा थी के उन्हें वहां पर होना चाहिए था। ये एक पब्लिसिटी है और ये सिर्फ औरत का शोषण करने की वजह से है। के दोनों को बराबर रखिए। बराबरी के नाम पर क्या किया दुनिया ने आजतक? औरत को कहां लेकर आए बराबरी में ।
कैबरे डांसर बनाया। होटल की रिसेप्शनिस्ट बनाया। 90% रिसेप्शनिस्ट लड़कियां होंगी। उसको एयर होस्टेस बनाया। औरत की मजोरिटी को ये ऐसी थर्ड क्लास की जगह पर ले के आए। आप executive पोस्ट यानी डिसिजन मेकिंग पोस्ट को देख लीजिए। जो power पोजिशन होती है। दुनिया में कितनी औरतें पहुंची इन पोजीशन के उपर। Liberated सोसायटी जो कहलाती है वहां की औरतें कितनी पहुंची। हिलेरी क्लिंटन अगर जीत जाती तो अमेरिका की हिस्ट्री में पहली महिला राष्ट्रपति बनती। जबकि अमेरिका को आज़ाद हुए लगभग 250 साल हो गए। 250 साल में एक भी महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई। और कब से सोसायटी में women empowerment की बात चल रही है। होना तो ये चाहिए था के 50-50 % मामला लेकर चलते। कभी औरत बन गई और कभी मर्द।लेकिन ऐसा कही नहीं है। दुनिया के कुछ मुल्कों के अंदर कहीं कही महिलाएं उपर की पोस्ट तक पहुंच सकी है। लेकिन overall जो महिला आजादी का डंका पीट रहे वही मुल्क अपने यहां औरत को ऊपर डिसिजन मेकिंग पोस्ट पर नहीं आने देते। 60-,40 का ratio भी नहीं है पार्लियामेंट में। मिनिस्टर भी ,5% से ज़्यादा नहीं। आज़ादी का शोर मचाने के लिए औरत को जिस जगह लाते है वो जगह ये है। थर्ड क्लास जॉब्स और वो भी ऐसी जिसमें औरत के इंटेलेक्चुअल टैलेंट(दिमागी सलाहियत) का कोई यूज नहीं बल्कि उसके जिस्म को इस्तेमाल करके उसको कमोडिटी( इस्तेमाल की चीज़) की तरह पेश कर रहे दुनिया के सामने। चाहे रिसेप्शन हो या एयर होस्टेस दोनों जगह यही मकसद है ।बस एक showoff के लिए show piece बना कर अपने मनोरंजन का जरिया बना दिया औरत को। उसके एहसास और जज़्बात को दफ़न करके उसको हाड़ मास के पुतले की तरह लोगो के सामने परोस कर उनकी आंखो को ठंडक पहुंचाई जा रही है। ऐसा सिर्फ इसलिए हो रहा है जिससे अरबों का मुनाफा कमाया जा सके। बराबरी का ढोंग करके औरत को जिस जगह लाते है वो ये है। बस इससे आगे नहीं निकलने देते। इस्लाम ने कहा दोनों different है।
बराबरी के नाम पर औरत के वकार या प्रतिष्ठा को जितना आज गिरा दिया गया , इतना शायद कभी नहीं था। नारी को अबला बनाने वाले यही लोग है, पहले उसे अबला(कमज़ोर) बनाते है फिर बराबरी का पाठ पढ़ा कर सरे आम इज्ज़त को नीलाम कर देते है और कहते है के यही तो कामयाबी है।
#इस्लाम #ने #औरत #के #स्टेटस #को #इतना #ऊंचा #उठा #दिया #के #जन्नत #भी #उसके #क़दमों #में #आगयी
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इस्लाम ने जब गरीबी रेखा रखी तो शुरू में ये रखा था के 7.5 तोला (75grams) सोना या 52.5 तोला(525 grams) चांदी के बराबर किसी के पास अगर अपनी ज़रूरतें पूरी करने के बाद एक्स्ट्रा है तब वो जकात देगा, इसे निसाब कहते है। रसुलुल्लाह के दौर में 7.5 तोला सोने की कीमत 52.5 तोले चांदी के बराबर थी। और भी कुछ चीजों पर जकात थी। जैसे 5 ऊंट हो या 40 बकरिया हो तो जकात देगा। अब आज 7.5 तोले सोने की कीमत या 5 ऊंटों की कीमत या 40 बकरियों की कीमत औसत दर्जे में तकरीबन बराबर है , सिर्फ चांदी का रेट गिर गया। जब सिर्फ चांदी गिर गई तो अब चांदी निसाब में शामिल नहीं होगी।
सोने और चांदी पर जकात इसलिए थी क्यूंकि आज जो नोट (paper currency) आपके हाथ में होते है ये पहले नहीं होते थे। पहले सिक्के डायरेक्ट सोने और चांदी में होते थे। तो अगर किसी ने सोना या चांदी रोका (accumulation) तो एक तरीके से वो करेंसी रोक रहा है। Economic system of islam के मुताबिक़ इस्लाम चाहता है के करेंसी सर्कुलेशन में रहे। रुकनी नहीं चाहिए। ब्लॉक नहीं होनी चाहिए। और अगर कोई जमा कर रहा है तो उसमे से हर साल 2.5% निकलता रहे। जकात की फॉर्म में। तो पहले डायरेक्ट करेंसी ही सोने चांदी में होती थी इसलिए सोने चांदी पे जकात थी।
आज सोने चांदी में डायरेक्ट नहीं होती करेंसी ,लेकिन पूरी दुनिया में करेंसी की बुनियाद(standard) सोना ही है। इसमें अब चांदी बुनियाद(स्टैंडर्ड) नहीं रहा। इसलिए भी अब सोने के हिसाब से निसाब्ब होगा। चांदी के हिसाब से नहीं। 52.5 तोला चांदी आज लगबघ 24000 रुपए की। और 7.5 तोला सोना आज लगबघ 2.5 लाख का हुआ। यहां तो 10 गुने से भी ज़्यादा का फर्क है। अब मान लीजिए जिसके पास चांदी हो 60 तोला यानी लगभग 30,000 की तो उस पर जकात फ़र्ज़ होगई।लेकिन जिसके पास सोना 7 तोला है यानी 200,000 रुपए का, तो उस पर अब भी फ़र्ज़ नहीं हुई। ये तो illogical बात है इसलिए इस्लाम तो ऐसा नाइंसाफी वाला निज़ाम नहीं बना सकता। अगर चांदी वाला मसला ही लिया जाए तो गरीब आदमी की भीड़ की भीड़ मुकल्लफ़ होजाएगी। और देना पड़ेगा । जबकि गरीब आदमी से लेनी नहीं है जकात , उन्हें तो देनी है, वरना जकात का मकसद ही डिफीट होजाएगा। तो फिर करना क्या होगा।
वहां से उसूल लिया जाएगा। देखा जाएगा के आखिर जकात सोने चांदी पर थी क्यूं। जवाब मिलेगा, करेंसी की वजह से। और करेंसी का स्टैंडर्ड अब सोना है। चांदी नहीं। तो ज़ाहिर है सोने को ही बुनियाद बनाएंगे।
अब सवाल ये के जकात इनकम पर है या माल पर। दोनों पर ही है।लेकिन दोनों के अलग हिस्से हैं। ऐसा माल (capital) जो रखा हुए है एक तरफ। उसे किसी ऐसी जगह लगाया(invest) नहीं गया के उससे इनकम हो। तो यहां तो रखे हुए माल(Capital) पर जकात देनी होगी।
क़ुरआन में कहा गया है (خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً )" इनके मालो में से भी लो" (9:103) , दूसरी जगह ये फरमाया के अपनी कमाई (Income) में से दो।
अब माल का उसूल ये के उस माल पर से लिया जाएगा जो इनकम पैदा करने में इस्तेमाल नहीं होरहा है। जो रोक कर रखा गया है। अब अगर ज़ेवर बहुत से रखे है और रेगुलर यूज में नहीं है तो उस पर 2.5% देना होगा। अब अगर ज़ेवर तो है लेकिन आमदनी इतनी नहीं के जकात दे सके। तो फिर उसी ज़ेवर में से हर साल 2.5% कम करते जाइए वहीं जकात निकाल दीजिए। इस्लाम का मकसद यही है के चीज़े ब्लॉक ना कि जाएं। लेकिन अगर माल की मोहब्बत इतनी है के उसमे से कम भी नहीं करेंगे तो फिर इसकी तो अल्लाह के यहां पकड़ होगी। ये निज़ाम ऐसा है के अगर माल को लगाया जाए कमाने में (इन्वेस्ट किया जाए) तो जकात का अमाउंट काफ़ी कम हो जाता है क्यूंकि जो पैसा ब्लॉक पड़ा है जब वो बाहर आएगा तो उससे फायदा है अवामुन्नास( लोगो )का। पैसा सर्कुलेशन में आएगा। इकॉनमी बढ़ेगी। जॉब्स पैदा होंगी।
इसलिए सोने चांदी के बर्तनों को मना किया था। मर्दों को सोना पहनने को मना किया था। औरतों के मिज़ाज को देखते हुए उन्हें ये इजाज़त दे दी गई ज़ीनत इख्तेयार करने के लिए, बस उसे दिखाती ना फिरे। मर्दों को रोक दिया गया जिससे के (accumulation) इकठ्ठा होने से बच जाए। वरना करेंसी में दिक्कत होजाएगी। पहले बराहे रास्त सोने की करेंसी हुआ करती थी और आज सोने के बदले होती है।लेकिन बेस (Base) सोना ही है।
तो अब अगर रखे हुए माल से इनकम पैदा होने लगे तो फिर माल पर जकात नहीं होगी।सिर्फ इनकम पर होगी। अब जिस घर में रहते है उस पर तो जकात नहीं है क्यूंकि वो तो बुनियादी ज़रूरत थी। लेकिन अगर कोई और ज़मीन लेकर डाल दी तो वो पैसा आपने रोका है। और उसके कैपिटल पर जकात देनी होगी। अगर आप उसे यूज करना शुरू करदेते है कोई फैक्ट्री लगा देते है तो फिर उस कैपिटल पर नहीं होगी फिर तो फैक्ट्री की इनकम पर होगी। पर फलसफा ये है के कैपिटल ब्लॉक ना होने पाए। बल्कि इनकम जनरेट (पैदा) हो। और वो फैले, सर्कुलेशन में आए और जॉब्स पैदा हो , लोगो की इनकम बढ़े, अल्टीमेटली अवाम (पब्लिक) का फायदा हो।
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बुराक़ (बिजली के) घोड़े से मेराज के सफर की पुष्टि God patitcles (Higgs Boson) experimental से होती है।
क़ुरआन सुरतुल अम्बिया 21:30 में अल्लाहने कहा कि मैने बंध पदार्थ (one lump) को (as per by big bang theory ) खोल दिया और आकाश और ज़मीन को अलग कर दिया । सुष्ट्री सृजन की इस प्रक्रिया को खगोलियशास्त्री big bang कहते हैं ।विश्वका हर दिखनेवाला पदार्थ (तत्व) atoms के समूह संयोजन (दल/mass) से बना है यानी हर पदार्थ में रहा atom की संरचना electrons (negative charge), protons (positive charge) , और nuetrons (nuetral) से हुई है । और ये सब मिलके किसी पदार्थ का molecules बनते है और इसी molecules का समूह से पदार्थ बनता है जैसे iron, water आदि । एटम में electrons अति गति से सक्रिय है । इस thesis पर recently march 2013 में स्विट्ज़रलैंड में 27 km लम्बे बंध टनल (hadron collider) मे दोनों ends से electrons particles को एक दूसरे के सामने accelerated velocity (light speed) देकर collision का महा भयंकर विस्फोट (big bang ) कराया गया जिसके नतीजे (result) मे में God particles का सर्जन हुवा और अचानक इस particles की खोजने ब्रह्मांड की रचना की big bang theory को सिर्फ समर्थन नही दिया बल्कि एक नयी जानकारी ने वैज्ञानिकों को आश्चर्य में गरकव कर दिया । ये नये God particles को वैज्ञानिकों ने Higgs Boson particles का नाम दिया । इस God particles की खासियत ये रही है कि ब्रह्मांडमे जितनी चीज़ें जैसे इंसान, जानवर, झाड़, पहाड़, नदी, बादल, आसमान, तारे, चाँद,पृथ्वी, सूरज विगेरे दिखते हैं वो इस god particles की अस्तित्व की वजह से है और उसका माप यानी unit value 127 GeV है । अगर किसी चीज़ की GeV value 127 से कम हो जाये या कम कर दिया जाये वो अद्रश्य (zero mass/weight loss के प्रभाव में) हो जाएगा । big bang की घटना के बाद से पूरा ब्रह्मांड का अवकाश (space) इस God Particles के माध्यम से भरा हुवा है इसलिये उसके प्रभाव में हर भौतिक चीज़ (physical material) दिखाई (visionable) देती है । इसलिए पृथ्वी और आसमानों के बीच जो खाली जगह दिखाई देती है उसको वैदिक वैज्ञानिक blank या empty space कहते हैं । जो सच मे खाली नही है बल्कि god particles का अस्तित्व पुरवार हुवा इसलिये अब उसे खाली जगह (empty place ) कहना non scientific हो गया । सुष्ट्री में जितने भौतिक पदार्थ के दल (body mass) नज़र (द्रश्यमान) आते हैं उसके पीछे space (empty) मे जो God particles है वो पदार्थ के साथ उसका संपर्क होने की वजह से वो पदार्थ दिखाई देते हैं । zero mass वाली कोई भी चीज जैसे light, laser, radio waves, magnetic waves या field, आवाज़ के तरंग विगेरे massless body है उनके ऊपर god particles सीधा प्रभाव नही डालता है इसलिये वो दिखाय नही पड़ते । अगर वो सब god particles की वजह से दिखाय पड़ते तो पृथ्वी पे आये तमाम tower से निकले communications के तरंगों की वजह से सारा आसमान रंगों से छाया होता और इंसान को आसपास कुछ दिखाय नही पड़ता । क़ुदरत ने जानबूझकर इंसानों को ये nuisance से बचाये रख्खा है । इस वजहसे ये सारे waves की गति अवकाश में प्रकाश की गति प्राप्त करती है । अगर किसी body mass वाली चीज को अवकाश मे प्रकाश की गति से सफर करनी होतो हो तो पहले उसके body mass के higgs bonson की value 127 GeV से कम करना होगा जिससे वो mass less हो जाएगा और अद्रश्य हो जाएगा और उसपे god particles का प्रभाव zero हो जाएगा । और उस वजहसे वो light speed से गति कर सकेगा या light speed की गति से ज़्यादा गति करना हो तो जिस जगह पहुँचना हो वहाँ तक का पूरा रास्ता god particles से मुक्त रखना होगा । इसलिये मुहम्मद (सअ) नबी के मेराज की सफर मे उनके बदन के mass value Gev का मूल्य से 127 कम कर अद्रश्यका रूप दिया गया होगा और बुराक़ तो पहले से ही प्रकाश का ही बना हुवा था । इसलिये इनका ये सफर अद्रश्य सदेह (शरीर के साथ) हुवा होने का अब कोई संदेह नही रहता । ये सफर अल्लाह की मर्ज़ी से हुवा था । और अपने पियारे रसूल की सन्मान में ये यात्र का आयोजन अल्लाह की तरफ किया गया था । मेराज के सफर की वैज्ञानिक पुष्टि ।
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